सोमवार, 24 जुलाई 2023
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता
गुरुवार, 20 जुलाई 2023
इंडिया कितनी बड़ी चुनौती देगा एनडीए को
अवधेश कुमार
विपक्षी दलों की पटना बैठक खत्म होने को बाद राजनीति में अभिरुचि रखने वाले सभी का ध्यान बेंगलुरु बैठक की ओर था। हालांकि तब यह अनुमान नहीं था कि भाजपा भी एनडीए यानी राजग की बैठक उसी दिन आयोजित कर देगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीति का अपना तरीका है। विपक्ष की कवायद के परिणामों की प्रतीक्षा करने की जगह उसके समानांतर ऐसे आयोजन कर सीधा सामना किया जाए। पटना बैठक में भाजपा केवल विपक्ष की आलोचना तक सीमित थी और अपनी ओर से क्या करने जा रहे हैं यह बात सामने नहीं रख पाई थी। बेंगलुरु के समानांतर राजधानी दिल्ली की बैठक के पहले और बाद भाजपा के पास दोनों स्तर पर प्रतिउत्तर और प्रत्याक्रमण था। एक ओर विपक्ष की आलोचना तथा दूसरी ओर उनके समानांतर ज्यादा दलों और इन सबके बीच पूर्ण एकजुटता का संदेश। विपक्ष ने 26 दलों का जमावड़ा किया तो भाजपा ने प्रत्युत्तर में 38 दलों को इकट्ठा कर यह संदेश दिया कि अभी भी देश में ज्यादा दल उनके साथ हैं। यह बात ठीक है कि इनमें से अनेक दलों की हैसियत बड़ी नहीं है तथा संसद में उनके प्रतिनिधि भी नहीं। किंतु यही स्थिति दूसरी और भी है।
विपक्ष द्वारा बेंगलुरु से अपने गठजोड़ का इंडिया नाम देना सामान्य तौर पर गले उतरने वाला नहीं था। भाजपा एवं मोदी विरोधियों ने तर्क दिया कि अब भाजपा के पास न इंडिया बोलने के लिए रहेगा और न इसके नाम पर राष्ट्रवाद का भाव उभार पाएंगे। कोई व्यक्ति अपना नाम भारत, इंडिया, हिंदुस्तान या कुछ भी रख सकता है। राजनीतिक दल या दलों का कोई गठजोड़ जिसके स्थाई और स्थिर होने की संभावना नहीं हो सकती वह स्वयं को इंडिया कहे यह सहसा स्वीकार्य नहीं हो सकता। क्या इस नाम पर तालियां पीटने वालों ने सोचा कि लोकसभा चुनाव में यदि गठबंधन हारा तो क्या कहा जाएगा कि इंडिया हार गई या इंडिया पीछे रह गई या एनडीए ने इंडिया को पछाड़ दिया। इसी कारण विपक्ष के अंदर भी कई नेताओं का इसे लेकर मतभेद था।
वैसे नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के अध्यक्ष ललन सिंह ने बयान दे दिया है कि नाम को लेकर कोई मतभेद नहीं था किंतु जो सूचनाएं हैं नीतीश इस नाम से आरंभ में सहमत नहीं थे। कुछ लोग यह मान रहे थे कि इंडिया में भी एनडीए है। आरंभ में इसका नाम था इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक इंक्लूसिव अलायंस। बाद में इंडिया के नेशनल डेमोक्रेटिक का ध्यान रखते हुए डी से डेवलपमेंटल कर दिया गया। इसका मतलब यह है कि बैठक के पूर्व गठबंधन के नाम को लेकर सभी के बीच चर्चा नहीं हुई थी। विरोधी सोशल मीडिया पर इंडिया बनाम भारत की लड़ाई बताकर प्रचारित कर रहे हैं। हम इंडिया भारत में नहीं पढ़ना चाहेंगे। निस्संदेह, इंडिया अंग्रेजों का दिया नाम है और यह भारत का पर्याय किसी तरह नहीं हो सकता।बावजूद हर पार्टी और सरकार इंडिया शब्द का प्रयोग करती है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडिया फर्स्ट शब्द प्रयोग करते रहे हैं। यह बात अलग है कि इस तरफ के इंडिया की वह सोच नहीं हो सकती जो अंग्रेजों या वामपंथी एवं लिबरल विचारधारा मानने वालों का होता है। भारत में अभी भी ऐसे लोग हैं जो इंडिया नाम को उपयुक्त मानते हैं तथा राष्ट्र के रूप में अपनी शुरुआत 15 अगस्त, 1947 से ही स्वीकार करते हैं। चूंकी 27 राजनीतिक दलों में ऐसे लोग हैं तथा इनके पीछे सक्रिय रहने वाले बुद्धिजीवी, पत्रकार, एनजीओ, एक्टिविस्ट, बड़ी-बड़ी संस्थाएं, सेफोलॉजिस्ट आदि इस विचारधारा के पोषक हैं। इसका ध्यान रखें तो इंडिया नाम में हैरत का कारण नहीं दिखेगा। बावजूद यह कहना होगा कि इंडिया की जगह कुछ और नाम देना चाहिए था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए का भावार्थ अपने दृष्टि से समझाया पर नाम पुराना ही रहेगा। प्रश्न है कि इन बैठकों से 2024 लोक सभा चुनाव की तस्वीर कैसी नजर आती है ? यह सही है कि 2019 से थोड़ा अलग राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का एक गठबंधन हो गया है, इनकी दो बैठकें हुई और आगे भी बैठकें होते रहने की संभावना है। यही नहीं संयोजक से लेकर समन्वय व संचालन समिति एवं अलग-अलग विषयों के लिए भी समिति के गठन की घोषणा कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बेंगलुरु में की। इन पर आरंभिक टिप्पणी तभी की जाएगी जब समितियों की भूमिका और उनमें शामिल नामों की घोषणा होगी। पर इतने लंबे समय से भाजपा विरोधी मोर्चाबंदी की कवायद तथा दो बड़ी बैठकों के बाद एक संयोजक पर सहमति न बनना क्या बताता है? यहां तक कि समन्वय या संचालन समिति के सदस्यों के नामों का भी एलान संभव नहीं हुआ। इससे पता चलता है कि नरेंद्र मोदी ,भाजपा तथा संघ के विरोध करने में एकजुटता हो लेकिन न एक दूसरे के प्रति पूर्ण आपसी विश्वास पैदा हुआ न सम्मान भाव और न मिलजुल कर एक रणनीति के साथ चुनाव लड़ने की मानसिकता पैदा हुई। अंतिम प्रेस वार्ता में विपक्षी मोर्चाबंदी के लिए सबसे ज्यादा कोशिश करने वाले नीतीश कुमार का अनुपस्थित होना ही कई प्रश्न खड़ा करता है। उनके साथ लालू प्रसाद यादव एवं सोनिया गांधी तक नहीं थे। हालांकि इनलोगों ने हवाई जहाज के समय की बात कही है। जानते हैं कि ऐसी बैठकों के लिए कर्नाटक में कांग्रेस की हैसियत चार्टर प्लेन से गंतव्य तक पहुंचा देने की है।
दूसरी ओर राजधानी दिल्ली में आयोजित एनडीए की बैठक को देखिए। इस बात पर बहस हो सकती है कि विपक्ष के समानांतर भाजपा को गठबंधन के लिए इस तरह आगे आना चाहिए या नहीं चाहिए। कारण, बहुमतविहीन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकारों के दौरान कायम अनिश्चितता और अस्थिरता ,नीतियों को लेकर ठहराव आदि के विरुद्ध लोगों ने केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को बहुमत प्रदान किया। देश कभी नहीं चाहेगा कि यह स्थिति बदले। बावजूद अगर विपक्ष मोर्चाबंदी कर रहा है तो अपने साथ आने वाले संभावित दलों को छोड़कर उनके साथ जाने का अवसर देना वास्तव में विरोधियों को शक्तिशाली बनाना ही होता। इस नाते भाजपा की रणनीति समझ में आती है। तो भाजपा ने अपनी इस रणनीति से अब विपक्षी गठबंधन के विस्तार की संभावनाएं खत्म कर दी है।
दोनों बैठकों की तुलना करिए तो एनडीए में प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में सरकार, पार्टी और गठबंधन का पूरा लक्ष्य सामने रखा। इसमें सामाजिक न्याय से लेकर गरीबों की भलाई, महिलाओं के सम्मान और उत्थान आदि पर किए जा रहे कार्यक्रमों एवं भविष्य के सपने की रूपरेखा थी। रक्षा एवं विदेश नीति के स्तर पर स्पष्ट दिशा के साथ यह विश्वास भाव था कि उस पर ठीक काम हुआ है एवं भारत की प्रतिष्ठा दुनिया भर में बढ़ी है। दूसरी ओर विपक्ष में केवल घोषणाएं तथा भाजपा व संघ की आलोचना व सत्ता से हटाने की बात। अगर आप निष्पक्ष होकर विचार करेंगे तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि विपक्षी मोर्चाबंदी से नकारात्मक ध्वनि ज्यादा रही जबकि राजग से सकारात्मक। कम से कम नेताओं को देश, विकास, नीतियों आदि के संदर्भ में मोटा - मोटी रूपरेखा रखनी चाहिए थी।
विपक्ष कहता है कि उसका विरोध व्यक्ति से नहीं विचारों और मुद्दों से है तो उसे अपने विचार और मुद्दे सामने रखने चाहिए। अगर इसके लिए इतना समय लगेगा कि कुछ लोगों की समिति बनेगी और वह इसकी रूपरेखा बनाएंगे तो लोग इसका अर्थ यही लगाएंगे कि आपके पास विजन नहीं है। यानी केवल विरोध के लिए विरोध। किसी गठबंधन का आधार तो मुद्दे और विचारधारा ही होना चाहिए। केवल यह कहना कि लोकतंत्र सेकुलरिज्म बचाने के लिए हम इकट्ठे हो रहे हैं लोगों को आपसे सहमत नहीं करा पाएगा। वैसे नेताओं के इकट्ठे बैठने का अर्थ यह भी नहीं लगाया जा सकता कि राज्यों में सबके बीच सीटों का ऐसा समझौता हो जाएगा जिसमें भाजपा के विरुद्ध हर सीट पर विपक्ष का एक संयुक्त उम्मीदवार होगा। माकपा के सीताराम येचुरी ने तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ लड़ाई जारी रहने की घोषणा कर दी। महाराष्ट्र में पहले ही विपक्षी मोर्चाबंदी के सबसे वरिष्ठ नेता शरद पवार की पार्टी का बहुमत ही उन्हें छोड़कर इंडिया में चला गया। तेलंगाना में सत्तारूढ़ बीआरएस, आंध्र में सत्तारूढ़ वाईएसआरसीपी तथा विपक्षी तेलुगू देशम एवं उड़ीसा में नवीन पटनायक का बीजद दोनों गठजोड़ो से अलग है। बसपा ने अलग राह चलने की घोषणा बैठकों के दूसरे दिन ही कर दी।
वस्तुतः अपनी -अपनी राजनीति के कारण मोदी और भाजपा विरोधी विपक्षी एकता की बात अवश्य हो, भारतीय राजनीति की ऐसी स्थिति नहीं कि सारा विपक्ष एक होकर सरकार के विरुद्ध खड़ा हो जाए। सबकी अपनी विचारधारा, राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं तथा अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक हित हैं। इस कारण आसानी से किसी एक व्यक्ति को ये अपना नेता मान भी नहीं सकते। कम से कम इतना तो मानना पड़ेगा कि एनडीए के बीच नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को लेकर मतभेद नहीं है। दूसरे, अभी तक किसी दल ने भी ऐसी बात नहीं की है जिससे लगे इनके बीच 2024 को लेकर तत्काल किसी बिंदु पर असहमति है। इस दृष्टि से देखें तो कहना होगा एनडीए की शुरुआत विपक्ष से ज्यादा प्रभावी है।
अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -1100 92, मोबाइल -98110 27208
बुधवार, 12 जुलाई 2023
गुरु गोलवलकर के नाम पर झूठ
इस समय सोशल मीडिया पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का एक ट्वीट वायरल है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर के नाम से कुछ पंक्तियां लिखी हुईं हैं। 'मैं सारी जिंदगी अंग्रेजों की गुलामी करने के लिए तैयार हूं लेकिन जो दलित, पिछड़ों और मुसलमानों को बराबरी का अधिकार देती हो ऐसी आजादी मुझे नहीं चाहिए।' इसमें कहा गया है कि गुरु गोलवलकर ने 1940 में यह बात कही थी। इसी तरह एक पंक्ति और है-'जब भी सत्ता हाथ लगे तो सबसे पहले सरकार की धन संपत्ति, राज्यों की जमीन और जंगल पर अपने दो-तीन विश्वसनीय धनी लोगों को सौंप दें, 95 प्रतिशत जनता को भिखारी बना दें उसके बाद सात जन्मों तक सत्ता हाथ से नहीं जाएगी।' यह भी कहा गया है कि गुरु गोलवलकर की पुस्तक वी एंड आवर नेशनहुड आईडेंटिफाइड में ये पंक्तियां लिखी हुई है। वैसे उस पुस्तक का नाम वी एंड आवर नेशनहुड डिफाइंड है, आईडेंटिफाइड नहीं।
सार्वजनिक जीवन में किसी संगठन से या दो संगठनों व व्यक्तियों के बीच वैचारिक मतभेद, असहमति बिलकुल स्वाभाविक है। एक लोकतांत्रिक, खुले और उन्नत समाज का यही लक्षण है। किंतु मतभेद या असहमति तो उसी पर होगी जो वास्तविक रूप में है। जो है ही नहीं उसे किसी व्यक्ति का कथन बताना क्या माना जाना चाहिए? दिग्विजय सिंह बंच ऑफ थॉट की बात करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से दिग्विजय सिंह या किसी का भी मतभेद अस्वाभाविक नहीं है। किसी को इस संगठन का विरोध करने का पूरा अधिकार है। किंतु जिन पंक्तियों को उनके नाम से उद्धृत किया गया है वैसा गुरु गोलवलकर ने कभी कहा ही नहीं। बंच ऑफ थॉट या हिंदी में विचार नवनीत गुरु गोलवलकर के सारे भाषणों या वक्तव्यों का संक्षिप्त रूप है। आपको यह तक आसानी से मिल जाएगा। आप स्वयं उस पुस्तक को पढ़िए और उसमें इन पंक्तियों की तलाश करिए। आपको कहीं नहीं मिलेगा क्योंकि ये गुरु गोलवलकर के विचारों के बिल्कुल विपरीत हैं।
वी आवर नेशनहुड डिफाइंड पुस्तक की बार-बार चर्चा होती है। वैसे गुरु गोलवलकर ने वह पुस्तक बाद में वापस भी ले ली थी, लेकिन उनमें भी ये पंक्तियां नहीं थी। राज्यों की जमीन और जंगल पर अपने दो-तीन विश्वसनीय धनी लोगों को अधिकार देकर, 95 प्रतिशत लोगों को भिखारी बना देने की बातें तो कोई पागल, सिरफिरा या उन्मादी व्यक्ति ही कर सकता है। किसी भी संगठन के बारे में बनी- बनाई धारणा से बाहर निकल कर उसकी सच्चाई को उसके अनुसार देखने की आवश्यकता होती है। इस प्रकार की उन्मादी और पागलपन वाली विचारधारा का संगठन 100 वर्षों तक लगातार अपनी शक्ति बढ़ाते हुए केवल भारत में ही दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में सक्रिय नहीं रह सकता। विरोधियों की आलोचनाओं के बावजूद संघ लगातार इसी कारण बढ़ता है, क्योंकि जो आरोप होते हैं वह बिल्कुल तथ्यों से परे और झूठ।
गुरु गोलवलकर ने अपने जीवन काल में संघ के कई अनुषांगिक संगठनों को जन्म दिया जिनमें विश्व हिंदू परिषद तथा वनवासी कल्याण केंद्र है। एक बड़ा वर्ग तो इन संगठनों को भी हमेशा आरोपित करता रहा है। इन दोनों का उद्देश्य क्या था? विश्व हिंदू परिषद के उद्देश्यों में जाति भेद के विरुद्ध संपूर्ण हिंदू समाज को जागृत कर उन्हें साथ लाना यानी समरस समाज का निर्माण शामिल है। गुरु गोलवलकर के मार्गदर्शन में ही विहिप ने देश के धर्माचार्यों को एक समय अस्पृश्य माने जाने वाले समुदायों की बस्तियों में ले जाने, उनके साथ भोजन कराने के अनेक कार्यक्रम किए और आज भी कर रहा है। संघ के स्वयंसेवकों को भी लगातार आप ऐसी बस्तियों में जाते, उनके साथ काम करते देख सकते हैं। संघ की शाखाओं और कार्यक्रमों का अवलोकन करने के बाद विरोधियों ने भी माना कि यहां जाति भेद का अवशेष नहीं दिखता। इसी तरह वनवासी कल्याण केंद्र ,जिन्हें हम आदिवासी कहते हैं, उनके बीच काम करते हुए उनको शिक्षित करने से लेकर समाज की मुख्यधारा में लाने तथा यहां तक कि यथासंभव उनके जीविकोपार्जन के लिए अपनी सीमाओं में जितना संभव है लगातार करता आ रहा है।
सच यह है कि इसके अलावा भारत में किसी संगठन ने आदिवासियों के बीच उन्हें हिंदू समाज के साथ एकाकार करने के लिए काम किया ही नहीं है। ईसाई मिशनरियों ने अवश्य काम किया किंतु उनका लक्ष्य आदिवासियों का धर्मांतरण रहा है। दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के हैं। वहां आदिवासियों के बीच वनवासी कल्याण केंद्र व एकल विश्वविद्यालय ने कितनी बड़ी भूमिका अदा की है इसका उन्हें पता है, क्योंकि वो मुख्यमंत्री रहे हैं। गुरु गोलवलकर के 1940 से 1973 तक के कार्यकाल में दिए गए सारे भाषणों और वक्तव्य को देख लीजिए उनमें हिंदू समाज में जाति भेद जैसी कुरीतियों को खत्म करने के लिए स्वयंसेवक काम करें इसके लाखों उद्धरण मिलेंगे। इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि इन्हें यहां उद्धृत करने की आवश्यकता भी नहीं।
अस्पृश्य माने जाने वाली जातियों को मुख्यधारा में लाने के लिए गुरु गोलवलकर के जीवन काल में लगातार कार्यक्रम हुए। मैंने संघ का एक नारा सुना है - हिंदव: सोदरा सर्वे न हिंदू्र्पतितो भवेत्। यानी सभी हिंदू सहोदर भाई हैं इनमें कोई हिंदू पतित या अछूत नहीं हो सकता। उस काल में अनेक ऐसे गीत संघ के स्वयंसेवकों के लिए लिखे गए और आज तक गाए जाते हैं जो छुआछूत, जाति भेद, ऊंच-नीच को दूर कर सबको समान मानने का व्यवहार पैदा करता है। जिस पुस्तक की चर्चा दिग्विजय सिंह करते हैं उसी के अनेक पन्नों पर गुरु गोलवलकर की संपत्ति के बारे में मत अंकित है। वे बार-बार हिंदू धर्म ग्रंथों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जो कुछ भी धन संपदा हमारे लिए उपलब्ध है हम उसके न्यूनतम उपभोग करने के अधिकारी हैं। राजकीय सत्ता को लेकर तो वे अपने संगठन में वितृष्णा पैदा करते हैं। गुरु गोलवलकर के हजारों उद्धरण हैं जिनमें वे केवल सत्ता के माध्यम से समाज और राष्ट्र को संचालित करने के विरुद्ध आगाह करते हैं। समाज के प्रकाश से सत्ता संचालित हो, न कि सत्ता से समाज - जैसे सिद्धांत को वे अलग - अलग तरीके से लगातार अपने जीवन काल में समझाते रहे हैं। वे राजनीति की भूमिका अत्यंत सीमित बताते हैं। एक बार तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि जिस प्रकार हम आप किसी भवन के निर्माण में शौचालय बनाते हैं वही स्थान राजनीति का है। यानी जिसकी अपरिहार्यता तो है किंतु वह सर्वस्व नहीं है। राजनीति और सत्ता के प्रति उनकी इस सोच का ही परिणाम था कि गांधीजी की हत्या के आरोप से बरी होने और प्रतिबंध हटने के बाद अनेक लोगों के प्रयत्न के बावजूद जल्दी वे राजनीतिक दल के निर्माण के लिए तैयार नहीं हुए। इनमें काफी लंबा समय लगा। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनसे कई मुलाकातें करनी पड़ी। तब भी वे उस समय अपनी ओर से कुछ कार्यकर्ता देने को ही तैयार हुए।
गुरु गोलवलकर जब सत्ता और राजनीति को राष्ट्र और समाज की प्रगति का एकमात्र साधन नहीं मानते वो सत्ता पर वर्षों नियंत्रण बनाये रखने की बात करेंगे यह सोचा भी नहीं जा सकता। वो कहते हैं कि समाज की दिशा से सत्ता संचालित होनी चाहिए तो सत्ता को इतना महत्व देंगे ऐसे प्रचार वालों की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है? जो व्यक्ति संपदा पर सबके अधिकार को भारतीय संस्कृति का मूल तत्व मानता हो वह कुछ हाथों में सारी संपत्ति समिटाने का सिद्धांत देगा इससे बड़ा मजाक और कुछ नहीं हो सकता। ऐसा करने वाले राजनीतिक हित के लिए कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं यह शायद उन्हें पता नहीं हो लेकिन देश अवश्य पहचानेगा। वास्तविक फासिस्ट प्रवृत्ति यही है जो दुर्भाग्य से हमारी राजनीति से लेकर एक्टिविज्म, एनजीओ, मीडिया सबमें घातक रूप में प्रवेश कर गया है। इसी कारण दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेता के द्वारा ऐसा ट्वीट जाता है एवं हजारों लोग उसे रीट्वीट कर फैलाने में लग जाते हैं। देश के हित में यही है कि बात तथ्यों पर हो न कि झूठ फैला कर लोगों को भ्रमित करने का अपराध किया जाए। उम्मीद करनी चाहिए कि हमारे देश के नेता, एक्टिविस्ट , एनजीओ ,मीडिया के बड़े नाम अपने मतभेदों ,विरोधों और असहमतियों को तथ्य और सत्य तक सीमित रखकर देश में सकारात्मक -सार्थक संवाद व विमर्श का माहौल बनाने की कोशिश करेंगे।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल -9811027288
बुधवार, 5 जुलाई 2023
महाराष्ट्र का घटनाक्रम आश्चर्यजनक नहीं
अवधेश कुमार
महाराष्ट्र का वर्तमान घटनाक्रम कतई अचंभित करने वाला नहीं है। कुछ दिनों में साफ होने लगा था कि राकांपा नेताओं का बड़ा समूह महाविकास आघाडी को बनाए रखने तथा विपक्षी एकता का भाग बनने की बजाय भाजपा और शिवसेना (शिंदे )समूह के साथ जाने का मन बना चुका है। यह मानना ठीक नहीं कि जो हुआ उसका पता शरद पवार को नहीं था। जब शपथ ग्रहण के पूर्व अजित पवार के घर पर सुप्रिया सुले भी पहुंची तो उन्हें पूरा घटनाक्रम का ज्ञान था। आज भाजपा पर अनैतिकता का आरोप लगाने वालों में से एक भी नेता या पार्टी ने तब यही बात नहीं कही जब भाजपा शिवसेना गठबंधन को बहुमत मिलने के बावजूद सरकार महाविकास आघाडी की बनाई गई। शरद पवार पिछले 4 वर्षों से जैसी राजनीति कर रहे थे उसकी यही स्वाभाविक परिणति थी। नवंबर 2019 में अजीत पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ शरद पवार की अनुमति से शपथ लिया था। एक ओर वे भाजपा से बात कर रहे थे और दूसरी ओर उद्धव ठाकरे से भी। उन्होंने कहा है कि ऐसा करके वे भाजपा को एक्सपोज करना चाहते थे। इसमें सबसे ज्यादा अपमान और बदनामी अजीत पवार की हुई।उनके मन में लगातार इस बात की कसक थी। दूसरे, लगभग यह भी साफ हो चुका है कि शरद पवार ने एक समय उद्धव ठाकरे सरकार में रहते हुए भाजपा के साथ जाने के लिए भी बातचीत की। संभवतः उनके राष्ट्रपति बनाने पर नरेंद्र मोदी ने सहमति नहीं दी। इस तरह की राजनीति करने वाले व्यक्ति की पार्टी उसके साथ सदा रहे और वह भी इस स्थिति में जब प्रदेश में गठबंधन कमजोर होता दिखे यह संभव नहीं। थोड़े शब्दों में कहें तो यह शरद पवार की राजनीति की ही स्वाभाविक परिणाम है।
एक वर्ष पहले हुई शिवसेना में विद्रोह और राकांपा के वर्तमान टूट में गुणात्मक अंतर यही है कि तब उद्धव ठाकरे को इसका आभास नहीं था और शरद पवार जानकारी होते हुए भी रोक नहीं सके। शरद पवार विरोध में उतर रहे हैं तो कुछ समय के लिए नेताओं विधायकों का एक समूह उनके साथ दिखेगा। पर तस्वीर बता रही है कि उनके हाथ से नियंत्रण बाहर जा चुका है। इस घटना का तीन और पहलुओं के आधार पर संपूर्ण विश्लेषण किया जा सकता है। पहला , यह राकांपा की टूट है तो इस पर किसका दावा बनता है? दूसरे, इसका महाराष्ट्र की राजनीति में क्या असर होगा? और तीसरा, राष्ट्रीय राजनीति यानी नरेंद्र मोदी और भाजपा विरोधी विपक्षी एकजुटता इससे कितनी प्रभावित होगी?
प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि पार्टी ने फडणवीस और शिंदे सरकार में शामिल होने और समर्थन करने का फैसला किया है। यानी यह टूट नहीं पार्टी का निर्णय है। यह भी कहा कि शरद पवार हमारे नेता थे, हैं और रहेंगे। अजित पवार ने भी राकांपा के संदर्भ में यही बात कही। यानी ये कह रहे हैं कि पार्टी के फैसले से हम गए हैं हमने न बगावत की, न पार्टी तोड़ा है। यह स्टैंड ऐसा है जिसकी काट जरा मुश्किल होगी। शरद पवार के विरुद्ध ये कुछ नहीं बोलेंगे ,लेकिन स्टैंड यही रहेगा। उद्धव ठाकरे के विपरीत शरद कह रहे हैं कि वे कानूनी लड़ाई नहीं लड़ेंगे, जनता के बीच जाएंगे। हालांकि विधानसभा में अजित और विद्रोहियों की सदस्यता रद्द करने की मांग की गई है। तो होगा क्या?
अजीत और प्रफुल्ल कह रहे हैं कि वह राकांपा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ेंगे। यानी चुनाव के पूर्व पार्टी चुनाव चिन्ह को लेकर अभी तक दोनों पक्ष दावा करने के लिए चुनाव आयोग जाने का संकेत नहीं दे रहे। शरद अगर चुनाव के दौरान चुनाव आयोग के पास जाते हैं तभी इसकी कानूनी लड़ाई आरंभ होगी। वैसे विधानसभा में अध्यक्ष के पास आवेदन देने के साथ कानूनी और संवैधानिक लड़ाई आरंभ हो गई है। कानूनी लड़ाई का व्यवहार में बहुत ज्यादा मायने नहीं होता। किसी को चुनाव चिन्ह मिल जाए और नेता, विधायक, सांसद साथ नहीं हो तो उसका कोई अर्थ नहीं। प्रफुल्ल पटेल ,छगन भुजबल जैसे नेता शरद पवार से अलग निर्णय करते हैं तो यह साधारण घटना नहीं है। प्रफुल्ल पिछले करीब ढाई दशक से शरद पवार के सर्वाधिक विश्वसनीय एवं निकटस्थ नेताओं में हैं । छगन भुजबल की हैसियत भी बहुत बड़ी है। यही स्थिति लगभग दिलीप वलसे पाटील की भी है। ऐसे नेताओं के बाहर जाने के बाद शरद पवार के साथ पूरे प्रदेश में पहचान रखने वाले नेताओं की तलाश करनी पड़ेगी। अगर भारी संख्या में विधायक, सांसद और नेता इनके साथ हैं तो स्वाभाविक है कि वर्तमान राकांपा पर इन्हीं का नियंत्रण है। शरद पवार की मराठवाडा में प्रतिष्ठा है खासकर गांव में और उनके साथ लोग खड़े होंगे किंतु यह स्थाई नहीं हो सकता। 84 वर्ष की उम्र के व्यक्ति के साथ राजनीति का कोई व्यक्ति तभी खड़ा होगा जब उसे आगे अपना भविष्य दिखाई दे। सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को कार्याध्यक्ष बनाकर उन्होंने अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। सुप्रिया संगठन की व्यक्ति नहीं हैं। उनकी पूरी ताकत शरद पवार हैं। सुप्रिया के साथ जाकर कोई जोखिम मोल लेना नहीं चाहेगा। दूसरे, महाराष्ट्र विधानसभा में कांग्रेस को छोड़कर शरद के साथ बचे राकांपा और उद्धव शिवसेना के बचे-खुचे नेताओं की यह हैसियत नहीं कि वे ज्यादा लोगों को साथ ला सके। वहां का माहौल एकपक्षीय होगा। शरद पवार स्वयं विधानसभा में नहीं है। तो इसका भी असर होगा। इसलिए इस समय शरद पवार के साथ खड़े लोगों, या उनकी रैली आदि में संख्या के आधार पर भविष्य का निष्कर्ष मत निकालिए।
चूंकि शरद पवार पटना की विपक्षी बैठक में शामिल हो चुके हैं इस कारण उन्हें उन पार्टियों का समर्थन मिलेगा। उसका धरातल पर कोई मायने नहीं होगा। धरातल का सच यही है कि शरद पवार की राजनीतिक पारी का लगभग अंत हो चुका है। 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल के सैद्धांतिक मुद्दे को उठाकर उन्होंने कांग्रेस से अलग राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई। यह बात अलग है कि बाद में वह कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़े, यूपीए सरकार में मंत्री रहे,प्रदेश में भी सरकार चली। पार्टी शायद अभी कुछ दिन रहेगी किंतु उसका बड़ा हिस्सा उनके साथ नहीं। शरद के कमजोर होने और राकांपा के बड़े समूह का प्रमुख और प्रभावी नेताओं के साथ भाजपा गठबंधन में साथ आने के बाद महाराष्ट्र का पूरा राजनीतिक वर्णक्रम बदल गया है। अब महाविकास अघाडी में कांग्रेस प्रमुख पार्टी है और शरद पवार के नेतृत्व वाला राकांपा ,उद्धव ठाकरे की शिवसेना काफी कमजोर। इस तरह तात्काल प्रदेश की राजनीति एकपक्षीय रूप से भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन की ओर झुका दिखाई देता है। वर्तमान राष्ट्रीय राजनीति पर इसका दो तरीकों से असर होगा। पहला , शरद पवार भाजपा और मोदी विरोधी मोर्चाबंदी के वरिष्ठ नेता है। पार्टी के इस बड़े टूट के बाद उनका वह प्रभाव नहीं होगा। भाजपा के लिए इसका बड़ा मायने यही है कि महाराष्ट्र 48 सीटों के साथ उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा सबसे ज्यादा सांसद देने वाला प्रदेश है जो चुनावी दृष्टि से ज्यादा सुरक्षित हो गया दिखता है। इस समाचार की पुष्टि हो रही है कि अलग होने वाले नेताओं ने शरद पवार से विपक्षी मोर्चाबंदी में न जाने का आग्रह लगातार किया था। यानी पार्टी का बहुमत मोदी विरोधी गठबंधन में जाने के पक्ष में नहीं था। इसका अर्थ यही है कि अजित पवार ,प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल जैसे नेता नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा गठबंधन में जाने का मन बना चुके थे। अजीत पवार ने अपनी पत्रकार वार्ता में इसका स्पष्ट रूप से उल्लेख किया। इस तरह यहां राजनीतिक विचारधारा की भी भूमिका है। मान सकते हैं कि अजित विचारधारा के स्तर पर कोई सिद्धांतवादी नेता नहीं है। बावजूद वे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का अच्छा भविष्य होने की बात कह रहे हैं तो इसे केवल टूट के लिए गढ़ा गया तर्क मानना उचित नहीं होगा। निस्संदेह , इसके पीछे अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता होगी। किसके साथ जाने से हमारा राजनीतिक लाभ होगा यह कोई भी सोचता है पर आधार ठोस होता है। शरद पवार विरोधी इस समूह का कदम बताता है कि उनकी दृष्टि में महाराष्ट्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव जीतने की संभावना ज्यादा प्रबल है। यह न केवल महाराष्ट्र बल्कि देश के विपक्षी गठजोड़ की दृष्टि से बहुत बड़ी टिप्पणी है। जो नेता विपक्षी मोर्चाबंदी में बैठ रहे हैं उनकी पार्टी साथ है या नहीं इसे लेकर बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है।
अवधेश कुमार, ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208
बुधवार, 28 जून 2023
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नए अध्याय का निर्माण
अवधेश कुमार
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अमेरिका ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजकीय यात्रा पर आमंत्रित करने के साथ जिस तरह स्वागत सम्मान किया, उनके प्रति राष्ट्रपति जो वाइडन ,उनकी पत्नी जिल वाइडन, उपराष्ट्रपति कमला हैरिस सहित संपूर्ण वाइडन प्रशासन और विपक्ष का जैसा व्यवहार रहा एवं जिस तरह के समझौते हुए वैसा पिछले अनेक वर्षों में नहीं हुआ। किसी को याद नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी की तरह का व्यवहार दूसरे वैश्विक नेता या देश के साथ अमेरिका में कब किया गया। मोदी को व्हाइट हाउस के अंदर ले जाने के लिए एक तरफ राष्ट्रपति बाइडन ने हाथ पकड़ा था तो दूसरी ओर उनकी पत्नी। बाइडन के साथ व्हाइट हाउस में पहली मुलाकात के समय पहली बार व्हाइट हाउस ने इतनी संख्या में भारतीय अमेरिकियों के लिए दरवाजे खोले थे। अमेरिका में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी और विपक्षी विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी के बीच गहरे मतभेद और टकराव है किंतु भारत के साथ गहरे बहुपक्षीय रिश्तों और रणनीतिक साझेदारी को लेकर गजब एकता दिखी है। दोनों पार्टियों ने मोदी को अमेरिकी संसद को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया और संबोधन के दौरान उत्साहजनक तालियां एवं 15 बार स्टैंडिंग ओवेशन मिला। सांसदों में नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाने और ऑटोग्राफ लेने की होड़ थी।
आलोचकों ने कहा है कि यह तो खरीदी हुई राजकीय यात्रा, संसद संबोधन एवं सम्मान था। इस प्रकार की आलोचना न केवल भारत को छोटा करना है बल्कि इस यात्रा के फलितार्थों, भारत अमेरिका संबंधों, भारत के विश्व में प्रभावी महाशक्ति बनने, अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करने तथा आने वाले समय के लिए वैश्विक समीकरणों की दृष्टि से इसके विराट महत्व को कम करना होगा। इस यात्रा से 21वीं सदी के वैश्विक समीकरणों में बदलाव की शुरुआत हुई तथा ऐसी नई विश्व व्यवस्था की नींव पड़ी है जिसमें भारत अपनी क्षमता, विचारधारा और नेतृत्व की बदौलत निर्णायक भूमिका में दिखाई पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाशिंगटन के कैनेडी सेंटर में भारत और अमेरिका के शीर्ष कारोबारियों, समाजसेवियों और भारतीय अमेरिकी समुदाय के सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत अमेरिकी साझेदारी सहूलियत पर नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास ,साझा प्रतिबद्धता और संवेदना पर आधारित है।
तीन दिनों की यात्रा में राष्ट्रपति बाइडन के साथ चार चरणों की मुलाकात के बाद दोनों देशों की तरफ से रक्षा, अंतरिक्ष, कारोबार व अत्याधुनिक प्रौद्यौयिगिकी में सहयोग की जो बड़ी घोषणाएं हुई, समझौते हुए वे सब दो देशों के बीच ही नहीं संपूर्ण विश्व के बदलते समीकरणों के परिचायक हैं। इस यात्रा से भारत अमेरिका संबंधों ,अंतरराष्ट्रीय राजनीति एवं नई विश्व व्यवस्था की दृष्टि से नए दौर की शुरुआत हुई, नए अध्याय का निर्माण हुआ है। भारतीय वायु सेना के हल्के युद्धक विमान तेजस् की अगली पीढ़ी के विमानों में लगने वाला एफ414 इंजन को जनरल इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल के साथ मिलकर निर्माण करेगा। सेमीकंडक्टर बनाने वाली माइक्रोन अहमदाबाद में प्लांट लगाने में 2.7 अरब डॉलर का निवेश करेगी तो अप्लाइड मैटेरियल्स भी 80 करोड़ डॉलर का निवेश करने जा रहा है। दोनों देशों द्वारा चांद, मंगल, अंतरिक्ष के दूसरे क्षेत्रों के रहस्य का पता लगाने के लिए साझा अभियान चलाना नए अंतरराष्ट्रीय परिवेश का ही परिचायक है। जो अमेरिका एक समय भारत को जीपीएस देने को तैयार नहीं था वह अंतरिक्ष में साझेदारी तक बढ़ गया। अभी तक रूस अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत का सबसे निकट का साझेदार रहा है।
भारत ने 2020 के आर्टेमिस समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। यह 1967 के अंतरिक्ष समझौते पर आधारित अमेरिका द्वारा निर्मित एक गैर बाध्यकारी व्यवस्था है जो अंतरिक्ष में असैन्य शोध के मूल आदर्श व्यवहार के मापदंडों को निर्धारित करती है। अमेरिका बंगलुरु और अहमदाबाद में दो नए वाणिज्य दूतावास खोलेगा तो भारत सिएटल में। कारोबारी संभावनाएं नहीं हो तो वाणिज्य दूतावास खोलने का कोई अर्थ नहीं हो सकता। जनरल एटॉमिक्स के साथ 30 एमक्यू-9 बी प्रिडेटर यानी रीपर ड्रोन खरीदने पर भी सहमति इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह दुनिया का सबसे घातक मानवरहित विमान है जिसके अचूक निशाने व सटीक निगरानी को संपूर्ण विश्व स्वीकार करता है। अमेरिका ने उच्च शिक्षा हासिल भारतीय पेशेवरों के लिए ज्यादा सहूलियतों और सुविधाओं की घोषणा की। एच 1बी वीजा की संख्या बढ़ाई गई और नवीनीकरण भी अमेरिका के अंदर की हो जाने की घोषणा हुई। अमेरिका भारतीय छात्रों को भी उदारतापूर्वक वीजा देगा। पिछले वर्ष अमेरिका ने भारतीय छात्रों को करीब एक लाख 25 हजार वीजा जारी किए जो रिकॉर्ड है।
मोदी बाइडन के बीच शिखर वार्ता के बाद आतंकवाद और कट्टरता के बढ़ते खतरे पर जारी संयुक्त बयान में पाकिस्तान के लिए सख्त शब्दों का प्रयोग सामान्य बात नहीं है। बयान में सीमा पार आतंकवाद की निंदा के साथ कहा गया है कि पाकिस्तान सुनिश्चित करे कि उसकी जमीन का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए न हो। मुंबई हमले व पठानकोट हमले के दोषियों को सजा दिलाने की मांग के साथ संयुक्त राष्ट्र की तरफ से घोषित अलकायदा जैसे मोहम्मद लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों के खिलाफ ठोस कदम उठाने की अपील भी इसमें है। दोनों देशों ने आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स एफएटीएफ के अंदर ज्यादा सहयोग करने की बात कही है। आतंकवाद के विरुद्ध इस तरह की स्पष्ट घोषणा और सहमति बताती है कि अमेरिका भारत के साथ किस सीमा तक आगे बढ़ने का निर्णय कर चुका है। अमेरिकी प्रशासन ने आतंकवाद को लेकर पहली बार इस तरह की सहमति किसी देश के साथ व्यक्त की और संयुक्त बयान जारी किया।
इस तरह समझौते ,साझेदारी, सहमतियां और घोषणाएं निश्चित रूप से बदलते वैश्विक समीकरणों एवं नई विश्व व्यवस्था के परिचायक हैं । अमेरिका ने इसके पूर्व किसी भी देश के साथ इस तरह के खुले समझौते बिना अनुबंध और शर्तों के नहीं किए थे। जर्मनी और जापान के साथ उसके समझौते अनुबंध आधारित रहे हैं। निस्संदेह ,अमेरिका के अपना रणनीतिक हित हैं,भारत के साथ संबंधों को लेकर उसकी हिचक खत्म हो गई है। सामरिक सहयोग में दोनों देश लगातार नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। दोनों देश के सैन्य ठिकानों ,सुविधाओं तक पहुंच के साथ संवेदनशील सूचनाओं की साझेदारी अब ऐसे ठोस दौर में पहुंच गया है जहां से हम भावी वैश्विक तस्वीरों को आसानी से देख सकते हैं। भारत ने अमेरिका के साथ सबसे ज्यादा साझा सैन्य अभ्यास किया है। भारत की भूमिका क्वाड को सामरिक तेवर देने में भी महत्वपूर्ण रहा है इसे बाइडन ने अपने आरंभिक संयुक्त वक्तव्य में स्वीकार भी किया। भारत विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या के साथ सबसे तेज गति से बढ़ती हुई आर्थिक शक्ति है। भारत की बढ़ती हुई आर्थिक एवं सैन्य ताकत ने इसे एशिया और विस्तारित एशिया प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने कहा भी कि अमेरिका भारत साझेदारी ही हिंद प्रशांत क्षेत्र की शांति एवं सुरक्षा के मूल में है। यही क्षेत्र विश्व में राजनीतिक एवं आर्थिक केंद्र के रूप में उभर रहा है।
इसमें दो राय नहीं कि अमेरिका की चिंता चीन की बढ़ती आर्थिक एवं सामरिक ताकत है। चीन संपूर्ण विश्व में जिस तरह की आपूर्ति श्रृंखला स्थापित कर रहा है उसका मुकाबला भारत के बगैर आज के विश्व में संभव नहीं है। चीन भारत के लिए भी चिंता का कारण है। रूस और चीन की दोस्ती अमेरिका के लिए 21 वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। यूक्रेन युद्ध ने संपूर्ण विश्व के समक्ष नए प्रकार के खतरों और चुनौतियों को रेखांकित किया है। इनको ध्यान में रखें तो भारत अमेरिका के आर्थिक, सामरिक, सांस्कृतिक साझेदारी तथा पृथ्वी, आकाश, पाताल सहित जीवन के हर क्षेत्र में सहयोग पर सहमति का महत्व समझ में आ जाएगा। व्हाइट हाउस में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में रणनीतिक संचार के समन्वयक जॉन किर्बी ने इस यात्रा का लक्ष्य भारत को चीन के मुकाबले पेश करना नहीं बल्कि विश्व के दो बड़े लोकतांत्रिक देशों के बीच रक्षा सहयोग सहित अन्य संबंधों को प्रगाढ़ करना बताया। वास्तव में विश्व को लेकर भारत और अमेरिका का दृष्टिकोण पूरी तरह समान नहीं हो सकता किंतु अनेक बिंदुओं पर सहमति है और इस दृष्टि से दोनों के बीच साझेदारी वैश्विक व्यवस्था के पुनर्निर्माण की क्षमता रखता है।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208
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