मंगलवार, 3 जनवरी 2023

बुधवार, 28 दिसंबर 2022

अकेले एक पार्टी ने नहीं लड़ी आजादी की लड़ाई

अवधेश कुमार

कांग्रेस के अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे के स्वतंत्रता आंदोलन संबंधी बयान पर भाजपा का तीखा विरोध स्वाभाविक था। खरगे ने कहा कि आजादी दिलाने में कांग्रेस के नेताओं ने कुर्बानी दी लेकिन उनका तो कुत्ता भी नहीं मरा। खरगे ने कुत्ता शब्द का इस्तेमाल कर दिया अन्यथा कांग्रेस सहित कई पार्टियों के नेता लगातार कहते हैं कि भाजपा का स्वतंत्रता के आंदोलन में कोई योगदान नहीं था। कुछ यह भी कह देते हैं कि संघ अंग्रेजों के पक्ष में था। जब कोई बात जोर-शोर से बोली जाए तो बहुत सारे लोग उस पर विश्वास भी करने लगते हैं और उसी प्रकार की भाषा बोलते हैं। जाहिर है, इस विषय पर तथ्यात्मक तरीके से सच सच सामने लाना आवश्यक है। 

• कांग्रेस 15 अगस्त 1947 से पूर्व अनेक वर्षों तक स्वतंत्रता संघर्ष का भारत का सबसे बड़ा मंच था। 

• लेकिन वह कांग्रेस आज की तरह एक राजनीतिक पार्टी नहीं थी। अहिंसक आंदोलनों से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले दूसरी विचारधाराओं के लोग भी उस समय कांग्रेस के मंच से काम करते थे। 

•कांग्रेस के नेता जिस हिंदू महासभा की दिन रात आलोचना करते हैं उन्हें यह पता होना चाहिए कि एक ही व्यक्ति एक साथ हिंदू महासभा एवं कांग्रेस दोनों का सदस्य हो सकता था। यहां तक कि अध्यक्ष भी। पंडित मदन मोहन मालवीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे और कांग्रेस के भी। 

•वास्तव में सबका लक्ष्य अंग्रेजों से भारत की मुक्ति था और उसमें आज की तरह तथाकथित विचारधारा का तीखा विभाजन नहीं था। 

•वर्तमान कांग्रेस तब के कांग्रेस के उन नेताओं का नाम नहीं लेती जिनकी विचारधारा को हिंदुत्ववादी या संप्रदायिक मानती है। अंग्रेजों को प्रतिवेदन देने वाले मंच से प्रखर संघर्ष के रूप में कांग्रेस को परिणत करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाल गंगाधर तिलक  के योगदान को कांग्रेस उस रूप में नहीं स्वीकारती जैसा था। यही बात लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं के साथ लागू होता है। 

तिलक और लाला लाजपत राय दोनों उन स्वतंत्रता सेनानियों के प्रतिनिधि थे जो हिंदुत्व तथा धर्म अध्यात्म के आधार पर भारत का विचार करते थे। क्या इनका आजादी के आंदोलन में योगदान नहीं था? यह एक उदाहरण बताता है कि आजादी के आंदोलन को लेकर वर्तमान कांग्रेस की सोच संकुचित और विकृत है। एक और उदाहरण लीजिए। डॉ राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी धारा के नेता भी कांग्रेस के साथ ही स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय थे। क्या कांग्रेस कभी इनकी और इनकी तरह दूसरे नेताओं के महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करती है? 

वास्तव में छोटे बड़े संगठनों, संगठनों से परे और कांग्रेस में भी ऐसे लाखों की संख्या में विभूतियां थीं जिन्होंने अपने-अपने स्तरों पर स्वतंत्रता की लड़ाई में योगदान दिया,  अपनी बलि चढ़ाई। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर उन गुमनाम स्वतंत्र सेनानियों को तलाश कर सामने लाया जा रहा है। जितने सेनानियों के विवरण आ रहे हैं वे बताते हैं कि कोई एक संगठन ,कुछ नेता या कोई एक पार्टी स्वतंत्रता का श्रेय नहीं ले सकती। 

अब स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में कुछ दूसरे पक्ष।

• भारत का स्वतंत्रता संघर्ष लंबे कालखंड से चलता रहा है। 

•जहां तक अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का प्रश्न है तो यह 1756-57 में प्लासी युद्ध के साथ आरंभ हो गया था। जैसे-जैसे अंग्रेजी शासन का विस्तार होता गया उनके विरुद्ध विद्रोह एवं संघर्ष भी बढ़ता गया। संघर्ष का अपना एक व्यापक लक्ष्य भी था। 

•कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई और अंग्रेजों के विरुद्ध मुखर आवाज बनने की शुरुआत बीसवीं सदी के पहले दशक के उत्तरार्ध से हुई जब 1905 में बंग- भंग आंदोलन हुआ। 

• उसके पहले अंग्रेजों से मुक्ति के संघर्षों की एक पूरी श्रृंखला है। 

•1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का ही सच क्या था? कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। फिर आंदोलन पूरे भारत में कैसे फैला? जगह-जगह लोगों ने स्वतः प्रेरणा से अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठाया और आंदोलन अहिंसक भी नहीं रहा। कांग्रेस नेताओं ने बयान जारी किया कि आंदोलन में हो रहे हिंसा से उनका कोई लेना देना नहीं है। 

कहने का यह अर्थ नहीं कि 1942 का आंदोलन कांग्रेस का बिल्कुल नहीं था। कांग्रेस के स्थानीय सदस्य उसमें शामिल थे लेकिन बड़ी संख्या ऐसे लोग आंदोलन कर रहे थे जो कांग्रेस के सदस्य नहीं थे। 

•1942 से 47 के बीच का इतिहास बताता है कांग्रेस ने बाद में घोषित रूप से कोई राष्ट्रीय आंदोलन नहीं किया लेकिन पूरे देश में संघर्ष और आंदोलन होता रहा।

 • सैनिकों ने भी विद्रोह का का झंडा उठाया। मुंबई का नौसैनिक विद्रोह सबसे प्रचलित था लेकिन कई विद्रोह हुए। 

•उस समय के आंदोलनों में देश के ज्यादातर संगठनों की या संगठनों में काम करने वाले लोगों की जबरदस्त भूमिका थी।


जहां तक का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रश्न है तो उसने संगठन के रूप में आंदोलन में भाग नहीं लिया लेकिन स्वयंसेवक स्वतंत्रता आंदोलन में संघर्षरत रहे और बलिदान भी दिया। 

एक, संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार अपने  कोलकाता अध्ययन के दौरान तब के सबसे बड़े क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के सदस्य थे। 

दो,वहां से आने के बाद उन्होंने खिलाफत आंदोलन से असहमति रखते हुए भी असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल गए। उन्होंने न्यायालय में अपनी बहस में जो कुछ कहा उसके बाद न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि डॉ हेडगेवार ने जो किया उससे ज्यादा खतरनाक बयान उनका है। ऐसा व्यक्ति संघ की स्थापना के बाद अंग्रेजों का समर्थक हो गया यह वही कह सकते हैं जो मानसिक रूप से असंतुलित हो। 

तीन,1929 में कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित करने के बाद डॉक्टर हेडगेवार ने सभी शाखाओं पर तिरंगा झंडा फहराने का संदेश दिया और फहराया गया। 

चार,नमक सत्याग्रह के लिए डॉक्टर हेडगेवार ने सरसंघचालक पद से कुछ समय के लिए स्वयं को अलग किया और डॉक्टर परांजपे को सौंपकर स्वयंसेवकों के साथ निकल पड़े। 

इन सबमें विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। सच यह है कि तब कांग्रेस डॉ हेडगेवार का समर्थन करती थी। कुछ उदाहरण देखिए।

• असहयोग आंदोलन में जेल से छूटकर आने के बाद कांग्रेस ने डॉ हेडगेवार के सम्मान में सभा आयोजित की इसको मोतीलाल नेहरू सहित कई कांग्रेस के नेताओं ने संबोधित किया।

• 1930 में जंगल सत्याग्रह के दौरान जब डॉक्टर हेडगेवार को उनके 10 साथियों के साथ गिरफ्तार किया गया और 9 माह की सजा सुनाई गई तो वहां कांग्रेस के नेताओं ने उनके समर्थन में रैली का आयोजन किया। 

•सेंट्रल प्रोविंस और बरार पुलिस की रिपोर्ट को देखिए तो उसमें लिखा है कि डॉ हेडगेवार की भागीदारी के कारण अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन को गति मिली। 

•इन पर शोध करने वालों ने बताया है कि राजनीतिक आंदोलनों में संघ के बढ़-चढ़कर भाग लेने का परिणाम यह हुआ कि सेंट्रल प्रोविंस की सरकार ने 15/ 16 दिसंबर 1932 को एक सर्कुलर के जरिए  सरकारी कर्मचारियों को संघ की गतिविधियों से दूर रहने और इसका सदस्य बनने आदि को लेकर चेतावनी दी। सेंट्रल प्रोविंस की प्रांतीय विधानसभा में कांग्रेस के लोगों ने ही इसे चुनौती दी। विधानसभा में संघ की प्रशंसा हुई और सर्कुलर वापस हुआ। 

द्वितीय विश्व युद्ध में संघ ने ब्रिटिश सरकार को समर्थन देने से जब इनकार किया 2 जून, 1940 में गृह विभाग ने सेंट्रल प्रोविंस सरकार से संघ पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा। तत्कालीन मुख्य सचिव जी एम त्रिवेदी ने कहा कि यह संभव नहीं है तो प्रशिक्षण शिविरों और वर्दी पर रोक लगाने के लिए अध्यादेश लाया गया। इसके विरोध में स्वयंसेवकों ने भारी संख्या में गिरफ्तारियां दी। 1942 के आंदोलन के दौरान सेंट्रल प्रोविंस के चिमूर और आष्टी तहसील में पुलिस कार्रवाई में कई स्वयंसेवकों की मौत हुई ,अनेक जेल में डाले गए। तब एक रिपोर्ट में कहा गया था कि संघ के स्वयंसेवक सेना, नौसेना, डाक  व तार, रेलवे और प्रशासनिक सेवाओं में घुस गए हैं जिससे इन पर कब्जा करने में कोई समस्या नहीं आए। इस रिपोर्ट में कहा गया कि यह संगठन बहुत ज्यादा ब्रिटिश सरकार विरोधी है और इसकी आवाज उग्रवादी होती जा रही है। संघ के प्रशिक्षण शिविरों पर छापे मारकर स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया गया।

साफ है कि कांग्रेस के साथ-साथ कई दल, इतिहास के विद्वान, एक्टिविस्ट आदि लगातार झूठ फैलाते रहे हैं। यह केवल संघ ही नहीं दूसरे संगठनों और संगठन से परे काम करने वाले लाखों देशभक्तों के साथ अन्याय है जिन्होंने अंग्रेजों से मुक्ति के लिए जितना संभव था संघर्ष किया। अच्छा हो इस विषय को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे रखा जाए।

अवधेश कुमार,ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

सोमवार, 26 दिसंबर 2022

बुधवार, 21 दिसंबर 2022

तवांग में चीन की हरकत

अवधेश कुमार

चीनी सैनिकों द्वारा अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर भारतीय सैनिकों के साथ आमने-सामने के संघर्ष में एक बार फिर भारत चीन सीमा तनाव को सतह पर ला दिया है। हालांकि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। हम चीन की हरकतें अरुणाचल प्रदेश को लेकर पुरानी है। वह संपूर्ण अरुणाचल पर अपना दावा करता है। इसलिए तवांग सेक्टर में 9 दिसंबर को चीनी सैनिकों द्वारा सीमा पार करने की कोशिश उसकी उसी दुर्नीति का अंग है। वे सीमा पार नहीं कर सके तो यह हमारे सैनिकों की बहादुरी है। इसमें हमारे जवान भी घायल हुए और उन्हें गुवाहाटी के 151 बेस अस्पताल में एअरलिफ्ट करना पड़ा तो जाहिर है झड़प सामान्य नहीं थी। हालांकि चीन के घायल सैनिकों की संख्या ज्यादा बताई जा रही है। भारतीय सेना की ओर से जो बयान जारी किया गया है उसके अनुसार 9 दिसंबर को पीएलए के सैनिकों ने तवांग सेक्टर में एलओसी की सीमा को छुआ। इस पर भारतीय सैनिकों ने पूरी ताकत और दृढ़ता से मुकाबला किया। इस आमने-सामने की झड़प में दोनों पक्षों के कुछ सैनिकों को मामूली चोटें आई।

वैसे भारतीय सेना ने घायल जवानों की संख्या नहीं बतलाई है। इसके कुछ रणनीतिक कारण होंगे। चीन से हम यह उम्मीद कर भी नहीं सकते कि वहां इन मामलों में पारदर्शिता होगी। पूर्वी लद्दाख में गलवन घाटी में 15 जून, 2020 को एलएसी पर हुए खूनी संघर्ष के बाद भारत और चीन के सैनिकों के बीच सीधे टकराव का यह दूसरा अवसर है। ध्यान रखने की बात है कि कल उस संघर्ष में 20 भारतीय सैनिकों का बलिदान हुआ था। इन 20 बलिदानी सैनिकों ने ही चीनी सेना की योजनाओं को ध्वस्त कर दिया था। इसमें ज्यादा संख्या में चीनी सैनिक भी मारे गए थे जिनके बारे में पहले उसने इनकार किया लेकिन बाद में उसे स्वीकार करना पड़ा। यह बात अलग है कि केवल 5 सैनिकों के मारे जाने की बात को ही स्वीकार किया है। हालांकि उस टकराव के बीच ही सितंबर 2020 में पैंगौंग झील के इलाके में एलएसी पर चीनी सैनिकों ने गोलीबारी की थी जिसका भारत की ओर से करारा प्रत्युत्तर दिया गया था। यह 45 वर्ष से दोनों देशों की सीमा पर गोलीबारी नहीं होने के समझौते का सरेआम उल्लंघन था। अक्टूबर 2021 में भी यांगसे इलाके में चीनी सैनिकों ने भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण की कोशिश की थी लेकिन भारतीय सैनिकों ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया और कुछ घंटों बाद दोनों देशों के बीच स्थापित तंत्र के बीच संवाद के बाद छोड़ा गया। 

जाहिर है, चीन अपनी कुटिल रणनीति के तहत सैन्य गतिविधियों को इस तरह अंजाम देता है। वर्तमान झड़प के बारे में जितनी खबरें आई हैं उनके अनुसार चीनी सैनिकों की संख्या लगभग 300 थी। तवांग सेक्टर में 9 दिसंबर को करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर झड़प हुई थी। चीनी सैनिक अगर मन बना कर आए थे तो उनकी पूरी तैयारी थी। आमने-सामने की भिड़ंत हुई जिनमें भारतीय सैनिकों ने उनको करारा उत्तर दिया और खदेड़ डाला।  तवांग सेक्टर में एलओसी पर दोनों पक्ष अपने दावे की सीमा तक क्षेत्र में गश्त करते हैं और 2006 से चल रहा है। भारतीय सेना कभी इससे परे जाकर हरकत नहीं करती। किंतु चीनी सैनिक समय-समय पर ऐसा करते रहते हैं। चीन जिस ढंग के खुराफात करता है उससे हमारे रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण बने हुए हैं। पिछले 7 दिसंबर को  विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संसद में कहा था कि चीन के साथ अभी भारत के रिश्ते सामान्य नहीं कहे जा सकते। उन्होंने कहा था कि कूटनीतिक तौर पर चीन को यह स्पष्ट किया जा चुका है कि वह एलएसी को मनमाने तरीके से नहीं बदल सकता और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। जब तक वे ऐसा करते हैं या शक्ति का प्रयोग करते हैं जो हमारी सीमा के लिए गंभीर चिंता पैदा करते हैं तब तक हमारे रिश्ते सुधर नहीं सकते। हाल में चीन में बढ़ती महंगाई के कारण लोगों ने जिस ढंग से प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैथ तथा जीरो कोविड नीति के विरुद्ध सड़कों पर उतरे हैं उनसे राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनके सलाहकारों के पेशानी पर बल पड़े हुए हैं। सभी कोशिशों के बावजूद कहीं न कहीं लोग सड़कों पर उतर कर विरोध में नारे लगाते हैं और शी जिनपिंग वापस जाओ की बात करते हैं। संभव है इनसे ध्यान बंटाने के लिए भारत के साथ तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहा हो। उसके पास दो ही क्षेत्र है जहां वह सैन्य कार्रवाई करके राष्ट्रवाद की भावना पैदा कर सकता है। एक है ताइवान लेकिन वहां हस्तक्षेप से अभी वह बचना चाहेगा क्योंकि अमेरिकी विमान दक्षिण चीन सागर में पहुंच चुके हैं। तो भारत बचता है। 

तवांग के बारे में वह कहता है कि यह हमारा ही हिस्सा था।1962 के युद्ध के समय चीनी सैनिकों का सबसे बड़ा समूह तवांग के रास्ते असम तक घुसपैठ किया था। कुछ समय के लिए तवांग उसके कब्जे में भी रहा था। अक्टूबर 2021 में चीन के 200 सैनिकों का एक दल तवांग स्थित भारत चीन भूटान सीमा के पास भारतीय गांव में घुस आया था जिसे बाद में भारतीय सैनिकों ने खदेड़ दिया था। 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीनी घुसपैठ के बाद दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ता में भी तवांग की स्थिति पर चर्चा हुई थी। गलवन घाटी में खूनी संघर्ष के बाद तनाव के बीच उसी वर्ष अगस्त में चीन के 100 सैनिक तवांग के एक क्षेत्र में करीब 5 किलोमीटर तक भारतीय सीमा में घुसे थे। इससे पहले वर्ष 2016 में करीब 200-250 चीनी सैनिकों ने तवांग स्थित एक दूसरे पॉइंट से भारतीय सीमा में प्रवेश किया था। हर बार भारतीय सैनिक उन्हें खदेड़ते हैं। चीन की तरफ से बार-बार तवांग में घुसपैठ यूं ही नहीं है। तवांग का रणनीतिक महत्व है। इस जिले की सीमा भारत और तिब्बत के साथ ही भूटान से जुड़ी हुई है। यहां से वह समूचे पूर्वोत्तर भारत की निगरानी कर सकता है। इसका एक दूसरा पहलू भी है। तवांग का तिब्बत में प्रचलित बौद्ध धर्म से काफी गहरा नाता है और चीन इस आधार पर ही क्षेत्र पर अपना दावा पेश करता है। तवांग छठे दलाई लामा की जन्मस्थली है । इस कारण बौद्ध धर्मावलंबियों के बीच पूरे दुनिया में इसका महत्व है। चीन कहता है कि चूंकि तवांग का मठ दलाई लामा द्वारा बनाया गया इसलिए वह हमारा भाग है। वर्तमान दलाई लामा जब तिब्बत में विद्रोह के बीच अपने सहयोगियों के साथ भारत भागे थे उस समय तवांग तिब्बत विद्रोह का एक बड़ा केंद्र था। इस कारण भी चीन की नजर वहां पड़ती है। दलाई लामा जब भी उस क्षेत्र की यात्रा करते हैं चीन की तीखी प्रतिक्रिया सामने आती है। चीन के दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता। तिब्बत कभी चीन का भाग रहा नहीं है। उसने क्रूरता से तिब्बत को हड़पा है।  इस आधार पर विचार करें तो भारत के बौद्ध भिक्षुओं ने दुनिया में जहां-जहां बौद्ध मठ बनाए उसे हम भारत का भाग घोषित कर सकते हैं। कैलाश मानसरोवर आज चीन का भाग है। वह हमारा धर्म क्षेत्र है और मान्यता भी है कि वह भारत का ही अंग था। क्या चीन के व्यवहार के प्रत्युत्तर में भारत भी कैलाश मानसरोवर की मुक्ति के लिए कार्रवाई करे? लेकिन चीन को ऐसे तार्किक बातों से कोई लेना-देना नहीं। दक्षिण चीन सागर पर उसके दावे के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक ने फैसला दे दिया कि कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है जिससे वह कभी आपका भूभाग बताया जा सके। बावजूद वहां पूरे सैन्य ताकत के साथ जमा हुआ है और किसी की नहीं सुनता। ऐसा देश हमारा पड़ोसी है तो हमें उसकी ऐसी हरकतों से निपटने के लिए हर क्षण तैयार रहना चाहिए। भारत ने चीन के इरादे को देखते हुए समूचे अरुणाचल प्रदेश में ढांचागत विकास को काफी तेज किया। अरुणाचल से लगे लगे इलाकों में कुल 63 सड़क परियोजनाएं चल रही है। इससे चीन की सीमा तक भारतीय सैनिकों की पहुंच भी हो गई है। 1962 के युद्ध के समय सड़क मार्ग नहीं होने के कारण भारतीय सैनिकों को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा था। तवांग और अरुणाचल के दूसरे इलाकों में भारत ने अपने सैनिकों की संख्या बढ़ाई है। चीन ने भी इस इलाके में सड़कों, पुलों सैन्य अड्डों का निर्माण किया है लेकिन उसे भारत के निर्माण पर आपत्ति है। चीन जिस वृहत्तर राष्ट्र की नीति पर चल रहा है तथा विश्व का एकमात्र महाशक्ति बनने का इरादा रखता है उसमें भारत के सामने उसके समानांतर अपनी सैन्य शक्ति खड़ी करते हुए हर क्षण सतर्क रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हां , इसके लिए देश में एकता चाहिए। राजनीतिक रूप से एक दल दूसरे का विरोध करें किंतु चीन के मामले पर भारत से एक आवाज निकलनी चाहिए। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है। 

अवधेश कुमार,ई 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 98110 27208



मंगलवार, 20 दिसंबर 2022

शमां एनजीओ की ओर से प्रेम नगर, लोनी में गरीब वृद्ध, महिलाओं और बच्चों के लिए निशुल्क स्वास्थ्य कैंप का आयोजन किया गया

प्रेम नगर, लोनी। शमां एजुकेशनल एंड पॉलिटेक्निक सोसाइटी की ओर से प्रेम नगर लोनी, उत्तर प्रदेश में हाजी सैयद कासिम के कार्यालय पर गरीबों, बेसहारा  बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए एक भव्य निशुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाया गया। संस्था के महासचिव डॉ फहीम बेग के अनुसार इस शिविर में 200 से अधिक रोगियों के की जांच करके मुफ्त दवाइयां वितरित की गईं। डॉ बेग ने बताया कि दिल्ली से सटे प्रेम नगर लोनी में बहुत ही कमजोर तबके के लोग रहते हैं, इस क्षेत्र के आसपास सरकारी स्वास्थ्य केंद्र अथवा अस्पताल न होने के कारण आम लोगों को अपने स्वास्थ्य को स्वस्थ रखने के लिए या तो गाजियाबाद जाना होता है या फिर दिल्ली आना पड़ता है जिसके कारण यहां के निवासी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। इन्हीं सब समस्याओं के चलते शमां एनजीओ की टीम ने यह फैसला लिया कि इस क्षेत्र में निशुल्क स्वास्थ्य  शिविर लगाया जाए और गरीब बेसहारा लोगों की सेवा की जाए।
शिविर में महिला रोगियों की जांच करते हुए डॉक्टर शबनम मिर्जा ने बताया कि इस क्षेत्र में महिलाओं में आयरन, कैल्शियम आदि की बेहद कमी देखी जा रही है साथ ही गुप्त रोगी महिलाओं की संख्या भी अधिक है, हमने यहां रोगियों को  स्वस्थ रहने के लिए अनेकों सुझाव भी दिए हैं।
शिविर में सेवा करते हुए मोहम्मद अबू कमर ने बताया कि आज हमारी संस्था ने 200 से अधिक रोगियों को मुफ्त दवाइयां वितरित की साथ ही उनकी जीवनशैली को सुधारने हेतु अनेकों उपाय और सुझाव भी बताए और हमारी संस्था पिछले 25 वर्षों से इस प्रकार के मानव कल्याणकारी कार्य करती आ रही है और हमारी पूरी टीम का यह लक्ष्य है की हर गरीब और जरूरतमंद को स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जाए।
शिविर को आयोजित करने के लिए हाजी शफीक उर रहमान सैफी, मोहम्मद अनीस, मोहम्मद साबिर ने रोगियों को वितरित करने लिए दवाइयां देकर महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
हाजी सैयद कासिम ने संस्था की मेडिकल टीम व सदस्यों की भूरी-भूरी प्रशंसा की और क्षेत्र में आकर निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं देकर गरीबों बेसहारों जरूरतमंदों की जी सेवा की उसके लिए भी उन्होंने सभी का धन्यवाद किया।
शिविर में शाहबाज खान, आसिफ इदरीसी, शिबा खान, फातिमा, साहिल, शहजाद अली आदि ने अपना पूर्ण योगदान दिया और रोगियों की सेवा की।
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