गुरुवार, 3 मार्च 2022

सरकारों को मीडिया के नजरिए के आधार पर अपनी विज्ञापन नीति निर्धारित नहीं करनी चाहिए

एल. एस. हरदेनिया

यह प्रसंग पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल का है। अंग्रेजी साप्ताहिक 'ब्लिट्ज' देश का एक शक्तिशाली अखबार था। उसकी छवि नेहरू विरोधी समाचारपत्र की थी। समाचार पत्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साम्राज्यवादी एवं पूंजीवादी व्यवस्था के विरूद्ध प्रतिबद्ध था। उस दौरान अमरीका की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के मुखिया भारत आए। बंबई में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में उनसे पूछा गया कि इस तथ्य के बावजूद कि ब्लिट्ज प्रधानमंत्री नेहरू और पूंजीवाद का घोर विरोधी है, आपकी कंपनी उसे भरपूर विज्ञापन देती है ऐसा क्यों? प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि जिस समाचारपत्र को हम विज्ञापन देते हैं, वह क्या लिखता है, उसकी नीति क्या है, वह किसका समर्थन करता है, किसका विरोध करता है, इससे हमें कोई मतलब नहीं है। हम तो यह देखते हैं कि उसके पाठकों की संख्या कितनी है। क्योंकि विज्ञापन देने का हमारा उद्धेश्य अपने उत्पाद की विशेषताओं की जानकारी ज्यादा से ज्यादा पाठकों को देना और विज्ञापन के माध्यम से पाठकों को प्रभावित करना है।

जहां साधारणतः निजी क्षेत्र विज्ञापन की ऐसी नीति अपनाता है वहीं सरकारों की विज्ञापन की नीति भिन्न होती है। सरकारें विज्ञापन के माध्यम से मीडिया पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती हैं। जिन देशों में सैकड़ों वर्षों से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है, वहां यह मान्यता है कि लोकतंत्र उसी हालत में फलता-फूलता है जहां प्रतिपक्ष शक्तिशाली हो। ब्रिटेन में तो प्रतिपक्ष को हर मेजिस्टिीज अपोजीशन कहा जाता है। परंतु इसके विपरीत उन देशों में जो कुछ दशकों पहले ही आजाद हुए, सत्ता में बैठा दल प्रतिपक्ष को कमजोर करने का सतत प्रयास करता रहता है। सत्ता में बैठा दल ऐसा ही व्यवहार मीडिया के साथ भी करता है।

इस समय मेरे घर पर 20 से 25 दैनिक समाचारपत्र आते हैं। मैं प्रायः देखता हूं कि मध्यप्रदेश सरकार के विज्ञापन लगभग सदैव ऐसे समाचारपत्रों में प्रकाशित होते हैं जिनके कालमों में सरकार विरोधी सामग्री कम ही छपती है। कबजब सरकार विरोधी समाचारपत्रों में ऐसे विज्ञापन भी नहीं छपते जिनका उद्धेश्य ऐसे कार्यक्रमों एवं योजनाओं की जानकारी पाठकों को देना होता है जो मूलतः जनहितैषी हैं।

जैसे कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश में पोलियो अभियान लांच किया गया। परंतु इस अभियान का विज्ञापन उन समाचारपत्रों को नहीं दिया गया जिन्हें सरकार अपना विरोधी मानती है। वर्तमान में सरकारी विज्ञापन ‘दैनिक भास्कर‘ में नजर नहीं आते। कम से कम मुझे तो दैनिक भास्कर में पोलियो अभियान का विज्ञापन नहीं दिखा। पोलियो हमारे देश का अत्यधिक महत्वपूर्ण अभियान है जिसपर हमारे बच्चों का भविष्य निर्भर है। पोलियो ड्राप की दो बूंदे इस बात की गारंटी होती हैं कि आप पर लकवे का हमला नहीं होगा। ऐसा जनोपयोगी विज्ञापन जिन अखबारों में नहीं छपा उनके पाठकों को इस बात का पता नहीं लगेगा कि उन्हें अपने बच्चों को पोलियो की दवा की दा बूंदें पिलाना है। 

कोरोना के संदर्भ में भी अनेक चेतावनी भरी सूचनाएं दी जाती हैं। विज्ञापन के माध्यम से भी यह किया जाता है। परंतु ये सूचनाएं उन समाचारपत्रों के पाठकों तक नहीं पहुंच पातीं जिन्हें किन्हीं कारणों से सरकारी विज्ञापन नहीं मिल रहे हैं। 

पता नहीं यह संभव होगा या नहीं परंतु चुनावों के माध्यम से सत्ता हासिल करने वाली सरकारों को मीडिया के नजरिए के आधार पर अपनी विज्ञापन नीति निर्धारित नहीं करनी चाहिए। संसदीय प्रजातंत्र के तीन स्तंभ हैं - विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका। विधायिका के सदस्यों को (प्रतिपक्ष सहित) सरकारी कोष से वेतन व अन्य सुविधाएं मिलती हैं। इसी तरह किसी न्यायाधीश का वेतन इस कारण नहीं रोका जाता क्योंकि उसने सरकार विरोधी फैसले सुनाए। इसी तरह किसी अधिकारी का वेतन मात्र इस कारण नहीं रोका जाता कि उसने फाईल में मंत्री की राय के विपरीत राय दी है। 

मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। आए दिन मंत्री और अन्य राजनीतिक नेता मीडिया का गुणगान करते रहते हैं। परंतु जब मीडिया पर हमला होता है तब वे मौन धारण कर लेते हैं। मीडिया को भी जहां तक संभव हो ‘न काहू दोस्ती, न काहू से बैर' का रवैया अपनाना चाहिए और लगभग ऐसा ही रवैया सरकारों को भी अपनाना चाहिए। ऐसा होने पर ही मीडिया रचनात्मक भूमिका अदा कर सकता है।

-एल. एस. हरदेनिया, (मो. 9425301582)

 

जेटीबीएस संघ के संयोजक जमील अहमद ने रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव का किया धन्यवाद

नई दिल्ली। कोरोना के कारण जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया गया और लोगों के एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने वाला साधन रेल को भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया जिसका सीधा असर गरीब जनता पर पड़ा। पहले जनरल टिकट लेकर लोग सुपरफास्ट ट्रेनों में सफर कर लेते थे मगर वो दो साल से बंद था जिसे फिर से सुपरफास्ट ट्रेनों में लागू कर दिया गया है। इससे रेल यात्रियों को राहत मिलेगी और वे अपने गंतव्य स्थान तक कम राशि का टिकट लेकर पहुंच जाएंगे।

इस पर अखिल भारतीय जेटीबीएस संघ के संयोजक जमील अहमद ने खुशी का इजहार करते हुए कहा की केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को धन्यवाद देते हुए कहा कि भारतवर्ष की रेल यात्रियों में खुशी की लहर है क्योंकि दो वर्षों बाद केंद्रीय मंत्री और उनके सहयोगियों ने जनरल टिकट फिर से सुपरफास्ट ट्रेनों में लागू कर दिया है। इससे रेल यात्रियों को राहत मिलेगी और वे अपने गंतव्य स्थान तक कम राशि का टिकट लेकर पहुंच जाएंगे और रेलवे को भी लाभ पहुंचेगा भारतवर्ष के रेल यात्रियों को दो सालो में बहुत महंगा किराया देकर यात्रा की और अतिरिक्त शुल्क भी दिया कोरोना के कारण देश के ज्यादातर तब कों का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया।


ज्यादातर लोगों की रोजी-रोटी छिन गई और काम की तलाश में जो लोग एक शहर से दूसरे शहर काम की तलाश में जाते थे उन्हें भी महंगा किराया देना पड़ रहा था। अब रेलवे के फैसले से सभी यात्रियों में खुशी की लहर है आशा करते हैं कि आगे भी केंद्रीय रेल मंत्री भारत वर्ष के नौजवानों के लिए कोई ना कोई नई योजना बनाएंगे जैसे कि पहले की सरकारों ने बेरोजगार नौजवानों के लिए और विकलांगों के लिए एसटीडी/ पीसीओ, मिसलेनियस आइटम, खानपान के छोटे स्टाल, रेलवे के प्लेटफार्म पर दिया थे इससे बहुत सारे नौजवानों को काम मिला और तत्कालीन सरकार को उनका सपोर्ट भी मिला यह सरकार भी इसी प्रकार के कार्य करते हुए देश को आगे बढ़ाएगी।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

गोवा की आजादीः क्या देरी के लिए नेहरू जिम्मेदार थे?

राम पुनियानी

सन् 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी-भाजपा जो बातें कहते थे उनमें से एक यह भी थी कि जनता ने कांग्रेस को 60 साल सत्ता में रखा. अब जनता हमें 60 महीने दे और फिर देखे कि हम देश को किस तीव्र गति से विकास पथ पर अग्रसर करते हैं. स्वाधीनता से लेकर सन् 2014 तक कांग्रेस 49 वर्ष केन्द्र में सत्ता में रही. कई दूसरी सरकारें भी इस बीच सत्तासीन हुईं जिनमें इन्द्र कुमार गुजराल और देवेगौड़ा की सरकारों के अलावा अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार भी थीं. अतः यह कहना तथ्यों के विपरीत है कि कांग्रेस ने 60 वर्षों तक देश पर राज किया है. संभवतः भाजपा नेताओं ने ऐसा इसलिए कहा होगा क्योंकि 60 वर्ष और 60 महीने की तुकबंदी है.

पिछले 7-8 सालों के मोदी-भाजपा शासन में सामाजिक विकास के सभी सूचकांकों में गिरावट आई है. नोटबंदी से देश में हाहाकार मचा और जीएसटी ने छोटे व्यापारियों को बर्बादी की कगार पर ला खड़ा किया. कोरोना के प्रसार को नियंत्रित करने के नाम पर जो भयावह लॉकडाउन देश में लगाया गया उससे लाखों लोग अपनी आजीविका खो बैठे. विकास का कहीं दूर-दूर तक पता नहीं है और युवा दुःखी व आक्रोशित हैं क्योंकि उनके हिस्से में बेरोजगारी के सिवाए कुछ नहीं आया है.

प्रजातांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की आजादी, धार्मिक स्वातंत्रता, पोषण, स्वास्थ्य आदि जैसे विषयों से संबद्ध सूचकांकों में जबरदस्त गिरावट आई है. चुनाव आयोग, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) एवं केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) सरकार के हाथ की कठपुतली बन गए हैं. न्यायपालिका की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिन्ह लगने लगे थे परंतु पिछले कुछ समय से उसमें सुधार परिलक्षित हो रहा है. इन विकट परिस्थितियों के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की हर समस्या के लिए जवाहरलाल नेहरू को दोषी ठहराते हैं. मोदी ने हाल में कहा कि गोवा के देरी से (देश की आजादी के 14 साल बाद) स्वतंत्रता हासिल करने के लिए नेहरू की कमजोर नीतियां जिम्मेदार थीं. गोवा को देश की आजादी के समय, अर्थात 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र करवाया जा सकता था. सन् 1955 में 20 सत्याग्रहियों की मौत के बावजूद नेहरू ने कोई कदम नहीं उठाया. मोदी इस मुद्दे पर तो बहुत मुखर हैं किंतु चीन द्वारा भारत के एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर लेने के मामले में वे चुप रहते हैं.

गोवा के उपनिवेश बनने और फिर स्वतंत्र होने का क्या इतिहास है? गोवा को सन् 1961 में भारतीय सेना ने ‘आपरेशन विजय‘ के तहत 26 घंटों में स्वतंत्र करवा लिया था. गोवा को सन् 1510 में पुर्तगाल ने अपना उपनिवेश बनाया था. पुर्तगाली सेना ने बीजापुर के सुल्तान आदिल शाह को हराकर गोवा पर कब्जा किया था. यह अंग्रेजों द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप के औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया शुरू करने के बहुत पहले की बात है. पुर्तगालियों ने कई सदियों तक गोवा पर शासन किया. उनका शासन अत्यंत कड़ा था. पुर्तगालियों की बड़े पैमाने पर खिलाफत पहली बार सन् 1718 में हुई जब वहां के पॉस्टरों के एक समूह ने टीपू सुल्तान की मदद मांगी और पुर्तगाली सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया. इसे पिंटो षड़यंत्र कहा जाता है.  यह विद्रोह बुरी तरह असफल हुआ और इसके कर्ताधर्ता पॉस्टरों को अमानवीय यातनाएं दी गईं.

सन् 1900 में एल. मेनेजेज़ ब्रेगांजा ने पुर्तगाली भाषा में होराल्डो नामक अखबार गोवा से निकालना शुरू किया.  यह अखबार पुर्तगाल का आलोचक था. सन् 1917 में गोवा में सेंसरशिप लागू कर दी गई. इससे आमजनों में असंतोष बढ़ा. सन् 1928 में टी. ब्रेगांजा ने गोवा कांग्रेस पार्टी का गठन किया. सन् 1946 में राममनोहर लोहिया ने गोवा की मुक्ति के लिए सत्याग्रह किया. उन्हें 18 जून को गिरफ्तार कर लिया गया. इस दिन को गोवा क्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है. गोवा के एक प्रमुख मैदान का नाम लोहिया के नाम पर रखा गया है.

इस सत्याग्रह के बाद गोवा में नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया. इसमें भाग लेने वाले क्रांतिकारी थे जिनमें पुणे के प्रसिद्ध पहलवान नाना काजरेकर, लोकप्रिय संगीत निदेशक सुधीर फड़के आदि शामिल थे. इन लोगों ने युनाईटेड फ्रंट ऑॅफ लिबरेशन के झंडे तले आजाद गोमांतक दल का गठन किया. यह दिलचस्प है कि लब्धप्रतिष्ठित गायिका लता मंगेशकर ने गोवा की स्वतंत्रता के लिए धन इकट्ठा करने हेतु पुणे में आयोजित एक संगीत कार्यक्रम में हिस्सेदारी की थी.

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पुर्तगाल के तानाशाह सलाजार ने देश के संविधान को संशोधित कर गोवा को पुर्तगाल का  अभिन्न हिस्सा घोषित कर दिया. इसके अलावा पुर्तगाल नाटो में शामिल हो गया जिसका अर्थ यह था कि नाटो के सभी सदस्य देश पुर्तगाल के राज्यक्षेत्र की रक्षा करने के लिए वचनबद्ध थे. नाटो का नेतृत्व अमरीका के हाथों में था और उस समय पुर्तगाल से सैन्य संघर्ष छेड़ने का अर्थ था अमरीका सहित बड़ी पश्चिमी ताकतों को भारत में हस्तक्षेप करने का न्यौता देना. अमरीका के राष्ट्रपति आईजनहावर एवं विदेश मंत्री डलेस ने यह घोषणा की थी कि गोवा पुर्तगाल का अभिन्न भाग है. इसका जवाहरलाल नेहरू ने विरोध किया था.

गोवा में जनमत संग्रह कराए जाने की मांग भी उठी थी जिस पर नेहरू ने जोर देकर यह कहा था कि गोवा के भारत में विलय के मामले में किसी बहस या विवाद की गुंजाइश नहीं है. इसके बाद केनेडी अमरीका के राष्ट्रपति बने जिनका भारत के प्रति रवैया कुछ नरम था.

सन् 1950 के दशक के पूर्वार्ध में एफ्रो-एशियन कान्फ्रेंस के सदस्यों ने भारत से गोवा का मुद्दा सुलझाने और वहां से पुर्तगालियों को निकाल बाहर करने का तकाजा किया. परंतु इसमें सबसे बड़ी बाधा नाटो और अमरीका की यह घोषणा थी कि गोवा पुर्तगाल का हिस्सा है. केनेडी के सत्ता में आने के बाद भारत का रूख भी बदल गया. यह साफ था कि पुर्तगाल को गोवा पर अपना नियंत्रण छोड़ने के लिए बातचीत से राजी करना मुश्किल होगा.

सन् 1955 में समाजवादी और साम्यवादियों ने इस मुद्दे पर आम सत्याग्रह शुरू किया. इन सत्याग्रहियों ने जब गोवा में प्रवेश किया तब वहां की सरकार ने उन पर गोलियां बरसाईं जिससे 20 सत्याग्रही मारे गए. इस घटना से व्यथित और क्रुद्ध नेहरू ने गोवा की आर्थिक नाकेबंदी की घोषणा की. पणजी में स्थित वाणिज्य दूतावास को बंद कर दिया और पुर्तगाल से कूटनीतिक संबंध तोड़ लिए गए.

आर्थिक नाकाबंदी से गोवा पूरी दुनिया से कट गया. यहां तक कि वहां के नागरिक समाचार पाने के लिए भी तरस गए. इस समय वामन सरदेसाई और उनकी पत्नि लीबिया लोबो सरदेसाई ने एक भूमिगत रेडियो स्टेशन शुरू किया जिसका नाम ‘द वाइस ऑफ फ्रीडम‘ था. इस रेडियो स्टेशन के जरिए क्रांतिकारियों को सूचनाएं पहुंचाई जातीं थीं और झूठे पुर्तगाली प्रचार का पर्दाफाश किया जाता था. यह रेडियो स्टेशन नवबंर 1955 से दिसंबर 1961 तक गोवा से सटे वनक्षेत्र से संचालित होता रहा.

नेहरू ने केनेडी को कूटनीतिक चैनलों द्वारा यह संदेश भिजवाया कि अमरीका गोवा के मामले में हस्तक्षेप न करे. फिर 17 दिसंबर को नेहरू के आदेश पर आपरेशन विजय शुरू किया गया. यह अभियान अचानक शुरू किया गया था. भारतीय वायुसेना ने डबोलिन हवाईअड्डे के रनवे को नष्ट कर दिया. नौसेना ने गोवा के बंदरगाह को बंद कर दिया और 30 हजार भारतीय सैनिकों ने गोवा में प्रवेश किया. वहां मौजूद लगभग दो हजार पुर्तगाली सैनिकों को आसानी से परास्त कर दिया गया.

गोवा के गवर्नर को यह अहसास हो गया था कि बाहर से कोई सहायता आने वाली नहीं है और इसलिए अपनी सरकार के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए उसने आत्मसमर्पण कर दिया. दो दिन बाद 19 दिसंबर को गोवा केन्द्र शासित प्रदेश के रूप में भारत का हिस्सा बन गया. सन् 1987 में यह जानने के लिए जनमत संग्रह किया गया कि गोवा के निवासी पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र का हिस्सा बनना चाहते हैं या गोवा को स्वतंत्र राज्य बनाना. बहुसंख्यक मतदाताओं ने अलग राज्य बनाने के पक्ष में मत व्यक्त किया और इस तरह गोवा भारतीय संघ का 25वां राज्य बन गया. नेहरू ने गोवा की आजादी के लिए जो प्रयास किए वे उनके परिपक्व कूटनीतिज्ञ और सच्चा देशभक्त होने का सुबूत हैं. जहां तक मोदी का सवाल है, वे जो चाहे वो कहने के लिए स्वतंत्र हैं. (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

विश्व समुदाय संभले, अन्यथा देर हो जाएगी

अवधेश कुमार

रूस द्वारा युक्रेन पर हमला भयभीत अवश्य करता है किंतु इसमें हैरत की कोई बात नहीं। हैरत केवल उन्हें होगी जो मान रहे थे कि अमेरिका और पश्चिमी देश रूस की घेराबंदी के लिए आरोपित कर रहे हैं। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में रूस जिस दिशा में बढ़ रहा था उसकी स्वाभाविक परिणति यूक्रेन पर हमला ही थी। इतनी भारी संख्या में सैनिकों की लामबंदी, आक्रामक युद्धाभ्यास, परमाणु युद्ध अभ्यास, पूर्वी यूक्रेन के हथियारबंद अलगाववादी नेताओं को हर तरह का समर्थन आदि दुनिया के सामने था। अंततः पुतिन ने अपनी योजना के अनुसार यूक्रेन के दो श्रेत्रों दोनेत्स्क और  लुहान्स्क को स्वतंत्र घोषित कर उसे मान्यता भी प्रदान कर दी। इसके बाद इन देशों की रक्षा के नाम पर वहां सैनिक हस्तक्षेप का आधार उन्होंने तैयार कर लिया । हमले के बाद पुतिन ने कहा कि रूस की सेना का विशेष ऑपरेशन आरंभ हो रहा है जिसका उद्देश्य यूक्रेन से उसकी सेना को हटाना है। उनकी भाषा बिल्कुल अल्टीमेटम की है कि यूक्रेन की सेना हथियार डाल दे और अपने घर लौट जाए। दूसरी ओर उन्होंने यूक्रेन के समर्थन में खड़े देशों को भी चेतावनी दी कि अगर उन्होंने किसी तरह का हस्तक्षेप किया तो परिणाम ऐसे होंगे जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी।

कल्पना कर सकते हैं कि पुतिन ने किस दृढ़ता के साथ तैयारी की हुई है। ऐसा नहीं है कि यहां तक पहुंचने के पहले उन्होंने विश्व स्तर पर इसकी प्रतिक्रियाओं और अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के कदमों आदि का आकलन नहीं किया होगा। उन्हें पता है कि रूस इसके बाद प्रतिबंधित होगा। तो उस प्रतिबंध के बारे में भी उन्होंने सोचा होगा और उनके चरित्र को जानने वाले मानेंगे कि इसके जवाब की भी उन्होंने पूरी तैयारी की होगी। 

यूक्रेन का क्या होगा और रूस किस सीमा तक सैन्य अभियान को ले जाएगा इसके बारे में हम आप केवल अनुमान लगा सकते हैं। पहले पूरी स्थिति को देखिए। अमेरिका और नाटो के देश बार-बार रूस को चेतावनी देते रहे पर पुतिन इससे अप्रभावित रहे। अंततः यूक्रेन पर हमला हो गया और कोई देश यूक्रेन की मदद में उस रूप में आगे नहीं आया जिस प्रकार का भीषण हमला उसे झेलना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की विवशता देखिए। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस कह रहे हैं कि हमने सोचा ही नहीं था कि रूस इस तरह हमले कर सकता है। हम आश्वस्त थे कि ऐसा नहीं होगा। उन्होंने गिड़गिड़ाते हुए रूस से अपनी सेना वापस बुलाने की अपील की । अपील से अगर पुतिन को प्रभावित होना होता तो वे इस प्रकार की कार्रवाई करते ही नहीं । सच कहा जाए तो पूरा दृश्य विश्व के भविष्य की दृष्टि से आतंकित करने वाला है।  सैन्य शक्ति की बदौलत कोई देश इस तरह की कार्रवाई करें और उसे रोकने के लिए विश्व स्तर पर कहीं से भी पहल नहीं हो तो आगे क्या होगा इसकी कल्पना से ही सिहरन पैदा होती है। मामला चाहे जितना पेचीदा हो यह समाधान का तरीका नहीं हो सकता। इससे जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली विश्व व्यवस्था हो जाएगी । 

ऐसा नहीं है कि यूक्रेन बिल्कुल युद्ध करने या रूस को जवाब देने की स्थिति में नहीं है। वह बिल्कुल कमजोर देश नहीं है। बावजू रूस जैसे सैन्य महाशक्ति से मुकाबला उसके लिए असंभव है। सच कहें तो यूक्रेन अकेले रूस जैसी  महाशक्ति के समक्ष नहीं टिक सकता। उसमें भी तब जब उसके दो महत्वपूर्ण क्षेत्र व्यवहारिक रूप से रूस के नियंत्रण में हैं। भले वे स्वतंत्र घोषित किए गए हैं लेकिन उनकी स्वतंत्रता ही नहीं पूरी सैन्य नीति पुतिन के हाथों है। इसके अलावा बेलारूस में रूस पूरी युद्धक विमानों और सामग्रियों के साथ लंबे समय से मौजूद है। वहां उसका युद्धाभ्यास चल रहा है जिसमें परमाणु युद्धाभ्यास भी शामिल है। अमेरिका और यूरोपीय देश केवल धमकियों तक सीमित है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन शाब्दिक हमले कर रहे हैं कि वे और उनके सहयोगी देश माकूल जवाब देंगे। वह क्या जवाब दे सकते हैं?

 विश्व का दुर्भाग्य देखिए कि व्लादिमीर पुतिन साम्राज्यवादी नेता की तरह पूर्व सोवियत संघ के राज्यों को अपने नियंत्रण में रखने की निष्ठुर नीति । उनकी एक ही कोशिश है कि वे सभी देश सीधे उनके शासन में नहीं हो तो तो कम से कम वहां ऐसी सरकारें हो जो उनके नीतियों के अनुसार काम करें और उनके नेतृत्व को माने। यूक्रेन में 2014 में जन विरोध में रूसी समर्थित सरकार के हटने के बाद से ही उनकी आक्रामकता बढ़ती गई। अमेरिका और नाटो ने यूक्रेन की वर्तमान सरकार को सैग मदद दी। आज कोई उनके लिए लड़ने नहीं आया तो रूस वहां की सरकार को अपदस्थ कर सकता है। जब पूरे विश्व के सभी देश अपनी-अपनी सीमाओं में स्वयं को अकेले मान रहे हों तो  शक्तिशाली देश ऐसा ही आचरण करेंगे। यूक्रेन पर हमले को थोड़ा विस्तारित करें तो विश्व में ऐसे कई विवाद हैं जहां इस तरह की घटनाएं सामने आ सकतीं हैं। ताइवान ऐसा ही क्षेत्र है। चीन की दृष्टि वहां लगी हुई है। बीजिंग ओलंपिक्स यात्रा के दौरान व्लादिमीर पुतिन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ लंबी बातचीत की। उस बातचीत का विवरण 5300 शब्दों में जारी हुआ। इतना बड़ा वक्तव्य सामान्यतः जारी नहीं होता। बिना स्पष्ट घोषणा किए  उसकी भाषा से साफ था कि चीन का समर्थन रूस को मिलेगा। वास्तव में यूक्रेन के प्रति रूस की नीति तथा ताइवान के प्रति चीन की नीति में काफी हद तक समानता है। जिस तरह पुतिन पूर्व सोवियत संघ के भौगोलिक विस्तार तक रूस को ले जाने की महत्वाकांक्षा पर काम कर रहे हैं ठीक वैसी ही चीनी विस्तारवाद की नीति भी है। यूक्रेन मामले पर पश्चिमी देशों के हस्तक्षेप के विरुद्ध चीन खड़ा होता है तो स्थिति विकट होगी। दूसरी ओर चीन कल ताइवान को हड़पने की कोशिश करता है तो रूस भी उसका साथ देगा। पुतिन यूक्रेन में सफल होते हैं तो उनका अभियान यहीं तक नहीं रुकेगा और जॉर्जिया से लेकर कई बाल्टिक देशों तक इस नीति का विस्तार हो सकता है। इसी तरह चीन ताइवान के साथ-साथ मंगोलिया तक जा सकता है। इस आधार पर विचार करें तो विश्व के समक्ष उत्पन्न खतरे और चुनौतियों की भयावहता का आभास हो जाता है। 

विश्व युद्ध के खतरों को गलत मानने वाले थोड़ी गहराई से सोचें। वैसी स्थिति में होगा क्या। क्या सारे देश मुंह ताकते रहेंगे? या फिर उन्हें आगे आना होगा? जब वे आगे आएंगे तो क्षेत्रिय युद्ध होगा या विश्वयुद्ध? आखिर द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व ज्यादातर देश हिटलर की साम्राज्यवादी नीति को देखते हुए भी सैनिक टकराव से बचते रहे। जब हिटलर सीमा से आगे चला गया तब मजबूरी में यूरोपीय देशों को हस्तक्षेप करना पड़ा और फिर महायुद्ध में जैसा भीषण विनाश हुआ वह सबके सामने है। उस स्थिति से बचना है तो जाहिर है किसी देश की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को विराम देना ही होगा। यूक्रेन के आंतरिक और रूस के साथ उसके विवाद का निपटारा हो यह विश्व समुदाय के हित में है। दुनिया में ऐसे बहुत सारे विवाद हैं और सबके समाधान के लिए युद्ध का विकल्प अपनाया जाने से संपूर्ण मानवता का नाश हो सकता है। कम से कम विश्व समुदाय मिल बैठकर विचार अवश्य करे कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए। कितने समय तक सामने आ रही समस्याओं से कोई भागेगा? ऐसा नाहो कि जब तक समझ ले तब तक देर हो जाए। अवधेश कुमार,ई 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092 ,मोबाइल -98110 27208

सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

राष्ट्रीय सेक्युलर मंच एवं गांधी भवन का संयुक्त आयोजन

 राष्ट्रीय सेक्युलर मंच एवं गांधी भवन का संयुक्त आयोजन
प्रतिवर्ष के अनुसार इस वर्ष भी दिनांक 28 फरवरी को हम सद्भावना दिवस के रूप में मनाएंगे। जैसा कि हम सब जानते हैं 28 फरवरी 2002 को देश के इतिहास के सबसे वीभत्स दंगों की शुरूआत हुई थी।
हम चाहते हैं कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इसके लिए क्या उपाय किए जाएं इस पर हम विचार करेंगे। इसके साथ ही पूर्व आईएएस अधिकारी स्वर्गीय एम. एन. बुच द्वारा गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री को लिखे गए एक पत्र का वाचन किया जाएगा और उन घटनाओं पर लिखी गई कुछ मार्मिक कविताओं का वाचन भी होगा।
कार्यक्रम में आप आमंत्रित हैं।
कार्यक्रम विवरण
        दिनांक        -        28 फरवरी 2022
        समय        -        सायं 5.30 बजे
        स्थान        -        प्रवेश द्वार का बरामदा, गांधी भवन, भोपाल
       
     सधन्यवाद,
भवदीय
दयाराम नामदेव, एल. एस. हरदेनिया, (मो. 9425301582) आशा मिश्रा, शैलेन्द्र शैली, जावेद

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/