शुक्रवार, 12 मई 2023

शुक्रवार को गांधीनगर के विधायक अनिल बाजपेई ने सुनी लोगों की जन समस्याएं

हर बार की तरह इस बार भी शुक्रवार को गांधीनगर के  विधायक श्री अनिल बाजपेई जी ने लोगो की समस्याओं को सुना।

आज विशेष बात यह भी रही कि गांधीनगर के एसएचओ श्री भगवती प्रसाद जी और गांधी नगर की निगम पार्षद श्रीमती प्रिया जी ने भी इस अवसर पर उपस्थित रहकर लोगो को समस्याओं को सुना।

गांधीनगर के एसएचओ श्री भगवती प्रसाद जी ने लोगो को कहा की दिल्ली पुलिस तो कैमरे लगाती है लोगो को भी अपने घरों पर कैमरे लगाने की पहल करनी चाहिए और किरायदारों की वेरिफिकेशन भी करानी चाहिए,।

आज की मीटिंग में श्री विशाल मिश्रा,श्री ऋषि राय,श्री आयुष कुमार श्री राजेंद्र वर्मा श्री अरूण शर्मा जी के अलावा एरिया के सम्मानित लोग भी मौजूद थे।

उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षा में नए अध्याय की शुरुआत

अवधेश कुमार

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की 10वीं और 12वीं हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा से लेकर परिणाम तक की पूरी प्रक्रिया को अगर अनेक शिक्षाविद और विश्लेषक उदाहरण के रूप में पेश कर रहे हैं तो यह बिल्कुल स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश में कोई परीक्षा और परिणाम विवादित नहीं हो इसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। ऐसा हुआ तो साफ है कि प्रदेश में शिक्षा और परीक्षा के क्षेत्र में नए अध्याय की शुरुआत हुई है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की स्थापना का यह 100वां वर्ष है।सच कहा जाए तो परीक्षा और परिणाम दोनों के साथ नए इतिहास का निर्माण हुआ है। उत्तर प्रदेश बोर्ड के इतिहास में अब तक के सबसे कम समय में यह परिणाम घोषित हुआ है। ध्यान रखिए उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद एशिया का सबसे बड़ा शैक्षणिक बोर्ड है। इनमें परीक्षार्थियों की भारी संख्या को देखते हुए यह कहा जाने लगा था कि इतनी बड़ी संख्या से लेकर भौगोलिक रूप से पूरब से पश्चिम उत्तर से दक्षिण की दूरी के बीच आयोजित परीक्षाओं में कुछ न कुछ गड़बड़ी होगी ही। 10वीं  की परीक्षा में में कुल पंजीकृत छात्रों की संख्या 31 लाख 16 हजार 454 थी जिनमें से 28 लाख 63 हजार 631 छात्र परीक्षा में बैठे। इसी तरह इंटरमीडिएट या 12 वीं में कुल पंजीकृत थे 27 लाख 68 हजार 180 जिनमें से 25 लाख 71 हजार 2 छात्र परीक्षा में बैठे। इस तरह 54 लाख से ज्यादा छात्रों ने परीक्षा दिया, जिनमें से 46 लाख से थोड़ा ज्यादा उत्तीर्ण हुए।

इतनी बड़ी संख्या परीक्षार्थियों की तो दुनिया के अनेक देशों में नहीं है। उसमें भी उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद कई मामलों में बदनाम था। कदाचार, नकल और काफी विलंब से परिणाम घोषित करना उसकी पहचान बन गई थी। मान लिया गया था कि चाहे इसकी जितनी आलोचना हो इसे पूरी तरह बदला ज्यादा बिल्कुल संभव नहीं है । इतनी बड़ी संख्या कि परीक्षार्थियों के उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन उनके प्रारूप में उनकी गणना और फिर अंततः अंतिम परिणाम निकालने में तो समय लगेगा। लेकिन हुआ क्या?  बोर्ड की परीक्षा 16 फरवरी से 4 मार्च तक आयोजित की गई थी। इसके बाद मूल्यांकन-  पुनर्मूल्यांकन 14 दिनों में पूरा हो गया और 25 अप्रैल को परिणाम जारी। इस तरह परीक्षा खत्म होने के 52 दिनों बाद ही परिणाम आ गया। परीक्षा पूरी तरह कदाचार मुक्त। यानी नकल की एक भी सूचना पूरे प्रदेश से कहीं नहीं आई। इसी तरह प्रश्न पत्र लीक होने की परंपरा भी खत्म हो गई। ऐसा कोई वर्ष नहीं था जब प्रश्न पत्रों के लीक का मामला सामने नहीं आता। हर बार किसी न किसी पत्र या कई पत्रों की पुनर्परीक्षाएं भी आयोजित करनी पड़ती थी। कई बार तो एक ही विषय की पुनर्परीक्षा कई बार करानी पड़ी क्योंकि बार-बार प्रश्न लीक होने की घटनाएं सामने आ गई। आपको उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद को जानने वाले बोलते मिल जाएंगे कि ऐसा हो गया पर अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है कि वाकई ऐसा हुआ ही है। फिर नहीं कह सकते की नकल नहीं होने या प्रश्न पत्र लिक नहीं होने का असर उत्तीर्ण होने वाली संख्या पर पड़ा है।

बिना नकल के संपन्न कड़ी परीक्षा के बावजूद अगर 10 वीं  में 89.78 प्रतिशत और 12 वीं में 75.52% परीक्षार्थी सफल हुए हैं तो इससे सामान्य नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न है कि यह चमत्कार हुआ कैसे? वास्तव में योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल में शिक्षा का सुधार एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। वैसे तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति धीरे-धीरे जमीन पर उतर रही है, किंतु उप्र की परीक्षाओं का अतीत शर्मनाक रहा है। सरकार ने इस बात के लिए कमर कस लिया था कि परीक्षा को इतना फूलप्रूफ बनाएंगे कि दूसरी सरकारें भी हमारी नकल करने को विवश हो जाए। पहले लंबा विचार मंथन हुआ और फिर उनमें से आए महत्वपूर्ण सुझावों- विचारों को कार्य रूप में परिणत करना आरंभ हुआ। वास्तव में उप्र बोर्ड ने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट दोनों परीक्षाओं में ऐसे कई नए और महत्वपूर्ण प्रयोग किए जिनका असर दिखा। शायद कईयों को इसका महत्व समझ में तब आएगा जब यह पता चले कि बोर्ड के  इतिहास में पहली बार है जब परिणाम रिकॉर्ड समय में जारी किया गया। दूसरे, प्रश्न पत्र लिक नहीं हुआ यह तो महत्वपूर्ण है ही, किसी भी दिन गलत प्रश्न पत्र नहीं खोले गए यह भी सामान्य परिवर्तन नहीं है। जब पेपर लीक नहीं हो या एक विषय की जगह दूसरे विषय का प्रश्न पत्र न खुल जाए तो पुनर्परीक्षा कराने की आवश्यकता ही नहीं हो सकती । इसी का परिणाम था कि पुनर्परीक्षा नहीं करानी पड़ी। सारी चीजें एक दूसरे से जुड़ी हुई है। अगर प्रश्नपत्र लीक हो जाते या परीक्षा वाले विषय की जगह दूसरे दिन वाले विषय के प्रश्नपत्र खुल जाते तो पुनर्परीक्षा करानी पड़ती और  रिकॉर्ड समय में परिणाम निकालना संभव नहीं होता। यह यूं ही नहीं हुआ। पूरी व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा और आवश्यक परिवर्तन के साहसिक निर्णय से ही संभव हुआ है। इनके लिए सबसे पहली आवश्यकता प्रश्न पत्रों को सुरक्षित रखने की होती है।  जैसी सूचना है पहली बार उच्चस्तरीय सुरक्षा मानकों के अनुसार 4 लेयर में टैंपर एवीडेंट लिफाफे में पैकेजिंग की गई थी। इस कारण कोई भी प्रश्न पत्र लीक होकर वायरल नहीं हुआ। दूसरे, परीक्षा केंद्रों पर प्रश्न पत्रों को सुरक्षित रखने के लिए प्रधानाचार्य के कक्ष से अलग एक कक्ष में स्ट्रांग रूम की व्यवस्था की गई जिसे हर तरह से सुरक्षित किया गया था। इन सबसे भी आगे उत्तर पुस्तिकाओं में किसी प्रकार परीक्षा के बाद परिवर्तन नहीं हो, वो सुरक्षित रहें इसके लिए पहली बार क्यूआर कोड

 का प्रयोग हुआ और माध्यमिक शिक्षा परिषद का लोगो लगाया गया। इससे उत्तर पुस्तिकाओं की शुचिता सुनिश्चित और पुनःस्थापित हुई। सभी जनपदों में सिलाईयुक्त उत्तर पुस्तिकाएं प्रेषित की गई। स्वभाविक ही इतने कदम से उत्तर पुस्तिकाओं में किसी भी प्रकार के हेरफेर या परिवर्तन की संभावना खत्म करने की कोशिश हुई और अभी तक की सूचना में इसके अपेक्षित परिणाम आए हैं।

वास्तव में किसी भी व्यवस्था में केवल ऊपरी आदेश या सख्ती से अपेक्षित सकारात्मक परिवर्तन नहीं हो सकता। उसके लिए उसकी पूरी संरचना, प्रकृति और तौर-तरीकों में आंतरिक स्तर पर परिवर्तन करना पड़ता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं अभिरुचि ली और शिक्षा मंत्री के अलावा उच्चाधिकारियों के साथ संबंध में संवाद बनाए रखा। बार-बार यह संदेश दिया गया कि सरकार परीक्षाओं को शत प्रतिशत पवित्र और दोषरहित बनाने के प्रति पूरी तरह संकल्पित है और जो इस रास्ते की बाधा बनेगा उसे परिणाम भुगतना पड़ेगा। संदेश दिया गया कि अगर परीक्षा में कोई भी गड़बड़ी हुई तो उसके लिए जिम्मेवारी तय करके सजा दी जाएगी । जैसा हम सब जानते हैं उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने अपने लिए तीन सोपान तय किए थे। गुणवत्तापरक शिक्षा, परीक्षा शत-प्रतिशत नकल विहीन तथा मूल्यांकन शुचितापूर्ण। जब माध्यमिक शिक्षा परिषद ने अपने आंतरिक व्यवस्था में सुधार आरंभ किए तो शैक्षणिक और राजनीतिक क्षेत्रों से उसका विरोध भी हुआ। उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार कोई भी कदम उठाए तो उसे राजनीतिक विचारधारा के आईने में हमेशा आलोचना और हमले झेलने पड़ते हैं। खासकर जब नकल करने वालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए लगाने तथा परीक्षा निरीक्षकों पर भी कानूनी कार्रवाई का की घोषणा हुई तो पूरे देश में इसका विरोध हुआ। पहली दृष्टि में यह बात गले नहीं उतर रही थी कि अगर कोई छात्र नकल कर रहा है तो उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून क्यों लागना चाहिए? उसी तरह अगर परीक्षा निरीक्षक की गलती नहीं है और किसी ने उसकी नजर बचाकर नकल कर लिया तो उसके लिए निरीक्षक क्यों जेल जाए और सजा भुगते ।

इन सबके परिणाम हमारे सामने हैं। यह संभव नहीं कि मनुष्य कोई काम करे और उसमें छोटी मोटी भूलें न हो। किंतु उसे न्यूनतम बिंदु पर लाया जा सकता है। यह साबित हो गया कि अगर राजनीतिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति हो तथा संकल्पबद्धता के साथ काम किया जाए तो छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के व्यवहार में परिवर्तन के साथ व्यापक सुधार संभव है। निश्चय ही अन्य राज्य उत्तर प्रदेश से सीख ले सकते हैं।

 

मंगलवार, 9 मई 2023

सोमवार, 8 मई 2023

विगत 05 वर्षो के दौरान वार्षिक विवरणी आर.एन.आई. में न प्रस्तुत करने पर प्रकाशन होगा रद्द

उत्तर प्रदेश। अपर प्रेस पंजीकय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय नई दिल्ली द्वारा जनपद गौतमबुद्धनगर से प्रकाशित 261 समाचार पत्र/पत्रिकाओं की विगत पॉच वर्षो के दौरान वार्षिक विवरणी न प्रस्तुत करने पर प्रकाशन को रद्द करने से सम्बन्धित पत्र जिला कलेक्टर/जिला मजिस्ट्रेट को प्रेषित किया है। जिला मजिस्ट्रेट सुहास एल.वाई. के निर्देश पर तत्सम्बन्धी समाचार पत्र/पत्रिकाओं की सूची उनके प्रकाशक/स्वामी के अवलोकनार्थ जिला सूचना कार्यालय गौतमबुद्धनगर में उपलब्ध है।
उपरोक्त पत्र के द्वारा अवगत कराया है कि भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय (आर.एन.आई.) प्रेस एवं पुस्तकों के पंजीयन अधिनियम 1867 के अन्तर्गत सम्बन्धित जिला मजिस्ट्रेट के द्वारा संस्तुति किये गये घोषणा पत्र के आधार पर समाचार पत्रों/पत्रिकाओं का पंजीयन करता है। पंजीकृत प्रकाशनों के स्वामी/प्रकाशक के लिए यह अनिवार्य है कि वह निर्धारित प्रपत्र में प्रेस एवं पुस्तक पंजीयन अधिनियम 1867 की धारा-19डी के अनुसार प्रत्येक वर्ष 30 जून तक अथवा उससे पूर्व वार्षिक विवरणी आरएनआई कार्यालय में जमा कर दें। पत्र के द्वारा यह अवगत कराया गया है कि ऐसे प्रकाशक जिन्होनें विगत तीन वर्षो तक वार्षिक विवरणी प्रस्तुत नहीं की थी जनवरी 2020 में अवसर प्रदान किया गया था कि वे अपनी वार्षिक विवरणी जमा कर दें। अपर प्रेस पंजीयक आरएनआई द्वारा जारी पत्र व जनपद गौतमबुद्धनगर के 261 पंजीकृत प्रकाशनों की सूची प्रकाशन स्थल के आधार पर जिला सूचना कार्यालय गौतमबुद्धनगर में उपलब्ध है। 

सम्बन्धित समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक सूची देखकर वांछित सूचना जिला सूचना अधिकारी गौतमबुद्धनगर को 1 सप्ताह के भीतर अनिवार्य रूप से उपलब्ध करा दें अन्यथा पीआरबी अधिनियम 1867 की धारा-8 के अन्तर्गत इन प्रकाशनों प्राधिकत घोषणा पत्र (फार्म-1) रदद् कर दिया जायेगा। आरएनआई के द्वारा जिन समाचार पत्रों के नाम पत्र के माध्यम से जिलाधिकारी को प्रेषित किये है उसमें विकल्प चेतना, समय संबंध, लोकमंच जन चेतना, बाजार गाइड, वॉइस ऑफ इंडिया, नोएडा लाइफ, लोह स्तंभ, जनता विद्यालय एच एस स्कूल जेवर मैगजीन, मतदाता लोक संपर्क ऑन लोकसेवा सूत्र, भवानी मेल, आनंद धाम, बुद्धि प्रकाश, यथार्थ समाचार, विकासशील भारत, नोएडा दर्पण, नोएडा टाइम्स, रिफॉर्म इंडिया, उत्तरांचल गौरव, स्वर्ण विधान, निशा संदेश, युगांचल, स्वतंत्र हिंद सत्ता, वॉइस ऑफ दी कॉरपोरेट वर्ल्ड, पंच सत्ता, न्यू नोएडा बाजार, विस ए विस, गांव देहात, वर्तमान सच्चाई, मीडिया सत्ता, सुदर्शन इंडिया, प्रोफाइलर, कानून की कलम, मंत्रा माधव, भारत धाम, कर्ण मीडिया, चारुशील भारत, जन जन की आवाज जनचेतना, प्राकृत मार्ग, जी आई एस एंड डेवलपमेंट, दा फ्यूचर जेड टाइम्स, देहात 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आत्मनिर्भरता के लिए जीवन विज्ञान की शिक्षा उपयोगी

डाॅ. वीरेन्द्र भाटी मंगल
(वरिष्ठ साहित्यकार व चिंतक)
देश में नई शिक्षा नीति का निर्धारण हो चुका है। शिक्षा में नई नीति भावी नागरिक में मूल्यों के निर्माण की दिशा में उठा विशिष्ट कदम है। सही मायने में आत्मनिर्भर बनाने में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है। वर्तमान आधुनिक शिक्षा व्यवसाय व नौकरी तक सिमटती जा रही है। जबकि शिक्षा सही मायने में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक व बौद्धिक विकास का समन्वित रूप है। जीवन विज्ञान में शिक्षा को दार्शनिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है, अर्थात् शिक्षा को अन्तिम परिभाषा, सर्वमान्य उद्देश्य, पाठ्यक्रम एवं चिन्तन आधारित शिक्षा विधियों का निर्माण होता है, यही दर्शन शिक्षा के नाम से पुकारा जाता है, केवल शिक्षाशास्त्र नहीं केवल दर्शनशास्त्र नहीं परन्तु नव-सर्जित विषय शिक्षा दर्शन का स्वरूप बन जाता है। दर्शन के विभिन्न अंग-ज्ञान दर्शन, मूल्य दर्शन, नीति दर्शन, सौन्दर्य दर्शन आदि के समान ही शिक्षा दर्शन के भी विभिन्न अंग निश्चित किये जाते हैं। इसमें अंतिम, शाश्वत एवं सूक्ष्म, ज्ञान, तर्क, नैतिकता, सौन्दर्यानुभूति आदि का अध्ययन शिक्षा के रूप, उद्देश्य, मूल्य, आदर्श, विधि, भावनात्मक दृष्टिकोण आदि के रूप में होता है।
शिक्षा से ही सभी समस्याओं का समाधान संभव है वहीं समाज निर्माण पूर्ण शिक्षा से ही निर्धारित होता है। शिक्षा में जीवन विज्ञान की परिकल्पना करते हुए आचार्य महाप्रज्ञ कहते है वर्तमान शिक्षा प्रणाली गलत नहीं है पर अधूरी है, संतुलित नहीं है। संतुलित शिक्षा प्रणाली वह होती है जिसमें व्यक्तित्व के चारों आयाम शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और भावनात्मक-संतुलित रूप से विकसित हो। इन चारों आयामों का विशिष्ट रूप जीवन विज्ञान में देखने को मिलते है। शरीर, मन, बुद्धि और भावना का विकास भी अपेक्षित है। शिक्षा के दो आयाम शारीरिक विकास और बौद्धिक विकास प्रमुख रूप से प्रचलित है। आज की शिक्षा में इन दो आयामों का विकास तो हो रहा है लेकिन मानसिक व भावनात्मक विकास पर ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं जिसके कारण शिक्षा से मानवीय चिंतन की परिकल्पना का असंतुलन हो गया है।
आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ के निर्देशन में शिक्षा में जीवन विज्ञान नीति के निर्धारण के लिए अनुंशषा पत्र तैयार किया गया। जिसमें जीवन विज्ञान की आवश्यकता पर बल दिया गया। जीवन विज्ञान की कल्पना और योजना को व्यापक रूप से वैज्ञानिक तर्क संगत के साथ प्रयोग सिद्ध भी बताया गया। संतुलित एवं पूर्ण शिक्षा के लिए जीवन विज्ञान की आवश्यकता पर बल दिया गया। जीवन विज्ञान में अध्यात्म और विज्ञान, मनोविज्ञान और समाज विज्ञान तथा सृष्टि संतुलन शास्त्र का समन्वित रूप है। शिक्षा में जीवन विज्ञान की परिकल्पना को विशिष्ट शिक्षा आयाम बताते हुए वे कहते है जीवन विज्ञान यह मानता है कि मस्तिष्क में अपार शक्ति है, और उस शक्ति का विकास जीवन विज्ञान के प्रयोगों से संभव है।
यदि अपराध व हिंसा को कम करना है तो समाज को भी संयम की जीवनशैली अपनाना होगी। यदि समाज के मुखिया ही नैतिक जीवन जिएं तो हमारा चिंतन बदल सकता है, तथा अपराध व हिंसा की समस्या भी कम हो जाएगी। शिक्षा दर्शन वास्तव में दर्शन होता है, क्योंिक उसमें भी अन्तिम सत्यों, मूल्यों, आदर्शों, आत्मा-परमात्मा, जीव, मनुष्य, संसार, प्रकृति आदि पर चिन्तन एवं उसके स्वरूप को जानने का प्रयत्न होता है, अतएवं यह दर्शन एक अभिन्न अंग ही होता है और प्रारम्भिक शिक्षा दार्शनिक दर्शन पर ही बल देते रहे हैं।
मानव जीवन में शिक्षा का एक प्रमुख कार्य व्यक्ति को आत्म निर्भर बनाना है। ऐसा व्यक्ति समाज के लिये भी सहायक होता है, जो अपना भार स्वयं उठा लेता है। भारत जैसे विकासशील समाज में व्यक्ति को आत्म निर्भर बनाने का कार्य शिक्षा का है। स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा के इस कार्य को इंगित करते हुये लिखा था-केवल पुस्तकीय ज्ञान से काम नहीं चलेगा। हमें उस शिक्षा की आवश्यकता है जिससे कि व्यक्ति अपने स्वयं के पैरों पर खड़ा हो सकता है। चिंतक विलमॉट ने स्पष्ट कहा है कि शिक्षा जीवन की तैयारी है। शिक्षा का प्रमुख कार्य बच्चों को जीवन के लिये तैयार करना है। शिक्षा के इस कार्य पर विचार करते हुये स्वामी विवेकानन्द लिखते है कि-क्या वह शिक्षा कहलाने के योग्य है जो सामान्य जन समूह को जीवन के संघर्ष के लिये अपने आपको तैयार करने में सहायता नही देती है और उनमें शेर सा साहस न उत्पन्न कर पाये। आजकल प्रयोजन व उद्देश्य की पूर्ति के बिना कोई कार्य नहीं होता। जब तक किसी राष्ट्र का नैतिक स्तर उन्नत नहीं होता, तब तक जो भी प्रयत्न हो रहा है, वह फलदायी नहीं बनेगा। जरूरी है समाज में नैतिक स्तर ऊँचा हो। यह सब शिक्षा के द्वारा ही संभव है।
जीवन विज्ञान का सिद्धांत कहता है केवल दो शब्दों में संपूर्ण दुनिया की समस्या और समाधान छिपे हुए हैं, एक है पदार्थ जगत और दूसरा है चेतना जगत। पदार्थ भोग का और चेतना त्याग का जगत है। हमारे सामने केवल पदार्थ जगत् है और इसकी प्रकृति है समस्या पैदा करना। इस जगत् में प्रारंभ में अच्छा लगता है और बाद में यह नीरस लगने लगता है। दूसरा है चेतना जगत जो प्रारंभ में कठिन लगता है लेकिन जैसे-जैसे व्यक्ति उस दिशा में जाता है उसे असीम आनंद प्राप्त होने लगता है। महाप्रज्ञ ने शिक्षा को सही मायने में मानव मस्तिष्क के लिए उपयोगी बनाया है। शिक्षा दर्शन में दार्शनिक सिद्धान्तों का शिक्षा के क्षेत्र में व्यवहार किस प्रकार होता है, और होना चाहिये इसे प्रभावी रूप से बताया गया हैं।
-राष्ट्रीय संयोजक-अणुव्रत लेखक मंच
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