गुरुवार, 4 अगस्त 2022

ममता के लिए बहुत बड़ा आघात

अवधेश कुमार


दक्षिण कोलकाता के टाॅलीगंज पाॅश कॉलोनी के एक घर से जब प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने आलीशान मकान से ट्रक पर बड़े -बड़े बक्से लादना शुरू किया तो देखने वाले भौंचक्क रह गए। वह आलीशान घर मॉडल और अभिनेत्री अर्पिता मुखर्जी का है। पहले दौर में उनके एक घर से 21 करोड़ 20 लाख रुपए नगद, 79 लाख रुपए के सोने व हीरे के गहने, 20 मोबाइल फोन, 54 लाख रुपए मूल्य की विदेशी मुद्रा, 10 जमीनों के दस्तावेज और काफी मात्रा में विदेशी शराब मिले। उनके बेलघरिया स्थित दूसरे घर से 27 करोड़ 90 लाख रुपए नकद, 6 किलो सोना के गहने और चांदी के सिक्के के साथ कई संपत्ति के दस्तावेज तथा नोटबंदी के दौरान रद्द हो चुके 500 एवं1000 के नोट भी मिले। कुल मिलाकर अभी तक ईडी की कार्रवाई में अर्पिता के यहां से 49 करोड़ 20 लाख नगद मिल चुके हैं। बेलघरिया स्थित फ्लैट के टॉयलेट से नोट मिले। रुपए बैग और प्लास्टिक के पैकेट में इस तरह रखे गए थे मानो उनके रखने के लिए ही वो जगह बनी हो। इसका मतलब उस घर का निर्माण ही भ्रष्टाचार से आए नकदी को ठीक से रखने के लिए किया गया था।

जैसा हम जानते हैं बंगाल में स्कूल सेवा आयोग के शिक्षक भर्ती घोटाले में जांच चल रही है। इसी संदर्भ में ईडी ने पार्थ चटर्जी और अर्पिता को गिरफ्तार किया है।  जिस समय  घोटाला हुआ उस समय पार्थ  शिक्षा मंत्री थे। ममता बनर्जी और पूरी तृणमूल कांग्रेस छापेमारी में बरामद इन नोटों को देखकर सन्न हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या प्रतिक्रिया दिया जाए। तृणमूल कांग्रेस का तर्क है कि अर्पिता मुखर्जी का पार्टी से कोई लेना देना नहीं है।  अर्पिता मुखर्जी ने ईडी को बताया है कि सारे रुपए पार्थ के हैं।  उसके अनुसार उसके फ्लैट का रुपए रखने के लिए गोदाम की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था। पार्थ चटर्जी ने भी बयान दिया है कि उन्हें षड्यंत्र के तहत फंसाया जा रहा है।

पार्थ चटर्जी सामान्य नेता नहीं हैं। वे गिरफ्तार होने के बाद बरखास्तगी तक राज्य के उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी व संसदीय कार्य मंत्री थे।  पार्थ पार्टी में भी महत्वपूर्ण थे। तृणमूल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, प्रदेश महासचिव ,अनुशासनात्मक समिति के सदस्य और पार्टी के मुखपत्र जागो बांग्ला के संपादक थे। थोड़े शब्दों में कहा जाए तो ममता बनर्जी या उनके भतीजे अभिजीत बनर्जी के बाद या उनके द्वारा अधिकार प्राप्त समानांतर शक्ति रखने वाला पार्टी में वह शीर्ष व्यक्तित्व थे। जाहिर है, ममता बनर्जी ने गिरफ्तारी के 6 दिन बाद भले उन्हें सभी पदों से निलंबित कर दिया, प्रश्नों के दायरे में वो स्वयं भी हैं। आखिरी एक व्यक्ति , जो उनका दाहिना हाथ बना, इतने बड़े भ्रष्टाचार का खलनायक साबित हो रहा है तो इसकी जिम्मेवारी उसकी अकेले नहीं हो सकती। यह संभव नहीं है कि धन का उपयोग पार्थ अकेले करते हो। शिक्षक भर्ती घोटाले के बारे में जितनी जानकारी सामने आई है उससे साफ हो गया है कि शिक्षकों की नियुक्ति में नीचे से ऊपर मंत्री से लेकर अधिकारी कर्मचारी नेता तक शामिल थे।

अर्पिता पार्टी से जुड़ी है या नहीं है यह मायने नहीं रखता।  पार्थ चटर्जी के फेसबुक प्रोफाइल में अर्पिता मुखर्जी का परिचय दिया गया है। नाकतला उदयन संघ की दुर्गा पूजा समिति की अर्पिता ब्रांड अंबेडकर रही है और इसके अध्यक्ष पार्थ चटर्जी हैं। अर्पिता विधानसभा चुनाव मे बेहला पश्चिम सीट पर पार्थ के समर्थन में चुनाव प्रचार करती थी। स्वयं ममता मंच से उसकी प्रशंसा कर चुकी हैं कि वह अच्छा काम कर रही है । उसके घर पर वीआईपी का आना-जाना लगा रहता था। वैसे पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नजर रखने वाले एवं सत्ता के गलियारों से जुड़े हुए लोग अर्पिता और पार्थ चटर्जी के रिश्ते अच्छी तरह जानते हैं। आखिर तृणमूल कांग्रेस का कौन नेता है जो अर्पिता को नहीं जानता हो?

आरंभ में अवश्य तृणमूल के प्रवक्ताओं ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई बताया। बाद में तृणमूल कांग्रेस सहमी हुई नजर आई। ममता बनर्जी तथा तृणमूल के पहले के ऐसे मामलों में व्यवहार और वर्तमान रवैया में आपको जमीन आसमान का अंतर आएगा। पार्था पर कार्रवाई करने में उन्हें 6 दिन इसीलिए लग गए कि इसके पूर्व वह अपनी पार्टी के नेताओं, मंत्रियों या अधिकारियों तक के विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ मोर्चा मोर्चाबंदी करती थी। सारधा चिटफंड घोटाले में मंत्री मदन मित्रा की गिरफ्तारी के विरुद्ध ममता सड़कों पर उतर गई थी। 

सीबीआई के साल्टलेक स्थित कार्यालय के सामने बड़ा प्रदर्शन किया गया था। रोज वैली कांड में जब सांसद सुदीप बंदोपाध्याय और तपस पाल की गिरफ्तारी हुई तो ममता उनसे मिलने भुवनेश्वर तक गई थी। सारधा कांड में सबूतों को मिटाने के आरोप में जब सीबीआई फरवरी 2019 में कोलकाता के तत्कालीन पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ करने के लिए उनके आवास पर पहुंची तो ममता धरमतल्ला में धरने पर बैठ गई थी। पिछले वर्ष मई में जब नारद स्टिंग कांड में सीबीआई ने दो मंत्रियों फिरहाद हकीम, सुब्रत मुखर्जी तथा विधायक मदन मित्रा को गिरफ्तार किया तो ममता सीबीआई कार्यालय निजाम पैलेस पहुंची और वहां 6 घंटे तक बैठी रही। उनके भतीजे अभिजीत बनर्जी और उसकी पत्नी से पूछताछ के मामले में भी उनका तेवर आक्रामक था। हर अवसर पर ममता का यही तर्क था कि मोदी सरकार उनके विरुद्ध राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। किंतु  इतने नोटों और अन्य सामग्रियों की बरामदगी के बाद उनके लिए कोई भी तर्क देना संभव नहीं रहा है।

वास्तव में पार्थ के मामले में ममता बनर्जी एवं तृणमूल का पूरा व्यवहार उनके पूर्व के चरित्र के विपरीत है। इसके मायने गंभीर हैं। 2016 में माकपा के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा को सत्ता से उखाड़ कर शासन संभालने वाली ममता बनर्जी अपने क्रांतिकारी तेवरों के लिए जानी जाती रही है। धीरे-धीरे उनकी पार्टी, सरकार और नेताओं पर भ्रष्टाचार के इतने आरोप लगे जिनसे निकलना अब आसान नहीं रह गया है। ध्यान रखिए कि जितने भी मामले में ईडी या सीबीआई जांच कर रही है उन सबके लिए हरी झंडी कोलकाता उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय से मिली हुई है।  उनके भतीजे अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी रुचिरा बनर्जी पर भी धनशोधन मामले में मुकदमा दर्ज है। अभिषेक से ईडी 22 मार्च को दिल्ली स्थित मुख्यालय पर लंबी पूछताछ कर चुकी है। ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड में कोयले की चोरी और तस्करी को लेकर सीबीआई ने मुकदमा दर्ज किया हुआ है।

इस सब में वर्तमान प्रकरण ने ममता बनर्जी और तृणमूल को सबसे ज्यादा परेशानी में डाला है। इतने नोटों की गड्डियां तथा सामग्रियां कभी यहां बरामद हुआ नहीं। ममता बनर्जी और उनके रणनीतिकार लगातार मंथन कर रहे होंगे कि से निकला कैसे जाए? किंतु निकलना आसान नहीं है। संभव है आने वाले समय में इस जांच का विस्तार हो और दूसरे लोग भी चपेट में आए। जांच में दूसरे लोग आते हैं तो ममता के लिए राजनीतिक समस्या भी बढ़ेगी। भाजपा आक्रामक हो चुकी है। इससे उसके डरे समय और निराश कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों में नई जान आ सकती है। वाममोर्चा भी उनके विरुद्ध धरना प्रदर्शन कर रहा है। तो विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए ममता इस हालत में कदम नहीं उठा सकती। उनकी सोच में शायद बदलाव आया है। उपराष्ट्रपति चुनाव से उन्होंने अपनी पार्टी को अलग कर दिया है। यह कोई सामान्य निर्णय नहीं है। जो नेत्री विदेशी मोर्चे के नेतृत्व के लिए अभियान चला रही हो वह उपराष्ट्रपति के चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार को वोट ना दें इसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी।

राष्ट्रपति चुनाव में भी यशवंत सिन्हा को खड़ा करने के बावजूद ममता क्या उनके दूसरे साथी बिल्कुल सक्रिय नहीं दिखे। सच कहे तो भाजपा के पास ममता व तृणमूल के विरुद्ध पार्था और अर्पिता के रूप में ऐसा हथियार हाथ लगा है जिसके आधार पर वह आक्रामक तरीके से अपनी राजनीति को आगे पढ़ा रही है। इसमें ममता बनर्जी व तृणमूल के पास प्रति आक्रमण का कोई विकल्प नहीं है। उन्हें केवल अपना बचाव करना है और किसी संघर्ष में बचाव सफलता की रणनीति रणनीति या गारंटी नहीं हो सकती। पार्था अर्पिता प्रकरण बताता है कि सरकार किस ढंग से चल रही है। शिक्षकों की भर्ती में इतना बड़ा भ्रष्टाचार हो सकता है तो अन्य सरकारी भर्तियां पूरी तरह बेदाग होंगी ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। वैसे भी पश्चिम बंगाल जाने आने वाले लोगों को पता है कि भ्रष्टाचार और अपराध वहां कैसे सर्व स्वीकृत हो चुका है। तृणमूल कार्यकर्ता एवं समर्थक मनमाने तरीके से व्यवहार करते हैं। ममता के पास अवसर था कि वे वाम मोर्चे के अपराध और भ्रष्टाचार से पश्चिम बंगाल को मुक्ति दिलाएं लेकिन उन्होंने लेकिन उनकी राजनीति उसी दिशा में आगे बढ़ती चली गई। सत्ता से जुड़े या पार्टी के लालची और बेईमान समर्थकों के लिए तो ऐसा शासन अवसर है किंतु आम कार्यकर्ता, समर्थक और बंगाल की जनता के लिए यह भयानक स्वप्न जैसा बनता जा रहा है। 

अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208



रविवार, 31 जुलाई 2022

ईश्वर के पहरेदार बने बैठे ये 'स्वयंभू धर्म दूत'


तनवीर जाफ़री
इज़राइल के चैनल 13 के एक यहूदी टीवी पत्रकार गिल तामरी ने पिछले दिनों सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में प्रवेश कर वहाँ का एक वीडियो बनाया और उस वीडियो को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। उसके बाद सऊदी अरब प्रशासन में खलबली मच गयी। सऊदी पुलिस ने इस मामले में पूरी तत्परता दिखाते हुये सऊदी अरब के ही निवासी एक व्यक्ति को गिरफ़्तार कर लिया गया है। आरोप है कि  इसी  व्यक्ति ने चैनल 13 के इसराइली टीवी पत्रकार गिल तामरी को मक्का में प्रवेश कराने में सहायता की थी। हालांकि अपनी मक्का यात्रा के बाद पत्रकार तामरी ने यह कहते हुये माफ़ी मांगी है कि वे -'धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए मक्का और इस्लाम की सुंदरता दुनिया को दिखाना चाहते थे ' । 
वीडियो में तामरी को स्वयं ये बोलते भी सुना जा सकता है कि  ''सऊदी क़ानून के अनुसार ग़ैर-मुसलमानों का यहाँ आना वर्जित है। मेरे लिए भी यहां पहुंचना असंभव था।  परन्तु मुझे यहां एक बहुत अच्छे व्यक्ति (गाईड ) मिले जिन्होंने अपनी जान ख़तरे में डालकर मुझे यहां ले जाने का फ़ैसला किया ''। इस पूरे प्रकरण में मक्का पुलिस का कहना है कि 'मक्का में प्रवेश करने वाले इसराइली पत्रकार पर आगे क़ानूनी कार्रवाई की जा रही है। मक्का पुलिस प्रवक्ता ने एक बार फिर पुरज़ोर तरीक़े से यह कहा है कि सऊदी अरब आने वाले लोग यहाँ के नियम-क़ानूनों का पालन करें, ख़ासतौर पर दो पवित्र मस्जिदों और अन्य पवित्र जगहों के मामले में।अन्यथा क़ानूनों का उल्लंघन करने वालों को सऊदी क़ानून के अनुसार सज़ा दी जाएगी। ग़ौर तलब कि मक्का शहर के चारों ओर नगर की एक सीमा निर्धारित की गयी है और इन सीमाओं के प्रवेश द्वार पर बड़े अक्षरों से बोर्ड पर लिखा गया है कि -'ग़ैर मुस्लिमों का मक्का की सीमाओं में प्रवेश वर्जित,केवल मुस्लिम मक्का में दाख़िल हो सकते हैं।'

इस घटना के बाद एक बार फिर वही बहुचर्चित सवाल विश्व स्तर पर पूछा जाने लगा है कि आख़िर हज की रस्म अदा करने के लिये सऊदी अरब के पवित्र मक्का शहर में ग़ैर मुस्लिमों का प्रवेश क्यों वर्जित है। हज के तौर तरीक़ों और हज अदायगी को क़रीब से देखने की उत्सुकता रखने वाले दुनिया के तमाम लोग सऊदी सरकार के इस फ़ैसले से व्यथित हैं। केवल ग़ैर मुस्लिम ही नहीं बल्कि दुनिया के मुसलमानों का भी एक बड़ा वर्ग जो हमेशा से सऊदी सरकार के इस 'ग़ैर मुस्लिम का मक्का प्रवेश निषेध ' नीति का विरोधी रहा है वह भी पुनः मुखरित हो उठा है। ग़ौर तलब है कि हज स्थल मक्का (काबा शरीफ़ ) चूँकि सऊदी अरब में इत्तेफ़ाक़न इसलिये स्थित है क्योंकि इस्लाम धर्म की शुरुआत अरब से ही हुई और यही इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद साहब की जन्म व कर्मस्थली भी रही है। परन्तु चूँकि इस्लाम विश्वस्तर पर फैल चुका है और पूरी दुनिया के लोग हज या उमरा करने मक्का आते जाते रहते हैं इसलिये दुनिया का मुसलमान इन पवित्र धार्मिक स्थलों पर अपना भी समान अधिकार समझता है। कई बार मुस्लिम जगत में यह चर्चा भी हो चुकी कि सऊदी अरब में हज उमरा आदि धार्मिक गतिविधियों के नियम क़ायदे यहाँ तक कि अलग अलग देशों का वीज़ा कोटा निर्धारण करने के लिये इस्लामी देशों की विश्वस्तरीय संयुक्त कमेटी बनायी जाये।परन्तु ठीक इसके विपरीत सऊदी सरकार इन स्थानों पर अपना आधिपत्य समझती है। और इस पवित्र क्षेत्र में अपनी ही सोच विचार के अनुसार नियम क़ानून निर्धारित व लागू  करती है। ग़ैर मुस्लिमों के मक्का प्रवेश निषेध  मामले पर वह यही कहकर पल्ला झाड़ती कि अन्य देशों की तरह किसी भी क्षेत्र या किसी भी व्यक्ति को वीज़ा देना या न देना उसका अपना अधिकार है इसके लिये कोई चुनौती नहीं दी जा सकती।

परन्तु मक्का के अतिरिक्त भी अनेक इस्लामी धर्मस्थल ऐसे हैं जहां पूरे वर्ष और चौबीस घंटे मक्का और मदीना से भी ज़्यादा दर्शनार्थियों व पर्यटकों की भीड़ रहती है। उदाहरण के तौर पर करबला,नजफ़ सीरिया और इराक़ के अनेक रौज़े हर समय दर्शानार्थियों से भरे रहते हैं। भारत और पाकिस्तान की अनेकानेक विश्व स्तरीय मस्जिदें व दरगाहें हर समय आम लोगों के दर्शन व भ्रमण के लिये  खुली रहती हैं। ऐसी जगहों पर सरकार या धर्मस्थान का प्रबंधन न किसी से किसी का धर्म पूछता है न जाति न नागरिकता। ऐसे में विश्व के सबसे महत्वपूर्ण इस्लामी धर्मस्थल मक्का पर सऊदी सरकार द्वारा थोपा गया 'प्रवेश प्रतिबंध क़ानून ' न केवल समानता जैसे इस्लामी सिद्धांतों को चुनौती देता है बल्कि इस्लाम विरोधी भावना रखने वालों को तरह तरह के निराधार तर्क गढ़ने के भी अवसर देता है।
सऊदी सरकार के इस फ़ैसले में शिया व बरेलवी समुदाय को लेकर भी काफ़ी विरोधाभास है। क्योंकि इन दोनों ही समुदाय के लोग बड़ी संख्या में हज व  उमरा करने के लिये जाते रहते हैं। और सऊदी सरकार इनको वीज़ा भी देती है। परन्तु अहमदिया मुसलमान अन्य ग़ैर मुस्लिमों की तरह हज करने नहीं जा सकते। इन्हें सऊदी सरकार ग़ैर मुस्लिम की श्रेणी में रखती है। अरब,भारत,बंगलादेश, अफ़ग़ानिस्तान व पाकिस्तान के अनेक सुन्नी वहाबी मुसलमान समय समय पर शिया व बरेलवी समुदाय के विरुद्ध फ़तवे जारी कर इन्हें भी ग़ैर मुस्लिम और मुशरिक (बहुदेववादी ) बताते रहे हैं। क्योंकि यह लोग ताज़ियादारी करते हैं,पीरों फ़क़ीरों की मज़ारों पर दुआएं मांगते हैं,या अली मदद बोलते हैं,और इन सब के सामने हाथ उठाकर दुआएं मांगते हैं। इसलिये वहाबी मतावलंबी इन समुदाय के लोगों को कभी काफ़िर तो कभी मुशरिक की उपाधियों से नवाज़ते रहते हैं। सवाल यह है कि जब सऊदी अरब में भी वहाबी विचारधारा की हुकूमत है तो वह शिया व बरेलवी मुसलमानों पर भी मक्का में प्रवेश वर्जित करने का साहस क्यों नहीं करती ?और अहमदिया मुसलमानों पर क्यों प्रवेश निषेध किया हुआ है ? क्या यह वहाबियों को तय करना है कि एक अल्लाह का कलमा पढ़ने के बावजूद उनकी नज़रों में कौन सा मुस्लिम समुदाय मुसलमान है और कौन मुशरिक या काफ़िर?    
                              
किसी भी धर्म के किसी भी धर्मस्थान में धर्म या जाति के आधार पर किसी भी श्रद्धालु को जाने से मना करने का अधिकार मेरे विचार से किसी भी व्यक्ति,सरकार अथवा शासक को नहीं होना चाहिये। जिस तरह चर्च,गुरद्वारे,इमाम बरगाहें,दरगाहें और विश्व की सुप्रसिद्ध मस्जिदें सभी के लिये खुली हैं उसी तरह मक्का,हज स्थल आदि भी पूर्णतयः प्रतिबंध मुक्त होने चाहिये। भारत में भी अनेक मंदिरों  में महिलाओं,दलितों व मुसलमानों का जाना प्रतिबंधित है। यह प्रतिबंध भी समाप्त होने चाहिये। ऐसे प्रतिबंधों से तो संकीर्णता का ही सन्देश जाता है और यह भी कि गोया -'ईश्वर के पहरेदार बने बैठे ये 'स्वयंभू धर्म दूत'।

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

रुबिया सईद अपहरण मामले की कानूनी परिणति बदले समय का प्रमाण

अवधेश कुमार

समय का चक्र घूमते हुए एक समय न्याय की परिधि तक अवश्य पहुंचता है। क्या किसी ने कल्पना की थी कि 32 वर्ष पहले कश्मीर में स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद सईद की छोटी बेटी रुबिया सईद अपहरण का मामला फिर से खुलेगा और न्यायिक प्रक्रिया मुकाम पर पहुंचने की ओर अग्रसर होगी? पिछले 16 जुलाई को जम्मू के टाडा न्यायालय में रुबिया सईद ने यासीन मलिक समेत चारों आरोपियों की पहचान की। जम्मू-कश्मीर ही नहीं पूरा देश मान चुका था कि रुबिया अपहरण का मामला आया गया हो चुका है। लेकिन जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है उसमें यासीन मलिक सहित शेष  आरोपियों को सजा मिलना निश्चित है। यासीन मलिक आतंक के वित्तपोषण मामले में राजधानी दिल्ली की तिहाड़ जेल में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है। यह दूसरा मामला होगा जिसमें यासीन को सजा मिलने की संभावना है। जिस दिन नरेंद्र मोदी सरकार ने अलगाववादी नेताओं तथा पूर्व आतंकवादियों से नेता बने लोगों के विरुद्ध गैरकानूनी गतिविधियां निवारक कानून के तहत मामला दर्ज किया उसी दिन साफ हो गया था कि कश्मीर में 90 के दशक में हुए भयावह अन्याय के न्यायिक प्रतिकार का रास्ता बन चुका है। आतंकवाद के वित्तपोषण मामले में लोगों की गिरफ्तारियां हुई और सजा मिलनी शुरू हो चुकी है। जो भी गिरफ्तार हुए जाहिर है उनसे संबंधित सारे मामले खंगाल कर नए सिरे से उन पर कानूनी प्रक्रिया भी आरंभ हुई। इसी के तहत यासीन मलिक से जुड़े मामले भी पुलिस और एनआईए ने खोल दिया।

इस मामले में यासीन मलिक के साथ उन्हीं के संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी जेकेएलएफ के कमांडर मेहराजुद्दीन शेख, मोहम्मद उस्मान मीर और मंजूर अहमद सोफी भी सुनवाई के दौरान न्यायालय में मौजूद रहे। यासीन मलिक ने दिल्ली में होने के कारण वर्चुअली  न्यायिक प्रक्रिया में भाग लिया किंतु उसने खुद जम्मू के न्यायालय में पेश होकर जिरस करने का आग्रह किया। न्यायालय ने यासीन के विरुद्ध प्रोडक्शन वारंट जारी कर दिया है। न्यायिक प्रक्रिया पर हम नजर रखेंगे। रुबिया सईद अपहरण तब सर्वाधिक चर्चित मामला था। केंद्रीय गृह मंत्री की बेटी के अपहरण की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में  गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद पर ही कई हलकों में आरोप लगा था कि उन्होंने जेल में बंद आतंकवादियों को छुड़ाने के लिए अपनी बेटी के अपहरण का नाटक रचवाया था। श्रीनगर के सदर पुलिस थाने में 8 दिसंबर, 1989 को रुबिया सईद अपहरण का मामला दर्ज हुआ था। इसके अनुसार रुबिया ट्रांजिट बैन में श्रीनगर के ललदेद अस्पताल से नौगांव अपने घर जा रही थी। तब वह एमबीबीएस के बाद अस्पताल में इंटर्नशिप कर रही थी। जब वह चांदपुरा चौक के पास पहुंची तो उसी में सवार तीन लोगों ने बंदूक के दम पर वैन रोका और रुबिया का अपहरण कर लिया। बाद में उन्होंने अपने साथियों को जेल से छोड़ने की मांग की। ये कुख्यात आतंकवादी थे। अपहरण के मामले में थाने में यासीन मलिक, मेहराजुद्दीन शेख ,मोहम्मद जमाल, अमीर मंजूर अहमद सोफी के अलावा अली मोहम्मद अमीर, इकबाल अहमद, जावेद अहमद मीर, मोहम्मद रफी, वजाहत बशीर और शौकत अहमद बख्शी के नाम शामिल है।

गृह मंत्री की कुर्सी पर बैठे बड़े नेता की बेटी का अपहरण भारत के इतिहास की असाधारण घटना थी। पूरा देश सकते में था। अंततः सरकार ने 13 दिसंबर को पांच आतंकवादियों को रिहा किया, जिसके बाद रुबिया को छोड़ा गया। छोड़े गए आतंकवादियों में शेर खान पाक अधिकृत कश्मीर का रहने वाला था जिसे बाद में सुरक्षा बलों ने मार गिराया। दूसरा भी सुरक्षा बलों के साथ श्रीनगर में मारा गया। जावेद जरगर और नूर मोहम्मद याहिन जेल में हैं। हां, अल्ताफ अहमद तत्काल बेंगलुरु में एक रेस्त्रां चला रहा है। यह सामान्य स्थिति नहीं थी कि इतने बड़े अपहरण के आरोपी खुलेआम घूमते ही नहीं रहे, जम्मू-कश्मीर में सम्मान पूर्वक जीवन जिया। यासीन मलिक हीरो की तरह रहते थे। जिस तरह की कार्रवाई मोदी सरकार आने के बाद हुई वह पहले भी हो सकती थी।

समस्या केवल जम्मू कश्मीर के संदर्भ में सही राजनीतिक सोच तथा इच्छाशक्ति की थी। सही सोच और इच्छाशक्ति के अभाव के कारण ही प्रदेश की स्थिति बिगड़ी, आतंकवादी निर्भय हुए और बड़े समूह के अंदर हीरो माने जाने लगे। अलगाववादियों को सम्मानजनक स्थान भी केंद्रीय राजनीतिक नेतृत्व की गलत सोच के कारण ही प्राप्त हुआ। समय के साथ बहुत चीजें बदली हैं। इस मामले को जम्मू के विशेष टाडा न्यायालय में ठीक प्रकार से प्रस्तुत किया गया। न्यायालय ने 29 जनवरी ,2021 को रुबिया सईद अपहरण मामले में यासीन व अन्य को आरोपी करार दे दिया। इसमें तीन प्रत्यक्ष गवाह हैं जिनमें रूबिया के अलावा फेस्टिवल डॉक्टर शहनाज हैं।

रुबिया सईद अपहरण मामले का खुलना और यहां तक पहुंचना केवल एक अपहरण की न्यायिक प्रक्रिया भर नहीं है। यह जम्मू कश्मीर और उसके संदर्भ में आए व्यापक बदलाव का प्रमाण है। रुबिया सईद अपहरण कांड जम्मू कश्मीर में आतंकवाद को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उससे आतंकवादियों का हौसला बढ़ा और उन्होंने जो कहर बरपाया वह इतिहास का भयानक अध्याय बन चुका है। कश्मीरी हिंदुओं और सिखों का निष्कासन और पलायन परवर्ती घटनाएं हैं। इस एक प्रकरण के बाद आतंकवादी निर्भय होकर वारदातों को अंजाम देने लगे थे। पुलिस प्रशासन का धरातल पर नामोनिशान नहीं रहा। तब फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे। उन्होंने बाद में बयान दिया कि रुबिया की रिहाई के प्रयास में केंद्र सरकार से किसी तरह का सहयोग नहीं मिल रहा था। उनके अनुसार आतंकवादियों को छोड़ने के लिए कहा जा रहा था। सामान्यतः फारूक अब्दुल्लह की बातों पर विश्वास करना कठिन होता है। किंतु इस मामले में वीपी सिंह सरकार में शामिल वर्तमान में केरल के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान ने भी कहा है कि फारुख और उनके अधिकारियों ने कहा था कि रुबिया को छुड़वाने के लिए आतंकवादियों को रिहा करने की जरूरत नहीं है। आरिफ खान के अनुसार उन्होंने यही बात तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह और गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद को बताया। उनका कहना है कि इसके बाद उन्हें उस प्रक्रिया से ही अलग कर दिया गया।

स्पष्ट है कि केंद्र सरकार आतंकवादियों से लोहा लेने को तैयार नहीं थी और घुटने टेक दिए। अगर उस समय संकल्पबद्धता दिखाई गई होती तो जम्मू कश्मीर की स्थिति काफी हद तक अलग होती। आतंकवादियों को रिहा न करने का मतलब होता आतंकवाद के विरुद्ध सख्त अभियान व कार्रवाई। वीपी सिंह के बाद आई नरसिंह राव की सरकार ने भी रुबिया अपहरण मामले को आगे बढाने में रुचि नहीं दिखाई। 

हालांकि उस दौरान आतंकवाद के विरूद्ध कार्रवाई हुई एवं जम्मू कश्मीर में इतनी शांति स्थापित हुई जिससे 1996 में विधानसभा चुनाव कराया जा सका। पहली बार वर्तमान मोदी सरकार ने आतंकवाद, अलगाववाद और हिंसा से संबंधित वारदातों को उसके सही परिप्रेक्ष्य के साथ कानून के कठघरे तक लाने का साहस किया है। इसके द्वारा संदेश दिया गया है कि जो कुछ पहले हुआ वह अब संभव नहीं है तथा जिन्हें आतंकवादी, अलगाववादी और गैर कानूनी गतिविधियों के बावजूद सम्मान मिलता रहा उनको उनकी असली जगह यानी कानून के कटघरे से लेकर जेल तक पहुंचाया ही जाएगा। यह हो भी रहा है। रुबिया सईद का गवाही देने के लिए न्यायालय में आना भी सामान्य घटना नहीं है। इससे पता चलता है कि जम्मू कश्मीर का वातावरण कितना बदल चुका है। स्वयं मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी पुत्री पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती इस मामले को खुलवाने के पक्ष में नहीं थे। बावजूद मामला खुला, परिवार की ही सदस्या उस समय अपहृत रुबिया न्यायालय तक आई और उसने वही बोला जो कानून के तहत इन्हें सजा दिलाने के लिए पर्याप्त है। यह प्रदेश के बदले हुए वातावरण में ही संभव हुआ है। पहले माहौल यही था कि यदि मामले को आगे बढ़ाया गया तो रुबिया एवं अन्य गवाह इन्हें पहचानने से इंकार कर दे या न्यायालय में पेश होने से बचें।

तो इसका भी विश्लेषण करना पड़ेगा कि आखिर ऐसी स्थिति कैसे पैदा हो गई कि रुबिया सामान्य तरीके से न्यायालय पहुंची और उन्होंने गवाही दी? वह आगे जिरह में भी उपस्थित होने को तैयार हैं। इसका अर्थ है कि अब आतंकवादियों का भय कम हुआ है तथा बदली हुई आबोहवा का आभास वहां के राजनीतिक परिवारों को हो चुका है। उन्हें पता है कि अगर हमने न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग नहीं किया तो  हमारे साथ भी कानून अपने तरीके से काम करेगा। इसे ही कानून का राज कहते हैं जिसकी आवश्यकता जम्मू कश्मीर में सबसे ज्यादा थी। इस तरह कुल मिलाकर रूबिया सईद अपहरण प्रकरण की कानूनी प्रक्रिया ने साफ संदेश दे दिया है कि यह पहले वाला जम्मू कश्मीर नहीं है। अब उन सभी मामलों में न्याय होगा जिनमें इसकी आवश्यकता थी लेकिन पूरी नहीं की गई।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल- 9811027208

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

मजहबी कट्टरता और हिंसा के खतरो में संघ क्या करे

अवधेश कुमार

शायद ही कोई ऐसा समय हो जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी न किसी रूप में चर्चा में नहीं रहता। किसी घटना में उसकी भूमिका हो या नहीं लेकिन विरोधी घसीट कर ले ही आते हैं । ज्ञानवापी मामले में प्रत्यक्ष रूप से संघ के न होने के बावजूद  विरोधी हर चर्चा में उसका नाम लेते हैं । उदयपुर और अमरावती के हत्यारों ने कहीं भी संघ का नाम नहीं लिया । उन्होंने साफ कहा है कि हमने नबी के अपमान का बदला लिया है फिर भी विरोधियों के लिए यह संघ के हिंदुत्व की प्रतिक्रिया है। ऐसे समय संघ के प्रांत प्रचारकों की बैठक पर देश की नजर होनी स्वाभाविक थी। राजस्थान के झुंझुनू में आयोजित कोरोना के बाद प्रांत प्रचारकों की  बैठक में सरसंघचालक से लेकर अधिकतर अखिल भारतीय अधिकारी उपस्थित थे । देश में जितना संतप्त माहौल है उसमें विरोधियों एवं समर्थकों दोनों को उम्मीद थी कि संघ इन पर विस्तृत आक्रामक प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा। संघ के उस समय और उसके बाद के  बयानों में भी संयम और संतुलन का पुट ज्यादा है। 2025 में संघ अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरा कर लेगा। बैठक में शताब्दी वर्ष को लेकर कुछ लक्ष्य और कार्यक्रम निर्धारित किए गए। वे सारे अपने आप महत्वपूर्ण है।

 यह बैठक संघ के शिक्षा वर्गों के बाद आयोजित होती है। संघ प्रतिवर्ष मई-जून में देशभर में शिक्षा वर्ग आयोजित करता है। प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष, तृतीय वर्ष के 3 शिविर होते हैं। तृतीय वर्ष प्रशिक्षण का अंतिम वर्ष होता है जिसका आयोजन संघ के मुख्यालय नागपुर में किया जाता है। शेष संख्या के अनुसार अलग-अलग प्रांतों में आयोजित होता है।  बैठक के बाद आयोजित पत्रकार वार्ता में अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने इस संबंध में जो जानकारियां दी उसमें दो विन्दू विरोधियों एवं समर्थकों दोनों के लिए है।एक, इस वर्ष संघ शिक्षा वर्गों में 40 वर्ष से कम आयु के 18 हजार 981 व 40 वर्ष से अधिक आयु के 2 हजार 925 ने प्रशिक्षण लिया। कुल मिलाकर  पूरे देश के प्रथम, द्वितीय व तृतीय वर्ष के 101 वर्गों में कुल 21 हजार 906 संख्या रही।

दो ,वर्तमान में शाखाओं की संख्या 56 हजार 824 है जिसे शताब्दी वर्ष आते-आते शाखाओं की संख्या एक लाख तक ले जाना है।

जिन्हें प्रशिक्षण शिविरों और शाखाओं का ज्ञान नहीं उन्हें लगेगा कि यह संख्या बहुत बड़ी नहीं। जरा सोचिए ,भारत ही नहीं दुनिया में ऐसा कौन संगठन है जो वर्ष के दो महीने में निश्चित समयावधि के बीच इतनी बड़ी युवा आबादी को वैचारिक एवं शारीरिक रूप से प्रशिक्षित कर लेता है? ध्यान रखिए प्रशिक्षण के पूर्व सभी को प्रतिज्ञा लेनी पड़ती है । इस तरह उसने इस वर्ष इतनी बड़ी संख्या में प्रतीज्ञित प्रशिक्षित कार्यकर्ता तैयार कर लिया है। राजनीतिक दलों में सदस्य बनाना आसान होता है। संघ के प्रशिक्षण शिविरों में कष्ट साध्य परिश्रम करना होता है जिसके लिए संकल्प और मानसिक तैयारी चाहिए। ऐसे प्रशिक्षित लोग ही संघ की विचारधारा संगठन को आगे बढ़ाते हैं। आलोचक संघ की आलोचना करते रहेंगे, इसके आगे बढ़ने का कारण कार्य प्रणाली है जिसमें शाखा मूल है और प्रशिक्षण शिविर के द्वारा कैडर यानी स्वयंसेवक तैयार होते हैं। आज उसकी शाखाएं 56 हजार के आसपास है तो वह विश्व की इतनी बड़ी शक्ति है। कल्पना करिए,  उसकी संख्या एक लाख हो जाएगी तो ताकत कितनी बड़ी होगी? विरोधी अगर संघ से मुकाबला करना चाहते हैं तो उन्हें इतनी बड़ी संख्या में प्रतिबद्ध कार्यकर्ता तैयार करने की हैसियत बनानी होगी जो किसी के पास नहीं दिखती। कोरोना काल के बाद स्वयंसेवकों ने जल प्रबंधन, कचरा प्रबंधन, पर्यावारण व स्वच्छता आदि क्षेत्र में सक्रिय योगदान किया । कोरोना के बाद अवश्य शिक्षा वर्गों का यह पहला वर्ष था लेकिन अनवरत हर वर्ष यह प्रक्रिया चलती है। जाहिर है भारी संख्या में उसके कार्यकर्ता तैयार होते रहते हैं। अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अनेक केंद्रीय मंत्री प्रदेश के प्रदेश के मुख्यमंत्री मंत्री अनेक राज्यपाल संघ के प्रतिज्ञित प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं। नकारात्मक सोच और तरीके से इतनी संख्या में कार्यकर्ता तैयार नहीं हो सकते। संघ ने  एक लाख शाखा का लक्ष्य तय किया है तो उसके आसपास 2024 तक अवश्य पहुंच जाएंगे। जाहिर है ,जो मानकर चल रहे थे हैं कि संघ कट्टरवादी संगठन है और धीरे-धीरे नष्ट हो जाएगा उनके लिए यह सूचना निश्चय ही निराशा का कारण बनेगा। 

बैठक के बाद कहा गया कि समाज के सहयोग से सहभागिता बढ़ती जा रही है। ऐसे ही कुटुंब प्रबोधन व कुरीतियों के निवारण के लिए सामाजिक संस्थाओं, संतों व मठ-मंदिरों के सहयोग से स्वयंसेवक कार्य कर रहे हैं। इसके पूर्व मार्च में आयोजित प्रतिनिधि सभा की बैठक में स्वरोजगार और स्वावलंबन की बात की गई थी और उसके तहत कुछ हजार कार्यकर्ताओं को स्वावलंबन की शिक्षा भी दी गई है। निश्चित रूप से इतने बड़े संगठन को समाज के हर क्षेत्र में भूमिका निभानी चाहिए और उनमें समाज सुधार, रोजगार, पर्यावरण, जल प्रबंधन आदि आएंगे। किंत स्थापना का शताब्दी वर्ष आते-आते चुनौतियां बढ़ीं हैं। जब 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने इसकी स्थापना की उस समय आजादी के आंदोलन के बीच मुस्लिम संगठनों और नेताओं की भूमिका के कारण हिंदू समाज के अंदर कई तरह की चिंता व्याप्त थी। डॉ हेडगेवार भारतीय मुस्लिम कट्टरवाद के प्रति कांग्रेस की उदासीनता से निराश थे। उन्होंने हिंदुओं का संगठन आरंभ किया और इसका असर होने लगा। हालाकी संघ चाह कर भी हिंदू-मुस्लिम आधार पर भारत के विभाजन को नहीं रोक सका लेकिन गैर मुस्लिमों खासकर हिंदुओं और सिखों की सुरक्षा, उनको पाकिस्तान से सुरक्षित वापस लाने, शरणार्थियों की व्यवस्था एवं पुनर्वसन में उसने भूमिका अदा की। 29 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के कारण प्रतिबंध नहीं लगता तो संघ की यह भूमिका काफी विस्तारित होती। संघ की दृष्टि से देखें तो वर्तमान स्थितियां काफी गंभीर एवं चिंताजनक हैं। यह कहना उचित नहीं होगा कि चुनौतियां ठीक वैसी सी ही हैं जो संघ की स्थापना या आजादी के पूर्व थी ।  संघ मूल्यांकन करें तो उसे चार चिंताजनक बातें दिखाई देंगी। 

पहला, मुस्लिम समाज के बीच एक बड़े वर्ग के अंदर मजहबी कट्टरता तेजी से बढ़ रहा है। दूसरे, चूंकि मुस्लिम राजनीतिक- गैर राजनीतिक और मजहबी नेताओं के एक समूह ने संघ, भाजपा और यहां तक कि आमहिंदुओं का भय पैदा किया है इसलिए संभव है कुछ लोगों में अलगाववाद की भावना भी बड़ी हो ।तीसरा, अंतरराष्ट्रीय जिहादी विचारधारा से प्रभावित हिंसा के लिए उद्धत लोग भी सामने आए हैं। बिहार की राजधानी पटना और फुलवारी शरीफ में पीएफआई द्वारा  2047 तक भारत के इस्लामिक देश बनाने के लक्ष्य एवं हथियार प्रशिक्षण का पकड़ में आना तथा उदयपुर और अमरावती का कत्ल आईएस, अल कायदा और तालिबान की धारा को ही प्रतिबिंबित करता है। अलग-अलग भागों में नूपुर शर्मा का समर्थन करने वालों को जान से मारने की धमकियां भी इसे पुष्ट करती है। देश के अलग-अलग भागों में जुमे की नमाज के बाद हुए हिंसक प्रदर्शन और कानपुर आदि जगहों के दंगों ने खतरो का प्रत्यक्ष अनुभव कराया है। नूपुर शर्मा मामले में भाजपा की चुप्पी , प्रवक्ताओं के डिबेट से दूर रहने आदि के कारण हिंदुओं के अंदर डर पैदा हुआ है।

इसमें देश के सबसे बड़े हिंदू संगठन के साथ केंद्र में सत्तारूढ़ दल की मातृ संस्था होने के कारण संघ की जिम्मेवारी बढ गई है। संघ सीधे कोई काम नहीं करता स्वयंसेवक करते हैं, पर उन्हें मार्गदर्शन का दायित्व उसी का है। संघ का लक्ष्य देश की एकता अखंडता कायम रखने के साथ अखंड भारत है इसलिए वह नहीं चाहेगा किअलगाववादी मजहबी हिंसक ताकतें बढ़ें। इसलिए उसे तीन काम करना चाहिए ।  एक,  हिंदू समाज के अंदर भय और गुस्सा नकारात्मक मोड़ न ले इसके लिए वातावरण बनाना। दूसरे, ऐसे वक्तव्य एवं कार्य योजना लेकर सामने आना जिससे लोगों के अंदर व्याप्त भय कम होते -होते खत्म हो जाए तथा आत्मविश्वास बढ़े।तीन, हिंसक प्रदर्शनों और हिंसा के विरुद्ध स्वयंसेवकों को समाज के साथ समय-समय पर अनुशासित व गरिमामय तरीके से सड़कों पर उतर कर  अहिंसक प्रदर्शन व धरना आदि का स्वभाव बनाना। आम स्वयंसेवक एवं संघ के दूसरे अनुषांगिक संगठनों के ज्यादातर कार्यकर्ताओं में सड़कों पर उतरने ,धरना प्रदर्शन करने का चरित्र नहीं है। खतरे बड़े हैं तो इसे पैदा करना होगा । इससे देश में व्याप्त भय दूर होगा, हिंसक तत्वों के अंदर व्यापक जन विरोध का भय पैदा होगा तथा सरकार में राजनीतिक नेतृत्व एवं प्रशासन पर सक्रिय कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा।

अवधेश कुमार, ई- 30 ,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, मोबाइल- 98110 27208



रविवार, 17 जुलाई 2022

जो उनके लिये 'वंशवाद' वह इनके लिये 'राष्ट्रवाद' कैसे?


तनवीर जाफ़री

ख़बर है कि 2024 में भारतीय जनता पार्टी 'वंशवाद की राजनीति' के विरुद्ध बिगुल फूंकने की तैयारी में है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'वंशवाद की राजनीति' के विरुद्ध काफ़ी मुखर होकर बोलते रहे हैं। चाहे वह कानपुर में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के पैतृक गांव परौंख में दिया गया उनका भाषण हो या पिछले दिनों हैदराबाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक या अत्र तत्र कहीं भी, हर जगह उनका मुख्य फ़ोकस 'वंशवाद की राजनीति' के विरोध पर आधारित ही रहा। सूत्रों के अनुसार जिसतरह बीजेपी ने पिछले चुनावों में कांग्रेस और भ्रष्टाचार मुक्त भारत के नारे दिए थे उसी तरह अगले चुनावों में पार्टी  'वंश-मुक्त भारत' के नारे को अपने चुनाव अभियान में शामिल कर सकती है। परन्तु सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी व उसके नेताओं की नज़रों में 'वंशवाद ' की व्यापक परिभाषा है क्या ? क्या वास्तव में राजनीति की 'वंशवादी' व्यवस्था ही देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा है ? क्या कांग्रेस या कई अन्य क्षेत्रीय राजनैतिक दल ही 'वंशवादी राजनीति ' का शिकार हैं और भाजपा इससे पूरी तरह अछूती है ? या फिर भाजपा अपने दल के वंशवादी नेताओं या अपने समर्थक 'वंशवादियों ' के अतिरिक्त केवल अपने विरोधी 'वंशवादियों ' को ही 'वंशवादी राजनीति ' करने वालों की श्रेणी में डालती है ?

सबसे ताज़ातरीन उदाहरण तो महाराष्ट्र का ही है। जब शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भाजपा से नाता तोड़ने के बाद एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर महा विकास अघाड़ी का गठन किया और मंत्रिमंडल में अपने पुत्र आदित्य ठाकरे को शामिल किया उस समय से लेकर अब तक यही शोर-शराबा होता रहा कि शिवसेना वंशवादी राजनीति का प्रतीक है। अब उसी राज्य से प्राप्त ख़बरों के अनुसार भाजपा ने राज ठाकरे के सुपुत्र अमित ठाकरे को विभाजित शिवसेना के शिंदे गुट व भाजपा द्वारा नव गठित सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल कर उद्धव ठाकरे की कथित  'वंशवादी राजनीति ' को ' वंशवाद' के ही शस्त्र से ही हमलावर होने की योजना बनाई है।  इससे राज ठाकरे व उनके मनसे समर्थक ख़ुश होंगे और उद्धव ख़ेमा आहत होगा और इन दोनों ही ख़ेमों की खाई और गहरी भी होगी। गोया बाल ठाकरे के एक पौत्र आदित्य ठाकरे को बढ़ावा दिया जाना 'वंशवादी राजनीति ' का हिस्सा था और बाल ठाकरे के ही दूसरे पौत्र अमित ठाकरे को मंत्री बनाना 'राष्ट्रवादी राजनीति ' कहलायेगी ?

कुछ दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के 26 वर्षीय सुपुत्र आर्यमन सिंधिया को किसी भी संस्था या संगठन के पहले पद की ज़िम्मेदारी सौंपते हुए ग्वालियर डिवीज़न क्रिकेट एसोसिएशन GDCA  का उपाध्यक्ष बनाया गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया का चश्म-ए-चिराग़ होने के अतिरिक्त आख़िर उनमें और क्या विशेषता है ? यह सिंधिया घराने की अगली पीढ़ी के राजनैतिक प्रवेश की तैयारी नहीं तो और क्या है? विजय राजे सिंधिया से लेकर वसुंधरा राजे उनके पुत्र दुष्यंत सिंह,स्वयं ज्योतिरादित्य सिंधिया आदि सब वंशवाद की ही बेल तो है? इसी प्रकार गृह मंत्री अमित शाह के पुत्र जय शाह को 2019 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का सेक्रेटरी बनाया गया। आज वे एशियन क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष भी हैं। अमित शाह का कुलदीपक होने के अतिरिक्त भी क्या उनकी कोई योग्यता या विशेषता है ? परन्तु इसे भी वंशवाद नहीं बल्कि राष्ट्रवाद कहिये। भाजपा में शीर्ष में अनेक नेताओं ने वंशवादी बेल को बख़ूबी सींचा है और अब भी सींच रहे हैं। उदाहरणार्थ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के विधायक पुत्र पंकज सिंह, हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के फ़ायर ब्रांड सुपुत्र व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर,दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय साहब सिंह वर्मा के सांसद पुत्र प्रवेश सिंह वर्मा, उत्तर प्रदेश के 3 बार मुख्यमंत्री व राज्यपाल रहे स्व कल्याण सिंह के सांसद पुत्र राजवीर सिंह और राजवीर सिंह के भी विधायक पुत्र संदीप सिंह जोकि वर्तमान में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में शिक्षा राज्य मंत्री भी हैं। इसी तरह स्वर्गीय प्रमोद महाजन की पुत्री पुनम महाजन,गोपीनाथ मुंडे की प्रीतम मुंडे व पंकजा मुंडे,भाजपा नेता वेद प्रकाश गोयल के पुत्र केंद्रीय मंत्री पीयुष गोयल, लालजी टंडन के सुपुत्र आशुतोष टंडन, ठाकुर प्रसाद के सुपुत्र रविशंकर प्रसाद, यशवंत सिन्हा के पुत्र जयंत सिन्हा, देवेंद्र प्रधान के पुत्र धर्मेंद्र प्रधान,बीएस येदियुरप्पा के पुत्र बी. वाई राघवेंद्र,कैलाश विजयवर्गीय के 'बैट दनादन फ़ेम सुपुत्र 'आकाश विजय वर्गीय विधायक,गंगाधर फ़नवीस के नूर-ए- नज़र देवेंद्र फ़डनवीस, सांसद दीया कुमारी, किरण रिजिजू, रीता बहुगुणा जोशी,आदि जैसी दर्जनों और राज्य स्तर पर सैकड़ों मिसालें ऐसी मिलेंगी जिनमें भाजपाइयों द्वारा वंशवाद की बेल को बख़ूबी खाद पानी दिया जा रहा है।

इसी प्रकार जब जम्मू कश्मीर में सरकार बनानी थी तो राज्य में महबूबा मुफ़्ती भी वंशवादी नहीं थी और उनकी पी डी पी भी पक्की राष्ट्रवादी थी। अब साथ छूटते ही वह वंशवादी भी हैं और पी डी पी राष्ट्रविरोधी भी। पंजाब में दो दशक से भी लंबे समय तक बादल परिवार के अकाली दल से गठबंधन रहा,वंशवाद की कोई चर्चा नहीं हुई,आज भी हरियाणा में देवी लाल के पौत्र दुष्यंत चौटाला को उनकी इसी योग्यता के आधार पर मुख्यमंत्री बनाया गया है कि वे स्व देवी लाल जी के वंश के ध्वजवाहक हैं अन्यथा पहली बार में ही विधायक बनने पर उपमुख्यमंत्री बनना भला किसी साधारण जे जे पी कार्यकर्त्ता के भाग्य में कहाँ ? परन्तु जब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनकी पार्टी के अन्य शीर्ष नेता जनसभाओं में वंशवाद पर निशाना साधते हैं तो उन्हें अपने निशाने पर देश का प्रथम वंशवादी राजनैतिक परिवार नेहरू गांधी परिवार नज़र आता है परन्तु इसी परिवार के मेनका गाँधी व वरुण गांधी मां-बेटे राष्ट्रवादी नज़र आते हैं ,वंशवादी नहीं ? भाजपा को समाजवादी पार्टी,राष्ट्रीय जनता दल,बीजू जनता दल,तथा दक्षिण भारत की अनेक पार्टियां जो भाजपा  विरोधी हैं उन सबमें इनको वह 'वंशवाद ' दिखाई देता है जो इनके अनुसार देश की राजनीति व लोकतंत्र के लिये घातक है।

यदि भाजपा की यही धारणा है तो इस पैमाने पर तो केवल देश की वामपंथी पार्टियां ही सबसे उपयुक्त नज़र आती हैं। परन्तु भाजपाई व संघ विचारधारा व सिद्धांतों के मुताबिक़ तो कम्युनिस्टों से भी देश को उतना ही ख़तरा है जितना ईसाईयों व मुसलमानों से ? ऐसे में वंशवाद से निपटने का आख़िर उपाय क्या रह जाता है। क्या यही कि जो भाजपाई वंशवादी नेता हैं उन्हें वंशवादी नहीं बल्कि राष्ट्रवादी और यदि हो सके तो उन्हें  'महा राष्ट्रवादी ' मान लिया जाये और जो भाजपा विरोधी ख़ेमे से संबद्ध हैं उनपर वंशवादी होने का टैग लगाकर उन्हें लोकतंत्र व राजनीति के लिये ख़तरा घोषित कर दिया जाये।    

तनवीर जाफ़री 

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