शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

पावरग्रिड उत्तरी क्षेत्र ने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल फरीदाबाद के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए

फरीदाबाद। पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (पावरग्रिड), उत्तरी क्षेत्र, फरीदाबाद ने उन्नत रोबोटिक सर्जरी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए दिनांक 01 सितंबर 2023 को ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, फरीदाबाद के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 25 करोड़ रुपये है। फरीदाबाद प्रमुख जिलों में से एक है और दिल्ली एनसीआर क्षेत्र से निकटता के कारण, चिकित्सा के क्षेत्र में रोगियों के लिए कम खर्च में उन्नत ईलाज की आवश्यकता रहती है। ईएसआईसी श्रमिकों के विभिन्न प्रकार के चिकित्सकीय लाभों से संबंधित कल्याणकारी संस्थान है और इस प्रकार उन्नत रोबोटिक सर्जरी प्रणाली के माध्यम से रोगियों को शीघ्र चिकित्सकीय लाभ मिलेगा, जिससे श्रमिक अल्प समयावधि में कार्य पर लौट सकने में सक्षम होंगे। एक जिम्मेदार कॉर्पोरेट संस्थान के रूप में पावरग्रिड द्वारा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अन्तर्गत स्वास्थ्यगत क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पहल कर रहा है, यह परियोजना देश में स्वास्थ्य और चिकित्सा के बुनियादी ढांचे में व्यापक सुधार कर पावरग्रिड के मिशन में एक और मील का पत्थर सिद्ध होगा। उक्त समझौते पर पावरग्रिड, उत्तरी क्षेत्र। फरीदाबाद के श्री ए. के मिश्रा, कार्यपालक निदेशक एवं ईएसआईसी मुख्यालय से श्री रत्नेश गौतम, बीमा आयुक्त और डॉ. असीम दास (डीन) की गरिमामय उपस्थिति में श्री अशोक कुमार मिश्रा, महाप्रबंधक (मानव संसाधन एवं सीएसआर) एवं ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, फरीदाबाद के श्री अनिल कुमार पांडे, चिकित्सा अधीक्षक ने हस्ताक्षर किए।

साथ ही इस अवसर पर ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से डॉ. निशांत घुरनानी, रोबोटिक सर्जन, डॉ. मिथिलेश कुमार और पावरग्रिड से श्री संजय कुमार वर्मा महाप्रबंधक (मानव संसाधन प्रभारी), श्री राजेश कुमार गुप्ता, मुख्य प्रबन्धक (सीएसआर), श्री यू सी त्रिवेदी, सलाहकार श्री दीपक धमेजा, मुख्य प्रबन्धक भी उपस्थित रहे।


गुरुवार, 31 अगस्त 2023

शिव शक्ति नाम में भारतीय दर्शन की व्यापक सोच

अवधेश कुमार

चंद्रयान-3 के चंद्रमा पर उतरने की जगह का नाम शिव शक्ति हो चुका है। उस स्थान को जहां चंद्रयान-2 ध्वस्त हुआ, तिरंगा नाम दिया गया। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि नरेंद्र मोदी जी ने उसका नाम कैसे रख दिया? क्या वह चांद के मालिक हैं ? यह गलत बात हैआदि आदि। ये ऐसी प्रतिक्रियाएं हैं जिनका उत्तर देना भी अपना समय नष्ट करना होगा। चंद्रयान 1 जहां 2008 में  उतरा था उसका नाम तत्कालीन संप्रग सरकार ने जवाहर रख दिया। हालांकि चंद्रयान  की योजना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान बनी थी और उन्होंने 1999 में ही घोषणा की थी कि 2008 में चंद्रयान 1 प्रक्षेपित होगा। भाजपा मांग कर सकती थी कि बाजपेयी जी का नाम रखा जाए। शिव शक्ति और तिरंगा राजनीतिक नाम भी नहीं। इस नाम के पीछे गहरी सोच है। हमारे धर्मग्रंथो में शिव और चंद्रमा के संबंध  बताने की आवश्यकता नहीं। शिव शक्ति भारतीय सभ्यता संस्कृति का प्रतीक नाम है। नामकरण के कुछ उद्देश्य होते हैं। शिव सृष्टि के कल्याणकर्ता हैं। वे कालों के काल महाकाल भी हैं। कल्याण के लिए वे विषपान तक चले गए। उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है। तो शिव शक्ति नाम का अर्थ यह हुआ कि भारत का अंतरिक्ष अभियान या चंद्रमा पर चंद्रयान का उतरना संपूर्ण मानवता या सृष्टि के कल्याण के लिए है और कालातीत है। यानी हमारा अंतरिक्ष अभियान विज्ञान की प्रकृति पर विजय को दर्शाने या महाशक्ति की धौंस जमाने के लिए नहीं है।

यही भारतीय दृष्टि आज हमारी समस्त विदेश नीति, रक्षा नीति, विज्ञान नीति का मूल दर्शन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद आंतरिक और बाह्य नीतियों में भारतीय सभ्यता संस्कृति का दिग्दर्शन हो रहा है और विश्व मानवता भी हमारी व्यापक दृष्टि और व्यवहार से परिचित हो रही है। उन्होंने चंद्रयान 3 की सफलता के बाद दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि यह केवल भारत की और भारत के वैज्ञानिकों की सफलता नहीं है, संपूर्ण विश्व की, मानवता की सफलता है।  प्रधानमंत्री ने अपने देश की वैज्ञानिक उपलब्धियां, अनुसंधान आदि की चर्चा की, पर धौंस जमाने या यह प्रदर्शित करने का दंभ नहीं था कि भारत के समक्ष दूसरे देश छोटे या बौनें हैं। संपूर्ण विश्व का साझा अभियान बताकर प्रधानमंत्री ने संदेश दिया कि भारत का वैश्विक दृष्टिकोण क्या है। भारतीय जीवन दर्शन में उपलब्धियों और समृद्धि के साथ विनम्रता और त्याग को जोड़ा गया है।  ब्रिक्स सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी थे। चीन अंतरिक्ष की उपलब्धियां पर गर्वोन्मत भाव प्रकट करता है। इसी कारण कई गुनी बड़ी आर्थिक शक्ति होते हुए भी चीन को भारत की तरह विश्व में भविष्य के नेता या उम्मीद की दृष्टि से नहीं देखा जाता।  बिना उपलब्धि के विश्व मानवता की भाषा बोलें तो कोई सुनने वाला नहीं होता। उपलब्धियां हासिल करने के बाद अपना दर्शन रखते हैं तो सारे देश गंभीरता से सुनते और विचार करते हैं। 

यह मानना होगा कि भारत के अंतरिक्ष सफलता के साथ विश्व के अंतरिक्ष अभियानों के दृष्टिकोण में बदलाव आएगा। प्रधानमंत्री कोरोना काल के बाद जिस विश्व व्यवस्था की बात करते हैं उसमें भारतीय दर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। प्रधानमंत्री मोदी हर ऐसे अवसर का इस दृष्टि से उपयोग करते हैं और अपने अनुसार विश्व को संदेश देने में सफल होते हैं। यही चंद्रयान-3 के मामले में है और इसे भारतवासियों को गहराई से समझना चाहिए। दुर्भाग्य है कि जहां संपूर्ण विश्व भारत को बधाई दे रहा है और बड़ी संख्या में देश भारत की सफलता से खुश होकर नेतृत्व की दृष्टि से हमारी ओर देख रहे हैं वहां हम राजनीतिक तू तू मैं मैं में उलझे हैं। कांग्रेस ने 2019 में भी चंद्रयान 1 के उड़ान के साथ भी श्रेय वैज्ञानिकों के अलावा पंडित नेहरू को दिया। इस बार भी कांग्रेस का स्वर यही है।  सरकारें निरंतरता में चलतीं हैं। स्वतंत्रता के समय कांग्रेस ही थी और तब विकास की नींव डालने की भूमिका उनकी थी। हालांकि कोई उपलब्धि  एक नेता या केवल सरकार की नहीं होती, पर उसकी महत्वपूर्ण भूमिका अवश्य होती है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान और कार्य की नींव डालने में नेहरू जी की भूमिका थी। किंतु सब कुछ उन्हीं के कारण हो रहा है केवल दंभ कहा जाएगा। यह सच भी नहीं है। यह मानसिकता स्वयं को ही महान और सर्वोपरि मानती है और दूसरे को स्वीकार नहीं करती।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में अंतरिक्ष, रक्षा या अन्य वैज्ञानिक अनुसंधानों को मिली शक्ति, दिशा और व्यापक आयाम अतुलनीय है।  यूपीए सरकार के अंतिम समय में अंतरिक्ष बजट और आज के बजट को देखें तो यह तीन गुना से भी ज्यादा हो जाता है। अंतरिक्ष को व्यापक आयाम दिया गया।  अंतरिक्ष के व्यावहारिक लक्ष्य तय हुए। यानी भारतीय दृष्टि तथा अंतरिक्ष लोगों के दैनिक जीवन से जुड़े इस पर फोकस करने का लक्ष्य मिलने के बाद वैज्ञानिकों ने केंद्रित होकर काम किया है। अमेरिका में नासा की ताकत निजी क्षेत्र है। केवल सरकार की बदौलत अंतरिक्ष या किसी क्षेत्र में आवश्यक ऊंचाइयां हासिल नहीं कर सकते। निजी क्षेत्र को अनुमति दी गई। इंडियन स्पेस एसोसिएशन की स्थापना और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र यानी इन स्पेस का गठन हुआ।  श्रीहरिकोटा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में एक निजी लॉन्चपैड और मिशन नियंत्रण केंद्र की स्थापना हुई। आज 140 स्टार्टअप अंतरिक्ष क्षेत्र में काम कर रहे हैं। स्टार्टअप में 2021 से अभी तक 20 करोड डॉलर का निवेश आया है। 2030 तक इसरो ने अपना स्पेस स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। भारत दूसरे देशों का सबसे ज्यादा उपग्रह प्रक्षेपित करने वाला देश है। 2040 तक अंतरिक्ष बाजार एक खरब डालर का हो सकता है और उसमें भारत को सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा पाना है तो उसके अनुरूप उद्देश्य, विचारधारा, आधारभूत संरचना, माहौल और सरकारी प्रोत्साहन होना चाहिए। व्यावहारिक दृष्टिकोण नहीं हो तो दूसरे देशों को आप नहीं समझा सकते कि वे उपग्रह क्यों छोड़ें। उपग्रहों से आम व्यक्ति का दैनंदिन जुड़ाव इतना ज्यादा है कि सभी देश आगे बढ़ना चाहते हैं। इस समय हमारा अंतरिक्ष बाजार चार प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रहा है।

सही लक्ष्य, विचारधारा,माहौल देने तथा नेतृत्व द्वारा लगातार प्रोत्साहन मिलने के बाद वैज्ञानिक, कर्मचारी सब अपने आपको झोंक देते हैं क्योंकि सब उनके मन के अनुकूल होता है। हमारा चंद्रयान-3 केवल 600 करोड रुपए में सफल हुआ जबकि रूस का लूना 16000 करोड रुपए खर्च करके विफल। यानी बड़ी सफलताओं के लिए भी बहुत ज्यादा धन नहीं चाहिए। विचारों और लक्ष्यों की प्रेरणा तथा नेतृत्व का प्रोत्साहन मूल होता है। 2019 में चंद्रयान-2 की विफलता के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जिस ढंग से तत्कालीन इसरो प्रमुख को गले लगाया और भाषण दिया वह अद्भुत था। इस बार भी विदेश से लौटते हुए सीधे बेंगलुरु उतर केंद्र पर जाकर उन्होंने वही भूमिका निभाई है। नेतृत्व का दृष्टिकोण देखिए। उन्होंने छात्रों व युवा वैज्ञानिकों से कहा कि हमारे खगोल विज्ञान की गणनाओं को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सही साबित करें ताकि हम विश्व को बता सकें कि हमारी धरोहर क्या है। यही बात पहले क्यों नहीं कही गई? इसरो प्रमुख सोमनाथ ने कहा था कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में जो कुछ भी आज है वह  वेदों में पहले से हैं, बीजगणित , अंकगणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिति सबके आधार वहां है और पश्चिम ने उसी को नए पैकेज में पेश किया है। सोमनाथ की इस कथन पर पीठ थपथपाई गई। हो सकता है दूसरी सरकार होती तो उनकी हंसी उड़ाई जाती। भारत की ज्ञान शक्ति को साबित करने का लक्ष्य भी वैज्ञानिकों को मिल गया है। तो चंद्रयान तीन की सफलता  भारत के उस दर्शन की सफलता है, जिसका आधार अद्भुत ज्ञान के खजाने का सबको लाभ पहुंचाना और संपूर्ण सृष्टि का कल्याण है। भारत चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर पहुंचने वाला पहला देश ही नहीं बना भविष्य में संपूर्ण विश्व के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को सही दिशा देने की आधारभूमि भी तैयार कर दिया है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208



आवश्यक शिक्षण मानक के अभाव में कोचिंग संस्थानों के पास शोषण का अवसर?

पी. के. प्रमाणिक
माता-पिता चिंतित है वे अपने बच्चों की पढ़ाई के आसमान छूते खों को पूरा करने के लिए खुद को बढ़ा रहे हैं, अगर उनके एक से अधिक बच्चे है, तो उनकी वित्तीय स्थिति हमेशा अनिति होती है, चाहे उनकी आप कुछ भी हो....
आज के समय में, बच्चों को अच्छे स्कूलों में भेजना इतना महंगा क्यों हो गया है और सरकार ने इस समस्या पर अपनी जद करती है जैसे कि उन्हें 'चिंता करने की कोई बात नहीं है।
यह किसी भी सरकार की विफलता है जो राज्य सरकारों द्वारा संचालित कुछ मुट्ठी भर स्कूलों को छोड़कर आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए गुणवत्ता वाले स्कूलों को जोड़ने में सक्षम नहीं है, अधिकांश स्कूल खराब गुणवत्ता वाले लेकिन उच्च वेतन वाले शिक्षकों या कर्मचारियों के साथ सबसे खराब बुनियादी ढांचे के साथ हैं, जो ज्यादातर बड़े व्यापारिक घरानों या शिक्षा माफियाओं द्वारा चलाए जाते हैं। जो लोग पाते हैं कि भारत में स्कूल या कॉलेज चलाना सबसे आकर्षक और मुनाफाखोरी का व्यवसाय है, जिसमें विकास शुल्क आदि के नाम पर फीस या अन्य अत्यधिक शुल्क पर राज्य या केंद्र सरकार का शायद ही कोई नियंत्रण है, उन माता-पिता से एकत्र किए जाते हैं जिनके पास नाक के माध्यम से खर्च करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं है। यह बिल्कुल स्पष्ट है, ये स्कूल या कॉलेज भारत की बड़ी आबादी की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते हैं, इसलिए कई लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों या कॉलेजों के पास डाल रहे हैं, जिसमें शायद ही कोई शिक्षण प्रणाली हो, चाहे शिक्षक हो या प्रयोगशालाएं व्यावहारिक कक्षाएं।
यहाँ कुछ लोगों के लिए बढ़ते व्यावसायिक अवसरों की भूमिका आती है, जो विशेष रूप से हाई स्कूल या +2 कॉलेज के छात्रों के लिए अतिरिक्त सहायता प्रदान करने के नाम पर, जिन्हें कठिन बोर्ड परीक्षा या जेईई, एनईईटी, एनडीए, यूपीएससी और कई अन्य जैसे पेशेवर या तकनीकी परीक्षणों का सामना करना पड़ता है.....।
सरकारी स्कूलों या कॉलेजों में खराब शिक्षा स्तर का लाभ उठाते हुए, अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को कोचिंग संस्थानों में भेजने के लिए मजबूर होते हैं, जो अपनी फीस या अन्य शुल्कों पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं होने के साथ एक उद्योग बन गए है, इस उम्मीद के साथ कि उनके निजी स्कूल के बच्चों की की मराबरी कर सकते हैं, जबकि निजी स्कूल के बच्चों के माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे अधिक उत्कृष्टता प्राप्त करे और सभी विषयों में 100/100 स्कोर करें ट्रेंड यह है कि भारतीय स्कूल या कॉलेज ऐसे हैं जो शीर्ष स्कूलों या कॉलेजों में प्रवेश कट ऑफ अंकों से परिलक्षित होते हैं...।
ध्यान रहे केवल परीक्षा पास करने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और गहन शिक्षण में बड़ा अंतर है, जो एकमात्र आया है और कोचिंग संस्थान भारी पैसे का भुगतान करके संकायों को नियुक्त करते हैं जो शॉर्टकट सिखा सकते हैं और जो कोचिंग पास राशन के लिए मेहतर सुनिश्चित करते है, हालांकि वे संस्थान व्यापक पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते हैं जो छात्रों में उचित ज्ञान और लंबे समय तक चलने वाली स्मृति के लिए आवश्यक बच्चे परीक्षा में सफल हो सकते हैं लेकिन उन्हें हमेशा अपनी आगे की पढ़ाई में समस्या का सामना करना पड़ेगा क्योंकि उनका आधार कमजोर और खोखला है। 
कोचिंग संस्थान भी छात्रों पर उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए अत्यधिक दबाव डालते हैं, इसके लिए वे अपमान, खुलेआम छात्रों का मजाक उड़ाने जैसे किसी भी हद तक जा सकते है, जिससे सात्रों में अवसाद या मानसिक आघात हो सकता है जो किसी भी तरह प्रदर्शन करने में रहते हैं। यदि आप एनईईटी या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों द्वारा की गई आत्महत्याओं को देखें, तो आपको यह जानकर होगा कि कोटा, पटना, हैदराबाद, बैंगलोर या भुवनेचा, दिल्ली या पुणे जैसे शहरों में जाने वाले कई छात्र अनुचित दबाव के आगे झुक जाते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं और यह प्रवृत्ति बढ़ रही है।
माता-पिता, सरकार और शिक्षानियों को सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए कोचिंग संस्थान प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कठिन विषयों में केवल थोड़े समर्थन के लिए है, वे पारंपरित स्कूलों या कॉलेजों का प्रतिस्थापन नहीं है, बल्कि यदि आप परिणामों का विषण करते हैं, तो अधिकांश टॉपर्स केवल अपने स्वयं के अध्ययन और माता-पिता, शिक्षकों के समर्थन के कारण उत्कृष्टता प्राप्त करते हैं।
कोचिंग संस्थान निजी अस्पतालों की तरह सिर्फ पैसा कमाने वाला व्यवसाय है, जो बूचड़खानों से भी बदतर हपूछो कहां भूषण खानों से बेहतर है, जहां न केवल बच्चों को बल्कि उनके माता-पिता को का सामना करना पड़ता है और केवल उनके बेहतर परिणामों की उम्मीद में लाइन में लग जाते है जो सफल भविष्य सुनिचित नहीं करते हैं।
करियर सलाहकार के रूप में मेरा पुरजोर है कि अपने बच्चों स्कूल में पढ़ने और पापा को संस्थानों से दूर रहें जी आपको जात में पैसा कमाने के लिए यहां है और भोले-भाले माता-पिता जल में फंसने के लिए तैयार हो जाते हैं और 9वीं या 10वीं कक्षा के छात्रों के लिए लाखों रुपये खर्च करते है को कोचिंग में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करना बंद करें क्योंकि उसका अध्ययन पूर्ण हो जाता है और कई बार जीवन के लिए खो जाता है।
कारको कोचिंग संस्थानों को उनकी फीस और अत्यधिक शुल्क पर नियमित करना चाहिए और बच्चों को सामान्य रूप से हार्मोन इंजेक्शन वाले चूनों को आवश्यकता से जल्दी बड़ा होने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
सरकार के साथ-साथ माता-पिता स्कूलों पर डालते हैं कि अपने मानक को संस्थानों के साथ मेल खाने के लिए अड करें और सभी कोचिंग संस्थान फीस कम करेंगे या विनियमित किए जा सकते हैं। हमारे स्कूलों और कॉलेजों को उच्च प्रेरणा और प्रदर्शन आधारित प्रशंसा और के साथ बेहतर शिक्षण कर्मचारियों की आवश्यकता है और कोचिंग संस्थानों में प्रवास को नियंत्रित करने के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे की भी आवश्यकता है। यह माता-पिता को अनुचित अनुचित वयख और तनाव से बचाएगा।
(लेखक भुवनेश्वर में करियर कंसलटेंट हैं।)

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

न्यूजक्लिक का सच क्या हो सकता है

अवधेश कुमार

देश के 750 नामचीन लोगों ने न्यूजक्लिक के पक्ष में  बयान जारी कर कहा है कि उसका उत्पीड़न हो रहा है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। उनके अनुसार न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में न्यूज़क्लिक के विरुद्ध किसी कानून का उल्लंघन करने की बात नहीं कही गई है। इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, इतिहासकार रोमिला थापर, जोया हसन, जयती घोष, हर्ष मंदर, अरुणा राय, एन राम, कॉलिन गोंजाल्विस, प्रशांत भूषण ,आनंद पटवर्धन आदि शामिल हैं। एक लोकतांत्रिक खुले समाज एवं व्यवस्था में सरकार के समर्थक विरोधी, मध्यमार्गी, निष्पक्ष, सापेक्ष सभी प्रकार की अभिव्यक्ति के मंचों के लिए जगह होनी चाहिए। इसलिए न्यूजक्लिक अगर  संगठन के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा और नरेंद्र मोदी सहित भाजपा सरकारों के विरोध को अपना एजेंडा बनाता है तो यह उसका अधिकार है। पर उसका वैचारिक विरोध होगा और होना भी चाहिए। अगर वह एजेंडा चलता है तो उसके विरुद्ध भी मान्य कानूनी तरीकों में एजेंडा चल सकता है।  किंतु इसके आधार पर भारत सरकार की या किसी प्रदेश सरकार की एजेंसियां उसके विरुद्ध कार्रवाई करे यह स्वीकार नहीं हो सकता। क्या न्यूजक्लिक कि विरोध वाकई उसके राजनीतिक एवं वैचारिक एजेंडे के कारण है?

जिन लोगों ने न्यूज़क्लिक के समर्थन में हस्ताक्षर किए हैं उनकी समाज में प्रतिष्ठा है। इसके साथ यह भी सच है कि इनमें से ज्यादातर का अपना वैचारिक और राजनीतिक एजेंडा एकपक्षीय राष्ट्रीय संघ, भाजपा और हिंदुत्व से घृणावाद और विरोधवाद फैलाना है। विरोध इनका अधिकार है, पर ये दुराग्रहों की सीमा पार कर उस स्तर पर चले जाते हैं कि आम व्यक्ति भी इनकी सोच और व्यवहार पर संदेह व्यक्त करने लगता है। इन्होंने इतना सच कहा है कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी खोजपूर्ण रिपोर्ट में न्यूज़क्लिक द्वारा भारत में कानून के उल्लंघन की बात नहीं लिखा है। इन्होंने यह तथ्य नहीं लिखा कि न्यूयॉर्क टाइम्स की छानबीन न्यूज़क्लिक पर न होकर इसके फाइनेंसर नेविले राय सिंघम, अमेरिका सहित विश्व भर में फैले मीडिया एवं गैर सरकारी संगठनों आदि के माध्यम से फैला उनका विस्तृत जाल तथा चीन के साथ उनके संबंध हैं। इन्हीं की चर्चा करते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत में न्यूज़क्लिक का उल्लेख किया है। न्यूयॉर्क टाइम्स छानबीन की रिपोर्ट से साफ है कि सिंघम चीनी एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए कई हजार करोड़ की फंडिंग कर रहे हैं और उसमें न्यूज़क्लिक भी शामिल है तो फिर इसे पाक साफ कैसे कहा जा सकता है?

न्यूजक्लिक के मामले के दो पहलू है– वित्त पोषण के साथ चीनी एजेंडे का जुड़ाव और दूसरा इसमें भारतीय कानूनों का उल्लंघन। न्यूज़क्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड को  2018 से करीब 38 करोड रुपया सिंघम प्राप्त हुआ है।  इसको जस्टिस एंड एजुकेशन फंड इंक, यूएस; जीएसपीएएन एलएलसी, यूएस; ट्राईकॉन्टिनेंटल लिमिटेड इंक, यूएसए के अलावा सेंट्रो पॉपुलर डेमिडास, ब्राजील से फंड मिला। न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि अमेरिकी अरबपति सिंघम की विश्व भर में चीन का बचाव करने और उसका प्रोपेगेंडा आगे बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका है और उनके पास भरपूर धन है। यह कैसे काम करता है इसका एक उदाहरण देखिए। कोल्ड वॉर ग्रुप के बारे में माना जाता था कि यह अमेरिका और ब्रिटिश एक्टिविस्टों का  बिगड़ा हुआ समूह है। इसके अनेक प्रदर्शन होते थे। पिछले दिनों नवंबर 2021 में एशियाइयों के खिलाफ घृणा अपराध के विरोध प्रदर्शन में लंदन के चायना टाइम में कई सक्रिय समूहों में यह भी था। उसमें प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई तो लोगों को आश्चर्य हुआ। विरोध जताने वाले अधिकतर लोग चीनी थे । झगड़ा उस समय हुआ जब कोल्ड वॉर ग्रुप के लोगों ने हांगकांग में लोकतंत्र आंदोलन का समर्थन करने वाले एक्टिविस्टों पर हमला कर दिया। लोगों को समझ में नहीं आया कि अमेरिकी ब्रिटिश एक्टिविस्टों के लोग हमला क्यों कर रहे हैं। बाद में पता चला कि यह चीन का बचाव करने और उसका प्रोपगंडा चलाने वाला समूह है। सोचिए, नाम कोल्ड वॉर ग्रुप और काम क्या है?  रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी एंटीवर्ट समूह कोड पिंक में भी समय बीतने के साथ बदलाव आया है। कोड पिंक ने पहले मानवाधिकारों को लेकर चीन की आलोचना की थी लेकिन अब वह मुस्लिम उईगारो पर अत्याचारों का बचाव करता है।

न्यूयॉर्क टाइम्स बताता है कि सिंघम के पास गैर-लाभकारी संगठन व सेल कंपनियों के इतने बड़े जाल है कि उनमें यह बात लगभग छुपी रही है कि वे चीन सरकार की मीडिया मशीन के साथ काम करते हैं। 69 वर्षीय सिंघम शिकागो में सॉफ्टवेयर कंसलटेंसी कंपनी थॉटवर्क्स चलाते हैं और शंघाई में बैठते हैं। वहां उनका नेटवर्क यूट्यूब पर एक शो आयोजित करता है। इसके लिए शंघाई का प्रोपोगंडा विभाग भी पैसा देता है। दो अन्य समूह दुनिया में चीन के पक्ष का प्रचार करने के लिए चीनी यूनिवर्सिटी के साथ काम कर रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की छानबीन के अनुसार सिंघम के साथ मैसाचुसेट्स में एक थिंकटैंक, मैनहैटन की संस्था, दक्षिण अफ्रीका में एक राजनीतिक दल, भारत और ब्राजील में न्यूज संगठन सहित कई समूह जुड़े हैं।

सिंघम ने बयान दिया कि वह चीन सरकार के निर्देश पर काम नहीं करते। सच यह है कि सिंघम के समूह चीन के पक्ष में अभियान के लिए यूट्यूब वीडियो बनाते हैं, राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, ये समूह अमेरिकी कांग्रेस में सहायकों से मिलते हैं, अफ्रिका में राजनेताओं को प्रशिक्षण देते हैं, दक्षिण अफ्रीका के चुनाव में उम्मीदवार खड़ा करते हैं और लंदन जैसे विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हैं।

न्यूयॉर्क टाइम्स का मूल लक्ष्य भारत था ही नहीं। न्यूयॉर्क टाइम्स मूलतः अमेरिकियों को बता रहा है कि हमारे यहां किस तरह से चीनी एजेंडा चलाने वाला एक व्यक्ति अलग-अलग समूहों और सेल कंपनियों के माध्यम से काम कर रहा है। अमेरिका में सिंघम से जुड़ा कोई समूह विदेशी एजेंट रजिस्ट्रेशन कानून के तहत निबंधित नहीं है। अमेरिका में दूसरे देशों की ओर से जनमत को प्रभावित करने के अभियान चलाने वाले समूहों का निबंधन आवश्यक है। जिन चार गैर-लाभकारी संगठनों की बदौलत सिंघम का अभियान चलता है उनके पते इलीनॉय, विस्कंसिन और न्यूयॉर्क में यूपीएस स्टोर मेल बॉक्स के रूप में दर्ज है। न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि यूपीएस स्टोर गैर-लाभकारी समूह के रूप में यहां दर्ज है जिससे करोड़ों डॉलर दुनिया भर में भेजे गए हैं।  कोई न कोई बहाना बनाकर इसने दक्षिण अफ्रीका के स्कूलों को लाखों डॉलर भेजे हैं। इसी में आगे वह कुछ राजनीतिक दलों एवं मीडिया संस्थानों को पैसा मिलने के बारे में लिखता है। उदाहरण के लिए ब्राजील में ब्राजील डिफेक्टो अखबार चलाने वाले समूहों को भी सिंघम से धन मिला है। न्यूयॉर्क टाइम्स बता रहा है कि यह अखबार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रशंसा में लिखता है। इसने स्पष्ट लिखा है कि नई दिल्ली में कॉरपोरेट्स फाइलिंग से पता लगा है कि सिंघम के नेटवर्क न्यूज़ साइट न्यूज़क्लिक को फाइनेंस किया है। ये समूह तालमेल से काम करते हैं। उन्होंने एक-दूसरे के कंटेंट सोशल मीडिया पर सैकड़ों बार पोस्ट की है।

यह है न्यूयॉर्क टाइम्स की छानबीन। हस्ताक्षर करने वाले नामचीन लोगों ने निश्चय ही रिपोर्ट को पढ़ा होगा। क्या इसके बाद कोई मानेगा कि सिंघम से जुड़ा कोई मीडिया संस्थान निष्पक्ष होकर काम करेगा या भारतीय हितों को ध्यान में रखते हुए पत्रकारिता करेगा?  ईडी या प्रवर्तन निदेशालय की छानबीन से मोटा -मोटी जो जानकारी सामने आई उसके अनुसार न्यूज पोर्टल को आए धन में से 52 लाख बप्पादित्या सिन्हा को दिए गए। बप्पादित्या सिन्हा कम्युनिस्ट नेताओं के ट्विटर हैंडल भी संभालते हैं। धन का एक हिस्सा गौतम नवलखा के पास गया। निश्चित रूप से ये भुगतान उनके लेख या रिपोर्ट आदि के लिए ही गया होगा। विचार या एजेंडा फैलाने वालों को इसी तरह भुगतान किया जाता है जिनमें कानूनी रूप से कोई खांच न रहे। यह देखना प्रवर्तन निदेशालय का काम है कि जो धन आए उनमें कानून और भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों का पालन हुआ या नहीं? न्यूज क्लिक ने अपने बयान में कहा कि उसने इनका पालन किया है। हो सकता है। कानूनी रूप से शायद गलत न भी हो, पर न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के बाद भी यदि भारतीय होने के नाते इसकी टीम को कोई समस्या नहीं है तो देश अवश्य इनसे प्रश्न करेगा? संघ , भाजपा व  मोदी विरोध के नाम पर न्यूजक्लिक के पक्ष में हस्ताक्षर करने वालों ,अभियान चलाने वालों से भी पूछा जाएगा कि क्या वे चीन के एजेंडे को सही मानते हैं? 

 पता– अवधेश कुमार, ई-30 , गणेश नगर, पांडव नगर कौम्पलेक्स, दिल्ली- 110092 मोबाइल- 98110 27208

सोमवार, 21 अगस्त 2023

राष्ट्रीय आन्दोलन में हिन्दी की भूमिका

 डॉ. मीना शर्मा

वैसे तो राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की विधिवत शुरुआत सन् 1885 में भारतीय कांग्रेस की स्थापना के साथ हो गई थी किन्तु 20वीं सदी के आरम्भ से इसकी तीव्रता में गुणात्मक परिवर्तन आया। एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत जन्म ले रहा था और उसके साथ ही राष्ट्रीय भावना एवं राष्ट्रीय पहचान व अस्मिता का सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय पुर्नजागरण की चेतना भी उभरने लगी थी। राष्ट्रीय जागरण अब सांस्कृतिक जागरण में रूपान्तरित हो रहा था। राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव राजनीतिक जीवन, सामाजिक जीवन, सांस्कृतिक जीवन और राष्ट्रीय जीवन पर भी पड़ा। भारतीय संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक ऊर्जा ने अपनी पहचान को पाने की अराकलता एवं चुनौती राष्ट्रनायकों के समक्ष रख दी थी। औपनिवेशिक विमर्श से उत्पन्न राष्ट्रीयता की भावना का उदय भारत समेत लगभग सभी गुलाम देशों में हुआ। एक राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रय भाषा होती है जो उसकी पहचान भी होती है, यह सवाल स्वाधीनता सेनानियों और सुधारकों के मानस को आंदोलित करता था। 19वीं शताब्दी के सुधारकों के समक्ष जब यह प्रश्न उठा कि जो नवीन भारत जन्म ले रहा है उसकी राष्ट्रभषा क्या हो? तब अनायास ही वे इस निर्णय पर पहुंचे कि नवीन भारत की राष्ट्रभाषा केवल हिन्दी ही हो सकती हैं।
राष्ट्रवाद की भावना को संपूर्ण भारत वर्ष के जन-जन में फैलने के लिए अन्तःप्रान्तीय सम्पर्क की आवश्यकता महसूस की गई तब भी यह महसूस किया गया कि सभी प्रादेशिक पूर्व ग्रहों से ऊपर उठाकर वह (सम्पर्क भाषा ) भारतीय भाषा हिन्दी ही हो सकती है। क्योंकि एक बहुभाषी देश में स्वाधीनता की चेतना को प्रत्येक गांव और प्रत्येक आदमी तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय एकता के निर्माण के लिए हिन्दी की एकमात्र अस्त्र हो सकती है। राजा राम मोहन राय ने भी महसूस किया कि जनता में जाने और उसे आंदोलित करने के लिए अंग्रेजी का कोई उपयोग नहीं। उसे अपनी भाषा के द्वारा ही करना होगा। राष्ट्रीय आजादी के लिए राष्ट्रीय एकता और अखंडता अनिवार्य होता है और राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बांधने वाला सूत्र के बिना यह परिकल्पना साकार नहीं हो सकती। अतः चुनौती कई स्तरों पर थी। उस सूत्र की पहचान करते हुए उस दौर के लगभग सभी राष्ट्रनायकों ने विचार किया। 1875 में ब्रह्मसमाज के प्रधान नेता केशवचन्द्र सेन ने कहा कि अभी कितनी ही भाषाएं भारत में प्रचलित हैं, उनमें से हिन्दी भाषा ही सर्वत्र प्रचलित है। इसी हिन्दी को भारत वर्ष की एकमात्र भाषा स्वीकार कर लिया जाए तो सहज ही में यह एकता सम्पन्न हो सकती है।'
राष्ट्र निर्माण और भाषा निर्माण की दोहरी प्रक्रिया समानान्तर रूप से एक दूसरे से सहयोग करते हुए हो रही थी । हिन्दी राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक बन चुकी थी। राष्ट्रीय आकांक्षा, मुक्ति के स्वप्नों को आंखों में लिए नयी सामाजिकता के निर्माण के लिए, भारत की विविधता के इन्द्रधनुषी रंग को एक भाषा के माध्यम से पकड़कर उनमें अन्तर्निहित सौन्दर्य को उद्घाटित करने के लिए भाषागत वैविध्य की बाधा को पाटकर उसमें राष्ट्रीय एकता व स्वाधीनता के विचारों को अभिव्यक्त करने का समर्थ और समक्ष माध्यम के रूप में हिन्दी की पहचान हो चुकी थी। इसी को लक्षित करते हुए बंकिम चन्द्र ने कहा कि हिन्दी एक दिन भारत की राष्ट्रभाषा होकर करेगी, क्योंकि हिन्दी भाषा की सहायता से भारत के विभिन्न प्रदेशों में ऐक्स- बांधने स्थापित कर भारत बंधु कहलाने योग्य है।
भारत के स्वत्व और पहचान के संदर्भ को चिन्हित कर ही राष्ट्रप्रेम को जन-जन में फैलाने के लिए हिन्दी भाषा को माध्यम के रूप में चुना गया तथा इस भारत की समस्त उन्नति का मूलमंत्र घोषित किया गया-
“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ।
निज बिन भाषा ज्ञान के मिटत न हित को शूल ॥”
पहचान का संबंध अतीत से होता है। अत: अपने अतीत के गौरव को पुर्न सृजित कर अपनी परंपरा का गौरव गान कर भारतीय जनजागरण की भाषा बनने का गौरव हिन्दी को ही जाता है। इस स्वत्व से ही स्वदेश प्रेम, स्वदेश वस्तुओं को प्रयोग, स्वदेशी भाषा और अंततः स्वतंत्रता की प्राप्ति का लक्ष्य इसी नवजागरण और औपनिवेशिक विमर्श की कोख से पैदा होता है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण ने अपनेपन की भावना को गाढ़ापन प्रदान किया। सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग का प्रश्न इसी औपनिवेशिक विमर्श की प्रसव पीड़ा से उत्पन्न हुआ था । यी कारण था कि हिन्दी का मसला सिर्फ एक भाषा का मसला न रहकर एक राष्ट्रीय भाषा और एक राष्ट्रीय पहचान का भी था । यही कारण था कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने सन् 1882 में शिक्षा आयोग के समक्ष इस पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा था-
" सभी सभ्य देशों की अदालतों में उनके नागरिकों की बोली और लिपि का प्रयोग होता है। यही ऐसा देश है, जहां न तो अदालती भाषा...... हिन्दी का प्रयोग होने से जमींदार, साहूकार, व्यापारी और सभी को सुविधा होगी, क्योंकि सभी जगह हिन्दी का ही प्रयोग है। "
हिन्दी भाषा के अधिकांश प्रदेशों और लोगों द्वारा बोली और समझी जाने के कारण एक सार्वदेशिक भाषा के पद पर आसानी से स्थापित होकर राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में कार्य करने लगी। विलक्षण बात यह है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव उन महापुरुषों ने किया जिनमें अधिकांश की मातृभाषा हिन्दी न होकर बंगला, गुजराती, मराठी या कोई और भाषा थी। हिन्दी एवं अहिन्दी भाषी क्षेत्र के इन सभी नेताओं ने इसे सम्मिलित भारत की संस्कृति और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक माना। राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र प्रेम को साधने के लिए सुभाषचन्द्र बोस ने भी हिन्दी की भूमिका को रेखांकित इन शब्दों में किया है- “देश की एकता के लिए एक भाषा का होना जितना आवश्यक है, उससे अधिक आवश्यक है- देश भर के लोगों में देश के प्रति विशुद्ध प्रेम तथा अपनापन का होना। यदि आज हिन्दी मान ली गई है, तो यह अपनी सरलता, व्यापकता और क्षमता के कारण। वह किसी प्रांत विशेष की भाषा नहीं है बल्कि सारे देश की भाषा है।"
भाषा की मुक्ति के बिना राष्ट्र की मुक्ति संभव नहीं है। इसलिए भाषा के स्तर पर भी मुक्ति की मांग स्वाभाविक है। अंग्रेज और अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ना प्रकारान्तर से राष्ट्रीय अस्मिता को प्राप्त करने का ही दूसा नाम था । अतः कुछ राष्ट्रीय नेताओं ने स्वदेशी को अपनाने और विदेशी के बहिष्कार का संकल्प लेकर और उसे स्वाधीनता की समग्र परिकल्पना से जोड़कर ही स्वदेशी वस्तु, स्वदेशी भाषा, स्वराज्य स्वतंत्रता (स्वयं का तंत्र) को विकसित करने की मांग करने लगे। क्योंकि भाषा की स्वायत्तता के बिना मनसिक वराज्य संभव लगे। 
शिक्षा, प्रशासन, न्याय आदि सभी क्षेत्रों में हिन्दी को लागू करने की मांग जोर पकड़ने लगी। अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी शिक्षा विदेशी दासता का प्रतीक मानी जाने लगी और हिन्दी हिन्दुस्तान की पहचान तथा हिन्दुस्तान की आत्मा के रूप में-
'हिन्दी है हम वतन हैं हिन्दोस्तान हमारा।'
पूरे भारत वर्ष के स्वाधीनता सेनानियों ने हिन्दी और हिन्दुस्तान को अभिन्न समझकर ही राष्ट्रप्रेम के साथ-साथ राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति भी अपनी व्यक्त की। राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसी भावना को केन्द्र में रखकर अपने विशेष अधिवेशन में हिन्दी के पक्ष में प्रस्ताव पारित कर अपनी कार्यवाई हिन्दी में करने का फैसला किया। सन् 1906 में कांग्रेस अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी ने प्रथम बार 'स्वराज्य' हिन्दी शब्द का प्रयोग किया। बाद में तिलक ने इसे विकसित करते हुए जोरदार शब्दों में कहा- 'स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।' तिलक के ये वाक्य पूरे भारत वर्ष में एक नारे के रूप में लोगों के दिलों में गूंजने लगी । स्वराज्य की प्राप्ति की यह चिंगारी अब आम लोगों से जुड़ने लगी। जो कांग्रेस पढ़े-लिखे लोगों की पार्टी थी उससे आम लोगों के जुड़ने और जाड़ने में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन को व्यापक आधार देने में हिन्दी एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुई है। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को करोड़ों निरक्षर लोगों ने निरक्षर स्त्रियों और भूखे लोगों को स्वराज्य से जोड़ने की भाषा महात्मा गांधी ने हिन्दी को ही समझा। गांधीजी की स्पष्ट मान्यता थी कि भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है-
“यदि स्वराज्य अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतवासियों का है और केवल इनके लिए है जो सम्पर्क भाषा अवश्य अंग्रेजी होगी। लेकिन यदि वह करोड़ों निरक्षर लोगों, निरक्षर स्त्रियों और सताए हुए अछूतों के लिए है, तो सम्पर्क भाषा केवल हिन्दी ही हो सकती है। "
हिन्दी के माध्यम से आम आदमी को राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ने का ही परिणाम था कि राष्ट्रीय आजादी को चाहने वालों, राष्ट्र के लिए मर-मिटने वाले लोगों की संख्या अब करोड़ों में हो गई। देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पण त्याग व बलिदान की भावना से समूचा देश आंदोलित हो गया हिन्दी और स्वाधीनता आंदोलन दोनों के मिल जाने से इन दोनों का आधार राष्ट्रीय हो गया। अब स्वाधीनता के विचारों को पूरे भारतवर्ष में प्रत्येक प्रांत, प्रत्येक धर्म, प्रत्येक व्यक्ति तक हिन्दी के माध्यम से पहुंचाना आसान था ।
राष्ट्रीय एकता और स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दी की भूमिका को पहचान कर ही राष्ट्रनायकों ने उसे राष्ट्रभाषा के पद पर सुशोभित किया। उन राष्ट्रनायकों में स्वामी दयानंद सरस्वती, सुभाषचन्द्र बोस, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लोकमान्य तिलक, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, पुरुषोत्तम दास टंडन, राजेन्द्र प्रसाद आदि प्रमुख थे।
हिन्दी के महत्व को समझ कर ही स्वाधीनता सेनानियों ने उसके माध्यम से राष्ट्रीय विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए हिन्दी पत्रकारिता को अपनाया । पं. मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, तिलक आदि सभी हिन्दी पत्रकारिता के माध्यम से जन जागृति, समाज सुधार, राष्ट्रीय चेतना, देश भक्ति आदि का कार्य करते रहे। 'मास' से कटकर महान से महान विचार भी अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सकता। इसलिए हिन्दी को मास की भाषा समझकर मास को आंदोलित व संगठित करने का एक सशक्त माध्यम बना हिन्दी पत्रकारिता । हिन्दी आंदोलन और स्वाधीनता आंदोलन दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ते गए। हिन्दी का साहित्यकार और स्वाधीनता सेनानी दोनों उसी राष्ट्रीय भावना को अपने-अपने तीरके से लेकर चलता । इस अर्थ में उस युग का साहित्यकार किसी स्वाधीनता सेनानी से कम नहीं है तो दूसरी तरफ उस दौर के स्वाधीनता सेनानी भी साहित्यकार की भूमिका में नजर आते हैं। इन दोनों वर्गों में रास्ते का भेद है, मनोभेद नहीं। दोनों का लक्ष्य एक ही है और वह है- राष्ट्रीय आजादी और राष्ट्रीय स्वाधीनता एकता व अखंडता । साहित्य और राजनीति उस दौर में एक मिशन था, प्रोफेशन नहीं। इसीलिए साहित्य भी उस दौर में राजनीति के आगे-आगे चलने वाली रोशनी थी जो आजादी का रास्ता दिखाते हुए बढ़ रही थी। और ये सफर तब तक चलता रहा जब तक भारत को 1947 में आजादी मिल गई।

- डॉ. मीना शर्मा -
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