सोमवार, 19 दिसंबर 2022
बुधवार, 14 दिसंबर 2022
परिणामों में सभी पार्टियों के लिए संदेश
अवधेश कुमार
गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव परिणामों के पहली नजर में अलग-अलग संदेश हैं। गुजरात में अगर 27 वर्षों से कायम भाजपा की सत्ता को रिकॉर्ड मत और बहुमत के साथ स्वीकार किया तो हिमाचल प्रदेश ने हर 5 में वर्ष सत्ता बदलने की परंपरा तोड़ने की उसकी आकांक्षा को धक्का पहुंचाया। हालांकि हिमाचल का कुल अंकगणित ऐसा है जिसमें भाजपा अपने लिए सांत्वना के पहलू तलाश चुकी है। पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने कहा कि हमारे और कांग्रेस के मतों में केवल .9 प्रतिशत का ही अंतर है। वास्तव में भाजपा को 43% एवं कांग्रेस को 43.9% मत मिले। इस तरह 1% से भी कम मत में कांग्रेस को बहुमत प्राप्त हो गया। जरा सोचिए, हिमाचल में कितने कांटे की टक्कर रही होगी कि .9% मत में 68 विधानसभाओं में 40 कांग्रेस के पास चले गए एवं भाजपा के पास केवल 25 बचे, जो उसके पिछले 44 की संख्या से 19 कम है। यह भी कहा जा सकता है कि 1977 के बाद कोई सरकार वहां लगातार दूसरी बार नहीं आई। इस आधार पर कहा जा सकता है कि मतदाताओं ने सरकार बदलने की अपनी परंपरा को कायम रखा है।
इसके समानांतर गुजरात में भाजपा को 156 सीटें और 52.5% मत मिलने की कल्पना किसी ने भी नहीं की थी। 1952 के पहले आम चुनाव के बाद संपूर्ण भारत में किसी बड़े राज्य के विधानसभा चुनाव में इस तरह का रिकॉर्ड शायद ही मिलेगा जहां किसी एक पार्टी को 86% के आसपास सीटें मिल गई हो। ऐसी जबरदस्त विजय में हिमाचल की पराजय भाजपा के लिए वैसी निराशा का कारण नहीं बना जैसी बननी चाहिए थी। दूसरी ओर लंबे समय से हताशा के दौर से गुजर रही कांग्रेस को हिमाचल ने नई उर्जा दी है। पार्टी ने कहा भी है कि उसने यह मिथक तोड़ा है कि भाजपा को उत्तर भारत में कोई हरा नहीं सकता है। हालांकि यह सच नहीं है। भाजपा इसके पहले भी 2018 में मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ राजस्थान का चुनाव हार चुकी है और कांग्रेस के हाथों ही। जाहिर है अति उत्साह में कांग्रेस ने यह वक्तव्य दिया है। तीसरी तरफ आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि केवल 10 वर्ष पहले बनी पार्टी गुजरात में 12% से अधिक वोट और 5 सीटें पाई तथा राष्ट्रीय पार्टी बन गई यह बहुत बड़ी बात है। इस तरह भारत की तीनों पार्टियों के लिए इन चुनावों में संतोष के पहलू निहित हैं।
लेकिन चुनावों के संदेश यहीं तक सीमित नहीं है। राजनीति, विचारधारा और भविष्य के चुनावी परिदृश्य की दृष्टि से इसने और भी कुछ संकेत दिए हैं, जिनकी अनदेखी करने वाली पार्टी के लिए भविष्य में खतरा पैदा हो सकता है। आइए कांग्रेस पर चर्चा करें। कांग्रेस उत्साहित होने की जगह हिमाचल परिणाम को वास्तविकता के आईने में देखें तो उसके भविष्य के लिए अच्छा होगा। कांग्रेस कतई ना माने कि उसकी रणनीति के कारण विजय मिली है या उसकी पार्टी हिमाचल में 2017 के मुकाबले ज्यादा सशक्त हुई है। केंद्रीय स्तर पर पार्टी की दुर्दशा का शिकार राज्य इकाइयां भी हैं और हिमाचल उससे अछूता नहीं है। जिस तरह के कांटे की लड़ाई थी उसमें पासा किधर भी पलट सकता था। इतने कम मतों की दूरी से हिमाचल में सरकार बनने का कोई रिकॉर्ड नहीं है। सच यह है कि भाजपा अपनी पार्टी के अंतर्कलह को दूर करने में सफल नहीं हुई तथा जगह-जगह विद्रोह और भीतरघात ने उसे नुकसान पहुंचाया। चुनाव परिणाम का विश्लेषण बताता है कि भाजपा केवल अपने विद्रोहियों के कारण हारी है। कहीं विद्रोही सीधे मुकाबले में थे तो कहीं पार्टी को हराने के लिए काम कर रहे थे। उदाहरण के लिए फतेहपुर सीट को लीजिए। आज वहां भाजपा के विद्रोही कृपाल परमार थे, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं फोन कर मैदान से हटने का आग्रह किया था। वे डटे रहे और उन्होंने 2811 वोट काटे जिससे कैबिनेट मंत्री राकेश पठानिया चुनाव हार गए। हमीरपुर सीट से आशीष शर्मा निर्दलीय जीते जो भाजपा में थे। वे चुनाव के पूर्व कांग्रेस में चले गए थे लेकिन जब लगा कि टिकट नहीं मिलेगा तो उन्होंने निर्दलीय पर्चा दाखिल कर दिया। भाजपा होशियार, चंबा, मनाली, बड़सर, धर्मशाला, इंदौरा, किन्नौर आदि सीटें सीधे-सीधे विद्रोहियों के चलते हारी। इतने से ही भाजपा कुल सीटों की आधी संख्या पा लेती । शेष जगह विद्रोही उम्मीदवार नहीं बने लेकिन भाजपा उम्मीदवारों को हराने के लिए जरूर काम किया। कहने का तात्पर्य कि इतनी बड़ी संख्या में भाजपा के विद्रोहियों और भीतरघातियों के रहते हुए कांग्रेस अगर 1% मतों से भी कम से अंतर से विजय प्राप्त कर पाई है तो यह किसी भी दृष्टि से उसकी ठीक-ठाक स्थिति का प्रमाण नहीं है। आप इसके लिए प्रियंका वाड्रा को श्रेय दे दीजिए यह अलग बात है। प्रियंका वाड्रा का घर शिमला के पास ही है। उन्होंने वहां केवल 4 सभाएं की जिनमें भी एक सभा केवल औपचारिक थी। अगर उनका इतना बड़ा जादू है कि 4 सभाओं से पूरे हिमाचल का चुनाव जिता सकती हैं तो दूसरे जगह भी यह चमत्कार होना चाहिए। इसलिए कांग्रेस की सरकार बन गई लेकिन गलतफहमी न पाले की भाजपा को चुनौती देने की अवस्था में वह आ रही है।
कांग्रेस की चिंता होनी चाहिए कि गुजरात, जहां उसका संगठन पूरे प्रदेश में रहा है, वहां उसे धूल चाटने को क्यों विवश होना पड़ा? क्या बुरे से बुरे सपनों में भी कांग्रेस कल्पना कर सकती थी कि उसे 27.2% मत और 17 सीटों तक सिमट जाना पड़ेगा? उसे इतिहास की सबसे कम सीटें और वोट मिले हैं। चुनाव का विश्लेषण बताता है कि आम आदमी पार्टी उसके बरसों के जनाधार को भेदने में कामयाब हुई है। आप आम चुनाव में तीसरी शक्ति है। दिल्ली एमसीडी चुनाव में भी कांग्रेस साफ हो गई। आप ने ही दिल्ली की राजनीति में उसे हाशिए पर धकेल दिया। भाजपा और मोदी विरोधियों के अंदर यह संदेश जा रहा है कि आप कांग्रेस की जगह ले रही है और यह कांग्रेस के लिए बहुत बड़े खतरे की घंटी है। कांग्रेस अगर इस मुगालते में रहे कि राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा की लोकप्रियता जनता में है और वह वापसी करेगी तो फिर उसे आने वाले चुनावों में ज्यादा बड़ा आघात लग सकता है। निराशा के दौर में कांग्रेस उसी तरह की लोकप्रियतावादी वायदे करने लगी है जो अपरिपक्व नेता और पार्टियां करती रही है। हिमाचल में पुरानी पेंशन योजना कांग्रेस ने ही खत्म की थी और यह सही कदम था क्योंकि इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था नष्ट हो जाती। उसने चुनावी लाभ के लिए उसकी वापसी की घोषणा कर दी। संभव है इससे थोड़े बहुत वोट मिले हों, लेकिन ऐसे रवैया से कांग्रेस का उद्धार नहीं हो सकता। भविष्य में उसके लिए चुनौतियां पड़ेगी। कांग्रेस सोचे कि अगर भाजपा अपनी पार्टी का प्रबंधन थोड़ा भी ठीक कर लेती तो उसके इस इस वायदे के बावजूद सरकार फिर वापस आ जाती। यानी बहुमत ऐसे लोकप्रिय वायदों के अनुसार मतदान नहीं करता।
भाजपा यकीनन गुजरात की ऐतिहासिक विजय से संतुष्ट हो सकती है, पर हिमाचल और दिल्ली के परिणाम उसके लिए गंभीर चिंता का कारण होना चाहिए। आखिर हिमाचल भाजपा में अंतर्कलह इस सीमा तक क्यों गया कि अपने ही लोग प्रतिशोध के भाव में पार्टी को हराने के वाहक बन गए? मोदी जैसे लोकप्रिय नेता के रहते तथा पार्टी द्वारा अपने मूल एजेंडे पर काम करने के माहौल में ऐसा होना असामान्य बात है। हिमाचल प्रदेश अध्यक्ष नड्डा एवं केंद्रीय मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर का गृह राज्य है। अनुराग ठाकुर के लोकसभा क्षेत्र में भाजपा को बुरी शिकस्त मिली है। इस स्थिति को आप केवल छोटे मतों के अंतर के पहलू तक सीमित कर देंगे तो खतरा ज्यादा बढ़ेगा। अन्य राज्यों में भी सरकारों की नीतियों, कार्यकर्ताओं की अनदेखी, पुलिस और प्रशासन का कानून व्यवस्था के नाम पर मनमाना रवैया आदि नेताओं, कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों में असंतोष पैदा कर रहा है। इन सबकी व्यापक समीक्षा कर संभालने की आवश्यकता है। हिमाचल ने जता दिया है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता रहते हुए भी अगर स्थानीय सरकार व प्रतिनिधियों से अपने ही नेता और कार्यकर्ता असंतुष्ट हैं तो फिर पराजय हाथ लग सकती है।
अरविंद केजरीवाल और आप भी न भूले कि गुजरात में उन्होंने 27 साल बाद परिवर्तन का लक्ष्य घोषित किया था। केजरीवाल ने हस्ताक्षर करते हुए कागज पर लिखा था कि सरकार बदल रही है। उनके तीन प्रमुख चेहरे मुख्यमंत्री उम्मीदवार इशुदान गढ़वी ,पार्टी अध्यक्ष गोपाल इटालिया तथा बड़े नेता अल्पेश कथिरिया तक चुनाव हार गए। हिमाचल में उनके सारे उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। दिल्ली एमसीडी में भी उसका वोट भाजपा से केवल 3% ज्यादा है और उनकी विजय उस तरह एक तरफा नहीं हुई जैसी 2017 में भाजपा की हुई थी। यह 3% की खाई कभी भी पाटी जा सकती है। भाजपा का मत काटने की क्षमता आप ने अभी तक नहीं दिखाई है क्योंकि दिल्ली एमसीडी में भी भाजपा का मत 36% से बढ़कर 39% हुआ है। यह तथ्य है जिसे अरविंद केजरीवाल एवं उनके साथियों को याद रखना चाहिए। अगर वे इसकी समीक्षा करें तो पता चलेगा कि लोगों को मुफ्त का लालच देने की नीतियों में केवल एक वर्ग का ही आकर्षण है। यानी उसे ज्यादा गंभीर और जिम्मेवार पार्टी होने का परिचय देना होगा तभी उसकी व्यापक स्वीकार्यता हो सकती है।
अवधेश कुमार, ई 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208
सोमवार, 12 दिसंबर 2022
शनिवार, 10 दिसंबर 2022
जनता के भरोसे को कभी टूटने नहीं दूंगा: हाजी समीर मंसूरी
चुनाव परिणाम बिल्कुल स्वाभाविक हैं
अवधेश कुमार
गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा की रिकॉर्ड जीत पर भौचक होने का कोई कारण नहीं है। यही बात हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में भी है। गुजरात में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को झटका लगा है तो इसलिए उन्होंने वस्तुस्थिति का गलत आकलन किया था। अरविंद केजरीवाल ने दावा किया था कि 27 साल बाद यहां परिवर्तन होगा। जनादेश ने बता दिया कि राज्य राजनीतिक परिवर्तन के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। कांग्रेस का दावा था कि वह धरातल पर काम कर रही है, घर - घर जा रही है और उसे जनता का व्यापक समर्थन है। परिणाम ने बता दिया कि उसका दावा भी सही नहीं था। एक सरल विश्लेषण यह है कि कांग्रेस चुनाव अभियान में भाजपा के समकक्ष कहीं दिख नहीं रही थी। आप ने जोर लगाया लेकिन उसके पास संगठन नहीं है। दूसरी ओर भाजपा के पास सरकार है ,सशक्त संगठन है तथा नरेंद्र मोदी जैसा लोकप्रिय नेता एवं अमित शाह के जैसे चुनावी रणनीतिकार। हिमाचल का सामान्य विश्लेषण यह है कि यहां में पिछले 37 वर्षों से हर चुनाव में सरकार बदलती रही है। क्या गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणामों को इन्हीं कारकों तक सीमित माना जा सकता है?
इसका स्पष्ट उत्तर है, नहीं। केंद्रीय नेतृत्व के बिना अगर कांग्रेस की प्रदेश इकाई हिमाचल में अच्छा प्रदर्शन कर पाई तो इसका मतलब है कि भाजपा वहां कल्पना से ज्यादा रोगग्रस्त है। 68 सीटों में पार्टी के 21 विद्रोहियों का खड़ा होना बताता है कि पार्टी की स्थिति क्या है । भाजपा विद्रोहियों द्वारा काटे गए मतों के कारण ही हारी है। हिमाचल में कांग्रेस और भाजपा दोनों का वोट लगभग समान है। विपक्षी कांग्रेस के अंदर व्याप्त निराशा को देखें तो भाजपा को आसानी से चुनाव जीतना चाहिए था, क्योंकि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और केंद्र सरकार के कार्यों को लेकर वहां असंतोष का वातावरण नहीं था । भाजपा को गहराई से मंथन करना होगा कि पूरे देश के वातावरण से अलग हिमाचल का परिणाम क्यों आया? इसके विपरीत गुजरात में भाजपा ने 1995 में अपने उत्थान के बाद मतों का सर्वोच्च शिखर छुआ है तो राज्य बनने के बाद गुजरात में सबसे ज्यादा सीट पाने का रिकॉर्ड बना दिया। माधव सिंह सोलंकी के नेतृत्व में कांग्रेस की 149 सीट रिकॉर्ड बन गया था जो टूट चुका है। 53 प्रतिशत से ज्यादा मत पाने का अर्थ है कि वह किसी पार्टी से सीधे मुकाबले में भी जीत सकती थी। यानी यह विश्लेषण कि आप नहीं होती तो कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती एवं भाजपा का ग्राफ नीचे आता सही नहीं दिखता। सीटों और मतों की दृष्टि से यह असाधारण विजय है। हर अंकगणित के राजनीतिक मायने होते हैं। 2017 का चुनाव अलग वातावरण में हुआ था। नोटबंदी के बाद का पहला चुनाव था और प्रदेश का माहौल पाटीदार आंदोलन से संतप्त था। हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी तीन युवा नेता के रूप में उभरे थे। हार्दिक पटेल पाटीदारों के गुस्से का चेहरा बने थे। इन सबका असर हुआ और भाजपा सत्ता में आने के बाद सबसे कम 99 सीटों तक सिमट गई। 2022 आते-आते भाजपा ने ईडब्ल्यूएस के तहत 10% आरक्षण देकर नाराज पटेल नेताओं को मनाया , साथ लिया तथा हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर भाजपा में आ गए। भूपेंद्र पटेल के मुख्यमंत्री होने के बाद यह प्रक्रिया लगभग पूरी हो गई। भाजपा ने आदिवासी नेताओं के कुछ प्रमुख चेहरों को भी शामिल किया। निमिषाबेन मनहरसिंह सुथार (निमिषा सुथार) को मंत्री बनाया और उन्हें पार्टी स्तर पर आदिवासी चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया । इसमें भाजपा का ग्राफ स्वाभाविक रूप से बढना था। भाजपा का प्रदर्शन उन क्षेत्रों में भी काफी अच्छा रहा जिनमें वह पिछली बार पिछड़ गई थी। तो इनके मायनों को थोड़ी गहराई से समझनी होगी।
गुजरात एक सामान्य राज्य नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सम्पूर्ण राजनेता के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर निखारने और उभारने की आधार भूमि है। यह कल्पना करना निरर्थक है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीति की जो धारा राष्ट्रीय धारा बन गई वह अपनी आधारभूमि में ही कमजोर हो जाएगी । व्यक्तित्व मुख्यतः विचार और व्यवहार का समुच्चय होता है। गुजरात का मोदी मॉडल हिंदुत्व, राष्ट्रभाव के सामाजिक -आर्थिक- सांस्कृतिक विकास और परिवर्तन के संतुलन का मॉडल रहा है। कहने का तात्पर्य कि मोदी के कार्यकाल में गुजरात की यह सामूहिक मानसिकता सुदृढ़ हुई। मोदी ने गुजरात में क्षेत्रीयता को राष्ट्रीयता के भाव से जोड़ दिया। दुर्भाग्य से विपक्षी कांग्रेस या आप संपूर्ण रूप में इस परिवर्तन को समझ नहीं पाई है। कांग्रेस जैसी पार्टी अभी भी मानती है कि हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विचार लोगों का केवल भावनात्मक शोषण है और आर्थिक - सामाजिक उन्नति का इससे लेना-देना नहीं। सच इसके विपरीत है। कहा जाता है कि पेट में दाने नहीं हों तो राष्ट्र और धर्म का विचार गले नहीं उतरता। यह तो नहीं कहा जा सकता कि मोदी के शासनकाल में वाकई गुजरात या भारत चमत्कारिक रूप से बदल गया है किंतु विकास के मानकों में गुजरात और भारत हर मायने में बेहतर पायदान पर है। इसमें कांग्रेस या आप कहे कि गुजरात 27 सालों में बर्बाद हो गया, बेरोजगारी बढ़ गई, आर्थिक विकास की गाड़ी रुक गई, व्यापार ठप्प हो गया तो लोगों के गले इसलिए नहीं उतरता, क्योंकि धरातल की सच्चाई यह नहीं है। दूसरे, मोदी मॉडल का एक मुख्य तत्व आंतरिक और बाह्य सुरक्षा है। गृह मंत्री अमित शाह ने अपने भाषण में कहा कि 2002 के पहले गुजरात में दादाओं की चलती थी और दंगे होते थे, उनका इलाज हुआ उसके बाद से गुजरात शांत है। इसका असर आम लोगों पर होना ही था, क्योंकि शांति और सुरक्षा की दृष्टि से 2002 के पहले और बाद के गुजरात में जमीन आसमान का अंतर है। भाजपा, कांग्रेस और आप तीनों के घोषणापत्रों को देखें तो सुरक्षा का पहलू मुख्य रूप से आपको भाजपा में ही दिखेगा। पहली बार कहा गया है कि रेडिकलाइजेशन यानी कट्टरवाद को खत्म करने के लिए एक डीरेडिकलाइजेशन विंग बनेगा जो धर्म क्षेत्र के लोगों के साथ मिलकर मजहबी आतंकवाद की दिशा में जाने वाले युवाओं के मानस परिवर्तन के लिए काम करेगा। सुरक्षा का ऐसा विजन किसी दूसरी पार्टी ने नहीं दिखाया है। इसी तरह अगर विकास की चर्चा करें तो गुजरात के सभी भौगोलिक क्षेत्रों का समग्रता में विचार करते हुए विकास की रूपरेखा बनाने का काम भाजपा ने वहां किया है। वर्तमान घोषणापत्र में ही ब्लू इकोनामी कॉरिडोर की बात है। मछुआरों के लिए राजनीतिक तौर पर बहुत बात होती है लेकिन किसी ने भी इस दृष्टि से नहीं सोचा कि एक अलग कॉरिडोर भी इनके लिए हो सकता है जहां मछली पकड़ने से लेकर, उसके व्यापार, संसाधन आदि के सभी आधारभूत संरचना उपलब्ध हों। एक उदाहरण बताने के लिए पर्याप्त है कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का मॉडल विकास की श्रेष्ठ अवधारणा से अलग नहीं है।
चुनावी विजय के लिए शेष बातें साथ चलती हैं।
चुनाव पूर्व का वातावरण देखिए तो सर्वाधिक प्रभावी चुनावी अभियान किसी का था तो भाजपा का था। मोदी, अमित शाह से लेकर केंद्रीय नेताओं की रैलियां और रोड शो से घर-घर संपर्क तक में कोई पार्टी मुकाबले में नहीं थी। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का तो लगा ही नहीं कि गुजरात चुनाव से बहुत वास्ता है। नरेंद्र मोदी के प्रति वितृष्णा के कारण चुनाव प्रक्रिया आरंभ होते ही मधुसूदन मिस्त्री ने मोदी को औकात दिखाने की बात की तो पहले चरण के पूर्व अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे ने कह दिया कि उनके क्या 100 सिर हैं रावण जैसे और मतदान के दूसरे दौर के पहले कर्नाटक के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता वी एस उग्रप्पा ने उन्हें आधुनिक भस्मासुर कह दिया। इसके विरुद्ध प्रतिक्रिया होनी थी और भाजपा ने मोदी के अपमान के रूप में इस ढंग से पेश किया जिससे लोगों का कांग्रेस के विरुद्ध गुस्सा बड़ा। परिणाम सामने है। कांग्रेस इतिहास के अब तक के सबसे कम सीटों और वोटों तक सिमट गई है। आप ने आरंभ में इवेंट प्रबंधन के गुण से यह दिखाया कि माहौल उसके अनुरूप है किंतु जमीन पर वही स्थिति नहीं थी। उसने वहां खाता खोला लेकिन वोट उसने केवल कांग्रेस का ही काटा है। यह विश्लेषण गलत होगा कि आप नहीं होती तो भाजपा बड़े अंतर से चुनाव नहीं जीतती। कांग्रेस सही तरीके से लड़ाई लड़ते दिख ही नहीं रही थी। इस तरह गुजरात का चुनाव परिणाम बिल्कुल स्वाभाविक है। वर्तमान वातावरण में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के सिर भारी विजय का सेहरा पहना था और वही हुआ है।
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