बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

आईपी यूनिवर्सिटी का रजत जयंती स्वास्थ्य मेला 5 अक्टूबर से

 नई दिल्ली। गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर एक विशाल स्वास्थ्य मेले का आयोजन करने जा रहा है। यह मेला 5 अक्टूबर से 10 अक्टूबर तक दिल्ली के तालकटोरा इंडोर स्टेडियम में आयोजित किया जाएगा।

एक कदम अच्छे स्वास्थ्य की ओर विषय पर आयोजित इस स्वास्थ्य मेले में प्रत्येक दिन स्वास्थ्य जागरूकता से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। जनता को विभिन्न प्रकार के चिकित्सीय परीक्षण एवं स्वास्थ्य सलाह उपलब्ध कराने के लिए कई प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्थाएँ इस मेले में भाग ले रही है। आम जनता को नेत्र, दांत, स्पीच, हीपरिंग, कैंसर, ईएनटी, बीएमडी, बीएमआई ब्लड प्रेशर, बोन डेनसिटी, मधुमेह, ईसीजी जैसी कई जाँचों का लाभ इस स्वास्थ्य मेले द्वारा मुफ्त में उपलब्ध कराया जाएगा। इसके साथ ही उन्हें होम्योपैथी और आयुर्वेद की फ्री ओपीडी और योग, मानसिक स्वास्थ्य, पोषण एवं जीवन शैली प्रबंधन का मुफ्त परामर्श भी दिया जाएगा। साथ ही बीएलएस, सीपीआर, फर्स्ट एड जैसे जीवन रक्षक कौशल का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा और प्रशिक्षण पूरा करने वालों को प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा। 

मेले के स्वास्थ्य जन-जागरूकता पेवेलियन में जीवनशैली, मानसिक स्वास्थ्य, बुढ़ापे में देख-भाल, अंग एवं रक्तदान, कैंसर की रोकथाम, संक्रामक रोग, दांतों की देखभाल, पोषण एवं स्वास्थ्य परामर्श पर्यावरणीय रोग एवं उनकी रोकथाम जैसे विषयों पर चर्चा एवं परिचर्चा आयोजित की जाएँगी। मिलेट के भी कई स्टॉल होंगे जहाँ मिलेट के उपयोग से होने वाले लाभ की जानकारी भी दी जाएगी।

मेले में आए लोगों के मनोरंजन के लिए हर दिन समूह गायन, शास्त्रीय एवं पश्चिमी संगीत और गायन, लोक नृत्य, शास्त्रीय नृत्य, स्ट्रीट डांस, कोरियोग्राफी, वन एक्ट प्ले स्ट्रीट प्ले, मोनो एक्टिंग, किज, डिबेट जैसे कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

इस मेले में प्रवेश, चिकित्सीय परीक्षण एवं स्वास्थ्य सलाह बिलकुल मुफ़्त है! मेले के आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति पद्मश्री प्रो. डा. महेश वर्मा ने कहा कि हमारा मकसद स्वास्थ्य सेवाओं को जन जन तक पहुँचाना और स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करना है। यह विश्वविद्यालय का एक अनूठा प्रयास है जिसके माध्यम से आम जनता को स्वास्थ्य लाभ पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसका लाभ सभी को लेना चाहिए।

शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

लोकतंत्र के मन्दिर में अमर्यादित शब्दों की पार होती सीमा

 

बसंत कुमार

वर्ष 2014 में जब श्री नरेंद्र मोदी जी पहली बार सांसद बन कर आये तो लोकसभा में प्रवेश करते समय सीढ़ियों पर दंडवत प्रणाम करके यह आभास दे दिया कि देश के लोकतंत्र का यह मन्दिर श्रद्धा का स्थान है और इस वजह से एक उम्मीद यह जगी थी कि लोकतंत्र के इस मंदिर में अब वाद-विवाद और परिचर्चा का स्तर पुरानी बुलंदियों को छूने लगेगा क्योंकि विगत कुछ वर्षो में संसद में परिचर्चा का स्तर काफी गिर गया था। हम सभी जानते हैं कि पं. जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में सदन में परिचर्चा का स्तर बहुत उच्च कोटि का हुआ करता था, पर सभी का भ्रम उस समय टूट गया जब देश के सूचना मंत्री अनुराग ठाकुर को एक सभा में अल्पसंख्यक समाज के विरुद्ध यह नारा लगाते हुए सुना गया "देश के इन गद्दारों को गोली मारो सालों को" अब प्रश्न यह है कि देश में यदि कोई गद्दार है तो उसके लिए पुलिस और न्यायालय है उसके लिए मंत्री को गला फाड़ने की जरूरत क्या है। देश की राजनीति में अटल जी, आडवाणी जी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज अरुण जेटली जैसे नेता थे जिन्होंने दशकों तक विपक्ष की राजनीति की पर कभी भी किसी नेता के विरुद्ध अमर्यादित टिप्पणी नहीं की।

यहां तक कि एक बार एक युवा सांसद अटल बिहारी ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की कटु आलोचना की पर पंडित नेहरू युवा सांसद की इस आलोचना से नाराज नहीं हुए अपितु अटल जी के पास जाकर उनकी पीठ थपथपाकर शाबासी देते हुए कहा कि तुम एक दिन इस देश के प्रधानमंत्री अवश्य बनोगे और पंडित नेहरू की भविष्यवाणी चार दशक बाद सही हुई। इसी तरह संसद में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और अटल जी के साथ खूब नोक-झोक होती थी पर कई बार ऐसे अवसर आये जब इंदिरा जी ने देश हित में संसद को सुचारू रूप में चलाने हेतु अटल जी से सहयोग मांगा और अटल जी ने पूरा सहयोग किया पर आजकल जब हमारी सेना दुश्मन के क्षेत्र से सर्जिकल स्ट्राइक करती है तो विपक्ष इसके सबूत मांगता है इससे देश के बाहर देश की छवि धूमिल होती है।

अभी कुछ दिन पूर्व महिला आरक्षण बिल के लिए संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया और सभी दलों के समर्थन से यह बिल पारित भी हो गया पर इसी बीच लोकसभा में घटी घटना ने सभी को हदप्रद कर दिया, लोकसभा में बोलते हुए दिल्ली के सांसद रमेश बिधूड़ी ने एक मुस्लिम सांसद को मुल्ले आतंकवादी न जाने क्या क्या कह दिया, हो सकता है कि देश में कुछ मुस्लिम आतंकवादी हो सकते हैं पर एक मुस्लिम सांसद को आतंकवादी कहना पूरे मुस्लिम समुदाय का अपमान है। अगर सभी मुस्लिम आतंकवादी हैं तो कलाम साहब, बिस्मिल्ला खां, अब्दुल हमीद, इकबाल आदि को क्या कहेंगे, हमारे लोकतंत्र के मंदिर लोकसभा में वाद-विवाद, परिचर्चा की उच्च परम्परा रही है। हमारे नेताओं ने जीवन में उच्च आदर्श स्थापित किए हैं, इस कारण सुभाष चन्द्र बोस के नाम के सामने नेताजी विशेषण लगाया जाता था पर अब हम यदि किसी के नाम के आगे नेता शब्द लगाएं तो इसे कटाक्ष माना जाता है इसलिए जो लोकसभा में हुआ उस पर अफसोस किया जाना चाहिए।

जाति और सम्प्रदाय को लेकर संसद के अंदर जहर उगलने की घटना यह पहली बार नहीं हुई है, वर्ष 1987 में केन्द्र में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और उनके एक मंत्री प्रो. के. के. तिवारी ने सदन में बहस के दौरान वरिष्ठ दलित सांसद राम धन को चमार की औलाद कहा और इनके इस कथन पर कांग्रेस ने तिवारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। मनबढ़ तिवारी ने तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के विषय में आपत्तिजनक शब्द कह दिए वह बात अलग है कि ज्ञानी जैल सिंह के रुख के कारण के. के. तिवारी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया। जाति और धर्म की राजनीति अपनी जड़ें इतनी गहरी जमा चुकी है कि क्षेत्रीय दल तो दूर अब राष्ट्रीय पार्टियां भी इससे अछूती नहीं रह गई हैं। इस घटना में जिस सांसद ने एक मुस्लिम सांसद के लिए आतंकवादी जैसे शब्द का उल्लेख किया उसे सजा देने के बजाय राजस्थान विधानसभा में गुर्जर समुदाय के वोटों के खातिर विशेष टास्क दिया गया है, प्रश्न यह है की दौसा क्षेत्र में सचिन पायलट जो कि एक प्रभावशाली गुर्जर नेता हैं, उनकी टक्कर का भाजपा के पास और कोई गुर्जर नेता नहीं है जो सौम्य और शालीन हो। वैसे भी भाजपा (पूर्व में जनसंघ) का इतिहास रहा है कि यह अपनी राष्ट्रवादी नीतियों और रीतियों के बल पर सत्ता में आने का प्रयास करती रही है।

वर्ष 1965-66 में उप्र की जनपद जौनपुर की संसदीय सीट पर चुनाव हो रहे थे और वहां से जनसंघ के टिकट पर जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष व एकात्म वाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय चुनाव लड़ रहे थे और उनके प्रतिद्वंदी के रूप में कांग्रेस के राजदेव सिंह थे। एक दिन उनके चुनाव का कार्यभार संभाल रहे राजा यादवेंद्र दत्त दुबे ने पं. दीनदयाल उपाध्याय जी को सलाह दी कि जौनपुर ब्राह्मण बाहुल्य क्षेत्र है आप एक बार ब्राह्मणों की एक सभा कर लें और जाति के नाम पर वोट मांग लें आप यह चुनाव जीत जाएंगे। इस पर पंडित जी बोले ऐसा करके मैं चुनाव तो अवश्य जीत जाऊंगा पर मेरा सिद्धांत सदैव के लिए हार जाएगा और परिणाम यह हुआ कि वे चुनाव हार गए और वे कभी लोकसभा सांसद नहीं बन पाए पर उनका सिद्धांत आज भी अमर है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्हीं के दल के एक सांसद ने मजहब को लेकर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया कि पूरा संसद सन्न रह गया। आश्चर्य की बात है कि इनके पीछे बैठे पूर्व मंत्री डॉ. हर्षवर्धन उन्हें चुप कराने के बजाय हंस रहे थे।

21वी शताब्दी में हमारी एक बड़ी उपलब्धि रही है कि हमने पुराने संसद भवन के स्थान पर एक नए संसद भवन का निर्माण कर लिया है पर हम क्या पुराने संसद भवन में वर्षों तक हुई शालीनता भरी परिचर्चा, वाद- विवाद के स्थान पर नए संसद भवन में इस प्रकार की निम्न स्तरीय परिचर्चा और वाद-विवाद की शुरुआत कर देंगे। संसद में वाद-विवाद और परिचर्चा के गिरते हुए स्तर पर सभी राजनीतिक दलों को सोचना होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।) M-9718335683

गुरुवार, 28 सितंबर 2023

जस्टिन ट्रूडो भारत से तनाव के जिम्मेवार

अवधेश कुमार

कनाडा भारत तनाव उस अवस्था में पहुंच गया है जहां से संबंधों का सामान्य होना आसान नहीं होगा।  कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और उनकी सरकार की हरकतों ने भारत के पास जैसे को तैसा आक्रामक प्रत्युत्तर देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। ट्रूडो‌ ने हाउस ऑफ़ कॉमंस में खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर को कनाडा का सम्मानित नागरिक बताते हुए उसकी हत्या का आरोप भारत पर लगाया उसे कोई सभ्य और स्वाभिमानी देश सहन नहीं कर सकता। निज्जर की 18 जून को कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया के सरी शहर में गुरुद्वारे के बाहर कार सवार दो बंदूकधारियों ने हत्या कर दी थी। ट्रूडो सरकार ने भारतीय उच्चायोग के एक वरिष्ठ अधिकारी को निष्कासित करने का आदेश सुना दिया। भारत ने कुछ ही घंटे बाद कनाडा उच्चायुक्त को विदेश मंत्रालय में बुलाकर एक राजनयिक को निष्कासित करने का आदेश सुनाया। कनाडा सरकार ने अगले दिन एडवाइजरी जारी किया जिसमें कहा गया कि जम्मू कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों को देखते हुए सतर्क रहें और जाने से बचें। वर्तमान भारत इस तरह की उदंडता सहन नहीं कर सकता था और भारतीय नागरिकों खासकर छात्रों युवाओं के लिए एडवाइजरी जारी हुआ कि वहां भारत विरोधी और अलगाववादी हिंसक गतिविधियों को देखते हुए यात्रा करने से बचें, सतर्क रहें। यह भी कि कनाडा स्थित भारतीय उच्चायोग अपने नागरिकों की हर क्षण सहायता करने को तैयार है। कनाडा ने भारत के साथ मुक्त व्यापार वार्ता रद्द कर दिया। भारत ने कनाडा की वीजा सेवा को रद्द करने की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई की जो अभूतपूर्व है। किसी कनाडाई को तत्काल भारत का वीजा नहीं मिलेगा।

कोई भी संतुलित ,विवेकशील और समझबूझ वाली सरकार इस तरह वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत जैसे देश के साथ ऐसा व्यवहार करने का दुस्साहस नहीं कर सकता। ट्रूडो ने कहा कि निज्जर की हत्या और भारत सरकार के एजेंट के बीच संभावित संबंध के ठोस आरोपों की कनाडा की सुरक्षा एजेंसियां पूरी सक्रियता से जांच कर रही है। उन्होंने अंग्रेजी में क्रेडिबल एविडेंस यानी विश्वास योग्य साक्ष्य मिलने की बात कही। कहा कि कनाडा की धरती पर कनाडाई नागरिक की हत्या में विदेशी सरकार की किसी भी प्रकार की संलिप्तता अस्वीकार्य है और यह हमारी संप्रभुता का उल्लंघन है। भारत द्वारा इसका खंडन स्वाभाविक था। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि कनाडा में हिंसा की किसी घटना में भारत की संलिप्तता के आरोप बेतुका और निराधार हैं।भारत ने कितना कड़ा तेवर अपनाया इसका प्रमाण इस पंक्ति से मिलता है कि इस प्रकार के निराधार आरोप खालिस्तानी आतंकवादियों और चरमपंथियों से ध्यान हटाने की कोशिश है जिन्हें कनाडा में प्रश्रय दिया जाता है और जो भारत की क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा बने हुए हैं।

 यही सच है। कनाडा में खालिस्तानी आतंकवादियों , समर्थकों और चरमपंथियों को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए जितनी स्वतंत्रता और सहयोग प्राप्त है वैसा पाकिस्तान के अलावा कहीं नहीं। कनाडा के नेता खालिस्तानी तत्वों के प्रति खुलेआम सहानुभूति जताते हैं।  जी20 सम्मेलन के इतर ट्रूडो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मुलाकात हुई तो इस विषय पर चर्चा की गई। प्रधानमंत्री ने उन्हें कनाडा में खालिस्तानी गतिविधियों को अस्वीकार्य बताया तो ट्रूडो ने भी निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंसियों की भूमिका की जांच का आग्रह किया। जस्टिन ट्रूडो भारत से आगबबूला थे इसका प्रमाण तब मिला जब कनाडा वापसी के समय उनका विमान खराब हो गया, वह होटल में रुके रहे लेकिन भारत द्वारा विमान उपलब्ध कराने का आग्रह ठुकरा दिया। आखिर वह चाहते क्या है? कह रहे हैं कि कनाडा की एजेंसियों ने पुख्ता तौर पर पता किया है कि निज्जर की हत्या के पीछे भारत सरकार का हाथ हो सकता है। कनाडा की विदेश मंत्री मैलानी जोली ने कहा कि भारतीय राजनीतिक पवन कुमार राय को इस मामले की जांच के कारण ही निष्कासित कर दिया गया। राजनयिक को निष्कासित करने के साथ नाम सार्वजनिक नहीं किया जाता। यह मान्य परंपराओं का उल्लंघन है और इससे पवन कुमार राय के जीवन पर खतरा पैदा हो गया है। 

पिछले कुछ वर्षों में विदेश में खालिस्तानी हिंसक तत्वों की गतिविधियां बढ़ती देखी गई है। इन्हीं स्थितियों में हाल में निज्जर सहित तीन घोषित खालिस्तानी आतंकवादियों की मौत हुई है। जून में ब्रिटेन में अवतार सिंह खांडा को बर्मिंघम के एक अस्पताल में रहस्यमय परिस्थितियों में मृत घोषित किया गया। वह खालिस्तान लिबरेशन फोर्स का प्रमुख था। उसके पहले पाकिस्तान के लाहौर में भी खालिस्तानी आतंकवादी परमजीत सिंह पंजवार की  सरेआम हत्या कर दी गई। इस तरह की हत्याओं ने खालिस्तानी आतंकवादियों और समर्थकों के अंदर डर और गुस्सा पैदा किया तथा वे लगातार आरोप लगा रहे हैं। ब्रिटिश सरकार ने कनाडा की तरह खांडा की हत्या का आरोप भारत पर नहीं लगाया। ट्रूडो कह रहे हैं कि उन्होंने यह बात अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन एवं ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के समक्ष भी उठाई थी। इस मामले में ट्रूडो के साथ विश्व का कोई प्रमुख देश नहीं है। 

1990 के दशक में खालिस्तानी आतंकवाद की चरम अवस्था में पाकिस्तान के बाद सबसे ज्यादा गतिविधियां कनाडा में ही थी। 1985 में टोरंटो से लंदन जा रहा एयर इंडिया का विमान कनिष्क विस्फोट में खत्म हो गया और सवार 329 में से कोई नहीं बचा। कनाडा में दिखावटी जांच की लंबी प्रक्रिया चलाई गई लेकिन सच सामने नहीं आया। 2005 में दो सिख अलगाववादियों को रिहा भी कर दिया गया। कई को गवाही देने से डराया गया और कई की मौत हो गई या हत्या कर दी गई। एक आरोपी को बम बनाने और हत्या के मुकदमे में झूठी गवाही देने का दोषी पाया गया था। 2005 में रिहा हुए मुख्य सरगना माने जाने वाले रिपुदमन सिंह मलिक को जुलाई 2022 में गोली मार दी गई थी। पिछले दिनों सिख अलगाववादियों ने कनाडा की राजधानी टोरंटो में भारत को चिढ़ाने वाला जुलूस निकाला जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की हत्या को सही ठहराते हुए हत्यारे को महिमामंडित किया गया। 2015 में जब ट्रूडो प्रधानमंत्री बने तो उनके मंत्रिमंडल में जगमीत सिंह भी था, जो खालिस्तान की रैलियां में शामिल होता है।  ट्रूडो और उनकी सरकार से  पूछा जाना चाहिए कि भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता का कोई मायने है या नहीं?  सरेआम भारत को तोड़ने की बात करना, हिंसा के लिए उकसाना कनाडा के कानून में अपराध है या नहीं? कोई देश भारत की एकता अखंडता को चुनौती देने वाले को सम्मानित नागरिक कहकर संरक्षण देता है तो उसे प्रत्युत्तर देने में हम सक्षम हैं। भारत की नीति साफ है, जो देश को तोड़ने के लिए काम करेगा, हिंसा करेगा, हिंसा कराने की कोशिश करेगा उससे दुश्मन और आतंकवादी की तरह ही निपटा जाएगा। क्या कनाडा सरकार को पता नहीं था कि निज्जर पर 10 लाख रुपए का इनाम था?  उसी के संगठन ने 31 अगस्त,1995 को पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या की थी। कनाडा की आबादी में 9 लाख 42 हजार 170 यानी 2.7 प्रतिशत सिख समुदाय के लोग हैं। उनमें मुट्ठी भर ही खालिस्तान समर्थक होंगे।  इस समय भारत कनाडा का व्यापार 8 अरब डॉलर के आसपास है और इसमें कनाडा का भारत को निर्यात करीब 4.3 अरब डॉलर है। तो व्यापार वार्ता रोकने से क्षति उसे भी होगी। कनाडा की करीब 600 कंपनियां भारत में कार्यरत हैं। हजारों छात्र वहां पढ़ने जाते हैं। कनाडा को इससे करोड़ों का लाभ है। करीब 4 करोड़ की आबादी वाले देश को 140 करोड़ आबादी के देश से ज्यादा क्षति होगी। भारत ट्रूडो के उत्तेजक व्यवहार की तरह इन कंपनियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं कर सकता। भारत का पक्ष बिल्कुल स्पष्ट है, कनाडा को भारत विरोधी खालिस्तानी गतिविधियों को प्रश्रय देना बंद करना होगा, भारत विरोधी गतिविधियों को रोकना पड़ेगा। उन्होंने जो आरोप लगाया है उसके बारे में वह जानें और साबित करें। 



बुधवार, 27 सितंबर 2023

स्त्री-चेतना: स्वानुभूति बनाम सहानुभूति

 मीना शर्मा

सत्य क्या है? चेतना क्या है? सत्य स्त्रीलिंग है अथवा पुलिंग या उभयलिंग? चेतना स्त्री की है? चेतना पुरुष की है? अथवा चेतना मनुष्य मात्र की (मानवीय) है? सत्य भक्ति का होता है? सत्य रचयिता का होता है? सत्य पाठक का होता है? सत्य सार्वभौम होता है अथवा सत्य विशिष्ट होता है? या सत्य इनमें से कोई भी नहीं होता है? या सत्य समन्वित निर्मिति है। ऐसे अनगिनत प्रश्नों की वर्षा होने लगती है जब हम सत्य को खंगालना शुरू करते हैं और सत्य को खंगालाना भी जरूरी है, क्योंकि इसी से जुड़ा है अनुभूति का सत्य। अपनी अनुभूति (स्वानुभूति) सत्य है अथवा अनुभूति - सामर्थ्य के सहारे दूसरे की अनुभूति तक पहुंचकर सत्य का साक्षात्कार करना यानी सह- अनुभूति, समान अनुभूति के सत्य को उपलब्ध करना सत्य है। दूसरे शब्दों में क्या सह अनुभूति (सहानुभूति) सत्य है? ये इतने सारे सवाल क्यों? तो उत्तर यह है कि सत्य की उपलब्धि का दावा सभी करते हैं और प्रत्येक दावा करने वाला अपने सत्य को परम सत्य और अन्तिम सत्य मानने लगता है, परम ब्रह्म की तरह और फिर इस परमब्रह्म का परमज्ञानी दूसरे के सत्य को अंतिम सत्य भी नहीं मानता तो फिर निर्णय कैसे हो? झगड़ा और विवाद की जड़ यही है कि मेरा सत्य और तेरा सत्य, मेरी अनुभूति और तेरी अनुभूति, स्वानुभूति और सहानुभूति, रचनाकार और भोक्ता का सत्य, स्त्री लेखक का सत्य और लेखक का सत्य।
इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सत्य क्या है, वह महत्त्वपूर्ण नहीं है, सत्य को कौन देख रहा है यह महत्त्वपूर्ण है किस चश्मे से सत्य को देखा जा रहा है, वह चश्मा सत्य को निर्धारित करता है। आदमी की निगाह में औरत का सत्य बनाम औरत की निगाह में औरत का सत्य, दोनों सत्य में से किसका सत्य मान्य और किसका सत्य अमान्य हो, यह कौन तय करेगा, आदमी या औरत ? पुरुष लेखक होकर भी पहले पुरुष है तो वहीं स्त्री लेखक होकर भी पहले वह स्त्री है, तो क्या अपने-अपने पूर्वाग्रह के साथ इस सत्योपलब्धि की प्रक्रिया में अनायास अथवा सायास चले आते हैं और इस कारण सामने वाले के सत्य को लिंग भेद, स्थिति भेद, अनुभूति भेद, अनुभव भेद के आधार पर हम स्वीकार नहीं करते हैं अथवा महजीह नहीं देते हैं। दोनों एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगते हैं, एक दूसरे के सत्य को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने के तर्क रखते हैं, उसका लॉजिकल फार्मूला स्त्री के अलग प्रजाति होने के आधार पर देते है-
'हर स्त्री मनुष्य है-
किन्तु हर मनुष्य स्त्री नहीं।'
इस तर्क को थोड़ा और बारीक करते हैं कि हर मनुष्य तो क्या, कोई भी स्त्री मनुष्य नहीं होती। अगर स्त्री मनुष्य होती तो उसकी मानव सत्ता अक्षुण्ण रहती, उसकी जैविक सत्ता के साथ-साथ। किन्तु स्त्री की मानव सत्ता की सर्वस्वीकार्यता कारिता होती तो फिर उसे उपनिवेश की श्रेणी में क्यों रखतो उसे परजीवी क्यों मानते, उसका दोयम दर्जा क्यों मानते? उसे वस्तु 'अन्या' आदि की श्रेणी में क्यों रखते? निम्नलिखित कथन को पढ़कर तो इसी तथ्य की पुष्टि होती है- "दरअसल भारतीय समाज में औरत और दलित दोनों ही परजीवी हैं। दोनों अपने जन्म के कारण ही भेदभावपूर्ण व्यवहार के शिकार होते हैं। दलितों के साथ जन्म-परक भेदभाव, एक वर्गीय व्यवस्था, ऊँची-नीच मालिक-गुलाम, विजेता-विजित आदि एक राजनीतिक साजिश का परिणाम है जो मनु की आचार संहिता पर आधारित सामन्ती/वर्ण-व्यवस्था के कारण घटित हुआ है। यह केवल भारत में ही है। औरत के साथ यह भेदभाव उसके स्त्री होने के कारण होता है, चाहे वह ऊंचे वर्ग की हो या निम्न- सर्वहारा वर्ग की, यानी गरीब हो या अमीर, गोरी या पीली अथवा काली या किसी भी रंग की हो, चपटी नाकवाली हो या चपटे माथे वाली या तीखी रोमन नाक वाली हिंदू हो या मुसलमान, ईसाई हो या यहूदी, पूरब की हो या पश्चिमी की स्त्री जाति में जन्म लेने वाली यानी स्त्री प्रजाति की होने के कारण ही उसे विश्व भर में दोयम दर्जा ही दिया जाता रहा है।

औरत, औरत होने के कारण यदि कमतर है तो एक बात है, ऊपर से यदि यह दलित जाति से ताल्लुक रखती है, उससे भी बड़ी बात, साथ ही यदि वह गरीब भी हो तो फिर तो वह उपनिवेश -द-उपनिवेश के चक्रव्यूह फंसी स्त्री हुई। यानी लिंग, जाति, वर्ग जैसी भिन्न स्थितियों में जाने वाली स्त्रियों को क्या पितृसत्ता एक ही प्रकार की प्रकटित करेगी? ऊपर से यदि वह स्त्री पिछड़ी जाति की निरक्षर, बेसहारा स्त्री हुई तब क्या होगा? शायद गांव का काई दबंग डायन, चुड़ैल बताकर निर्वस्त्र करके गांव में घुमाए अथवा बलात्कार आदि घटना को अंजाम देकर, काटकर नदी में बहा दे, तो क्या उस स्त्री की स्वानुभूति को उसी लिंग की कोई महानगरीय संभांत उच्च जाति की महिला 2000 किमी दूर वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अपनी अनुभूति को उस पीड़ित महिला की अनुभूति के साथ समरूप कर सकती है? या फिर सिर्फ अपनी तरफ से सहानुभूति ही व्यक्त कर सकती है यानी एक महिला एक का ही सत्य (स्वानुभूति) दूसरी महिला का सत्य (सहानुभूति) नहीं बन पाता, तो ऐसी स्थिति मतें फिर कोई पुरुष उस पीड़ित महिला के दर्द की अनुभूति बयान करें तो वह अकेला 'हाऊटसाइडर कैसे? यह पुरुष भी तो उस पीड़ित महिला के साथ सहानुभूति ही तो व्यक्त करता है दूसरी स्त्री महिला लेखक के समान क्या सिर्फ लिंग एक होने से अनुभूति भी एक हो जाती है? सत्य भी एक हो जाता है? एक की स्वानुभूति दूसरे की स्वानुभूति हो पाती है क्यों?
अतएव जब स्त्री विमर्श की बात आती है तो पुरुष लेखक बाहरी कैसे? और स्त्री लेखक ही हमेशा हर स्थिति में अन्तरंग कैसे? फिर एक स्त्री भी पुरुष के चश्मे से स्त्री के सत्य को देख सकती/देखती है। यही बात दलित विमर्श के सन्दर्भ में भी उठता है स्वानुभूति और सहानुभूति का मसला वहां भी है, किन्तु दलितों में एलीट' वहां भी है, जो उससे अपनी वर्गीय हैसियत के कारण उतना ही दूसरी बनाकर रखता है जैसे वर्णव्यवस्था में एक सवर्ण व्यक्ति किसी अवर्ण व्यक्ति के साथ रखता था। वह 'एलीट उस गरीब के साथ खान-पान, उठ-बैठ, विवाह-रिश्ते, आना-जाना आदि मामलों में उसकी तरफ हिकारत भरी नजरों से देखता है। साथ ही दलितों के भीतर भी जाति-व्यवस्था उतनी ही कठोर (क्रूर नहीं क्योंकि यहाँ जान लेने वाला मसला नहीं है।) नियम का पालन कर अपनी विशिष्टता, पृथकता को बनाए रखना चाहता है। तो फिर क्या यह एलीट दलित व्यक्ति उस गरीब व्यक्ति के अन्तःकरण का साक्षात्कार उस स्वानुभूति की तीव्रता और गहराई के साथ कर पाएगा जैसा कि वह गरीब दलित व्यक्ति करता है। तो फिर यह एलीट व्यक्ति यदि लेखक बनकर उस पर लिखने की पात्रता रखने वाला इन 'साइडर' है अथवा 'आउट साइडर ? स्वानुभूति बनाम आत्मानुभूति का सवाल तो वहाँ भी उठना चाहिए। सिर्फ यह कहना कि सभी दलित एक हैं, दलित-दलित एक हैं. सभी दलित की स्थिति, सत्य, वेदना, अनुभूति एक है, स्वानुभूति एक है (?) कहकर इस सवाल से कन्नी नहीं काटा जा सकता । यानी जब भिन्न अभिव्यक्ति में पूर्ण सक्षम अथवा समरूप जीवनानुभव न रखने के कारण, सौ फीसदी उपयुक्त लेखकीय पात्र नहीं है, वह भी (एलीट) उसके (गरीब दलित) लिए उतना ही हाउट साइडर बाहरी व्यक्ति है, जितना कि सवर्ण लेखक उस गरीब दलित के लिए होगा। भिन्न स्थिति में रहने के कारण एवं जाति विशेष होने के कारण ही किसी भी सहानुभूति स्वानुभूति नहीं बन सकती। स्वानुभूति और सहानुभूति के झगड़े में सत्य से ज्यादा राजनीति ज्यादा काम करती है।
वास्तव में स्त्री विषय हो या दलित विषय, दोनों की विमर्श में जाति, पितृसत्ता, वर्ण-व्यवस्था के प्रश्नों से काटकर, उनकी भिन्न स्थिति, सन्दर्भ में विच्छिन्न कर देखना सत्य का औसतीकरण होगा क्योंकि "स्त्रीवाद की मुख्य चिता, आज की पितृसत्ता ही है। लेकिन क्या पितृसत्ता प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में एक जैसी है ?... वह एक जैसी नहीं होती। एक ही समय और एक ही समाज में भी वह एक जैसी नहीं होती। उदाहरण के लिए हम आज के अपने भारतीय समाज में देखें, तो क्या उच्च या उच्च मध्यवर्गीय, शिक्षित और कामकाजी स्त्रियों की स्थिति निम्न या निम्न मध्यवर्गीय, अशिक्षित और घरेलू स्त्रियों से भिन्न नहीं है? शहरी और देहाती स्त्रियों की धनी और निर्धन परिवारों की, ऊँची जातियों और नीची जातियों की स्थिति भिन्न नहीं है? क्या ऐसी तमाम स्थिति भिन्न नहीं है? क्या ऐसी तमाम भिन्न स्थितियों में जीने वाली स्त्रियों को पितृसत्ता एक ही प्रकार से प्रभावित करती है? यदि वह सब स्त्रियों को एक ही प्रकार से प्रभावित नहीं करती, तो क्या आज के स्त्रीवाद के पितृसत्ता विरोधी संघर्ष तक ही सीमित रहना चाहिए? क्या उसे वर्ण और जाति के प्रश्नों से नहीं जोड़ना चाहिए?"
अतएव वर्ण और जाति की असमानताओं से सत्य निरपेक्ष नहीं है। स्त्री की चेतना इनके सापेक्ष में ही मूल्य अर्थ और दिशा पाती है। वर्ण-व्यवस्था भी असमानता का एक ढाँचा है किन्तु वह वर्ग और जाति के सत्य से मुक्त नहीं है। वर्ग और जाति की असमानता का एक ढाँचा है, किन्तु वह वर्ग और जाति के सत्य से मुक्त नहीं है। वर्ग और जाति की असमानताओं को भूलकर उनकी आंतरिक विसंगति को छोड़कर अगर हम यह सोचें कि केवल वर्ण-व्यवस्था का विरोध करके या उखाड़ फेंकने से हम सब तरह की असमानताओं से या दलितों के साथ होने वाले अत्याचार भेदभाव से हम मुक्त हो जाएंगी, या स्त्री वर्ग, जाति की असमानताओं को भूलकर पितृसत्तात्मक व्यवस्था को उखाड़ फेंगेगी, तो यह एक भ्रामक धारणा होगी। एक समतामूलक मानवीय समाज के निर्माण में सभी विघ्न-बाधाओं तत्वों की पहचान करके ही इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ एवं दिशा दी जा सकती है। अन्यथा इतिहास गवाह है कि इन तथ्यों को भुलाकर आंतरिक विसंगतियों को भुलाकर जल्दबाजी मतें कई देशों में की गई क्रांतियां कालांतर में ऐसा अभिशाप बन जाती हैं कि उसे मिटाने के लिए एक और क्रांति करनी पड़ती है, फिर एक और, और यह क्रम निरंतर चलता रहता है। वहां के समाजों में आंतरिक अशांति, उपद्रव, गृह क्लेश, आपातकाल जैसी स्थितियाँ और घटनाएं अक्सर देखे जा सकते हैं। शायद इन्हीं आंतरिक विसंगतियों और अन्विति के अभाव में ही इतिहास को फिर से अपना इतिहास दोहराना पड़ता है इतिहास दोहराने का भी इतिहास रहा है।
वास्तविकता यह यहै कि केवल पितृसत्ता के कारण ही स्त्रियों का दमन और उत्पीड़न नहीं होता बल्कि वर्ग ओर जाति के आधार पर भी स्त्रियाँ उसका शिकार होती हैं इस तरह की खबरें अक्सर देखने-सुनने को मिलती हैं। है एक दिलचस्प उदाहरण मार्क्सवाद का ही है जो समतामूलक मानवीय व्यवस्था के दर्शन के साथ संपूर्ण विश्व में निकला था, इस धारणा के साथ कि समाज में वर्ग-भेद एक बार मिटा तो जाति-भेद और स्त्री-पुरुष भेद स्वतः चला जाएगा। किन्तु तमाम क्रांतियों के बाद भी पूरे विश्व में पितृसत्ता बनी रही। जहाँ साम्यवादी शासन था वहाँ की स्त्रियाँ यह कहते हुए सुनी जा सकती थीं कि "मेरा पति, जो बाहर कॉमरेड है घर में मुझे क्यों पीटता है ?"
स्त्री चेतना को स्वानुभूति या सहानुभूति के सन्दर्भ में एक बार महिला का विषय की भी है यह यह कि जब टी.एस. इलियट (TS. Eliot) कहते हैं कि रचनाकार और भोक्ता में अन्तर होता है, जितना बड़ा अन्तर होगा, उतना बड़ा बदलाव होगा और इसका सीधा अर्थ यही होता है कि रचनागत सत्य / काव्यगत सत्य और व्यक्तिगत सत्य दो अलग सत्य हैं। रचना प्रक्रिया में जब तक रचने वाला निर्धेयक्ति नहीं हो पाता, तब तक वह कलाकार नहीं बन पाता। स्वानुभूति के आधार पर व्यक्तिगत या आत्मगत सत्य और तथ्य को सीधे एवं सपाट ढंग से प्रस्तुत करने पर साहित्य, साहित्य न रहकर रिपोर्टिंग रह जाएगा। साहित्य सूचना, तथ्य या समाचार बन जाएगा और सूचना अथवा समाचार साहित्य नहीं होता। इस कसौटी पर महान साहित्य का मूल्यांकन करना भी संभव नहीं होगा, मसलन स्वानुभूति के आधार पर कामायनी में जयशंकर प्रसाद का जीवन खोजना, रामायण में तुलसीदास अथवा वाल्मीकि का कहाँ है? या साकेत के अनदर मैथिली शरण गुप्त का स्वानुभूत सत्य या व्यक्तिगत सत्य कहाँ और कितना है? गोदान में प्रेमचन्द का जीवन कितना है, गोदान में होरी का सत्य क्या प्रेमचंद का सत्य है या प्रेमचंद का सत्य क्या होरी का सत्य है? दोनों में किसी स्वानुभूति और किसकी सहानुभूति है? पछाड़ खाकर गिरते होरी की त्रासदी सिर्फ होरी की त्रासदी है या भारत के आम किसान की त्रासदी है या प्रेमचंद की त्रासदी है?
अतएव स्वानुभूति और सहानुभूति की कसौटी पर साहित्य के मूल्यांकन में अत्यधिक सचेत होने की आवश्यकता है। फार्मूलाबद्ध तरीके से न तो साहित्य का सृजन हो सकता है, न मूल्यांकन और न ही पाठन सृजन-प्रक्रिया, आलोचना-प्रक्रिया और पाठकीय प्रक्रिया में अनुभूति कई स्तरों पर संक्रमित होती है, अनुभूति के पैटर्न में बदलाव दिखाई पड़ता है। यदि गोदान में पछाड़ खाकर गिरते होती की त्रासदी प्रेमचन्द का सहानुभूति-सत्य है, तब भी वह महान रचनागत सत्य है जो मानवीय संवेदना को झंकृत करता है। साहित्य की परकाया प्रवेश की भूमिका वहाँ देखी जा सकती है।

गुरुवार, 21 सितंबर 2023

संघ की दृष्टि में सनातन एक आध्यात्मिक लोकतंत्र

लोग देश की उन्नति के लिए एक काम करें इसका चलेगा अभियान 

अवधेश कुमार

पुणे में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के संगठनों की अखिल भारतीय समन्वय बैठक पर स्वाभाविक ही पूरे देश की दृष्टि थी। वर्ष में एक बार आयोजित इस बैठक में संघ से जुड़े सारे संगठन के नेता उपस्थित होकर वर्ष भर के अपने कार्य वृत्त के साथ भविष्य की योजनाओं की रूपरेखा रखते हैं। एक वर्ष की दृष्टि से कुछ सामूहिक निश्चित कार्य योजनाएं निर्धारित होती हैं। इस नाते यह बैठक अत्यंत महत्वपूर्ण थी। विरोधी वैसे भी अपने आरोपों औरक् विरोधों सेशन को चर्चा में बने ही रखते हैं। भारत सहित विश्व भर में घटी घटनाओं पर संघ का मत जानने की  उत्सुकता एक बड़े वर्ग में रहती है। बैठक के पूर्व कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिस कारण वहां से आने वाले समाचारों को गहरी दिलचस्पी से देखा गया।

•संघ की पूरी वैचारिक आधारभूमि हिंदुत्व और सनातन है। तमिलनाडु सरकार में मंत्री और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदय निधि स्टालिन ने सनातन को बीमारी की संज्ञा देते हुए इसके उन्मूलन का बयान दिया और विवाद उभरने पर कहा कि हम अपने बयान पर कायम है। भाजपा की प्रतिक्रिया लोग पहले दिन से सुन रहे हैं लेकिन संघ ने‌ स्पार्क कोई औपचारिक बयान नहीं दिया।

• संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपील की थी कि देश का नाम भारत है और इसका ही प्रयोग किया जाए। उसके कुछ दिनों बाद जी 20 नेताओं के सम्मान में आयोजित भोज के निमंत्रण पत्र में प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया के संघ प्रमुख के कहने के कारण ही देश का नाम बदल जा रहा है।  जी 20 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने लकड़ी की पट्टिका पर भी भारत लिखा था। भारत और इंडिया के विवाद मैं संघ क्या बोलता है यह जानने में भी लोगों की रुचि थी।

•आईएनडीआईए गठबंधन लगातार संघ की विचारधारा के विरुद्ध राजनीति करने की बात कर रहा है। राहुल गांधी ने विदेशों में संघ का नाम लेकर इसके हिंदुत्व को अल्पसंख्यकों के साथ दलित और पिछड़ा विरोधी बताया था।

  संघ सामान्यत: आरोपी और विरोधों पर अन्य संगठनों की तरह प्रतिक्रिया नहीं देता। उसका चरित्र इन सबसे आप प्रभावित रहते हुए शांतिपूर्वक अपना काम करने का है। संघ को निकट से देखने वाले जानते हैं कि जो बैठक जिस उद्देश्य से आयोजित है उसी पर फोकस किया जाता है। समन्वय में बैठक के बाद पत्रकार वार्ता में जानकारी देते हुए संघ के सह सरकार्यवाह डॉक्टर मनमोहन वैद्य ने भी अपनी ओर से इन पर कुछ नहीं कहा।

सनातन संस्कृति को लेकर पूछे गए प्रश्न का उत्तर उन्होंने अवश्य दिया। 

उन्होंने तीन बातें कहीं। 

•एक, सनातन का अर्थ रिलिजन नहीं है। यानी या किसी मजहब की तरह मजहब का पर्याय नहीं है। तो फिर? 

•दो,  संघ की दृष्टि में सनातन सभ्यता एक आध्यात्मिक लोकतंत्र (स्पिरिचुअल डेमोक्रसी) है। वास्तव में इसे मान्य परिभाषा सनातन की कुछ हो नहीं सकती। •तीसरे,उन्होंने इतना ही कहा कि जो लोग सनातन को लेकर वक्तव्य देते हैं, उन्हें पहले इस शब्द का अर्थ समझ लेना चाहिए। 

•इंडिया और भारत पर भी एक सामान्य प्रतिक्रिया थी।  उदाहरण के लिए देश का नाम भारत है, वह भारत ही रहना चाहिए। प्राचीन काल से यही प्रचलित नाम है।भारत नाम सभ्यता का मूल है।

साफ है कि इसमें सनातन का विरोध या उन्मूलन करने की बात करने वालों करने  पर कोई प्रतिक्रिया नहीं। सरसंघचालक ने अपने एक भाषण में कहा था कि हमको विरोधियों का भी विरोधी नहीं होना है।

भारत के संदर्भ में भी संघ प्रमुख के भाषण के कारण ऐसा हुआ इसकी श्रेय लेने की कोई कोशिश नहीं।

आप चाहे संघ के विरोधी हो या समर्थन उनके कार्य और व्यवहार के इस तरीके से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।

हमारी घटनाओं पर राजनीति के वर्चस्व के कारण ऐसी सभी बैठकों को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाता है। चूंकि समन्वय बैठक में भाजपा की ओर से अध्यक्ष जगत प्रसाद  नड्डा और संगठन महासचिव बीएल संतोष उपस्थित थे इसलिए भी उसकी राजनीतिक रंग देना आसान है।  पर किसी संगठन को उसके अनुसार विश्लेषित करने से ही सच्चाई के निकट पहुंचा जा सकता है। संघ के कार्य व्यवहार पर निकट से अध्ययन करने वाले देखने वाले जानते हैं कि हम जितनी चर्चा करते हैं उस तरह राजनीति पर उनकी बैठकों में बातचीत नहीं होती। समन्वय बैठक का मूल उद्देश्य ही होता है कि सारे संगठन एक दूसरे के क्रियाकलापों से अवगत रहे तथा जहां एक दूसरे का सहयोग कर सकते हैं करें। सब अपने -अपने क्षेत्र में स्वायत्ततापूर्वक कम करते हैं लेकिन इनके बीच सुसंगति बनाने की भूमिका संघ की है। संघ मातृ संगठन के रूप में सभी की सोच को ध्यान में रखते हुए भविष्य की दृष्टि से योजनाएं रखता है। इस बैठक में भी यही हुआ। 

•समन्वय बैठक की समाप्ति के बाद संघ के सारे कार्यवाही डॉक्टर मनमोहन वैद्य ने पत्रकार वार्ता में जो कुछ कहा उसमें राजनीति का लेश मात्र भी नहीं था। 

•बैठक में 36 विभिन्न संगठनों के कुल 246 प्रतिनिधि उपस्थित थे। भाजपा उन 36 संगठनों में ही एक है। तीन दिनों के कार्यक्रम में सभी को वर्ष भर और भविष्य की योजनाओं का वृत देना था। इसमें एक भाजपा और  चुनाव पर तो बात नहीं हो सकती।

संघ अपने 97 वर्ष की आयु पूरी कर शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है।

इसमें  संघ का आगामी फोकस हर क्षेत्र में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने पर होगा। हालांकि विरोधियों की महिलाओं को महत्व न देने के आरोप के विपरीत संघ यह कार्य कुटुंब प्रबोधन और परिवार परंपरा को सशक्त करने के कार्यक्रम में पहले से कर रहा है।

• डॉ. वैद्य ने कहा कि भारत के चिंतन में परिवार सबसे छोटी इकाई होती है। परिवार में महिलाओं की भूमिका सबसे प्रमुख होती है। संघ की शताब्दी योजना के अंतर्गत महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने पर बैठक में चर्चा की गई।‌ 

•महिलाओं में आपसी संपर्क बढ़ाने के साथ देशभर में 411 सम्मेलन आयोजित करने की योजना बताता है कि इसे लेकर कितनी गंभीरता है। अभी तक 12 प्रांतों में इस तरह के 73 सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं। इनमें 1 लाख 23 हजार से अधिक महिलाएं शामिल हुई। गैर राजनीतिक स्तर पर महिलाओं का सम्मेलन बुलाना आसान नहीं होता।

 संघ के 97 वर्ष की यात्रा के मुख्य चार पड़ाव रहे हैं।  संगठन, विस्तार, संपर्क व गतिविधि ये तीन पड़ावों पर लंबे समय तक फोकस रहा। सन् 2006 में संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी की जन्मशती के के साथ हर स्वयंसेवक द्वारा राष्ट्र की उन्नति के लिये कुछ न कुछ कार्य करने का प्रण लेने की बात आई और तीन  के साथ यह चौथा तब से आगे बढ़ रहा है। स्वयंसेवक चाहे जिस संगठन में हो, वो भारत की उन्नति के लिए एक कार्य अपने हाथ में ले इसके लिए लगातार कोशिश हो रही है। जरा सोचिए , भारत में ऐसे कितने संगठन हैं जो अपने सदस्यों को देश की उन्नति के लिए कोई एक काम करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं? आप देखेंगे कि संपूर्ण देश में स्वयंसेवकों द्वारा ऐसे कार्य किया जा रहे हैं जिनकी अनजान लोगों को उम्मीद भी नहीं होती। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जहां संघ के लोग काम नहीं कर रहे हैं। कई बार आप उस कम की सराहना करते हैं यहां तक कि उसमें सहयोग भी करते हैं किंतु आपको पता भी नहीं चलता कि वह संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा किया जा रहा है। संघ के हर बैठक में समाज में अच्छे लोगों जिन्हें संघ सज्जन शक्ति कहता है वो सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो इसके प्रयास पर हमेशा चर्चा होती है। समन्वय बैठक का भी एक प्रमुख बिंदु यही था। यानी शाखा और संगठन विस्तार के अलावा समाज के अच्छे लोगों के पास जाकर उन्हें पेश की उन्नति के लिए कोई एक काम करने के लिए प्रेरित करने का अभियान संघ लगातार चलाएगा। ऐसे अभियानों से भी संघ के संगठन शक्ति बढ़ती है। इसके संगठन संबंधी कुछ आंकड़े देखिए।

 •संघ की शाखाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। कोरोना से पूर्व  सन् 2020 में देश में 38 हजार 913 स्थानों पर शाखाएं थीं, 2023 में यह बढ़कर 42 हजार 613 हो गया है।  यानी 9.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

• संघ की दैनिक शाखाओं की संख्या 62 हजार 491 से बढ़कर 68 हजार 651 हो गई है। इनमें 60 प्रतिशत विद्यार्थी शाखाएं हैं।

 • संघ की आधिकारिक वेबसाइट पर जॉइन आरएसएस के माध्यम से प्रति वर्ष एक से सवा लाख नए लोग जुड़ने की इच्छा जता रहे हैं। उनमें से अधिकतर 20 से 35 वर्ष तक की आयु के हैं।

विरोधी महिलाओं पर फोकस करने या फिर लोगों से देश की उन्नति के लिए एक काम करने के अभियान को भी संघ का छद्म व्यवहार कहेंगे, पर समाज वही धारणा बनाएगा जो प्रत्यक्ष देखता है। संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों का अगर लगातार विस्तार हो रहा है तो इसी कारण कि राजनीतिक और वैचारिक विरोध के विपरीत आम समाज इसके प्रति अच्छी धारणा रखता है। विरोधी शांत मन से इस पर विचार करें तो वह भी काफी कुछ सीख सकते हैं।



http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/