गुरुवार, 17 मार्च 2022

कांग्रेस के मटियामेट होने की जिम्मेदारी किसकी

अवधेश कुमार

कांग्रेस पार्टी ऐसी दशा में पहुंच गई है जहां उसके घोर समर्थक भी कहते हैं कि उस पर चर्चा के अब कोई मायने नही। पांच राज्यों के चुनावों में फिर मटियामेट होने के बाद कांग्रेस के पास कहने के लिए ऐसा कुछ नहीं है जिससे किसी तरह की उम्मीद जग सके। सोनिया गांधी परिवार के घोर समर्थक और उनके लिए मोर्चा लेने वाले भी कह रहे हैं कि इन्हें पार्टी से ही नहीं राजनीति से अलग कर लेना चाहिए ताकि कांग्रेस खड़ा होने का अवसर प्राप्त कर सके। यानी इन सबकी दृष्टि में कांग्रेस के पुनर्जीवित व पुनर्गठित होने में सबसे बड़ी बाधा परिवार ही है। निश्चित रूप से सभी इससे सहमत नहीं होंगे किंतु यह प्रश्न तो उठेगा ही कि अगर आज कोई सक्षम कार्यकर्ता या नेता या कार्यकर्ताओं- नेताओं का समूह कांग्रेस को नए सिरे से खड़ा करने के लिए सामने आए तो क्या उसे ऐसा अवसर मिलेगा? 

कह सकते हैं कि ऐसा कोई व्यक्ति तो दिख नहीं रहा। ऐसा व्यक्तित्व कौन है इसका फैसला कैसे होगा? कोई कोशिश करेगा तभी तो उसकी प्रतिभा और क्षमता का पता चलेगा। क्या अभी कांग्रेस में ऐसी कोशिश करने वाले को स्वतंत्रता और समर्थन मिलने की गुंजाइश है?इसी प्रश्न के उत्तर में कांग्रेस का अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों निहित है। पांचों राज्यों में रणनीति बनाने से लेकर उम्मीदवारों के चयन व नेतृत्व का चेहरा तय करने आदि का नियंत्रण किनके हाथों में था? इसके उत्तर में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा का नाम लेने में किसी को मिनट भर भी देर नहीं लगेगी। उत्तर प्रदेश की पूरी कमान प्रियंका वाड्रा के हाथों थी तो राहुल गांधी पांचो राज्यों के मुख्य प्रचारक। निश्चित रूप से सोनिया गांधी अपनी अस्वस्थता के कारण सामने नहीं आ सकती लेकिन हर फैसले और विमर्श में उनकी भूमिका रही होगी। दुर्भाग्य यह है कि जब भी कोई गंभीरता से कांग्रेस के हित की दृष्टि से परिवार के अलग होने का सुझाव देता है तो उन्हें सीधे कांग्रेस विरोधी और किसी न किसी पार्टी का समर्थक या अन्य तरह के आरोपों से लाद दिया जाता है। जरा सोचिए, उत्तराखंड में हर 5 वर्ष पर सत्ता बदलने की परंपरा रही है। इस नाते कांग्रेस के पास पूरा अवसर था। वहां कांग्रेस ही मुख्य विपक्ष थी। बावजूद उसकी ऐसी दशा हो गई कि मुख्यमंत्री के उम्मीदवार हरीश रावत तक चुनाव हार गए। इसी तरह मणिपुर में लगातार तीन बार सत्ता में रहने के बाद 2017 में भाजपा से ज्यादा सीटें रहने के बावजूद वह।सरकार नहीं बना पाई और इस बार उसकी दशा जद यू और एनपीएफ की तरह हो गई। कांग्रेस को जद यू और एनपीएफ के समान 5 सीटें मिली हैं। इनसे ज्यादा एनपीपी ने 7 सीटें प्राप्त की है। भाजपा को 32 सीटें तथा 37.83% मत मिला है तो कांग्रेस को केवल 16.83%। एनपीपी को 17.29% वोट मिला। यानी कांग्रेस वहां अब भाजपा के बाद दूसरे स्थान पर भी नहीं है। जो विधायक जीत कर आए हैं वो कितनी देर तक कांग्रेस के साथ रहेंगे यह भी नहीं कहा जा सकता। संभव है आने वाले दिनों में विधानसभा में कांग्रेस का नाम लेवा इस विधानसभा में ना रहे ।गोवा में भी उसके पास अवसर था लेकिन कांग्रेस 11 सीटों तक सीमित हो गई जबकि भाजपा 20 स्थान पाने में कामयाब रही। कांग्रेस के शीर्ष चेहरा पी चिदंबरम वहां जमे हुए थे। वे भी कुछ न कर सके। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इसके बाद फिर कांग्रेस इन राज्यों में खड़ी हो पाएगी?

 पंजाब में कांग्रेस इसके पहले कभी 18 सीटें और 22.98 प्रतिशत मत के निचले स्तर पर नहीं गई। जिसे परिवार ने मुख्यमंत्री बनाया वही दोनों स्थानों से चुनाव हार गए। जिसे अध्यक्ष बनाया वह भी गए। अकाली दल और भाजपा के गठबंधन टूटने तथा अमरिंदर सिंह के बाहर निकलने के बाद कुछ विशेष न कर पाने की हालत में कांग्रेस के पास सत्ता में वापसी का पूरा अवसर था। लेकिन आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को धूलधुसरित कर दिया। सच कहा जाए तो कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को इतनी बड़ी जीत थाली में सौंप कर दे दी। उत्तर प्रदेश के बारे में कह सकते हैं कि  वहां कांग्रेस है ही नहीं। हालांकि यहां भी प्रश्न उठेगा कि क्यों नहीं है। कितने राज्यों में कहा जाएगा कि कांग्रेस है ही नहीं? कल कहा जाएगा कि बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, दिल्ली आदि में तो कांग्रेस है ही नहीं। आखिर इन राज्यों की राजनीतिक मुख्यधारा से कांग्रेस गायब किसके काल में हुई और क्यों हुई? सोनिया गांधी के हाथों जब कांग्रेस का नेतृत्व आया तो इन सारे राज्यों में वह सशक्त थी। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, दिल्ली और उड़ीसा में मुख्य ताकत थी। यही सच्चाई बताती है कि कांग्रेस की वर्तमान दशा एक-दो दिन की नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस के सिमटते जाने की प्रक्रिया लगातार बढ़ती रही और उसे रोकने में नेतृत्व कामयाब नहीं हुआ। यह बात सही है कि कांग्रेस के पतन की शुरुआत बरसों पहले हो चुकी थी और 2004 एवं 2009 में परिस्थितिवश वह सत्ता में आ पाई। लेकिन जहां तक आए वहां से संभाल कर रखने और उसे सशक्त करने की जिम्मेवारी नेतृत्व की ही थी। सोनिया गांधी शीर्ष नेतृत्व पर थी। सरकार के प्रधान मनमोहन सिंह थे लेकिन सत्ता और राजनीति का पूरा सूत्र सोनिया गांधी के हाथों केंद्रित था। इसलिए पूरी दुर्दशा की जिम्मेवारी किसके सिर जाएगी? पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को बाहर करने, सिद्धू को अध्यक्ष बनाने, उनके सारे आत्मघाती बयानों को सहन करने तथा चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने जैसे निर्णयों के पीछे किसी तरह की स्वीकार्य तार्किकता दिखाई देती है? इसके पीछे कोई एक कारण था तो यही कि अमरिंदर सोनिया परिवार के विरोधी न होते हुए भी संपूर्ण रूप से निष्ठावान नहीं हो सकते थे। सिद्धू परिवार को महत्व देते थे और चन्नी निष्ठावान फुल। अगर लक्ष्य कांग्रेस की मजबूती की जगह परिवार की सुरक्षा हो जाए तो पार्टी की यही दशा होगी। यह कोई एक जगह की बात नहीं है । आप पिछले ढाई दशक के अंदर केंद्र से राज्यों तक पार्टी में सामने आए चेहरों पर नजर दौड़ाइये पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी।

इस समय कांग्रेस लगभग नष्ट होने की कगार पर है। जहां भी कांग्रेस है वहां ज्यादातर पार्टियां उसे निगल जाने के लिए प्रयासरत है। तृणमूल कांग्रेस पहले आगे थी। अब आम आदमी पार्टी भी सामने है। दिल्ली और पंजाब के बाद उसका निशाना हरियाणा और कर्नाटक है। वह गुजरात में भी कोशिश करेगी और गोवा में अगले चुनाव तक किसी तरह कांग्रेस का नामोनिशान मिटा देने के लिए काम करेगी। तृणमूल पश्चिम बंगाल में साफ करने के बाद पूर्वोत्तर के राज्यों से कांग्रेस की अंत्येष्टि का पूरा आधार तैयार कर चुकी है। अभी तक सोनिया गांधी परिवार और उनके रणनीतिकारों की ओर से एक ऐसा बयान नहीं आया जिससे पता चले कि इन पार्टियों का ग्रास बनने से कांग्रेस को बचाने की सोच तक इनके पास है। यह बात समझ से परे है कि कि सोनिया गांधी , राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा तथा उनके समर्थकों को इसका आभास नहीं कि जब पार्टी खत्म हो जाएगी तो परिवार की हैसियत कुछ नहीं रहेगी। क्यों नहीं पार्टी में नया नेतृत्व या नेतृत्व मंडली विकसित करने की पहल हो रही है? राहुल गांधी ने त्यागपत्र दे दिया लेकिन बिना पद के ही संपूर्ण नीति निर्धारण का सूत्र उनके हाथों सीमित रहेगा। सोनिया गांधी प्रवास तक करने की स्थिति में नहीं लेकिन कार्यकारी अध्यक्ष तब तक वो रहेंगी जब तक राहुल गांधी के सिर सेहरा नहीं बंध जाता। जो नेता इसके विरुद्ध असंतोष प्रकट कर रहे हैं या बयान दे रहे हैं वह भी खुलकर सामने नहीं आते। अगर वे सब कांग्रेस को बचाना चाहते हैं तो उन्हें खुलकर विद्रोह करना चाहिए तथा समानांतर कांग्रेस बनाकर नए सिरे से पुनर्रचना और पुनर्गठन के लिए जी जान लगाना चाहिए। जिन्हें कांग्रेस के पतन की पीड़ा और उसको बचाने की छटपटाहट है उनके सामने इसके अलावा कोई विकल्प नहीं। ऐसा कोई करता नहीं दिख रहा है इसलिए इस समय  कांग्रेस के उठकर खड़े होने की किसी तरह की उम्मीद करना हास्यास्पद हो जाएगा।

अवधेश कुमार,ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल -98110 27208

बुधवार, 16 मार्च 2022

कश्मीर फाईल्स‘ का उपयोग समाज को विभाजित करने के लिए न करें: एल. एस. हरदेनिया

फिल्में स्वस्थ मनोरंजन का स्त्रोत होती हैं। उनका उपयोग समाज को विभाजित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए जैसा कुछ लोग 'द कश्मीर फाईल्स'के मामले में कर रहे हैं। विभाजित और ध्रुवीकृत समाज विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा होता है।

ऐसे समाज में न तो गरीबी का अभिशाप कम होता है, न ही शिक्षा के मंदिरों के पट खुल पाते हैं और ना ही स्वास्थ्य की सुविधाओं में इजाफा होता है। हां, चुनाव जरूर जीता जा सकता है।

इसलिए 'द कश्मीर फाईल्स'का उपयोग समाज में तनाव पैदा करने के लिए न करें। अंत में यह कहना चाहूंगा कि मध्यप्रदेश सरकार ने पुलिसकर्मियों को 'द कश्मीर फाईल्स'देखने के लिए एक दिन का अवकाश देने की घोषणा की है। काश गांधीफिल्म देखने के लिए एक दिन की छुट्टी दी जाती तो कितना अच्छा होता। 
(एल  एस हरदेनिया संयोजक, राष्ट्रीय सेक्युलर मंच एवं अध्यक्ष कौमी एकता ट्रस्ट द्वारा जनहित में जारी  मोबाईल 09425301582)

 

शनिवार, 12 मार्च 2022

चुनाव परिणामों का सच यही है

अवधेश कुमार

जिन लोगों ने पांच राज्यों में अलग चुनाव परिणामों की उम्मीद लगा रखी थी निश्चित रूप से उन्हें आघात लगा है। हमारे समाज में अग्रिम मोर्चे पर खड़े ऐसे लोगों की संख्या काफी है जो धरातल की वास्तविकता की बजाय अपनी सोच के अनुरूप जन मनोविज्ञान की कल्पना कर लेते हैं। इस समूह का मानना था कि पांच में से चार राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं ,इसलिए प्रदेश के साथ केंद्र सरकार के दोहरे विरोधी जन मनोविज्ञान का सामना करना होगा।  इसके साथ इनका विश्लेषण यह भी था कि केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकारों ने नीतियों और वक्तव्यों में हिंदुत्व पर जैसी  प्रखरता दिखाई है उससे मुसलमानों और ईसाइयों के साथ पढ़ा-लिखा वर्ग भी नाराज है। इस तरह उसे तीन प्रकार के सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना है और उसकी सरकारों का जाना निश्चित है। चुनाव परिणामों ने फिर एक बार इन्हें पूरी तरह गलत साबित कर दिया है। हालांकि चुनावी अंकगणित के आधार पर अभी भी ये अपनी हवाई कल्पनाओं को सही साबित करने के लिए अलग-अलग तरह के तर्क और तथ्य दे रहे हैं। हम और आप जानते हैं कि ये सारे तथ्य और तर्क खोखले हैं जिनका वास्तविकता से लेना-देना नहीं।

उत्तर प्रदेश को लीजिए तो तीनों श्रेणी का सत्ता विरोधी रुझान सबसे ज्यादा यही होना चाहिए। आखिर हिंदुत्व का सर्वाधिक मुखर प्रयोग इसी राज्य में हुआ। अल्पसंख्यकों में मुसलमानों तथा भाजपा विरोधियों की सर्वाधिक संख्या यही थी। भाजपा के विरुद्ध प्रचार करने वाली गैर दलीय ताकतें भी यहां सबसे ज्यादा सक्रिय थीं। यह वातावरण बनाया गया था कि भाजपा को पराजित करना है तो एकजुट होकर बिना आगा पीछा सोचे सपा के पक्ष में मत डाला जाए। हुआ भी यही। बसपा की कमजोर उपस्थिति के कारण भाजपा विरोधी मतों का ध्रुवीकरण सपा के पक्ष में हुआ। सपा को प्राप्त मतों और सीटों में वृद्धि का मूल कारण यही है। उसके पक्ष में सकारात्मक के बजाय भाजपा हराओ मानसिकता का नकारात्मक मत ज्यादा है। दूसरी ओर भाजपा के पक्ष में सकारात्मक मत ज्यादा है। दरअसल, हिंदुत्व और उस पर आधारित राष्ट्रीयता के साथ केंद्र और प्रदेश सरकारों द्वारा समाज के वंचित तबकों के हित में किए गए कार्य, उनको पहुंचाए गए लाभ, अपराध नियंत्रण के कारण कायम सुरक्षा स्थिति तथा नेतृत्व के रूप में केंद्र में नरेंद्र मोदी और प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति ने विरोधियों की कल्पनाओं को ध्वस्त कर दिया। नेतृत्व के स्तर पर इन दोनों के सामने कोई नेता टिकता ही नहीं था। प्रोफेशनलों, कारोबारियों ,महिलाओं ..सबके लिए सुरक्षा प्राथमिक चिंता का विषय था और इस कसौटी पर केवल भाजपा सरकार खरी उतरती थी। इसी तरह केंद्र और प्रदेश सरकार ने आम जन के पक्ष में कल्याणकारी कार्यक्रमों के साथ सिर पर छत, संकट काल में पेट में अन्न तथा जेब में थोड़े पैसे पहुंचाने की नीतियों से ऐसा बड़ा समर्थक समूह खड़ा कर दिया है जिसकी काट किसी के पास नहीं।

ये बातें भाजपा शासित सभी राज्यों में थोड़ा या ज्यादा लागू होतीं हैं। चाहे उत्तराखंड हो मणिपुर या गोवा सब जगह लाभार्थियों का एक बड़ा वर्ग तैयार हो चुका है। जितनी संख्या में लोगों को आवास इन सरकारों में मिले, बिजलियां पहुंचाई गई, किसानों के खाते में धन पहुंचा,गरीब मजदूरों के निबंधन के बाद खातों में धन पहुंचा तथा कोरना टीकाकरण हुआ उन सबसे सरकारों की सकारात्मक छवि बनी। उत्तराखंड में लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी का रिकार्ड बना देना असाधारण है। भाजपा ने तीन मुख्यमंत्री बदले और उसकी छवि पर इसका असर हुआ लेकिन दूसरी ओर इससे पार्टी के अंदर का असंतोष दूर हो गया। पार्टी के अंदर असंतोष नहीं हो तो लड़ाई जीतना आसान होता है। पार्टी की भारी विजय के बावजूद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हालांकि स्वयं हार गए   लेकिन जितना कम समय मिला उसमें उनको लेकर प्रदेश  किसी तरह की नकारात्मक धारणा कायम नहीं हुई। भाजपा एकीकृत होकर चुनाव लड़ रही थी। जो छोटे-मोटे विद्रोह हुए उनका ज्यादा असर नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहाड और तराई के लिए विकास की जो कल्पना दी और केदारनाथ व अन्य धार्मिक स्थलों से लेकर तीर्थ यात्राओं के लिए जितना कुछ किया उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा। उत्तराखंड के लोगों के समक्ष भाजपा के सामने केवल कांग्रेस ही दूसरा विकल्प है। उत्तराखंड की स्थापना के बाद कोई भी सरकार लगातार दोबारा चुनाव में वापस नहीं आई। इसमें कांग्रेस के लिए उम्मीद थी। कांग्रेस उत्तराखंड के लिए भाजपा के समानांतर कोई ऐसा विज़न नहीं दे सकी जिससे जनता का आकर्षण उसकी ओर बड़े स्तर पर पैदा हो। हरीश रावत उत्तराखंड के लोगों के लिए जाने पहचाने नेता हैं लेकिन उन्हें ही एक समय अपनी पार्टी की अंदरूनी कलह से दुखी होकर ट्वीट करना पड़ा। केंद्रीय नेतृत्व इस अवस्था में नहीं कि उनकी कोई मदद कर सके। 

मणिपुर और गोवा दोनों राज्यों के चुनाव परिणामों से भी कुछ मुखर संदेश निकले हैं। मणिपुर में बहुमत प्राप्त करने का सर्वाधिक प्रमुख संदेश यही है कि भाजपा वहां स्थापित ताकत बन चुकी है। लगातार तीन बार सत्ता में रहने वाली कांग्रेस की दशा सबके सामने है। साफ है कि पूर्वोत्तर में अब भाजपा मुख्य ताकत है। पिछले चुनाव में केवल 21 सीट पाने वाली भाजपा पांच वर्ष तक सरकार चलाने में सक्षम इसलिए हुई , क्योंकि दूसरी पार्टियों के विधायक भी किसी से उम्मीद करते थे। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के लिए यह परिणाम आघात पहुंचाने वाला है ,क्योंकि कांग्रेस को निगलते जाने के कारण उसका मानना है कि वह पूर्वोत्तर की प्रमुख शक्ति होगी। साफ है कि मणिपुर उसके लिए पश्चिम बंगाल नहीं है। गोवा में पिछली बार भाजपा को केवल 14 सीटें मिली थी। कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा नहीं किया और ज्यादातर गैर कांग्रेसी विधायकों का रुझान भाजपा की तरफ था। इस बार मनोहर पर्रिकर जैसा नेता न होने के बावजूद लोगों ने अगर उसे 18 सीटें दी तो जाहिर है न सरकार के विरुद्ध रुझान था और न ही कांग्रेस सहित आम आदमी पार्टी या तृणमूल कांग्रेस को लेकर कोई आकर्षण। तृणमूल ने यहां भी कांग्रेस के नेताओं को शामिल कर अपने आपको राष्ट्रीय स्तर की पार्टी साबित करने की कोशिश की थी। चुनाव परिणामों ने उसके सपने को यहां भी धराशाई किया है।

पंजाब में भाजपा लंबे समय से बड़ी शक्ति नहीं रही है। अकाली दल के गठबंधन में उसे 23 विधानसभा और 3 लोकसभा सीटें ही लड़ाई के लिए मिलती रही है। इस कारण जनसंघ के समय एक ताकत होते हुए भी बाद में उसका राजनीतिक विस्तार पूरे प्रदेश में नहीं हो पाया। कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस से अलग तो हुए लेकिन उसे ज्यादा क्षति पहुंचाकर अपनी पार्टी को सक्षम बनाएं, लोगों के बीच जाकर माहौल बनाएं ऐसा अभियान उन्होंने नहीं चलाया। इसमें भाजपा, पंजाब लोक कांग्रेस तथा ढिंढसा के अकाली दल के गठबंधन के बेहतर करने की उम्मीद भी नहीं थी। भाजपा से अलग होने के बाद अकाली दल का एक बड़ा मत आधार कट गया। बसपा वहां अब इस स्थिति में नहीं कि दलितों का बड़ा वर्ग उसे अपनी पार्टी माने। दूसरी ओर  अंतर्कलह से जूझती हुई कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी विकल्प के रूप में उपलब्ध थी। हालांकि मतदान को लेकर पार्टियों के परंपरागत मतदाता के अंदर उत्साह नहीं था तभी तो 2007,  2012 और 2017 की तुलना में काफी कम वोट पड़े है। मोहाली जैसी जगह में नए मतदाताओं में से केवल 35% ने वोट डाला। हर चुनाव में सक्रिय रहने वाले अनिवासी पंजाबी भी इस बार चुनाव से दूर रहे। इस तरह पंजाब के चुनाव को कद्दावर नेताओं तथा उनके नेतृत्व वाली पार्टियों की अनुपस्थिति के कारण परिवर्तन की आकांक्षा वाली जनता द्वारा जो है उसमें से किसी को मत देने के विकल्प का परिणाम कहा जा सकता है। इसका तात्कालिक निष्कर्ष यह हो सकता है कि पंजाब अभी उपयुक्त राजनीतिक धाराओं की तलाश करेगा।

किसी दल, विचारधारा या नेताओं से वितृष्णा से परे हटकर निष्पक्षता से विश्लेषण करें तो इन पांच राज्यों ने देश के आम जन की सामूहिक सोच को प्रकट किया है। यह सोच साफ करती है कि भाजपा और उसके नेताओं की विचारधारा ,उप पर आधारित नीतियों ,जनकल्याणकारी संबंधी उनके कार्यक्रमों आदि को लेकर बनाई गई नकारात्मक और विपरीत धारणा का जमीन स्तर के यथार्थ से लेना देना नहीं है। उत्तर प्रदेश से लेकर पूरब में मणिपुर और समुद्र के किनारे गोवा जैसे आधुनिक जीवन शैली वाले प्रदेश की आवाज में कुछ एकता है तो इसकी ध्वनियों को जरा गहराई से समझने की आवश्यकता है।

अवधेश कुमार, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092



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