फरीदाबाद। पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (पावरग्रिड), उत्तरी क्षेत्र, फरीदाबाद ने उन्नत रोबोटिक सर्जरी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए दिनांक 01 सितंबर 2023 को ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, फरीदाबाद के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 25 करोड़ रुपये है। फरीदाबाद प्रमुख जिलों में से एक है और दिल्ली एनसीआर क्षेत्र से निकटता के कारण, चिकित्सा के क्षेत्र में रोगियों के लिए कम खर्च में उन्नत ईलाज की आवश्यकता रहती है। ईएसआईसी श्रमिकों के विभिन्न प्रकार के चिकित्सकीय लाभों से संबंधित कल्याणकारी संस्थान है और इस प्रकार उन्नत रोबोटिक सर्जरी प्रणाली के माध्यम से रोगियों को शीघ्र चिकित्सकीय लाभ मिलेगा, जिससे श्रमिक अल्प समयावधि में कार्य पर लौट सकने में सक्षम होंगे। एक जिम्मेदार कॉर्पोरेट संस्थान के रूप में पावरग्रिड द्वारा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत स्वास्थ्यगत क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पहल कर रहा है, यह परियोजना देश में स्वास्थ्य और चिकित्सा के बुनियादी ढांचे में व्यापक सुधार कर पावरग्रिड के मिशन में एक और मील का पत्थर सिद्ध होगा। उक्त समझौते पर पावरग्रिड, उत्तरी क्षेत्र। फरीदाबाद के श्री ए. के मिश्रा, कार्यपालक निदेशक एवं ईएसआईसी मुख्यालय से श्री रत्नेश गौतम, बीमा आयुक्त और डॉ. असीम दास (डीन) की गरिमामय उपस्थिति में श्री अशोक कुमार मिश्रा, महाप्रबंधक (मानव संसाधन एवं सीएसआर) एवं ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, फरीदाबाद के श्री अनिल कुमार पांडे, चिकित्सा अधीक्षक ने हस्ताक्षर किए।
शुक्रवार, 1 सितंबर 2023
पावरग्रिड उत्तरी क्षेत्र ने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल फरीदाबाद के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए
गुरुवार, 31 अगस्त 2023
शिव शक्ति नाम में भारतीय दर्शन की व्यापक सोच
अवधेश कुमार
चंद्रयान-3 के चंद्रमा पर उतरने की जगह का नाम शिव शक्ति हो चुका है। उस स्थान को जहां चंद्रयान-2 ध्वस्त हुआ, तिरंगा नाम दिया गया। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि नरेंद्र मोदी जी ने उसका नाम कैसे रख दिया? क्या वह चांद के मालिक हैं ? यह गलत बात हैआदि आदि। ये ऐसी प्रतिक्रियाएं हैं जिनका उत्तर देना भी अपना समय नष्ट करना होगा। चंद्रयान 1 जहां 2008 में उतरा था उसका नाम तत्कालीन संप्रग सरकार ने जवाहर रख दिया। हालांकि चंद्रयान की योजना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान बनी थी और उन्होंने 1999 में ही घोषणा की थी कि 2008 में चंद्रयान 1 प्रक्षेपित होगा। भाजपा मांग कर सकती थी कि बाजपेयी जी का नाम रखा जाए। शिव शक्ति और तिरंगा राजनीतिक नाम भी नहीं। इस नाम के पीछे गहरी सोच है। हमारे धर्मग्रंथो में शिव और चंद्रमा के संबंध बताने की आवश्यकता नहीं। शिव शक्ति भारतीय सभ्यता संस्कृति का प्रतीक नाम है। नामकरण के कुछ उद्देश्य होते हैं। शिव सृष्टि के कल्याणकर्ता हैं। वे कालों के काल महाकाल भी हैं। कल्याण के लिए वे विषपान तक चले गए। उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है। तो शिव शक्ति नाम का अर्थ यह हुआ कि भारत का अंतरिक्ष अभियान या चंद्रमा पर चंद्रयान का उतरना संपूर्ण मानवता या सृष्टि के कल्याण के लिए है और कालातीत है। यानी हमारा अंतरिक्ष अभियान विज्ञान की प्रकृति पर विजय को दर्शाने या महाशक्ति की धौंस जमाने के लिए नहीं है।
यही भारतीय दृष्टि आज हमारी समस्त विदेश नीति, रक्षा नीति, विज्ञान नीति का मूल दर्शन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद आंतरिक और बाह्य नीतियों में भारतीय सभ्यता संस्कृति का दिग्दर्शन हो रहा है और विश्व मानवता भी हमारी व्यापक दृष्टि और व्यवहार से परिचित हो रही है। उन्होंने चंद्रयान 3 की सफलता के बाद दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि यह केवल भारत की और भारत के वैज्ञानिकों की सफलता नहीं है, संपूर्ण विश्व की, मानवता की सफलता है। प्रधानमंत्री ने अपने देश की वैज्ञानिक उपलब्धियां, अनुसंधान आदि की चर्चा की, पर धौंस जमाने या यह प्रदर्शित करने का दंभ नहीं था कि भारत के समक्ष दूसरे देश छोटे या बौनें हैं। संपूर्ण विश्व का साझा अभियान बताकर प्रधानमंत्री ने संदेश दिया कि भारत का वैश्विक दृष्टिकोण क्या है। भारतीय जीवन दर्शन में उपलब्धियों और समृद्धि के साथ विनम्रता और त्याग को जोड़ा गया है। ब्रिक्स सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी थे। चीन अंतरिक्ष की उपलब्धियां पर गर्वोन्मत भाव प्रकट करता है। इसी कारण कई गुनी बड़ी आर्थिक शक्ति होते हुए भी चीन को भारत की तरह विश्व में भविष्य के नेता या उम्मीद की दृष्टि से नहीं देखा जाता। बिना उपलब्धि के विश्व मानवता की भाषा बोलें तो कोई सुनने वाला नहीं होता। उपलब्धियां हासिल करने के बाद अपना दर्शन रखते हैं तो सारे देश गंभीरता से सुनते और विचार करते हैं।
यह मानना होगा कि भारत के अंतरिक्ष सफलता के साथ विश्व के अंतरिक्ष अभियानों के दृष्टिकोण में बदलाव आएगा। प्रधानमंत्री कोरोना काल के बाद जिस विश्व व्यवस्था की बात करते हैं उसमें भारतीय दर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। प्रधानमंत्री मोदी हर ऐसे अवसर का इस दृष्टि से उपयोग करते हैं और अपने अनुसार विश्व को संदेश देने में सफल होते हैं। यही चंद्रयान-3 के मामले में है और इसे भारतवासियों को गहराई से समझना चाहिए। दुर्भाग्य है कि जहां संपूर्ण विश्व भारत को बधाई दे रहा है और बड़ी संख्या में देश भारत की सफलता से खुश होकर नेतृत्व की दृष्टि से हमारी ओर देख रहे हैं वहां हम राजनीतिक तू तू मैं मैं में उलझे हैं। कांग्रेस ने 2019 में भी चंद्रयान 1 के उड़ान के साथ भी श्रेय वैज्ञानिकों के अलावा पंडित नेहरू को दिया। इस बार भी कांग्रेस का स्वर यही है। सरकारें निरंतरता में चलतीं हैं। स्वतंत्रता के समय कांग्रेस ही थी और तब विकास की नींव डालने की भूमिका उनकी थी। हालांकि कोई उपलब्धि एक नेता या केवल सरकार की नहीं होती, पर उसकी महत्वपूर्ण भूमिका अवश्य होती है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान और कार्य की नींव डालने में नेहरू जी की भूमिका थी। किंतु सब कुछ उन्हीं के कारण हो रहा है केवल दंभ कहा जाएगा। यह सच भी नहीं है। यह मानसिकता स्वयं को ही महान और सर्वोपरि मानती है और दूसरे को स्वीकार नहीं करती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में अंतरिक्ष, रक्षा या अन्य वैज्ञानिक अनुसंधानों को मिली शक्ति, दिशा और व्यापक आयाम अतुलनीय है। यूपीए सरकार के अंतिम समय में अंतरिक्ष बजट और आज के बजट को देखें तो यह तीन गुना से भी ज्यादा हो जाता है। अंतरिक्ष को व्यापक आयाम दिया गया। अंतरिक्ष के व्यावहारिक लक्ष्य तय हुए। यानी भारतीय दृष्टि तथा अंतरिक्ष लोगों के दैनिक जीवन से जुड़े इस पर फोकस करने का लक्ष्य मिलने के बाद वैज्ञानिकों ने केंद्रित होकर काम किया है। अमेरिका में नासा की ताकत निजी क्षेत्र है। केवल सरकार की बदौलत अंतरिक्ष या किसी क्षेत्र में आवश्यक ऊंचाइयां हासिल नहीं कर सकते। निजी क्षेत्र को अनुमति दी गई। इंडियन स्पेस एसोसिएशन की स्थापना और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र यानी इन स्पेस का गठन हुआ। श्रीहरिकोटा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में एक निजी लॉन्चपैड और मिशन नियंत्रण केंद्र की स्थापना हुई। आज 140 स्टार्टअप अंतरिक्ष क्षेत्र में काम कर रहे हैं। स्टार्टअप में 2021 से अभी तक 20 करोड डॉलर का निवेश आया है। 2030 तक इसरो ने अपना स्पेस स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। भारत दूसरे देशों का सबसे ज्यादा उपग्रह प्रक्षेपित करने वाला देश है। 2040 तक अंतरिक्ष बाजार एक खरब डालर का हो सकता है और उसमें भारत को सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा पाना है तो उसके अनुरूप उद्देश्य, विचारधारा, आधारभूत संरचना, माहौल और सरकारी प्रोत्साहन होना चाहिए। व्यावहारिक दृष्टिकोण नहीं हो तो दूसरे देशों को आप नहीं समझा सकते कि वे उपग्रह क्यों छोड़ें। उपग्रहों से आम व्यक्ति का दैनंदिन जुड़ाव इतना ज्यादा है कि सभी देश आगे बढ़ना चाहते हैं। इस समय हमारा अंतरिक्ष बाजार चार प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रहा है।
सही लक्ष्य, विचारधारा,माहौल देने तथा नेतृत्व द्वारा लगातार प्रोत्साहन मिलने के बाद वैज्ञानिक, कर्मचारी सब अपने आपको झोंक देते हैं क्योंकि सब उनके मन के अनुकूल होता है। हमारा चंद्रयान-3 केवल 600 करोड रुपए में सफल हुआ जबकि रूस का लूना 16000 करोड रुपए खर्च करके विफल। यानी बड़ी सफलताओं के लिए भी बहुत ज्यादा धन नहीं चाहिए। विचारों और लक्ष्यों की प्रेरणा तथा नेतृत्व का प्रोत्साहन मूल होता है। 2019 में चंद्रयान-2 की विफलता के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जिस ढंग से तत्कालीन इसरो प्रमुख को गले लगाया और भाषण दिया वह अद्भुत था। इस बार भी विदेश से लौटते हुए सीधे बेंगलुरु उतर केंद्र पर जाकर उन्होंने वही भूमिका निभाई है। नेतृत्व का दृष्टिकोण देखिए। उन्होंने छात्रों व युवा वैज्ञानिकों से कहा कि हमारे खगोल विज्ञान की गणनाओं को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सही साबित करें ताकि हम विश्व को बता सकें कि हमारी धरोहर क्या है। यही बात पहले क्यों नहीं कही गई? इसरो प्रमुख सोमनाथ ने कहा था कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में जो कुछ भी आज है वह वेदों में पहले से हैं, बीजगणित , अंकगणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिति सबके आधार वहां है और पश्चिम ने उसी को नए पैकेज में पेश किया है। सोमनाथ की इस कथन पर पीठ थपथपाई गई। हो सकता है दूसरी सरकार होती तो उनकी हंसी उड़ाई जाती। भारत की ज्ञान शक्ति को साबित करने का लक्ष्य भी वैज्ञानिकों को मिल गया है। तो चंद्रयान तीन की सफलता भारत के उस दर्शन की सफलता है, जिसका आधार अद्भुत ज्ञान के खजाने का सबको लाभ पहुंचाना और संपूर्ण सृष्टि का कल्याण है। भारत चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर पहुंचने वाला पहला देश ही नहीं बना भविष्य में संपूर्ण विश्व के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को सही दिशा देने की आधारभूमि भी तैयार कर दिया है।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208
आवश्यक शिक्षण मानक के अभाव में कोचिंग संस्थानों के पास शोषण का अवसर?
गुरुवार, 24 अगस्त 2023
न्यूजक्लिक का सच क्या हो सकता है
अवधेश कुमार
देश के 750 नामचीन लोगों ने न्यूजक्लिक के पक्ष में बयान जारी कर कहा है कि उसका उत्पीड़न हो रहा है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। उनके अनुसार न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में न्यूज़क्लिक के विरुद्ध किसी कानून का उल्लंघन करने की बात नहीं कही गई है। इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, इतिहासकार रोमिला थापर, जोया हसन, जयती घोष, हर्ष मंदर, अरुणा राय, एन राम, कॉलिन गोंजाल्विस, प्रशांत भूषण ,आनंद पटवर्धन आदि शामिल हैं। एक लोकतांत्रिक खुले समाज एवं व्यवस्था में सरकार के समर्थक विरोधी, मध्यमार्गी, निष्पक्ष, सापेक्ष सभी प्रकार की अभिव्यक्ति के मंचों के लिए जगह होनी चाहिए। इसलिए न्यूजक्लिक अगर संगठन के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा और नरेंद्र मोदी सहित भाजपा सरकारों के विरोध को अपना एजेंडा बनाता है तो यह उसका अधिकार है। पर उसका वैचारिक विरोध होगा और होना भी चाहिए। अगर वह एजेंडा चलता है तो उसके विरुद्ध भी मान्य कानूनी तरीकों में एजेंडा चल सकता है। किंतु इसके आधार पर भारत सरकार की या किसी प्रदेश सरकार की एजेंसियां उसके विरुद्ध कार्रवाई करे यह स्वीकार नहीं हो सकता। क्या न्यूजक्लिक कि विरोध वाकई उसके राजनीतिक एवं वैचारिक एजेंडे के कारण है?
जिन लोगों ने न्यूज़क्लिक के समर्थन में हस्ताक्षर किए हैं उनकी समाज में प्रतिष्ठा है। इसके साथ यह भी सच है कि इनमें से ज्यादातर का अपना वैचारिक और राजनीतिक एजेंडा एकपक्षीय राष्ट्रीय संघ, भाजपा और हिंदुत्व से घृणावाद और विरोधवाद फैलाना है। विरोध इनका अधिकार है, पर ये दुराग्रहों की सीमा पार कर उस स्तर पर चले जाते हैं कि आम व्यक्ति भी इनकी सोच और व्यवहार पर संदेह व्यक्त करने लगता है। इन्होंने इतना सच कहा है कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी खोजपूर्ण रिपोर्ट में न्यूज़क्लिक द्वारा भारत में कानून के उल्लंघन की बात नहीं लिखा है। इन्होंने यह तथ्य नहीं लिखा कि न्यूयॉर्क टाइम्स की छानबीन न्यूज़क्लिक पर न होकर इसके फाइनेंसर नेविले राय सिंघम, अमेरिका सहित विश्व भर में फैले मीडिया एवं गैर सरकारी संगठनों आदि के माध्यम से फैला उनका विस्तृत जाल तथा चीन के साथ उनके संबंध हैं। इन्हीं की चर्चा करते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत में न्यूज़क्लिक का उल्लेख किया है। न्यूयॉर्क टाइम्स छानबीन की रिपोर्ट से साफ है कि सिंघम चीनी एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए कई हजार करोड़ की फंडिंग कर रहे हैं और उसमें न्यूज़क्लिक भी शामिल है तो फिर इसे पाक साफ कैसे कहा जा सकता है?
न्यूजक्लिक के मामले के दो पहलू है– वित्त पोषण के साथ चीनी एजेंडे का जुड़ाव और दूसरा इसमें भारतीय कानूनों का उल्लंघन। न्यूज़क्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड को 2018 से करीब 38 करोड रुपया सिंघम प्राप्त हुआ है। इसको जस्टिस एंड एजुकेशन फंड इंक, यूएस; जीएसपीएएन एलएलसी, यूएस; ट्राईकॉन्टिनेंटल लिमिटेड इंक, यूएसए के अलावा सेंट्रो पॉपुलर डेमिडास, ब्राजील से फंड मिला। न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि अमेरिकी अरबपति सिंघम की विश्व भर में चीन का बचाव करने और उसका प्रोपेगेंडा आगे बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका है और उनके पास भरपूर धन है। यह कैसे काम करता है इसका एक उदाहरण देखिए। कोल्ड वॉर ग्रुप के बारे में माना जाता था कि यह अमेरिका और ब्रिटिश एक्टिविस्टों का बिगड़ा हुआ समूह है। इसके अनेक प्रदर्शन होते थे। पिछले दिनों नवंबर 2021 में एशियाइयों के खिलाफ घृणा अपराध के विरोध प्रदर्शन में लंदन के चायना टाइम में कई सक्रिय समूहों में यह भी था। उसमें प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई तो लोगों को आश्चर्य हुआ। विरोध जताने वाले अधिकतर लोग चीनी थे । झगड़ा उस समय हुआ जब कोल्ड वॉर ग्रुप के लोगों ने हांगकांग में लोकतंत्र आंदोलन का समर्थन करने वाले एक्टिविस्टों पर हमला कर दिया। लोगों को समझ में नहीं आया कि अमेरिकी ब्रिटिश एक्टिविस्टों के लोग हमला क्यों कर रहे हैं। बाद में पता चला कि यह चीन का बचाव करने और उसका प्रोपगंडा चलाने वाला समूह है। सोचिए, नाम कोल्ड वॉर ग्रुप और काम क्या है? रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी एंटीवर्ट समूह कोड पिंक में भी समय बीतने के साथ बदलाव आया है। कोड पिंक ने पहले मानवाधिकारों को लेकर चीन की आलोचना की थी लेकिन अब वह मुस्लिम उईगारो पर अत्याचारों का बचाव करता है।
न्यूयॉर्क टाइम्स बताता है कि सिंघम के पास गैर-लाभकारी संगठन व सेल कंपनियों के इतने बड़े जाल है कि उनमें यह बात लगभग छुपी रही है कि वे चीन सरकार की मीडिया मशीन के साथ काम करते हैं। 69 वर्षीय सिंघम शिकागो में सॉफ्टवेयर कंसलटेंसी कंपनी थॉटवर्क्स चलाते हैं और शंघाई में बैठते हैं। वहां उनका नेटवर्क यूट्यूब पर एक शो आयोजित करता है। इसके लिए शंघाई का प्रोपोगंडा विभाग भी पैसा देता है। दो अन्य समूह दुनिया में चीन के पक्ष का प्रचार करने के लिए चीनी यूनिवर्सिटी के साथ काम कर रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की छानबीन के अनुसार सिंघम के साथ मैसाचुसेट्स में एक थिंकटैंक, मैनहैटन की संस्था, दक्षिण अफ्रीका में एक राजनीतिक दल, भारत और ब्राजील में न्यूज संगठन सहित कई समूह जुड़े हैं।
सिंघम ने बयान दिया कि वह चीन सरकार के निर्देश पर काम नहीं करते। सच यह है कि सिंघम के समूह चीन के पक्ष में अभियान के लिए यूट्यूब वीडियो बनाते हैं, राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, ये समूह अमेरिकी कांग्रेस में सहायकों से मिलते हैं, अफ्रिका में राजनेताओं को प्रशिक्षण देते हैं, दक्षिण अफ्रीका के चुनाव में उम्मीदवार खड़ा करते हैं और लंदन जैसे विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स का मूल लक्ष्य भारत था ही नहीं। न्यूयॉर्क टाइम्स मूलतः अमेरिकियों को बता रहा है कि हमारे यहां किस तरह से चीनी एजेंडा चलाने वाला एक व्यक्ति अलग-अलग समूहों और सेल कंपनियों के माध्यम से काम कर रहा है। अमेरिका में सिंघम से जुड़ा कोई समूह विदेशी एजेंट रजिस्ट्रेशन कानून के तहत निबंधित नहीं है। अमेरिका में दूसरे देशों की ओर से जनमत को प्रभावित करने के अभियान चलाने वाले समूहों का निबंधन आवश्यक है। जिन चार गैर-लाभकारी संगठनों की बदौलत सिंघम का अभियान चलता है उनके पते इलीनॉय, विस्कंसिन और न्यूयॉर्क में यूपीएस स्टोर मेल बॉक्स के रूप में दर्ज है। न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि यूपीएस स्टोर गैर-लाभकारी समूह के रूप में यहां दर्ज है जिससे करोड़ों डॉलर दुनिया भर में भेजे गए हैं। कोई न कोई बहाना बनाकर इसने दक्षिण अफ्रीका के स्कूलों को लाखों डॉलर भेजे हैं। इसी में आगे वह कुछ राजनीतिक दलों एवं मीडिया संस्थानों को पैसा मिलने के बारे में लिखता है। उदाहरण के लिए ब्राजील में ब्राजील डिफेक्टो अखबार चलाने वाले समूहों को भी सिंघम से धन मिला है। न्यूयॉर्क टाइम्स बता रहा है कि यह अखबार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रशंसा में लिखता है। इसने स्पष्ट लिखा है कि नई दिल्ली में कॉरपोरेट्स फाइलिंग से पता लगा है कि सिंघम के नेटवर्क न्यूज़ साइट न्यूज़क्लिक को फाइनेंस किया है। ये समूह तालमेल से काम करते हैं। उन्होंने एक-दूसरे के कंटेंट सोशल मीडिया पर सैकड़ों बार पोस्ट की है।
यह है न्यूयॉर्क टाइम्स की छानबीन। हस्ताक्षर करने वाले नामचीन लोगों ने निश्चय ही रिपोर्ट को पढ़ा होगा। क्या इसके बाद कोई मानेगा कि सिंघम से जुड़ा कोई मीडिया संस्थान निष्पक्ष होकर काम करेगा या भारतीय हितों को ध्यान में रखते हुए पत्रकारिता करेगा? ईडी या प्रवर्तन निदेशालय की छानबीन से मोटा -मोटी जो जानकारी सामने आई उसके अनुसार न्यूज पोर्टल को आए धन में से 52 लाख बप्पादित्या सिन्हा को दिए गए। बप्पादित्या सिन्हा कम्युनिस्ट नेताओं के ट्विटर हैंडल भी संभालते हैं। धन का एक हिस्सा गौतम नवलखा के पास गया। निश्चित रूप से ये भुगतान उनके लेख या रिपोर्ट आदि के लिए ही गया होगा। विचार या एजेंडा फैलाने वालों को इसी तरह भुगतान किया जाता है जिनमें कानूनी रूप से कोई खांच न रहे। यह देखना प्रवर्तन निदेशालय का काम है कि जो धन आए उनमें कानून और भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों का पालन हुआ या नहीं? न्यूज क्लिक ने अपने बयान में कहा कि उसने इनका पालन किया है। हो सकता है। कानूनी रूप से शायद गलत न भी हो, पर न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के बाद भी यदि भारतीय होने के नाते इसकी टीम को कोई समस्या नहीं है तो देश अवश्य इनसे प्रश्न करेगा? संघ , भाजपा व मोदी विरोध के नाम पर न्यूजक्लिक के पक्ष में हस्ताक्षर करने वालों ,अभियान चलाने वालों से भी पूछा जाएगा कि क्या वे चीन के एजेंडे को सही मानते हैं?
पता– अवधेश कुमार, ई-30 , गणेश नगर, पांडव नगर कौम्पलेक्स, दिल्ली- 110092 मोबाइल- 98110 27208
सोमवार, 21 अगस्त 2023
राष्ट्रीय आन्दोलन में हिन्दी की भूमिका
डॉ. मीना शर्मा
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