मंगलवार, 18 अप्रैल 2023

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

सिलेबस में हल्के बदलाव पर बेवजह हंगामा

अवधेश कुमार

सिलेबस के कुछ अंशों में संशोधन या बदलाव पर मचाया जा रहा हंगामा असामान्य नहीं है। भाजपा के शासनकाल में सिलेबस संबंधी निर्णय हमेशा विवाद के विषय बनाए जाते रहे हैं । हमने अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान यही देखा और अब नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में भी। इसी तरह इसकी राज्य सरकारें भी शिक्षा संबंधी निर्णय को लेकर एक वर्ग के निशाने पर रहती हैं । इस समय राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी की ओर से 10वीं, 11वीं और 12वीं कक्षा के लिए कुछ विषयों में किए गए बदलाव इसका ही प्रकटीकरण है है। यह विरोध ऐसा है जिसमें लगता ही नहीं कि कोई सच समझने और देखने की कोशिश भी करना चाहता है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार तथा राज्यों की भाजपा सरकारों पर वैसे भी शिक्षा के भगवाकरण, हिंदूकरण, फासिस्टीकरण आदि का आरोप नया नहीं है।  सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में किए गए परिवर्तन को तो हमारे देश का एक बड़ा समूह किसी सूरत में यह मानने के लिए तैयार नहीं हो सकता कि इनके पीछे सच्ची तार्किकता भी है। तो क्या है वर्तमान विवाद का कारण? 


एनसीईआरटी ने 10वीं, 11वीं, 12वीं की इतिहास, नागरिक शास्त्र- राजनीति शास्त्र और साहित्य में कुछ संशोधन और बदलाव किए है। इतिहास की पुस्तकों से राजाओं और उनके इतिहास से संबंधित अध्यायों  को हटा दिया है। नए पाठ्यक्रम के तहत इतिहास की किताब थीम्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री-पार्ट-2 से द मुगल कोर्ट्स (16वीं और 17वीं सदी) को हटाया है। 12वीं की इतिहास की किताबों से छात्रों को अकबरनामा और बादशाहनामा, मुगल शासकों और उनके साम्राज्य, पांडुलिपियों की रचना, रंग चित्रण, आदर्श राज्य, राजधानियां और दरबार, उपाधियां और उपहारों, शाही परिवार, शाही नौकरशाही, मुगल अभिजात वर्ग, साम्राज्य और सीमाओं के बारे में भी पढ़ने को नहीं मिलेगा। 11वीं की पाठ्यपुस्तक से थीम्स इन वल्र्ड हिस्ट्री, सेंट्रल इस्लामिक लैंड्स, संस्कृतियों का टकराव और औद्योगिक क्रांति जैसे अध्याय हटा दिए गए हैं। नागरिक शास्त्र संबंधी बारहवीं कक्षा की  किताब से 'लोकप्रिय आंदोलनों का उदय' और 'एक दलीय प्रभुत्व का युग' जैसे अध्याय हटे हैं। 10वीं की किताब डेमोक्रेटिक पॉलिटिक्स-2 से लोकतंत्र और विविधता, लोकप्रिय संघर्ष और आंदोलन, लोकतंत्र की चुनौतियां जैसे पाठ भी हटा दिए गए हैं। विश्व राजनीति में अमेरिकी आधिपत्य और द कोल्ड वॉर एरा जैसे अध्यायों को भी 12वीं की पाठ्यपुस्तक से हटा दिया गया है। 12वीं की किताब पॉलिटिक्स इन इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस से राइज ऑफ पॉपुलर मूवमेंट्स और एरा ऑफ वन पार्टी डोमिनेंस को भी हटा दिया गया है। इनमें कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी के प्रभुत्व के बारे में बताया गया था। 

प्रश्न है कि इन में ऐसा क्या है जिसे जिस पर इतना हंगामा होना चाहिए? वैसे तो एनसीईआरटी ने स्पष्टीकरण दे दिया है। उसका कहना है कि कोरोना काल में छात्रों पर से पाठ्यपुस्तकों का बोझ कम करने की दृष्टि से कुछ अध्याय हटाने की सिफारिश की गई थी। छात्रों से पाठ्यपुस्तकों का बोझ कम हो इसका सुझाव शिक्षाशास्त्री और समाजशास्त्री हमेशा देते रहे हैं।  एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने स्पष्ट किया है कि मुगलों के बारे में अध्याय नहीं हटाए गए हैं। उनके अनुसार पिछले साल एक रेशनलाइजेशन प्रोसेस थी क्योंकि कोरोना के कारण हर जगह छात्रों पर दबाव था। विशेषज्ञ समिति ने सिफारिश की कि यदि इन अध्यायों को हटा दिया जाता है, तो इससे बच्चों के ज्ञान पर कोई असर नहीं पड़ेगा और एक अनावश्यक बोझ को हटाया जा सकता है।  इसके बारे भी गहराई से सोचिए की मध्यकाल क्या केवल मुगल काल और सल्तनत काल ही है? क्या अभी तक मध्यएशिया या भारत में इस्लाम के उदय के बारे में जो कुछ कहा जाता रहा वही सच है? इतिहास के मध्यकालीन भारत में उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम अनेक राजे राजवाड़े, व्यक्तित्व थे जिन्होंने शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, अध्यात्म, ज्ञान विज्ञान,वास्तुकला, संगीत आदि से लेकर पराकर्म और शौर्य में अपना लोहा मनवाया। उन सबको इतिहास की पुस्तकों में उनकी भूमिका के अनुरूप स्थान न देना वास्तव में  भारत के सच्चे इतिहास से वंचित करने का षड्यंत्र रहा है। कोई भी सरकार इसे दूर कर पूरी सच्चाई सामने लाती है उसका धन्यवाद किया जाना चाहिए। मुगल इस देश में आए और उन्होंने शासन किया तो उन्हें इतिहास से हटाया नहीं जा सकता। हटाया भी नहीं जाना चाहिए। किंतु इतिहास का जितना जैसा और जो सच है उसे सामने रखना ही किसी शिक्षा व्यवस्था का मूल कर्तव्य हो सकता है। इसी तरह राजनीति से जो अध्याय हटाए गए हैं बहुत आवश्यकता उनकी नहीं थी। साथ ही वे सारे अध्याय एकपक्षीय तरीके से लिखे गए थे। लोकप्रिय आंदोलनों बाले अध्याय में ही वैसे आंदोलन जिन्होंने पूरे देश में आलोड़न पैदा किया जिनसे भारत की राजनीति बदली उन सबको आंदोलन की श्रेणी में रखा ही नहीं गया। कुछ ही विशेष संगठनों या विचारधाराओं को को ही आंदोलनों में स्थान दिया गया। राजनीतिक दलों के उदय या ऐसे अन्य अध्यायों में भी शैक्षणिक गैर ईमानदारी भरी हुई थी।

यही नहीं 12वीं की वर्तमान राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के अंतिम अध्याय  पॉलिटिक्स इन इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस में दंगों की चर्चा थी। इसमें 2002 के गुजरात दंगों की उसी तरह चर्चा है जैसे हमारी राजनीति में भाजपा विरोधी दल पिछले 20 वर्षों से कर रहे हैं । पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ‘राज धर्म‘ टिप्पणी को उद्धृत करते हुए यह बताने की कोशिश की गई कि वे भी तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका से असंतुष्ट थे। बाजपेई जी के उस वक्तव्य के की प्रतिक्रिया में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि साहब वही तो कर रहे हैं और बाजपेई जी ने भी बोला कि मुझे उम्मीद है मुख्यमंत्री वैसा ही कर रहे हैं । इसे शामिल नहीं किया गया था। इस तरह की बातें हाई स्कूल के छात्रों की पुस्तकों में डालने का क्या लक्ष्य हो सकता है? इसी तरह पाठ्य पुस्तकों में हिंदू चरमपंथियों की गांधी के प्रति नफरत, महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर लगे प्रतिबंध जैसे अंश सकारात्मक ज्ञान के पर्याय तो नहीं माने जा सकते। इसलिए इन्हें हटाया जाना सर्वथा उचित है। इस तरह के अध्याय क्यों डाले गए और इनसे छात्रों का कितना कल्याण होता रहा होगा इसकी कल्पना आप कर सकते हैं । जहां तक साहित्य का प्रश्न है तो उत्तर प्रदेश के इंटरमीडिएट में चलने वाली ‘आरोह भाग दो’ में परिवर्तन किए गए हैं। इसमें फिराक गोरखपुरी गजल और ‘अंतरा भाग दो’ से सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की ‘गीत गाने दो मुझे’, विष्णु खरे की एक काम और सत्य तथा ‘चार्ली चैपलिन यानी हम सब’ भी निकाल दिए गए हैं । इससे क्या अंतर आ जाएगा? वैसे भी महाकवि निराला भारतीय संस्कृति,  अध्यात्म और राष्ट्रवाद के प्रखर स्वर हैं। भाजपा या संघ को इनसे तो समस्या हो ही नहीं सकती। लेकिन जिन्हें विरोध करना है वह विरोध करेंगे। सच्चाई यह है कि पहली बार नरेंद्र मोदी सरकार ने शिक्षा को पूरा महत्व देते हुए नई शिक्षा नीति तैयार की है। राजनीति को छोड़ दें तो इसका समर्थन सारे शिक्षाविद कर रहे हैं। नई शिक्षा नीति बनी है तो उनके अनुसार धीरे-धीरे सिलेबस और पुस्तकें भी बदलेंगे। सब कुछ पहले ही जैसा चलने देना है तो फिर नई शिक्षा नीति की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए थी।

अवधेश कुमार, ई-30 ,गणेश नगर पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208

मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

यह परिणति जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी

अवधेश कुमार

कई बार हमारे सामने जो कुछ घटित होता है उसके महत्व को नहीं समझ पाते। बड़ी - बड़ी घटनाएं भी हमें सामान्य लगती है। अतीक अहमद को प्रयागराज के सांसद विधायक न्यायालय द्वारा दी गई उम्र कैद की सजा आज सामान्य लग सकता है। उसने अपराध किया और उसकी सजा हुई। जिन्होंने 80 और 90 के दशक के उत्तर प्रदेश में अतीक और उसके पूरे गैंग या जुड़े हुए लोगों के कारनामे देखे हैं उनके लिए यह कल्पना करना भी कठिन था कि उसके विरुद्ध पुलिस की कोई बड़ी कार्रवाई हो सकती है। जिस व्यक्ति के विरुद्ध थाने में प्राथमिकी लिखवाने का अर्थ अपने साथ परिवार और रिश्तेदारों के नष्ट हो जाने का खतरा मोल लेना था उसकी ऐसी दशा होगी इसकी कल्पना की भी नहीं जा सकती थी। जो मामले पुलिस नहीं सुलझा सकती थी वह भी अतीक के पास जाता था। उसके पास दूसरे को अपने अनुसार बोलने, काम करने को विवश करने के लिए पूरी प्रणाली थी। फोन पर आदेश देकर बुलाना, न आने पर उठा लेना, टॉर्चर करना, मनमाने तरीके से जहां चाहो हस्ताक्षर करवाना और जो चाहो बुलवा लेना अतीक अहमद के तंत्र का सामान्य क्रियाकलाप था। अतीक को साबरमती जेल से प्रयागराज लाने या बुलडोजर की कार्रवाई उसे वापस ले जाने सहित अन्य घटनाक्रमों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देख लीजिए। इस पर एक ही प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी कि दुर्दांत अपराधी, जिसने पूरे प्रदेश की सत्ता तक को उंगलियों पर रखा उसके और उससे जुड़े लोगों के साथ ऐसा ही होना चाहिए। इसकी जगह आपको इतने किंतु परंतु मिलेंगे , संविधान कानून का हवाला दिया जाएगा कि ऐसा लगता है मानो अतीक और उसके लोगों के साथ उपयुक्त व्यवहार नहीं हो रहा और योगी आदित्यनाथ की सरकार ही अन्यायी और अपराधी है।

इसका पहला निष्कर्ष तो यही है कि प्रदेश में यदि योगी सरकार नहीं होती तो अतीक को सजा दिलाना या बुलडोजर से संपत्तियों को ध्वस्त करना तो छोड़िए इतने लंबे समय तक जेल में रखना संभव नहीं होता। सपा के नेता- प्रवक्ता चाहे जितने गुस्से का प्रदर्शन करें सच यही है अतीक अहमद अपने जीवन का 21 वर्ष उसी पार्टी में रहा और सामान्य सदस्य के रूप में नहीं। उसे पांच बार विधायक एवं एक बार सांसद समाजवादी पार्टी ने ही बनाया। क्या सपा के नेतृत्व को अतीक के आपराधिक साम्राज्य का पता नहीं था? सब कुछ जानते हुए उसे विधानसभा और लोकसभा में लाकर आम लोगों का नियति निर्धारक बनाना क्या साबित करता है? 

ध्यान रखिए, उसके विरुद्ध पहला मुकदमा 1979 में दर्ज हुआ । इस तरह उसे सजा तक लाने में 44 वर्ष लगे हैं। उस पर 100 मुकदमे दर्ज होने के आंकड़े हैं। इस समय करीब 50 मामले न्यायालय में चल रहे हैं। इनमें हर प्रकार के जघन्य अपराध शामिल हैं। जो पुलिस प्रशासन अतीक के विरुद्ध आक्रामक होकर कानूनी सीमाओं में इस स्तर की कार्रवाई कर रहा है वही पहले उसके सामने नतमस्तक क्यों था? जो लोग भी भय और भ्रष्टाचार से मुक्त राज व्यवस्था व समाज की कामना करते हैं उन्हें राजनीतिक विचारधारा या समर्थन विरोध से परे हटकर इस प्रश्न का उत्तर तलाशना चाहिए। जिन लोगों ने साहस करके मुकदमा दर्ज किया उनकी दशा क्या हुई इसकी छानबीन करेंगे तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे। जिस उमेश पाल अपहरण कांड में अतीक को उम्रकैद की सजा हुई उसमें उसके वकील खान सौलत हनीफ को भी उम्र कैद मिली है। ऐसे मामले विरले होते हैं जिसमें मुख्य आरोपी के साथ उसका वकील भी उतना ही बड़ा अपराधी साबित हुआ हो। उमेशपाल का अपहरण कर लाया गया तो वह पूरे कागजात तैयार करके रखा था जिस पर उसे हस्ताक्षर करना था और यही बयान उसे पुलिस और न्यायालय के समक्ष देना था। ध्यान रखिए, तब सपा का कार्यकाल था और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। उमेशपाल ने अतीक के पक्ष में बयान दिया। कल्पना करिए, जिस उमेशपाल ने मित्र राजूपाल की हत्या की कानूनी लड़ाई का संकल्प किया और उसी में उसकी जान भी गई उसने किन परिस्थितियों में अतीक के पक्ष में गवाही दी होगी! जब मायावती 2007 में मुख्यमंत्री बनी तभी उसके विरुद्ध कार्रवाई नए सिरे से आरंभ हुई। उमेशपाल ने प्राथमिकी दर्ज कराई तथा विरुद्ध बयान दिया। हालांकि मायावती भी अपने शासनकाल में अतीक के विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया को मुकाम तक नहीं ले जा सकीं क्योंकि उनके विधायकों और मंत्रियों में भी उससे संपर्क- संबंध रखने वाले थे और जिनका स्वयं भ्रष्टाचार और अपराध का अतीत था। उनके बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार में तो कोई उसे स्पर्श करने की सोच भी नहीं सकता था। उस दौरान उसके विरुद्ध मायावती शासन काल में मुकदमा दर्ज करने वालों की हालत क्या रही होगी इसकी कल्पना भी आसानी से की जा सकती है। वह केवल 1999 से 2003 तक अपना दल में रहा। 2004 में सपा ने ही उसे पंडित जवाहरलाल नेहरू के क्षेत्र फूलपुर से उम्मीदवार बनाकर लोकसभा भेज दिया। यह समय केंद्र में यूपीए सरकार का कार्यकाल था। प्रदेश में 3 वर्ष तक मुलायम सिंह यादव की सरकार रहेगी। 2014 में भी अगर नरेंद्र मोदी की लहर नहीं होती तो अतिक्रमण लोकसभा पहुंच जाता।

 चाहे कोई कितना बड़ा अपराधी बाहुबली माफिया हो अगर वह माननीय बन गया तो  विशेषाधिकार हो जाते हैं और सामान्यतः पुलिस प्रशासन उसके विरुद्ध मुकदमे लेने, कार्रवाई करने से तब तक बचता है जब तक राजनीतिक नेतृत्व प्रत्यक्ष परोक्ष हरी झंडी नहीं दे देता। योगी आदित्यनाथ सरकार में भी आरंभ में उसके विरुद्ध कार्रवाई की गति अत्यंत धीमी रही। लंबे समय तक प्रदेश में ऐसे अपराधियों माफियाओं और अंडरवर्ल्ड के लिए हर स्तर का इंफ्रास्ट्रक्चर यानी आधारभूत संरचना सशक्त हो गया। इन सबको तलाश कर ध्वस्त करना आसान नहीं है। सरकार के समक्ष समस्या कानून और उसकी प्रक्रियाओं के पालन करते हुए कार्रवाई की होती है जबकि माफियाओं और अपराधियों के समक्ष अपनी तथा तंत्र की रक्षा करने -छिपाने के लिए कोई बाध्यता नहीं। बावजूद योगी आदित्यनाथ सरकार की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने इतने बड़े माफिया को इस स्थिति में ला दिया कि केवल आदेश पर हत्या और अपहरण कराने वाले की पत्नी और बच्चे को भी स्वयं हत्या करने के लिए सामने आना पड़ा। उनके सामने अब बचने का कोई चारा नहीं है। यानी पूरे परिवार के कानूनी रूप से खत्म होने की आधारभूमि। विधानसभा में जब मुख्यमंत्री ने इस माफिया को मिट्टी में मिला देंगे की घोषणा की उसी समय अतीक और उसके साम्राज्य के अंत का संकेत मिल गया। 

लोग प्रश्न उठा रहे हैं कि आखिर सड़क से उसे इतनी दूर प्रयागराज लाने की आवश्यकता क्या थी? निस्संदेह, उसे हवाई जहाज या रेल से भी लाया जा सकता था। सड़क से लाने की घोषणा के साथ ही देश भर में चर्चा होने लगी कि या तो गाड़ी पलटेगी या उसको मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। यह भय पूरे रास्ते आने और लौटने तक अतीक के अंतर्मन में रहा होगा, उसके परिवार और रिश्तेदार एवं समर्थक भी हर क्षण इसी चिंता में डूबे रहे होंगे कि पता नहीं कब उसका अंत कर दिया जाए। यह कानूनी भी सही है और इससे अपराध करने वाले के अंदर यह एहसास हुआ होगा कि अगर उसने न किया होता तो ऐसी स्थिति नहीं होती। इससे दूसरे अपराधियों -आतंकवादियों -माफियाओं के अंदर भी संदेश गया होगा कि तुम्हारी भी दुर्दशा ऐसी ही होगी। अपराध उन्मूलन या नियंत्रण के क्षेत्र में डेटरेंट यानी भय निवारक शब्द का प्रयोग होता है। इसका अर्थ है कि ऐसी कार्रवाई करें जिसे देखकर भय से दूसरे अपराधी अपराध करना छोड़ दें और नए अपराधी तैयार नहीं हो हो। उम्मीद करनी चाहिए साबरमती जेल से नैनी जेल लाने और  यहां से ले जाने के प्रसंग का ऐसा ही असर हुआ होगा। न जाने ऐसे लोगों के कितनी संख्या होगी जिन्हें अतीक के कारण परिवार, रिश्तेदार, दोस्त की जान गंवानी पड़ी होगी, संपत्तियां छोड़नी पड़ी होगी या भय से पलायन कर चुप कर रहना पड़ा होगा। इन सबके साथ सही न्याय की शुरुआत हो गई है। इसमें बिना लाग लपेट  कहा जा सकता है कि उमेशपाल हत्याकांड की कानूनी परिणति भी वही होगी जो होनी चाहिए। 

अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल 9811027208

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

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