सोमवार, 5 दिसंबर 2022
गुरुवार, 24 नवंबर 2022
राहुल गांधी ने सावरकर की आलोचना कर कांग्रेस के लिए ही समस्याएं खड़ी की
राहुल गांधी द्वारा भारत जोड़ो यात्रा के दौरान महाराष्ट्र के दो स्थानों पर वीर सावरकर के विरुद्ध दिए गए बयान पर खड़ा बवंडर स्वाभाविक है। राहुल ने पहले वाशिम जिले में आयोजित रैली में सावरकर जी की निंदा की और जब इसका विरोध हुआ तो अकोला जिले के वाडेगांव में पत्रकार वार्ता में माफीनामे की एक प्रति दिखाते हुए उन्हें डरपोक तथा महात्मा गांधी और उस वक्त के नेताओं के साथ धोखा करने वाला बता दिया। राहुल के बयान और उसके प्रभावों के दो भाग हैं। पहला है इसका राजनीतिक असर और दूसरा उनके दावों की सच्चाई। राजनीतिक असर देखिए । 
अवधेश कुमार
एक,राहुल के बयान से उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की राकांपा दोनों असहज हो गए। दोनों को खुलकर इससे अपने को अलग करना पड़ा।
दो, संजय राउत ने यहां तक कह दिया कि इसका असर महाविकास अघाडी पर पड़ सकता है।
तीन,महाराष्ट्र में भारत जोड़ो यात्रा में जो लोग आ रहे थे उनमें उद्धव शिवसेना और राकांपा के साथ उन संगठनों और समूहों के थे जो भाजपा आरएसएस के विरुद्ध हैं।
चार, महाराष्ट्र में वीर सावरकर के प्रति श्रद्धा और सम्मान समाज के हर वर्ग में है। इनमें भाजपा और संघ के विरोधी भी शामिल हैं। इन सबके लिए राहुल गांधी ने समस्याएं पैदा कर दी।
पाच,आम लोगों में भी इसके विरुद्ध प्रतिक्रिया है। भाजपा विरोधियों के लिए इस यात्रा का राजनीतिक लाभ उठाने की संभावनाएं धूमिल हो गई हैं।
और छह, राहुल गांधी और उनके रणनीतिकारों की यह भूल कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र में महंगी साबित होगी।
राहुल जो बोल रहे हैं वह सच्चाई का एक पक्ष है। सावरकर जी और माफीनामे के संबंध में सच्चाई को देखें।
एक,सावरकर 11 जुलाई ,1911 को अंडमान जेल गए और 6 जनवरी, 1924 को रिहा हुए। उनको करीब साढे 12 वर्ष काला पानी में बिताना पड़ा।
दो, सावरकर जी ने 1911 से 1920 के बीच 6 बार रिहाई के लिए अर्जी दिया।
तीन,वे सभी अस्वीकृत हो गए।
चार, राहुल गांधी कह रहे हैं कि महात्मा गांधी को उन्होंने धोखा दिया जबकि उनकी छठी याचिका महात्मा गांधी के कहने पर ही डाली गई । गांधी जी ने स्वयं उनकी पैरवी की और यंग इंडिया में रिहाई के समर्थन में लिखा । प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1919 में जॉर्ज पंचम के आदेश पर भारतीय कैदियों की सजा माफ करने की घोषणा की गई। उनमें अंडमान के सेल्यूलर जेल से भी काफी कैदी छोड़े गए। इनमें सावरकर बंधुओं विनायक दामोदर सावरकर और इनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर शामिल नहीं थे। उनके छोटे भाई नारायणराव सावरकर ने महात्मा गांधी को पत्र लिखकर सहयोग मांगा था। गांधी जी ने क्या किया इसे देखिए।
• 25 जनवरी, 1920 को गांधी जी ने उत्तर दिया, ‘प्रिय डॉ. सावरकर, ….मेरी राय है कि आप एक विस्तृत याचिका तैयार कराएं जिसमें मामले से जुड़े तथ्यों का जिक्र हो कि आपके भाइयों द्वारा किया गया अपराध पूरी तरह राजनीतिक था।…. मैं इस मामले को अपने स्तर पर भी उठा रहा हूं।
•गांधी जी ने 26 मई, 1920 को यंग इंडिया में लिखा, …. कई कैदियों को शाही माफी का लाभ मिला है। लेकिन कई प्रमुख राजनीतिक अपराधी हैं जिन्हें अब तक रिहा नहीं किया गया है। मैं इनमें सावरकर बंधुओं को गिनता हूं। वे उसी तरह के राजनीतिक अपराधी हैं जैसे पंजाब में रिहा किए गए हैं और घोषणा के प्रकाशन के पांच महीने बाद भी इन दो भाइयों को अपनी आजादी नहीं मिली है।'
• एक और पत्र (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ गांधी, वॉल्यूम 38, पृष्ठ 138) में गांधी जी ने लिखा, 'मैं राजनीतिक बंदियों के लिए जो कर सकता हूं, वो करूंगा। … राजनीतिक बंदियों के संबंध में, जो हत्या के अपराध में जेल में हैं, उनके लिए कुछ भी करना मैं उचित नहीं समझूंगा। हां, मैं भाई विनायक सावरकर के लिए जो बन पड़ेगा, वो करूंगा।'
•गांधी जी ने सावरकर बंधुओं की रिहाई के मुहिम में सारे तर्क दिए जो एक देशभक्त के पक्ष में दिया जा सकता है।
•सावरकर जी की प्रशंसा में भी गांधीजी ने लिखा । इसके कुछ अंश देखिए-
'अगर देश समय पर नहीं जागता है तो भारत के लिए अपने दो वफादार बेटों को खोने का खतरा है। दोनों भाइयों में से विनायक दामोदर सावरकर को मैं अच्छी तरह जानता हूं। मेरी उनसे लंदन में मुलाकात हुई थी। वो बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं और स्पष्ट रूप से हुए क्रांतिकारी थे। उन्होंने सरकार की वर्तमान व्यवस्था में छिपी बुराई को मुझसे काफी पहले देख लिया था। भारत को बहुत प्यार करने के कारण वे काला पानी की सजा भुगत रहे हैं। '
राहुल गांधी के सलाहकारों ने उन्हें नहीं बताया कि गांधीजी सावरकर जी से 1906 एवं 1909 में लंदन में मिल चुके थे। तब सावरकर इंडिया हाउस में रहकर वहां बैरिस्टर की पढ़ाई करने के साथ भारत के स्वतंत्रता के लिए भी सक्रिय थे। उनका नाम रहा होगा तभी गांधीजी उनसे मिलने गए। माना जाता है कि गांधी जी ने अपनी पहली पुस्तक हिंद स्वराज लिखी जिसमें सावरकर से हुई बहस का बड़ा योगदान है।
जब सावरकर जी का नाम हो चुका था उस समय महात्मा गांधी के राजनीतिक जीवन की ठीक से शुरुआत नहीं हुई थी।
ठीक है कि सावरकर जी गांधी जी के अनेक विचारों से असहमत थे और कांग्रेस के आलोचक थे। यह बिलकुल स्वाभाविक है। किंतु,उन्हें माफी मांगने वाला कायर, अंग्रेजों का पिट्ठू और स्वतंत्रता आंदोलन का विरोधी कहना एक महान देशभक्त, क्रांतिकारी , त्यागी, समाज सुधारक, जिसने संपूर्ण जीवन केवल भारत के लिए समर्पित कर दिया उसके प्रति कृतघ्नता होगी। कुछ और तथ्य देखिए।
• ऐसा प्रस्तुत किया जाता है मानो दया अर्जी डालने वाले सावरकर अकेले थे । •स्वतंत्रता सेनानियों की लंबी संख्या है जो नियम के अनुसार माफीनामा आवेदन भरकर बाहर आए।
•महान क्रांतिकारी सचिंद्र नाथ सान्याल ने अपनी पुस्तक बंदी जीवन में लिखा कि सेल्यूलर जेल में सावरकर के कहने पर ही उन्होंने दया याचिका डाली और रिहा हुए। उन्होंने लिखा है कि सावरकर ने भी तो अपनी चिट्ठी में वैसी ही भावना प्रकट की थी जैसे कि मैंने की। तो फिर सावरकर को क्यों नहीं छोड़ा गया और मुझे क्यों छोड़ा गया?
महाराष्ट्र में उनका सम्मान इस कारण भी है कि कालापानी से आने के बाद उन्होंने छुआछूत और जातपात के विरुद्ध लंबा अभियान चलाया। अछूतों और दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन किया और कराया। इस पर खुलकर लिखा। मुंबई की पतित पावनी मंदिर, जहां आज अनेक नेता जाते हैं उन्हीं की कृति है। इस कारण महाराष्ट्र के दलित नेताओं के अंदर उनके प्रति गहरा सम्मान है। इनमें बाबा साहब भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे। बाबा साहब और सावरकर जी के बीच हुए पत्र व्यवहार आज भी सुरक्षित हैं। बाबासाहेब ने सावरकर जी का नाम हमेशा सम्मान से लिया। कांग्रेस ने वर्षों तक उनकी देशभक्ति पर अधिकृत रूप से सवाल नहीं उठाया। राहुल गांधी की दादी स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री रहते उन पर डाक टिकट जारी किया तथा फिल्म डिवीजन विभाग को उन पर अच्छी फिल्म बनाने का आदेश दिया और यह बना भी। दुर्भाग्य से सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ऐसे अतिवादी बुद्धिजीवियों और नेताओं के प्रभाव में आ गई जिनके लिए हिंदुत्व, उसकी विचारधारा के नेता और संगठन दुश्मन और नफरत के पात्र हैं। भारत जोड़ो यात्रा के मुख्य सलाहकार और रणनीतिकार यही लोग हैं। राहुल गांधी कहते हैं कि एक ओर आरएसएस और सावरकर की विचारधारा है तो दूसरी ओर कांग्रेस की। यह भी कि भाजपा और आरएसएस के प्रतीक सावरकर हैं।
सच यह है कि वीर सावरकर संघ के प्रशंसक नहीं रहे। बावजूद संघ और भाजपा उनके बलिदान, त्याग, देश भक्ति, उनकी रचनाएं और हिंदू समाज की एकजुटता के लिए किए गए उनके कामों को लेकर सम्मान करती है। सावरकर जैसे महान व्यक्तित्वों के मानमर्दन के विरुद्ध पूरे भारत में प्रतिक्रिया है। इसी कारण लोग कांग्रेस और नेहरु जी से जुड़े उन अध्यायों को सामने ला रहे हैं जिनका जवाब देना राहुल और उनके सलाहकारों के लिए कठिन है। कुल मिलाकर राहुल गांधी ने बयान से कांग्रेस के लिए ही समस्याएं पैदा की है।
अवधेश कुमार,ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल 98110 27208
शुक्रवार, 18 नवंबर 2022
ऐसी क्रूरता आती कहां से है
अवधेश कुमार
आप किसी भी दृष्टिकोण से विचार करिए इसका तार्किक और सर्वमान्य उत्तर नहीं मिल सकता। हत्या करने के बाद टुकड़े-टुकड़े काटना, उसे रखने के लिए 300 लीटर वाली फ्रिज लाना और फिर एक-एक टुकड़े को दिल्ली के महरौली के जंगलों में देर रात जाकर फेंकते रहना यह सब किसी सामान्य व्यक्ति की कारगुजारी नहीं हो सकती। आप उसे असंतुलित मस्तिष्क का व्यक्ति कह कर मामले को एक मोड़ दे सकते हैं। जब भी कोई असामान्य क्रूर अपराध होता है सामान्यतः अपराधी को असामान्य या मानसिक व्याधि से ग्रसित घोषित कर दिया जाता है। निश्चित रूप से असामान्य मानसिक व्याधियों को वर्तमान मनोविज्ञान में व्यापक आयाम दे दिए हैं और उसमें आज सभी प्रकार के व्यवहार और विचार समाहित हो जाते हैं। किंतु आम भाषा में हम इसे ऐसे स्वीकार नहीं कर सकते। विचार यह करना होगा कि आखिर और सामान्य मानसिक स्थिति क्या थी? जो थी वह क्यों पैदा हुई ?
जरा इस घटना में अभी तक आई जानकारी के दूसरे पहलू को भी देखिए।
यह भी कहा गया है कि टुकड़े टुकड़े काटकर जंगलों में फेंकने की प्रेरणा उसे अमेरिकी टीवी सीरीज डेक्सटर से मिली। जाहिर है, एक दिन में उसके अंदर यह विचार घर नहीं किया होगा। श्रद्धा की हत्या कर उसके अंगों को काटकर वह फ्रिज में रखे हुए हैं और दूसरी लड़कियों से डेटिंग कर रहा है, उन्हें घर में बुलाकर उनके साथ मौज मस्ती कर रहा है। जिसे किसी से प्रेम होगा वह पहले तो उसकी हत्या नहीं करेगा और अगर गुस्से में कुछ हो गया तो फिर वह उसके दुख से जल्दी बाहर नहीं निकल पाएगा। यहां तो वह आराम से उसके टुकड़े काटता है, घर में रखे हुए है और दूसरी लड़कियों के साथ संबंध बनाता है। उसके जाने का उसे बिल्कुल दुख नहीं है बल्कि उसके व्यवहार से लगता है जैसे वाह मानता हो कि उसने वही किया जो उसे करना चाहिए था। यानी उसने श्रद्धा की हत्या कर अपना कर्तव्य पूरा किया है। इसका मतलब है कि श्रद्धा वाकर के साथ उसका प्रेम केवल दिखावा ही रहा होगा। पूछताछ से यह भी स्पष्ट हो जाएगा। बिल्कुल संभव है कि उसने योजनापूर्वक श्रद्धा को फंसाया होगा। डेटिंग एप पर श्रद्धा से उसकी मुलाकात हुई और नजदीकियां इतनी बढी कि दोनों साथ रहने लगे। मुंबई से दिल्ली आए। सामान्यतः हमारे देश में पढ़े लिखे लोगों का एक बड़ा तबका लव जिहाद के दृष्टिकोण को ही खारिज करता है। आप इस शब्द को कुछ समय के लिए छोड़ दीजिए। किंतु ऐसी घटनाएं बड़ी संख्या में हो रहीं हैं जहां एक मुस्लिम युवक हिंदू लड़कियों को फंसाता है और उनका धर्म परिवर्तन कर निकाह करता है। बाद में उनको तलाक देता है या फिर लड़की ही तंग आकर छोड़ देती है। अनेक मामले ऐसे हैं जहां मुस्लिम युवक ने हिंदू नाम रखकर लड़की को फंसाया, उससे शादी भी कर ली और जब लड़की घर आई तो पता चला वह मुसलमान है। उसे फिर से धर्म परिवर्तन कर निकाह करने के लिए मजबूर किया गया या करने की कोशिश हुई। ऐसी प्रमाणित और न्यायालय द्वारा पुष्ट घटनाओं की लंबी सूची है। ऐसी भी घटनायें पहले आई हैं कि किसी ने लड़की को फंसाया, उनके साथ रहा और बाद में छोड़ दिया।
ऐसा नहीं है कि लड़कियों के साथ लिव-इन में रहने के बाद उसे छोड़ने वाले गैर मुस्लिम समुदाय के नहीं है। हैं, किंतु इस तरह की दरिंदगी करने वाली घटना पहले नहीं हुई। इससे सहसा संदेह की सुई घूमती है कि आफताब अमीन कहीं कट्टर इस्लामी विचारों की मानसिकता वाला तो नहीं था। ऐसे लोगों के सामने मनुष्यता, इंसानियत, संवेदनशीलता या वचनबद्धता के कोई मायने नहीं होते। वह केवल अपने दृष्टिकोण से दीन की समझ के अनुसार ही लड़कियों से संबंध बनाते हैं। हाल के वर्षों में ऐसी घटनाएं आई है जब मुस्लिम नवजवानों के भीतर इस्लाम के नाम पर इस तरह की बातें भरी गई हैं जिनसे उन्हें लगे कि गैरमुस्लिम लड़की को फंसाकर निकाह करना या उसके साथ रिश्ते बनाना उनके लिए मजहबी फर्ज हो। उनका ब्रेनवाश इस तरह से किया जाता है कि वह ऐसा करने के लिए किसी सीमा तक चले जाते हैं। संभव है उसने श्रद्धा को धर्म परिवर्तन के लिए कहा हो और वह उसके लिए तैयार नहीं हुई हो। इसमें कुछ ऐसी बातें हुई है जिसे बाहर आने के बाद आफताब अमीन के लिए कठिनाइयां पैदा हो जाती। या फिर श्रद्धा ने दूसरी लड़कियों के साथ इसी विचार के अनुरूप उसे संपर्क संबंध बनाते देखा हो और उसे इसकी पूरी असलियत समझ आ गई हो। उसने इसकी असलियत दुनिया के सामने लाने की धमकी भी दी हो। श्रद्धा की दोस्त बता रही है की आफताब उसकी हत्या कर सकता था इसी आशंका थी और उसने उसके परिवार को आगाह सतर्क भी किया था। सब पुलिस के पास भी जाना चाहते थे लेकिन श्रद्धा में ही किसी कारण रोक दिया था। श्रद्धा की आफताब हत्या कर सकता था यह आशंका कैसे पैदा हुई इसका उत्तर मिलना चाहिए।
यह तो सोचना ही पड़ेगा कि आखिर हत्या कर टुकड़े-टुकड़े काटने के बाद वह दूसरी लड़कियों के साथ किस मानसिकता में संबंध बना रहा था? पुलिस बता सकती है कि उन लड़कियों में भी सभी या ज्यादातर गैर मुस्लिम ही होंगी। आफताब अमीन पुलिस की पूछताछ में इस बात को स्वीकार करता है या नहीं इसका पता भी कुछ दिनों में चल जाएगा। किंतु इस दृष्टि से जांच होनी चाहिए और वह नहीं स्वीकार करता तो नारको टेस्ट कराया जाना चाहिए। नारको टेस्ट के लिए वह तैयार नहीं होता तो न्यायालय से उसकी अनुमति ली जा सकती है। वास्तव में यह ऐसी घटना है जिसका पूरा सच देश और दुनिया के सामने आना चाहिए। इस तरह के वारदात की पुनरावृत्ति न हो इसलिए इसकी पूरी जानकारी आवश्यक है।
अगर आफताब का व्यवहार मजहबी कट्टर सोच से नहीं निकली और इसके कारण कुछ और है तो भी इस तरह की क्रूरता को केवल सामान्य परिभाषा के तहत मानसिक व्याधियों की परिणति नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर यह पूरी घटना हम सबको काफी कुछ सोचने को फिर से बात करती है। आखिर परवरिश में ऐसी गलती कहां हो रही है कि नई पीढ़ी वास्तविक या तथाकथित प्यार के चक्कर में अपने माता-पिता तक के रिश्ते को नकारने किस सीमा तक चली जाती है? हमने कैसा समाज बना दिया है जहां हर कोई आप केंद्रित हो गया है? हर व्यक्ति यहां स्वयं को अकेला पाता है और अनेक समस्याओं की जड़ यही है। दूसरी ओर यह घटना नई पीढ़ी को भी अपने रवैये पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करती है। जब श्रद्धा के पिता ने आफताब के साथ उसके संबंधों को स्वीकार नहीं किया तो उसने कहा कि मैं 25 वर्ष की हो गई हूं और अपना भला बुरा सोच सकती हूं। इसके बाद वह उसके साथ लिव-इन में रहने लगी। ऐसी लड़कियों की बड़ी संख्या है जो घोषित उम्र के साथ बालिग होने के बाद माता-पिता की सलाह मशविरा या सहमति के बिना इस तरह के कदम उठातीं हैं जिनकी परिणति भयावह होती है। अनेक लड़कियों की पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई। उनके परिवार वालों के सामने इससे जो सामाजिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं वह अलग। हमारे यहां सामाजिक व्यवस्था में परिवार द्वारा तलाशे गए लड़के से लड़की की शादी की परंपरा सर्वाधिक सफल है। किंतु, अगर कोई लड़की किसी लड़के के साथ प्रेम विवाह करना चाहती है तो उसे परिवार के विरोध के काल में भी जिन निकट के रिश्तेदारों के साथ संवाद हो उनसे ठीक प्रकार से उसके और परिवार का पता कराना चाहिए। यही नहीं शादी करने के बाद भी उन रिश्तेदारों का आना - जाना अपने यहां रखना ही चाहिए। इससे आप अकेले नहीं होते और कमजोर नहीं पड़ते। ऐसा नहीं करना आपके और आपके परिवार के लिए जीवन भर की ट्रेजडी साबित हो सकती है।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 1100 92 , मोबाइल 98110 27208
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मंगलवार, 15 नवंबर 2022
शमां एजुकेशनल एंड पॉलिटेक्निक सोसाइटी के तत्वाधान में मुफ्त आंखों की जांच और मोतियाबिंद ऑपरेशन कैंप का आयोजन हुआ
सोमवार, 14 नवंबर 2022
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