शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

कन्हैया लाल के अपराधी केवल हत्यारे नहीं

अवधेश कुमार

उदयपुर के कन्हैयालाल दर्जी की दिनदहाड़े गला काटकर हत्या करने की भयानक घटना से देश का बड़ा समूह उद्वेलित है। न तो कन्हैयालाल को जिबह करने वाला रियास अख्तरी और गौस मोहम्मद इस सोच के दो ही है और न कन्हैयालाल उनके निशाने पर एकमात्र व्यक्ति। न जाने कितने रियास और गौस मजहब के नाम पर ऐसे ही अनेक कन्हैयालालों को जिबह करने के लिए तैयार बैठे हैं। कन्हैयालाल की हत्या ठीक वैसे ही है जैसे फ्रांस में 16 अक्टूबर, 2020 को सैमुअल पेटी शिक्षक का एक चेचेन मुसलमान जेहादी आतंकवादी ने सिर कलम कर दिया था। हत्यारा अब्दुलाख अबौयदोविच  अंजोरोव को बताया गया था कि पेटी ने अपनी कक्षा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बोलते हुए छात्रों को शार्लो हेब्दो के 2012 के कार्टून दिखाए थे ,जिसमें पैगंबर मोहम्मद साहब की आपत्तिजनक छवि दिखाई गई थी। उसके बाद पेटी के विरुद्ध इसी तरह अभियान चलाए गए, जिस तरह इस समय भाजपा की नूपुर शर्मा, नवीन जिंदल और उनके समर्थकों को लेकर चलाया जा रहा है। बाद में पता चला कि जिस दिन पेटी द्वारा शार्लो  हेब्दो का कार्टून दिखाने की बात थी उस दिन वो स्कूल गए ही नहीं थे। कन्हैयालाल को नूपुर शर्मा के पक्ष में एक फेसबुक पोस्ट लिखने के कारण जान गंवानी पड़ी। उस घटना के तुरंत बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि यह विशिष्ट इस्लामी आतंकवादी हमला है और हम इसके सामने झुकेंगे नहीं। पूरे फ्रांस में लोगों ने बाहर निकलकर इसका विरोध किया और लाखों लोगों ने कहा कि हम भी सैमुअल पेटी हैं। हमारे यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ।  उस समय फ्रांस की मस्जिदों के अनेक इमामों, मौलानाओं ने हत्या की निंदा की और कहा कि इस्लाम में इसके लिए कोई स्थान नहीं है।

वैसा ही दृश्य भारत में है। जो नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल को गुस्ताख ए रसूल घोषित कर रहे थे वो सब हत्या की निंदा में लग गए हैं। एक दिन पहले मोहम्मद जुबेर की गिरफ्तारी को मोदी सरकार की मुस्लिम विरोधी सोच का प्रमाण बताने वाले मुस्लिम चेहरे भी इसकी निंदा कर रहे हैं। प्रश्न है कि अगर ये सारे लोग इस तरह की हिंसा व हत्या के विरोधी हैं तो ऐसी स्थिति पैदा क्यों हुई जिसमें कन्हैयालाल की बलि चढ़ गई और अनेक की जान खतरे में हैं?

सच यह है कि सिर कलम करने का वातावरण बनाने और रियाज एवं गौस जैसों की जिहादी कट्टरता को परवान चढ़ाने के पीछे उन सारे मुस्लिम नेताओं, बुद्धिजीवियों , स्वयं को सेकुलर- लिबरल मानने वाले हिन्दू बुद्धिजीवियों ,पत्रकारों एक्टिविस्टों की भूमिका है जिन्होंने न केवल नूपुर शर्मा नवीन जिंदल प्रकरण को विकृत तरीके से पेश किया बल्कि लंबे समय से यह प्रचारित करते रहे हैं कि भारत में मुसलमानों के साथ शासन -प्रशासन दोयम दर्जे का व्यवहार कर रहा है , उनकी धार्मिक गतिविधियों तक को बाधित की जा रही है। क्या ऐसी संख्या हजारों लाखों में नहीं है जिन्होंने  लंबे समय से दुष्प्रचार किया मानो मुसलमान इस देश में मजहबी अल्पसंख्यक होने के कारण उत्पीड़ित हैं? 

क्या ज्ञानवापी पर न्यायालय के फैसले के बाद यह शोर नहीं मचाया गया कि हमारी सारी मस्जिदें छिन जाएंगी, नमाज पढ़ने पर बंदिशें लग जाएंगी? एक टीवी डिबेट की बहस में यह कहे जाने को कि आप हमारे देवी देवताओं के बारे में इस तरह बोलते हो अगर मैं आपको इस तरह कहूंगी तो कैसा लगेगा मोहम्मद साहब और इस्लाम के अपमान का इतना बड़ा मुद्दा बना दिया गया कि दुनिया भर में जिहादी सोच वालों को खाद पानी मिल गया। इस घटना की निंदा करने वाले में वे लोग भी हैं, जो उन विरोध प्रदर्शनों के नेतृत्वकर्ताओं में थे या भागीदार थे जिनमें बाजाब्ता बैनर लगे थे कि गुस्ताख ए रसूल की एक ही सजा सिर तन से जुदा सिर तन से जुदा और यही नारे भी लग रहे थे।

जब आप ऐसा माहौल बनाएंगे ,इस तरह के पोस्टर लेकर सड़कों पर निकलेंगे ,नारे लगाएंगे तो उसका हस्र यही होगा। सेकुलरवाद की विकृत सोच और वोट बैंक के कारण अनेक सरकारें ऐसी नीतियां अपनातीं हैं,जो व्यवहार में मुस्लिमपरस्त हो जाती हैं। कन्हैयालाल को धमकियां मिलती रही, पुलिस में शिकायत की गई, पर वह इतना अरक्षित था कि जेहादी सिर कलम कर चले गए। बाद में आप उसे पकड़कर सजा दे ही दीजिए इससे क्या होगा? ऐसी सोच वाले मजहब का फर्ज मान दुनिया भर में अपराध को अंजाम देते हैं और कभी ऐसे अपराधियों को अफसोस प्रकट करते नहीं देखा गया। अशोक गहलोत सरकार अपने राज्य में बढ़ते मुस्लिम कट्टरवाद, जिहादी सोच के विस्तार की कोई शिकायत सुनने को तैयार नहीं। हिंदू शोभा यात्राओं पर हमले हुए,  करौली में दंगे हुए और उसका रवैया बदला नहीं। गहलोत मानने को तैयार नहीं कि राजस्थान में इस्लामी कट्टरवाद जड़ जमा चुका है। उल्टे वे भाजपा - संघ को दोषी ठहराते हैं और इस मामले में तो उन्होंने स्वयं को दोषी मानने की बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से ही देश को हिंसा के विरुद्ध संबोधित करने की मांग कर दी। इससे ऐसे कट्टरपंथियों का मनोबल बढ़ता है। 

उत्तर प्रदेश में भी राजधानी लखनऊ में कमलेश तिवारी की ऐसी ही हत्या हुई थी। योगी आदित्यनाथ सरकार उसके बाद से सतर्क रहते हुए ऐसी कार्रवाइयां कर रही है जिनसे जिहादी कट्टरपंथियों का मनोबल कमजोर रहता है। 10 जून को जुम्मे की नमाज के बाद सड़कों पर उतर कर की गई हिंसा पर आदित्यनाथ सरकार की कार्रवाइयां सबके सामने है। लिबरल चेहरा लगाए इनके देश भर के समर्थकों द्वारा हाय तौबा मचाने तथा योगी आदित्यनाथ के मुस्लिम विरोधी होने के दुष्प्रचारों के बावजूद सरकार अपने रुख पर कायम है। गहलोत और दूसरी सरकारों के सामने भी यह एक उदाहरण है। लेकिन कोई इसका अनुसरण करने को तैयार नहीं।

पाकिस्तान के एक मुस्लिम पत्रकार ने तो यह कह दिया कि उन्हें पूरा वीडियो नहीं मिला लेकिन जितना वीडियो उन्होंने देखा उसके आधार पर सच यही है कि पहले मुसलमान डिबेटर ने हिंदू देवताओं को अपमानित कर भाजपा की प्रवक्ता को उकसाया। उसके अनुसार भाजपा की प्रवक्ता कह रही है कि मैं ऐसा कहूंगी तो आपको कैसा लगेगा और यह बताता है कि कैसे उसको उकसाया गया। लेकिन भारत के किसी मुस्लिम नेता, बुद्धिजीवी, मौलाना ने यह बात नहीं कही। उल्टे जुबेर की गिरफ्तारी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं मोदी सरकार के मुस्लिम विरोधी सोच का परिचायक बताया गया। 7 जनवरी, 2015 को शार्लो पत्रिका और उसकी जगह सुपर मार्केट में दो आतंकवादी हमलों में 17 लोगों के मारे जाने के बाद की डिबेट में भी मुस्लिम प्रवक्ता हमले की निंदा कर रहे थे लेकिन कार्टून छापने के बारे में वक्तव्य ऐसे दे रहे थे जिससे हमला न्यायसंगत साबित होता था। यही इस मामले में भी है।

कैसे इनकी भूमिका से देश में मजहबी कट्टरता बढी और हमें खून व विध्वंस का शिकार होना पड़ा इसके कई उदाहरण है। उच्चतम न्यायालय ने अभी गुजरात दंगों के मामले में स्पष्ट कर दिया कि उसके पीछे तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और उच्च स्तरीय प्रशासन का किसी प्रकार का षड्यंत्र नहीं था। पिछले 20 वर्षों से यही प्रचारित किया गया कि गुजरात सरकार ने साजिश रचकर जानबूझकर मुसलमानों का नरसंहार कराया तथा प्रशासन को कोई कार्रवाई नहीं करने दी। सितंबर 2002 में गांधीनगर के अक्षरधाम पर हुए आतंकवादी हमले के बाद से अनेक वर्षों तक के हमलों में पकड़े गए आतंकवादियों का बयान यही होता था कि गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम से उनके अंदर गुस्सा था और  बदला लेने के लिए उन्होंने ऐसा किया है। बाटला हाउस मुठभेड़ को झूठा करार देने वाले लेख, वीडियो, तकरीरें हजारों की संख्या में देश और दुनिया भर में गई। इसके प्रतिशोध में मुस्लिम युवकों के एक समूह ने इंडियन मुजाहिदीन संगठन बनाया तथा अनेक आतंकवादी हमले किए।

इसलिए इनकी आलोचना या निंदा के मायने तब तक नहीं होंगे जब तक ये स्वयं को दोषी मानकर अपना व्यवहार पूरी तरह नहीं बदलते। ऐसा होना नहीं है। दुर्भाग्य से नूपुर शर्मा प्रकरण को भाजपा ने भी बिल्कुल गलत तरीके से हैंडल किया। अपने सारे प्रवक्ताओं को टीवी पर भेजना बंद कर दिया। ठीक यही व्यवहार भाजपा का कन्हैयालाल हत्या प्रकरण में भी रहा। फ्रांस हमारे सामने एक उदाहरण है जो अनेक आतंकवादी हमला झेलने के बावजूद नहीं झुका। यह तभी हुआ जब वहां की जनता खुलकर ऐसी जिहादी सोच और आतंकवाद के विरुद्ध सड़कों पर आई। भारत की समस्या यह है विरोध करने वाले स्वयं को सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने तक सीमित है। कुछ लोग गुस्से में आकर तोड़फोड़ ,आगजनी, हिंसा करने लगते हैं। तोड़फोड़, आगजनी, हिंसा से हम उन्हीं आतंकवादियों और अपने कट्टर इस्लामी सोच के ऊपर लिबरलवाद का चेहरा लगाए लोगों के कुत्सित इरादों को ही सफल करेंगे।

फ्रांस के लोगों ने विरोध में हिंसा नहीं की। साहस के साथ जब भी हमले हुए  सड़कों पर उतरे, अहिंसक प्रदर्शन किया। यही भारत में किये जाने की जरूरत है। अहिंसक आक्रोश प्रदर्शनों के द्वारा इनका प्रतिकार भी होगा एवं सरकारों पर कठोर कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा तथा सेकुलर लिबरल चेहरे लगाए हिंदू मुस्लिम नेताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, एक्टिविस्टों, मौलानाओं आदि के अंदर भी व्यापक जन विरोध का डर पैदा होगा। अवधेश कुमार,ई- 30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

शुक्रवार, 24 जून 2022

सामान्य नहीं यह हिंसा

अवधेश कुमार

 अग्निपथ के विरोध में हुई हिंसा और आगजनी ने पूरे देश को चौंकाया है। आप किसी भी दृष्टिकोण से अग्निवीर को देख लीजिए विरोध के नाम पर ऐसी हिंसा और अराजकता का कोई कारण नजर नहीं आएगा। कुछ समय के लिए अग्निवीर के तथ्यों को अलग रख दीजिए। जरा सोचिए,  इसमें ऐसा क्या है जिसके सामने आते ही विरोध के नाम पर भीषण आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा होने लगे? 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब पिछड़ों के लिए आरक्षण की योजना केंद्र की सेवाओं में भी लागू की तो इस तरह का विरोध हुआ था। उसमें गैर दलित व गैर पिछले पिछड़ी जातियों के छात्रों को लगा था कि आरक्षण से उनके लिए नौकरियों के अवसर कितना जाएंगे। इस कारण विरोध में व्यापक हिंसक हुआ और छात्रों द्वारा आत्मदाह करने तक की घटनाएं हुई। अग्निवीर योजना में किसी का कुछ जाना नहीं है। यह योजना अनिवार्य नहीं है। जिसे पसंद होगा वह योजना में आवेदन करेगा और जाएगा जिसे नहीं पसंद होगा नहीं जाएगा। विरोधियों ने देश और दुनिया में ऐसे प्रस्तुत कर दिया है मानो हजारों -लाखों लोग सेना में भर्ती होने वाले थे जिनको इस योजना से वंचित कर दिया गया है। यही नहीं भविष्य के लिए उनके रास्ते अवरुद्ध कर दिए गए हैं तथा केवल 4 वर्ष की अवधि के लिए निश्चित वेतनमान पर सेवा लेकर उन्हें जीवनभर के लिए निराश्रित और बेरोजगार छोड़ दिया जाएगा। यानी कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी सरकार की छवि ऐसी बनाई गई है कि यह रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं और छात्रों की दुश्मन है। उन्हें सेना जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के रोजगार से वंचित रखना चाहती है। ध्यान रखने की बात है कि जिस दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस योजना की घोषणा की उसके कुछ ही देर बाद से इसका विरोध आरंभ हो गया जो धीरे-धीरे भारी हिंसा आगजनी तोड़फोड़ से बढ़ता चला गया। क्यों? अग्निवीर योजना की पूरी जानकारी इतनी जल्दी विरोध करने वालों के पास कैसे पहुंच गई?

यद्यपि हिंसा कई राज्यों में हुए लेकिन सबसे ज्यादा शिकार बिहार हुआ है। तो यह प्रश्न भी उठेगा कि आखिर बिहार में सबसे ज्यादा हिंसा क्यों? अगर सेना में भर्ती से वंचित होने का ही सवाल है तो हिंसा देखकर निष्कर्ष यही निकलेगा कि बिहार से भारी संख्या में नौजवान हर वर्ष भर्ती होते हैं। सच यह है कि प्रतिवर्ष बिहार से सेना में जाने वाले युवाओं की संख्या औसत ढाई हजार है। उत्तर प्रदेश की भी औसत संख्या 6500 है। इतनी कम संख्या में जहां लोग सेना में जाते हो वहां इतनी बड़ी हिंसा अग्निवीर के कारण तो नहीं हो सकती। बिहार से ज्यादा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से लोग सेना में जाते हैं। जाहिर है, ऐसी हिंसा का मूल कारण कुछ और है। यह नहीं कह सकते कि इस आंदोलन में छात्र और नौजवान नहीं है लेकिन आंदोलन केवल उनका नहीं है इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। हिंसा के आ रहे विजुअल की थोड़ी गहराई से समीक्षा करेंगे तो साफ दिख जाएगा कि अनेक जगह आग लगाने वाले बिल्कुल पारंगत है। जिस तरह रेलवे की बोगी में पेट्रोल डालकर आग लगाया जा रहा है इससे पता चलता है कि इसका ज्ञान उनको है। सामान्य आंदोलनों की आगजनी में थोड़ा जला ,थोड़ा रह गया, कहीं आग लगा फिर बुझ गया। इस आंदोलन में ज्यादातर जगहों की आगजनी में संपत्तियां पूरी तरह खाक हो गई। एक विजुअल में साफ दिखा कि बिहार के तारेगाना रेलवे स्टेशन में स्टेशन मास्टर का केबिन व्यवस्थित तरीके से जल रहा है । तारेगना रेलवे स्टेशन में पुलिस के साथ मोर्चाबंदी में प्रदर्शनकारियों की ओर से गोलियां चलीं। गोलियां चलाने वाले क्या सामान छात्र और नौजवान थे? ये तो कुछ उदाहरण हैं। आप देखेंगे कि चेहरे पर कपड़ा बांधे हुए हाथों में लाठी ,डंडे, पेट्रोल के कनस्तर लिए ऐसे लोगों की बड़ी संख्या इस हिंसा में चारों तरफ नजर आ रही है। बिहार में 8 बजे रात से सुबह 4 बजे तक ट्रेनों का चालन निश्चित किया गया क्योंकि पुलिस का ने बताया 5 बजे सुबह से पत्थरबाजी शुरू हो जाती है। इतने पत्थरबाज कहां से आ गए? कश्मीर से निकलकर पत्थरबाजी उत्तर प्रदेश से बिहार और झारखंड तक पहुंची है।

 

ऐसे अनेक डरावने तथ्य हैं जिनके आधार पर आप मोटा -मोटी अनुमान लगा सकते हैं कि विरोध और आंदोलन के नाम पर कैसी शक्तियां इसके पीछे हैं।

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ,कांग्रेस सभी कम्युनिस्ट पार्टियों ने आंदोलन और दूसरे दिन आयोजित बंद का समर्थन किया था।  जब आंदोलन के नाम पर इतनी हिंसा होने लगी राजनीतिक पार्टियों का दायित्व था कि अपने को अलग होने की घोषणा करते। इसकी जगह इन्होंने दूसरे दिन बंद का समर्थन किया और राजद, कांग्रेस जनाधिकार पार्टी तथा कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यकर्ता जगह-जगह स्वयं जबरन बंद कराते देखे गए । 18 जून के दिन टेलीविजन में ज्यादातर बायट राजद नेताओं के आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे यह आंदोलन उस पार्टी का है । राजद कहती है कि हिंसा से उसका कोई लेना-देना नहीं तो फिर इसकी जिम्मेवारी किसके सिर जा सकती है ? राजद बिहार की बड़ी राजनीतिक शक्ति है ।उसके सहयोग और साथ के बिना सरकार के विरुद्ध इतना बड़ा आंदोलन संभव नहीं था। बिहार में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री सहित कई नेताओं के घरों पर हमले हुए और तीन जिलों में कार्यालय जला दिए गए। यह सब किसी सामान आंदोलन का उदाहरण तो नहीं हो सकता।

 वास्तव में देखा जाए तो 2018 के बाद से भारत में केंद्र की मोदी सरकार के विरोध में होने वाले अभियान ऐसे ही हिंसक होते गए हैं। नागरिकता कानून संशोधन के दौरान जामिया मिलिया से आरंभ हिंसा कई जगह गया। कृषि कानून विरोधी आंदोलन में लाल किले की हिंसा सबको याद है। पिछले दिनों एक परीक्षा को लेकर व्यापक पैमाने पर इसी तरह हिंसा हुई। ज्ञानवापी और भाजपा के एक प्रवक्ता के टेलीविजन डिबेट मेंदिए गए जवाब विरोध के नाम पर प्रदर्शन और हिंसा सबसे ताजा है।10 जून जुम्मे की नमाज के बाद की हिंसा भुला नहीं जा सकता। कई मुस्लिम नेताओं ने अगले जुम्मे को भी बंद और विरोध की घोषणा की थी । ध्यान रखिए ,17 जून के मुख्य विरोध प्रदर्शन का दिन भी जुम्मा का ही था। देश में और बाहर ऐसी बड़ी शक्तियां किसी भी मुद्दे को लेकर विरोध के नाम पर हिंसा, आगजनी तथा उसके दुष्प्रचार के लिए पूरी तैयारी से काम करता है। इन शक्तियों की पूरी कोशिश भारत में केवल अशांति, अराजकता और हिंसा ही पैदा करना नहीं, दुनिया को संदेश देना है कि केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की भाजपा सरकार से शासन संभल नहीं रहा, देश में उनके विरुद्ध आक्रोश है, इसलिए लोग सड़कों पर उतर कर आगजनी कर रहे हैं, कानून व्यवस्था विफल है। दूसरी ओर सरकार के स्तर पर कभी इनसे कड़ाई से निपटने और इनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई का कदम नहीं उठाया गया। पहली बार उत्तर प्रदेश विरोध प्रदर्शन में हिंसा करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो रही है। चाहे शाहीनबाग का नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध अवैध धरना हो या जामिया मिलिया की हिंसा या फिर किसी कानून विरोधी आंदोलन में लाल किले की भयानक हिंसा, इनके पीछे की ताकतों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई हो ऐसा देश के सामने नहीं आया। इससे हिंसा पकरने वालों का हौसला बढ़ता है कि हम कुछ भी करेंगे हमारे विरुद्ध कार्रवाई नहीं होगी। दूसरे ,कृषि कानूनों की वापसी से इनका हौसला बढ़ा। इतने मान लिया कि हमने सरकार पर दबाव बनाया तो चाहे उसकी योजना जितनी सही हो वह वापस ले लेगी। विरोधियों की समस्या यह भी है कि वे नहीं चाहते कि 2024 तक मोदी सरकार की लोकप्रियता बनी रहे। इसलिए ऐसी योजनाओं को हर हाल में विफल करना चाहते हैं जिनसे मोदी सरकार की लोकप्रियता में वृद्धि हो। अग्निवीर योजना में अगर प्रति वर्ष 60 हजार के आसपास दसवीं से बारहवीं पास नौजवान ,जिनके लिए रोजगार नहीं होता, जाते हैं तो वे जो कुछ सीखेंगे, नौकरी से निकलने के बाद उन्हें जो अवसर और लाभ मिलेंगे वह सब उनको मोदी सरकार का समर्थक बना सकती है। तो यह भाव भी विरोधियों के अंदर काम कर रहा है ।इसलिए विपक्षी दल हिंसा, उपद्रव और अराजकता देखते हुए साथ दे रहे हैं और केवल औपचारिक घोषणा करते हैं कि हिंसा नहीं होनी चाहिए। 

सच कहा जाए तो ऐसा लगता है कि जैसे धीरे-धीरे देश उस दशा में जा रहा है जहां सरकार के विरोध के नाम पर ऐसी हिंसा और तोड़फोड़ सामान्य घटना बन जाएगा। इसमें पहली आवश्यकता तो लोगों के सामने सच लाने की है ताकि भ्रमित होने की गुंजाइश न रहे। हिंसा जब जहां हो वहां कुछ कार्रवाई करने की रणनीति के परे मोदी सरकार पिछले 3 वर्ष के ऐसे आंदोलनों की समीक्षा कर एक समग्र रणनीति बनाए ताकि उन तत्वों की पहचान कर उन से निपटा जाए और भविष्य में इस तरह के साजिश करने वालों से देश सुरक्षित रहे।

अवधेश कुमार,ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 1100 92, मोबाइल 98210 27208



रविवार, 19 जून 2022

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने 195 बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नई सोच संस्था की ओर से 195 बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई। संस्था की ओर से हर बार की तरह इस बार भी पल्स पोलियो टीकाकरण कैम्प लगाया गया जिसमें 195 बच्चों ने पोलियो की दवा पी।   यह कैम्प संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की जनता क्लीनिक बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क में लगाया गया। कैम्प में बच्चों को पोलियो की ड्राप्स सुबह 9 बजे से ही पिलाई जाने लगी थी और शाम 4 बजे तक 195 बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाई गई। संस्था के पदाधिकारियों और सदस्यों ने घर-घर जाकर लोगों को पोलियो ड्राप्स पिलाने के लिए प्राोरित किया और पोलियो की ड्राप्स न पिलाने के नुकसान बताए। संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन ने कहा कि संस्था हमेशा हर तरह के राष्ट्रीय प्रोग्राम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है और बीच-बीच में जनता को भी इन प्रोग्रामों के प्रति जागरूक करती है। संस्था के सदस्यों ने आज पूरी दिन लोगों के घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो केंद्र पर 0-5 वर्ष के बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाने के लिए कहा। संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज ने कहा कि सरकार द्वारा चलाई जा रही मुहिम को हम जनता तक पहुंचा रहे हैं। आज पोलियो जड़ से खात्मे की ओर जा चुका है दूसरी बीमारियों पर भी सरकार जल्द कामयाबी हासिल कर लेगी और कुछ बीमारियों पर कामयाबी हासिल कर चुकी है। संस्था के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी ने कहा कि हमारी पूरी कोशिश रहती है कि हम लोगों की मदद करते रहें क्योंकि दूसरों की मदद करने में जो सुकून मिलता है वह और किसी दूसरे काम में नहीं मिलता।  समाजसेवी अब्दुल खालिक ने कहा कि लोगों को अपने बच्चों को हमेशा सरकार के कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए चाहे वह कोई भी हो और यह तो बच्चों के जीवन से जुड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि लोग आज भी बच्चों को पोलियो की दवा नहीं पिलाते हैं जो कि गलत है। इस अवसर पर संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन, संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मौ. रियाज, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी, सदरे आलम, आजाद, मौ. सज्जाद, शान बाबू, इरफान आलम, यामीन, मो. मुन्ना अंसारी, अब्दुल रज्जाक, मो. सलीम आदि मौजूद थे।


इस मुल्क में हर शख़्स परेशान सा क्यों है?

तनवीर जाफ़री

सरकार की विवादित सैन्य भर्ती योजना 'अग्निपथ' के विरोध में देश के 15 राज्यों के युवा सड़कों पर उतर आये हैं। इनमें पंजाब,हरियाणा,उत्तराखंड,उत्तर प्रदेश,बिहार से लेकर तेलंगाना तक के राज्य शामिल हैं। आंदोलनकारियों द्वारा दुर्भाग्यवश पूरे देश में अब तक 11 ट्रेन्स जलाई जा चुकी हैं। इस आंदोलन से अब तक 370 से अधिक ट्रेन प्रभावित हुई हैं जबकि 369 ट्रेन्स रद्द किये जाने की ख़बर है। एक ट्रेन का औसतन मूल्य 68 करोड़ रूपये आता है इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सरकार की अग्नि पथ योजना की घोषणा देश को कितना मंहगी साबित हो रही है। बिहार में कई ज़िलों में इंटरनेट बंद किये जाने की भी ख़बर है। कई विद्यार्थी जिन्हें इस विवादित योजना के चलते अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा था दुर्भाग्यवश वे आत्म हत्या तक कर चुके हैं। गोया देश का वह किसान पुत्र युवा जो सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा करने से लेकर अपने व अपने परिवार के उज्जवल भविष्य के सपने संजोय रहता था उसे इस योजना के कारण अपना भविष्य अंधकारमय नज़र आने लगा है। केवल विपक्षी दल ही नहीं बल्कि देश के अनेक पूर्व सैन्य अधिकारी व सैन्य विशेषज्ञ भी इस विवादित योजना की आलोचना कर रहे हैं।

परन्तु ठीक किसान आंदोलन की ही तरह सरकार ने अपने मंत्रियों,मुख्यमंत्रियों व पार्टी नेताओं की पूरी फ़ौज 'अग्निपथ योजना ' के समर्थन में  योजना का गुणगान करने के लिये उतार दी है। गृह मंत्री जहां युवाओं को यह कहकर आश्वस्त कर रहे हैं कि सेना में चार वर्ष सेवा दे चुके अग्निवीरों को अर्ध सैनिक बलों में प्राथमिकता के आधार पर भर्ती किया जायेगा। गृह मंत्रालय के अनुसार अग्निवीरों को सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स अर्थात सीएपीएफ व असम राइफल्स में 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा। वहीं उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,असम, हिमाचल प्रदेश  हरियाणा व उत्तराखंड समेत कई भाजपा शासित राज्य सरकारों के मुख्यमंत्री भी आंदोलन कारी छात्रों को यह आश्वासन दे रहे हैं कि 'अग्निवीरों ' को राज्य पुलिस व अन्य विभागों में भर्ती में प्राथमिकता दी जाएगी। परन्तु अग्निपथ योजना के विरोध में उपजे इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आख़िर क्या वजह है कि भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में बनीं कई ऐसी योजनाएं जिनका राष्ट्रीय स्तर पर विरोध हुआ देश के लोगों में बेचैनी पैदा हुई,भारी सरकारी नुक़सान हुआ,परन्तु सरकारी पक्ष उन विवादित योजनाओं की पैरवी व उनका गुणगान करता रहा ?

मिसाल के तौर पर नोटबंदी की योजना जिसने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी। देश के बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों ने इसका विरोध किया था। उस समय भी सरकार के सिपहसालार नोटबंदी के फ़ायदे बताते फिर रहे थे।जैसे कश्मीर में आतंकवाद काम होगा,नक्सलवाद नियंत्रित होगा,काला धन बाहर आयेगा आदि। परन्तु आज देश की अर्थ व्यवस्था का बुरा हाल है। कैशलेस इकोनॉमी जिसका ढिंढोरा पीटा जा रहा था न जाने कहाँ चली गयी। उल्टे स्विस बैंक में भारतीयों का पैसा 50 प्रतिशत बढ़कर 14 वर्षों के उच्तम स्तर पर पहुँच गया। हाँ इस नोटबंदी ने सरकार के कुछ अघोषित व गुप्त एजेंडे ज़रूर पूरे किये जिससे सत्ता समर्थकों को भारी लाभ व विपक्षियों को नुक़सान हुआ। देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने की शर्त पर इस तरह की योजना आख़िर कैसे सही कही जा सकती है? इसी प्रकार सरकार की सी ए ए और एन आर सी नीति को लेकर दिल्ली से आसाम तक आंदोलन हुये। लाखों लोगों द्वारा इसका विरोध लंबे समय तक किया जाता रहा। इसके बाद सरकार तीन विवादित कृषि क़ानून लेकर आ गयी। हज़ारों करोड़ रूपये सरकार ने इन कृषि क़ानूनों का 'क़सीदा ' पढ़ने के लिये जारी विज्ञापनों में ख़र्च कर दिए।सरकार कहती रही कि यह तीनों कृषि क़ानून किसानों के लिये हितकारी हैं। जबकि किसानों का कहना था कि यह क़ानून किसानों के हित के लिये नहीं बल्कि चंद सत्ता शुभचिंतक उद्योगपतियों को फ़ायदा पहुँचाने के लिये हैं। लगभग 700 किसानों की क़ुर्बानी देकर तेज़ धूप,मूसलाधार बारिश और हांड कंपकंपाने वाली ठण्ड में भी किसान, सरकार के इन क़ानूनों के विरुद्ध दिल्ली की सीमाओं पर डटा रहा। और आख़िरकार सरकार को 13 महीने चले किसान आंदोलन के सामने घुटने टेकने ही पड़े। सरकार के इन विवादित क़ानूनों के चलते भी देश को हज़ारों करोड़ का नुक़सान उठाना पड़ा।

अब एक बार फिर सरकार एक और विवादित अग्निपथ सैन्य भर्ती योजना लेकर आयी है। सरकार जहाँ इस योजना के और भी कई लाभ गिना रही है वहीं एक फ़ायदा यह भी बता रही है कि अग्निपथ योजना से सेना में बढ़ते हुए वेतन और पेंशन पर होने वाले भारी भरकम ख़र्च में कमी आएगी। ज़ाहिर है जब सैनिक अपनी निर्धारित सैन्य सेवा पूरी नहीं करेगा तो सरकार द्वारा उसे पेंशन देने,अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ देने या उसका वेतन बढ़ाने का ज़िम्मा भी सरकार का नहीं होगा। पेंशन न देने और सैलरी न बढ़ने पर पैसे की काफ़ी बचत होगी जो सैन्य आधुनिकीकरण पर ख़र्च होगी । जबकि आंदोलनकारी छात्र सरकार के इस तर्क को ख़ारिज करते हुए कह रहे हैं कि जो सरकार नेताओं की पेंशन बंद नहीं करती,जो सरकार उद्योगपतियों के हित के फ़ैसले लेती रहती है। भारत ही नहीं विदेशों में भी उनके हित में सिफ़ारिशें करती फिरती है। उसे अपने ही देश का भविष्य समझे जाने वाले युवाओं को स्थायी नौकरी देने में किस बात की हिचकिचाहट है। जो सरकार नया संसद भवन बनवा रही हो,सरदार पटेल की दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा बनवाती हो,प्रधानमंत्री के लिये अत्याधुनिक विशेष विमान ख़रीद सकती हो क्या उसके पास अपने ही देश के उन युवाओं को तनख़्वाह व पेंशन देने के लिये पैसे नहीं जो अपनी जान को हथेली पर रखकर देश की सीमाओं के प्रहरी बनकर देश की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं ?

सरकार को चाहिये कि वह अपने अघोषित एजेंडे लागू करने की ख़ातिर देश के युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करना बंद करे। जो सरकार देश के युवाओं और किसानों के उज्जवल भविष्य के बारे में नहीं सोच सकती उसे जनहितकारी सरकार कैसे कहा जा सकता है। सरकार का फ़र्ज़ तो यह है कि वह अपने शुभचिंतक उद्योगपतियों के हित से पहले देश के युवाओं की समृद्धि व उनके उज्जवल भविष्य के बारे में सोचे व उसके अनुरूप नीतियां बनाये। देश के युवाओं व किसानों का मनोबल टूटने का मतलब है देश का मनोबल टूटना। डॉलर के सामने भारतीय मुद्रा की ऐतिहासिक गिरावट,कमर तोड़ मंहगाई,पेट्रोल डीज़ल गैस के बढ़ते मूल्य,बेरोज़गारी की इन्तहा,आये दिन बेरोज़गारों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं,देश में फैलता जा रहा सांप्रदायिक व जातिवादी वैमनस्य जैसी अनेक बातें पहले ही सरकार की नीयत,नीति व कार्यक्षमता की पोल खोल चुकी हैं। ऐसे में युवाओं की बेचैनी सरकार की एक और बड़ी नाकामी उजागर कर रही है। सरकार की इसतरह की 'कारगुज़ारियों' से एक बार फिर यही सवाल उठता है कि  आख़िर 'इस मुल्क में हर शख़्स परेशान सा क्यों है' ?

                                                                            तनवीर जाफ़री 

शनिवार, 18 जून 2022

विरोध और हिंसा के पीछे कौन है

अवधेश कुमार

निस्संदेह, इससे भयावह परिदृश्य देश के लिए शायद ही कुछ होगा। जुम्मे की नमाज के बाद कई राज्यों में एक साथ जिस तरह उग्र हिंसक प्रदर्शन हुए उसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। जो कुछ हुआ वह सबके सामने है। इसलिए उसे दोहराने की जरूरत नहीं। जब भी इस तरह का हिंसा होती है हर विवेकशील भारतीय सोचता है कि इस समय हमारा दायित्व सबसे पहले देश में शांति स्थापित करना है। निंदा, आलोचना और विरोध बाद में कर लेंगे पहले देश को बचाना जरूरी है । जाहिर है, ऐसे समय हमेशा शांति , सद्भावना तथा मेल मिलाप की बात को ही प्राथमिकता दी जाती है और यह सही है । किंतु अगर कुछ समूह, संगठन या लोग हर दृष्टि से सक्रिय हो कि यहां अशांति और उपद्रव पैदा करना है तो शांति और सद्भाव की भाषा सफल नहीं होती। यह प्रयास तभी सफल होग जब समूची स्थिति को ठीक से समझा जाए। लोकतांत्रिक देश में सबको किसी मुद्दे पर अपना विरोध प्रकट करने का अधिकार है। किंतु विरोध हमेशा क्यों ,कब और कैसे के साथ आबद्ध रहना चाहिए। जुम्मे की नमाज के बाद मस्जिदों से निकलकर किए गए विरोध प्रदर्शन ज्यादातर जगह डरावने थे। अनेक जगह जिस तरह की हिंसा हुई उनसे साफ हो गया कि विरोध नियोजित करने वाले के इरादे कुछ और थे और हैं। धीरे धीरे सच सामने आ भी रहा है। यह बात सामान्य लोगों के गले नहीं उतरती कि विरोध प्रदर्शन के लिए जुम्मे का दिन और नमाज के बाद का समय ही क्यों चुना गया होगा?

देश के अनेक हिस्सों में एक ही समय एक साथ एक ही तरह के प्रदर्शन स्वतः स्फूर्त नहीं हो सकते। निश्चित रूप से इसके पीछे योजना थी। कुछ समूह, संगठन और लोग निश्चित रूप से इसकी योजना बना रहे होंगे। इतने क्षेत्रों में ये बातें कैसे और क्यों पहुंची होंगी यह प्रश्न भी मायने रखा जाना चाहिए। टेलीविजन डिबेटों में बैठने वाले अनेक मुस्लिम चेहरे बता रहे हैं कि मुसलमान सब कुछ सहन कर लेगा लेकिन अपने नबी का अपमान नहीं सहेगा। इस तरह की सोच इसलिए दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि हिंदुओं के अंदर दूसरे मजहब के या उनके संस्थापकों- पैगंबरों के बारे में हमेशा सम्मान का भाव रहा है। अपमान की तो सोच भी नहीं सकते।  टेलीविजन डिबेट में भाजपा की एक प्रवक्ता द्वारा की गई टिप्पणी को इन सबका कारण बताया जा रहा है। किसी सभ्य समाज का तकाजा यही है कि अगर कोई टिप्पणी आपको गलत लगता है तो उसका जवाब तथ्यों और तर्कों से दिया जाए। अगर भारत के कानून का उसमें उल्लंघन है तो कानूनी एजेंसियों को कार्रवाई करने दी जाए। कानूनी एजेंसियां कार्रवाई नहीं करतीं तो आपके पास न्यायालय में जाने का रास्ता खुला हुआ है। न्यायालय भी अंततः कानूनी दायरे में ही कार्रवाई करेगा। यहां समस्या यह है कि एक ओर तो ये संविधान और कानून की बात करते हैं, न्यायालयों में विश्वास प्रकट करते हैं, लेकिन दूसरी ओर स्वयं देश को भयभीत करते हैं। आखिर इस तरह के विरोध प्रदर्शनों का लक्ष्य क्या हो सकता है? यही न कि आक्रामक उग्र प्रदर्शनों से सरकार, पुलिस, प्रशासन और गैर मुस्लिमों को डराया जाए? संदेश दिया जाए कि हमारे विरुद्ध किसी प्रकार की कार्रवाई हुई तो हम देश में उथल-पुथल मचा देंगे?

अगर लोकतंत्र का किंचित भी सम्मान इनके मन में होता तो इस तरह जुम्मे की नमाज के बाद आक्रामक और विरोध प्रदर्शन नहीं होते, आपत्तिजनक नारे नहीं लगाए जाते, हिंसा नहीं होती। लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन में किसी भी प्रकार के आरोप या अपराध के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की निर्धारित प्रक्रिया है। प्राथमिकी दर्ज हो गई है तो प्रक्रिया के हिसाब से कार्रवाई होगी। गिरफ्तारी का मूल मकसद यही है कि आरोपी बाहर रहा तो वह साक्ष्यों को नष्ट कर सकता है, छेड़छाड़ कर सकता है। इस मामले में सबूत छिपाने, नष्ट करने या छेड़छाड़ करने का प्रश्न ही नहीं है क्योंकि जो बोला गया और लाइव डिबेट का हिस्सा है और उसके वीडियो हर जगह उपलब्ध है। बावजूद पुलिस या न्यायालय को आवश्यक लगा तो गिरफ्तारी भी हो सकती है। कानूनी प्रक्रिया हिंसा के दबाव में तो नहीं बदल सकती।

ध्यान रखने बात है कि अगर मुसलमानों में इतना गुस्सा था तो डिबेट के दो-चार दिनों के अंदर विरोध विरोध प्रदर्शन होना चाहिए। घटना के 17 दिनों बाद प्रदर्शन का मतलब है कि कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाने वाली बात है। डिबेट के बाद दो जुम्मे के नमाज भी निकल गए। साफ है कि भाजपा प्रवक्ता के टीवी डिबेट के उस हिस्से को बहाना बनाया गया। असल मकसद कुछ और है। वास्तव में मुसलमानों के अनेक बड़े चेहरों का अस्तित्व भाजपा, संघ यहां तक कि हिंदुओं से भय बनाए रखने पर टिका है। वे ऐसे अनेक समूहों संगठनों व्यक्तियों से रिश्ता रखते हैं जो सामने नहीं दिखते। पिछले काफी समय से दुष्प्रचार किया जा रहा है कि मुसलमानों की सारी मस्जिदें छीन जाएगी, एक दिन उनके लिए अपने मजहब का पालन करना संभव नहीं रहेगा, नमाज नहीं पढ़ सकेंगे, रोजा नहीं रख सकेंगे आदि आदि। ज्ञानवापी मामला उभरने के बाद हमने देखा कि मजहबी राजनीतिक मुस्लिम नेताओं ने कैसी आग लगाने वाली भाषायें बोली है। असदुद्दीन ओवैसी ने सिर पर सफेद कपड़ा बांध लिया जो कफन का प्रतीक है। 

कानपुर के एक मौलाना ने कहा कि सिर पर कफन बांध कर निकलेंगे। देवबंद में जमीयत ए उलेमा ए हिंद के सम्मेलन में पारित प्रस्ताव व भाषण उत्तेजित करने वाले थे। दुष्प्रचार यह  किया गया है कि मोदी और योगी सरकार जानबूझकर ज्ञानवापी मामले को सामने लाई है जबकि पूरा मामला ही न्यायालयों के कारण आया है। यह भी दुष्प्रचार हो रहा है कि धीरे-धीरे सारे प्रमुख मस्जिदों पर ये दावा करेंगे कि यह पहले हिंदू मंदिर था। मुसलमानों के अंदर या भावना तीव्रता से पैदा करने की कोशिश हुई है कि अगर उठकर लड़ने मरने को तैयार नहीं हुए तो तुम और तुम्हारा मजहब दोनों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। उत्तर प्रदेश में ये लोग भाजपा के पराजय की कामना कर रहे थे।  इसके उलट योगी आदित्यनाथ फिर मुख्यमंत्री बन गए। रमजान के महीने में एक भी नमाज सड़क पर नहीं हुआ। मुस्लिम नेता सड़कों पर नमाज को भी सरकार एवं प्रशासन पर दबाव के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। मुसलमानों को बताया जाता था कि सड़क पर उतरने से तुम्हारी संख्या बहुत ज्यादा दिखती है और इसका असर नेताओं व प्रशासन पर होगा। सड़क से हटाने का मतलब तुमको कमजोर बना देना है। यह समय है कि उठो सड़कों पर उतरो और अपने अस्तित्व बचाने के लिए लड़ाई लड़ो अन्यथा भाजपा की सरकारें हमें कहीं का नहीं रहने देंगी। इससे आम मुसलमानों में भय और आशंका पैदा होना स्वभाविक है।

निश्चित रूप से इस तरह का भाव पैदा करने के साथ कोई संगठन ,समूह , व्यक्तियों का समूह इसकी तैयारी में सक्रिय था। एक ही समय में देश के 11 राज्यों में जुम्मे की नमाज के बाद मस्जिदों के बाहर प्रदर्शन बगैर बड़ी तैयारी के संभव ही नहीं थी। जगह जगह पत्थरबाजी और तोड़फोड़ एकाएक हुए प्रदर्शन में संभव नहीं। प्रयागराज में तो बम तक चले। पश्चिम बंगाल में कई दिनों तक हिंसा होती रही है। मुस्लिम समुदाय के अंदर से ही कुछ संगठन और व्यक्तियों के नाम सामने आ रहे हैं। पुलिस की कार्रवाई से भी काफी सच सामने आ रहा है। उत्तर प्रदेश में इनके विरुद्ध कानून की सख्ती से काफी लोग पकड़े गए हैं । आने वाले समय में इसका भी खुलासा होगा कि किन-  किन स्रोतों से इसके लिए धन आया किन्हें किस तरह मिला। या राज्यों के पुलिस प्रशासन की जिम्मेवारी है कृषक सामने लाए और दोषियों के विरुद्ध इस तरह की कार्रवाई हो कि आगे ऐसा अपराध करने की कोई सोचे तक नहीं। इन्हें समझना पड़ेगा कि भारत में मुसलमानों की संख्या 2 देशों के बाद सबसे ज्यादा है लेकिन हम इस्लामी मुल्क नहीं है कि ईशनिंदा जैसा कानून बना दें। हमारे यहां फार्म और पंथ के अंदर भी बाहर और विमर्श की परंपरा है। हिंदू धर्म के देवी देवताओं के विरुद्ध ना जाने कितनी अपमानजनक टिप्पणियां पुस्तकों में भरी है। पता चलने पर उनका विरोध भी होता है पर ऐसी नौबत कभी नहीं आई की भारी संख्या में लोग सड़कों पर उतर कर हिंसा और उत्पात कर दें। लेकिन प्रश्न है कि जो इस तरह के विवेक सम्मत बार किया उत्तर सुनने को ही तैयार नहीं उनके साथ क्या किया जाए?

अवधेश कुमार को,ई 30 ,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 1100 92, मोबाइल 98110 27208

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