सोमवार, 9 जनवरी 2023

गुरुवार, 5 जनवरी 2023

चुनौतियों से भरा होगा वर्ष 2023

अवधेश कुमार 

हर नया वर्ष पुराने वर्ष का ही विस्तार होता है । ईसा संवत 2023 भी इसका अपवाद नहीं है। वर्ष 2022  के आरंभ और अंत तक घटी घटनाएं तथा अनेक घटनाओं की तैयार होती आधारभूमि से ही 2023 का ताना-बाना खड़ा होगा। इस वर्ष का सूर्योदय ऐसे समय हुआ जब पूरी दुनिया में कोरोना फिर भय पैदा कर रहा है। पिछले तीन वर्षों में कोरोना ने पूरी दुनिया को हलकान किया है। इसका प्रकोप कैसा होगा, कितना होगा, होगा कि नहीं होगा यह सब भविष्य के गर्त में है लेकिन हमारे पास सुरक्षा के हरसंभव उपाय करने तथा आक्रमण से बचाव की तैयारी के अलावा कोई चारा नहीं है। कोरोना केवल एक बीमारी नहीं है। यह अपने साथ आर्थिक- सामाजिक- सांस्कृतिक समस्याएं लेकर आता है। निश्चित रूप से आम लोग ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि फिर कोरोना की त्रासदी हमारे देश में न आए। पिछली लहर को आधार बनाकर गलत आंकड़े, गलत तथ्य प्रस्तुत करने के साथ यह भय भी पैदा किया जा रहा है कि अस्पतालों में व्यवस्थाएं आने वाले खतरों के समक्ष नाकाफी हैं। अगर कोरोना का रूप विकराल हुआ तो पहलै की तरह दुनिया भर में भारत को एक विफल देश के रूप में प्रस्तुत किए जाने का सामना करने को तैयार रहिए।

इस वर्ष अग्निवीर योजना को लेकर देश के कई भागों में हिंसा हुई। वाराणसी ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे के न्यायालयी आदेश के विरुद्ध हिंसा और और दंगे का दृश्य भी सामने रहा। 2023 में भी हमें इसके विस्तार के लिए तैयार रहना होगा। साबित हो गया कि इनके पीछे ऐसे संगठनों की भूमिका है जो देश को हिंसा और अराजकता में झोंकने के लिए सक्रिय है। न्यायालय ने मथुरा के शाही ईदगाह मस्जिद में भी सर्वे का आदेश दे दिया है। इस वर्ष ज्ञानवापी और मथुरा श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद में संभव है कोई फैसला भी आए। फैसला नहीं भी आए तो सुनवाई और न्यायालयों की टिप्पणियों तथा वादी - प्रतिवादी पक्षों की गतिविधियों से माहौल गर्म रहेगा। भारत विरोधी तथा देश के अंदर सक्रिय जेहादी आतंकवादी कट्टरपंथी शक्तियां इसका लाभ उठाकर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश करेंगी। नूपुर शर्मा मामले में सिर तन से जुदा करने के लगते नारे तथा उसके आधार पर उदयपुर से अमरावती तक हुई सिर तन से जुदा की घटनाओं के आरोप पत्र में है कि हत्यारे और उनको सहयोग करने वाले समूह कट्टरपंथी समूहों से जुड़े थे और उनका मानस बदला जा चुका था। उदयपुर के हत्यारे पाकिस्तान स्थित दावत-ए-इस्लामी संगठन से जुड़े थे तो अमरावती के तब्लीगी जमात से।

इस तरह की मानसिकता इन गिरफ्तार हुए कुछ ही लोगों तक सीमित नहीं होगी। इसका विस्तार हुआ होगा और ज्यादा मजहबी कट्टरपंथी हिंसक मॉड्यूल तैयार हुए होंगे। वे दूसरे बहाने कुछ बड़ी घटनाएं करने की कोशिश करेंगे। जम्मू कश्मीर में साल के अंत में हमने देखा कि पाकिस्तान से प्रवेश कर गए चार आतंकवादी भारी हथियार लेकर बड़े हमले करने जा रहे थे। 4 घंटे से ज्यादा मुठभेड़ के बाद उन पर काबू पाया जा सका। सरकार जम्मू कश्मीर में चुनाव आयोजित कराने की तैयारी कर रही है, इसलिए ये शक्तियां वहां ज्यादा आक्रामक होकर हिंसा का षड्यंत्र रचेंगी।

जब भी भारत जैसा देश अपनी समस्त संभावनाओं को पहचान कर विश्व की पहली पंक्ति के देशों के समक्ष होने की कोशिश करता है तो उसे बाहरी एवं आंतरिक अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत कई वर्षों से इसी दौर से गुजर रहा है। जाहिर है, 2023 इससे बिल्कुल अलग नहीं हो सकता। चीन ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग में सैनिक घुसपैठ करने की कोशिश ही इसलिए की ताकि भारत को दबाव में रखा जाए। जून, 2020 में गलवान में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ करने का दुस्साहस किया था और उसके परिणामस्वरूप कोरोना प्रकोप से जूझते हुए भी भारत को सीमा सुरक्षा की दृष्टि से हर वह कदम उठाना पड़ा था जो कोई देश आसन्न युद्ध को देखते हुए उठाता है। चीन के कारण भारत को भारी खर्च उठाते हुए ऐसी स्थिति में लंबे समय तक रहना पड़ेगा। रूस यूक्रेन युद्ध के कारण विश्व में तेल के दाम और खाद्यान्नों की वैश्विक समस्या भारत को भी प्रभावित कर रही है। 2022 में प्रमुख देशों ने भारत एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसा व्यक्तित्व मान लिया जो व्लादिमीर पुतिन से बात कर युद्ध रुकवाने में भूमिका निभा सकते हैं। 

भारत व्यापक हितों का ध्यान रखते हुए युद्ध में कोई पक्ष बनने से स्वयं को बचाया  है। इस कारण अमेरिका और यूरोप सहित नाटो के देश नाखुश भी हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इनको सही जवाब दिया और कहा कि जब चीन हमारी सीमाओं पर अतिक्रमण कर रहा था, तो आप सुझाव दे रहे थे कि उनके साथ व्यापार बढ़ाएं। 2023 में भारत की विदेश नीति इसी तरह प्रखर रहेगी जिनकी चुनौतियां भी होंगी। संयुक्त राष्ट्रसंघ तनाव को दूर करने में पहले की ही भांति लाचार साबित हुआ है। भारत की नीति 2022 में भी संयुक्त राष्ट्र को महत्त्व देने और उसके सानिध्य में तनाव को सुलझाने की रही। इसमें सफलता नहीं मिली। चीन द्वारा ताइवान की सैनिक घेरेबंदी भी भारत की चिंता का कारण है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान के विरुद्ध किसी तरह की कार्रवाई की तो भारत के लिए निरपेक्ष रहना कठिन होगा। जी 20 का अध्यक्ष होने के कारण भारत मेजबानी की तैयारी में 2022 से ही लग गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने जी-20 के लिए नया थीम दिया है और उसके अनुरूप प्रमुख देशों की बैठक में विश्व को दिशा देने की कोशिश होगी।

वर्तमान भारत की प्रमुख चुनौती विदेश एवं रक्षा नीति पर भी राजनीतिक एकता का न होना है। जिस तरह चीन के मुद्दे पर कांग्रेस सहित विपक्ष ने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की उसकी प्रतिध्वनि इस वर्ष भी गुंजित होती रहेगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव जैसे दो बड़े नेता मोदी विरोधी राष्ट्रव्यापी गठबन्धन की कवायद कर रहे हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा उत्तर प्रदेश और  पंजाब से जम्मू कश्मीर तक जाएगी। राजस्थान में प्रवेश करने के साथ भारत जोड़ो यात्रा पर भाजपा ने जो स्टैंड लिया है उसको आधार बनाएं तो कह सकते हैं कि जम्मू कश्मीर जाते-जाते भी विवाद बना रहेगा।  यात्रा में सम्मिलित भाजपा, संघ और मोदी विरोधी एनजीओ सहित अन्य समूहों ने आपसी एकता बनाने की कोशिश की है। संभव है सरकार के विरुद्ध कोई बड़ा आंदोलन और संघर्ष आरंभ करने की कोशिश हो। शाहीनबाग से लेकर कृषि कानून विरोधी आंदोलनों को आधार बनाएं तो यह केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ सकती है। कृषि कानून विरोधी आंदोलन का लाभ उठाकर विदेश में बैठी खालिस्तान समर्थक शक्तियों ने किस ढंग से भारत को बदनाम करने और पंजाब में नए सिरे से विरोध पैदा करने की कोशिश की यह सामने है। पंजाब में 2022 में खालिस्तान समर्थक जुलूस निकले, पूरे वर्ष हथियारों के जखीरे और आतंकवादी पकड़े गए हैं , कुछ विस्फोट भी हुए हैं। पंजाब 2023 में एक बड़ी चुनौती के रूप में उपस्थित रहेगा।

2024 लोकसभा चुनाव की दृष्टि से 2023 महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों का वर्ष है।   दिल्ली एमसीडी में विजय से आम आदमी पार्टी का उत्साह बढ़ा है। गुजरात में भी उसने कांग्रेस के वोट में अच्छी सेंध लगाई है। इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों मे शायद कर्नाटक में वह हाथ आजमाये। पंजाब से वह कांग्रेस को सत्ताच्युत कर चुकी है।  कांग्रेस के लिए आम आदमी पार्टी 2023 में भी राजनीतिक चुनौती बनी रहेगी। कांग्रेस के लिए भाजपा से ज्यादा विपक्षी दल ही चुनौती हैं। त्रिपुरा चुनाव में अगर तृणमूल कांग्रेस ने ताल ठोंका तो कांग्रेस के लिए समस्याएं खड़ी होंगी। भाजपा एवं कांग्रेस के लिए कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश त्रिपुरा आदि के चुनाव काफी महत्वपूर्ण है। त्रिपुरा वाम मोर्चा विशेषकर माकपा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें सरकारों के लिए बड़ी चुनौती विकास की उचित और कठोर नीति को बनाए रखना होगा। चुनावों के कारण सरकारें लोकप्रियतावादी नीतियों की ओर बढ़ती हैं और इससे वास्तविक विकास एवं अन्य आवश्यक कार्य हाशिये में चले जाते हैं। हिमाचल चुनाव में कांग्रेस ने पुरानी पेंशन बहाली का वादा किया था जिसका भाजपा ने अलोकप्रियता का जोखिम उठाते हुए भी विरोध किया। उम्मीद करनी चाहिए कि केंद्र और भाजपा की प्रदेश सरकारें तथा दूसरी पार्टियों की सरकारें देश की अर्थव्यवस्था को जोखिम पहुंचाने वाले कदम नहीं उठाएगी।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -1100 92, मोबाइल - 98110 27208



मंगलवार, 3 जनवरी 2023

बुधवार, 28 दिसंबर 2022

अकेले एक पार्टी ने नहीं लड़ी आजादी की लड़ाई

अवधेश कुमार

कांग्रेस के अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे के स्वतंत्रता आंदोलन संबंधी बयान पर भाजपा का तीखा विरोध स्वाभाविक था। खरगे ने कहा कि आजादी दिलाने में कांग्रेस के नेताओं ने कुर्बानी दी लेकिन उनका तो कुत्ता भी नहीं मरा। खरगे ने कुत्ता शब्द का इस्तेमाल कर दिया अन्यथा कांग्रेस सहित कई पार्टियों के नेता लगातार कहते हैं कि भाजपा का स्वतंत्रता के आंदोलन में कोई योगदान नहीं था। कुछ यह भी कह देते हैं कि संघ अंग्रेजों के पक्ष में था। जब कोई बात जोर-शोर से बोली जाए तो बहुत सारे लोग उस पर विश्वास भी करने लगते हैं और उसी प्रकार की भाषा बोलते हैं। जाहिर है, इस विषय पर तथ्यात्मक तरीके से सच सच सामने लाना आवश्यक है। 

• कांग्रेस 15 अगस्त 1947 से पूर्व अनेक वर्षों तक स्वतंत्रता संघर्ष का भारत का सबसे बड़ा मंच था। 

• लेकिन वह कांग्रेस आज की तरह एक राजनीतिक पार्टी नहीं थी। अहिंसक आंदोलनों से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले दूसरी विचारधाराओं के लोग भी उस समय कांग्रेस के मंच से काम करते थे। 

•कांग्रेस के नेता जिस हिंदू महासभा की दिन रात आलोचना करते हैं उन्हें यह पता होना चाहिए कि एक ही व्यक्ति एक साथ हिंदू महासभा एवं कांग्रेस दोनों का सदस्य हो सकता था। यहां तक कि अध्यक्ष भी। पंडित मदन मोहन मालवीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे और कांग्रेस के भी। 

•वास्तव में सबका लक्ष्य अंग्रेजों से भारत की मुक्ति था और उसमें आज की तरह तथाकथित विचारधारा का तीखा विभाजन नहीं था। 

•वर्तमान कांग्रेस तब के कांग्रेस के उन नेताओं का नाम नहीं लेती जिनकी विचारधारा को हिंदुत्ववादी या संप्रदायिक मानती है। अंग्रेजों को प्रतिवेदन देने वाले मंच से प्रखर संघर्ष के रूप में कांग्रेस को परिणत करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाल गंगाधर तिलक  के योगदान को कांग्रेस उस रूप में नहीं स्वीकारती जैसा था। यही बात लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं के साथ लागू होता है। 

तिलक और लाला लाजपत राय दोनों उन स्वतंत्रता सेनानियों के प्रतिनिधि थे जो हिंदुत्व तथा धर्म अध्यात्म के आधार पर भारत का विचार करते थे। क्या इनका आजादी के आंदोलन में योगदान नहीं था? यह एक उदाहरण बताता है कि आजादी के आंदोलन को लेकर वर्तमान कांग्रेस की सोच संकुचित और विकृत है। एक और उदाहरण लीजिए। डॉ राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी धारा के नेता भी कांग्रेस के साथ ही स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय थे। क्या कांग्रेस कभी इनकी और इनकी तरह दूसरे नेताओं के महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करती है? 

वास्तव में छोटे बड़े संगठनों, संगठनों से परे और कांग्रेस में भी ऐसे लाखों की संख्या में विभूतियां थीं जिन्होंने अपने-अपने स्तरों पर स्वतंत्रता की लड़ाई में योगदान दिया,  अपनी बलि चढ़ाई। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर उन गुमनाम स्वतंत्र सेनानियों को तलाश कर सामने लाया जा रहा है। जितने सेनानियों के विवरण आ रहे हैं वे बताते हैं कि कोई एक संगठन ,कुछ नेता या कोई एक पार्टी स्वतंत्रता का श्रेय नहीं ले सकती। 

अब स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में कुछ दूसरे पक्ष।

• भारत का स्वतंत्रता संघर्ष लंबे कालखंड से चलता रहा है। 

•जहां तक अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का प्रश्न है तो यह 1756-57 में प्लासी युद्ध के साथ आरंभ हो गया था। जैसे-जैसे अंग्रेजी शासन का विस्तार होता गया उनके विरुद्ध विद्रोह एवं संघर्ष भी बढ़ता गया। संघर्ष का अपना एक व्यापक लक्ष्य भी था। 

•कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई और अंग्रेजों के विरुद्ध मुखर आवाज बनने की शुरुआत बीसवीं सदी के पहले दशक के उत्तरार्ध से हुई जब 1905 में बंग- भंग आंदोलन हुआ। 

• उसके पहले अंग्रेजों से मुक्ति के संघर्षों की एक पूरी श्रृंखला है। 

•1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का ही सच क्या था? कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। फिर आंदोलन पूरे भारत में कैसे फैला? जगह-जगह लोगों ने स्वतः प्रेरणा से अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठाया और आंदोलन अहिंसक भी नहीं रहा। कांग्रेस नेताओं ने बयान जारी किया कि आंदोलन में हो रहे हिंसा से उनका कोई लेना देना नहीं है। 

कहने का यह अर्थ नहीं कि 1942 का आंदोलन कांग्रेस का बिल्कुल नहीं था। कांग्रेस के स्थानीय सदस्य उसमें शामिल थे लेकिन बड़ी संख्या ऐसे लोग आंदोलन कर रहे थे जो कांग्रेस के सदस्य नहीं थे। 

•1942 से 47 के बीच का इतिहास बताता है कांग्रेस ने बाद में घोषित रूप से कोई राष्ट्रीय आंदोलन नहीं किया लेकिन पूरे देश में संघर्ष और आंदोलन होता रहा।

 • सैनिकों ने भी विद्रोह का का झंडा उठाया। मुंबई का नौसैनिक विद्रोह सबसे प्रचलित था लेकिन कई विद्रोह हुए। 

•उस समय के आंदोलनों में देश के ज्यादातर संगठनों की या संगठनों में काम करने वाले लोगों की जबरदस्त भूमिका थी।


जहां तक का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रश्न है तो उसने संगठन के रूप में आंदोलन में भाग नहीं लिया लेकिन स्वयंसेवक स्वतंत्रता आंदोलन में संघर्षरत रहे और बलिदान भी दिया। 

एक, संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार अपने  कोलकाता अध्ययन के दौरान तब के सबसे बड़े क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के सदस्य थे। 

दो,वहां से आने के बाद उन्होंने खिलाफत आंदोलन से असहमति रखते हुए भी असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल गए। उन्होंने न्यायालय में अपनी बहस में जो कुछ कहा उसके बाद न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि डॉ हेडगेवार ने जो किया उससे ज्यादा खतरनाक बयान उनका है। ऐसा व्यक्ति संघ की स्थापना के बाद अंग्रेजों का समर्थक हो गया यह वही कह सकते हैं जो मानसिक रूप से असंतुलित हो। 

तीन,1929 में कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित करने के बाद डॉक्टर हेडगेवार ने सभी शाखाओं पर तिरंगा झंडा फहराने का संदेश दिया और फहराया गया। 

चार,नमक सत्याग्रह के लिए डॉक्टर हेडगेवार ने सरसंघचालक पद से कुछ समय के लिए स्वयं को अलग किया और डॉक्टर परांजपे को सौंपकर स्वयंसेवकों के साथ निकल पड़े। 

इन सबमें विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। सच यह है कि तब कांग्रेस डॉ हेडगेवार का समर्थन करती थी। कुछ उदाहरण देखिए।

• असहयोग आंदोलन में जेल से छूटकर आने के बाद कांग्रेस ने डॉ हेडगेवार के सम्मान में सभा आयोजित की इसको मोतीलाल नेहरू सहित कई कांग्रेस के नेताओं ने संबोधित किया।

• 1930 में जंगल सत्याग्रह के दौरान जब डॉक्टर हेडगेवार को उनके 10 साथियों के साथ गिरफ्तार किया गया और 9 माह की सजा सुनाई गई तो वहां कांग्रेस के नेताओं ने उनके समर्थन में रैली का आयोजन किया। 

•सेंट्रल प्रोविंस और बरार पुलिस की रिपोर्ट को देखिए तो उसमें लिखा है कि डॉ हेडगेवार की भागीदारी के कारण अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन को गति मिली। 

•इन पर शोध करने वालों ने बताया है कि राजनीतिक आंदोलनों में संघ के बढ़-चढ़कर भाग लेने का परिणाम यह हुआ कि सेंट्रल प्रोविंस की सरकार ने 15/ 16 दिसंबर 1932 को एक सर्कुलर के जरिए  सरकारी कर्मचारियों को संघ की गतिविधियों से दूर रहने और इसका सदस्य बनने आदि को लेकर चेतावनी दी। सेंट्रल प्रोविंस की प्रांतीय विधानसभा में कांग्रेस के लोगों ने ही इसे चुनौती दी। विधानसभा में संघ की प्रशंसा हुई और सर्कुलर वापस हुआ। 

द्वितीय विश्व युद्ध में संघ ने ब्रिटिश सरकार को समर्थन देने से जब इनकार किया 2 जून, 1940 में गृह विभाग ने सेंट्रल प्रोविंस सरकार से संघ पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा। तत्कालीन मुख्य सचिव जी एम त्रिवेदी ने कहा कि यह संभव नहीं है तो प्रशिक्षण शिविरों और वर्दी पर रोक लगाने के लिए अध्यादेश लाया गया। इसके विरोध में स्वयंसेवकों ने भारी संख्या में गिरफ्तारियां दी। 1942 के आंदोलन के दौरान सेंट्रल प्रोविंस के चिमूर और आष्टी तहसील में पुलिस कार्रवाई में कई स्वयंसेवकों की मौत हुई ,अनेक जेल में डाले गए। तब एक रिपोर्ट में कहा गया था कि संघ के स्वयंसेवक सेना, नौसेना, डाक  व तार, रेलवे और प्रशासनिक सेवाओं में घुस गए हैं जिससे इन पर कब्जा करने में कोई समस्या नहीं आए। इस रिपोर्ट में कहा गया कि यह संगठन बहुत ज्यादा ब्रिटिश सरकार विरोधी है और इसकी आवाज उग्रवादी होती जा रही है। संघ के प्रशिक्षण शिविरों पर छापे मारकर स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया गया।

साफ है कि कांग्रेस के साथ-साथ कई दल, इतिहास के विद्वान, एक्टिविस्ट आदि लगातार झूठ फैलाते रहे हैं। यह केवल संघ ही नहीं दूसरे संगठनों और संगठन से परे काम करने वाले लाखों देशभक्तों के साथ अन्याय है जिन्होंने अंग्रेजों से मुक्ति के लिए जितना संभव था संघर्ष किया। अच्छा हो इस विषय को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे रखा जाए।

अवधेश कुमार,ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

सोमवार, 26 दिसंबर 2022

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