मंगलवार, 15 अगस्त 2023

शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए व अमनदूत एनजीओ ने ध्वजारोहण कर मनाया 77वां स्वतंत्रता दिवस, तिरंगा फहराकर दिया शांति का संदेश

 मो. रियाज़

नई दिल्ली। इस वर्ष हमारा देश आज़ादी की 76वीं वर्षगांठ मना रहा है। 15 अगस्त 1947 को हमें अंग्रेजों के चंगुल से आजादी मिली थी। 15 अगस्त के दिन हर साल भारत के प्रधानमंत्री दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर तिरंगा फहराने के बाद देश को संबोधित करते हैं। स्कूलों व सरकारी दफ्तरों आदि जगहों पर भी तिरंगा फहराया जाता है। राष्ट्र गान गाकर तिरंगे को सलामी दी जाती है। इसके बाद रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इसी मौके पर अमनदूत एनजीओ व शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के ऑफिस के पास सादगी से आज़ादी की 76वीं वर्षगांठ मनाई गई।
अमनदूत एनजीओ व शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन ने ध्वजारोहण कर लोगों को स्वतंत्रता दिवस की 76वीं वर्षगांठ पर संबोधित करते हुए कहा कि आज हम सभी यहां आजादी का जश्न मनाने के लिए इकट्ठा हुए हैं। स्वतंत्रता दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है। हमारा देश 1857 से लेकर 1947 तक अंग्रेजों का गुलाम रहा था। 15 अगस्त 1947 के दिन हमें आजादी मिलने के बाद हम स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में घोषित हुए थे। तभी से भारतवासी इस दिन को "स्वतंत्रता दिवस" के रूप में बहुत ही धूम-धाम और हर्षोउल्लास से मनाते है।
उन्होंने आगे बताया कि अंग्रेजों से आजादी दिलाने में कई स्वतंत्रता सेनानियों ने सालों तक संघर्ष किया था। इस संघर्ष की शुरुआत तब से हुई जब मंगल पांडे को अंग्रेजों ने गोली मारी थी। तभी से देश में आजादी के लिए लड़ाई शुरू हो गई थी। इसके बाद तो महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बाल गंगाधर तिलक, लोक मान्य तिलक, लाला लाजपत राय और खुदीराम बोस जैसे सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया। इस संघर्ष में सबसे अहम योगदान महात्मा गांधी का माना जाता है। उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए सत्याग्रह आंदोलन चलाया और कई बार तो उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और समय-समय पर अपने आंदोलनों के जरिए अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। 
 हमारा देश आज़ादी की 76वीं वर्षगांठ मना रहा है और इस दौरान देश हर मोर्चे पर दुनिया भर में अपनी धाक जमा चुका है। साइंस, टेक्नोलॉजी, आर्थिक, कृषि, शिक्षा, साहित्य, खेल समेत तमाम मोर्चों पर भारत बहुत तरक्की कर चुका है। परमाणु क्षमता संपन्न देश भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल कर चुका है। विकास के हर क्षेत्र में भारत बहुत आगे बढ़ चुका है। दुनिया भारत की ओर देख रही है।
इस अवसर पर ध्वजारोहण के बाद लोगों में मिठाई भी बांटी गई। इस मौके पर अमनदूत एनजीओ व शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के सदस्य व आम जनता मौजूद थी।

 


सोमवार, 14 अगस्त 2023

समाचार में मूल्य किस चिड़िया का नाम है?

 डॉ. मीना शर्मा

जमाना बदल गया है। मीडिया बदल गयी है और मूल्य.. मूल्य का क्या है? मूल्य किस चिड़िया का नाम है। इस चिड़िया का नाम आप यदि आप के बड़े - बड़े पत्रकार और संपादक के सामने लेंगे और इस चिड़िया का अता-पता पूछेंगे तो वो एक बार आपको ऊपर से नीचे भौंह चढ़ाकर विस्मय भरी नजर से देखेंगे और मन-ही-मन कहेंगे, ऊल्लू है क्या, कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहा हैं, लगता है पगला गया है, 'क्या बकवास है' वगैरह-वगैरह। तो क्या सचमुच जमाना बदल गया है, जिसमें मूल्य का नाम लेते ही उसे पागलपन मान लिया जाता हो, तो आप सोचेंगे कि क्या यह वाकई बेमानी वाला प्रश्न है जो सबको हैरानी में डाल देता है। तब ऐसी स्थिति में आज की मीडिया के वर्तमान परिदृश्य के बारे में सहज परिकल्पना की जा सकती है।
बदले-बदले से अन्दाज नजर आते हैं, बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं, कभी था वो एक जमाने में जन सरोकार अब तो समाचार के कारोबार नजर आते हैं। अब तो जनता का अखबार बाजार का अखबार बनकर रह गया है। आज की मीडिया कॉर्पोरेट मीडिया है। मीडिया के इस कार्पोरेट कल्चर ने उसे बाजार कल्चर ने पत्रकारिता के स्वरूप, पत्रकारिता के तौर-तरीके, पत्रकारिता के सिद्धांत और पत्रकारिता के मूल्य सब कुछ बदल कर रख दिया है। पत्रकारिता के चरित्र को बदलकर रख दिया है।
आज की मीडिया, पूंजी, बाजार और सत्ता का पिछलग्गू बनकर रह गया है। इस कार्पोरेट मीडिया में एक टी.वी. चैनल या एक अखबार 150-200 करोड़ का माल लगता है, निवेश होता है और इस भारी निवेश की वसूली करोड़ों के विज्ञापन, खबरों की खरीद-फरोख्त कर की जाती है या दूसरे शब्दों में कहें तो यह खबरों के प्रबंधन का दौर है, न्यूज ट्रेडर का दौर है। खबरों के सौदागर अब खबरों का सौदा करते हैं सत्ता के साथ अपना नेक्सस बनाने के जुगाड़ में भिड़े रहते हैं। सत्ता की मीडिया के दौर में हाशिए के लोगों की आवाज आम दम तोड़ कर रह जाती हैं।
एक समय अखबारों का नारा था 'सबकी खबर ले सबकी खबर दें' उस खबर के दायरे में सब थे। लेकिन आज उस 'सब' की पड़ताल करने पर आए देखते हैं कि उस सब में कौन-कौन शामिल है और कौन-कौन बाहर है। क्या उसमें स्त्री, बच्चे और वृद्ध शामिल हैं? क्या उसमें दलित शामिल हैं? क्या उसमें आदिवासी शामिल हैं? क्या उसमें मुस्लिम शामिल हैं? क्या उसमें गांव-देहात शमिल है? क्या उसमें उत्तर पूर्व शामिल है? क्या उसमें हाशिए के लोग शामिल हैं? क्या उसमें आम जनता जनार्दन की आवाज शमिल है? हम पाएंगे कि इतनी बड़ी आबादी, इतना बड़ा वर्ग दूसरे शब्दों में कहें तो मास ही गायब है और बिना मास के मास मीडिया कैसा? आज सोशल मीडिया पर जो इतने बड़े पैमाने पर आम लोगों के द्वारा अभिव्यक्ति के नये प्लेटफार्म पर जाकर व्यापक एवं मास अभिव्यक्ति करना, इसी अंतराल के असंतोष का प्रगटीकरण है अथवा विस्फोट है। एक वैकल्पिक माध्यम को पाकर मास की सचित अनुभूति का सैलाव ही प्रकारान्तर से सोशल मीडिया पर बह निकला है। वह कितना सही और कितना गलत है, वो एक अलग मुद्दा है।
आज की मीडिया के समक्ष जो चुनौतियाँ और संकट है उसका कारण उसका जिम्मेदार बाहर की शक्तियां न होकर मीडिया के अपने भीतर की कमजोरियां हैं। अखबार की चुनौतियां बाहर से नहीं वरन् अपने अंदर से ही हैं। अंदर ही अंदर समाचार में से विचार को खत्म कर दिया गया, मुद्दों का निर्वासन कर दिया गया, जनता की आवाज की अनसुनी कर दी गयी, वंचितों के साथ वंचना की गई, ईमानदार पत्रकारिता के रास्ते को भुला दिया गया, गांव, देहात, खेत-खलिहान की सुध लेनी छोड़ दी, लोकतंत्र का चौथा प्रहरी न बनकर, प्रतिपक्ष की भूमिका छोड़ दी। समाचार मूल्य के रक्षार्थ सत्यता, निष्पक्षता, विश्वसनीयता, संतुलन, जन सरोकार, समग्रता, सामाजिक- राष्ट्रीय दायित्व बोध, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, न्याय के पक्ष में खड़े होने की बुनियादी पहचान ओर ईमानदारी का दामन छोड़ दिया है। वंचितों की, पीड़ितों की, शोषितों की आवाज एंव चीखें हमें सुनाई नहीं पड़ती हैं। जन सामान्य की धड़कन नहीं सुनाई पड़ती है। आखिर हो क्या गया है इस मीडिया को ? बाजार मीडिया का संग पाकर वह बीमारू मीडिया हो गया है। 'मिशन' 'प्रोफेशन' से कहीं दूर निकलकर वह एक धंधा बन गया है। आपको सर्वत्र विज्ञापन दिखेगा विचार नहीं। पहले समाचारों के बीच-बीच में विज्ञापन दिखता है और अब विज्ञापनों के बीच-बीच में समाचार ढूंढकर दिखता है। पहले टीवी पर न्यूज के बीच में ब्रेक होता था अब ब्रेक के बीच में न्यूज आता है। और न्यज भी कैसी उसकी भी बानगी देखिए । पहले आप न्यूज देखते थे अब न्यूज के साथ व्यूहज' देखते हैं। जो न्यूज पर चस्पाया जाता है चैनल और अखबारों के अपने निहितार्थ (विस्टेड इंट्रेस्ट) और जिसमें विचारधारात्मक जुड़ाव शामिल होता है। जिसमें चैनलों और अखबारों के आर्थिक हित और राजनीतिक हित जुड़े होते है। पत्रकार संपादक की खुशामद में लगा रहता है तो संपादक मालिकों के लिए न्यूज ब्रोकर का काम करता है। उसका काम होता है अपने पूंजीपति मालिक के लिए राज्यसभा का टिकट दिलवाने की जुगाड़ भिड़ाना, लॉबिग करना और खबरों की सौदेबाजी करना । ऐसी स्थिति में ईमानदार पत्रकारिता रही कहाँ ? बाजार, पैसा, राजनीति के खेल में पत्रकारिता भी शामिल हो गयी है, जो इनकी शर्तों पर चलती है, इनके इशारे पर जाचती है और अखबार महज एक उत्पाद बनकर रह गया है। जो जनता को उपभोक्ता मानकर खबर परोस रहा है।
आवाज एंव चीखें हमें सुनाई नहीं पड़ती हैं। जन सामान्य की धड़कन नहीं सुनाई पड़ती है। आखिर हो क्या गया है इस मीडिया को ? बाजार मीडिया का संग पाकर वह बीमारू मीडिया हो गया है। 'मिशन' 'प्रोफेशन' से कहीं दूर निकलकर वह एक धंधा बन गया है। आपको सर्वत्र विज्ञापन दिखेगा विचार नहीं। पहले समाचारों के बीच-बीच में विज्ञापन दिखता है और अब विज्ञापनों के बीच-बीच में समाचार ढूंढकर दिखता है। पहले टीवी पर न्यूज के बीच में ब्रेक होता था अब ब्रेक के बीच में न्यूज आता है। और न्यज भी कैसी उसकी भी बानगी देखिए । पहले आप न्यूज देखते थे अब न्यूज के साथ व्यूहज' देखते हैं। जो न्यूज पर चस्पाया जाता है चैनल और अखबारों के अपने निहितार्थ (विस्टेड इंट्रेस्ट) और जिसमें विचारधारात्मक जुड़ाव शामिल होता है। जिसमें चैनलों और अखबारों के आर्थिक हित और राजनीतिक हित जुड़े होते है। पत्रकार संपादक की खुशामद में लगा रहता है तो संपादक मालिकों के लिए न्यूज ब्रोकर का काम करता है। उसका काम होता है अपने पूंजीपति मालिक के लिए राज्यसभा का टिकट दिलवाने की जुगाड़ भिड़ाना, लॉबिग करना और खबरों की सौदेबाजी करना । ऐसी स्थिति में ईमानदार पत्रकारिता रही कहाँ ? बाजार, पैसा, राजनीति के खेल में पत्रकारिता भी शामिल हो गयी है, जो इनकी शर्तों पर चलती है, इनके इशारे पर जाचती है और अखबार महज एक उत्पाद बनकर रह गया है। जो जनता को उपभोक्ता मानकर खबर परोस रहा है।
राजनीति से लेकर शिक्षा, चिकित्सा, खनन, वकालत, प्रशासन, न्याय आदि के क्षेत्र में नोट बटोरने का जुनून सवार है तो अकेले पत्रकार से ही त्यागी तपस्वी, साधु-संत बनने की अपेक्षा क्यों ? किन्तु क्या दूसरों के पाप गिनाने से अपने पाप कम हो जाते हैं क्या? वह (+) और माइनस (-) बनाकर इक्वल टू (= ) के सिद्धांत का रोग आज भारतीय राजनीति से लेकर पत्रकारिता तक सबको लग गया है। कांग्रेस सुषमा स्वराज पर ललितगेट प्रकरणों में आरोप लगाती हैं तो सुषमा स्वराज बचाव में क्वात्रोची का नाम लेकर, उसके बहाने से कांग्रेस पर आरोप लगाकर अपने दाग छुड़ाने और अपना दामन पाक करने की कोशिश इसी प्लस (+) और माइनस (-) इक्वल टू () के सिद्धांत के सहारे करती है। यह सिद्धांत और यह तर्क मीडिया और राजनीति दोनों के लिए कवच-कुंडल का कार्य करती है। किन्तु कवच-कुंडल जब महाभारत के कर्ण के काम न आया तो हम इस सिद्धांत को कब तक ढोएंगे। तो क्या इस तर्क के आगे की सब कर रहे हैं तो हम भी करेंगे, सबको समर्पण कर देना चाहिए। इस हमाम में सब नंगे हैं तो हम भी होंगे। तो क्या पत्रकारिता महज धंधा है? तो फिर लोकतंत्र की चौथी आँख का क्या होगा? लोकतंत्र का चौथा प्रहरी भी लट में शामिल हो जाए, लूटने लग जाए तो लोकतंत्र और देश का क्या होगा? देश का तो चौथा हो जाएगा । विशेषकर तब जब और आस्था लोकतंत्र के चौथे प्रहरी होने के कारण ही करोड़ों लोगों ने बड़ी आस और आस्था से मीडिया को सिर पर बैठाया हो, उसे अपनी आंख का तारा बनाया हो, ताकि उनके सपने मीडिया में दिखे। उनके अरमान मीडिया के द्वारा पूरा हो सके। यह सपना आज भी उनकी आंखों में जिन्दा है।
लोगों के सपने तो आज भी जिंदा हैं लेकिन मीडिया भी जिंदा है, उसका अमूक प्रमाण है यह प्रश्न मीडिया के मानस को कितना मथता है, कितना सालता है, इसका उत्तर तो मीडिया - बिरादरी को अपने भीतर से ही खोजकर देना होगा। कहीं ऐसा न हो कि लिखने वाली स्याही से पत्रकारिता के मुँह पर कालिख लग जाए । 'दाग अच्छे हैं' सिद्धांत पर अपना दामन भी दागदार करने की होड़ और दौड़ हमें कहां ले जाकर छोड़ेगी, वह आत्ममंथन का प्रश्न है। समाचार और पत्रकारिता के मल्य के संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर की प्रासंगिक टिप्पणी का यहां सहज स्मरण हो रहा है-
“हमारा वह समय अभी पूरी तरह विस्मृत नहीं हुआ है जब पत्रकार सचमुच ईमानदारी से काम करते थे। तब पैसे की इतनी चकाचौंध नहीं थी । उन दिनों पाठकों ने कभी यह शिकवा नहीं किया कि हम पत्रकारों ने उनके विश्वास को तोड़ा है। आज मुझे लगता है हमारे देश में प्रतिबद्धता की कमी है। मूल्यों के प्रति दृढ़ता नहीं रही आदर्शवादिता और राष्ट्रीय सामाजिक दायित्व बोध का असर नहीं रहा। कई अखबारों के संपादक अब मालिकों की पी. आर. ओ बन गये हैं। अब ऐसी स्थिति में संपादक और पत्रकार दोनों देखते हैं जब हम दूसरों के लिए पी.आर.ओ. शिप का काम करते हैं, तो अपने लिए क्यों नहीं करें। और फिर वे भी पैसा कमाने लग जाते हैं। यानी जो वातावरण है वह अच्छी और स्वस्थ पत्रकारिता के प्रतिकूल है। लेकिन सोचिए, क्या हम भी इस रंग में रंग जाएं? यदि हम भी इस बहाव में बह गए, तो देश का क्या होगा?"
'देश का क्या होगा' से ही जुड़ा भविष्य है कि समाचार का क्या होगा, पत्रकार का क्या होगा? पत्रकारिता का क्या होगा? क्योंकि देश है तो सब है। इसलिए इस बिन्दु पर थोड़ा ब्रेक लेकर (अल्प विराम) सोचते हैं कि देश और अपने बचे-खुचे सम्मान की रक्षा के खातिर इस दिशा में सोचे। मूल्य की रक्षा के लिए विचार करें। और साथ ही अपने विचार की भी रक्षा करें। क्योंकि धीरे-धीरे विचारने की आदत छोड़ते छोड़ते हम धीरे-धीरे विचारने की शक्ति भी खोते जा रहे हैं। क्योंकि विचार हैं तो हम हैं, हम जीवित हैं। समाचार हैं, समाचार जीवित है। मूल्य है मूल्य जीवित और और हम जीवित है। हर जीवित चीज को अपना प्रमाण खुद ही देना पड़ता है।
- डॉ. मीना शर्मा

बुधवार, 9 अगस्त 2023

नूह मेवात की हिंसा का सच

अवधेश कुमार

नूह मेवात की हिंसा को जो भी गहराई से देखेगा वह चिंतित और भयभीत हो जाएगा। मैं दो साथियों सामाजिक कार्यकर्ता भारत रावत एवं जमात उलेमा ए हिंद के प्रमुख मौलाना सोहेब कासमी के साथ कर्फ्यू तथा भय के बीच उन सारे स्थानों पर गया जहां हिंसा हुई थी। क्षेत्र के कुछ लोगों से मिलने की कोशिश की, जिनसे हो पाई उनसे बातचीत कर स्थिति समझा। किसी भी धार्मिक यात्रा को लेकर इससे पहले इस तरह की हिंसा भारत में नहीं हुई थी। जो लोग उसे सामान्य तनाव या दो पक्षों के टकराव के रूप में देख रहे हैं उन्हें एक बार वहां जाकर स्वयं सच्चाई देखनी चाहिए। किसी भी हिंसा, तनाव या समस्या में जो सच है उसे छिपाने की कोशिश होगी तो न सच्चे दोषी पकड़े जाएंगे और न इनकी पुनरावृति की संभावनाओं को खत्म किया जा सकेगा। तो सच क्या है?

जलाभिषेक यात्रा नल्हर महादेव मंदिर से निकलकर फिरोजपुर झिरका तक जाने वाली थी। नल्हर महादेव मंदिर अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में है। वहां से निकलने का एक ही मार्ग है जो नूह शहर की ओर आती है।  आगे दो तरफ रास्ते फूटते हैं जिनमें एक  मेडिकल कॉलेज होते हुए नूंह शहर निकल जाती है और दूसरा सीधे नूंह शहर से मुख्य हाइवे तक। मंदिर से दूर तक बस्ती नहीं है। यात्रा निकलने के 50 गज दूर आपको वाहनों एवं अन्य सामग्रियों के जले हुए अवशेष दिखाई देने लगेंगे। पुलिस द्वारा जले हुए वाहनों के अवशेषों को पूरी तरह हटाने तथा सफाई करने के बावजूद काफी कुछ है जो बताता है कि हमला कितना भीषण रहा होगा। जब वहां कोई बस्ती है ही नहीं तो इतने वाहनों के जलने का कारण क्या हो सकता है?

पता चला कि यात्रा आगे बढ़ी, कुछ लोग आगे निकल गए, कुछ बीच में थे और बीच वाले से हमले शुरू हो गए थे।  लोगों को जान बचाने के लिए मंदिर की ओर ही वापस दौड़ना पड़ा। यात्रा में महिलाएं और बच्चे भी थे। पीछे पहाड़ से भी गोलियां चलाए जाने की बात बताई जा रही है। कुछ जो आगे निकल गए उन पर भी आगे हमले हुए । जिस अभिषेक को गोली मारने और गला काटने का समाचार आया वह थोड़ा आगे मेडिकल कॉलेज का चौक है। कोई भी यात्रा निकलती है तो कुछ लोग आगे मोटरसाइकिल या कार आदि से जाते हैं ताकि सड़क खाली कराकर यात्रा  निकलने की व्यवस्था की जाए। उसी में वह नौजवान आगे निकल गया था। वहां जाने पर समझ में आ जाता है कि मंदिर में जान बचाकर छिपे हुए लोगों को सुरक्षित निकालने में पुलिस को बहुत ज्यादा समय क्यों लगा होगा?

वास्तव में मंदिर के आगे खाली जगह या उससे आगे की बस्ती से पत्थरों, गोलियों के हमले तथा पुलिस के साथ मुकाबले इतने सघन थे कि किसी को ले जाना खतरे से भरा था। पुलिस ने कुछ घंटे हिंसक तत्वों को परास्त करने की कोशिश की लेकिन देर लगने पर फायरिंग कवर देते हुए थोड़ी-थोड़ी संख्या में पुलिस घेरे के बीच पुलिस वाहनों में धीरे-धीरे निकालना शुरू किया। इसमें देर रात हो गई। कर्फ़्यू और तनाव के कारण वहां नेताओं को तलाशना और मिलना कठिन था। शहर में आम आदमी पार्टी के नेता फखरुद्दीन अली अपने घर में मिले। उन्होंने कहा कि इस तरह धार्मिक यात्रा पर हमले की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पहले झड़प हुई ,पुलिस आई, उसने हवाई फायरिंग की, कुछ लाठियां चलाई लोग भाग जाते थे। इस बार पुलिस के साथ जिस ढंग से मोर्चाबंदी कर रहे थे, चारों तरफ हमले और आगजनी कर रहे थे उससे साफ लगता है कि पूरी प्लानिंग की गई थी। हालांकि उनका कहना था कि यह प्लानिंग हमारे मेवात में न होकर शायद राजस्थान के इलाके में हुई। नूंह जिला और पूरा मेवात एक ओर राजस्थान के अलवर से लगता है तो दूसरी ओर मथुरा, भरतपुर आदि जुड़ा है। दूसरे लोगों ने भी कहा कि यात्रा नूंह से निकलकर आगे जाती बड़कली तक पहुंच जाती तो कुछ हजार लोग मर सकते थे। ध्यान रखिए यात्रा सौ गज भी नहीं चल पाई।

नूंह शहर में भी हिंसा करने वाला समूह अलग-अलग दिशाओं में भी बंट गया, इस कारण भी मरने और घायल होने वालों की संख्या काफी कम रही। कुछ दुकानें लूटने लगे, जलाने लगे, तो कुछ बसों को रोककर लोगों को उतारकर उनमें आग लगाने लगे। नूंह साइबर थाने का दृश्य भी आपको बहुत कुछ समझा देगा। एक बस को तोड़फोड़ कर कब्जा किया गया और उसको चलाते हुए साइइबर थाने की दीवार तोड़ी गई , पुलिस की गाड़ियां चकनाचूर की गई। साफ लगता है कि हमलावरों का लक्ष्य साइबर थाने के रिकॉर्ड को खत्म करना था। मेवात पूरे देश में साइबर अपराध का सबसे बड़ा केंद्र है। पिछले दिनों ही वहां 300 से ज्यादा छापेमारी हुई, भारी संख्या में लोग पकड़े गए तथा ऐसी-ऐसी सामग्रियां बरामद हुई जो भौंचक करने वाली थी।

दूसरी ओर के कुछ वीडियो तनाव के कारण थे या यात्रा निकालने वालों ने तनाव की स्थिति पैदा की तो साइबर थाने पर हमले का कोई कारण नहीं होना चाहिए। सड़कों से चलते बसों से लोगों को उतार कर उनको अपमानित करना और उन बसों को जलाने का भी कारण नहीं हो सकता। अगर कुछ आपत्तिजनक या उत्तेजक था तो उसकी शिकायत पुलिस प्रशासन से होनी चाहिए न कि इतनी जगहों पर भीषण हमले। वहां सदर थाना और अलग पड़े जले हुए वाहनों का अवशेष देखें तो दंग रह जाएंगे। सामान्य कारों में तो लोहे के अलावा कुछ नहीं बचा है। बसों की स्थिति भी लगभग यही है। इस तरह वाहनों को जलाना बिल्कुल प्रशिक्षित व प्रोफेशनल लोगों का काम है। तात्कालिक गुस्से और उत्तेजना में वाहनों को थोड़ी क्षति पहुंच सकती है, धू-धू कर मिनटों में खाक नहीं किया जा सकता। यह बताता है कि बाजाब्ता तैयारी हुई, प्रशिक्षण किया गया, संसाधन जुटाने जुटाए गए। इतनी मात्रा में पेट्रोल मिनटों व घंटों में जमाकर वितरित नहीं किया जा सकता।  मंदिर से आगे वीरान में सीसीटीवी था नहीं कि हमलावर नजर आएं। आगे के कुछ वीडियो उपलब्ध हैं। कुछ भवनों को बुलडोजर से ध्वस्त किया गया, जिनसे पत्थर व अन्य सामग्रियां फेंकी जातीं दिखीं। लोगों ने उन छतों से पत्थर चलते, पेट्रोल बम फेंके जाते देखे। जिस सहारा होटल में सबसे ज्यादा पत्थर और बाकी चीजें मिली वह सदर थाने से कुछ गज की दूरी पर है। अरावली की पहाड़ियों से पत्थर काटे जाते हैं। उनको ढोने वाले डंपरों की संख्या काफी है इसलिए पत्थर कहीं आए तो सामान्यतः संदेह नहीं होता।

नूंह से 20 किलोमीटर दूर बड़कली की स्थिति भी भयावह थी। वहां नूंह जिला भाजपा के महासचिव की तेल मिल पर दोपहर हमला हुआ, उसे पूरी तरह जला दिया गया, वहां खड़ी दो गाड़ियां भी आग को समर्पित कर दी गई। लोगों ने बताया कि पुलिस 12 बजे रात के बाद वहां पहुंची। वहां 20-22 दुकानें जलीं हैं, जो एक ही समुदाय के लोगों की है। लोगों ने कहा कि हम अभी भी रात में जागकर डरते हुए अपनी दुकानों की रक्षा करते हैं, न जाने कब हमला हो जाए। वहां मुख्य चौक पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के कुछ जवान हैं, सुरक्षा के लिए पुलिस नहीं है। प्रश्न है कि उतनी दूर उन दुकानों को निशाना क्यों बनाया गया? उतने भीषण अग्निकांड के लिए सामग्रियां, उतनी संख्या में लोग अचानक तो नहीं आ सकते। नूंह में भी एक समुदाय की ही दुकानें लूटी गई,जलाई गई।

इस तरह आप पूरी हिंसा की एक तस्वीर बनाएं तो साफ दिख जाएगा कि इसके पीछे लंबे समय की तैयारी थी। बिना जगह-जगह बैठकों, लोगों को तैयार किए, उनको संसाधन उपलब्ध कराए तथा प्रशिक्षित किए इस तरह की हिंसा संभव नहीं है। घटनाएं कुछ लोग करते हैं और परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। मेवात भय व तनाव से गुजर रहा है। पुलिस प्रशासन की विफलता स्पष्ट है। दोपहर 12 बजे के थोड़े समय बाद यात्रा पर हमला हुआ। जो थोड़े पुलिस वाले साथ थे उन्हें जान बचानी पड़ी। लोग हमलों के बीच मंदिर की ओर भागने को विवश थे। पुलिस वहां 5 बजे के आसपास पहुंची है। पूरा शहर हमलावरों के नियंत्रण में था। यह स्थिति बदलनी चाहिए। जिन पर हमले हुए, जिनकी दुकानें जलाई गई, उन्हें तुरंत पूरी सरकारी मुआवजा मिले, उनके अंदर सुरक्षा का भाव उत्पन्न हो, हिंसा करने और करवाने वालों को महसूस हो कि उनके अपराध की सजा मिलनी निश्चित है । यह सब प्रशासन और सरकार का दायित्व है। इसके साथ राजनीतिक, गैर राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक समूहों भी आगे आए। दोनों समुदायों के बीच जाना, उनके अंदर के अविश्वास को कम करना तथा अतिवादी विचारों की ओर जा चुके युवाओं को वापस मुख्यधारा में लाना आवश्यक है। इसके लिए लंबे समय तक काम करना होगा।

अवधेश कुमार, ई-30 ,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208

बुधवार, 2 अगस्त 2023

विपक्षी सांसदों के मणिपुर दौरे के बाद

अवधेश कुमार


मणिपुर के दो दिवसीय दौरे पर गया 21 सदस्यीय विपक्षी आईएनडीआईए सांसदों के प्रतिनिधिमंडल के वक्तव्यों व विवरणों में ऐसा कुछ नहीं है जो पहले समाचार माध्यमों से हमारे आपके पास नहीं पहुंचे हों। कहने का तात्पर्य यह नहीं कि विपक्षी सांसदों का दौरा महत्वपूर्ण नहीं था। बिल्कुल महत्वपूर्ण था। जनप्रतिनिधि होने के नाते वहां जाकर सच्चाई को अपनी आंखों से देखना, समझना तथा जो कुछ समाधान के रास्ते नजर आए उसे देश ,सरकार के समक्ष रखना विपक्ष का भी दायित्व है। इस नाते देखें तो कहा जा सकता है कि विपक्षी सांसदों का दौरा बिल्कुल उपयुक्त था। विपक्षी सांसदों ने राज्यपाल अनुसुइया उइके से मुलाकात कर अपना ज्ञापन भी दिया। राज्यपाल को ज्ञापन देने का अर्थ है कि वह केंद्र सरकार तक भी पहुंच गया होगा। आखिर राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर ही प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। दिल्ली आने के बाद प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से भी मुलाकात कर अपनी बात रखी। इन सबके साथ विपक्ष का मूल स्वर यही है कि प्रधानमंत्री इस विषय पर बोलें। तो फिर बात आकर वही अटक गई है। प्रश्न है कि अब आगे क्या?

एक ओर आप मणिपुर की स्थिति का आकलन करें और दूसरी ओर संसद‌ न चलने दें तो रास्ता निकलेगा कैसे? सांसदों के दल ने राज्यपाल को जो ज्ञापन दिया उसके अनुसार 140 से अधिक मौतें हुई, 500 से अधिक लोग घायल हुए, 5000 से अधिक घर जला दिए गए तथा मैतेयी एवं कुकी दोनों समुदाय के 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। इन तथ्यों को कोई नकार नहीं सकता। उन्होंने यह भी लिखा है कि राहत शिविरों में स्थिति दयनीय है। प्राथमिकता के आधार पर बच्चों का विशेष ख्याल रखने की जरूरत है। विभिन्न स्ट्रीम के छात्र अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं जो राज्य और केंद्र सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए। इस तरह के सुझावों को स्वीकार करने में केंद्र और प्रदेश सरकार को समस्या नहीं हो सकती है। इस तरह के जातीय नस्ली संघर्ष में शांति, राहत तथा पुनर्वास अत्यंत कठिन होता है। हर संभव कोशिश करने के बावजूद राहत शिविरों में लोगों को सामान्य जीवन देना पूरी तरह संभव नहीं होता। तो इसके लिए जितनी कोशिश संभव है की जानी चाहिए। शेष बातें तो सरकार की आलोचना है जिन पर बहुत चर्चा करने की आवश्यकता नहीं। लेकिन अगर वाकई विपक्ष मणिपुर में शांति व्यवस्था स्थापित करने की आकांक्षा रखता है तथा यह चाहता है कि इस तरह की पुनरावृति भविष्य में नहीं हो तो उसे अपने दायित्व पर भी विचार करना चाहिए।

अगर राज्यपाल अनुसूया यूके ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने तथा सभी समुदायों के नेताओं से बात करने का सुझाव दिया है तो इसे स्वीकार करने में किसी को समस्या नहीं हो सकती है। मणिपुर का संकट निस्संदेह, राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट है। पर विपक्ष का यह कहना कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल जाए यह गले नहीं उतर सकता। जाहिर है इसमें मणिपुर की चिंता कम और आगामी लोकसभा चुनाव की राजनीति ज्यादा दिखती है। वैसे तो 18 जुलाई को बेंगलुरु में आईएनडीआईए के गठन के साथ ही स्पष्ट हो गया था कि आगामी संसद में विपक्ष आक्रामक भूमिका निभाएगा तथा हर स्तर पर यह संदेश देने की कोशिश करेगा कि वे एकजुट हैं और नरेंद्र मोदी सरकार के विरुद्ध प्रखरता से हमले कर रहे हैं। संसद के अधिवेशन में यही दिख रहा है। प्रधानमंत्री बोलें इस इस एक जिद के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही लगातार बाधित है। सच यह है कि चाहे कश्मीर हो या पूर्वोत्तर हिंसा और अशांति के बीच सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों का कभी भी प्रधानमंत्री ने नेतृत्व किया हो इसका रिकॉर्ड नहीं है। 

अगर आईएनडीआईए के नेता इसकी मांग कर रहे हैं तो उन्हें बताना चाहिए कि इसके पूर्व कब प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हिंसा में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल गया? मणिपुर में भाजपा की सरकार है और केंद्र में भी तो निश्चित रूप से प्रदेश की स्थिति को लेकर उससे प्रश्न किया जाएगा। विपक्ष कटघरे में खड़ा करेगा यह भी स्वाभाविक है। सरकार उत्तर दे इसमें भी दो मत नहीं हो सकता किंतु प्रधानमंत्री ही उत्तर दें इसका अर्थ तो यही है कि आपको सरकार के वक्तव्य से ज्यादा अपनी राजनीति साधनी है। कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर राजनीति से ऊपर उठकर सभी दलों को व्यवहार करना चाहिए। देश की एकता अखंडता तथा आंतरिक अशांति व संघर्ष के मामले पर अगर राजनीतिक एकता नहीं होगी तो किस पर होगी?

यह तो संभव नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मणिपुर पर कभी बोलेंगे ही नहीं। इससे कोई इनकार कर नहीं सकता कि मणिपुर में स्थिति धीरे-धीरे शांत हो रही है। सरकार ने कुकी और मैतेयी दोनों समुदायों के नेताओं के साथ बातचीत शुरू की है और इसके कई दौर संपन्न हो चुके हैं। सेना और केंद्रीय सशस्त्र बल वालों ने दोनों समुदायों के बीच कुछ बफर जोन भी स्थापित कर दिए हैं। मर्चुअरी में पड़े मृतकों के शवों के अंतिम संस्कार किए जा रहे हैं। थोड़े समय में जलाए गए, उजाड़े गए घरों के पुनर्निर्माण की भी शुरुआत होगी। तोड़े गए ध्वस्त किए गए सड़कें और पुल भी बनने शुरू होंगे। सुरक्षा बढ़ने के साथ यातायात की शुरुआत भी होगी। जहां-जहां संभव है विद्यालय खोले गए हैं। कहने का तात्पर्य है कि मणिपुर को सामान्य स्थिति में लाने की सरकारी स्तर पर कोशिशें जारी है। सरकार ने तात्कालिक और दूरगामी लक्ष्य बनाया होगा। इसमें एक सोपान तक पहुंचने के बाद अब प्रधानमंत्री का वक्तव्य देना उचित होगा। यही मणिपुर पूरे पूर्वोत्तर तथा देश के हित में होगा।

हमने देखा कि मिजोरम जैसे राज्य में महिलाओं के विरुद्ध माहौल बना। कुकी समुदाय के समर्थन में आयोजित बंद और प्रदर्शन में स्वयं वहां के मुख्यमंत्री तक शामिल हुए। एक पहलू बताने के लिए पर्याप्त है कि अगर मणिपुर जैसे संवेदनशील मामले पर संयम और संतुलन के साथ व्यवहार नहीं किया जाए तो क्या हो सकता है।

विपक्ष ने कई पहलुओं पर चर्चा नहीं की 5000 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके हैं तथा करीब 7000 लोग गिरफ्तार हैं। दूसरे या झूठ है कि केंद्र ने मणिपुर को उसके हालात पर छोड़ दिया। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय 3 सप्ताह से ज्यादा वही रहे और उनके साथ अनेक अधिकारी थे। क्या मणिपुर की स्थिति दुरुस्त करने के लिए प्रधानमंत्री की भूमिका होगी ही नहीं? ऐसा सोचने वालों पर हंसने के सिवा कुछ नहीं किया जा सकता। म्यानमार और बांग्लादेश के ईसाई कूकियों ने हथियार उठाकर देश तोड़ने का अभियान चलाया और कुछ अभी तक संलिप्त हैं। स्वयं यूपीए सरकार ने इनके साथ युद्ध विराम समझौता किया बावजूद सभी ने हथियार नहीं डाले। इसी तरह कूकी महिलाओं के साथ घृणित दुर्व्यवहार के वीडियो जारी करने के पीछे भी षड्यंत्र की परतें खुल रही है। इन सबको अस्वीकार कर देंगे त मणिपुर क्या पूर्वोत्तर की समस्या का समाधान नहीं होगा। फरवरी 2021 के बाद केवल मिजोरम में 30,000 से ज्यादा म्यानमार के लोग आ चुके हैं। केंद्र की पहल पर अब उनके बायोमेट्रिक पहचान की प्रक्रिया शुरू हुई है। 

मैतेयी समुदाय ने भारत से अलग होने का आंदोलन कभी नहीं किया। इसलिए दोनों को एक ही तराजू पर रख कर नहीं देखा जा सकता। किसी समस्या का समाधान तभी होगा जब उसकी वास्तविकता स्वीकार किया जाए। मणिपुर में अफस्पा हटाने का आंदोलन कांग्रेस के शासनकाल में ही आरंभ हुआ। सत्य है कि भाजपा सरकार ने पूरे पूर्वोत्तर से धीरे-धीरे अफस्पा को हटाया। मणिपुर में इस कारण भी समस्याएं आईं क्योंकि अफस्पा हटाने के बाद सेना के अनेक पोस्ट खत्म हो गए थे। इस संघर्ष में उन्हें फिर से खड़ा करना भी एक चुनौती थी। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य कि विपक्ष 2024 की दृष्टि से अपनी राजनीति करें पर मणिपुर की सच्चाई को स्वीकार कर उसके हल करने की दिशा में भूमिका निभाए। संसद को ठप्प करना यह भूमिका नहीं हो सकता। अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिए जाने के बाद लोकसभा अध्यक्ष के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए। आप अपनी बात अविश्वास प्रस्ताव के दौरान रखिए। उसके पहले मणिपुर की दिल दहलाने वाली घटनाओं का संज्ञान लेकर वास्तविकता को समझना तथा उसके तथा शांति के लिए अपील व भूमिका निभाना ही किसी भी भारतीय का कर्तव्य हो सकता है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -1100 92, मोबाइल -98110 27208

बुधवार, 26 जुलाई 2023

मणिपुर की स्तब्ध करने वाली तस्वीरों को कैसे देखें

अवधेश कुमार

मणिपुर से महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने, उन्हें अपमानित करने के वीडियो ने संपूर्ण देश को स्तब्ध किया है।  हिंसा किसी प्रकार की हो , महिलाओं और बच्चों को ज्यादा त्रासदी झेलनी पड़ती है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वीडियो में जो लोग भी जघन्य अपराध करते दिख रहे हैं उनको उपयुक्त सजा मिलेगी। बावजूद इस घटना की चर्चा करते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मणिपुर में कई तरह की हिंसा जारी थी।  मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह का यह वक्तव्य वायरल है कि आपको एक घटना की चिंता है न जाने कितनी घटनाएं ऐसी हुई है। यही सच है।  यह घटना कूकी महिलाओं से संबंधित है। हमें पता है कि मैतेयी समुदाय की कितनी महिलाओं के साथ क्या-क्या हुआ होगा? जितनी संख्या में घर बार छोड़कर लोगों को विस्थापित होना पड़ा उसमें यह कल्पना आसानी से की जा सकती है अनेक महिलाओं के साथ भयानक दुर्व्यवहार हुए होंगे। जब तक हिंसा के पीछे के सच को और जिस तरह वो घटी उस तरह नहीं देखा जाएगा तो इसका निदान ढूंढना मुश्किल होगा। यह वीडियो मैतेई और कुकी समुदायों के बीच झड़प के एक दिन बाद यानी 4 मई की है ।  विचार करने की बात है कि यह वीडियो अब क्यों जारी हुआ?

इंडिजेनस ट्राइबल लीडर्स फोरम ने स्वयं द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन और संसद सत्र आरंभ होने के एक दिन पूर्व वीडियो जारी किया। जाहिर है, समय का ध्यान रख यह वीडियो जारी हुआ। इससे देश और दुनिया भर में यह संदेश देने की कोशिश हुई कि मैतेयी हिन्दू उत्पीड़क हैं और‌ पीड़ित समुदाय केवल कूकी हैं, जिनमें ज्यादातर ईसाई हैं। यह सच नहीं है कि पुलिस ने पहले इसका संज्ञान नहीं लिया था। 

4 मई को घटना हुई थी और मामले में 18 मई को कांगपोकपी जिले में जीरो एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इसके बाद मामला संबंधित पुलिस स्टेशन को भेज दिया गया। जब भी कहीं जातीय, नस्ली, सांप्रदायिक अलगाववादी हिंसा होती है तो सुरक्षाबलों व प्रशासन की पहली भूमिका उसे शांत करने की रहती है। आप इंडीजीनस ट्राईबल फोरम के विरोध प्रदर्शन को देखिए तो सभी काला ड्रेस पहने हुए हैं। इतनी संख्या में काला ड्रेस मुफ्त नहीं मिल सकता। साफ है कि विरोध के पीछे ऐसी शक्तियां हैं जो कुछ अलग उद्देश्य पाना चाहती हैं। वस्तुतः मणिपुर की हिंसा का यह ऐसा पहलू है जिसको समझने की कोशिश करनी होगी।  

अभी तक के आंकड़ों के अनुसार मणिपुर में कुल 6000 हिंसा की घटनाएं हुईं ,5000 से ज्यादा प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है, 6700 से ज्यादा लोग गिरफ्तार हैं ,70 हजार के आसपास विस्थापित हैं, 10 हजार ने मणिपुर छोड़ दिया तथा 160 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। अनेक मारे गए लोगों के शव मोर्चुअरी में पड़े हैं जिन्हें ले जाने वाला कोई नहीं।  उन हालातों में न जाने कितने भयावह और जघन्य अपराध हुए होंगे इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है। उसमें एक वीडियो समय का ध्यान रखते हुए जारी करने का उद्देश्य क्या हो सकता है?  आने वाले समय में ऐसी और घटनाओं के भी विवरण आएंगे जो हमें आपको बार-बार अंदर से हिला सकते हैं। 4 जून को ही भीड़ ने एक एंबुलेंस को रास्ते में रोक उसमें आग लगा दी। एंबुलेंस में सवार 8 साल के बच्चे, उसकी मां और एक अन्य रिश्तेदार की मौत हो गई। मृतका मां मैतेई समुदाय से आती थीं और उनकी शादी एक कुकी से हुई थी। इस तरह की हिंसा को किस श्रेणी में रखेंगे?

वीडियो जारी करने वाले विश्व भर को संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि मैतेयी हिंदुओं ने कूकी ईसाइयों के साथ इसी तरह की बर्बरता की। साफ है कि वह केंद्र एवं प्रदेश दोनों सरकारों को विश्व भर में अल्पसंख्यकों का खलनायक तो साबित कर ही रहे हैं ऐसी स्थिति पैदा करना चाहते हैं ताकि वहां हिंसा कायम रहे और वे अपना लक्ष्य पा सके।

इस संघर्ष को हिंदू बनाम ईसाई संघर्ष कहना गलत होगा। ईसाई संघर्ष होता तो इसमें नगा भी शामिल होते। हां, अलगाववाद और हिंसा के पीछे चर्च अवश्य मुख्य प्रेरक कारक है। पूर्वोत्तर में अलगाववाद एवं हिंसक आंदोलनों के पीछे चर्च की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और आज भी है। मणिपुर में कूकियों का एक बड़ा समूह म्यान्मार से आया।   इन्हें चिन कूकी कहा जाता है। इनके अनेक हथियारबंद समूह खड़े हैं। इनका लक्ष्य बांग्लादेश, म्यानमार और मणिपुर के हिस्से को मिलाकर एक स्वतंत्र देश बनाना है।  मैतेयी मणिपुर तक सीमित है लेकिन कुकी पूरे पूर्वोत्तर में फैले हैं जिनमें गैर ईसाई अब बहुत कम होंगे।  

2008 में लगभग सभी कुकी विद्रोही संगठनों के साथ केंद्र सरकार ने सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन या एसओएस समझौता किया जिसका उद्देश्य इनके विरुद्ध सैन्य कार्रवाई रोकना था। कई संगठनों ने वादा नहीं निभाया। अंततः इस वर्ष 10 मार्च को मणिपुर सरकार ने दो संगठनों के साथ समझौता रद्द कर दिया। ये संगठन हैं जोमी रेवुलुशनरी आर्मी यानी जेडआरए और कुकी नेशनल आर्मी यानी केएनए।  बीरेन सिंह सरकार ने इनके विरुद्ध कार्रवाई शुरू की। एरियल सर्वे कराकर अफीम की खेती को नष्ट करना आरंभ हुआ। मादक औषधियों के व्यापार के लिए कुख्यात म्यानमार, थाईलैंड, बैंकॉक का गोल्डन ट्रायंगल इससे जुड़ा है। 

दूसरे, जंगलों की भूमि पर इनके अवैध कब्जे को भी मुक्त कराने का अभियान चला।  मणिपुर का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र पहाड़ी तथा 10 प्रतिशत मैदानी हैं। मैतेयी मणिपुर की लगभग 53 -54 प्रतिशत आबादी है, जो हिंदू हैं,लेकिन 10प्रतिशत मैदानी क्षेत्रों यानी इंफाल घाटी में रहते हैं। पहाड़ी इलाकों के 33 मान्य जनजातियों में मुख्यतः नंगा और कुकी हैं जिनमें ज्यादातर का ईसाई धर्म में धर्मांतरण हो चुका है।  मैतेयी समुदाय 1949 तक आदिवासी माना जाता था।‌ इन्हें सामान्य जाति बना दिया गया। ये सारी सुविधाओं और विशेष अधिकारों से वंचित हो गए। दूसरी ओर पहाड़ी जनजातियों को संविधान से विशेषाधिकार मिले हैं।  भूमि सुधार कानून के अनुसार कुकी और नगा तथा अन्य जनजातियां मैदानी क्षेत्र में जमीन खरीद सकते हैं लेकिन मैतेयी पहाड़ी क्षेत्र में नहीं खरीद सकते। 

कूकी और नगा धीरे-धीरे मैदानी इलाकों की जमीन खरीद कर इसमें बस रहे हैं ,चर्चों की संख्या बढ़ रही है। परिस्थितियों में मैतेयी समुदाय के भी कुछ लोग ईसाई धर्म कर ग्रहण कर चर्च में जाने लगे हैं। इससे वहां सामाजिक तनाव बढ़ता गया है। वैसे मणिपुर में कूकियों के साथ अन्याय का आरोप लगाने वाले नहीं बताते कि राजनीति में अवश्य मैतेयी समुदाय का वर्चस्व है लेकिन पुलिस और प्रशासन मुख्यतः कूकियों के हाथ में है। घटना के दौरान पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस उप महानिदेशक दोनों कूकी थे। प्रदेश में 21भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी कूकी हैं। सरकार द्वारा संरक्षित जंगलों और वन अभयारण्य में गैरकानूनी कब्जा करके अफीम की खेती करने के विरुद्ध अभियान जैसे-जैसे बढ़ा  अलगाववादी समूहों ने कूकियों को भड़काया कि भाजपा केवल हिंदुओं के हितों के लिए काम कर रही है और  तुम्हारी पुश्तैनी जमीन से तुम्हें हटा रहे है। 3 मई को कूकियों की रैली थी और इसी दौरान कांगपोकपी नाम की जगह पर पुलिस से उनका टकराव हुआ। महिलाओं को नग्न कर भीड़ द्वारा उत्पीड़न करने का वीडियो  वहीं के पास का है।  टकराव में पांच प्रदर्शनकारियों के साथ पांच पुलिसवाले भी घायल हुए थे। कल्पना की जा सकती थी कि वहां क्या स्थिति रही होगी।

  बंद और विरोध प्रदर्शन चुराचंदपुर में हुआ जहां मुख्यतः कूकी और नागा आबादी है लेकिन हिंसा की घटनाएं इंफाल घाटी में हुई।  27-28 अप्रैल तक हिंसा कूकी और पुलिस के बीच थी। इसके बाद यह मैतेयी और कूकी टकराव में बदला। 3 मई को  ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ने यह आरोप लगाते हुए एकता मार्च' निकाला कि सरकार मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने जा रही है। उसके साथ हिंसा शुरू हो गई। महिलाओं का वीडियो ठीक इसके अगले दिन का है। वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए यह अवश्य ध्यान रखिए कि कूकी महिलाएं संघर्ष के अग्रिम मोर्चे पर रखी जाती हैं। इंडियन आर्मी गो बैक की तख्तियां लेकर आंदोलन के अग्रिम पंक्तियों में चलती महिलाओं की तस्वीरें वहां आम हैं।

ऐसे मामलों में कानून निष्पक्षता से कार्रवाई करें यह हम सब चाहेंगे। किंतु जितनी बड़ी खाई हो गई है उसको पाटने के लिए कई स्तरों पर लंबे समय तक काम करने की आवश्यकता है।  ऐसे संवेदनशील मामले में अत्यंत सधे हुए तरीके से प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने एवं कदम उठाने की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से हमारी राजनीति क्षण भर के लिए भी ठहर कर इस दिशा में सोचने को तैयार नहीं है।

अवधेश कुमार, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -1100 92, मोबाइल -99110 27208

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