गुरुवार, 7 सितंबर 2023

उदयनिधि के सनातन धर्म विरोधी वक्तव्य के निहितार्थ

 अवधेश कुमार

उदयनिधि स्टालिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और युवा मामलों के मंत्री भी हैं। ऐसे शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वो ऐसा वक्तय न दें जिससे करोड़ लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हों। उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना से करते हुए कहा कि ये कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनका केवल विरोध नहीं किया जा सकता, बल्कि उन्हें खत्म करना जरूरी होता है। इस बयान के विरुद्ध संपूर्ण विश्व के हिंदू समाज के भीतर आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है।  लेकिन तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति और उदयनिधि की पार्टी द्रमुक की विचारधारा तथा अतीत एवं वर्तमान को देखने पर यह निष्कर्ष सही नहीं लगेगा। उन्होंने जो कुछ बोला है वह उनकी राजनीतिक धारा की सोच है।  उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज होने के बाद उनकी प्रतिक्रिया देखिए।  उन्होंने कहा कि हम पेरियार और अन्ना के फॉलोवर हैं। मैं आज, कल और हमेशा यही कहूंगा कि द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को रोकने का हमारा संकल्प बिल्कुल भी कम नहीं होगा। 

इसके बाद आप यह नहीं कह सकते कि वह उत्तेजना या भावावेश में बोल गए। वे जिस कार्यक्रम में बोल रहे थे उसका नाम ही था, सनातन उन्मूलन कार्यक्रम।  उन्होंने इस नाम की भी प्रशंसा की और कहा- सनातन क्या है? यह समानता और सामाजिक न्याय के खिलाफ है। सनातन का अर्थ होता है- स्थायी यानी ऐसी चीज जिसे बदला नहीं जा सकता। सनातन उन्मूलन सम्मेलन में उदयनिधि स्टालिन के अलावा कई मंत्री और द्रमुक नेता शामिल हुए। सनातन के उन्मूलन नामक शीर्षक से कार्यक्रम का आयोजन ही बताता है कि तमिलनाडु में किस तरह की विचारधारा और राजनीति को प्रश्रय दिया जा रहा है। निश्चित रूप से इसकी निंदा की जाएगी और विरोध भी होगा। द्रमुक आईएनडीआईए गठबंधन का एक मुख्य घटक है इसलिए अन्य घटक दलों से पूछा जाएगा कि आपका इस पर क्या मत है? कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों ने इस बयान से तो अपने को अलग किया लेकिन जितना प्रखर विरोध इसका होना चाहिए नहीं किया। यह राजनीतिक विवशता दुर्भाग्यपूर्ण है। 

हालांकि उदयनिधि के बयान पर आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। उदयनिधि के दादा करुणानिधि के ऐसे बयान आते रहते थे। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के विरोध में उन्होंने कहा था कि राम का जन्म प्रमाण पत्र कहां है? राम सेतु के बारे में उन्होंने कहा कि उसको किस सिविल इंजीनियर ने बनाया था? भाजपा उसका नाम बताए। द्रमुक के नेताओं के ऐसे बयान आते हैं। 1960 दशक में द्रमुक नेता रामास्वामी नायककर ने तब मद्रास शहर में ट्रकों पर श्रीराम, सीता जी और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों की झाड़ू और जूतों से पिटाई करने वाली झांकियां निकाली थी। इसके पीछे लक्ष्य था कि ब्राह्मणों व‌ सनातनियों को भड़काओ और उनके विरुद्ध दूसरी जातियों को लामबंद करो। ब्राह्मण और शुद्र नाम लेकर द्रमुक बहुसंख्यक दलितों का समर्थन पाता है। 

दरअसल, द्रमुक निकला ही हिन्दू धर्म विरोधी विचारधारा से। 1916 में टीएम नायर और पी त्यागराज चेट्टी ने द्रविड़ राजनीति की शुरुआत इस आधार पर की कि हम उत्तर भारतीय आर्यों से अलग हैं। उन्होंने जस्टिस पार्टी की स्थापना की जिसमें आई रामास्वामी पेरियार भी शामिल हुए। अंग्रेजों ने भारत में फूट डालो राज करो की नीति के तहत लोगों की सोच बदलने के लिए इतिहास, धर्म, संस्कृति ,समाजशास्त्र की पुस्तकें अपने अनुसार लिखवाईं जिसमें कहा गया कि आर्य बाहर से आए और उनका द्रविड़ों के साथ संघर्ष हुआ जो जारी है। आर्यों ने द्रविड़ों पर अपनी धर्म व्यवस्था लादने की कोशिश की। अंग्रेजों ने ही जस्टिस पार्टी की स्थापना के लिए प्रेरित किया और उसे  मदद देते रहे। अन्नादुरई भी पेरियार के साथ आए लेकिन बाद में अलग होकर उन्होंने द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम या द्रमुक की स्थापना की। पूरा आंदोलन हिंदू धर्म की मान्यताओं पर चोट कर ऐसी सोच स्थापित करने वाला था जिसके कारण तमिलनाडु के निवासियों को लगे कि वे‌ भारत और यहां की संस्कृति या धर्म के अंग है ही नहीं। इसी कारण तमिलनाडु में अलग देश का भी आंदोलन चला। हिंदी विरोध का सबसे तगड़ा आंदोलन तमिलनाडु में ही चला। यह बात अलग है कि तमिलनाडु के ही विवेकशील नेताओं ने इन सबका विरोध किया। उदाहरण के लिए सी राजगोपालाचारी ने भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की वकालत की। उन्होंने गीता और उपनिषदों पर टीकायें लिखकर बताया कि आर्य द्रविड़ के नाम पर झूठ फैलाया जा रहा है। रामचरितमानस और रामायण के बारे में गलत बातें फैलाये जाने की काट के लिए उन्होंने गद्य में चक्रवर्ति तिरुमगन लिखा जो रामायण कथा है। उन्होंने स्वयं और उनकी प्रेरणा से काफी लोग ऐसे लेख लिखते रहे जिससे साबित होता था कि आर्य द्रविड़ भेद भारत में या हिंदू धर्म में  नहीं है और तमिल भी सनातनी हिंदू हैं।

बाद के कालखंड में कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी कमजोर हुई और द्रविड़ राजनीति आगे बढ़ने लगी। हिंदी के विरुद्ध 60 और 70 के दशक के आंदोलन की उग्रता और उत्तेजना के कारण तमिलनाडु की सोच में व्यापक अंतर आया और द्रविड़ दल सशक्त हुये। 1977 से आज तक द्रमुक और अन्नाद्रमुक दो पार्टियों के इर्द-गिर्द तमिलनाडु की राजनीति चल रही है।  भाजपा पहले वहां शक्तिशाली नहीं है लेकिन उसका समर्थन बढा है।दूसरे दलों को लगता है कि हिंदू धर्म पर जितना चोट करेंगे, उनकी राजनीति की धारा वहां सशक्त होगी। अन्नाद्रमुक के भाजपा के साथ होने कारण भी वे अपने इस हिंदू धर्म विरोधी, हिंदी विरोधी तेवर को आक्रामक बनाए रखती है।

जो कुछ उदयनिधि या दूसरे नेता अपनी राजनीति के लिए बोलते हैं वह सच नहीं है और उनकी अज्ञानता का भी द्योतक है। सनातन का अर्थ ठहराव या जड़ता नहीं है। नित्य नूतन सनातन: यानी जो नित्य नूतन है वही सनातन है। जैसे सूर्य सनातन है। सुबह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक को क्या आप जड़ ,स्थिर या ठहरा हुआ कहेंगे ? यही तो सनातन है। दूसरे, तमिलनाडु हिंदू धर्म, सभ्यता- संस्कृति और अध्यात्म का महत्वपूर्ण केंद्र है। पूरे तमिल संगम साहित्य को उठा लीजिए हिंदू इतिहास, विचारों और कथाओं से भरे पड़े हैं। विविधता में एकता हमारी संस्कृति है लेकिन विरोधी इस एकता की बजाय विविधता को उठाकर तमिल संस्कृति को भारतीय संस्कृति से अलग साबित करते रहे हैं। तमिल संस्कृति भारतीय संस्कृति ही थी। संत तिरुवल्लुवर की रचना तिरुक्कुरल का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। यह ग्रंथ लोगों को ईश्वर में आस्था की ही बात करता है और बताता है कि पूजा पाठ के लिए संन्यासी होने की आवश्यकता नहीं, गृहस्थ होकर भी आप ऐसा कर सकते हैं। यह तो हिन्दू धर्म की ही धारा है। हिंदू धर्म की दो प्रमुख शाखाएं शैव और वैष्णव तमिलनाडु में न केवल मजबूत रहे बल्कि वहां के संतो ने अपने मार्ग का प्रसार भारत के दूसरे क्षेत्रों में भी किया। नयनमार या नयनार संतों की लंबी परंपरा है जो भगवान शिव के भक्त थे। ऐसे 63 संतों के नाम हमारे ग्रंथो में उपलब्ध हैं। झूठ है कि सारे ब्राह्मण थे। ये समाज के सभी जातियों से आते थे। इनके रचित भजन व मंत्र संपूर्ण देश में गाये व पढ़े जाते हैं।   विष्णु या नारायण की उपासना करने वाले 12 संतों, जिन्हें आलवार कहते हैं, सर्वत्र सम्मान है और इनमें  निम्न जाति के भी थे।  वैष्णव संप्रदाय के पंथ विशिष्टाद्वैतवाद , अद्वैतवाद, द्वैतवाद सबका स्रोत तमिलनाडु और आसपास ही है। विशिष्टाद्वैतवाद के संस्थापक संत रामानुजाचार्य के मानने वाले पूरे भारत में है। द्वैतवाद के संत माधवाचार्य ने जिन 37 ग्रंथों की रचना की वह संपूर्ण भारत में प्रचलित हैं। इसलिए आर्य और द्रविड़ भेद या तमिल संस्कृति भारतीय संस्कृति से अलग आदि विचार तथ्यों से बिल्कुल पड़े हैं।

 कोई पार्टी इतनी हैसियत नहीं रखता कि हिंदू धर्म को खत्म कर दे। उदयनिधि की बातें इसलिए डराती हैं कि यह हिंदू समाज की एकता की कोशिशों के साथ भारत की एकता अखंडता पर वैचारिक चोट करने वाले हैं। लेकिन गुस्सैल प्रतिक्रिया देने की बजाय तथ्यात्मक प्रतिवाद करें। आईएनडीआईए के दलों को भी विचार करना पड़ेगा कि समाज और देश की एकता से बड़ी कोई राजनीति नहीं हो सकती। 

पता– अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208



शनिवार, 2 सितंबर 2023

चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों के नए नाम रखने के संदर्भ में भारत और चीन के संबंधों का 1949 से लेकर आज तक का ब्यौरा

कर्नल शिवदान सिंह
अभी कुछ दिन पहले चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों के नाम बदलकर उन्हें दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताया है ! जिसे भारत सरकार ने कठोर शब्दों में नकार दिया है ! इन स्थानों में 2 आबादी वाले शहर, दो भूभाग, पांच पहाड़ी चोटिया और दो नदियां हैं और यह उसने तब किया है जब अभी कुछ दिन में ही चीन के रक्षा मंत्री जनरल ली संगफू भारत में होने वाली शंघाई सहयोग संघ की बैठक में हिस्सा लेने के लिए आने वाले हैं। इसके अलावा वहां के विदेश मंत्री कुयङ्ग्गंग भी भारत का दौरा मई में करने वाले हैं! इससे सिद्ध होता है कि चीन भारत को अरुणाचल के लिए आंखें दिखाने की कोशिश कर रहा है! अपने पड़ोसी देशों की भूमियों पर कब्जा करने की प्रक्रिया चीन में 1949 मैं उस समय प्रारंभ हुई जब चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन लागू हुआ तथा माओ चीन के प्रमुख बने।  माओ ने चीनी जनता को अपना शक्तिशाली रूप दिखाने के लिए विस्तार वादी नीति अपनाई जिसके द्वारा उसने धीरे-धीरे 14 पड़ोसी देशों जिनमें भूटान नेपाल वर्मा और सोवियत संघ के बहुत से देश शामिल थे। इसके लिए उसने अपने झूठे इतिहास का सहारा लिया और कमजोर पड़ौसी देशों की भूमियों पर कब्जा कर लिया। इसी प्रक्रिया के अनुसार जब चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा किया तब वहां की मोहिनबा जाति के लोगों ने पलायन करके भारत के अंदर अरुणाचल में शरण ली ये बोद्ध धर्म के अनुयाई हैं और दलाई लामा को अपना शासक मानते हैं। इसको देखते हुए चीन ने जिस भी क्षेत्र में मोइनबा जाति के लोगों ने शरण ली उन्हीं को चीन ने दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताना शुरू कर दिया। ऐसा ही पाकिस्तान ने 1947 में जम्मू कश्मीर में किया थाऔर दावा किया की कश्मीर घाटी में मुस्लिम बहुल आबादी पाकिस्तान में मिलना चाहती है। जबकि जम्मू कश्मीर की तरह अरुणाचल प्रदेश भी भारत का हिस्सा वैधानिक पद्धति से घोषित किया गया था भारत तिब्बत और चीन की सीमाओं के निर्धारण के लिए भारत के अंग्रेजी शासकों ने 1914 में शिमला में भारत तिब्बत और चीन के बीच में एक लंबी बैठक का आयोजन किया जो पूरे 2 महीने चली इस बैठक में तिब्बत के प्रतिनिधि ने तिब्बत- भारत सीमा पर मैक मोहन रेखा को मान्यता प्रदान की। परंतु चीन ने भारत चीन सीमा के लद्दाख क्षेत्र के लिए इस रेखा को मान्यता प्रदान नहीं की। यह प्रसिद्ध मैकमोहन रेखा है जिसका निर्धारण काफी सोच-समझकर किया गया था यह उसी प्रकार था, जिस प्रकार जम्मू-कश्मीर के विलय के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार इस राज्य का विलय भारत में हुआ था। जम्मू-कश्मीर के विलय के लिए वहां के शासक महाराजा हरि सिंह ने अपनी स्वीकृति प्रदान की थी इसी प्रकार तिब्बत भारत सीमा के लिए तिब्बत के मान्यता प्राप्त प्रतिदिन सहमति दी थी उस समय तिब्बत स्वतंत्रता और उनके प्रतिनिधि को सीमा के बारे में सारे अधिकार प्राप्त है। परंतु 1949 में जैसे ही माओ सत्ता में आए उन्होंने पड़ोसी देशों से चीन और तिब्बत द्वारा की गई सारी संधियों को नकार दिया और कहां कि अब चीन इतिहास के आधार पर अपनी सीमाएं पड़ोसी देशों के साथ निर्धारित करेगा।
1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे के लिए उसकी आलोचना पूरे विश्व के गैर कम्युनिस्ट देशों ने की परंतु इस समय भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस विषय पर चुप्पी साध ली और एक प्रकार से चीन के तिब्बत पर कब्जे को स्वीकृति प्रदान कर दी। पंडित नेहरू माओ से संबंध बढ़ाकर विश्व में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहते थे। इसके लिए भारत ने चीन के साथ अपने संबंधों को और प्रगाढ़ करने के लिए 1954 में पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसमें मुख्य सिद्धांत थे... दोनों देश एक दूसरे की सीमाओं को मान्यता प्रदान करेंगे, एक दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे और दोनों एक दूसरे को बराबर का समझेंगे। इसके साथ साथ सीमा पर शांति बनाई जाएगी। पंचशील समझौते के बाद पूरे देश में हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे लगाए जाने लगे और पूरे देश में यह संदेश देने की कोशिश की गई कि भारत और चीन अब भाइयों की तरह है। परंतु चीन ने इस नारे की भावना के अनुसार कभी भी भारत को भाई नहीं समझा और हर हर समय वह भारत को धोखा देने की योजनाएं बनाता रहा। इसी संधि के साथ-साथ भारत ने चीन के साथ 4 महीने की गहन मंत्रणा के बादआपसी व्यापार के लिए एक और संधि पर पंडित नेहरू और चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने हस्ताक्षर किए, जिसका नाम था तिब्बत (चीन का क्षेत्र) और भारत के बीच व्यापार और आदान-प्रदान की संधि। यह महत्वपूर्ण संधि थी क्योंकि पुराने समय में दक्षिणी तिब्बत और भारत के बीच व्यापार का मार्ग यहीं से जाता था। इस प्रकार इस संधि के द्वारा भारत ने चीन के तिब्बत पर कब्जे को और भी ज्यादा मान्यता प्रदान कर दी और विश्व को दिखा दिया कि भारत चीन के साथ है।
चीन के द्वारा तिब्बत पर कब्जे को वहां की जनता ने स्वीकार नहीं किया और तिब्बत में लासा और इसके चारों तरफ विद्रोह की लपटें फैल गई 1959 मैं जब दलाई लामा को जब लगा की चीन उन्हें गिरफ्तार कर सकता है। तब सिक्किम के रास्ते पैदल चलकर भारत में शरण ली ! यहां पर भारत सरकार ने उन्हें आदर पूर्वक राजनीतिक शरण प्रदान की और हिमाचल के धर्मशाला में उन्हें बसा दिया। हालांकि भारत सरकार चीन के साथ अपने संबंध और भी मजबूत करना चाहती थी परंतु चीन हमेशा भारत के प्रति द्वेष की भावना रखता रहा और सोचता था कि तिब्बत मैं विद्रोहियों को अमेरिका भारत के रास्ते ही मदद दे रहा है। दलाई लामा ने तिब्बत के शासक होने की पोजीशन भारत में प्रवेश करने के केवल 2 दिन बाद ही तिब्बत पर चीन के कब्जे के विरोध में संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव पेश कर दिया। राष्ट्र संघ में इस प्रस्ताव पर काफी बहस हुई और दलाई लामा के प्रस्ताव को बहुमत से पारित कर दिया गया परंतु इस कार्यवाही में भारत ने उदासीन रुख ही अपनाया। नेहरू ने देश की लोकसभा में बयान दिया की इस विषय पर भारत दलाई लामा के साथ नहीं है। इस प्रकार भारत ने दलाई लामा के विरुद्ध चीन को अपना सहयोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिया। पंडित नेहरू अपनी इस कार्रवाई के बाद यह सोचने लगे थे किचीन अब कभी भी भारत पर हमला नहीं करेगा और भारत चीन सीमा सुरक्षित रहेंगी। मगर शुरू से ही चीन इस सीमा पर आक्रमक कार्रवाई करता रहा और लद्दाख सेअरुणाचल तक फैले अक्साई चीन के 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा ठोकता रहा। चीन की सैन्य तैयारियां और संसाधनों को देखकर तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख जनरल थिमैया ने बार-बार प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनॉन को सेना के लिए संसाधन जुटाने के लिए आग्रह किया परंतु नेहरू, कृष्णा मेनन और बी के मौलिक की तिकड़ी ने कभी भी जनरल थिमैया के सुझावों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इससे निराश होकर जन थिममैया ने 1959 मैं अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। मौलिक इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख थे और नेहरू के करीबी थे जिसके कारण पूरे रक्षा मंत्रालय में उनका बोलबाला था। इसी कारण मलिक ने सेना के जमीनी स्तर के अधिकारियों को सीधे आदेश देने शुरू कर दिए। मौलिक की मुख्य जिम्मेदारी सरकार के लिए बाहरी देशों की इंटेलिजेंस एकत्रित करना था, और चीन अपने आक्रमक रुख के कारण मौलिक का मुख्य केंद्र था। इसलिए मौलिक उत्तर पूर्वी सीमा पर अग्रिम पोजीशन के रूप में भारत और चीन के बीच में नो मैंस लैंड कहे जाने वाले स्थानों पर सेना की छोटी-छोटी चौकियां स्थापित कर दी, जिसका सेना ने भारी विरोध किया परंतु उनके विरोध को दरकिनार करके यह चौकियां स्थापित की गई। इन चौकियों के द्वारा चीन ने सोचा शायद भारत आक्रमक रुख अख्तियार कर रहा है। इसलिए इससे पहले कि भारत चीन पर हमला करें उसने अचानक अक्टूबर 1962 में भारत पर हमला कर दिया। जिसमें मेजर शैतान सिंह ने लद्दाख के रेजांगला मेंअपने केवल 100 सैनिकों से चीन के 1200 सैनिकों को मार कर चीन को आगे बढ़ने से रोका। इसी प्रकार की वीरता भारतीय सेना ने चीन के विरुद्ध हर मोर्चे पर दिखाइ परंतु संसाधनों की कमी और पुरानेहथियारों और तोपखाने तथा वायु सेना की मदद उपलब्ध ना होने के कारण भारतीय सेना को बहुत बुरी हार का सामना करना पड़ा और इस हमले के द्वारा चीन ने 38000 वर्ग किलोमीटर में फैले अक्साई चिन क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। जिस पर वह आज तक जमा हुआ है। इसके बाद 1967 में चीन ने सिक्किम पर कब्जा करने के लिए नाथूला पर हमला किया। मगर यहां पर 17 डिवीजन के जीओसी जनरल सगत सिंह ने चीन को करारा जवाब देते हुए पीछे धकेल दिया। हालांकि रक्षा मंत्रालय और सेना के वरिष्ठ अधिकारी चीन को कड़ा जवाब देने के पक्ष में नहीं थे फिर भी जगत सिंह ने इसकी परवाह न करते हुए अपनी जिम्मेदारी को पूरा करते हुए सिक्किम की रक्षा की। जिसके कारण पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी कॉरिडोर या चिकननेक कहे जाने वाले क्षेत्र की रक्षा की अन्यथा चीन का इरादा सिलीगुड़ी सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर कब्जा करके पूरे पूर्वी राज्यों असम नागालैंड अरुणाचल मणिपाल इत्यादि को भारत से अलग अलग करना था। इसके बाद भी यदा-कदा चीन के आक्रामक रुख के कारण सीमा पर दोनों देशों के बीच में झड़पें चलती वही अरुणाचल का सपना पूरा करने के लिए 1986 में चीन ने सोम द्रोङ्ग छु नामक घाटी में हेलीपैड बनाने की कोशिश की जिसको भारतीय सेना ने जनरल सुंदर जी की कमांड में चीन के इस इरादे को नाकाम कर दिया और चीन को एक संदेश दिया की वह भविष्य में इस तरह की हरकत ना करें।
1962 के युद्ध मिली हार के बाद पूरे देश में इस युद्ध में उन कारणों का पता लगाने की मांगे उठी जिनके कारण भारत को इस हार को देखना पड़ा तथा उसका इतना बड़ा भूभाग चीन के कब्जे में चला गया। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने सेना के दो वरिष्ठ अधिकारी जनरल हेंडरसन और ब्रिगेडियर भगत को उन कारणों को पता लगाने के लिए एक जांच आयोग के रूप में नियुक्त किया। इन दोनों अधिकारियों ने लगन और ईमानदारी के साथ देशवासियों को सच्चाई बताने के लिए सीमाओं पर जाकर के इसकी जांच की और उन्होंने पाया कि इस युद्ध में रक्षा मंत्रालय और राजनीतिक हस्तक्षेप भी था जिसके कारण ना तो सेना युद्ध के लिए तैयार थी और ना ही चीन सीमा पर संचार के साधन जैसे सड़क पुल सुरंगे इत्यादि हीं थे। इसके अलावा वायु सेना के विमानों के उतरने के लिए वहां पर कोई लैंडिंग ग्राउंड भी नहीं थे। रिपोर्ट के इन संवेदनशील तथ्यों को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने इस रिपोर्ट को गोपनीय घोषित करके इसे सार्वजनिक करने से मना कर दिया। देश की पार्लियामेंट में भारतीय जनता पार्टी के अरुण जेटली ने इस रिपोर्ट की मांग उठाई थी जिसे सरकार ने नहीं माना। विडंबना देखिए कि जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तब उन्हीं अरुण जेटली ने इस रिपोर्ट को गोपनीयता के नाम पर सार्वजनिक करने से मना कर दिया था। अभी तक रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय में गोपनीयता के कारण पड़ी हुई है और देशवासियों को इतनी बड़ी हार के कारणों का पता नहीं लग पाया है।
इसके बाद भारत-चीन के बीच में तनाव कम करने के लिए उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मंडलों के बीच में बातचीत ओं का दौर शुरू हुआ जिससे सीमाओं पर तनाव कम किया जा सके। इसी बातचीत के चलते 1996 में एक दूसरे के प्रति विश्वास बहाने बढ़ाने के लिए एक संधि पर हस्ताक्षर किए गए जिसमें भारत के प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव और चीन के प्रधानमंत्री ने स्वयं हस्ताक्षर किए थे और इस समझौते के अनुसार सीमा पर दोनों देशों की सेनाएं अग्रिम क्षेत्रों में बगैर हथियारों के साथ गस्त करेंगी। इसी समझौते का नतीजा था कि गलवान में भारतीय सैनिक बगैर हथियारों के गए परंतु चीनी सैनिक अपनी धोखा देने की आदत के अनुसार कटीले तार लगे हुए डंडों के साथ आए। परंतु फिर भी भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों से ही लाठी-डंडे छीन कर उनका मुकाबला किया और उन्हें मौत के घाट उतारा। तवांग में भारतीय सैनिकों ने पहले से ही अपने आप को चीन की इस चाल का जवाब देने के लिए तैयार किया हुआ था। जिसके कारण तवांग में भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों की बुरी तरह से पिटाई की जिसमें बहुत से चीनी सैनिक मारे गए। इस प्रकार अब चीन को कड़ा संदेश चला गया है कि यह भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है और भारत 20 वीं सदी का आर्थिक और सैनिक दृष्टि से सशक्त भारत है। इसी कारण अब सेना को आधुनिकतम हथियार सीमाओं पर चौकसी रखने के लिए इलेक्ट्रॉनिक संसाधन और संचार के माध्यमों को उपलब्ध करा कर चीन को संदेश दे दिया गया है।
तथ्यों के विश्लेषण से यह साफ हो जाता है की 50 और 60 के दशक में भारत सरकार ने चीन की हरकतों को पहचानने में बहुत बड़ी भूल की जिसके कारण चीन ने आराम से तिब्बत और अक्साई चिन के बड़े क्षेत्रफल कब्जा कर लिया ! विपक्षी दलों के द्वारा भारतीय सेना की कार्यशैली पर टिप्पणियां सैनिकों के मनोबल को प्रभावित करती हैं। जैसे कांग्रेस पार्टी पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक को ही झूठा मानती है। इसके साथ साथ गलवान और तवांग की मुठभेड़ों पर भी शक कर रही है। भारतीय सीमा पर कुछ क्षेत्रों में चीनी हरकत को कुछ राजनीतिज्ञ यह मान रहे हैं कि चीन ने भारत के क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया है। परंतु यह सत्य नहीं है, भारतीय सेना मजबूती से चीन की हर चाल का जवाब देने में सक्षम है और चीन अब भारत की । इंच भूमि पर भी कब्जा नहीं कर सकता है।
आक्रमक स्वरूप का ध्यान करना चाहिए जिसके कारण चीन भारत के 38000 वर्ग किलोमीटर पर कब्जा किए हुए हैं और तत्कालीन सरकार ने तिब्बत के ऊपर चीन को स्वीकृति देकर एक प्रकार से चीन को तिब्बत का असली शासक के रूप में मान्यता प्रदान की थी।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

पावरग्रिड उत्तरी क्षेत्र ने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल फरीदाबाद के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए

फरीदाबाद। पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (पावरग्रिड), उत्तरी क्षेत्र, फरीदाबाद ने उन्नत रोबोटिक सर्जरी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए दिनांक 01 सितंबर 2023 को ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, फरीदाबाद के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 25 करोड़ रुपये है। फरीदाबाद प्रमुख जिलों में से एक है और दिल्ली एनसीआर क्षेत्र से निकटता के कारण, चिकित्सा के क्षेत्र में रोगियों के लिए कम खर्च में उन्नत ईलाज की आवश्यकता रहती है। ईएसआईसी श्रमिकों के विभिन्न प्रकार के चिकित्सकीय लाभों से संबंधित कल्याणकारी संस्थान है और इस प्रकार उन्नत रोबोटिक सर्जरी प्रणाली के माध्यम से रोगियों को शीघ्र चिकित्सकीय लाभ मिलेगा, जिससे श्रमिक अल्प समयावधि में कार्य पर लौट सकने में सक्षम होंगे। एक जिम्मेदार कॉर्पोरेट संस्थान के रूप में पावरग्रिड द्वारा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत स्वास्थ्यगत क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पहल कर रहा है, यह परियोजना देश में स्वास्थ्य और चिकित्सा के बुनियादी ढांचे में व्यापक सुधार कर पावरग्रिड के मिशन में एक और मील का पत्थर सिद्ध होगा। उक्त समझौते पर पावरग्रिड, उत्तरी क्षेत्र। फरीदाबाद के श्री ए. के मिश्रा, कार्यपालक निदेशक एवं ईएसआईसी मुख्यालय से श्री रत्नेश गौतम, बीमा आयुक्त और डॉ. असीम दास (डीन) की गरिमामय उपस्थिति में श्री अशोक कुमार मिश्रा, महाप्रबंधक (मानव संसाधन एवं सीएसआर) एवं ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, फरीदाबाद के श्री अनिल कुमार पांडे, चिकित्सा अधीक्षक ने हस्ताक्षर किए।

साथ ही इस अवसर पर ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से डॉ. निशांत घुरनानी, रोबोटिक सर्जन, डॉ. मिथिलेश कुमार और पावरग्रिड से श्री संजय कुमार वर्मा महाप्रबंधक (मानव संसाधन प्रभारी), श्री राजेश कुमार गुप्ता, मुख्य प्रबन्धक (सीएसआर), श्री यू सी त्रिवेदी, सलाहकार श्री दीपक धमेजा, मुख्य प्रबन्धक भी उपस्थित रहे।


गुरुवार, 31 अगस्त 2023

शिव शक्ति नाम में भारतीय दर्शन की व्यापक सोच

अवधेश कुमार

चंद्रयान-3 के चंद्रमा पर उतरने की जगह का नाम शिव शक्ति हो चुका है। उस स्थान को जहां चंद्रयान-2 ध्वस्त हुआ, तिरंगा नाम दिया गया। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि नरेंद्र मोदी जी ने उसका नाम कैसे रख दिया? क्या वह चांद के मालिक हैं ? यह गलत बात हैआदि आदि। ये ऐसी प्रतिक्रियाएं हैं जिनका उत्तर देना भी अपना समय नष्ट करना होगा। चंद्रयान 1 जहां 2008 में  उतरा था उसका नाम तत्कालीन संप्रग सरकार ने जवाहर रख दिया। हालांकि चंद्रयान  की योजना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान बनी थी और उन्होंने 1999 में ही घोषणा की थी कि 2008 में चंद्रयान 1 प्रक्षेपित होगा। भाजपा मांग कर सकती थी कि बाजपेयी जी का नाम रखा जाए। शिव शक्ति और तिरंगा राजनीतिक नाम भी नहीं। इस नाम के पीछे गहरी सोच है। हमारे धर्मग्रंथो में शिव और चंद्रमा के संबंध  बताने की आवश्यकता नहीं। शिव शक्ति भारतीय सभ्यता संस्कृति का प्रतीक नाम है। नामकरण के कुछ उद्देश्य होते हैं। शिव सृष्टि के कल्याणकर्ता हैं। वे कालों के काल महाकाल भी हैं। कल्याण के लिए वे विषपान तक चले गए। उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है। तो शिव शक्ति नाम का अर्थ यह हुआ कि भारत का अंतरिक्ष अभियान या चंद्रमा पर चंद्रयान का उतरना संपूर्ण मानवता या सृष्टि के कल्याण के लिए है और कालातीत है। यानी हमारा अंतरिक्ष अभियान विज्ञान की प्रकृति पर विजय को दर्शाने या महाशक्ति की धौंस जमाने के लिए नहीं है।

यही भारतीय दृष्टि आज हमारी समस्त विदेश नीति, रक्षा नीति, विज्ञान नीति का मूल दर्शन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद आंतरिक और बाह्य नीतियों में भारतीय सभ्यता संस्कृति का दिग्दर्शन हो रहा है और विश्व मानवता भी हमारी व्यापक दृष्टि और व्यवहार से परिचित हो रही है। उन्होंने चंद्रयान 3 की सफलता के बाद दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि यह केवल भारत की और भारत के वैज्ञानिकों की सफलता नहीं है, संपूर्ण विश्व की, मानवता की सफलता है।  प्रधानमंत्री ने अपने देश की वैज्ञानिक उपलब्धियां, अनुसंधान आदि की चर्चा की, पर धौंस जमाने या यह प्रदर्शित करने का दंभ नहीं था कि भारत के समक्ष दूसरे देश छोटे या बौनें हैं। संपूर्ण विश्व का साझा अभियान बताकर प्रधानमंत्री ने संदेश दिया कि भारत का वैश्विक दृष्टिकोण क्या है। भारतीय जीवन दर्शन में उपलब्धियों और समृद्धि के साथ विनम्रता और त्याग को जोड़ा गया है।  ब्रिक्स सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी थे। चीन अंतरिक्ष की उपलब्धियां पर गर्वोन्मत भाव प्रकट करता है। इसी कारण कई गुनी बड़ी आर्थिक शक्ति होते हुए भी चीन को भारत की तरह विश्व में भविष्य के नेता या उम्मीद की दृष्टि से नहीं देखा जाता।  बिना उपलब्धि के विश्व मानवता की भाषा बोलें तो कोई सुनने वाला नहीं होता। उपलब्धियां हासिल करने के बाद अपना दर्शन रखते हैं तो सारे देश गंभीरता से सुनते और विचार करते हैं। 

यह मानना होगा कि भारत के अंतरिक्ष सफलता के साथ विश्व के अंतरिक्ष अभियानों के दृष्टिकोण में बदलाव आएगा। प्रधानमंत्री कोरोना काल के बाद जिस विश्व व्यवस्था की बात करते हैं उसमें भारतीय दर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। प्रधानमंत्री मोदी हर ऐसे अवसर का इस दृष्टि से उपयोग करते हैं और अपने अनुसार विश्व को संदेश देने में सफल होते हैं। यही चंद्रयान-3 के मामले में है और इसे भारतवासियों को गहराई से समझना चाहिए। दुर्भाग्य है कि जहां संपूर्ण विश्व भारत को बधाई दे रहा है और बड़ी संख्या में देश भारत की सफलता से खुश होकर नेतृत्व की दृष्टि से हमारी ओर देख रहे हैं वहां हम राजनीतिक तू तू मैं मैं में उलझे हैं। कांग्रेस ने 2019 में भी चंद्रयान 1 के उड़ान के साथ भी श्रेय वैज्ञानिकों के अलावा पंडित नेहरू को दिया। इस बार भी कांग्रेस का स्वर यही है।  सरकारें निरंतरता में चलतीं हैं। स्वतंत्रता के समय कांग्रेस ही थी और तब विकास की नींव डालने की भूमिका उनकी थी। हालांकि कोई उपलब्धि  एक नेता या केवल सरकार की नहीं होती, पर उसकी महत्वपूर्ण भूमिका अवश्य होती है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान और कार्य की नींव डालने में नेहरू जी की भूमिका थी। किंतु सब कुछ उन्हीं के कारण हो रहा है केवल दंभ कहा जाएगा। यह सच भी नहीं है। यह मानसिकता स्वयं को ही महान और सर्वोपरि मानती है और दूसरे को स्वीकार नहीं करती।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में अंतरिक्ष, रक्षा या अन्य वैज्ञानिक अनुसंधानों को मिली शक्ति, दिशा और व्यापक आयाम अतुलनीय है।  यूपीए सरकार के अंतिम समय में अंतरिक्ष बजट और आज के बजट को देखें तो यह तीन गुना से भी ज्यादा हो जाता है। अंतरिक्ष को व्यापक आयाम दिया गया।  अंतरिक्ष के व्यावहारिक लक्ष्य तय हुए। यानी भारतीय दृष्टि तथा अंतरिक्ष लोगों के दैनिक जीवन से जुड़े इस पर फोकस करने का लक्ष्य मिलने के बाद वैज्ञानिकों ने केंद्रित होकर काम किया है। अमेरिका में नासा की ताकत निजी क्षेत्र है। केवल सरकार की बदौलत अंतरिक्ष या किसी क्षेत्र में आवश्यक ऊंचाइयां हासिल नहीं कर सकते। निजी क्षेत्र को अनुमति दी गई। इंडियन स्पेस एसोसिएशन की स्थापना और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र यानी इन स्पेस का गठन हुआ।  श्रीहरिकोटा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में एक निजी लॉन्चपैड और मिशन नियंत्रण केंद्र की स्थापना हुई। आज 140 स्टार्टअप अंतरिक्ष क्षेत्र में काम कर रहे हैं। स्टार्टअप में 2021 से अभी तक 20 करोड डॉलर का निवेश आया है। 2030 तक इसरो ने अपना स्पेस स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। भारत दूसरे देशों का सबसे ज्यादा उपग्रह प्रक्षेपित करने वाला देश है। 2040 तक अंतरिक्ष बाजार एक खरब डालर का हो सकता है और उसमें भारत को सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा पाना है तो उसके अनुरूप उद्देश्य, विचारधारा, आधारभूत संरचना, माहौल और सरकारी प्रोत्साहन होना चाहिए। व्यावहारिक दृष्टिकोण नहीं हो तो दूसरे देशों को आप नहीं समझा सकते कि वे उपग्रह क्यों छोड़ें। उपग्रहों से आम व्यक्ति का दैनंदिन जुड़ाव इतना ज्यादा है कि सभी देश आगे बढ़ना चाहते हैं। इस समय हमारा अंतरिक्ष बाजार चार प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रहा है।

सही लक्ष्य, विचारधारा,माहौल देने तथा नेतृत्व द्वारा लगातार प्रोत्साहन मिलने के बाद वैज्ञानिक, कर्मचारी सब अपने आपको झोंक देते हैं क्योंकि सब उनके मन के अनुकूल होता है। हमारा चंद्रयान-3 केवल 600 करोड रुपए में सफल हुआ जबकि रूस का लूना 16000 करोड रुपए खर्च करके विफल। यानी बड़ी सफलताओं के लिए भी बहुत ज्यादा धन नहीं चाहिए। विचारों और लक्ष्यों की प्रेरणा तथा नेतृत्व का प्रोत्साहन मूल होता है। 2019 में चंद्रयान-2 की विफलता के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जिस ढंग से तत्कालीन इसरो प्रमुख को गले लगाया और भाषण दिया वह अद्भुत था। इस बार भी विदेश से लौटते हुए सीधे बेंगलुरु उतर केंद्र पर जाकर उन्होंने वही भूमिका निभाई है। नेतृत्व का दृष्टिकोण देखिए। उन्होंने छात्रों व युवा वैज्ञानिकों से कहा कि हमारे खगोल विज्ञान की गणनाओं को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सही साबित करें ताकि हम विश्व को बता सकें कि हमारी धरोहर क्या है। यही बात पहले क्यों नहीं कही गई? इसरो प्रमुख सोमनाथ ने कहा था कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में जो कुछ भी आज है वह  वेदों में पहले से हैं, बीजगणित , अंकगणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिति सबके आधार वहां है और पश्चिम ने उसी को नए पैकेज में पेश किया है। सोमनाथ की इस कथन पर पीठ थपथपाई गई। हो सकता है दूसरी सरकार होती तो उनकी हंसी उड़ाई जाती। भारत की ज्ञान शक्ति को साबित करने का लक्ष्य भी वैज्ञानिकों को मिल गया है। तो चंद्रयान तीन की सफलता  भारत के उस दर्शन की सफलता है, जिसका आधार अद्भुत ज्ञान के खजाने का सबको लाभ पहुंचाना और संपूर्ण सृष्टि का कल्याण है। भारत चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर पहुंचने वाला पहला देश ही नहीं बना भविष्य में संपूर्ण विश्व के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को सही दिशा देने की आधारभूमि भी तैयार कर दिया है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208



आवश्यक शिक्षण मानक के अभाव में कोचिंग संस्थानों के पास शोषण का अवसर?

पी. के. प्रमाणिक
माता-पिता चिंतित है वे अपने बच्चों की पढ़ाई के आसमान छूते खों को पूरा करने के लिए खुद को बढ़ा रहे हैं, अगर उनके एक से अधिक बच्चे है, तो उनकी वित्तीय स्थिति हमेशा अनिति होती है, चाहे उनकी आप कुछ भी हो....
आज के समय में, बच्चों को अच्छे स्कूलों में भेजना इतना महंगा क्यों हो गया है और सरकार ने इस समस्या पर अपनी जद करती है जैसे कि उन्हें 'चिंता करने की कोई बात नहीं है।
यह किसी भी सरकार की विफलता है जो राज्य सरकारों द्वारा संचालित कुछ मुट्ठी भर स्कूलों को छोड़कर आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए गुणवत्ता वाले स्कूलों को जोड़ने में सक्षम नहीं है, अधिकांश स्कूल खराब गुणवत्ता वाले लेकिन उच्च वेतन वाले शिक्षकों या कर्मचारियों के साथ सबसे खराब बुनियादी ढांचे के साथ हैं, जो ज्यादातर बड़े व्यापारिक घरानों या शिक्षा माफियाओं द्वारा चलाए जाते हैं। जो लोग पाते हैं कि भारत में स्कूल या कॉलेज चलाना सबसे आकर्षक और मुनाफाखोरी का व्यवसाय है, जिसमें विकास शुल्क आदि के नाम पर फीस या अन्य अत्यधिक शुल्क पर राज्य या केंद्र सरकार का शायद ही कोई नियंत्रण है, उन माता-पिता से एकत्र किए जाते हैं जिनके पास नाक के माध्यम से खर्च करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं है। यह बिल्कुल स्पष्ट है, ये स्कूल या कॉलेज भारत की बड़ी आबादी की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते हैं, इसलिए कई लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों या कॉलेजों के पास डाल रहे हैं, जिसमें शायद ही कोई शिक्षण प्रणाली हो, चाहे शिक्षक हो या प्रयोगशालाएं व्यावहारिक कक्षाएं।
यहाँ कुछ लोगों के लिए बढ़ते व्यावसायिक अवसरों की भूमिका आती है, जो विशेष रूप से हाई स्कूल या +2 कॉलेज के छात्रों के लिए अतिरिक्त सहायता प्रदान करने के नाम पर, जिन्हें कठिन बोर्ड परीक्षा या जेईई, एनईईटी, एनडीए, यूपीएससी और कई अन्य जैसे पेशेवर या तकनीकी परीक्षणों का सामना करना पड़ता है.....।
सरकारी स्कूलों या कॉलेजों में खराब शिक्षा स्तर का लाभ उठाते हुए, अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को कोचिंग संस्थानों में भेजने के लिए मजबूर होते हैं, जो अपनी फीस या अन्य शुल्कों पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं होने के साथ एक उद्योग बन गए है, इस उम्मीद के साथ कि उनके निजी स्कूल के बच्चों की की मराबरी कर सकते हैं, जबकि निजी स्कूल के बच्चों के माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे अधिक उत्कृष्टता प्राप्त करे और सभी विषयों में 100/100 स्कोर करें ट्रेंड यह है कि भारतीय स्कूल या कॉलेज ऐसे हैं जो शीर्ष स्कूलों या कॉलेजों में प्रवेश कट ऑफ अंकों से परिलक्षित होते हैं...।
ध्यान रहे केवल परीक्षा पास करने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और गहन शिक्षण में बड़ा अंतर है, जो एकमात्र आया है और कोचिंग संस्थान भारी पैसे का भुगतान करके संकायों को नियुक्त करते हैं जो शॉर्टकट सिखा सकते हैं और जो कोचिंग पास राशन के लिए मेहतर सुनिश्चित करते है, हालांकि वे संस्थान व्यापक पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते हैं जो छात्रों में उचित ज्ञान और लंबे समय तक चलने वाली स्मृति के लिए आवश्यक बच्चे परीक्षा में सफल हो सकते हैं लेकिन उन्हें हमेशा अपनी आगे की पढ़ाई में समस्या का सामना करना पड़ेगा क्योंकि उनका आधार कमजोर और खोखला है। 
कोचिंग संस्थान भी छात्रों पर उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए अत्यधिक दबाव डालते हैं, इसके लिए वे अपमान, खुलेआम छात्रों का मजाक उड़ाने जैसे किसी भी हद तक जा सकते है, जिससे सात्रों में अवसाद या मानसिक आघात हो सकता है जो किसी भी तरह प्रदर्शन करने में रहते हैं। यदि आप एनईईटी या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों द्वारा की गई आत्महत्याओं को देखें, तो आपको यह जानकर होगा कि कोटा, पटना, हैदराबाद, बैंगलोर या भुवनेचा, दिल्ली या पुणे जैसे शहरों में जाने वाले कई छात्र अनुचित दबाव के आगे झुक जाते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं और यह प्रवृत्ति बढ़ रही है।
माता-पिता, सरकार और शिक्षानियों को सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए कोचिंग संस्थान प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कठिन विषयों में केवल थोड़े समर्थन के लिए है, वे पारंपरित स्कूलों या कॉलेजों का प्रतिस्थापन नहीं है, बल्कि यदि आप परिणामों का विषण करते हैं, तो अधिकांश टॉपर्स केवल अपने स्वयं के अध्ययन और माता-पिता, शिक्षकों के समर्थन के कारण उत्कृष्टता प्राप्त करते हैं।
कोचिंग संस्थान निजी अस्पतालों की तरह सिर्फ पैसा कमाने वाला व्यवसाय है, जो बूचड़खानों से भी बदतर हपूछो कहां भूषण खानों से बेहतर है, जहां न केवल बच्चों को बल्कि उनके माता-पिता को का सामना करना पड़ता है और केवल उनके बेहतर परिणामों की उम्मीद में लाइन में लग जाते है जो सफल भविष्य सुनिचित नहीं करते हैं।
करियर सलाहकार के रूप में मेरा पुरजोर है कि अपने बच्चों स्कूल में पढ़ने और पापा को संस्थानों से दूर रहें जी आपको जात में पैसा कमाने के लिए यहां है और भोले-भाले माता-पिता जल में फंसने के लिए तैयार हो जाते हैं और 9वीं या 10वीं कक्षा के छात्रों के लिए लाखों रुपये खर्च करते है को कोचिंग में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करना बंद करें क्योंकि उसका अध्ययन पूर्ण हो जाता है और कई बार जीवन के लिए खो जाता है।
कारको कोचिंग संस्थानों को उनकी फीस और अत्यधिक शुल्क पर नियमित करना चाहिए और बच्चों को सामान्य रूप से हार्मोन इंजेक्शन वाले चूनों को आवश्यकता से जल्दी बड़ा होने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
सरकार के साथ-साथ माता-पिता स्कूलों पर डालते हैं कि अपने मानक को संस्थानों के साथ मेल खाने के लिए अड करें और सभी कोचिंग संस्थान फीस कम करेंगे या विनियमित किए जा सकते हैं। हमारे स्कूलों और कॉलेजों को उच्च प्रेरणा और प्रदर्शन आधारित प्रशंसा और के साथ बेहतर शिक्षण कर्मचारियों की आवश्यकता है और कोचिंग संस्थानों में प्रवास को नियंत्रित करने के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे की भी आवश्यकता है। यह माता-पिता को अनुचित अनुचित वयख और तनाव से बचाएगा।
(लेखक भुवनेश्वर में करियर कंसलटेंट हैं।)
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