गुरुवार, 17 अगस्त 2023

अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्ष बनाम सरकार

अवधेश कुमार 

लोकसभा में तीन दिनों तक चले अविश्वास प्रस्ताव पर बहस ने आगामी 2024 लोकसभा चुनाव तक की राजनीतिक ध्वनियों की दिशा तय कर दी है। राजनीति में सामान्य रुचि रखने वालों में से भी शायद ही कोई हो जिसने अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा अवसर मिलने पर लाइव न देखी या सुनी हो। पार्टियों और नेताओं के लिए यह केवल एक दूसरे को घेरने, उत्तर देने, व्यंग्य और कटाक्ष करने का ही अवसर नहीं होता, बल्कि नेताओं -कार्यकर्ताओं -समर्थकों को बोलने व तर्क करने के लिए विषय-वस्तु, शब्दावलियां भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है। कम से कम भाजपा और कांग्रेस के नेताओं ने बोलते समय इस पहलू का अवश्य ध्यान रखा। बावजूद यह संभवतः पहला अविश्वास प्रस्ताव था जिसमें सरकार की ओर से बोलने वालों को विपक्ष के तथ्यों ,तर्कों व आरोपी की काट के लिए  शोध या छानबीन कर विषयवस्तु लाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। विपक्ष चाहे जितनी अपनी वाहवाही करे कि उसने प्रधानमंत्री को बोलने के लिए विवश कर दिया, सच यह है कि उनकी तैयारी ऐसी नहीं थी जिससे सरकार को घेरा जा सके। विपक्ष के नेताओं का एक भी भाषण नहीं जिसे सुनने के बाद लगे कि सरकार के लिए इसका उत्तर देना कठिन या असंभव होगा या वह निरुत्तर हो जाएंगे। आप आरोप लगाएं, हमले करें और उनमें अधिकृत तथ्य नहीं हो तो संसद की बहस में उसके मायने नहीं होते। सच कहा जाए तो सरकार की ओर से विशेषकर गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण या प्रधानमंत्री तक ने अपनी ओर से ही संबंधित विषय रखे ताकि वह सब संसद के रिकॉर्ड में आ जाए और रुचि रखने वालों को उपलब्ध हो।

आईएनडीआईए के गठन के बाद 26 दलों के संगठित विपक्षी समूह के लिए यह नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल का सबसे बड़ा अवसर था जिसमें वह स्वयं की क्षमता प्रमाणित कर सकते थे। वे साबित कर सकते थे कि हमारे पास इतनी योग्यता है जिससे हम सरकार को उन्हीं के तथ्यों और तर्कों से कटघरे में खड़ा कर सकते हैं, देश के भविष्य को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समानांतर हर विषय पर हमारे पास ऐसी रूपरेखा और सोच के साथ व्यक्तित्व भी हैं जो बेहतर सरकार चला सकते हैं। क्या कोई स्वीकार करेगा कि आईएनडीआईए इन कसौटियों पर स्वयं को खरा उतारने में सफल हो सका? कांग्रेस की ओर से तरुण गोगोई ने अवश्य अपने भाषण में विषयवस्तु रखें, लेकिन वह इतना प्रभावी नहीं था जिनसे सरकार को उत्तर देने में कठिनाइयां पैदा हो। राहुल गांधी जब दूसरे दिन बोलने के लिए खड़े हुए तो सोचा गया कि भारत जोड़ो यात्रा तथा सजा के कारण चार महीने से ज्यादा समय तक लोकसभा सदस्यता से वंचित रहने के बाद उनके भाषण में अवश्य तथ्यों के साथ कटाक्ष एवं आक्रमण होंगे। आखिर आईएनडीआईए की सबसे बड़ी पार्टी के शीर्ष सक्रिय नेता होने के कारण संसद में आगे बढ़कर अपने वक्तव्य से उन्हें ही नेतृत्व संभालना था। जब आप 37 मिनट के भाषण में 15 मिनट से ज्यादा भारतयात्रा पर बोलेंगे और शेष सरकार को देशद्रोही से लेकर भारत माता की हत्या करने वाले बाबा बताने में ही समय लगा देंगे तो आपके पास मणिपुर से लेकर आर्थिक, सांस्कृतिक, रक्षा, विदेश नीति, आंतरिक सुरक्षा आदि पर बोलने के लिए समय कहां रहेगा। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी का वक्ताओं में नाम भी नहीं था। ऐसा लगता है जब गृह मंत्री अमित शाह ने तंज कसा तो नाम शामिल किया गया। ऐसा लगा जैसे वे प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक, अशोभनीय शब्दों और तुलनाओं की पोटली लेकर उपस्थित हुए हो। परिणामत: भाजपा के सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त से उनकी भीड़ंत होते-होते बची। वीरेंद्र सिंह ने सदन में अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांग लिया पर अधीर रंजन इसके लिए तैयार नहीं हुए। उन्हें न केवल निलंबन झेलना पड़ा बल्कि मामला विशेषाधिकार समिति के पास चला गया है।

सरकार की ओर दृष्टि डालिए तो दो भाषणों पर सबसे ज्यादा ध्यान था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह। संसद के अंदर गृह मंत्री अमित शाह ने अभी तक के भाषणों से योग्यता और क्षमता को बार-बार प्रमाणित किया है। भाजपा के विरोधी टिप्पणीकार भी कह रहे हैं कि उनका भाषण सबसे प्रभावी था क्योंकि उसमें हर उन पहलुओं से संबंधित तथ्यात्मक विवरण और तर्क थे, हर ऐसे प्रश्न के उत्तर थे जो विरोधी लगातार उठाते । इसके साथ उन्होंने अपनी ओर से और ऐसी बातें रख दीं जिनसे सरकार का पक्ष मजबूत होता हो और भाजपा के नेताओं - कार्यकर्ताओं को तो बोलने के लिए विषय वस्तु मिलते ही हो देश के आम लोगों को भी लगे लगे कि वाकई सरकार ने हर स्तर पर काम किया है और आगे भी कर रही है। मणिपुर पर उन्होंने करीब आधा घंटा बोला जिसमें उत्तर-पूर्व की कुछ और कुछ बातें भी थीं। वे अपने भाषण से यह संदेश देने में सफल रहे कि विपक्ष के सारे आरोप निराधार व राजनीति से प्रेरित हैं। मणिपुर में हिंसा भड़कने के 24 घंटे के अंदर ही सरकार ने वे सारे कदम उठाएं और अभी भी सक्रिय है ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो।

अधीर रंजन चौधरी का भाषण उनके अगले दिन था। वे गृज्ह मंत्री के भाषण पर फोकस कर विपक्ष की दृष्टि से अपनी बात रखते तो लगता कि वाकई विपक्ष का कोई नेता सरकार को उसके तथ्यों के आईने में घेरने के लिए तैयारी किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाषण कला पर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। पूरे अविश्वास प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि प्रधानमंत्री ने अपने व्यंग्य, हास्य व कटाक्षों के साथ उपमा,अलंकारों आदि का प्रयोग कर यह साबित किया कि कठोर से कठोर बातें और तीखे हमले के लिए उग्र होकर गुस्सैल शब्दावलियों का प्रयोग करना हमेशा आवश्यक नहीं होता। उन्होंने विपक्ष विशेषकर कांग्रेस की बखिया उधेड़ दी किंतु बोलने की शैली ऐसी थी जिसमें हंगामा व विरोध का अवसर नहीं मिला। समर्थक हो या विरोधी प्रधानमंत्री को सुनते समय बार-बार हंसी आती थी। उदाहरण के लिए उन्होंने आईएनडीआईए नाम को लेकर यही कहा कि आपने इसके लिए भी एनडीए चुरा लिया तथा आपका इंडिया घमंडइयआ है ,जिसमें दो आई एक हम और दूसरा परिवार के लिए है। यह सुनने में सरल लगता है लेकिन ऐसे कटाक्ष के लिए भी काफी सोचना पड़ा होगा। उन्होंने यूपीए की जगह आईएनडीआईए रखने पर भी तंज कसा कि आपने यूपीए का क्रिया कर्म और श्राद्ध कर दिया जिस पर मैं थोड़ी देर से संवेदना प्रकट कर रहा हूं। लेकिन आप खंडहर पर प्लास्टर चढ़ा कर जश्न मना रहे हैं। इंडिया नाम रखने से आप इंडिया नहीं हो सकते हैं और इसके लिए उन्होंने दो पंक्तियां सुनाई –'दूर‌ युद्ध से भागते नाम रखा रणधीर, भाग्यचंद की आज तक सोई है तकदीर।' इस पर ठहाके तो लगने थे।  

अविश्वास प्रस्ताव का उपहास उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि आपको मैंने 2018 में काम दिया था और मैं आभारी हूं कि आपने उसे पूरा किया। यानी आपने मेरे कहने पर 2023 में अविश्वास प्रस्ताव लाया लेकिन थोड़ी तैयारी करके तो लाते, अब मैं फिर आपको काम दे रहा हूं कि 2028 में आप लाइए लेकिन थोड़ी तैयारी करके लाइए। इस आपा खोने की शैली में हमला किया जा सकता था, लेकिन इस शैली का प्रभाव लंबे समय तक रहेगा। हालांकि उन्होंने समय-समय पर आक्रामकता भी प्रदर्शित की, पर अपने पद और उत्तरदायित्व का ध्यान रखा। देश को यह कहते हुए संबोधित किया कि यह कालखंड महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और विश्व में आर्थिक महाशक्ति बनकर उठकर खड़ा हो रहा है तथा ऐसी कई स्थितियां हैं जिनसे अगले 1000 सालों का आधार बनेगा। इस कारण सबको अपने-अपने दायित्व का पालन करना है। विपक्ष ने सबसे बड़ी गलती बहिर्गमन में जल्दबाजी करके किया। प्रधानमंत्री मणिपुर पर नहीं बोल रहे हैं तो इसी का बहाना बनाकर निकल जाओ। उसके बाद प्रधानमंत्री ने मणिपुर और पूर्वोत्तर पर भी बोला। यह विश्वास दिलाते हुए कि मणिपुर में भी शांति का सूरज चमकेगा और मिलकर वहां इसके लिए प्रयास करने की अपील की।

उन्होंने मणिपुर के लोगों से भी अपील की। इस तरह प्रधानमंत्री का अविश्वास प्रस्ताव पर उत्तर देश के नेता का उत्तर था जिसमें विपक्ष की आलोचना थी, राजनीति में संसद के अंदर और बाहर तनाव और उग्र हिंसाजनक शब्दों को देखते हुए उसे व्यंग्य और हास्य से ठंडा करने की कोशिश थी तो देश के अंदर आत्मविश्वास पैदा करने का भाव भी। चूंकी विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाकर भी मैदान खाली छोड़ दिया था इसलिए प्रधानमंत्री, गृहमंत्री एवं दो-तीन दूसरे नेताओं के लिए अपने तरीके से बात रखने का पूरा अवसर था। आईएनडीआईए  गठबंधन के बाद अगर अविश्वास प्रस्ताव को लेकर नेताओं की बैठक होती और नेताओं को अलग -अलग विषय बोलने के लिए दिए जाते तो स्थिति दूसरी होती। विपक्ष के व्यवहार से यही संदेश निकला  कि राजनीतिक विवशताओं के चलते वे साथ आ गये, पर उनके बीच सरकार से मुकाबले के लिए भी समन्वय और सामंजस्य का अभाव है। हालांकि सरकार की ओर से भी कई वक्ताओं के भाषण प्रभावी और स्तरीय नहीं थे, पर कुल मिलाकर समन्वय और सामंजस्य के साथ परिश्रम और तैयारी की पूरी झलक थी।

पता- अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल 98911027208



मंगलवार, 15 अगस्त 2023

शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए व अमनदूत एनजीओ ने ध्वजारोहण कर मनाया 77वां स्वतंत्रता दिवस, तिरंगा फहराकर दिया शांति का संदेश

 मो. रियाज़

नई दिल्ली। इस वर्ष हमारा देश आज़ादी की 76वीं वर्षगांठ मना रहा है। 15 अगस्त 1947 को हमें अंग्रेजों के चंगुल से आजादी मिली थी। 15 अगस्त के दिन हर साल भारत के प्रधानमंत्री दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर तिरंगा फहराने के बाद देश को संबोधित करते हैं। स्कूलों व सरकारी दफ्तरों आदि जगहों पर भी तिरंगा फहराया जाता है। राष्ट्र गान गाकर तिरंगे को सलामी दी जाती है। इसके बाद रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इसी मौके पर अमनदूत एनजीओ व शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के ऑफिस के पास सादगी से आज़ादी की 76वीं वर्षगांठ मनाई गई।
अमनदूत एनजीओ व शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन ने ध्वजारोहण कर लोगों को स्वतंत्रता दिवस की 76वीं वर्षगांठ पर संबोधित करते हुए कहा कि आज हम सभी यहां आजादी का जश्न मनाने के लिए इकट्ठा हुए हैं। स्वतंत्रता दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है। हमारा देश 1857 से लेकर 1947 तक अंग्रेजों का गुलाम रहा था। 15 अगस्त 1947 के दिन हमें आजादी मिलने के बाद हम स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में घोषित हुए थे। तभी से भारतवासी इस दिन को "स्वतंत्रता दिवस" के रूप में बहुत ही धूम-धाम और हर्षोउल्लास से मनाते है।
उन्होंने आगे बताया कि अंग्रेजों से आजादी दिलाने में कई स्वतंत्रता सेनानियों ने सालों तक संघर्ष किया था। इस संघर्ष की शुरुआत तब से हुई जब मंगल पांडे को अंग्रेजों ने गोली मारी थी। तभी से देश में आजादी के लिए लड़ाई शुरू हो गई थी। इसके बाद तो महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बाल गंगाधर तिलक, लोक मान्य तिलक, लाला लाजपत राय और खुदीराम बोस जैसे सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया। इस संघर्ष में सबसे अहम योगदान महात्मा गांधी का माना जाता है। उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए सत्याग्रह आंदोलन चलाया और कई बार तो उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और समय-समय पर अपने आंदोलनों के जरिए अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। 
 हमारा देश आज़ादी की 76वीं वर्षगांठ मना रहा है और इस दौरान देश हर मोर्चे पर दुनिया भर में अपनी धाक जमा चुका है। साइंस, टेक्नोलॉजी, आर्थिक, कृषि, शिक्षा, साहित्य, खेल समेत तमाम मोर्चों पर भारत बहुत तरक्की कर चुका है। परमाणु क्षमता संपन्न देश भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल कर चुका है। विकास के हर क्षेत्र में भारत बहुत आगे बढ़ चुका है। दुनिया भारत की ओर देख रही है।
इस अवसर पर ध्वजारोहण के बाद लोगों में मिठाई भी बांटी गई। इस मौके पर अमनदूत एनजीओ व शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के सदस्य व आम जनता मौजूद थी।

 


सोमवार, 14 अगस्त 2023

समाचार में मूल्य किस चिड़िया का नाम है?

 डॉ. मीना शर्मा

जमाना बदल गया है। मीडिया बदल गयी है और मूल्य.. मूल्य का क्या है? मूल्य किस चिड़िया का नाम है। इस चिड़िया का नाम आप यदि आप के बड़े - बड़े पत्रकार और संपादक के सामने लेंगे और इस चिड़िया का अता-पता पूछेंगे तो वो एक बार आपको ऊपर से नीचे भौंह चढ़ाकर विस्मय भरी नजर से देखेंगे और मन-ही-मन कहेंगे, ऊल्लू है क्या, कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहा हैं, लगता है पगला गया है, 'क्या बकवास है' वगैरह-वगैरह। तो क्या सचमुच जमाना बदल गया है, जिसमें मूल्य का नाम लेते ही उसे पागलपन मान लिया जाता हो, तो आप सोचेंगे कि क्या यह वाकई बेमानी वाला प्रश्न है जो सबको हैरानी में डाल देता है। तब ऐसी स्थिति में आज की मीडिया के वर्तमान परिदृश्य के बारे में सहज परिकल्पना की जा सकती है।
बदले-बदले से अन्दाज नजर आते हैं, बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं, कभी था वो एक जमाने में जन सरोकार अब तो समाचार के कारोबार नजर आते हैं। अब तो जनता का अखबार बाजार का अखबार बनकर रह गया है। आज की मीडिया कॉर्पोरेट मीडिया है। मीडिया के इस कार्पोरेट कल्चर ने उसे बाजार कल्चर ने पत्रकारिता के स्वरूप, पत्रकारिता के तौर-तरीके, पत्रकारिता के सिद्धांत और पत्रकारिता के मूल्य सब कुछ बदल कर रख दिया है। पत्रकारिता के चरित्र को बदलकर रख दिया है।
आज की मीडिया, पूंजी, बाजार और सत्ता का पिछलग्गू बनकर रह गया है। इस कार्पोरेट मीडिया में एक टी.वी. चैनल या एक अखबार 150-200 करोड़ का माल लगता है, निवेश होता है और इस भारी निवेश की वसूली करोड़ों के विज्ञापन, खबरों की खरीद-फरोख्त कर की जाती है या दूसरे शब्दों में कहें तो यह खबरों के प्रबंधन का दौर है, न्यूज ट्रेडर का दौर है। खबरों के सौदागर अब खबरों का सौदा करते हैं सत्ता के साथ अपना नेक्सस बनाने के जुगाड़ में भिड़े रहते हैं। सत्ता की मीडिया के दौर में हाशिए के लोगों की आवाज आम दम तोड़ कर रह जाती हैं।
एक समय अखबारों का नारा था 'सबकी खबर ले सबकी खबर दें' उस खबर के दायरे में सब थे। लेकिन आज उस 'सब' की पड़ताल करने पर आए देखते हैं कि उस सब में कौन-कौन शामिल है और कौन-कौन बाहर है। क्या उसमें स्त्री, बच्चे और वृद्ध शामिल हैं? क्या उसमें दलित शामिल हैं? क्या उसमें आदिवासी शामिल हैं? क्या उसमें मुस्लिम शामिल हैं? क्या उसमें गांव-देहात शमिल है? क्या उसमें उत्तर पूर्व शामिल है? क्या उसमें हाशिए के लोग शामिल हैं? क्या उसमें आम जनता जनार्दन की आवाज शमिल है? हम पाएंगे कि इतनी बड़ी आबादी, इतना बड़ा वर्ग दूसरे शब्दों में कहें तो मास ही गायब है और बिना मास के मास मीडिया कैसा? आज सोशल मीडिया पर जो इतने बड़े पैमाने पर आम लोगों के द्वारा अभिव्यक्ति के नये प्लेटफार्म पर जाकर व्यापक एवं मास अभिव्यक्ति करना, इसी अंतराल के असंतोष का प्रगटीकरण है अथवा विस्फोट है। एक वैकल्पिक माध्यम को पाकर मास की सचित अनुभूति का सैलाव ही प्रकारान्तर से सोशल मीडिया पर बह निकला है। वह कितना सही और कितना गलत है, वो एक अलग मुद्दा है।
आज की मीडिया के समक्ष जो चुनौतियाँ और संकट है उसका कारण उसका जिम्मेदार बाहर की शक्तियां न होकर मीडिया के अपने भीतर की कमजोरियां हैं। अखबार की चुनौतियां बाहर से नहीं वरन् अपने अंदर से ही हैं। अंदर ही अंदर समाचार में से विचार को खत्म कर दिया गया, मुद्दों का निर्वासन कर दिया गया, जनता की आवाज की अनसुनी कर दी गयी, वंचितों के साथ वंचना की गई, ईमानदार पत्रकारिता के रास्ते को भुला दिया गया, गांव, देहात, खेत-खलिहान की सुध लेनी छोड़ दी, लोकतंत्र का चौथा प्रहरी न बनकर, प्रतिपक्ष की भूमिका छोड़ दी। समाचार मूल्य के रक्षार्थ सत्यता, निष्पक्षता, विश्वसनीयता, संतुलन, जन सरोकार, समग्रता, सामाजिक- राष्ट्रीय दायित्व बोध, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, न्याय के पक्ष में खड़े होने की बुनियादी पहचान ओर ईमानदारी का दामन छोड़ दिया है। वंचितों की, पीड़ितों की, शोषितों की आवाज एंव चीखें हमें सुनाई नहीं पड़ती हैं। जन सामान्य की धड़कन नहीं सुनाई पड़ती है। आखिर हो क्या गया है इस मीडिया को ? बाजार मीडिया का संग पाकर वह बीमारू मीडिया हो गया है। 'मिशन' 'प्रोफेशन' से कहीं दूर निकलकर वह एक धंधा बन गया है। आपको सर्वत्र विज्ञापन दिखेगा विचार नहीं। पहले समाचारों के बीच-बीच में विज्ञापन दिखता है और अब विज्ञापनों के बीच-बीच में समाचार ढूंढकर दिखता है। पहले टीवी पर न्यूज के बीच में ब्रेक होता था अब ब्रेक के बीच में न्यूज आता है। और न्यज भी कैसी उसकी भी बानगी देखिए । पहले आप न्यूज देखते थे अब न्यूज के साथ व्यूहज' देखते हैं। जो न्यूज पर चस्पाया जाता है चैनल और अखबारों के अपने निहितार्थ (विस्टेड इंट्रेस्ट) और जिसमें विचारधारात्मक जुड़ाव शामिल होता है। जिसमें चैनलों और अखबारों के आर्थिक हित और राजनीतिक हित जुड़े होते है। पत्रकार संपादक की खुशामद में लगा रहता है तो संपादक मालिकों के लिए न्यूज ब्रोकर का काम करता है। उसका काम होता है अपने पूंजीपति मालिक के लिए राज्यसभा का टिकट दिलवाने की जुगाड़ भिड़ाना, लॉबिग करना और खबरों की सौदेबाजी करना । ऐसी स्थिति में ईमानदार पत्रकारिता रही कहाँ ? बाजार, पैसा, राजनीति के खेल में पत्रकारिता भी शामिल हो गयी है, जो इनकी शर्तों पर चलती है, इनके इशारे पर जाचती है और अखबार महज एक उत्पाद बनकर रह गया है। जो जनता को उपभोक्ता मानकर खबर परोस रहा है।
आवाज एंव चीखें हमें सुनाई नहीं पड़ती हैं। जन सामान्य की धड़कन नहीं सुनाई पड़ती है। आखिर हो क्या गया है इस मीडिया को ? बाजार मीडिया का संग पाकर वह बीमारू मीडिया हो गया है। 'मिशन' 'प्रोफेशन' से कहीं दूर निकलकर वह एक धंधा बन गया है। आपको सर्वत्र विज्ञापन दिखेगा विचार नहीं। पहले समाचारों के बीच-बीच में विज्ञापन दिखता है और अब विज्ञापनों के बीच-बीच में समाचार ढूंढकर दिखता है। पहले टीवी पर न्यूज के बीच में ब्रेक होता था अब ब्रेक के बीच में न्यूज आता है। और न्यज भी कैसी उसकी भी बानगी देखिए । पहले आप न्यूज देखते थे अब न्यूज के साथ व्यूहज' देखते हैं। जो न्यूज पर चस्पाया जाता है चैनल और अखबारों के अपने निहितार्थ (विस्टेड इंट्रेस्ट) और जिसमें विचारधारात्मक जुड़ाव शामिल होता है। जिसमें चैनलों और अखबारों के आर्थिक हित और राजनीतिक हित जुड़े होते है। पत्रकार संपादक की खुशामद में लगा रहता है तो संपादक मालिकों के लिए न्यूज ब्रोकर का काम करता है। उसका काम होता है अपने पूंजीपति मालिक के लिए राज्यसभा का टिकट दिलवाने की जुगाड़ भिड़ाना, लॉबिग करना और खबरों की सौदेबाजी करना । ऐसी स्थिति में ईमानदार पत्रकारिता रही कहाँ ? बाजार, पैसा, राजनीति के खेल में पत्रकारिता भी शामिल हो गयी है, जो इनकी शर्तों पर चलती है, इनके इशारे पर जाचती है और अखबार महज एक उत्पाद बनकर रह गया है। जो जनता को उपभोक्ता मानकर खबर परोस रहा है।
राजनीति से लेकर शिक्षा, चिकित्सा, खनन, वकालत, प्रशासन, न्याय आदि के क्षेत्र में नोट बटोरने का जुनून सवार है तो अकेले पत्रकार से ही त्यागी तपस्वी, साधु-संत बनने की अपेक्षा क्यों ? किन्तु क्या दूसरों के पाप गिनाने से अपने पाप कम हो जाते हैं क्या? वह (+) और माइनस (-) बनाकर इक्वल टू (= ) के सिद्धांत का रोग आज भारतीय राजनीति से लेकर पत्रकारिता तक सबको लग गया है। कांग्रेस सुषमा स्वराज पर ललितगेट प्रकरणों में आरोप लगाती हैं तो सुषमा स्वराज बचाव में क्वात्रोची का नाम लेकर, उसके बहाने से कांग्रेस पर आरोप लगाकर अपने दाग छुड़ाने और अपना दामन पाक करने की कोशिश इसी प्लस (+) और माइनस (-) इक्वल टू () के सिद्धांत के सहारे करती है। यह सिद्धांत और यह तर्क मीडिया और राजनीति दोनों के लिए कवच-कुंडल का कार्य करती है। किन्तु कवच-कुंडल जब महाभारत के कर्ण के काम न आया तो हम इस सिद्धांत को कब तक ढोएंगे। तो क्या इस तर्क के आगे की सब कर रहे हैं तो हम भी करेंगे, सबको समर्पण कर देना चाहिए। इस हमाम में सब नंगे हैं तो हम भी होंगे। तो क्या पत्रकारिता महज धंधा है? तो फिर लोकतंत्र की चौथी आँख का क्या होगा? लोकतंत्र का चौथा प्रहरी भी लट में शामिल हो जाए, लूटने लग जाए तो लोकतंत्र और देश का क्या होगा? देश का तो चौथा हो जाएगा । विशेषकर तब जब और आस्था लोकतंत्र के चौथे प्रहरी होने के कारण ही करोड़ों लोगों ने बड़ी आस और आस्था से मीडिया को सिर पर बैठाया हो, उसे अपनी आंख का तारा बनाया हो, ताकि उनके सपने मीडिया में दिखे। उनके अरमान मीडिया के द्वारा पूरा हो सके। यह सपना आज भी उनकी आंखों में जिन्दा है।
लोगों के सपने तो आज भी जिंदा हैं लेकिन मीडिया भी जिंदा है, उसका अमूक प्रमाण है यह प्रश्न मीडिया के मानस को कितना मथता है, कितना सालता है, इसका उत्तर तो मीडिया - बिरादरी को अपने भीतर से ही खोजकर देना होगा। कहीं ऐसा न हो कि लिखने वाली स्याही से पत्रकारिता के मुँह पर कालिख लग जाए । 'दाग अच्छे हैं' सिद्धांत पर अपना दामन भी दागदार करने की होड़ और दौड़ हमें कहां ले जाकर छोड़ेगी, वह आत्ममंथन का प्रश्न है। समाचार और पत्रकारिता के मल्य के संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर की प्रासंगिक टिप्पणी का यहां सहज स्मरण हो रहा है-
“हमारा वह समय अभी पूरी तरह विस्मृत नहीं हुआ है जब पत्रकार सचमुच ईमानदारी से काम करते थे। तब पैसे की इतनी चकाचौंध नहीं थी । उन दिनों पाठकों ने कभी यह शिकवा नहीं किया कि हम पत्रकारों ने उनके विश्वास को तोड़ा है। आज मुझे लगता है हमारे देश में प्रतिबद्धता की कमी है। मूल्यों के प्रति दृढ़ता नहीं रही आदर्शवादिता और राष्ट्रीय सामाजिक दायित्व बोध का असर नहीं रहा। कई अखबारों के संपादक अब मालिकों की पी. आर. ओ बन गये हैं। अब ऐसी स्थिति में संपादक और पत्रकार दोनों देखते हैं जब हम दूसरों के लिए पी.आर.ओ. शिप का काम करते हैं, तो अपने लिए क्यों नहीं करें। और फिर वे भी पैसा कमाने लग जाते हैं। यानी जो वातावरण है वह अच्छी और स्वस्थ पत्रकारिता के प्रतिकूल है। लेकिन सोचिए, क्या हम भी इस रंग में रंग जाएं? यदि हम भी इस बहाव में बह गए, तो देश का क्या होगा?"
'देश का क्या होगा' से ही जुड़ा भविष्य है कि समाचार का क्या होगा, पत्रकार का क्या होगा? पत्रकारिता का क्या होगा? क्योंकि देश है तो सब है। इसलिए इस बिन्दु पर थोड़ा ब्रेक लेकर (अल्प विराम) सोचते हैं कि देश और अपने बचे-खुचे सम्मान की रक्षा के खातिर इस दिशा में सोचे। मूल्य की रक्षा के लिए विचार करें। और साथ ही अपने विचार की भी रक्षा करें। क्योंकि धीरे-धीरे विचारने की आदत छोड़ते छोड़ते हम धीरे-धीरे विचारने की शक्ति भी खोते जा रहे हैं। क्योंकि विचार हैं तो हम हैं, हम जीवित हैं। समाचार हैं, समाचार जीवित है। मूल्य है मूल्य जीवित और और हम जीवित है। हर जीवित चीज को अपना प्रमाण खुद ही देना पड़ता है।
- डॉ. मीना शर्मा

बुधवार, 9 अगस्त 2023

नूह मेवात की हिंसा का सच

अवधेश कुमार

नूह मेवात की हिंसा को जो भी गहराई से देखेगा वह चिंतित और भयभीत हो जाएगा। मैं दो साथियों सामाजिक कार्यकर्ता भारत रावत एवं जमात उलेमा ए हिंद के प्रमुख मौलाना सोहेब कासमी के साथ कर्फ्यू तथा भय के बीच उन सारे स्थानों पर गया जहां हिंसा हुई थी। क्षेत्र के कुछ लोगों से मिलने की कोशिश की, जिनसे हो पाई उनसे बातचीत कर स्थिति समझा। किसी भी धार्मिक यात्रा को लेकर इससे पहले इस तरह की हिंसा भारत में नहीं हुई थी। जो लोग उसे सामान्य तनाव या दो पक्षों के टकराव के रूप में देख रहे हैं उन्हें एक बार वहां जाकर स्वयं सच्चाई देखनी चाहिए। किसी भी हिंसा, तनाव या समस्या में जो सच है उसे छिपाने की कोशिश होगी तो न सच्चे दोषी पकड़े जाएंगे और न इनकी पुनरावृति की संभावनाओं को खत्म किया जा सकेगा। तो सच क्या है?

जलाभिषेक यात्रा नल्हर महादेव मंदिर से निकलकर फिरोजपुर झिरका तक जाने वाली थी। नल्हर महादेव मंदिर अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में है। वहां से निकलने का एक ही मार्ग है जो नूह शहर की ओर आती है।  आगे दो तरफ रास्ते फूटते हैं जिनमें एक  मेडिकल कॉलेज होते हुए नूंह शहर निकल जाती है और दूसरा सीधे नूंह शहर से मुख्य हाइवे तक। मंदिर से दूर तक बस्ती नहीं है। यात्रा निकलने के 50 गज दूर आपको वाहनों एवं अन्य सामग्रियों के जले हुए अवशेष दिखाई देने लगेंगे। पुलिस द्वारा जले हुए वाहनों के अवशेषों को पूरी तरह हटाने तथा सफाई करने के बावजूद काफी कुछ है जो बताता है कि हमला कितना भीषण रहा होगा। जब वहां कोई बस्ती है ही नहीं तो इतने वाहनों के जलने का कारण क्या हो सकता है?

पता चला कि यात्रा आगे बढ़ी, कुछ लोग आगे निकल गए, कुछ बीच में थे और बीच वाले से हमले शुरू हो गए थे।  लोगों को जान बचाने के लिए मंदिर की ओर ही वापस दौड़ना पड़ा। यात्रा में महिलाएं और बच्चे भी थे। पीछे पहाड़ से भी गोलियां चलाए जाने की बात बताई जा रही है। कुछ जो आगे निकल गए उन पर भी आगे हमले हुए । जिस अभिषेक को गोली मारने और गला काटने का समाचार आया वह थोड़ा आगे मेडिकल कॉलेज का चौक है। कोई भी यात्रा निकलती है तो कुछ लोग आगे मोटरसाइकिल या कार आदि से जाते हैं ताकि सड़क खाली कराकर यात्रा  निकलने की व्यवस्था की जाए। उसी में वह नौजवान आगे निकल गया था। वहां जाने पर समझ में आ जाता है कि मंदिर में जान बचाकर छिपे हुए लोगों को सुरक्षित निकालने में पुलिस को बहुत ज्यादा समय क्यों लगा होगा?

वास्तव में मंदिर के आगे खाली जगह या उससे आगे की बस्ती से पत्थरों, गोलियों के हमले तथा पुलिस के साथ मुकाबले इतने सघन थे कि किसी को ले जाना खतरे से भरा था। पुलिस ने कुछ घंटे हिंसक तत्वों को परास्त करने की कोशिश की लेकिन देर लगने पर फायरिंग कवर देते हुए थोड़ी-थोड़ी संख्या में पुलिस घेरे के बीच पुलिस वाहनों में धीरे-धीरे निकालना शुरू किया। इसमें देर रात हो गई। कर्फ़्यू और तनाव के कारण वहां नेताओं को तलाशना और मिलना कठिन था। शहर में आम आदमी पार्टी के नेता फखरुद्दीन अली अपने घर में मिले। उन्होंने कहा कि इस तरह धार्मिक यात्रा पर हमले की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पहले झड़प हुई ,पुलिस आई, उसने हवाई फायरिंग की, कुछ लाठियां चलाई लोग भाग जाते थे। इस बार पुलिस के साथ जिस ढंग से मोर्चाबंदी कर रहे थे, चारों तरफ हमले और आगजनी कर रहे थे उससे साफ लगता है कि पूरी प्लानिंग की गई थी। हालांकि उनका कहना था कि यह प्लानिंग हमारे मेवात में न होकर शायद राजस्थान के इलाके में हुई। नूंह जिला और पूरा मेवात एक ओर राजस्थान के अलवर से लगता है तो दूसरी ओर मथुरा, भरतपुर आदि जुड़ा है। दूसरे लोगों ने भी कहा कि यात्रा नूंह से निकलकर आगे जाती बड़कली तक पहुंच जाती तो कुछ हजार लोग मर सकते थे। ध्यान रखिए यात्रा सौ गज भी नहीं चल पाई।

नूंह शहर में भी हिंसा करने वाला समूह अलग-अलग दिशाओं में भी बंट गया, इस कारण भी मरने और घायल होने वालों की संख्या काफी कम रही। कुछ दुकानें लूटने लगे, जलाने लगे, तो कुछ बसों को रोककर लोगों को उतारकर उनमें आग लगाने लगे। नूंह साइबर थाने का दृश्य भी आपको बहुत कुछ समझा देगा। एक बस को तोड़फोड़ कर कब्जा किया गया और उसको चलाते हुए साइइबर थाने की दीवार तोड़ी गई , पुलिस की गाड़ियां चकनाचूर की गई। साफ लगता है कि हमलावरों का लक्ष्य साइबर थाने के रिकॉर्ड को खत्म करना था। मेवात पूरे देश में साइबर अपराध का सबसे बड़ा केंद्र है। पिछले दिनों ही वहां 300 से ज्यादा छापेमारी हुई, भारी संख्या में लोग पकड़े गए तथा ऐसी-ऐसी सामग्रियां बरामद हुई जो भौंचक करने वाली थी।

दूसरी ओर के कुछ वीडियो तनाव के कारण थे या यात्रा निकालने वालों ने तनाव की स्थिति पैदा की तो साइबर थाने पर हमले का कोई कारण नहीं होना चाहिए। सड़कों से चलते बसों से लोगों को उतार कर उनको अपमानित करना और उन बसों को जलाने का भी कारण नहीं हो सकता। अगर कुछ आपत्तिजनक या उत्तेजक था तो उसकी शिकायत पुलिस प्रशासन से होनी चाहिए न कि इतनी जगहों पर भीषण हमले। वहां सदर थाना और अलग पड़े जले हुए वाहनों का अवशेष देखें तो दंग रह जाएंगे। सामान्य कारों में तो लोहे के अलावा कुछ नहीं बचा है। बसों की स्थिति भी लगभग यही है। इस तरह वाहनों को जलाना बिल्कुल प्रशिक्षित व प्रोफेशनल लोगों का काम है। तात्कालिक गुस्से और उत्तेजना में वाहनों को थोड़ी क्षति पहुंच सकती है, धू-धू कर मिनटों में खाक नहीं किया जा सकता। यह बताता है कि बाजाब्ता तैयारी हुई, प्रशिक्षण किया गया, संसाधन जुटाने जुटाए गए। इतनी मात्रा में पेट्रोल मिनटों व घंटों में जमाकर वितरित नहीं किया जा सकता।  मंदिर से आगे वीरान में सीसीटीवी था नहीं कि हमलावर नजर आएं। आगे के कुछ वीडियो उपलब्ध हैं। कुछ भवनों को बुलडोजर से ध्वस्त किया गया, जिनसे पत्थर व अन्य सामग्रियां फेंकी जातीं दिखीं। लोगों ने उन छतों से पत्थर चलते, पेट्रोल बम फेंके जाते देखे। जिस सहारा होटल में सबसे ज्यादा पत्थर और बाकी चीजें मिली वह सदर थाने से कुछ गज की दूरी पर है। अरावली की पहाड़ियों से पत्थर काटे जाते हैं। उनको ढोने वाले डंपरों की संख्या काफी है इसलिए पत्थर कहीं आए तो सामान्यतः संदेह नहीं होता।

नूंह से 20 किलोमीटर दूर बड़कली की स्थिति भी भयावह थी। वहां नूंह जिला भाजपा के महासचिव की तेल मिल पर दोपहर हमला हुआ, उसे पूरी तरह जला दिया गया, वहां खड़ी दो गाड़ियां भी आग को समर्पित कर दी गई। लोगों ने बताया कि पुलिस 12 बजे रात के बाद वहां पहुंची। वहां 20-22 दुकानें जलीं हैं, जो एक ही समुदाय के लोगों की है। लोगों ने कहा कि हम अभी भी रात में जागकर डरते हुए अपनी दुकानों की रक्षा करते हैं, न जाने कब हमला हो जाए। वहां मुख्य चौक पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के कुछ जवान हैं, सुरक्षा के लिए पुलिस नहीं है। प्रश्न है कि उतनी दूर उन दुकानों को निशाना क्यों बनाया गया? उतने भीषण अग्निकांड के लिए सामग्रियां, उतनी संख्या में लोग अचानक तो नहीं आ सकते। नूंह में भी एक समुदाय की ही दुकानें लूटी गई,जलाई गई।

इस तरह आप पूरी हिंसा की एक तस्वीर बनाएं तो साफ दिख जाएगा कि इसके पीछे लंबे समय की तैयारी थी। बिना जगह-जगह बैठकों, लोगों को तैयार किए, उनको संसाधन उपलब्ध कराए तथा प्रशिक्षित किए इस तरह की हिंसा संभव नहीं है। घटनाएं कुछ लोग करते हैं और परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। मेवात भय व तनाव से गुजर रहा है। पुलिस प्रशासन की विफलता स्पष्ट है। दोपहर 12 बजे के थोड़े समय बाद यात्रा पर हमला हुआ। जो थोड़े पुलिस वाले साथ थे उन्हें जान बचानी पड़ी। लोग हमलों के बीच मंदिर की ओर भागने को विवश थे। पुलिस वहां 5 बजे के आसपास पहुंची है। पूरा शहर हमलावरों के नियंत्रण में था। यह स्थिति बदलनी चाहिए। जिन पर हमले हुए, जिनकी दुकानें जलाई गई, उन्हें तुरंत पूरी सरकारी मुआवजा मिले, उनके अंदर सुरक्षा का भाव उत्पन्न हो, हिंसा करने और करवाने वालों को महसूस हो कि उनके अपराध की सजा मिलनी निश्चित है । यह सब प्रशासन और सरकार का दायित्व है। इसके साथ राजनीतिक, गैर राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक समूहों भी आगे आए। दोनों समुदायों के बीच जाना, उनके अंदर के अविश्वास को कम करना तथा अतिवादी विचारों की ओर जा चुके युवाओं को वापस मुख्यधारा में लाना आवश्यक है। इसके लिए लंबे समय तक काम करना होगा।

अवधेश कुमार, ई-30 ,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208

बुधवार, 2 अगस्त 2023

विपक्षी सांसदों के मणिपुर दौरे के बाद

अवधेश कुमार


मणिपुर के दो दिवसीय दौरे पर गया 21 सदस्यीय विपक्षी आईएनडीआईए सांसदों के प्रतिनिधिमंडल के वक्तव्यों व विवरणों में ऐसा कुछ नहीं है जो पहले समाचार माध्यमों से हमारे आपके पास नहीं पहुंचे हों। कहने का तात्पर्य यह नहीं कि विपक्षी सांसदों का दौरा महत्वपूर्ण नहीं था। बिल्कुल महत्वपूर्ण था। जनप्रतिनिधि होने के नाते वहां जाकर सच्चाई को अपनी आंखों से देखना, समझना तथा जो कुछ समाधान के रास्ते नजर आए उसे देश ,सरकार के समक्ष रखना विपक्ष का भी दायित्व है। इस नाते देखें तो कहा जा सकता है कि विपक्षी सांसदों का दौरा बिल्कुल उपयुक्त था। विपक्षी सांसदों ने राज्यपाल अनुसुइया उइके से मुलाकात कर अपना ज्ञापन भी दिया। राज्यपाल को ज्ञापन देने का अर्थ है कि वह केंद्र सरकार तक भी पहुंच गया होगा। आखिर राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर ही प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। दिल्ली आने के बाद प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से भी मुलाकात कर अपनी बात रखी। इन सबके साथ विपक्ष का मूल स्वर यही है कि प्रधानमंत्री इस विषय पर बोलें। तो फिर बात आकर वही अटक गई है। प्रश्न है कि अब आगे क्या?

एक ओर आप मणिपुर की स्थिति का आकलन करें और दूसरी ओर संसद‌ न चलने दें तो रास्ता निकलेगा कैसे? सांसदों के दल ने राज्यपाल को जो ज्ञापन दिया उसके अनुसार 140 से अधिक मौतें हुई, 500 से अधिक लोग घायल हुए, 5000 से अधिक घर जला दिए गए तथा मैतेयी एवं कुकी दोनों समुदाय के 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। इन तथ्यों को कोई नकार नहीं सकता। उन्होंने यह भी लिखा है कि राहत शिविरों में स्थिति दयनीय है। प्राथमिकता के आधार पर बच्चों का विशेष ख्याल रखने की जरूरत है। विभिन्न स्ट्रीम के छात्र अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं जो राज्य और केंद्र सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए। इस तरह के सुझावों को स्वीकार करने में केंद्र और प्रदेश सरकार को समस्या नहीं हो सकती है। इस तरह के जातीय नस्ली संघर्ष में शांति, राहत तथा पुनर्वास अत्यंत कठिन होता है। हर संभव कोशिश करने के बावजूद राहत शिविरों में लोगों को सामान्य जीवन देना पूरी तरह संभव नहीं होता। तो इसके लिए जितनी कोशिश संभव है की जानी चाहिए। शेष बातें तो सरकार की आलोचना है जिन पर बहुत चर्चा करने की आवश्यकता नहीं। लेकिन अगर वाकई विपक्ष मणिपुर में शांति व्यवस्था स्थापित करने की आकांक्षा रखता है तथा यह चाहता है कि इस तरह की पुनरावृति भविष्य में नहीं हो तो उसे अपने दायित्व पर भी विचार करना चाहिए।

अगर राज्यपाल अनुसूया यूके ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने तथा सभी समुदायों के नेताओं से बात करने का सुझाव दिया है तो इसे स्वीकार करने में किसी को समस्या नहीं हो सकती है। मणिपुर का संकट निस्संदेह, राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट है। पर विपक्ष का यह कहना कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल जाए यह गले नहीं उतर सकता। जाहिर है इसमें मणिपुर की चिंता कम और आगामी लोकसभा चुनाव की राजनीति ज्यादा दिखती है। वैसे तो 18 जुलाई को बेंगलुरु में आईएनडीआईए के गठन के साथ ही स्पष्ट हो गया था कि आगामी संसद में विपक्ष आक्रामक भूमिका निभाएगा तथा हर स्तर पर यह संदेश देने की कोशिश करेगा कि वे एकजुट हैं और नरेंद्र मोदी सरकार के विरुद्ध प्रखरता से हमले कर रहे हैं। संसद के अधिवेशन में यही दिख रहा है। प्रधानमंत्री बोलें इस इस एक जिद के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही लगातार बाधित है। सच यह है कि चाहे कश्मीर हो या पूर्वोत्तर हिंसा और अशांति के बीच सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों का कभी भी प्रधानमंत्री ने नेतृत्व किया हो इसका रिकॉर्ड नहीं है। 

अगर आईएनडीआईए के नेता इसकी मांग कर रहे हैं तो उन्हें बताना चाहिए कि इसके पूर्व कब प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हिंसा में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल गया? मणिपुर में भाजपा की सरकार है और केंद्र में भी तो निश्चित रूप से प्रदेश की स्थिति को लेकर उससे प्रश्न किया जाएगा। विपक्ष कटघरे में खड़ा करेगा यह भी स्वाभाविक है। सरकार उत्तर दे इसमें भी दो मत नहीं हो सकता किंतु प्रधानमंत्री ही उत्तर दें इसका अर्थ तो यही है कि आपको सरकार के वक्तव्य से ज्यादा अपनी राजनीति साधनी है। कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर राजनीति से ऊपर उठकर सभी दलों को व्यवहार करना चाहिए। देश की एकता अखंडता तथा आंतरिक अशांति व संघर्ष के मामले पर अगर राजनीतिक एकता नहीं होगी तो किस पर होगी?

यह तो संभव नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मणिपुर पर कभी बोलेंगे ही नहीं। इससे कोई इनकार कर नहीं सकता कि मणिपुर में स्थिति धीरे-धीरे शांत हो रही है। सरकार ने कुकी और मैतेयी दोनों समुदायों के नेताओं के साथ बातचीत शुरू की है और इसके कई दौर संपन्न हो चुके हैं। सेना और केंद्रीय सशस्त्र बल वालों ने दोनों समुदायों के बीच कुछ बफर जोन भी स्थापित कर दिए हैं। मर्चुअरी में पड़े मृतकों के शवों के अंतिम संस्कार किए जा रहे हैं। थोड़े समय में जलाए गए, उजाड़े गए घरों के पुनर्निर्माण की भी शुरुआत होगी। तोड़े गए ध्वस्त किए गए सड़कें और पुल भी बनने शुरू होंगे। सुरक्षा बढ़ने के साथ यातायात की शुरुआत भी होगी। जहां-जहां संभव है विद्यालय खोले गए हैं। कहने का तात्पर्य है कि मणिपुर को सामान्य स्थिति में लाने की सरकारी स्तर पर कोशिशें जारी है। सरकार ने तात्कालिक और दूरगामी लक्ष्य बनाया होगा। इसमें एक सोपान तक पहुंचने के बाद अब प्रधानमंत्री का वक्तव्य देना उचित होगा। यही मणिपुर पूरे पूर्वोत्तर तथा देश के हित में होगा।

हमने देखा कि मिजोरम जैसे राज्य में महिलाओं के विरुद्ध माहौल बना। कुकी समुदाय के समर्थन में आयोजित बंद और प्रदर्शन में स्वयं वहां के मुख्यमंत्री तक शामिल हुए। एक पहलू बताने के लिए पर्याप्त है कि अगर मणिपुर जैसे संवेदनशील मामले पर संयम और संतुलन के साथ व्यवहार नहीं किया जाए तो क्या हो सकता है।

विपक्ष ने कई पहलुओं पर चर्चा नहीं की 5000 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके हैं तथा करीब 7000 लोग गिरफ्तार हैं। दूसरे या झूठ है कि केंद्र ने मणिपुर को उसके हालात पर छोड़ दिया। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय 3 सप्ताह से ज्यादा वही रहे और उनके साथ अनेक अधिकारी थे। क्या मणिपुर की स्थिति दुरुस्त करने के लिए प्रधानमंत्री की भूमिका होगी ही नहीं? ऐसा सोचने वालों पर हंसने के सिवा कुछ नहीं किया जा सकता। म्यानमार और बांग्लादेश के ईसाई कूकियों ने हथियार उठाकर देश तोड़ने का अभियान चलाया और कुछ अभी तक संलिप्त हैं। स्वयं यूपीए सरकार ने इनके साथ युद्ध विराम समझौता किया बावजूद सभी ने हथियार नहीं डाले। इसी तरह कूकी महिलाओं के साथ घृणित दुर्व्यवहार के वीडियो जारी करने के पीछे भी षड्यंत्र की परतें खुल रही है। इन सबको अस्वीकार कर देंगे त मणिपुर क्या पूर्वोत्तर की समस्या का समाधान नहीं होगा। फरवरी 2021 के बाद केवल मिजोरम में 30,000 से ज्यादा म्यानमार के लोग आ चुके हैं। केंद्र की पहल पर अब उनके बायोमेट्रिक पहचान की प्रक्रिया शुरू हुई है। 

मैतेयी समुदाय ने भारत से अलग होने का आंदोलन कभी नहीं किया। इसलिए दोनों को एक ही तराजू पर रख कर नहीं देखा जा सकता। किसी समस्या का समाधान तभी होगा जब उसकी वास्तविकता स्वीकार किया जाए। मणिपुर में अफस्पा हटाने का आंदोलन कांग्रेस के शासनकाल में ही आरंभ हुआ। सत्य है कि भाजपा सरकार ने पूरे पूर्वोत्तर से धीरे-धीरे अफस्पा को हटाया। मणिपुर में इस कारण भी समस्याएं आईं क्योंकि अफस्पा हटाने के बाद सेना के अनेक पोस्ट खत्म हो गए थे। इस संघर्ष में उन्हें फिर से खड़ा करना भी एक चुनौती थी। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य कि विपक्ष 2024 की दृष्टि से अपनी राजनीति करें पर मणिपुर की सच्चाई को स्वीकार कर उसके हल करने की दिशा में भूमिका निभाए। संसद को ठप्प करना यह भूमिका नहीं हो सकता। अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिए जाने के बाद लोकसभा अध्यक्ष के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए। आप अपनी बात अविश्वास प्रस्ताव के दौरान रखिए। उसके पहले मणिपुर की दिल दहलाने वाली घटनाओं का संज्ञान लेकर वास्तविकता को समझना तथा उसके तथा शांति के लिए अपील व भूमिका निभाना ही किसी भी भारतीय का कर्तव्य हो सकता है।

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