शनिवार, 12 मार्च 2022

चुनाव परिणामों का सच यही है

अवधेश कुमार

जिन लोगों ने पांच राज्यों में अलग चुनाव परिणामों की उम्मीद लगा रखी थी निश्चित रूप से उन्हें आघात लगा है। हमारे समाज में अग्रिम मोर्चे पर खड़े ऐसे लोगों की संख्या काफी है जो धरातल की वास्तविकता की बजाय अपनी सोच के अनुरूप जन मनोविज्ञान की कल्पना कर लेते हैं। इस समूह का मानना था कि पांच में से चार राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं ,इसलिए प्रदेश के साथ केंद्र सरकार के दोहरे विरोधी जन मनोविज्ञान का सामना करना होगा।  इसके साथ इनका विश्लेषण यह भी था कि केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकारों ने नीतियों और वक्तव्यों में हिंदुत्व पर जैसी  प्रखरता दिखाई है उससे मुसलमानों और ईसाइयों के साथ पढ़ा-लिखा वर्ग भी नाराज है। इस तरह उसे तीन प्रकार के सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना है और उसकी सरकारों का जाना निश्चित है। चुनाव परिणामों ने फिर एक बार इन्हें पूरी तरह गलत साबित कर दिया है। हालांकि चुनावी अंकगणित के आधार पर अभी भी ये अपनी हवाई कल्पनाओं को सही साबित करने के लिए अलग-अलग तरह के तर्क और तथ्य दे रहे हैं। हम और आप जानते हैं कि ये सारे तथ्य और तर्क खोखले हैं जिनका वास्तविकता से लेना-देना नहीं।

उत्तर प्रदेश को लीजिए तो तीनों श्रेणी का सत्ता विरोधी रुझान सबसे ज्यादा यही होना चाहिए। आखिर हिंदुत्व का सर्वाधिक मुखर प्रयोग इसी राज्य में हुआ। अल्पसंख्यकों में मुसलमानों तथा भाजपा विरोधियों की सर्वाधिक संख्या यही थी। भाजपा के विरुद्ध प्रचार करने वाली गैर दलीय ताकतें भी यहां सबसे ज्यादा सक्रिय थीं। यह वातावरण बनाया गया था कि भाजपा को पराजित करना है तो एकजुट होकर बिना आगा पीछा सोचे सपा के पक्ष में मत डाला जाए। हुआ भी यही। बसपा की कमजोर उपस्थिति के कारण भाजपा विरोधी मतों का ध्रुवीकरण सपा के पक्ष में हुआ। सपा को प्राप्त मतों और सीटों में वृद्धि का मूल कारण यही है। उसके पक्ष में सकारात्मक के बजाय भाजपा हराओ मानसिकता का नकारात्मक मत ज्यादा है। दूसरी ओर भाजपा के पक्ष में सकारात्मक मत ज्यादा है। दरअसल, हिंदुत्व और उस पर आधारित राष्ट्रीयता के साथ केंद्र और प्रदेश सरकारों द्वारा समाज के वंचित तबकों के हित में किए गए कार्य, उनको पहुंचाए गए लाभ, अपराध नियंत्रण के कारण कायम सुरक्षा स्थिति तथा नेतृत्व के रूप में केंद्र में नरेंद्र मोदी और प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति ने विरोधियों की कल्पनाओं को ध्वस्त कर दिया। नेतृत्व के स्तर पर इन दोनों के सामने कोई नेता टिकता ही नहीं था। प्रोफेशनलों, कारोबारियों ,महिलाओं ..सबके लिए सुरक्षा प्राथमिक चिंता का विषय था और इस कसौटी पर केवल भाजपा सरकार खरी उतरती थी। इसी तरह केंद्र और प्रदेश सरकार ने आम जन के पक्ष में कल्याणकारी कार्यक्रमों के साथ सिर पर छत, संकट काल में पेट में अन्न तथा जेब में थोड़े पैसे पहुंचाने की नीतियों से ऐसा बड़ा समर्थक समूह खड़ा कर दिया है जिसकी काट किसी के पास नहीं।

ये बातें भाजपा शासित सभी राज्यों में थोड़ा या ज्यादा लागू होतीं हैं। चाहे उत्तराखंड हो मणिपुर या गोवा सब जगह लाभार्थियों का एक बड़ा वर्ग तैयार हो चुका है। जितनी संख्या में लोगों को आवास इन सरकारों में मिले, बिजलियां पहुंचाई गई, किसानों के खाते में धन पहुंचा,गरीब मजदूरों के निबंधन के बाद खातों में धन पहुंचा तथा कोरना टीकाकरण हुआ उन सबसे सरकारों की सकारात्मक छवि बनी। उत्तराखंड में लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी का रिकार्ड बना देना असाधारण है। भाजपा ने तीन मुख्यमंत्री बदले और उसकी छवि पर इसका असर हुआ लेकिन दूसरी ओर इससे पार्टी के अंदर का असंतोष दूर हो गया। पार्टी के अंदर असंतोष नहीं हो तो लड़ाई जीतना आसान होता है। पार्टी की भारी विजय के बावजूद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हालांकि स्वयं हार गए   लेकिन जितना कम समय मिला उसमें उनको लेकर प्रदेश  किसी तरह की नकारात्मक धारणा कायम नहीं हुई। भाजपा एकीकृत होकर चुनाव लड़ रही थी। जो छोटे-मोटे विद्रोह हुए उनका ज्यादा असर नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहाड और तराई के लिए विकास की जो कल्पना दी और केदारनाथ व अन्य धार्मिक स्थलों से लेकर तीर्थ यात्राओं के लिए जितना कुछ किया उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा। उत्तराखंड के लोगों के समक्ष भाजपा के सामने केवल कांग्रेस ही दूसरा विकल्प है। उत्तराखंड की स्थापना के बाद कोई भी सरकार लगातार दोबारा चुनाव में वापस नहीं आई। इसमें कांग्रेस के लिए उम्मीद थी। कांग्रेस उत्तराखंड के लिए भाजपा के समानांतर कोई ऐसा विज़न नहीं दे सकी जिससे जनता का आकर्षण उसकी ओर बड़े स्तर पर पैदा हो। हरीश रावत उत्तराखंड के लोगों के लिए जाने पहचाने नेता हैं लेकिन उन्हें ही एक समय अपनी पार्टी की अंदरूनी कलह से दुखी होकर ट्वीट करना पड़ा। केंद्रीय नेतृत्व इस अवस्था में नहीं कि उनकी कोई मदद कर सके। 

मणिपुर और गोवा दोनों राज्यों के चुनाव परिणामों से भी कुछ मुखर संदेश निकले हैं। मणिपुर में बहुमत प्राप्त करने का सर्वाधिक प्रमुख संदेश यही है कि भाजपा वहां स्थापित ताकत बन चुकी है। लगातार तीन बार सत्ता में रहने वाली कांग्रेस की दशा सबके सामने है। साफ है कि पूर्वोत्तर में अब भाजपा मुख्य ताकत है। पिछले चुनाव में केवल 21 सीट पाने वाली भाजपा पांच वर्ष तक सरकार चलाने में सक्षम इसलिए हुई , क्योंकि दूसरी पार्टियों के विधायक भी किसी से उम्मीद करते थे। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के लिए यह परिणाम आघात पहुंचाने वाला है ,क्योंकि कांग्रेस को निगलते जाने के कारण उसका मानना है कि वह पूर्वोत्तर की प्रमुख शक्ति होगी। साफ है कि मणिपुर उसके लिए पश्चिम बंगाल नहीं है। गोवा में पिछली बार भाजपा को केवल 14 सीटें मिली थी। कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा नहीं किया और ज्यादातर गैर कांग्रेसी विधायकों का रुझान भाजपा की तरफ था। इस बार मनोहर पर्रिकर जैसा नेता न होने के बावजूद लोगों ने अगर उसे 18 सीटें दी तो जाहिर है न सरकार के विरुद्ध रुझान था और न ही कांग्रेस सहित आम आदमी पार्टी या तृणमूल कांग्रेस को लेकर कोई आकर्षण। तृणमूल ने यहां भी कांग्रेस के नेताओं को शामिल कर अपने आपको राष्ट्रीय स्तर की पार्टी साबित करने की कोशिश की थी। चुनाव परिणामों ने उसके सपने को यहां भी धराशाई किया है।

पंजाब में भाजपा लंबे समय से बड़ी शक्ति नहीं रही है। अकाली दल के गठबंधन में उसे 23 विधानसभा और 3 लोकसभा सीटें ही लड़ाई के लिए मिलती रही है। इस कारण जनसंघ के समय एक ताकत होते हुए भी बाद में उसका राजनीतिक विस्तार पूरे प्रदेश में नहीं हो पाया। कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस से अलग तो हुए लेकिन उसे ज्यादा क्षति पहुंचाकर अपनी पार्टी को सक्षम बनाएं, लोगों के बीच जाकर माहौल बनाएं ऐसा अभियान उन्होंने नहीं चलाया। इसमें भाजपा, पंजाब लोक कांग्रेस तथा ढिंढसा के अकाली दल के गठबंधन के बेहतर करने की उम्मीद भी नहीं थी। भाजपा से अलग होने के बाद अकाली दल का एक बड़ा मत आधार कट गया। बसपा वहां अब इस स्थिति में नहीं कि दलितों का बड़ा वर्ग उसे अपनी पार्टी माने। दूसरी ओर  अंतर्कलह से जूझती हुई कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी विकल्प के रूप में उपलब्ध थी। हालांकि मतदान को लेकर पार्टियों के परंपरागत मतदाता के अंदर उत्साह नहीं था तभी तो 2007,  2012 और 2017 की तुलना में काफी कम वोट पड़े है। मोहाली जैसी जगह में नए मतदाताओं में से केवल 35% ने वोट डाला। हर चुनाव में सक्रिय रहने वाले अनिवासी पंजाबी भी इस बार चुनाव से दूर रहे। इस तरह पंजाब के चुनाव को कद्दावर नेताओं तथा उनके नेतृत्व वाली पार्टियों की अनुपस्थिति के कारण परिवर्तन की आकांक्षा वाली जनता द्वारा जो है उसमें से किसी को मत देने के विकल्प का परिणाम कहा जा सकता है। इसका तात्कालिक निष्कर्ष यह हो सकता है कि पंजाब अभी उपयुक्त राजनीतिक धाराओं की तलाश करेगा।

किसी दल, विचारधारा या नेताओं से वितृष्णा से परे हटकर निष्पक्षता से विश्लेषण करें तो इन पांच राज्यों ने देश के आम जन की सामूहिक सोच को प्रकट किया है। यह सोच साफ करती है कि भाजपा और उसके नेताओं की विचारधारा ,उप पर आधारित नीतियों ,जनकल्याणकारी संबंधी उनके कार्यक्रमों आदि को लेकर बनाई गई नकारात्मक और विपरीत धारणा का जमीन स्तर के यथार्थ से लेना देना नहीं है। उत्तर प्रदेश से लेकर पूरब में मणिपुर और समुद्र के किनारे गोवा जैसे आधुनिक जीवन शैली वाले प्रदेश की आवाज में कुछ एकता है तो इसकी ध्वनियों को जरा गहराई से समझने की आवश्यकता है।

अवधेश कुमार, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092



गुरुवार, 3 मार्च 2022

सरकारों को मीडिया के नजरिए के आधार पर अपनी विज्ञापन नीति निर्धारित नहीं करनी चाहिए

एल. एस. हरदेनिया

यह प्रसंग पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल का है। अंग्रेजी साप्ताहिक 'ब्लिट्ज' देश का एक शक्तिशाली अखबार था। उसकी छवि नेहरू विरोधी समाचारपत्र की थी। समाचार पत्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साम्राज्यवादी एवं पूंजीवादी व्यवस्था के विरूद्ध प्रतिबद्ध था। उस दौरान अमरीका की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के मुखिया भारत आए। बंबई में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में उनसे पूछा गया कि इस तथ्य के बावजूद कि ब्लिट्ज प्रधानमंत्री नेहरू और पूंजीवाद का घोर विरोधी है, आपकी कंपनी उसे भरपूर विज्ञापन देती है ऐसा क्यों? प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि जिस समाचारपत्र को हम विज्ञापन देते हैं, वह क्या लिखता है, उसकी नीति क्या है, वह किसका समर्थन करता है, किसका विरोध करता है, इससे हमें कोई मतलब नहीं है। हम तो यह देखते हैं कि उसके पाठकों की संख्या कितनी है। क्योंकि विज्ञापन देने का हमारा उद्धेश्य अपने उत्पाद की विशेषताओं की जानकारी ज्यादा से ज्यादा पाठकों को देना और विज्ञापन के माध्यम से पाठकों को प्रभावित करना है।

जहां साधारणतः निजी क्षेत्र विज्ञापन की ऐसी नीति अपनाता है वहीं सरकारों की विज्ञापन की नीति भिन्न होती है। सरकारें विज्ञापन के माध्यम से मीडिया पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती हैं। जिन देशों में सैकड़ों वर्षों से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है, वहां यह मान्यता है कि लोकतंत्र उसी हालत में फलता-फूलता है जहां प्रतिपक्ष शक्तिशाली हो। ब्रिटेन में तो प्रतिपक्ष को हर मेजिस्टिीज अपोजीशन कहा जाता है। परंतु इसके विपरीत उन देशों में जो कुछ दशकों पहले ही आजाद हुए, सत्ता में बैठा दल प्रतिपक्ष को कमजोर करने का सतत प्रयास करता रहता है। सत्ता में बैठा दल ऐसा ही व्यवहार मीडिया के साथ भी करता है।

इस समय मेरे घर पर 20 से 25 दैनिक समाचारपत्र आते हैं। मैं प्रायः देखता हूं कि मध्यप्रदेश सरकार के विज्ञापन लगभग सदैव ऐसे समाचारपत्रों में प्रकाशित होते हैं जिनके कालमों में सरकार विरोधी सामग्री कम ही छपती है। कबजब सरकार विरोधी समाचारपत्रों में ऐसे विज्ञापन भी नहीं छपते जिनका उद्धेश्य ऐसे कार्यक्रमों एवं योजनाओं की जानकारी पाठकों को देना होता है जो मूलतः जनहितैषी हैं।

जैसे कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश में पोलियो अभियान लांच किया गया। परंतु इस अभियान का विज्ञापन उन समाचारपत्रों को नहीं दिया गया जिन्हें सरकार अपना विरोधी मानती है। वर्तमान में सरकारी विज्ञापन ‘दैनिक भास्कर‘ में नजर नहीं आते। कम से कम मुझे तो दैनिक भास्कर में पोलियो अभियान का विज्ञापन नहीं दिखा। पोलियो हमारे देश का अत्यधिक महत्वपूर्ण अभियान है जिसपर हमारे बच्चों का भविष्य निर्भर है। पोलियो ड्राप की दो बूंदे इस बात की गारंटी होती हैं कि आप पर लकवे का हमला नहीं होगा। ऐसा जनोपयोगी विज्ञापन जिन अखबारों में नहीं छपा उनके पाठकों को इस बात का पता नहीं लगेगा कि उन्हें अपने बच्चों को पोलियो की दवा की दा बूंदें पिलाना है। 

कोरोना के संदर्भ में भी अनेक चेतावनी भरी सूचनाएं दी जाती हैं। विज्ञापन के माध्यम से भी यह किया जाता है। परंतु ये सूचनाएं उन समाचारपत्रों के पाठकों तक नहीं पहुंच पातीं जिन्हें किन्हीं कारणों से सरकारी विज्ञापन नहीं मिल रहे हैं। 

पता नहीं यह संभव होगा या नहीं परंतु चुनावों के माध्यम से सत्ता हासिल करने वाली सरकारों को मीडिया के नजरिए के आधार पर अपनी विज्ञापन नीति निर्धारित नहीं करनी चाहिए। संसदीय प्रजातंत्र के तीन स्तंभ हैं - विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका। विधायिका के सदस्यों को (प्रतिपक्ष सहित) सरकारी कोष से वेतन व अन्य सुविधाएं मिलती हैं। इसी तरह किसी न्यायाधीश का वेतन इस कारण नहीं रोका जाता क्योंकि उसने सरकार विरोधी फैसले सुनाए। इसी तरह किसी अधिकारी का वेतन मात्र इस कारण नहीं रोका जाता कि उसने फाईल में मंत्री की राय के विपरीत राय दी है। 

मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। आए दिन मंत्री और अन्य राजनीतिक नेता मीडिया का गुणगान करते रहते हैं। परंतु जब मीडिया पर हमला होता है तब वे मौन धारण कर लेते हैं। मीडिया को भी जहां तक संभव हो ‘न काहू दोस्ती, न काहू से बैर' का रवैया अपनाना चाहिए और लगभग ऐसा ही रवैया सरकारों को भी अपनाना चाहिए। ऐसा होने पर ही मीडिया रचनात्मक भूमिका अदा कर सकता है।

-एल. एस. हरदेनिया, (मो. 9425301582)

 

जेटीबीएस संघ के संयोजक जमील अहमद ने रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव का किया धन्यवाद

नई दिल्ली। कोरोना के कारण जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया गया और लोगों के एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने वाला साधन रेल को भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया जिसका सीधा असर गरीब जनता पर पड़ा। पहले जनरल टिकट लेकर लोग सुपरफास्ट ट्रेनों में सफर कर लेते थे मगर वो दो साल से बंद था जिसे फिर से सुपरफास्ट ट्रेनों में लागू कर दिया गया है। इससे रेल यात्रियों को राहत मिलेगी और वे अपने गंतव्य स्थान तक कम राशि का टिकट लेकर पहुंच जाएंगे।

इस पर अखिल भारतीय जेटीबीएस संघ के संयोजक जमील अहमद ने खुशी का इजहार करते हुए कहा की केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को धन्यवाद देते हुए कहा कि भारतवर्ष की रेल यात्रियों में खुशी की लहर है क्योंकि दो वर्षों बाद केंद्रीय मंत्री और उनके सहयोगियों ने जनरल टिकट फिर से सुपरफास्ट ट्रेनों में लागू कर दिया है। इससे रेल यात्रियों को राहत मिलेगी और वे अपने गंतव्य स्थान तक कम राशि का टिकट लेकर पहुंच जाएंगे और रेलवे को भी लाभ पहुंचेगा भारतवर्ष के रेल यात्रियों को दो सालो में बहुत महंगा किराया देकर यात्रा की और अतिरिक्त शुल्क भी दिया कोरोना के कारण देश के ज्यादातर तब कों का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया।


ज्यादातर लोगों की रोजी-रोटी छिन गई और काम की तलाश में जो लोग एक शहर से दूसरे शहर काम की तलाश में जाते थे उन्हें भी महंगा किराया देना पड़ रहा था। अब रेलवे के फैसले से सभी यात्रियों में खुशी की लहर है आशा करते हैं कि आगे भी केंद्रीय रेल मंत्री भारत वर्ष के नौजवानों के लिए कोई ना कोई नई योजना बनाएंगे जैसे कि पहले की सरकारों ने बेरोजगार नौजवानों के लिए और विकलांगों के लिए एसटीडी/ पीसीओ, मिसलेनियस आइटम, खानपान के छोटे स्टाल, रेलवे के प्लेटफार्म पर दिया थे इससे बहुत सारे नौजवानों को काम मिला और तत्कालीन सरकार को उनका सपोर्ट भी मिला यह सरकार भी इसी प्रकार के कार्य करते हुए देश को आगे बढ़ाएगी।

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