शनिवार, 6 मई 2023

मानवीय चेतना पर अनैतिकता, लोकतंत्र के लिए खतरनाक

-डाॅ. वीरेन्द्र भाटी मंगल
(वरिष्ठ साहित्यकार व स्तम्भकार)

चुनाव लड़ना कोई बुरी बात नहीं है, लेेकिन चुनाव में लोकतांत्रिक व्यवस्था के विपरीत आचरण करना राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा है। चुनाव भले ही महाविद्यालय के हो, पंचायत स्तर के हो, विधानसभा या लोकसभा के क्यों न हो लेकिन जब नैतिकता एवं मर्यादा को ताक में रखकर चुनाव लड़े जाते है तो चुनाव दंगल का रूप ले लेता है, वहां एक दूसरे के प्रति सम्मान, सदभाव एवं देश विकास की बात गौण हो जाती है। जबकि चुनाव में नैतिक आचरण बहुत जरूरी है। मूल्यों की रक्षा एवं विकास के लिए ऐसे उम्मीदवारों को संकल्प ग्रहण करना होगा जो देष के विकास में सहभागी बनना चाहते है। तभी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में देष की जनता के साथ समुचित न्याय किया जा सकता है।
चुनाव शुद्धि देश की जनता के सामने बहुत बड़ा विकल्प है। अगर जनता चुनाव शुद्धि को सफल बनाती है तो देष को एक स्वस्थ सरकार मिलने में सक्षम होगी, जिसके परिणाम स्वरूप देष का बहुमुखी विकास होगा वहीं स्थिर एवं प्रभावी विकास होगा। चुनाव शुद्धि के लिए उम्मीदवार यह संकल्प ग्रहण करे कि हम चुनाव में विजयी हो या न हो किसी भी हालत में भ्रष्ट व अनैतिक तरीकों को इस्तेमाल चुनाव में नहीं करेगें। इसी प्रकार सता पर आसीन दल की बहुत बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि चुनाव मंे सरकारी सम्पत्ति एवं साधनों का उपयोग किसी भी प्रकार नही होना चाहिए। सबसे बड़ी जिम्मेदारी बनती है हमारी जनता जर्नादन की, जो जागृत होकर लोभ, भय आदि में आकर लोकतंत्र को दूषित न करें। तभी स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था को अमली जामा पहनाया जा सकता है।
जब चुनाव में अनैतिक आचरण नहीं होगा तब योग्य उम्मीदवार का सामने आना तय है। वर्तमान हालातों में चुनावों की दषा देखकर योग्य उम्मीदवार स्वयं ही किनार कर लेता है, जो देष में सही लोकतांत्रिक व्यवस्था व विकास के लिए अच्छी बात नहीं है। देष की जनता को सजग व जागरूक होना होगा, योग्य उम्मीदवार का चयन करना होगा। तभी इस चुनाव की व्यवस्था को सुधारा जा सकता है। जब यह व्यवस्था लोकतंत्र में प्रभावी होगी तभी उम्मीदवार यह संकल्प ग्रहण कर पायेगा कि मैं चुनावों में अनैतिक आचरण नहीं करूगां।
अणुव्रत प्रवर्तक आचार्य तुलसी ने चुनाव शुद्धि को लेकर जो देष को चिंतन दिया आज भी उनके चिंतन पर बहुत बड़ा काम हो रहा है। आचार्य तुलसी ने अणुव्रत आंदोलन के माध्यम से जहां चुनाव-शुद्धि अभियान को गतिशील किया वहीं योग्य व ईमानदार उम्मीदवार के चयन के लिए भी देश की जनता का मार्ग प्रशस्त किया। तात्कालिक मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने आचार्य तुलसी के सामने नतमस्तष्क होते हुए उनके द्वारा दिये गये सुझावों को स्वस्थ चुनाव प्रक्रिया के लिए उपयोगी बताये। देश के विकास एवं संतुलन के लिए लोकतंत्र मानवीय एकता का सूत्रधार बने, यह तभी संभव होगा। जब देश की चुनाव प्रक्रिया शुद्ध होगी।
स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जनता का प्रशिक्षित होना बहुत जरूरी है, जब जनता जागरूक होगी तभी मायने मायने में लोकतंत्र की जीत होगी। लोकतंत्र की नीव अभय पर टिकी है जब जब जनता में भय का भाव पैदा होगा, देश को लोकतंत्र खतरे मंे होगा। इसके लिए जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति का नैतिकता में प्रबल विश्वास हो, उसके अनुरूप जीवन जीने का संकल्प एवं संकल्प की रक्षा के लिए किये जाने वाला आचरण प्रभावी बने। जहां जाति, सम्प्रदाय और अर्थबल से प्रभावित नहीं होगा, वहां नीतिनिष्ठ देश का ढांचा तैयार होगा। इन सबके साथ-साथ लोकतंत्र के इस उत्सव में आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को भी जीवित रखना होगा।  
जब मानवीय चेतना पर अनैतिकता हावी हो जाती है तो लोकतंत्र का खतरे में पड़ना तय है। इसके लिए चुनाव आयोग का प्रयास प्रभावी है आज चुनाव की प्रक्रियाएं सहज व सरल बनती जा रही है जो आम मतदाताओं की विचारधारा एवं चिंतन को ध्यान में रखकर बनायी जा रही है। इससे हमारा चुनावी तंत्र मजबूत हुआ है। देश की जनता वोट के प्रति जागरूक बनी है। चुनाव का सारा दारोमदार जनता पर है, जनता ही लोकतंत्र का वह मजबूत स्तम्भ है जिसके सहारे मजबूत महल खड़ा किया जा सकता है।
आज आवष्यकता है चुनाव-शुद्धि अभियान की। जब तक चुनाव पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होगें तक तक देश के विकास की बात सोची ही नहीं जा सकती। आज भारतीय जनमानस पर अनैतिकता हावी दिखाई दे रही है। सभी लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं, ऐसे में भला देश के क्या हालात होेंगे, किसी से छिपा नहीं है। लोकतंत्र शुद्धि के लिए आवश्यक है-जन चेतना को जगाने का। जब तक बुद्धि-जीवी वर्ग, मीडिया आदि इस कार्य के लिए सक्रिय नहीं होंगे तब तक चुनाव शुद्धि की कामना नहीं की जा सकती। सही लोकतंत्र की यदि परिभाषा दी जाए तो इसका अर्थ होता है-प्रेम, मैत्री व समता का विकास। लेकिन आज इसके विपरीत स्वार्थ, धोखा व असहिष्णुता द्रोपदी के चीर की तरह वृद्धिगत हो रहे हैं। जो हमारे देशहित में नहीं हैं इस विषय पर हमें विचार करना होगा। तभी हम देश एवं समाज के विकास के लिए अपना योगदान दे सकते हैं।
देश भर में नैतिकता के आधार पर चुनाव शुद्धि अभियान चलाना चाहिए। राष्ट्रीय संत आचार्य तुलसी-महाप्रज्ञ ने कहा था कि हमारे बहुमूल्य वोट का अधिकारी वहीं व्यक्ति होना चाहिए, जो ईमानदार हो, चरित्रवान हो, कार्य में निपुण हो, जाति सम्प्रदाय से बंधा हुआ न हो तथा आर्थिक पवित्रता में संलग्न हो। वोट देने की प्रक्रिया जितनी सहज और शुद्ध होगी, लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ होगा। जब मानवीय चेतना पर स्वार्थ हावी होता है और अनैतिकता के बीज अंकुरित हो जाते हैं तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता हैं। हमें इस खतरे को रोकना होगा। हमें स्वार्थ हो हावी होने से रोकना होगा। मैत्री, प्रेम व समता का विकास कर देष के हित को ध्यान में रखते हुए ही हमें मतदान करना होगा। तभी देश का कायाकल्प संभव है। जिस दिन देश में जनता जागृत होगी उसी दिन सही मायने में लोकतंत्र आयेगा। जनता को जागृत करने के लिए आवश्यक है व्यक्ति सुधार। व्यक्ति सुधार से ही समाज व राष्ट्र का सुधार संभव है।
-राष्ट्रीय संयोजक-अणुव्रत लेखक मंच
लाडनूं (राजस्थान)
मोबाइल-9413179329

गुरुवार, 4 मई 2023

कुत्ते व घोड़े की वफ़ादारी में अंतर

निर्मल रानी 
 
जब भी हम वफ़ादार जानवरों की बात करते हैं तो प्रायः दो ही नाम ज़ेहन में आते हैं। पहला कुत्ता और दूसरा घोड़ा। पौराणिक कथाओं से लेकर प्राचीन व मध्ययुगीन इतिहास तक तमाम ऐसे क़िस्से सुनाई देते हैं जो कुत्तों और घोड़ों की वफ़ादारी से जुड़े हैं। इतिहास की कई घटनाएं तो ऐसी भी हैं जिनसे पता चलता है कि कुत्ते व घोड़े ने अपने मालिकों के लिये अपनी जान तक दे डाली। अपने मालिक की रक्षा के लिये दुश्मनों पर टूट पड़ने की तो इनकी अनेक कहानियां हैं। अपनी वफ़ादारी की वजह से ही यह दोनों ही जानवर राजा महाराजाओं से लेकर संतों फ़क़ीरों तक के दरबारों की रौनक़ बढ़ाते रहे हैं।  
क्या आप जानते हैं कि इन दोनों वफ़ादार जानवरों के स्वभाव के अनुरूप इन की 'वफ़ादारी ' में क्या अंतर है ? आइये आपको गहन अध्ययन व अनुभव के आधार पर बताते हैं कि घोड़े और कुत्ते दोनों के वफ़ादार होने के बावजूद अपने स्वामी के प्रति इनकी वफ़ादारी में आख़िर अंतर क्या है।  मशहूर सूफ़ी संत बुल्लेशाह  कुत्ते की वफ़ादारी और उसकी महत्ता का बयान करते हुये फ़रमाते हैं कि -रातीं जागां ते शेख़ सदा वें, पर रात नु जागां कुत्ते, ते तो उत्ते।  रातीं भोंकों बस न करदे, फेर जा लारा विच सुत्ते, ते तो उत्ते।। यार दा बुहा मूल न छडदे, पावें मारो सौ सौ जूते, ते तो उत्ते। बुल्ले शाह उठ यार मना ले, नईं ते बाज़ी ले गए कुत्ते, ते तो उत्ते।। अर्थात धर्म उपदेशक सारी रात जागते हैं, और कुत्ते भी सारी रात जागते हैं, पर कुत्तों का जागना, धर्म उपदेशक के जागने से ऊपर है। कुत्ते रात में सारी रात भोंकते हैं और उसके बाद अपने बाड़े में जाकर सो जाते हैं, और अपने कर्तव्य का पालन करने में भी धर्म उपदेशक से ऊपर हैं। कुत्ते अपने मालिक का दर नहीं छोड़ते हैं चाहे उन्हें कितने भी जूते क्यों ना मारे जाएँ। और इस तरह से अपने मालिक के प्रति प्रेम और वफ़ादारी में भी वे किसी धर्म उपदेशक  से ऊपर ही हैं। और अंत में बुल्ले शाह फ़रमाते हैं कि ए बंदे अपने मालिक को पाने के लिए उठ खड़ा हो और सत्कर्मों की पूँजी कमा, अन्यथा कुत्ते इस मामले में भी तुझसे बाज़ी मार ले जाएँगे। बुल्ले शाह के इस कथन में स्पष्ट है कि कुत्ते अपने मालिक के प्रति इतने वफ़ादार होते हैं कि वे सारी सारी रात जाग कर अपने जिस मालिक की चौकीदारी करते हैं यदि वही मालिक उन्हें प्रताड़ित भी करे तो भी कुत्ते की वफ़ादारी में कोई कमी नहीं आती और वह अपने स्वामी का दर हरगिज़ नहीं छोड़ते ।
परन्तु  घोड़े के साथ ऐसा नहीं है। घोड़ा अपने स्वामी के प्रति वफ़ादार तो ज़रूर होता है परन्तु वह अपने स्वामी या प्रशिक्षक किसी की भी प्रताड़ना सहन नहीं करता। घोड़े इंसानों के साथ संबंध बनाने में अच्छे होते हैं। वे सहिष्णु और प्यार करने वाले होते हैं। परन्तु यदि उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाता है, तो वे इसे क़तई पसंद नहीं करते । अक्सर यह सुनने को मिलता है कि घोड़े ने अपने स्वामी या प्रशिक्षक से नाराज़ होकर उसे दांत काट लिया या लात मार दी। अर्थात घोड़ा राशन पानी के साथ साथ प्यार और सम्मान का भी आकांक्षी रहता है। वह अपने मालिक का ग़ुस्सा और अपना अपमान सहन नहीं करता। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि कुत्ता यदि समर्पित वफ़ादार जानवर है तो घोड़ा स्वाभिमानी वफ़ादार। और कुत्ते व घोड़े की वफ़ादारी में यही अंतर है। 
निर्मल रानी

बुधवार, 3 मई 2023

अमृतपाल के भिंडरावाले के गांव से गिरफ्तार होने के मायने

 

अवधेश कुमार 

अमृतपाल सिंह की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ से संबंधित जानकारियां अभी बाहर नहीं आ रही हैं । पंजाब के अंदर भी उसकी गिरफ्तारी के बाद कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन सामने नहीं आया है। यह थोड़ी राहत देने वाली बात है। किंतु 36 दिनों बाद अमृतपाल सिंह की गिरफ्तारी जिस तरीके से हुई उसके संदेश चिंताजनक हैं। आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले के गांव रोड़े को अमृतपाल द्वारा चयन बताता है कि उसने अपनी गिरफ्तारी को मनमाफिक मोड़ देने में सफलता पाई। पंजाब पुलिस के महानिरीक्षक (मुख्यालय ) डॉ. सुखचैन सिंह गिल का बयान है कि पुलिस ने 35 दिन से दबाव बनाया था। इंटेलिजेंस विंग के पास रोडे गांव में अमृतपाल की मौजूदगी का इनपुट था। उसे नाका लगाकर घेर लिया गया, लेकिन वह गुरुद्वारा साहिब के अंदर था। मर्यादा को देखते हुए पुलिस अंदर नहीं गई। अमृतपाल से बाहर आने के लिए कहा गया, फिर उसे गिरफ्तार किया गया। क्या इसे सच मान लिया जाए? पुलिस बता रही है कि अमृतपाल बैसाखी के दिन यानी 14 अप्रैल को समर्पण करना चाहता था। उसने बठिंडा में तलवंडी साबो स्थित तख्त दमदमा साहिब में समर्पण करने की योजना बनाई थी । पंजाब पुलिस ने इसका पता चलने पर दमदमा साहिब में सुरक्षा कड़ी कर दी थी। इसके बाद वह 22 अप्रैल को रोडे गांव पहुंचा। 

ठीक है कि पुलिस ने वहां जबरदस्त घेराबंदी की थी। किंतु सच यही है कि उसने हीरो की तरह गिरफ्तारी दी। समाचार यह भी है कि अमृतपाल के करीबियों ने ही पंजाब पुलिस को उसकी आत्मसमर्पण योजना के बारे में बताया था। पुलिस टीम सादे कपड़ों में गुरुद्वारे पहुंची और सुबह ही उसे गिरफ्तार किया। पुलिस दावा कर सकती है कि अमृतपाल की गिरफ्तारी के समय ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे अलगाववादियों को मुद्दा बनाने का मौका मिले। किंतु उसकी गिरफ्तारी पुलिस की योजना से हुई यह नहीं माना जा सकता। रोडे गांव में बने संत खालसा गुरुद्वारे के ग्रंथी का बयान है कि अमृतपाल शनिवार रात को गांव पहुंचा था। उसने गुरुद्वारे में मत्था टेका। रविवार सुबह गिरफ्तारी से पहले उसने पांच ककार (केश, कृपाण, कंघा, कड़ा और कच्छा) पहने और लाउडस्पीकर से लोगों को संबोधित किया। प्रश्न है कि उसे इतना मौका कैसे मिला? अगर पुलिस को उसके रोड़े गांव में होने की जानकारी थी तो उसे गुरुद्वारा में प्रवेश के पहले ही गिरफ्तार किया जा सकता था। स 36 दिनों से पुलिस ने सारी ताकत झोंक दी किंतु अमृतपाल को योजना के अनुसार गिरफ्तार करना संभव नहीं हुआ। इस बीच जितनी जानकारियां आई उनमें कितना सच था यह तभी पता चलेगा जब अमृतपाल बताएगा कि इतने दिनों तक वह कहां - कहां रहा। अगर  गांव के ग्रंथि बता रहे हैं कि अमृतपाल शनिवार की रात ही गांव पहुंचा था तो यही सच माना जाएगा। अमृतपाल की गिरफ्तारी के संदर्भ में यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दुबई से आने के बाद सरेआम ऐसा सब कुछ कर रहा था जिसे रोका जाना चाहिए था। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि एक अनाम व्यक्ति कैसे पंजाब में आकर इतना शक्तिशाली और लोकप्रिय हो गया कि उसके आह्वान पर हजारों लोग इकट्ठे होने लगे। पंजाब पुलिस प्रशासन द्वारा पूरी ताकत झोंकने के बावजूद अगर 36 दिनों तक वह छिपा रहा तो इसी कारण क्योंकि उसके समर्थकों में ऐसे लोग हैं जिन्होंने पुलिस दबाव के बावजूद उसे नहीं छोड़ा। पंजाब पुलिस के लिए उसकी गिरफ्तारी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। पुलिस ने जो स्थिति पैदा कर दी थी उसमें आज न कल उसे पकड़ में आना ही था लेकिन उसने भारत सहित पूरी दुनिया में अपने समर्थकों को संदेश दे दिया कि वह पंजाब में अपने विचारों के साथ पैर जमा चुका है। 

ध्यान रखिए, 29 सितंबर 2022 को रोड़े गांव के गुरुद्वारे में ही अमृतपाल को वारिस पंजाब दे का प्रमुख घोषित किया गया था। उस समय इकट्ठी भीड़ और उसका भाषण बता रहा था कि उसे भारत विरोधी शक्तियों ने पूरी तरह तैयार कर भेजा है। गिरफ्तारी से पहले रोडे गांव के गुरुद्वारे में प्रवचन के दौरान अमृतपाल ने कहा कि गिरफ्तारी अंत नहीं शुरुआत है । यह जरनैल सिंह भिंडरांवाले का जन्म स्थान है। उसी जगह पर हम अपना काम बढ़ा रहे हैं और अहम मोड़ पर खड़े हैं। एक महीने से जो कुछ हो रहा है, वह सभी ने देखा है। हम इसी धरती पर लड़े हैं और लड़ेंगे। जो झूठे केस हैं, उनका सामना करेंगे। इस तरह स्वयं को खालसा के रूप में  प्रस्तुत कर प्रवचन देना कैसे संभव हुआ ? कितनी दयनीय स्थिति है कि खुलेआम खालिस्तान की बात करने वाला व्यक्ति, जिसे पुलिस हर हाल में गिरफ्तार करना चाह रही हो वह सरेआम लोगों के बीच भिंडरावाले की तरह स्वयं को पेश कर भारत विरोधी तकरीरें देने में सफल हो जाता है । जैसी सूचना है वह सुबह से ही अपनी हर गतिविधि की वीडियो रिकॉर्डिंग करवाता रहा। पंजाब सहित विश्व भर में  रिकॉर्डिंग भेजकर वह संदेश देने की कोशिश करेगा कि जरनैल सिंह भिंडरावाले के खाली स्थान का सपना पूरा करने के लिए वह पूरी तरह लगा हुआ है लेकिन पुलिस ने अन्यायपूर्ण तरीके से उसे पकड़ा। उसने लड़ने की बात की है। 

वास्तव में वह अपने पक्ष में सिखों की भावना भड़काने के उद्देश्य ही सब कुछ कर रहा था। 

18 मार्च को फरार हो जाने के बाद पुलिस जांच से यह पता चला कि अमृतपाल के दुबई से पंजाब लौटने के पीछे एकमात्र उद्देश्य भिंडरावाला भाग-2 बनना था। इसीलिए वह दुबई से पहले जार्जिया गया और वहां भिंडरावाले  जैसा दिखने के लिए सर्जरी कराई। पंजाब आने के साथ उसने भिंडरावाले के कपड़ों से लेकर बोलने के अंदाज तक की नकल की। कल्पना कर सकते हैं कि उसके पीछे कितने लोगों का दिमाग लग रहा होगा।  पंजाब में भिंडरावाले के अलगाववादी विचारों को फैलाने की इतनी व्यापक तैयारी से आने वाले व्यक्ति की जैसी सख्त निगरानी होनी चाहिए थी वैसी होती तो उसकी हैसियत इतनी न बढ़ती। पुलिस प्रशासन राजनीतिक नेतृत्व की दिशा के अनुसार ही भूमिका निभाती है। भगवंथ सिंह मान के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार गठित होने के बाद पूरा देश यह देखकर भौंचक था कि सड़कों पर खालिस्तानी झंडे लिए खालिस्तान का नारा लगाते लोग जुलूस निकाल रहे थे और पुलिस उनको सुरक्षा दे रही थी। इसमें अमृतपाल को एक बड़े वर्ग का हीरो बनना ही था। अजनाला थाने का घेराव चरम बिंदु था जिसने प्रशासन को अहसास करा दिया इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो आगे पंजाब को संभालना मुश्किल होगा। तब भी अमृतपाल पर शिकंजा कसने के कदम नहीं उठाए गए। पुलिस उस दिन भी उसे साथियों के साथ गिरफ्तार कर सकती थी। आज न कल पंजाब की वर्तमान सरकार को इसका उत्तर देना होगा कि आखिर फरवरी 2022 से भारत आने के बाद वह जैसे चाहा खालिस्तान के पक्ष में बोलता अपना समूह गठित करता रहा पर किन कारणों से उसे रोकने की कोशिश नहीं की गई?

हम यह नहीं कहते कि फरार होने के बाद पुलिस का उस पर दबाव नहीं बढ़ा। जहां-जहां उसके छिपने या जिनके बारे में मदद देने की सूचना मिली उन सबको पुलिस पकड़ती रही और काफी लोग उसे शरण देने से भयभीत होने लगे थे। उसके फरार होने के 24 से 48 घंटों के बीच 78 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।  400 से अधिक को हिरासत में लिया गया और 350 से अधिक को छोड़ा जा चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाकर उसके नौ साथियों को डिब्रूगढ़ जेल भेजा जा चुका था। 10 अप्रैल को पप्पलपीरीत सिंह की गिरफ्तारी के बाद लगने लगा था कि वह  पकड़ में आ जाएगा। अमृतपाल के व्यक्तिगत संबंध ज्यादा विकसित नहीं हुए थे कि सीधे किसी के घर चला जाए। पप्पलप्रीत व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर उसे छिपने और पहुंचने में मदद करता रहा। उसके गिरफ्तार होने के बाद अमृतपाल के लिए ठिकाने बदलना जरा कठिन हो गया। हालांकि इसके बावजूद लगभग दो सप्ताह तक पुलिस की पकड़ में नहीं आना असामान्य स्थिति मानी जाएगी। उसके बाद पुलिस को संवेदनशील स्थानों पर उसकी उपस्थिति या गिरफ्तारी देने की संभावनाओं के प्रति ज्यादा सतर्क रहना चाहिए था। पुलिस को ध्यान रखना चाहिए था कि अगर वह भिंडरावाले भाग-2 बनने आया था तो उसके गांव में वह प्रवेश न कर पाए। इस आधार पर विश्लेषण किया जाए तो कहना होगा कि भिंडरावाले के गांव स्थित गुरुद्वारा में आना और गिरफ्तार होना पुलिस की रणनीतिक चूक है। उसे पूरी तैयारी से पंजाब भेजने वाली भारत विरोधी शक्तियां संतुष्ट होंगी कि उसने अंततः भिंडरावाले के नाम और गांव को सुर्खियों में लाकर अलगाववाद की भावना जगा दिया। संतोष का विषय है कि शीर्ष सिख संस्थाओं का सहयोग अमृतपाल को नहीं मिला । उसने फरार होने के बाद दो वीडियो और एक ऑडियो जारी किया। इसमें सिखों की सर्वोच्च संस्था कहे जाने वाले अकाल तख्त के जत्थेदार से तलवंडी साबो में 13-14 अप्रैल को बैसाखी पर सरबत खालसा (सिखों की धर्मसभा) बुलाने की मांग रखी। जत्थेदार ने इसे नकार दिया।  शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति भी खुलकर अमृतपाल के समर्थन में नहीं आई। यह बताता है कि पंजाब में अलगाववादी विचारों को सिखों के बहुमत का समर्थन नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में अमृतपाल का भिंडरावाले के गांव और गुरुद्वारे में पहुंच जाना चिंतित करता है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -1100 92 , मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 2 मई 2023

तारिक फतेह आदर्श मुसलमान थे

श्याम कुमार

इस्लाम का जब भारत में आगमन हुआ तो वह दो धाराओं में अग्रसर हुआ। पहली धारा उन कट्टरपंथी मुसलिम आक्रांताओं की थी, जो आए तो थे भारत की समृद्धि की चर्चा सुनकर यहां की सम्पदा लूट ले जाने के उद्देश्य से, किन्तु यहां का वैभव देख उनकी आंखें चकाचौंध हो गईं तथा धीरे-धीरे वे यहीं रहकर उस सम्पदा का उपभोग करने लगे। चूंकि वे इसलाम के कट्टर रूप के अनुयायी थे, इसलिए उन्होंने तलवार के बल पर यहां के लोगों को मुसलमान बनाना शुरू किया और हिंदुओं पर भीषण अत्याचार किए। औरंगजेब उसी कट्टरपंथी धारा का प्रतिरूप था। 

दूसरी उदारपंथी धारा उन मुस्लिमों की थी, जिन्होंने दिल से भारत और भारतीय संस्कृति को अपना समझा तथा उसे आत्मसात किया। इस धारा का पुरोधा औरंगजेब का ही बड़ा भाई दाराशिकोह था, जिसकी निर्मम हत्या कर औरंगजेब ने राजगद्दी हथिया ली थी। दारा षिकोह की उदारपंथी एवं भारतीय संस्कृति को अपना समझने वाली परम्परा में मलिक मुहम्मद जायसी, डॉ. अब्दुल कलाम आदि हुए। डॉ. अब्दुल कलाम ऐसे उदारवादी मुसलमान थे, जो शाकाहारी थे तथा गीता पाठ करते थे।  

तारिक मुहम्मद डॉ. अब्दुल कलाम की ही अनुकृति थे। वह जाने-माने स्तम्भकार एवं लेखक थे। तारिक मुहम्मद का जन्म 20 नवम्बर, 1949 को कराची में हुआ था तथा 73 वर्श की आयु में गत 24 अप्रैल, 2023 को उनका कनाडा में निधन हो गया। वह लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उन्हें भारत से इतना प्रेम था कि कहा करते थे कि वह ऐसे हिन्दुस्तानी हैं, जिसका जन्म पाकिस्तान में हुआ था। वह पाकिस्तान के कटु आलोचक थे तथा भारत का जो विभाजन हुआ, उसकी निंदा करते थे। अपने विचारों के कारण जब पाकिस्तान में उनकी जान को खतरा उत्पन्न हो गया था तो वर्ष 1987 में वह कनाडा चले गए थे और वहां की नागरिकता ले ली थी। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं। मूलतः पाकिस्तानी होने के बावजूद वह अपने को पूरी तरह भारतीय कहा करते थे। वह कहते थे कि कट्टरपंथियों ने इसलाम को भीषण क्षति पहुंचाई है तथा ‘मुल्ला के इस्लाम’ के बजाय ‘अल्ला के इस्लाम’ का अनुसरण किया जाना उचित है।

डॉ. अब्दुल कलाम चूंकि महान वैज्ञानिक थे तथा भारत के राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए थे, इसलिए कट्टरपंथी मुसलमान उनका उस प्रकार खुलकर विरोध करने का साहस नहीं कर सके, जैसा उन्होंने तारिक फतेह के खिलाफ अपनी भड़ास निकालकर किया। कट्टरपंथियों ने बंगलादेश की प्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ भी इसी प्रकार मोर्चा खोला था। तसलीमा नसरीन से कट्टरपंथी मुसलमानों की नाराजगी इस बात से थी कि उन्होंने अपने ‘लज्जा’ उपन्यास में बंगलादेश के कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा वहां हिंदुओं पर किए गए रोंगटे खड़े कर देने वाले अत्याचारों की सच्ची घटनाओं का चित्रण किया था। उन ह्रदयविदारक घटनाओं में एक घटना यह थी कि कट्टरपंथी मुसलिम एक परिचित हिंदू परिवार के घर में घुसकर मां के सामने उसकी बच्ची से सामूहिक बलात्कार करने लगते हैं। लाचार मां सामूहिक बलात्कार कर रहे उन परिचित मुसलमानों से बच्ची की जान की भीख मांगते हुए कहती है कि वे धीरे-धीरे बलात्कार करें, अन्यथा बच्ची मर जाएगी। चूंकि हमारे देश में सत्ता पर काबिज नेहरू वंष हमेषा कट्टरपंथी मुसलिमों का सरपरस्त रहा, इसलिए उसने तसलीमा नसरीन को भारत में षरण व संरक्षण देने के बजाय कट्टरपंथी मुसलिमों के पक्ष में काम किया। 

जिस प्रकार उदारवादी इसलाम को दारा षिकोह की हत्या से भारी क्षति पहुंची थी, तारिक फतेह के निधन से वैसी ही भारी क्षति उदारवादी इसलाम को पहुंची है। तारिक फतेह कट्टरपंथी मुसलिमों की बातों का तर्कपूर्ण उत्तर दिया करते थे। लेकिन अधिकतर मुसलिमों के दिमाग में बचपन से ही मजहबी कट्टरता इतनी कूट-कूटकर भर दी जाती है कि वे तारिक फतेह की बातों को तर्क की कसौटी पर समझने के बजाय उनसे घृणा करते थे और उन्हें अपना बहुत बड़ा दुश्मन मानते थे। टीवी की परिचर्चाओं में ऐसे उदाहरण कई बार देखने को मिले। एक बार तो एक मुस्लिम महाशय तारिक फतेह को अपशब्द कहते हुए परिचर्चा से उठकर चले गए थे। 

जब योगी सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया था तो टीवी पर एक मुस्लिम महिला ने आलोचनात्मक स्वर में इसका उल्लेख करते हुए तारिक फतेह से सवाल किया था। उत्तर में तारिक फतेह ने कहा था कि इलाहाबाद का मूल नाम प्रयागराज ही था, जिसे अकबर ने जानबूझकर बदलकर इलाहाबाद कर दिया था। इसलिए विरोध तो अकबर के उस कृत्य का किया जाना चाहिए, जिसने प्रयागराज को उसके असली नाम से वंचित कर दिया था।  
एक बार रजत शर्मा के प्रसिद्ध टीवी कार्यक्रम ‘आप की अदालत’ में तारिक फतेह पेष हुए थे। उस प्रसारण में जज की कुरसी पर षायर मुनव्वर राना बैठा हुआ था। उसे उस कुरसी पर बैठे देखकर प्रसारण देखने वालों ने माथा पीट लिया था कि रजत षर्मा ने ‘अवार्ड वापसी गिरोह’ के इस कम्युनल सदस्य को अपने कार्यक्रम में जज क्यों बना दिया! लोगों की आषंका सही निकली और तारिक फतेह की उचित बातों की मुनव्वर राना ने जिस घटिया रूप में भर्त्सना की थी, उसे सुनकर मुनव्वर राना के प्रति जनमानस का विरोध-भाव घृणा-भाव में बदल गया था। 

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हमारे यहां आजादी से पहले तो इसलाम का कट्टरपंथी रूप प्रभावी रहा ही, आजादी के बाद भी जिन लोगों के हाथ में सत्ता आई, वे कट्टरपंथी इसलाम का पोषण करने में लगे रहे। मोदी एवं योगी सरकारों के आगमन से पूर्व हमारे देश के सत्ताधारियों द्वारा कट्टरपंथी मुसलमानों को हमेशा जमकर संरक्षण व बढ़ावा दिया गया। जिन्ना तथा उसके अनुयायियों की यह मांग थी कि हिंदू व मुसलमान दो अलग कौमें हैं, जो एक साथ नहीं रह सकतीं और इसलिए मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान का निर्माण किया जाय। मुसलमानों की वह मांग मानकर मजहब के आधार पर देश का बंटवारा कर दिया गया, जिसके बाद भारत स्वाभाविक रूप से अपनेआप हिंदू राष्ट्र हो गया। लेकिन टांग अड़ाकर जवाहरलाल नेहरू ने भारत को ‘सेकुलर’ घोषित करा दिया। परिणाम यह हुआ कि बंटवारे के बाद बड़ी संख्या में कट्टरपंथी मुसलमान हमारे यहां बने रह गए, जो अभी भी देश के लिए भारी सिरदर्द बने हुए हैं। इसी कट्टरता के कारण तारिक फतेह के निधन पर हमारे यहां कुछ लोगों ने जश्न मनाया। सच्चाई तो यह है कि तारिक फतेह के निधन से वस्तुतः इसलाम का ही नुकसान हुआ है, क्योंकि इसलाम का कल्याण उसके उदारवादी रूप में ही होगा, न कि कट्टरतावादी रूप में। 

श्याम कुमार, सम्पादक, समाचारवार्ता, ईडी-33 वीरसावरकर नगर (डायमन्डडेरी), उदयगंज, लखनऊ, मोबाइल-09415002458, 7905405266     ईमेलःkshyam.journalist@gmail.com दिनांकः 3 मई, 2023  



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