गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

माहौल बिगाड़ने के विरुद्ध घातक प्रतिक्रिया

अवधेश कुमार

पहले चरण के मतदान के साथ पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की शुरुआत हो गई है। वैसे तो ये सभी चुनाव महत्वपूर्ण है लेकिन सबसे ज्यादा नजर उत्तर प्रदेश एवं उसके बाद पंजाब पर लगी हुई है। पंजाब सुरक्षा की दृष्टि से जम्मू कश्मीर के बाद दूसरा सबसे संवेदनशील राज्य है। पिछले करीब 1 साल से पंजाब कांग्रेस में मची हलचल और कैप्टन अमरिंदर सिंह के विदाई के बाद बदलते  राजनीतिक समीकरणों के कारण लोगों की उत्सुकता यह जानने में है कि वहां के आगे की राजनीति का बागडोर किसके हाथों में रहेगा। जिस तरह पिछले कुछ महीनों में वहां फिर से उग्रवाद पैदा करने के प्रमाण मिले हैं उससे भी या चुनाव महत्वपूर्ण हो गया है।  इसके समानांतर भारत का शायद ही कोई कोना हो जहां राजनीति में रुचि रखने वाले व्यक्ति की निगाहें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर न लगी हो। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद भारत भर में अपने समर्थकों और विरोधियों का समूह खड़ा किया है। उत्तर प्रदेश के चुनाव को  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ,उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य क साथ पूरी भाजपा का विरोध करन वालों ने जिस वैचारिक स्तर पर लिया है उससे यह किसी राज्य का विधानसभा  चुनाव न होकर राष्ट्रीय चुनाव जैसा हो गया है। आप देखेंगे कि सोशल मीडिया ही नहीं, मुख्य मीडिया के माध्यम से यह उन देशों में भी चर्चा का विषय बना है जिनकी अभिरुचि भारत में है। पंजाब को लेकर भी अभिरुचि भारत के बाहर है लेकिन उसका चरित्र उत्तर प्रदेश से अलग है। 


 इसमें असदुद्दीन ओवैसी का हमला देश और विदेश की मीडिया की सुर्खियां तथा व्यापक चर्चा का विषय बना ही था। एक सांसद पर हमला होगा तो  संसद के अंदर उसकी जानकारी देना सरकार का दायित्व बनता है। इस नाते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असदुद्दीन ओवैसी पर हुए हमले की पूरी जानकारी और कानूनी स्थिति को संसद में रख दिया। असदुद्दीन ओवैसी पर हमला से लेकर संसद के बयान तक  पश्चिम उत्तर प्रदेश का चुनाव अभियान अपने चरम पर आ चुका था।यद्यपि हमलावर गिरफ्तार हो चुके हैं। उनका पिछला कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है। वे किसी संगठन से भी नहीं जुड़े हैं। उनके सोशल मीडिया अकाउंट से पता चलता है कि किस तरह उनके अंदर  बढ़ते इस्लामिक कट्टरता को लेकर गुस्सा था और वे इसे राष्ट्रभक्ति के रूप में लेकर किसी भी स्तर पर जाने को तैयार थे। कानून अपने अनुसार उनको सजा देगा। अभी तक की जांच में   ऐसा कोई पहलू नहीं मिला है  जिससे रत्ती भर भी संदेह हो कि इसके पीछे किसी संगठन या किसी संगठित समूह की  भूमिका थी। लेकिन देख लीजिए ऐसा लग रहा है जैसे सुनियोजित तरीके से उन पर हमला कराया गया हो।  सच कहें तो उत्तर प्रदेश चुनाव में जिस तरह का  माहौल बनाया गया है प्रतिक्रियाएं भी उसी के अनुरूप आ रहीं हैं। सच यह है कि  पूरे चुनाव के दरमियान गैर भाजपा दलों ने मुसलमानों के अंदर डर का मनोविज्ञान पैदा करने की कोशिश की है। यद्यपि सपा और रालोद के शीर्ष नेता सार्वजनिक वक्तव्य में ऐसी कोई बात कहने से बचते हैं जिससे लगे कि वे किसी स्तर पर मुसलमानों को आकर्षित करने में लगे हैं। कारण साफ है। उन्हें भय है कि अगर यह संदेश चला गया कि वे मुसलमानों के वोट के लिए लालायित हैं तो वर्तमान वातावरण में हिंदुओं का बड़ा समूह इसके विरुद्ध मतदान कर सकता है। इसलिए वे सार्वजनिक स्तर पर नहीं बोलते लेकिन उस क्षेत्र का दौरा करने वाले जानते हैं कि किस तरह पूरा वातावरण बनाया गया है। मुसलमानों के अंदर भाजपा और और उसके समर्थक हिंदुओं का भय पैदा कर वोट लेने की रणनीति ने घातक तनाव और सांप्रदायिकता का वातावरण पैदा कर दिया है। इसके परिणाम क्या हो सकते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं।

 दूसरी ओर असदुद्दीन ओवैसी  की सोच लंबे समय से देश के सामने है। हैदराबाद से बाहर निकलकर उन्होंने देश भर में  स्वयं को मुसलमानों का सबसे बड़ा रहनुमा साबित करने के लिए  जिस आक्रामकता से अपने घातक विचारों की अभिव्यक्ति की है उससे वातावरण  विषाक्त हो रहा है। वे  इस समय उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की बात ऐसे करते हैं मानो वर्तमान शासन में  उन्हें हिंदुओं के बड़े समूह के दबाव और आतंक में जीना पड़ रहा है। वे बैरिस्टर हैं इसलिए सोच समझकर ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते जिससे कानूनी रूप से गिरफ्त में आ सकें।  ओवैसी बंधुओं के बयानों ने पूरे भारत में गैर मुस्लिम समुदाय खासकर हिंदुओं के बड़े समूह के अंदर गुस्सा पैदा किया है। कौन जानता है कि उनके भाषणों और बयानों के कारण स्थानीय स्तर पर कैसी स्थिति बनी होगी।  विवेकशील व्यक्ति कभी नकारात्मक या हिंसक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते,  किंतु हमारा संपूर्ण समाज हर समय विवेक और संतुलन से ही विचार करें यह आवश्यक नहीं।  असंतुलित , नासमझ और विषयों की सही समझ न रखने वाले  उत्तेजना में ना तक जा सकते हैं। पता नहीं लोग गुस्से में क्या-क्या कर बैठते हैं।  ओवैसी, सपा, रालोद, कांग्रेस या ऐसे अन्य दलों के नेता समझने को तैयार नहीं कि मुस्लिम वोट पाने या मुसलमानों को भाजपा के विरुद्ध उकसाने के उनके रवैया के विरुद्ध  भी प्रतिक्रिया हो रही है। ओवैसी पर जानलेवा हमला  समझने के लिए पर्याप्त है कि पूरा माहौल किस खतरनाक दिशा में जा रहा है।  यह तो सौभाग्य कहिए कि  हमारे समाज का बहुमत हिंसा को कभी समर्थन नहीं देता इसलिए इस तरह की हिंसक प्रतिक्रियाओं की बहुत ज्यादा संभावना नहीं दिखती। लेकिन अगर प्रतिक्रिया में ऐसे तत्व बन रहे हैं तो क्या थोड़ा ठहर कर अपनी पूरी राजनीति पर इन दलों को विचार नहीं करना चाहिए?

 बार-बार अगर जाट मुस्लिम एकता की बात की जाएगी तो उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया भी होगी। इसी तरह कोई बार-बार मुसलमानों का पीड़ित तथा  शासन के अंदर उन्हें दबा कुचला बताएगा तो उससे खीझ व गुस्सा पैदा होगा। वैसे भी  जिस जाट मुस्लिम एकता की बात की जा रही है वैसा ही धरातल पर नहीं है।   जाट  ऐसे नहीं है कि अपनी जाति के किसी एक व्यक्ति के कारण एक पार्टी के खिलाफ हो जाए। कानून व्यवस्था अपना काम करेगा लेकिन प्रति क्रियात्मक तनाव का वातावरण बनाते हुए कानून व्यवस्था को दोषी ठहराने वालों को क्या कहा जाएगा?  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कैराना से लेकर अन्य जगहों के बारे में दिए गए वक्तव्यों को विरोधी सांप्रदायिकता का प्रतीक बताते हैं। इस पर हमारी आपकी जो भी राय हो लेकिन क्या कैराना से हिंदुओं का पलायन नहीं हुआ था? क्या वे हिंदू फिर से वर्तमान शासन में वापस नहीं आए? भाजपा स्वभाविक ही इसे उठाएगी और बताएगी कि पूर्व शासन में किस तरह एक समुदाय का मनोबल बढ़ा दिया गया था। ओवैसी, सपा रालोद या कांग्रेस के लिए मुसलमानों के विरुद्ध कोई घटना मुद्दा है तो हिंदुओं के साथ ऐसी घटनाएं मुद्दा क्यों नहीं  बन रही है?  आप अगर अपने वक्तव्य और रणनीति में  जिम्मेदार रहेंगे तो भाजपा को इसका अवसर नहीं मिलेगा।  आपको लगता है कि मथुरा का मुद्दा उठा देंगे तो मुसलमान वोट कट जाएगा  लेकिन भाजपा सोचती है कि यह मुद्दा हिंदुओं के दिलों में है इसे उठाना चाहिए तो उठा रही है। ओवैसी इसके विरुद्ध अगर आग उगलेंगे  तो हिंदुओं के अंदर प्रतिक्रिया होगी क्योंकि करोड़ों की आस्था वहां है। आप कहेंगे कि मुजफ्फरपुर दंगे को भुला दीजिए तो उसे भुलाने के लिए आपने क्या किया यह भी तो सवाल उठता है।

 पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाने वाले जानते हैं कि जमीन के स्तर पर ये सारे सवाल उठ रहे हैं। मतदाता अवश्य समझ रहे होंगे कि उत्तर प्रदेश ही नहीं संपूर्ण भारत और भारत के बाहर के लोग इस चुनाव को किस रूप में ले रहे हैं। इस चुनाव  को प्रभावित करने के पीछे कौन-कौन सी शक्तियां चारों तरफ सक्रिय हैं।ओवैसी हमला मतदान वे प्रदेश में कैसा माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। निश्चित रूप से विवेकशील मतदाता इन सारी स्थितियों को देख रहे होंगे और उसके अनुसार ही हुए अपना मतदान करेंगे।

 अवधेश कुमार, ई 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 981102 7208

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

बजट में अर्थव्यवस्था के सभी अंगो का ध्यान रखा गया

अवधेश कुमार 

वित्त मंत्री  निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत चौथे बजट के बारे में अगर थोड़े शब्दों में कहना हो तो यही कहा जाएगा कि नरेंद्र मोदी सरकार की पहले से चली आ रही दीर्घकालीन लक्ष्य से भारत को मजबूत आर्थिक शक्ति बनाने के लक्ष्य को ही साधने वाला है। उन्होंने अपने भाषण के आरंभ में कहा भी की आजादी के 75 में वर्ष में अगले 25 वर्ष यानी आजादी के 100 वर्ष पूरा होने तक के आधार देने वाला बजट है।वित्त वर्ष 2023 के लिए कुल 39.45 लाख करोड़ रुपये का बजट भारत के बढ़ते वित्तीय आकार का द्योतक है। हालांकि प्रश्न उठाया जा सकता है कि जब  कुल आमदनी 22.84 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है तो फिर इतने खर्च के लिए धन आएगा कहां से? हम सब जानते हैं कि सरकार हम एक स्रोतों से बजट लक्ष्य को पूरा करने के लिए धन प्राप्त करती है और यह एक स्थापित व्यवस्था है। कोरोना की मारने विश्व के अन्य देशों की तरह भारत की अर्थव्यवस्था को भी काफी क्षति पहुंचाई। हालांकि देश की अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति 2020-21 की तुलना में बेहतर है। 2020-21 में राजकोषीय घाटा 9.3% की ऊंचाई तक चला गया था जो खतरनाक था। 2021-22 में इसे घटाकर सकल घरेलू उत्पाद का 6.8% का लक्ष्य रखा गया था और यह पूरा हुआ। 2025 26 तक राजकोषीय घाटा का लक्ष्य 4.5% तक लाने का लक्ष्य सरकार ने पहले से घोषित किया हुआ है। अप्रैल से नवंबर 2021 के जो वास्तविक आंकड़े हैं उनके अनुसार इस वित्तीय वर्ष का राजकोषीय घाटा लक्ष्य से भी बेहतर यानी 6.6% रह सकता है। 

यह कोरोना महामारी से पीड़ित अर्थव्यवस्था के लिए सामान्य उपलब्धि नहीं है। यह उपलब्धि तब और बड़ी हो जाती है जब पता चलता है कि 2021-22 के प्रस्तावित बजट खर्च में अनुपूरक मांग जोड़कर 35 लाख करोड़ से 38 लाख करोड़ कर दिया गया जबकि दूसरी ओर विनिवेश से 1.75 लाख रुपए रुपए की आय का लक्ष्य था जबकि प्राप्ति इसके 5 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो पाई है। 

इन सबके बावजूद अगर राजकोषीय घाटा लक्ष्य भी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है तो इसका मतलब है कि विकास की गति तेज है और राजस्व अपेक्षा अनुरूप प्राप्त हो रहा है। 2021-22 के बजट में 17.9 लाख करोड़ प्राप्ति का लक्ष्य था। आयकर विभाग ने जो आंकड़े दिए है उसके अनुसार 16 दिसंबर 2021 तक शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 9.5 लाख करो रुपए हो चुका है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 61% ज्यादा है। वित्त मंत्रालय ने भी आंकड़ा जारी किया है जिसके अनुसार 2021-22 में प्रतिमाह औसतन 1.2 लाख करो रुपए का जीएसटी कर संग्रह हो रहा है। बजट पेश करने के पहले ही पिछले महीने का जीएसटी आंकड़ा 1.38 लाख करोड़ रहा है। इस तरह संतोषजनक कर राजस्व की प्राप्ति से केंद्र सरकार की आय बढ़ी है और राजकोषीय घाटा में अपेक्षा से बेहतर सुधार बता रहा है कि भारत मंदी के दौर से बाहर निकल रहा है। 2021-22 की पहली और दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर यानी आर्थिक वृद्धि दर क्रमश 20.1% और 8.4% रहने के बाद पूरे वर्ष सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर 9.2% रहने की संभावना है। बजट में इसे रेखांकित किया गया है। आर्थिक विकास दर में वृद्धि का एक बड़ा कारण सकल स्थाई पूंजी निर्माण के बेहतर स्थिति है जो वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 11% से ज्यादा बढ़ा और 2019-20 से तुलना करें तो 1.5% ऊपर चला गया है। यह तभी होता है जब अर्थव्यवस्था में बेहतर निवेश हो। इसलिए निर्मला सीतारमण के पास आत्मविश्वास और भविष्य के लिए बेहतर अपेक्षाओं के पर्याप्त आधार उपलब्ध है। इस समय वित्त मंत्री के सामने मुख्य लक्ष्य हर हाल में विकास की गति को और तेज करना तथा आम जन को ध्यान में रखते हुए समावेशी विकास करना है। इसके लिए निवेश बढ़ाना तथा लोगों की आय बढ़ाना आवश्यक है । इससे ही रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे तथा लोगों को महंगाई की मार से निजात मिलेगी। लोगों की जेब में पैसा आएगा तो वह खरीदारी करेंगे और इससे पूरी अर्थव्यवस्था ठीक तरीके से संचालित होगी। सीतारमण ने बजट भाषण में अपनी प्राथमिकताएं इस प्रकार बताई- पीएम गति शक्ति, समावेशी विकास, उत्पादकता वृद्धि और निवेश, सनराइज अपॉर्च्युनिटी, ऊर्जा संक्रमण और जलवायु पर कदम और निवेश का वित्तपोषण।  उन्होंने यह भी कहा कि पीएम गति शक्ति 7 इंजनों द्वारा संचालित होती है: सड़क, रेलवे, हवाई अड्डे, बंदरगाह, जन परिवहन, जलमार्ग और रसद बुनियादी ढांचा। सभी 7 इंजन अर्थव्यवस्था को एक साथ आगे बढ़ाएंगे।  मापदंडों के आधार पर विचार करें तो 20000 करोड़ रुपए के निवेश से 2022-23 के बीच नेशनल हाईवे की लंबाई 25000 किमी तक बढ़ाए जाने का ऐलान है। मोदी सरकार सड़क रेल जलवायु यातायात को विश्व का आधुनिकतम मजबूत स्वरूप देने पर लगातार काम कर रही है। इसमें पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक सड़कों के लिए राष्ट्रीय रोपवे विकास कार्यक्रम को पीपीपी मोड में भी लेने की बात है।  इसी तरह सौर ऊर्जा लक्ष के साथ डीजल डिजिटल गतिविधियों को ऊंचाई तक ले जाना सरकार का एक बड़ा लक्ष्य है। 2030 तक सौर क्षमता के 280 गीगावाट के लक्ष्य के लिए 19,500 करोड़ रुपए का अतिरिक्त आवंटन किया गया है। इस साल 5 जी सेवा शुरू होगी । 2025 तक गांवों में ऑप्टिकल फाइबर बिछाने का काम पूरा होगा। अगले तीन  वर्षों के दौरान बेहतर दक्षता वाली 400 नई पीढ़ी की वंदे भारत ट्रेनें लाई जाएंगी। अगले तीन वर्षों के दौरान 100 प्रधानमंत्री गति शक्ति कार्गो टर्मिनल विकसित किए जाएंगे और मेट्रो प्रणाली के निर्माण के लिए नवीन तरीकों का कार्यान्वयन होगा। ये ऐसी महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं जिनके पूरा होने में निश्चित रूप से समय लगेगा लेकिन फोकस करके काम किया जाए तो भारत आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए पहले से बेहतर आधारभूत संरचना वाला देश बनेगा। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी एमएसएमई के योगदान को कोई नकार नहीं सकता। इसके लिए भी कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम के तहत 130 लाख से अधिक एमएसएमई को कर्ज दिए गए हैं। ईसीएलजीएस के दायरे को 50 हजार करोड़ रुपए से बढ़ाकर 5 लाख करोड़ रुपए तक कर दिया गया है। इससे 2 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त कर्ज मिल सकेगा। रेलवे छोटे किसानों और छोटे व मध्यम उद्यमों के लिए नए उत्पाद और कुशल लॉजिस्टिक सेवा तैयार करेगा। उद्यम, ई-श्रम, एनसीएस और असीम के पोर्टल्स को इंटर लिंक किया जाएगा, जिससे इनकी पहुंच व्यापक हो जाएगी। इसमें ऋण सुविधा, उद्यमशीलता के अवसरों को बढ़ाना शामिल होगा।

अर्थव्यवस्था में कार्बन फुटप्रिंट पहल को कम करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाओं में सॉवरेन ग्रीन बांड जारी किए जाएंगे।

कृषि क्षेत्र की ओर पूरे देश की नजर थी। भारत में कृषि जितना बेहतर होगा किसानों की आय जितनी बढ़ेगी आर्थिक ताकत को उतना ही सशक्त आधार मिलेगा। सरकार 2022 यानी इस वर्ष तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य पर कायम है। वित्त मंत्री ने कहा कि समावेशी विकास सरकार की प्राथमिकता है जिसमें धान, खरीफ और रबी फसलों के लिए किसान शामिल हैं। इसके तहत 1,000 लाख मीट्रिक टन धान की ख़रीद की उम्मीद है। इससे 1 करोड़ से अधिक किसान लाभान्वित होंगे। रबि के लिए 2021-22 में गेहूँ खरीफ में 2021-22 में 163 लाख किसानों से 1208 लाख मीट्रिक टन गेहूं और धान खरीदे जाने का लक्ष्य है। इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत 2.37 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किसानों के खाते में सीधे होगा।न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर जारी विवाद के बीच सरकार ने बजट के माध्यम से इसकी अस्पष्ट घोषणा करना उचित समझा है।  साल 2023 को सरकार ने मोटा अनाज वर्ष घोषित किया है। सरकार मोटे अनाज उत्पादों की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग पर जोर देगी। सिंचाई पर भी खासा जोर है। 44605 करोड़ रुपये की लागत से केन-बेतवा लिंक परियोजना को शुरू करने का ऐलान हुआ है।किसानों और स्थानीय आबादी को सिंचाई, खेती और आजीविका की सुविधा प्रदान करने वाली 9 लाख हेक्टेयर से अधिक किसानों की भूमि की सिंचाई प्रदान करने के लिए किया जाएगा। फसल मूल्यांकन, भूमि रिकॉर्ड, कीटनाशकों के छिड़काव के लिए किसान ड्रोन के उपयोग से कृषि और कृषि क्षेत्र में प्रौद्योगिकी की लहर चलने की उम्मीद है। वित्त मंत्री ने किसानों को डिजिटल और हाईटेक सेवाएं देने के लिए निजी और सार्वजनिक भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल की शुरुआत करने की घोषणा की। किसानों के लिए प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए, राज्य सरकारों और एमएसएमई की भागीदारी के लिए व्यापक पैकेज पेश किया जाएगा। ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 48,000 करोड़ रुपये से 80 लाख सस्ते घर बनाना जन कल्याण, विकास, रोजगार और समावेशी विकास  के लक्ष्य को एक साथ साधता। आत्मनिर्भर भारत के तहत 16 लाख नौकरियां तथा स्टार्ट अप के द्वारा 60 लाख का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन यह कई परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। 

तो लक्ष्य और सारी घोषणाएं उम्मीद पैदा करती हैं। समावेशी विकास किसी अर्थव्यवस्था का लक्ष हो सकता है। अर्थव्यवस्था में सभी वर्गों का ध्यान रखे जाने से लगता है सरकार संतुलित समावेशी आर्थिक विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रही है। हालांकि आयकर छूट की सीमा न बनाए जाने से निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग में थोड़ी निराशा है किंतु लगता है इसके लिए और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अगर आर्थिक विकास बढ़ता है हमारी आपकी आय बढ़ती है तो बहुत समस्या नहीं होगी लेकिन कोना के कारण देश के बड़े बढ़ती आय घटी और खर्च बड़ी है।अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ रही है और या उत्साहजनक स्थिति है। लेकिन वित्त मंत्री ने स्वयं कहा कि सारे लक इस बात को ध्यान में रखकर तय किए गए हैं कि कोरना महामारी अब नहीं आएगी। कामना करें कि मां मारी पहले की तरह आक्रमण नहीं करेगी।

अवधेश कुमार,  ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल-9811027208



शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

विपक्ष भाजपा को दबाव में लाने योग्य मुद्दा नहीं ढूंढ सका

अवधेश कुमार

सामान्य तौर पर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर से विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार बनाया जाना स्वाभाविक घटना होनी चाहिए। गोरक्ष पीठाधीश्वर के प्रमुख होने के साथ वहां से वे 1998 से 5 बार लगातार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। वह उनका मुख्य कार्यक्षेत्र रहा है। लेकिन विपक्षी दलों ने उसे भी एक बड़ा मुद्दा बना दिया है। पहले सपा के प्रमुख पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनके उम्मीदवारी पर प्रश्न उठाया एवं उपहास उड़ाया। उसके बाद से उनकी पूरी पार्टी लगातार यही कर रही है। कांग्रेस के भी कई नेता ऐसे बयान दे रहे हैं मानो गोरखपुर से उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने अपनी हार मान ली हो। प्रश्न है कि वो कहां से लड़ते तो माना जाता कि भाजपा ने सही फैसला किया? यह बात सही है कि उनके अयोध्या से लड़ने की चर्चा थी। कुछ लोगों ने उनके मथुरा से भी उम्मीदवार बनाए जाने की मांग की। अयोध्या भाजपा और पूरे संघ परिवार के लिए धार्मिक- आध्यात्मिक -सांस्कृतिक पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण प्रतीक है। श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के माहौल में यह कल्पना थी कि आदित्यनाथ वहां से उम्मीदवार बनेंगे तो उसका संदेश पूरे प्रदेश और देश में जाएगा। मथुरा से उनके उम्मीदवार बनाने की मांग के पीछे यही भाव था कि उस संघर्ष को ताकत मिलेगी एवं इस बात का संदेश जाएगा कि भाजपा प्रखर हिंदुत्व के अपने रास्ते पर कायम है। यह भी सच है कि अभी तक भाजपा की ओर से कभी नहीं कहा गया कि योगी आदित्यनाथ कहां से उम्मीदवार होंगे। गोरखपुर पर जब ऐसी प्रतिक्रिया है तो अयोध्या से उनकी उम्मीदवारी पर कैसी प्रतिक्रियाएं होती इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति पर दृष्टि रखने वाले जानते हैं कि विरोधी योगी आदित्यनाथ की अयोध्या से उम्मीदवार बनाए जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे क्योंकि उसके बाद की प्रतिक्रियाएं उन्होंने तैयार कर रखी थी। कुछ प्रतिक्रियाएं पहले से आने लगी थी। वास्तव में उन्हें अयोध्या से उम्मीदवार बनाए जाने पर पहली प्रतिक्रिया यही होती कि भाजपा समझ गई है कि वह हारने वाली है इसलिए उसने हिंदुओं के ध्रुवीकरण के लिए योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से उम्मीदवार बनाया है। यह अवसर विपक्ष को नहीं मिल पाया।

सही है कि भाजपा के अंदर विमर्श चला था कि योगी आदित्यनाथ को कहां से उम्मीदवार बनाया जाए। चर्चा में अयोध्या भी शामिल था। लेकिन कभी उसका फैसला नहीं हुआ। भाजपा की रणनीति यह है कि वह चुनाव में विजय के प्रति आत्मविश्वास से भरी हुई पार्टी दिखे। वह ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती जिससे लगे कि वह किसी तरह परेशान है या  अपने चुनावी भविष्य को लेकर चिंतित है। अयोध्या से उनके उम्मीदवार बनाए जाने का मतदाताओं पर क्या असर होता यह कहना कठिन है लेकिन इसका एक अर्थ निकाला जाता कि वह जीत को लेकर आश्वस्त नहीं है इसीलिए हिंदुत्व का सबसे बड़ा कार्ड खेला है। ध्यान रखिए, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को भी प्रयागराज के सिराथू से उम्मीदवार बनाया गया है जो उनका मुख्य कार्यक्षेत्र रहा है। भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व की संसदीय राजनीति में सामान्यतः बड़े से बड़े नेता अपने मुख्य कार्यक्षेत्र या स्थापित चुनाव क्षेत्र से ही चुनाव लड़ते हैं। इसके अपवाद अवश्य रहे हैं। पर अपवाद और असामान्य स्थिति में ही सामने आया। वैसे भाजपा द्वारा जारी अभी तक के उम्मीदवारों की सूची देखें तो उसमें भी यही लगता है कि पार्टी बिल्कुल सहज सामान्य तरीके से चुनाव में उतर रही है। बहुत ज्यादा विधायकों के टिकट नहीं काटे गए जबकि आम धारणा यही थी कि उसके विधायकों के खिलाफ जनता के अंदर असंतोष है और भारी संख्या में उनके टिकट काटे जाएंगे। तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उम्मीदवारी को पूरे संदर्भों से मिलाकर देखना चाहिए। योगी और मौर्या दोनों के लिए क्षेत्र से चुनाव लड़ने का मतलब यह हुआ कि उन्हें पूरे प्रदेश में चुनाव अभियान चलाने तथा रणनीति बनाने का पूरा अवसर उपलब्ध है। नई जगह से उनको अपने चुनाव की भी थोड़ी चिंता होती तथा कुछ न कुछ अतिरिक्त समय देना पड़ता। इस नाते भी भाजपा की दृष्टि से यह बिलकुल स्वाभाविक रणनीति है। यह भी न भूलिए कि गोरखपुर का चुनाव अंतिम चरण में है। इस तरह योगी आदित्यनाथ के पास प्रदेश की चुनाव कमान संभालने के लिए पूरा समय है।

इसके दूसरे पहलू भी हैं और यह विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने वाला है। लंबे समय से उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री विधानसभा से निर्वाचित होकर नहीं पहुंचा। योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्या को भी विधान परिषद से लाया गया था। वे चुनाव लड़ सकते थे लेकिन पार्टी ने यही निर्णय किया। इसके पहले अखिलेश यादव और मायावती दोनों विधान परिषद से ही निर्वाचित होकर मुख्यमंत्री बने रहे। तो भाजपा ने इससे यह संदेश दिया कि उसके मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों जनता के बीच से निर्वाचित होकर आएंगे। इस कारण विपक्ष के साथ समस्या हो गई कि वो क्या करें? बसपा ने साफ कर दिया है कि मायावती उम्मीदवार नहीं बनेंगी। सपा के अखिलेश यादव और कांग्रेस के प्रियंका वाड्रा के बारे में प्रश्न उठाया जा रहा था कि वो बताएं कि कहां से लड़ेंगे। सपा को आभास हो गया था कि अखिलेश यादव यदि चुनाव नहीं लड़ते तो भाजपा उनके विरुद्ध ज्यादा आक्रामक होगी। योगी की उम्मीदवारी तय होने के बाद अखिलेश यादव को ही मैनपुरी के सरल सीट से उम्मीदवार होने की घोषणा करनी पड़ी। या अभी उनका घरेलू क्षेत्रीय क्योंकि मुलायम सिंह ने पहला विधानसभा चुनाव वहीं से लड़ा था। यह पूरा क्षेत्र मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव का कार्य क्षेत्र रहा है। कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में ऐसा जनाधार नहीं है जो अब भाजपा को चुनौती दे सके। बावजूद प्रियंका वाड्रा के हाथ में चुनाव की कमान है तो उनसे भी भाजपा पूछेगी? भाजपा इसे मुद्दा बनाएगी इसमें कोई दो राय नहीं। अखिलेश यादव से भाजपा पूछ सकती है कि योगी के गोरखपुर से उम्मीदवार बनाने को आपने मुद्दा बनाया और आप भी तो अपने घर से ही चुनाव लड़ रहे है? उनकी आलोचना क्यों की? यदि वो किसी दूसरे क्षेत्र में जाते तो कहा जाता कि देखो अपने क्षेत्र में पराजय के भय से उन्होंने दूसरा क्षेत्र चुना है। कहने का तात्पर्य कि सपा, कांग्रेस या अन्य विरोधी भले गोरखपुर को लेकर कुछ भी बोले वे खुद इस घेरे आ गए हैं। यदि उन्होंने योगी की उम्मीदवारी को मुद्दा बनाने की गलत रणनीति नहीं अपनाई होती तो ऐसी नौबत नहीं आती। आप जानबूझकर मुद्दा देंगे तो आपको भी उस के घेरे में आना ही पड़ेगा।

इनसे परे इसका एक अन्य पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण व गंभीर है। अभी तक के चुनाव अभियानों का गहराई से विश्लेषण करें तो निष्कर्ष आएगा कि विपक्ष चुनाव को प्रभावित करने की दृष्टि से कोई ऐसा बड़ा मुद्दा नहीं उठा पाया है जिसमें भाजपा घिरती हुई दिखे। गोरखपुर से मुख्यमंत्री के उम्मीदवार बनाए जाने को मुद्दा बनाने का अर्थ ही है कि आपके पास व्यापक सोच व दृष्टि का अभाव है। सच यही है कि विपक्ष अभी तक भाजपा के विरुद्ध केवल सामान्य मुद्दे उठा रहा है। मसलन, आर्थिक विकास नहीं हुआ, काशी उद्धार कर दिया उससे क्या भक्तों का पेट भर जाएगा ,विकास विज्ञापन में है जमीन पर नहीं है ,मुस्लिम विरोधी है, योगी अलोकप्रिय हैं ,उनको जनता घर भेजने वाली है आदि आदि। बसपा ने अपना चेहरा और चरित्र बदलने की कवायद में अपनी आक्रामक छवि को बदला है। लेकिन सपा और कांग्रेस बिल्कुल आक्रामक हैं। उनसे उम्मीद की जा सकती थी कि वो भाजपा के सरकारों एवं प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री आदि की गतिविधियों का गहराई से मूल्यांकन कर ऐसे मुद्दे सामने लाएंगे जिससे भाजपा घिरेगी। ऐसा न करने के कारण वह नरेंद्र मोदी सरकार, प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार एवं भाजपा आरएसएस को लेकर वही सब बातें कर रहे हैं जो लंबे समय से किया जाता रहा है। वो ऐसी सामान्य बातें हैं जो पहले भी बेअसर रही हैं। इनसे जनता का बड़ा वर्ग प्रभावित होकर भाजपा विरोधी हो जाएगा और विपक्ष के समर्थन में मतदान करेगा ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। इसे दुर्भाग्य ही मानना होगा कि अभी तक विपक्ष भाजपा के विरुद्ध उसे दबाव में लाने  तथा जनता को प्रभावित करने योग्य  मुद्दे नहीं ढूंढ सका।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल - 98110 27208

बुधवार, 19 जनवरी 2022

अस्सी बनाम बीस प्रतिशत

अवधेश कुमार 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा 80% बनाम 20% का बयान जिस सघन बहस,  विवाद और बवंडर का आधार बना है वह अस्वाभाविक नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ और कुछ हद तक गृह मंत्री अमित शाह ऐसे नाम हैं, जिनके एक-एक शब्द का विशेष दृष्टिकोण और परिधि के तहत पोस्टमार्टम किया जाता है। उत्तर प्रदेश चुनाव के बीच उनके इस बयान का ऑपरेशन नहीं हो और शोर न मचे यह संभव ही नहीं था। योगी आदित्यनाथ जी ने एक टीवी चैनल के काॅन्क्लेव में मेरे ही प्रश्नों के उत्तर मेंयाह कहा था। हालांकि मैंने जब प्रश्न किया था तब भी मुझे उम्मीद थी कि उनके द्वारा दिया गया इसका उत्तर मीडिया की सुर्खियां के साथ बहस का विषय बनेगा। जिस समय वे उत्तर दे रहे थे उसी समय साफ हो गया था कि आने वाले समय में चुनाव तक ये शब्द गूंजते रहेंगे। प्रश्न है कि क्या वाकई इसके जो अर्थ लगाए जा रहे हैं वे सही हैं? क्या मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए उत्तर के पीछे वही निहितार्थ और भाव थे जो बताए जा रहे हैं?

आम निष्कर्ष यही निकाला गया है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के अंदर 19 - 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी को ध्यान रखते हुए ही कहा कि 80 प्रतिशत और 20प्रतिशत  का चुनाव होगा। 80 प्रतिशत सकारात्मक दृष्टि से भाजपा का समर्थन देंगे और 20 नकारात्मक दृष्टि से पहले भी विरोध करते रहे हैं, आगे भी करेंगे लेकिन सरकार भाजपा की बनेगी। हम किसी के हृदय में घुसकर नहीं देख सकते क अंदर क्या चल रहा है। उनके मस्तिष्क में कौन सा विचार है और कहां निशाना है इसको जानने के लिए कोई यंत्र विकसित नहीं हुआ है। किसी के व्यक्तित्व ,पृष्ठभूमि, संदर्भ, परिस्थितियां आदि के आधार पर निष्कर्ष निकालते हैं। सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि मेरे प्रश्न क्या थे। मैंने योगी जी से यह कहते हुए प्रश्न किया था कि मेरे प्रश्न तो एक ही है लेकिन इसके तीन अलग-अलग अंग हैं। मैंने पूछा था कि यदि आपको मतदाताओं से कहना हो कि किसी सूरत में विपक्ष का समर्थन नहीं करें तो आप क्या कहेंगे? इसके साथ मैंने कहा था कि सपा और बसपा जैसे मुख्य दलों के अलावा आपके दो बड़े विरोधी या विपक्ष मैंने उत्तर प्रदेश में महसूस किया है। पहला, उत्तर प्रदेश का चुनाव केवल एक प्रदेश का नहीं है, पूरे देश में और देश के बाहर विदेश में भी जो नरेंद्र मोदी, अमित शाह और आदित्यनाथ योगी को हराना चाहते हैं उनके लिए यह एक बड़ा एजेंडा है। वह उत्तर प्रदेश में ,देश में और विदेश में सक्रिय हैं। वे लोगों के बीच जा रहे हैं, कई तरीकों से अपनी बात कर रहे हैं और उनका प्रभाव भी है। तो उनसे निपटने या उनकी चुनौतियों का सामना करने के लिए आपकी तैयारी क्या है? दूसरा, मैं मुसलमानों के बीच जा रहा हूं। मुसलमान कह रहे हैं कि यह सरकार तो हिंदुओं की है। हमको तो इस सरकार को हराना है। तो ये जो दो बड़े विपक्ष या विरोधी हैं इनसे आप कैसे निपटेंगे ,इनकी चुनौतियों का कैसे सामना करेंगे? इसी का उन्होंने उत्तर दिया था।

उन्होंने कहा था कि सत्ता में हमने बिना भेदभाव के सबका विकास किया है  लेकिन किसी का तुष्टीकरण नहीं किया है। जैसा हम जानते हैं उत्तर प्रदेश के पूर्व शासन पर मुसलमानों के तुष्टीकरण यानी उनको विशेष प्राथमिकता और बढ़ावा देने का आरोप हो रहा है और यह प्रमाणित हुआ है। उन्होंने कहा कि कोई इसे हमारी कमजोरी मानता है तो माने। राष्ट्रवाद के प्रति हमारी प्रतिबद्धता है। जो राष्ट्र विरोधी हैं हिन्दू विरोधी हैं वे हमें नहीं मानेंगे।  उनका इसी में कहना था कि मोदी जी और योगी जी अपने गर्दन काट कर तश्तरी में सजा देंगे तब भी वो वर्ग हम पर विश्वास नहीं करेगा। इसी के आगे उन्होंने 80% और 20% वाली बात की थी।

इसका हम अपने अनुसार अर्थ लगाने के लिए स्वतंत्र हैं। यह बात सही है कि मैंने स्पष्ट रुप से मुसलमान शब्द का प्रयोग करके ही प्रश्न पूछा था। इसलिए उनके उत्तर को इस संदर्भ में देखा जाना स्वभाविक है। हालांकि उनके पूरे वक्तव्य को साथ मिलाकर देखा जाए तो उनका निहितार्थ यही था कि हमने सरकार होने के नाते सबके लिए काम किया है, न किसी को विशेष बढ़ावा दिया न किसी की अनदेखी की और यही करेंगे लेकिन कुछ लोग हैं जो हम पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं। उन्होंने इसमें राष्ट्र विरोधी, हिन्दू विरोधी शब्द प्रयोग किया और राष्ट्रवाद के प्रति  प्रतिबद्धता जताई। हां ,उन्होंने विश्वास करने या समर्थन करने की अपील नहीं की। उन्होंने यही कहा कि वो शक्तियां मोदी जी और योगी जी को क्यों वोट देंगे? उनके कहने का एक अर्थ यही था कि जो सकारात्मक दृष्टि से विचार करेंगे वो हमको वोट देंगे लेकिन नकारात्मक सोच रखने वाले न पहले दिया है न आगे देंगे।

योगी आदित्यनाथ अपनी स्पष्टता और प्रखरता के लिए विख्यात है। वो गोल मटोल या छायावादी शैली में बात नहीं करते। उनकी सरकार में माफिया और अपराधियों के विरुद्ध जैसी कठोर कार्रवाई हुई है उसकी कल्पना शायद ही किसी को रही हो। इसमें मुसलमानों की संख्या बहुत है। लेकिन क्या जितने बड़े अपराधियों ,माफियाओं ,गैंगस्टरों के विरुद्ध कार्रवाई हुई है उनके बारे में पहले से पता नहीं था? इनमें कौन है जिनके बारे में कहा जाए कि वे निर्दोष थे और सरकार ने जानबूझकर मुसलमान होने के कारण बड़े-बड़े मुकदमा करके उन्हें जेल में डाल दिया? वे सारे साधनसंपन्न हैं और न्यायालय में जितना चाहे खर्च कर सकते हैं, कर भी रहे हैं। जाहिर है, पहले की सरकारें उन पर हाथ डालने से बचती थी। योगी आदित्यनाथ सरकार ने निर्भीकता से इनके विरुद्ध कार्रवाई की। इसे कोई मुस्लिम विरुद्ध कार्रवाई कहे तो उससे पूछा जा सकता है कि क्या अपराधियों के विरुद्ध भी यह देखकर पुलिस काम करेगी कि यह किस समुदाय के हैं? मेरे प्रश्न में यह शामिल भी था। उत्तर प्रदेश में घूमने वाला कोई भी स्वीकार करेगा कि मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद ,आजम खान आदि के विरुद्ध कार्रवाइयों को इस रूप में प्रचारित किया गया है कि सरकार मुसलमान होने के कारण इन्हें परेशान कर रही है। बहुत सारे मुसलमान मानते हैं कि ये बाहुबली व अपराधी हैं ,इन्होंने सत्ता और शक्ति का दुरुपयोग किया है लेकिन बहुत बड़े वर्ग के अंदर इसे लेकर विकृत धारणा है। मुसलमानों का बहुमत भाजपा को आज भी अपना विरोधी मानता है तथा उसे हराने के लिए रणनीतिक मतदान करने वाला है। आप किसी मुस्लिम आबादी में चले जाइए आपको भाजपा विरोधी वातावरण मिलेगा। इक्का-दुक्का लोग समुदाय का विरोध झेल कर भाजपा समर्थन की बात कर देते हैं । उत्तर प्रदेश में सरकार के सामाजिक आर्थिक विकास एवं कल्याण कार्यक्रमों का आंकड़ा बताता है कि मुसलमानों को उनके 19% आबादी के मुकाबले सभी योजनाओं का 34% अनुपात प्राप्त हुआ है।

नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ या ऐसे अनेक नेताओं की हिंदुत्व के प्रति प्रतिबद्धता है। किंतु सरकार के रूप में उन्होंने मुस्लिम विरोधी काम किया है इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। हां, जिन मुद्दों को पहले की सरकारें छूने से बचती थी इन्होंने उन पर खुलकर काम किया है। दूसरी सरकार होती तो अयोध्या का फैसला आने के बाद भी मंदिर निर्माण के दिशा में आगे बढ़ने से बचती। काशी विश्वनाथ को भव्य रूप देने का माद्दा कोई सरकार नहीं दिखाती। इलाहाबाद को प्रयागराज या फैजाबाद को अयोध्या करने से लेकर धर्म संस्कृति से जुड़े स्थलों के विकास, अनेक कब्जा किए गए मंदिरों को मुक्त कराकर निर्माण का कार्य या लव जिहाद के विरुद्ध धर्म परिवर्तन संबंधी कानून, गौ हत्या निषेध ,अवैध बूचड़खाना बंद करना, शिक्षा के क्षेत्र में आवश्यक परिवर्तन आदि कार्य कोई दूसरी सरकार नहीं करती। यह सब भारतीय सभ्यता संस्कृति और अध्यात्म के गौरव को पुनर्स्थापित करना है। इसे मुस्लिम विरोधी कहने से बड़ी विडंबना कुछ नहीं हो सकती। ये काम पहले की सरकारों को भी करना चाहिए था। मुस्लिम वोटों के भय से चाहते हुए भी किसी सरकार ने नहीं किया। अंतर यही है। इस सरकार ने मुस्लिम वोटों की चिंता नहीं की यह सच है। लेकिन यह भी सोचिए कि कोई समुदाय इस पर अडिग हो जाये कि हर हाल में भाजपा के विरोध में वोट देना है तो उसे क्या कहा जा सकता है? शांत होकर इस प्रश्न का उत्तर तलाशिये।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर,  पांडव नगर कंपलेक्स,  दिल्ली-110092, मोबाइल-9811027208

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