मंगलवार, 21 सितंबर 2021
सोमवार, 20 सितंबर 2021
गुरुवार, 16 सितंबर 2021
भाजपा में मुख्यमंत्री बदलने के मायने
गुजरात के मुख्यमंत्री पद से विजय रूपाणी का इस्तीफा तथा पहली बार विधायक बने भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया जाना पूरे देश को चौंकाने वाली घटना बनी है। इसके पहले कभी नहीं देखा गया कि एक मुख्यमंत्री दोपहर में प्रधानमंत्री के साथ कार्यक्रम में रहता हो और शाम को पत्रकारों के सामने आकर यह कहे कि मैंने पद से इस्तीफा दे दिया है। जिस समय वो इस्तीफे की घोषणा कर रहे थे उनके चेहरे पर किसी प्रकार का दुख, अवसाद या मलाल का भाव नहीं देखा जा रहा था। हालांकि किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़े तो उसको अंदर से अच्छा नहीं लगेगा। किंतु रूपाणी ने कहा कि कार्यकर्ता के नाते उन्हें जिम्मेवारी मिली, 5 वर्ष की जिम्मेवारी छोटी नहीं होती, आगे पार्टी के कार्यकर्ता के नाते जो जिम्मेदारी देगी उसका मैं पालन करूंगा। विधायक दल की बैठक में उनके द्वारा ही मुख्यमंत्री के रूप में भूपेंद्र पटेल का नाम प्रस्तावित करना बताता है कि तैयारी पहले से थी। राष्ट्रीय संगठन मंत्री बीएल संतोष, भाजपा के वरिष्ठ नेता केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का वहां पहले से पहुंचना इस बात का संकेत था कि नेतृत्व परिवर्तन की कवायद पहले से चल रही थी। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और प्रहलाद जोशी तथा भाजपा के राष्ट्रीय में महासचिव तरुण चुग का वहां होना भी यही साबित करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि केंद्रीय नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी ,अमित शाह और जेपी नड्डा ने आपसी विमर्श के बाद यह फैसला किया होगा तथा विजय रुपाणी को सूचित किया गया होगा।
राजनीतिक विश्लेषक इसके कई कारण गिना सकते हैं। विरोधी पार्टियां भी अपने-अपने तरीके से इसका विश्लेषण कर रही है । यह भी नहीं कह सकते कि जो कुछ कहा जा रहा है वो सारी बातें गलत हैं। यह सही है कि 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीटें 2012 के 115 से घटकर 99 तक सिमट गई तथा कांग्रेस की सीटें 61 से बढ़कर 77 हो गई। सच यही है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत पाने के लिए नाकों चने चबाने पर पड़े। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को करीब तीन दर्जन सभाएं करनी पड़ी। अमित शाह चुनाव के काफी पहले से लेकर परिणाम आने तक वहीं डटे रहे। वास्तव में भाजपा की पूरी शक्ति गुजरात में लगी हुई थी। तब किसी तरह बहुमत हासिल हो सका। अगर 2017 के विधानसभा चुनाव का विश्लेषण करें तो इनमें 16 सीटें ऐसी थी जिनमें भाजपा की विजय का अंतर 5000 या उससे कम थी। इसी तरह 32 सीटें ऐसी हैं जहां तीसरे नंबर पर रहने वाले उम्मीदवार को मिला हुआ वोट भाजपा और कांग्रेस के जीत हार के अंतर से ज्यादा था। ऐसी 18 सीटें भाजपा ने जीती थी। वस्तुतः गुजरात में पटेल या पाटीदार समुदाय के अंदर भाजपा के विरुद्ध असंतोष और विद्रोह कोई भी देख सकता था। अगर मोदी ने चुनावी सभाओं के अलावा भी दिन रात एक नहीं किया होता तो परिणाम पलट भी सकता था। तभी यह साफ हो गया था कि नरेंद्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में होना और उनकी पसंद के किसी का मुख्यमंत्री होना गुजरात की जनता के लिए समान मायने नहीं रखता।
आनंदीबेन पटेल को मोदी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में सामने रखा लेकिन उनके विरुद्ध पार्टी में ही असंतोष पैदा हो गया। फिर पाटीदार आरक्षण आंदोलन को जिस ढंग से उन्होंने हैंडल किया उसके विरुद्ध भी प्रतिक्रिया हो रही थी। हालांकि आनंदीबेन पटेल की अपनी कोई गलती नहीं थी लेकिन प्रदेश की राजनीति का ध्यान रखते हुए उनको हटाने का फैसला करना पड़ा तथा उनकी जगह विजय रुपाणी आए। विजय रुपाणी लोकप्रिय नेता न थे न हैं। इसमें 2022 के चुनाव में उनके चेहरे के साथ उतरना भाजपा के लिए जोखिम भरा होता। जाति कारक भी नकारा नहीं जा सकता। पटेल समुदाय के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने का नेता किसी को बताने की आवश्यकता भी नहीं। यद्यपि कांग्रेस 2017 के चुनाव में प्रभावी प्रदर्शन के बावजूद गुजरात में इस समय दुर्दशा का शिकार है लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। इसलिए चुनाव से करीब सवा वर्ष पूर्व यह फैसला किया गया। इसके अलावा जो भी बातें हैं वो केवल कयास हैं।
2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने यह नीति अपनाई थी कि जिसे भी मुख्यमंत्री की जिम्मेवारी दी जाए उसे काम करने दिया जाए। प्रदेश में अनेक मुख्यमंत्रियों के खिलाफ असंतोष थे, इनकी सूचना प्रधानमंत्री तक पहुंची लेकिन उन्होंने किसी का इस्तीफा नहीं लिया। झारखंड में मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ जनता तो छोड़िए पार्टी के अंदर ही व्यापक विद्रोह था। रघुवर दास को नहीं बदला और चुनाव में पार्टी सत्ता से विपक्ष में चली गई। झारखंड में लगभग 25 सीटें भाजपा अपनी ही पार्टी के विद्रोहियों के कारण हारी। स्वयं रघुवर दास को पार्टी के ही वरिष्ठ नेता सरजू राय ने विद्रोही उम्मीदवार के तौर पर पराजित कर दिया। हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के विरुद्ध पार्टी के अंदर असंतोष था। चुनाव के पहले से उनको हटाए जाने की मांग थी। उन्हें नहीं हटाया गया और परिणाम भाजपा को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। निर्दलीय में पांच ऐसे विधायक चुने गए जो भाजपा के विद्रोही थे तथा कई सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों को पार्टी के लोग ही हराने में भूमिका निभा रहे थे।इन दो घटनाओं से मोदी ने सबक लिया और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को जाना पड़ा। वहां भाजपा के लिए बड़ी अजीबोगरीब स्थिति हो गई जब तीरथ सिंह रावत ने 10 मार्च को पदभार ग्रहण करने के बाद 2 जुलाई को ही इस्तीफा दे दिया क्योंकि वे लोकसभा सांसद थे और चूंकि चुनाव का एक वर्ष बाकी था इसलिए छः महीने में वे विधायक निर्वाचित नहीं हो सकते थे। आज वहां पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री हैं। इसी तरह भाजपा ने कर्नाटक में वहां के वरिष्ठ और सर्वाधिक लोकप्रिय नेता बीएस येदियुरप्पा से इस्तीफा दिला कर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया है। वैसे तो मोदी ने अघोषित रूप से भाजपा के अंदर मुख्यमंत्री मंत्री आदि पद के लिए 75 वर्ष की उम्र सीमा तय की। बावजूद अपवाद के रूप में येदियुरप्पा को इसलिए मुख्यमंत्री बनाया और अभी तक बनाए रखा क्योंकि उनके समानांतर उस समय सरकार को संभालने व उसे बनाए रखने वाला कोई दूसरा नेता नहीं दिख रहा था। एक तो लंबे समय तक उन्हें आगे जारी नहीं रखा जा सकता था और दूसरे ,पार्टी के अंदर से उनके विरोध आवाजें उठने लगी थी। कहने का तात्पर्य है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने मुख्यमंत्री को हर हाल में बनाए रखने की अपनी नीति को बदल दिया है। वह किसी व्यक्ति को बनाए रखने के लिए राजनीतिक जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं है। यह भाजपा के दूसरे मुख्यमंत्रियों के लिए भी संकेत है।
इसकी चाहे आप आलोचना करिए या कुछ लेकिन इसमें विरोधी पार्टियों विशेषकर कांग्रेस के लिए सीख भी है। विपक्ष के नाते वह भाजपा की आलोचना करे, उसके विरुद्ध अभियान चलाए, लेकिन किस सामान्य तरीके से प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन करती है इसकी समीक्षा कर अपनी पार्टी के अंदर अपनाने की कोशिश करे। आप देख रहे हैं कि पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में किस ढंग से भाजपा के मुख्यमंत्री के विरुद्ध वहां के प्रमुख नेताव मंत्री विरोध कर रहे हैं, लंबे समय से अंतर्कलह सामने है, केंद्रीय नेतृत्व उसे संभालने की हर संभव कोशिश कर रहा है लेकिन स्थिति बदल नहीं रही। भाजपा ने कितनी आसानी से उत्तराखंड में दो-दो परिवर्तन किए, कर्नाटक और अब गुजरात में किए और कहीं से विद्रोह का स्वर सामने नहीं आया। पार्टी के अंदरूनी झगड़े या राजनीतिक चुनौतियों को किस ढंग से संभाला जा सकता है इसका यह एक उदाहरण है। कर्नाटक में येदियुरप्पा के पक्ष में तो लिंगायत समुदाय के साधु संत ही खड़े थे। वो विद्रोह कर सकते थे। बावजूद कितनी आसानी से उन्होंने आगामी मुख्यमंत्री के लिए रास्ता प्रशस्त किया यह देश के सामने है। आज के दौर में मुख्यमंत्री या बड़े पद पर कायम नेता से इस्तीफा दिलवाने के बावजूद सतह पर इतनी सहज और सामान स्थिति बनाए रखना आसान नहीं होता।
हालांकि स्वयं भाजपा के भविष्य की दृष्टि से इसके नकारात्मक परिणाम भी आ सकते हैं। एक समय कांग्रेस मैं केंद्रीय नेतृत्व जब चाहे मुख्यमंत्री को बदल सकता था। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में रिकॉर्ड मुख्यमंत्री बदले गए, राजीव गांधी के कार्यकाल में भी यह कायम रहा। लेकिन बाद के कार्यकाल में यह आसान नहीं रहा। इस कारण अलग-अलग प्रदेशों में कांग्रेस टूटी कमजोर होती गई और आज उसकी दशा हमारे सामने है। इंदिरा गांधी के समय तो मुख्यमंत्रियों के बारे में राजनीतिक विश्लेषक मेड इन दिल्ली शब्द प्रयोग करने लगे थे। इसलिए भाजपा राजनीतिक जोखिम दूर करने के लिए मुख्यमंत्री को बदले लेकिन भविष्य में यह संभव नहीं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की तरह ही सक्षम प्रभावी नेतृत्व हमेशा रहे जो ऐसे विरोध और विद्रोह को इतनी सहजता से संभाल सके।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092,मोबाइल- 98110 27208
शुक्रवार, 10 सितंबर 2021
अफवाहों पर न जाएं, भारत की अफगान नीति सही
अवधेश कुमार
भारत की अफगानिस्तान और तालिबान संबंधी नीतियों को लेकर जिस तरह के दुष्प्रचार और अफवाह बार-बार सामने आ रहे हैं उनसे आम भारतीय के अंदर भी कई प्रकार की आशंकाएं पैदा हो रही है। सोशल मीडिया पर सबसे बड़ा प्रचार यह हुआ कि भारत ने तालिबान को मान्यता दे दिया। यह भी कहा जा रहा है कि भारत ने गुपचुप तरीके से तालिबान से बातचीत की और उसके साथ काम करने को तैयार हो गया है। इसके पहले यह दावा किया जा रहा था कि सुरक्षा परिषद में भारत की अध्यक्षता में ही तालिबान को आतंकवादी संगठनों की सूची से बाहर कर दिया गया और भारत ने उसका समर्थन किया। इस तरह की खबरें अगर बार-बार सामने आए तो फिर संभ्रम और संदेह पैदा होना बिल्कुल स्वाभाविक है। तो सच क्या है?
सबसे पहले सुरक्षा परिषद संबंधी प्रस्ताव और मान्यता देने की खबरों पर बात करें। 15 अगस्त को तालिबान द्वारा काबुल पर आधिपत्य के बाद अगले दिन भारत की अध्यक्षता में 16 अगस्त को सुरक्षा परिषद की बैठक हुई और जो कुछ भी उसमें हुआ उसे एक बयान के रूप में जारी किया गया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति के हस्ताक्षर से जो बयान जारी किया गया उसे देखिए -- ‘सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने अफगानिस्तान में आंतकवाद से मुकाबला करने के महत्व का जिक्र किया है। ये सुनिश्चित किया जाए कि अफगानिस्तान के क्षेत्र का इस्तेमाल किसी देश को धमकी देने या हमला करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, और न ही तालिबान और न ही किसी अन्य अफगान समूह या व्यक्ति को किसी अन्य देश के क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादियों का समर्थन करना चाहिए।’ दोबारा 27 अगस्त को काबुल हवाईअड्डे पर हुए बम विस्फोटों के एक दिन बाद फिर परिषद की ओर से एक बयान जारी किया गया। इसमें 16 अगस्त को लिखे गए पैराग्राफ को फिर से दोहराया गया। लेकिन इसमें एक बदलाव करते हुए तालिबान का नाम हटा दिया गया। इसमें लिखा था- ‘सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने अफगानिस्तान में आतंकवाद का मुकाबला करने के महत्व को दोहराया ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि अफगानिस्तान के क्षेत्र का इस्तेमाल किसी भी देश को धमकी देने या हमला करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, और किसी भी अफगान समूह या व्यक्ति को किसी भी देश के क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादियों का समर्थन नहीं करना चाहिए।’ तो इतना ही है। इसमें तालिबान को मान्यता देने या तालिबान को आतंकवादी संगठनों की सूची से निकालने की कोई बात नहीं है। यह अफवाह उड़ाने वालों का उद्देश्य क्या हो सकता है इसके बारे में आप अपना निष्कर्ष निकालने के लिए स्वतंत्र है।
भारत ने अपने एक महीने की अध्यक्षता में पहल करके पहले अफगानिस्तान पर बैठक बुलाई और तालिबान का नाम लिए बिना आतंकवाद के बढ़ते खतरे को लेकर दुनिया को आगाह किया और उसमें समर्थन भी मिला। सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 2593 अफगानिस्तान को लेकर भारत की मुख्य चिंताओं को संबोधित करता है। आतंकवाद संबंधी प्रस्ताव पर नजर डालिए --'अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी और देश पर हमले, उसके दुश्मनों को शरण देने, आतंकियों को प्रशिक्षण देने या फिर आतंकवादियों का वित्तपोषण करने के लिए नहीं किया जाएगा। इस प्रस्ताव में खासतौर पर जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा का भी नाम लिया गया है। आज की परिस्थिति में भारत की दृष्टि से इससे अनुकूल प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता था।
अब आएं तालिबान के साथ बातचीत पर। 31 अगस्त को भारतीय विदेश मंत्रालय ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जानकारी दी कि भारत ने तालिबान से बातचीत की है। विदेश मंत्रालय ने बताया कि कतर में भारत के राजदूत दीपक मित्तल ने तालिबान के दोहा राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्तनेकजई से दोहा स्थित भारतीय दूतावास में मुलाकात हुई जिसके लिए तालिबान ने अनुरोध किया था। तालिबान ने इसका खंडन नहीं किया । चूँकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि तालिबान के अनुरोध पर बातचीत हुई यानी भारत ने बातचीत और संपर्क की पहल नहीं की तो इसे शत -प्रतिशत सच मानना ही होगा। बातचीत हुई तो किन विषयों पर? प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार भारतीय राजदूत ने अफगानिस्तान में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और उनकी भारत वापसी पर विस्तृत बातचीत की तथा कहा कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी तरह से भारत विरोधी गतिविधियों और आतंकवाद के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसके अनुसार शेर मोहम्मद अब्बास स्तनेकजई ने आश्वासन दिया कि इन मुद्दों को सकारात्मक नजरिए से संबोधित किया जाएगा। ऐसे समय जब चीन, रूस ,तुर्की ,कतर जैसे देश तालिबान के साथ सहयोगात्मक रवैया अपना चुके हैं अनेक देश उनके साथ काम करने के लिए आगे आ रहे हैं तथा एक बड़े समूह में दुविधा की स्थिति है। भारत ऐसी बातचीत के प्रस्ताव को ठुकरा कर भविष्य के लिए जोखिम नहीं उठा सकता था। वैसे भी अफगानिस्तान में जो भारतीय हैं उनकी सुरक्षा या उनको वहां से वापस लाने के लिए इस समय तालिबान से ही बात करनी होगी। भारत का राष्ट्रीय हित इसी में है कि किसी तरह आतंकवादी समूह और पाकिस्तान अफगानिस्तान की भूमि का उपयोग भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए न कर पाए । इसके लिए तालिबान से बातचीत करने में कोई समस्या नहीं है। बातचीत का कतई अर्थ नहीं है कि भारत ने तालिबान को आतंकवादी मानना छोड़ छोड़ दिया या उन्हें बिल्कुल मान्यता ही दे दिया । तालिबान के नेताओं ने कई बार कहा है कि भारत इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण देश है और हम भारत से अच्छे रिश्ते चाहते हैं। उनके प्रवक्ताओं ने भारत को अपनी परियोजनाओं पर काम जारी रखने को भी कहा है । उनका यह भी बयान आया है कि तालिबान किसी भी देश के विरुद्ध अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देगा । पर तालिबान की विश्वसनीयता इतनी संदिग्ध है कि हम उनके आश्वासन पर एकाएक भरोसा नहीं कर सकते । एक ओर तालिबान का यह बयान है तो दूसरी ओर यह भी कि जम्मू-कश्मीर सहित दुनिया भर के मुसलमानों के लिए आवाज उठाने का उसे अधिकार है। अल कायदा ने तालिबान के अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज होने के साथ यह भी ऐलान कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर को आजाद करने के लिए काम करेगा । तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद का बयान है कि चीन उसका सबसे निकट का साझेदार होगा । उसके अनुसार अफगानिस्तान चीन के बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव का अंग बनेगा । तालिबान ने चीन को अपने खनिज पदार्थों के दोहन का भी खुला निमंत्रण दे दिया है ।
कहने का तात्पर्य कि भारत के लिए इसमें तत्काल आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थिति है । यह ऐसा समय है जिसमें भारत के लिए निर्णय करना अत्यंत कठिन है । अगर राजनीतिक मतभेद को अलग कर एक देश के हित के नाते हम विचार करेंगे तो सबका निष्कर्ष यही आएगा। एक बड़े वर्ग का आरोप है कि तालिबान और अफगानिस्तान को लेकर हमारी नीति अस्पष्ट है और यह उचित नहीं है। अगर थोड़ी गहराई से पिछले कुछ महीनों में तालिबान और अफगानिस्तान के संदर्भ में घट रही घटनाएं तथा तालिबान के आधिपत्य से अब तक भारतीय रवैया पर नजर डालें तो निष्कर्ष थोड़ा अलग आएगा। वास्तव में अस्पष्टता ही इस समय के लिए स्पष्ट नीति है। अस्पष्टता की बात कर आलोचना करने वाले का अपना मत हो सकता है लेकिन विचार तो सारी परिस्थितियों को एक साथ मिलाकर करना होगा। अमेरिका ने भी तालिबान को मान्यता देने या राजनयिक संबंध बनाने की बात नहीं की है। राष्ट्रपति जो बिडेन नहीं कहा है कि तालिबान का चरित्र क्रूर रहा है पहले देखना होगा कि वे अपने को बदलते हैं या नहीं । जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल का भी बयान इतना ही है कि हम तालिबान के साथ बातचीत करना चाहते हैं। इसी तरह का विचार कई देशों का है और ज्यादातर देश अभी इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। तालिबान के साथ तुरंत संबंध बनाने का सुझाव किसी दूरगामी विचार विमर्श से नहीं आया। यह कहना आसान है कि भारत की नीति गलत है और हम अफगानिस्तान से बाहर हो गए। यानी अफगानिस्तान में बने रहना है तो तालिबान को मान्यता दे देना चाहिए। यह बात अलग है कि मान्यता देने के अफवाह में भी इसके विरुद्ध तीखे स्वर ही हैं।
भारत के लिए यह तो जरूरी है कि किसी न किसी माध्यम से वह वहां संपर्क और संवाद में रहे। स्तनेकजई इसके लिए एक बेहतर व्यक्तित्व है । सैनिक जनरल का उनका प्रशिक्षण देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री अकादमी में हुआ। इस कारण भारत से उनके संबंध पुराने हैं। भारत के अनेक वर्तमान और पूर्व जनरलों से उनके व्यक्तिगत रिश्ते हैं । दोहा में भारतीय राजदूत से मुलाकात के पहले ही एक वीडियो संदेश में कहा था कि भारत के साथ हम व्यापारिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को बहुत अहमियत देते हैं और इस संबंध को बनाए रखना चाहते हैं। स्तनेकजई ने भारत द्वारा बनाए जा रहे चाबहार बंदरगाह को भी उन्होंने महत्वपूर्ण बताया। हम जानते हैं कि चाबहार बंदरगाह और उससे जुड़ी परियोजनाएं कारोबारी और रणनीतिक दृष्टि से कितने महत्वपूर्ण हैं। कोई तालिबान नेता इन सबके पक्ष में बयान दे रहा है और वह भारत से बातचीत का आग्रह करता है तो उसे हर दृष्टि से स्वीकार किया जाना चाहिए था। इस नाते भारत का यह बिल्कुल सही कदम था। 15 अगस्त को काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद भारत ने जब दूतावास खाली करना शरू किया था तब स्तनेकजई की तरफ से ही भारतीय अधिकारियों से संपर्क साधा गया था और कहा गया था कि भारत अपना दूतावास बंद नहीं करे। भारत इन परिस्थितियों में कोई जोखिम नहीं उठा सकता। हम चीन नहीं हैं जिसके लिए पाकिस्तान लगातार सक्रिय था और उसके माध्यम से चीन का तालिबानों के साथ तालमेल भी बन गया। भारत कतर और तुर्की भी नहीं है। अफगानिस्तान पर सर्वदलीय बैठक में सरकार की ओर से विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट कहा कि हम लगातार सक्रिय हैं, हमारे लिए राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता है और इसके बाद हमारी व्यापारिक-रणनीतिक और अन्य आवश्यकताएं भी अफगानिस्तान से जुड़ी हैं। लेकिन आज की परिस्थितियों में तालिबान के नेतृत्व को लेकर हम जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहते। इसलिए वेट एंड वॉच यानी लगातार नजर रखना और समय की प्रतीक्षा करने की नीति पर चल रहे हैं। भारत के लिए इस समय यही सर्वाधिक सुसंगत और उपयुक्त नीति मानी जाएगी। लेकिन परिस्थिति बिल्कुल अलग है। हमारे लिए अफगानिस्तान में तालिबानों का आधिपत्य सबसे ज्यादा चुनौतियां का प्रश्न बन गया है। ऐसे समय अत्यंत ही सधे हुए और परिपक्व विचार एवं व्यवहार की आवश्यकता है। अफवाह उड़ाने ,अनावश्यक निंदा करने से देश को क्षति होगी। भारत की छवि कमजोर होती है।
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