गुरुवार, 14 सितंबर 2023

जीएमएफ और अरिहंत हॉस्पिटल, देहरादून द्वारा सभी समुदायों और सभी धर्मों के लिए पैन इंडिया हेल्थकेयर लंगर सेवा

संवाददाता

नई दिल्ली। ग्लोबल मिडास फाउंडेशन (जीएमएफ), दिल्ली स्थित एक सामाजिक संगठन, पिछले 3 वर्षों से "सरबत दा भला" और "चरदी कला" के सिखी मूल्यों और विचारधारा के आधार पर पंथ और संगत सेवा कर रहा है। यह हेल्थकेयर लंगर के हिस्से के रूप में है सेवा ने धार्मिक और आध्यात्मिक संगठनों, निवासी कल्याण संघों, बाजार कल्याण संघों, शैक्षणिक संस्थानों और दिल्ली पुलिस के सहयोग से पिछले 3 वर्षों के संचालन में दिल्ली और पंजाब भर में कई मुफ्त स्वास्थ्य जांच शिविर, नेत्र जांच शिविर आयोजित किए हैं। इसके अलावा उन्होंने ग्लोबल मिडास फाउंडेशन (जीएमएफ) द्वारा अनुशंसित लोगों को रियायती दरों और समय पर परामर्श, परीक्षण, निदान, जांच, उपचार और सर्जरी प्रदान करने के लिए विभिन्न प्रयोगशाला परीक्षण सुविधाओं, डायग्नोस्टिक केंद्रों, नर्सिंग होम और अस्पतालों के साथ समझौता किया है।

अब, उन्होंने अरिहंत अस्पताल, देहरादून से गठजोड़ किया है और उन्हें समर्थन मिला है, जो एक मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल है, जो नवीनतम अद्यतन अस्पताल सुविधाओं और सर्वोत्तम विशेषज्ञ, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभवी डॉक्टरों और प्रबंधन टीम के साथ बहुत प्रतिष्ठित है। जीएमएफ के संस्थापक सरदार इंदरप्रीत सिंह कहा कि उन्होंने अब जीएमएफ और अरिहंत अस्पताल द्वारा संयुक्त रूप से मुफ्त हेल्थकेयर कार्ड पेश किया है, जो पूरे भारत में सभी समुदायों और सभी धर्मों के लोगों और एनआरआई के लिए हेल्थकेयर लंगर सेवा लाभ प्रदान करता है। जीएमएफ फेसबुक पेज, साड्डा खिडदा पंजाब यूट्यूब चैनल और हेल्पलाइन नंबर पर जाकर हेल्थ कार्ड बनवाया जा सकता है। +91 8368018195, 9289334641, 9289351596 और www.arihanthospitals.com/
 
किडनी प्रत्यारोपण और डायलिसिस के लिए उपचार और सर्जरी के लिए 20% रियायती छूट और समय की प्राथमिकता प्रदान की जाएगी। यह अखिल भारतीय स्तर पर सभी समुदायों, सभी धर्मों और भारत में अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा पर्यटन पहल के हिस्से के रूप में आने वाले विदेशियों / एनआरआई के लिए लागू है। स्वास्थ्य सेवाओं में समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आने वाले सिख संगत और आम जनता को परीक्षण, उपचार, सर्जरी आदि और ऐसी अन्य महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं पर 30% तक रियायती छूट और प्राथमिकता । भारत भर में गुरुद्वारा समिति के सेवादारों, कथा वाचकों, ग्रंथी साहिबानों और बोर्ड पर सेवा करने वाले पदाधिकारियों और कर्मचारियों को परीक्षण, उपचार, सर्जरी आदि और ऐसी अन्य महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं पर 50% तक रियायती छूट और प्राथमिकता । ये सभी लाभ देहरादून और चमोली, उत्तराखंड में मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं और भविष्य में आने वाली अन्य सुविधाओं में प्रदान किए जाएंगे और ग्लोबल मिडास फाउंडेशन द्वारा पेश किए गए पूरी तरह से मुफ्त स्वास्थ्य कार्ड बनाकर आज ही इसका लाभ उठाया जा सकता है।

बुधवार, 13 सितंबर 2023

भारत ने जी 20 को दिया नया कलेवर

अवधेश कुमार


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-20 अध्यक्ष के नाते जब स्वस्तिअस्तु विश्व: यानी संपूर्ण विश्व सुखी हो के साथ शिखर सम्मेलन के समापन की घोषणा की तो ये कोरे शब्द नहीं थे। जी 20 का नई दिल्ली शिखर सम्मेलन अनेक दृष्टियों से ऐतिहासिक और सफल माना जाएगा। यूक्रेन युद्ध के बाद  पहला सम्मेलन है जिसकी घोषणा पत्र से कोई सदस्य देश नाखुश या असंतुष्ट नहीं है। अमेरिका और पश्चिमी देश संतुष्ट हैं तथा रूस और चीन भी। इस कूटनीति को भारत ने कैसे साधा होगा इसकी कल्पना आसान नहीं है। 37 पृष्ठों के घोषणा पत्र में पृथ्वी, यहां के लोग, शांति व समृद्धि वाले खंड में चार बार यूक्रेन युद्ध की चर्चा है किंतु रुस का नाम नहीं है। इन पंक्तियों को देखिए,  सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों व सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। किसी भी दूसरे देश की अखंडता व संप्रभुता का उल्लंघन धमकी या बल के उपयोग से बचना चाहिए। नाभिकीय हथियारों के इस्तेमाल या इस्तेमाल की धमकी अस्वीकार्य है। यूक्रेन युद्ध के बीच में राष्ट्रपति पुतिन ने नाभिकीय हथियार के उपयोग तक की धमकी दे दी थी। इसमें प्रधानमंत्री की वह पंक्ति भी है जो उन्होंने पुतिन को कहा था कि यह समय युद्ध का नहीं है। अगर पिछले बाली घोषणा पत्र को देखें तो वह रूस के विरुद्ध था और रूस से यूक्रेन खाली करने की आवाज उठाई गई थी। तुलना करें तो इस प्रश्न का उत्तर सामान्यतः नहीं मिलेगा कि भारत ने अमेरिका को कैसे यह प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए तैयार किया। 

 सम्मेलन के पहले दिन दूसरे सत्र में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली घोषणा पत्र स्वीकार करने की घंटी बजाई तभी साफ हो गया कि भारत की कूटनीति सफल रही है।  सम्मेलन आरंभ होने के एक दिन पहले तक यूक्रेन से लेकर जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, विकासशील और कमजोर देश को वित्तीय सहायता व सस्ते कर्ज उपलब्ध कराने ,साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन रही थी। घोषणा पत्र में यूक्रेन युद्ध से जुड़ा पैराग्राफ खाली छोड़ना पड़ा था। भारतीय प्रयासों ने रंग लाया और घोषणा पत्र में यूक्रेन युद्ध, जलवायु परिवर्तन, लैंगिक असमानता ,आर्थिक चुनौतियां, हरित विकास, आतंकवाद, क्रिप्टो करेंसी, महिलाओं के उत्थान समेत वो सारे मुद्दे शामिल किए गए जिन्हें भारत ने तैयार किया था।

इस एक पहलू से साफ हो जाता है कि अपनी अध्यक्षता में भारत ने किस तरह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, देशों के संबंध, राजनय, व्यक्ति के जीवन आदि से संबंधित भारतीय विचारों को लेकर पिछले एक वर्ष तक काम किया होगा। भारत के लगभग 60 शहरों में 220 से ज्यादा बैठकें जी 20 की हुई है। इस कारण भी यह इतिहास का सबसे विस्तारित, महत्वाकांक्षी और सफल सम्मेलन साबित हुआ क्योंकि इनमें कुल 112 परिणाम दस्तावेज व अध्यक्षीय दक्षतावेज तैयार हुए। पिछले इंडोनेशिया की राजधानी बाली के सम्मेलन में कुल 50 परिणाम व अध्यक्षीय दस्तावेज स्वीकृत हुए थे। इनमें 73 परिणाम दस्तावेज यानी आउटकम डॉक्यूमेंट हैं जो देश के विभिन्न शहरों में सदस्य देशों के मंत्रियों और अधिकारियों के ओर से बैठकों में बनी सहमति पर तैयार हुए हैं। ऐसा कोई विषय नहीं जिन पर बैठक नहीं हुई। जब भारत ने इसका नारा ही एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य दिया तथा इसके साथ वसुधैव कुटुंबकम जोड़ दिया तो फिर इसके परे कुछ हो ही नहीं सकता था। सच कहा जाए तो भारत ने जी 20 की न केवल कुछ बदली बल्कि इसे नया कलेवर दे दिया। निश्चय ही इसके सदस्य देशों के साथ अन्य देशों को भी इन शब्दों के भारतीय अर्थ समझाए गए होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इंडिया की जगह भारत लिखा हुआ था। भारत नाम के वैश्विक स्वीकृति की ठोस नींव पड़ चुकी है। भारत शब्द के साथ विश्व यह मानने को विवश होगा कि हम लाखों वर्ष पूर्व के प्राचीनतम राष्ट्र हैं। इस नाते भी जी 20 सम्मेलन को इतिहास के अध्याय में याद किया जाएगा। 


भारत के लिए यह पहला अवसर था जब विश्व के सभी शक्तिशाली देशों के प्रतिनिधि तथा रूस, चीन और स्पेन को छोड़कर सारे राष्ट्र प्रमुख, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुख एवं सत्ता शीर्ष से जुड़े अधिकारी उपस्थित थे। भारत में स्वयं नौ देशों को विशेष तौर पर आमंत्रित किया था। भारत के लिए भविष्य की महाशक्ति संभावना का विश्वास दिलाने का अब तक का सबसे बड़ा अवसर था और यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि इस उद्देश्य को कल्पना से भी श्रेष्ठ तरीके से भारत ने प्राप्त किया है। भारत मंडपम देखने से ही भारत की सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत के साथ आधुनिक ज्ञान विज्ञान की उपलब्धियां ,आर्थिक व सैनिक क्षमता, विविधताओं, राष्ट्र की अवधारणा, राष्ट्र - राज्य के रूप में भविष्य के उद्देश्यों की समझ आने वाली लायक झलक मिल रही थी। स्वयं प्रधानमंत्री कोणार्क के जिस काल चक्र के सम्मुख खड़े होकर सभी नेताओं का स्वागत कर रहे थे उसके दर्शन में ही संपूर्ण सृष्टि के संचालन का ज्ञान निहित है। राष्ट्रपति के रात्रि भोज में स्वागत करने की पृष्ठभूमि नालंदा विश्वविद्यालय की तस्वीर यह बताने के लिए थी कि जब विश्व आधुनिक शिक्षा पद्धति से अनभिज्ञ था तब भी भारत में व्यवस्थित विश्वविद्यालय थे जहां हर विषयों की शिक्षा थी और अलग-अलग देशों से छात्र यहां पढ़ने आते थे। 

भारत ने इस सम्मेलन को महिमामंडित कर  जैसी भव्यता और सुव्यवस्थित आयोजन बनाया वह अगले अध्यक्ष ब्राजील के लिए एक मानक बन गया है। यह स्वीकार करना होगा कि भारत ने अपने नेतृत्व में जी 20 का एजेंडा, लक्ष्य, सदस्यों की सोच को काफी हद तक बदलने में सफलता पाई है। वसुधैव कुटुंबकम यानी संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानकर विश्व व्यवस्था की रचना करने की दिशा में 55 सदस्यीय अफ्रीकन यूनियन को सदस्य बनाने में भारत क़ो सफलता मिली, 125 विकासशील व गरीब देशों का सम्मेलन बुलाकर ग्लोबल साउथ या वैश्विक दक्षिण के एजेंडा को इसमें रखा गया। इस तरह भारत ने संदेश दिया कि अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से संभव है और इसमें छोटे -बड़े, संपन्न विकासशील और गरीब सभी देशों को सहभागी बनाया जाए ताकि उन्हें आभास हो कि विश्व व्यवस्था की रचना में उनकी भूमिका है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में मुख्य भूमिका निभाने वाले देशों से इनका संवाद एवं मिलन ही नहीं होगा तो असंतोष और गुस्सा पैदा होगा। 

  प्रधानमंत्री ने 15 द्विपक्षीय बैठकें भी कीं।  चीन भारत की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के विरुद्ध भारत काम कर रहा है। इटली की प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि वह इससे बाहर निकल रहा है।  भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच संपर्क गलियारे को जल्द लॉन्च करने की घोषणा हुई। भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, फ्रांस, इटली, जर्मनी व यूरोपीय संघ के अन्य देशों तथा अमेरिका को शामिल करते हुए इस संपर्क गलियारे और बुनियादी ढांचे पर सहयोग की आधारभूमि बन गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस जलवायु सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरुआत की। इस बार वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन की शुरुआत हुई। वैश्विक स्तर पर पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिश्रण को बढ़ाकर 20% तक करने की अपील के साथ इसके सदस्य बनने की अपील की गई। बहुपक्षीय विकास बैंक से लेकर डिजिटल सार्वजनिक आधारभूत संरचना आदि अनेक ऐसे बिंदु हैं जिनको उपलब्धियां के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है। 

कुल मिलाकर विश्व के नेताओं ने एक वर्ष के सम्मेलनों और दिल्ली समापन के साथ भारत की प्राचीन सभ्यता - संस्कृति ,धर्म ,विरासत, राष्ट्र - राज्य की अवधारणा, वर्तमान ताकत, एकता, अखंडता के इसके सूत्र, वैश्विक सोच, आधुनिक प्रगति और भविष्य में विश्व का शीर्ष देश बनने के संकल्प को साक्षात्कार देखा और समझा। इस मनोविज्ञान का असर आने वाले समय में दिखाई देगा और भारत ज्यादा मुखर होकर अपनी सोच के अनुरूप भावी विश्व व्यवस्था को दिशा देने में सफल भूमिकाएं निभाएगा।  जी 20 को इसके अनुकूल एक सशक्त आधार भारत के नेतृत्व में दे दिया गया है। उम्मीद की विश्व आर्थिक और तकनीकी विकास से लेकर संपूर्ण विश्व में खाद्यान्न व स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराने आदि की दृष्टि से समावेशी होगा तथा सहयोग और सहकार की भूमिका निभाते हुए तनाव दूर करने में भी सफल होगा।



गुरुवार, 7 सितंबर 2023

उदयनिधि के सनातन धर्म विरोधी वक्तव्य के निहितार्थ

 अवधेश कुमार

उदयनिधि स्टालिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और युवा मामलों के मंत्री भी हैं। ऐसे शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वो ऐसा वक्तय न दें जिससे करोड़ लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हों। उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना से करते हुए कहा कि ये कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनका केवल विरोध नहीं किया जा सकता, बल्कि उन्हें खत्म करना जरूरी होता है। इस बयान के विरुद्ध संपूर्ण विश्व के हिंदू समाज के भीतर आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है।  लेकिन तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति और उदयनिधि की पार्टी द्रमुक की विचारधारा तथा अतीत एवं वर्तमान को देखने पर यह निष्कर्ष सही नहीं लगेगा। उन्होंने जो कुछ बोला है वह उनकी राजनीतिक धारा की सोच है।  उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज होने के बाद उनकी प्रतिक्रिया देखिए।  उन्होंने कहा कि हम पेरियार और अन्ना के फॉलोवर हैं। मैं आज, कल और हमेशा यही कहूंगा कि द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को रोकने का हमारा संकल्प बिल्कुल भी कम नहीं होगा। 

इसके बाद आप यह नहीं कह सकते कि वह उत्तेजना या भावावेश में बोल गए। वे जिस कार्यक्रम में बोल रहे थे उसका नाम ही था, सनातन उन्मूलन कार्यक्रम।  उन्होंने इस नाम की भी प्रशंसा की और कहा- सनातन क्या है? यह समानता और सामाजिक न्याय के खिलाफ है। सनातन का अर्थ होता है- स्थायी यानी ऐसी चीज जिसे बदला नहीं जा सकता। सनातन उन्मूलन सम्मेलन में उदयनिधि स्टालिन के अलावा कई मंत्री और द्रमुक नेता शामिल हुए। सनातन के उन्मूलन नामक शीर्षक से कार्यक्रम का आयोजन ही बताता है कि तमिलनाडु में किस तरह की विचारधारा और राजनीति को प्रश्रय दिया जा रहा है। निश्चित रूप से इसकी निंदा की जाएगी और विरोध भी होगा। द्रमुक आईएनडीआईए गठबंधन का एक मुख्य घटक है इसलिए अन्य घटक दलों से पूछा जाएगा कि आपका इस पर क्या मत है? कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों ने इस बयान से तो अपने को अलग किया लेकिन जितना प्रखर विरोध इसका होना चाहिए नहीं किया। यह राजनीतिक विवशता दुर्भाग्यपूर्ण है। 

हालांकि उदयनिधि के बयान पर आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। उदयनिधि के दादा करुणानिधि के ऐसे बयान आते रहते थे। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के विरोध में उन्होंने कहा था कि राम का जन्म प्रमाण पत्र कहां है? राम सेतु के बारे में उन्होंने कहा कि उसको किस सिविल इंजीनियर ने बनाया था? भाजपा उसका नाम बताए। द्रमुक के नेताओं के ऐसे बयान आते हैं। 1960 दशक में द्रमुक नेता रामास्वामी नायककर ने तब मद्रास शहर में ट्रकों पर श्रीराम, सीता जी और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों की झाड़ू और जूतों से पिटाई करने वाली झांकियां निकाली थी। इसके पीछे लक्ष्य था कि ब्राह्मणों व‌ सनातनियों को भड़काओ और उनके विरुद्ध दूसरी जातियों को लामबंद करो। ब्राह्मण और शुद्र नाम लेकर द्रमुक बहुसंख्यक दलितों का समर्थन पाता है। 

दरअसल, द्रमुक निकला ही हिन्दू धर्म विरोधी विचारधारा से। 1916 में टीएम नायर और पी त्यागराज चेट्टी ने द्रविड़ राजनीति की शुरुआत इस आधार पर की कि हम उत्तर भारतीय आर्यों से अलग हैं। उन्होंने जस्टिस पार्टी की स्थापना की जिसमें आई रामास्वामी पेरियार भी शामिल हुए। अंग्रेजों ने भारत में फूट डालो राज करो की नीति के तहत लोगों की सोच बदलने के लिए इतिहास, धर्म, संस्कृति ,समाजशास्त्र की पुस्तकें अपने अनुसार लिखवाईं जिसमें कहा गया कि आर्य बाहर से आए और उनका द्रविड़ों के साथ संघर्ष हुआ जो जारी है। आर्यों ने द्रविड़ों पर अपनी धर्म व्यवस्था लादने की कोशिश की। अंग्रेजों ने ही जस्टिस पार्टी की स्थापना के लिए प्रेरित किया और उसे  मदद देते रहे। अन्नादुरई भी पेरियार के साथ आए लेकिन बाद में अलग होकर उन्होंने द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम या द्रमुक की स्थापना की। पूरा आंदोलन हिंदू धर्म की मान्यताओं पर चोट कर ऐसी सोच स्थापित करने वाला था जिसके कारण तमिलनाडु के निवासियों को लगे कि वे‌ भारत और यहां की संस्कृति या धर्म के अंग है ही नहीं। इसी कारण तमिलनाडु में अलग देश का भी आंदोलन चला। हिंदी विरोध का सबसे तगड़ा आंदोलन तमिलनाडु में ही चला। यह बात अलग है कि तमिलनाडु के ही विवेकशील नेताओं ने इन सबका विरोध किया। उदाहरण के लिए सी राजगोपालाचारी ने भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की वकालत की। उन्होंने गीता और उपनिषदों पर टीकायें लिखकर बताया कि आर्य द्रविड़ के नाम पर झूठ फैलाया जा रहा है। रामचरितमानस और रामायण के बारे में गलत बातें फैलाये जाने की काट के लिए उन्होंने गद्य में चक्रवर्ति तिरुमगन लिखा जो रामायण कथा है। उन्होंने स्वयं और उनकी प्रेरणा से काफी लोग ऐसे लेख लिखते रहे जिससे साबित होता था कि आर्य द्रविड़ भेद भारत में या हिंदू धर्म में  नहीं है और तमिल भी सनातनी हिंदू हैं।

बाद के कालखंड में कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी कमजोर हुई और द्रविड़ राजनीति आगे बढ़ने लगी। हिंदी के विरुद्ध 60 और 70 के दशक के आंदोलन की उग्रता और उत्तेजना के कारण तमिलनाडु की सोच में व्यापक अंतर आया और द्रविड़ दल सशक्त हुये। 1977 से आज तक द्रमुक और अन्नाद्रमुक दो पार्टियों के इर्द-गिर्द तमिलनाडु की राजनीति चल रही है।  भाजपा पहले वहां शक्तिशाली नहीं है लेकिन उसका समर्थन बढा है।दूसरे दलों को लगता है कि हिंदू धर्म पर जितना चोट करेंगे, उनकी राजनीति की धारा वहां सशक्त होगी। अन्नाद्रमुक के भाजपा के साथ होने कारण भी वे अपने इस हिंदू धर्म विरोधी, हिंदी विरोधी तेवर को आक्रामक बनाए रखती है।

जो कुछ उदयनिधि या दूसरे नेता अपनी राजनीति के लिए बोलते हैं वह सच नहीं है और उनकी अज्ञानता का भी द्योतक है। सनातन का अर्थ ठहराव या जड़ता नहीं है। नित्य नूतन सनातन: यानी जो नित्य नूतन है वही सनातन है। जैसे सूर्य सनातन है। सुबह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक को क्या आप जड़ ,स्थिर या ठहरा हुआ कहेंगे ? यही तो सनातन है। दूसरे, तमिलनाडु हिंदू धर्म, सभ्यता- संस्कृति और अध्यात्म का महत्वपूर्ण केंद्र है। पूरे तमिल संगम साहित्य को उठा लीजिए हिंदू इतिहास, विचारों और कथाओं से भरे पड़े हैं। विविधता में एकता हमारी संस्कृति है लेकिन विरोधी इस एकता की बजाय विविधता को उठाकर तमिल संस्कृति को भारतीय संस्कृति से अलग साबित करते रहे हैं। तमिल संस्कृति भारतीय संस्कृति ही थी। संत तिरुवल्लुवर की रचना तिरुक्कुरल का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। यह ग्रंथ लोगों को ईश्वर में आस्था की ही बात करता है और बताता है कि पूजा पाठ के लिए संन्यासी होने की आवश्यकता नहीं, गृहस्थ होकर भी आप ऐसा कर सकते हैं। यह तो हिन्दू धर्म की ही धारा है। हिंदू धर्म की दो प्रमुख शाखाएं शैव और वैष्णव तमिलनाडु में न केवल मजबूत रहे बल्कि वहां के संतो ने अपने मार्ग का प्रसार भारत के दूसरे क्षेत्रों में भी किया। नयनमार या नयनार संतों की लंबी परंपरा है जो भगवान शिव के भक्त थे। ऐसे 63 संतों के नाम हमारे ग्रंथो में उपलब्ध हैं। झूठ है कि सारे ब्राह्मण थे। ये समाज के सभी जातियों से आते थे। इनके रचित भजन व मंत्र संपूर्ण देश में गाये व पढ़े जाते हैं।   विष्णु या नारायण की उपासना करने वाले 12 संतों, जिन्हें आलवार कहते हैं, सर्वत्र सम्मान है और इनमें  निम्न जाति के भी थे।  वैष्णव संप्रदाय के पंथ विशिष्टाद्वैतवाद , अद्वैतवाद, द्वैतवाद सबका स्रोत तमिलनाडु और आसपास ही है। विशिष्टाद्वैतवाद के संस्थापक संत रामानुजाचार्य के मानने वाले पूरे भारत में है। द्वैतवाद के संत माधवाचार्य ने जिन 37 ग्रंथों की रचना की वह संपूर्ण भारत में प्रचलित हैं। इसलिए आर्य और द्रविड़ भेद या तमिल संस्कृति भारतीय संस्कृति से अलग आदि विचार तथ्यों से बिल्कुल पड़े हैं।

 कोई पार्टी इतनी हैसियत नहीं रखता कि हिंदू धर्म को खत्म कर दे। उदयनिधि की बातें इसलिए डराती हैं कि यह हिंदू समाज की एकता की कोशिशों के साथ भारत की एकता अखंडता पर वैचारिक चोट करने वाले हैं। लेकिन गुस्सैल प्रतिक्रिया देने की बजाय तथ्यात्मक प्रतिवाद करें। आईएनडीआईए के दलों को भी विचार करना पड़ेगा कि समाज और देश की एकता से बड़ी कोई राजनीति नहीं हो सकती। 

पता– अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208



शनिवार, 2 सितंबर 2023

चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों के नए नाम रखने के संदर्भ में भारत और चीन के संबंधों का 1949 से लेकर आज तक का ब्यौरा

कर्नल शिवदान सिंह
अभी कुछ दिन पहले चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों के नाम बदलकर उन्हें दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताया है ! जिसे भारत सरकार ने कठोर शब्दों में नकार दिया है ! इन स्थानों में 2 आबादी वाले शहर, दो भूभाग, पांच पहाड़ी चोटिया और दो नदियां हैं और यह उसने तब किया है जब अभी कुछ दिन में ही चीन के रक्षा मंत्री जनरल ली संगफू भारत में होने वाली शंघाई सहयोग संघ की बैठक में हिस्सा लेने के लिए आने वाले हैं। इसके अलावा वहां के विदेश मंत्री कुयङ्ग्गंग भी भारत का दौरा मई में करने वाले हैं! इससे सिद्ध होता है कि चीन भारत को अरुणाचल के लिए आंखें दिखाने की कोशिश कर रहा है! अपने पड़ोसी देशों की भूमियों पर कब्जा करने की प्रक्रिया चीन में 1949 मैं उस समय प्रारंभ हुई जब चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन लागू हुआ तथा माओ चीन के प्रमुख बने।  माओ ने चीनी जनता को अपना शक्तिशाली रूप दिखाने के लिए विस्तार वादी नीति अपनाई जिसके द्वारा उसने धीरे-धीरे 14 पड़ोसी देशों जिनमें भूटान नेपाल वर्मा और सोवियत संघ के बहुत से देश शामिल थे। इसके लिए उसने अपने झूठे इतिहास का सहारा लिया और कमजोर पड़ौसी देशों की भूमियों पर कब्जा कर लिया। इसी प्रक्रिया के अनुसार जब चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा किया तब वहां की मोहिनबा जाति के लोगों ने पलायन करके भारत के अंदर अरुणाचल में शरण ली ये बोद्ध धर्म के अनुयाई हैं और दलाई लामा को अपना शासक मानते हैं। इसको देखते हुए चीन ने जिस भी क्षेत्र में मोइनबा जाति के लोगों ने शरण ली उन्हीं को चीन ने दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताना शुरू कर दिया। ऐसा ही पाकिस्तान ने 1947 में जम्मू कश्मीर में किया थाऔर दावा किया की कश्मीर घाटी में मुस्लिम बहुल आबादी पाकिस्तान में मिलना चाहती है। जबकि जम्मू कश्मीर की तरह अरुणाचल प्रदेश भी भारत का हिस्सा वैधानिक पद्धति से घोषित किया गया था भारत तिब्बत और चीन की सीमाओं के निर्धारण के लिए भारत के अंग्रेजी शासकों ने 1914 में शिमला में भारत तिब्बत और चीन के बीच में एक लंबी बैठक का आयोजन किया जो पूरे 2 महीने चली इस बैठक में तिब्बत के प्रतिनिधि ने तिब्बत- भारत सीमा पर मैक मोहन रेखा को मान्यता प्रदान की। परंतु चीन ने भारत चीन सीमा के लद्दाख क्षेत्र के लिए इस रेखा को मान्यता प्रदान नहीं की। यह प्रसिद्ध मैकमोहन रेखा है जिसका निर्धारण काफी सोच-समझकर किया गया था यह उसी प्रकार था, जिस प्रकार जम्मू-कश्मीर के विलय के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार इस राज्य का विलय भारत में हुआ था। जम्मू-कश्मीर के विलय के लिए वहां के शासक महाराजा हरि सिंह ने अपनी स्वीकृति प्रदान की थी इसी प्रकार तिब्बत भारत सीमा के लिए तिब्बत के मान्यता प्राप्त प्रतिदिन सहमति दी थी उस समय तिब्बत स्वतंत्रता और उनके प्रतिनिधि को सीमा के बारे में सारे अधिकार प्राप्त है। परंतु 1949 में जैसे ही माओ सत्ता में आए उन्होंने पड़ोसी देशों से चीन और तिब्बत द्वारा की गई सारी संधियों को नकार दिया और कहां कि अब चीन इतिहास के आधार पर अपनी सीमाएं पड़ोसी देशों के साथ निर्धारित करेगा।
1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे के लिए उसकी आलोचना पूरे विश्व के गैर कम्युनिस्ट देशों ने की परंतु इस समय भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस विषय पर चुप्पी साध ली और एक प्रकार से चीन के तिब्बत पर कब्जे को स्वीकृति प्रदान कर दी। पंडित नेहरू माओ से संबंध बढ़ाकर विश्व में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहते थे। इसके लिए भारत ने चीन के साथ अपने संबंधों को और प्रगाढ़ करने के लिए 1954 में पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसमें मुख्य सिद्धांत थे... दोनों देश एक दूसरे की सीमाओं को मान्यता प्रदान करेंगे, एक दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे और दोनों एक दूसरे को बराबर का समझेंगे। इसके साथ साथ सीमा पर शांति बनाई जाएगी। पंचशील समझौते के बाद पूरे देश में हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे लगाए जाने लगे और पूरे देश में यह संदेश देने की कोशिश की गई कि भारत और चीन अब भाइयों की तरह है। परंतु चीन ने इस नारे की भावना के अनुसार कभी भी भारत को भाई नहीं समझा और हर हर समय वह भारत को धोखा देने की योजनाएं बनाता रहा। इसी संधि के साथ-साथ भारत ने चीन के साथ 4 महीने की गहन मंत्रणा के बादआपसी व्यापार के लिए एक और संधि पर पंडित नेहरू और चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने हस्ताक्षर किए, जिसका नाम था तिब्बत (चीन का क्षेत्र) और भारत के बीच व्यापार और आदान-प्रदान की संधि। यह महत्वपूर्ण संधि थी क्योंकि पुराने समय में दक्षिणी तिब्बत और भारत के बीच व्यापार का मार्ग यहीं से जाता था। इस प्रकार इस संधि के द्वारा भारत ने चीन के तिब्बत पर कब्जे को और भी ज्यादा मान्यता प्रदान कर दी और विश्व को दिखा दिया कि भारत चीन के साथ है।
चीन के द्वारा तिब्बत पर कब्जे को वहां की जनता ने स्वीकार नहीं किया और तिब्बत में लासा और इसके चारों तरफ विद्रोह की लपटें फैल गई 1959 मैं जब दलाई लामा को जब लगा की चीन उन्हें गिरफ्तार कर सकता है। तब सिक्किम के रास्ते पैदल चलकर भारत में शरण ली ! यहां पर भारत सरकार ने उन्हें आदर पूर्वक राजनीतिक शरण प्रदान की और हिमाचल के धर्मशाला में उन्हें बसा दिया। हालांकि भारत सरकार चीन के साथ अपने संबंध और भी मजबूत करना चाहती थी परंतु चीन हमेशा भारत के प्रति द्वेष की भावना रखता रहा और सोचता था कि तिब्बत मैं विद्रोहियों को अमेरिका भारत के रास्ते ही मदद दे रहा है। दलाई लामा ने तिब्बत के शासक होने की पोजीशन भारत में प्रवेश करने के केवल 2 दिन बाद ही तिब्बत पर चीन के कब्जे के विरोध में संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव पेश कर दिया। राष्ट्र संघ में इस प्रस्ताव पर काफी बहस हुई और दलाई लामा के प्रस्ताव को बहुमत से पारित कर दिया गया परंतु इस कार्यवाही में भारत ने उदासीन रुख ही अपनाया। नेहरू ने देश की लोकसभा में बयान दिया की इस विषय पर भारत दलाई लामा के साथ नहीं है। इस प्रकार भारत ने दलाई लामा के विरुद्ध चीन को अपना सहयोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिया। पंडित नेहरू अपनी इस कार्रवाई के बाद यह सोचने लगे थे किचीन अब कभी भी भारत पर हमला नहीं करेगा और भारत चीन सीमा सुरक्षित रहेंगी। मगर शुरू से ही चीन इस सीमा पर आक्रमक कार्रवाई करता रहा और लद्दाख सेअरुणाचल तक फैले अक्साई चीन के 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा ठोकता रहा। चीन की सैन्य तैयारियां और संसाधनों को देखकर तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख जनरल थिमैया ने बार-बार प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनॉन को सेना के लिए संसाधन जुटाने के लिए आग्रह किया परंतु नेहरू, कृष्णा मेनन और बी के मौलिक की तिकड़ी ने कभी भी जनरल थिमैया के सुझावों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इससे निराश होकर जन थिममैया ने 1959 मैं अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। मौलिक इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख थे और नेहरू के करीबी थे जिसके कारण पूरे रक्षा मंत्रालय में उनका बोलबाला था। इसी कारण मलिक ने सेना के जमीनी स्तर के अधिकारियों को सीधे आदेश देने शुरू कर दिए। मौलिक की मुख्य जिम्मेदारी सरकार के लिए बाहरी देशों की इंटेलिजेंस एकत्रित करना था, और चीन अपने आक्रमक रुख के कारण मौलिक का मुख्य केंद्र था। इसलिए मौलिक उत्तर पूर्वी सीमा पर अग्रिम पोजीशन के रूप में भारत और चीन के बीच में नो मैंस लैंड कहे जाने वाले स्थानों पर सेना की छोटी-छोटी चौकियां स्थापित कर दी, जिसका सेना ने भारी विरोध किया परंतु उनके विरोध को दरकिनार करके यह चौकियां स्थापित की गई। इन चौकियों के द्वारा चीन ने सोचा शायद भारत आक्रमक रुख अख्तियार कर रहा है। इसलिए इससे पहले कि भारत चीन पर हमला करें उसने अचानक अक्टूबर 1962 में भारत पर हमला कर दिया। जिसमें मेजर शैतान सिंह ने लद्दाख के रेजांगला मेंअपने केवल 100 सैनिकों से चीन के 1200 सैनिकों को मार कर चीन को आगे बढ़ने से रोका। इसी प्रकार की वीरता भारतीय सेना ने चीन के विरुद्ध हर मोर्चे पर दिखाइ परंतु संसाधनों की कमी और पुरानेहथियारों और तोपखाने तथा वायु सेना की मदद उपलब्ध ना होने के कारण भारतीय सेना को बहुत बुरी हार का सामना करना पड़ा और इस हमले के द्वारा चीन ने 38000 वर्ग किलोमीटर में फैले अक्साई चिन क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। जिस पर वह आज तक जमा हुआ है। इसके बाद 1967 में चीन ने सिक्किम पर कब्जा करने के लिए नाथूला पर हमला किया। मगर यहां पर 17 डिवीजन के जीओसी जनरल सगत सिंह ने चीन को करारा जवाब देते हुए पीछे धकेल दिया। हालांकि रक्षा मंत्रालय और सेना के वरिष्ठ अधिकारी चीन को कड़ा जवाब देने के पक्ष में नहीं थे फिर भी जगत सिंह ने इसकी परवाह न करते हुए अपनी जिम्मेदारी को पूरा करते हुए सिक्किम की रक्षा की। जिसके कारण पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी कॉरिडोर या चिकननेक कहे जाने वाले क्षेत्र की रक्षा की अन्यथा चीन का इरादा सिलीगुड़ी सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर कब्जा करके पूरे पूर्वी राज्यों असम नागालैंड अरुणाचल मणिपाल इत्यादि को भारत से अलग अलग करना था। इसके बाद भी यदा-कदा चीन के आक्रामक रुख के कारण सीमा पर दोनों देशों के बीच में झड़पें चलती वही अरुणाचल का सपना पूरा करने के लिए 1986 में चीन ने सोम द्रोङ्ग छु नामक घाटी में हेलीपैड बनाने की कोशिश की जिसको भारतीय सेना ने जनरल सुंदर जी की कमांड में चीन के इस इरादे को नाकाम कर दिया और चीन को एक संदेश दिया की वह भविष्य में इस तरह की हरकत ना करें।
1962 के युद्ध मिली हार के बाद पूरे देश में इस युद्ध में उन कारणों का पता लगाने की मांगे उठी जिनके कारण भारत को इस हार को देखना पड़ा तथा उसका इतना बड़ा भूभाग चीन के कब्जे में चला गया। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने सेना के दो वरिष्ठ अधिकारी जनरल हेंडरसन और ब्रिगेडियर भगत को उन कारणों को पता लगाने के लिए एक जांच आयोग के रूप में नियुक्त किया। इन दोनों अधिकारियों ने लगन और ईमानदारी के साथ देशवासियों को सच्चाई बताने के लिए सीमाओं पर जाकर के इसकी जांच की और उन्होंने पाया कि इस युद्ध में रक्षा मंत्रालय और राजनीतिक हस्तक्षेप भी था जिसके कारण ना तो सेना युद्ध के लिए तैयार थी और ना ही चीन सीमा पर संचार के साधन जैसे सड़क पुल सुरंगे इत्यादि हीं थे। इसके अलावा वायु सेना के विमानों के उतरने के लिए वहां पर कोई लैंडिंग ग्राउंड भी नहीं थे। रिपोर्ट के इन संवेदनशील तथ्यों को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने इस रिपोर्ट को गोपनीय घोषित करके इसे सार्वजनिक करने से मना कर दिया। देश की पार्लियामेंट में भारतीय जनता पार्टी के अरुण जेटली ने इस रिपोर्ट की मांग उठाई थी जिसे सरकार ने नहीं माना। विडंबना देखिए कि जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तब उन्हीं अरुण जेटली ने इस रिपोर्ट को गोपनीयता के नाम पर सार्वजनिक करने से मना कर दिया था। अभी तक रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय में गोपनीयता के कारण पड़ी हुई है और देशवासियों को इतनी बड़ी हार के कारणों का पता नहीं लग पाया है।
इसके बाद भारत-चीन के बीच में तनाव कम करने के लिए उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मंडलों के बीच में बातचीत ओं का दौर शुरू हुआ जिससे सीमाओं पर तनाव कम किया जा सके। इसी बातचीत के चलते 1996 में एक दूसरे के प्रति विश्वास बहाने बढ़ाने के लिए एक संधि पर हस्ताक्षर किए गए जिसमें भारत के प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव और चीन के प्रधानमंत्री ने स्वयं हस्ताक्षर किए थे और इस समझौते के अनुसार सीमा पर दोनों देशों की सेनाएं अग्रिम क्षेत्रों में बगैर हथियारों के साथ गस्त करेंगी। इसी समझौते का नतीजा था कि गलवान में भारतीय सैनिक बगैर हथियारों के गए परंतु चीनी सैनिक अपनी धोखा देने की आदत के अनुसार कटीले तार लगे हुए डंडों के साथ आए। परंतु फिर भी भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों से ही लाठी-डंडे छीन कर उनका मुकाबला किया और उन्हें मौत के घाट उतारा। तवांग में भारतीय सैनिकों ने पहले से ही अपने आप को चीन की इस चाल का जवाब देने के लिए तैयार किया हुआ था। जिसके कारण तवांग में भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों की बुरी तरह से पिटाई की जिसमें बहुत से चीनी सैनिक मारे गए। इस प्रकार अब चीन को कड़ा संदेश चला गया है कि यह भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है और भारत 20 वीं सदी का आर्थिक और सैनिक दृष्टि से सशक्त भारत है। इसी कारण अब सेना को आधुनिकतम हथियार सीमाओं पर चौकसी रखने के लिए इलेक्ट्रॉनिक संसाधन और संचार के माध्यमों को उपलब्ध करा कर चीन को संदेश दे दिया गया है।
तथ्यों के विश्लेषण से यह साफ हो जाता है की 50 और 60 के दशक में भारत सरकार ने चीन की हरकतों को पहचानने में बहुत बड़ी भूल की जिसके कारण चीन ने आराम से तिब्बत और अक्साई चिन के बड़े क्षेत्रफल कब्जा कर लिया ! विपक्षी दलों के द्वारा भारतीय सेना की कार्यशैली पर टिप्पणियां सैनिकों के मनोबल को प्रभावित करती हैं। जैसे कांग्रेस पार्टी पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक को ही झूठा मानती है। इसके साथ साथ गलवान और तवांग की मुठभेड़ों पर भी शक कर रही है। भारतीय सीमा पर कुछ क्षेत्रों में चीनी हरकत को कुछ राजनीतिज्ञ यह मान रहे हैं कि चीन ने भारत के क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया है। परंतु यह सत्य नहीं है, भारतीय सेना मजबूती से चीन की हर चाल का जवाब देने में सक्षम है और चीन अब भारत की । इंच भूमि पर भी कब्जा नहीं कर सकता है।
आक्रमक स्वरूप का ध्यान करना चाहिए जिसके कारण चीन भारत के 38000 वर्ग किलोमीटर पर कब्जा किए हुए हैं और तत्कालीन सरकार ने तिब्बत के ऊपर चीन को स्वीकृति देकर एक प्रकार से चीन को तिब्बत का असली शासक के रूप में मान्यता प्रदान की थी।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

पावरग्रिड उत्तरी क्षेत्र ने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल फरीदाबाद के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए

फरीदाबाद। पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (पावरग्रिड), उत्तरी क्षेत्र, फरीदाबाद ने उन्नत रोबोटिक सर्जरी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए दिनांक 01 सितंबर 2023 को ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, फरीदाबाद के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 25 करोड़ रुपये है। फरीदाबाद प्रमुख जिलों में से एक है और दिल्ली एनसीआर क्षेत्र से निकटता के कारण, चिकित्सा के क्षेत्र में रोगियों के लिए कम खर्च में उन्नत ईलाज की आवश्यकता रहती है। ईएसआईसी श्रमिकों के विभिन्न प्रकार के चिकित्सकीय लाभों से संबंधित कल्याणकारी संस्थान है और इस प्रकार उन्नत रोबोटिक सर्जरी प्रणाली के माध्यम से रोगियों को शीघ्र चिकित्सकीय लाभ मिलेगा, जिससे श्रमिक अल्प समयावधि में कार्य पर लौट सकने में सक्षम होंगे। एक जिम्मेदार कॉर्पोरेट संस्थान के रूप में पावरग्रिड द्वारा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत स्वास्थ्यगत क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पहल कर रहा है, यह परियोजना देश में स्वास्थ्य और चिकित्सा के बुनियादी ढांचे में व्यापक सुधार कर पावरग्रिड के मिशन में एक और मील का पत्थर सिद्ध होगा। उक्त समझौते पर पावरग्रिड, उत्तरी क्षेत्र। फरीदाबाद के श्री ए. के मिश्रा, कार्यपालक निदेशक एवं ईएसआईसी मुख्यालय से श्री रत्नेश गौतम, बीमा आयुक्त और डॉ. असीम दास (डीन) की गरिमामय उपस्थिति में श्री अशोक कुमार मिश्रा, महाप्रबंधक (मानव संसाधन एवं सीएसआर) एवं ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, फरीदाबाद के श्री अनिल कुमार पांडे, चिकित्सा अधीक्षक ने हस्ताक्षर किए।

साथ ही इस अवसर पर ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से डॉ. निशांत घुरनानी, रोबोटिक सर्जन, डॉ. मिथिलेश कुमार और पावरग्रिड से श्री संजय कुमार वर्मा महाप्रबंधक (मानव संसाधन प्रभारी), श्री राजेश कुमार गुप्ता, मुख्य प्रबन्धक (सीएसआर), श्री यू सी त्रिवेदी, सलाहकार श्री दीपक धमेजा, मुख्य प्रबन्धक भी उपस्थित रहे।


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