गुरुवार, 2 सितंबर 2021

हवाई हमलों नेअमेरिका को और जटिल स्थिति में डाला

अवधेश कुमार

अमेरिका ने अफगानिस्तान से बोरिया-बिस्तर समेट लिया है। लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान में दो हवाई हमला किया जा चुका है। ये दोनों हमले भविष्य के लिए कई प्रश्न खड़े करते हैं। पहला हमला अफगानिस्तान के नंगहार प्रांत में किया गया था। अमेरिकी सेंट्रल कमान के प्रवक्ता ने दावा किया था कि हमने आईएसआईएस के खुरासान मॉडल यानी आईएसकेपी के ठिकाने पर मानव रहित हवाई हमला किया जिसमें काबुल हमले के साजिशकर्ता को मार दिया गया है। दूसरा हमला काबुल में ही किया गया और अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रवक्ता बिल अर्बन ने कहा कि अमेरिकी सैन्यबलों ने आत्मरक्षा में काबुल में एक गाड़ी पर एयरस्ट्राइक की है, जिसमें आईएसआईएस का बड़ा आतंकवादी मारा गया है, जो हामिद करजई अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के लिए खतरा था। आईएसकेपी ने काबुल हवाई अड्डे पर हमले की जिम्मेदारी ली थी। बाद में आईएस की आधिकारिक अमाक न्‍यूज एजेंसी के हवाले गार्जियन समाचार पत्र ने रिपोर्ट दिया कि आईएसकेपी ने आत्मघाती हमलावरों में से एक अब्दुल रहमान अल-लोगारी की तस्वीर जारी की है, जिसने काबुल हवाई अड्डे पर हमला किया था। आईएस ने कहा  है कि हमलावर अमेरिकी बलों से 5  मीटर की दूरी तक पहुंचने में सक्षम रहे। अगर आईएस का यह दावा सही है तो अमेरिका के लिए शर्म का विषय होना चाहिए कि काबुल हवाई अड्डा उसकी सुरक्षा निगरानी में था और हमलावर गोला बारूद के साथ उसके इतने पास पहुंच गया। 

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि काबुल हवाई अड्डे के बाहर हुए विस्फोट में मारे गए 13 अमेरिकी सैनिकों का बदला ले लिया गया है। उन्होंने उसके बाद कहा था कि हम आतंकवादियों को ढूंढ कर मारेंगे । बिडेन प्रशासन की ओर से कहा गया कि हमने कहा था कि मारेंगे और मार दिया। संभव है अमेरिका आगे और भी ड्रोन से मानवरहित हवाई हमले करें। 

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की जोखिम भरी और बेतरतीब वापसी के कदम से अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन दुनिया के साथ स्वयं अमेरिकियों के भी निशाने पर हैं। पूरे अमेरिका में उनका व्यापक विरोध हो रहा है। विश्व भर में सोशल मीडिया पर जो बिडेन को जेहादी आतंकवादी समूहों के समर्थक एवं विश्व समुदाय के खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। अमेरिका की थूथू हो रही है। अमेरिका में माहौल यह है कि जो बिडेन ने पूरे देश को शर्मसार किया है । कहा जा रहा है कि उन्होंने दुनिया के साथ साथ अमेरिका के लिए ही जोखिम बढ़ा दिया है। जो तालिबान उतार फेंके गए थे उन्हें इस तरह 20 वर्ष बाद पहले से ज्यादा मजबूत बना कर छोड़ा है कि वे कल अमेरिका के लिए भी सिरदर्द बनेंगे। विश्व भर के विश्लेषकों का यह आकलन भी सही है कि अमेरिका के इस रवैया से पूरी दुनिया भर के जिहादी आतंकवादियों को नई ऊर्जा मिली है। उनको लग रहा है कि हम चाहे जितना आतंकवाद फैलाएं अमेरिका और उनके सहयोगी देश हमारे विरुद्ध कार्रवाई करने नहीं आने वाले। अमेरिका में जो बिडेन को हटाने तक की मांग हो रही है । एक समूह पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में फिर से अभियान चला रहा है। ट्रंप फिर से सामने आ गए हैं। रिपब्लिकन पार्टी पूरी तरह हमलावर है।रिपब्लिकन सीनेटर और पूर्व प्रवक्ता डेन क्रेनशॉ ऐसे ऐसे तथ्य लेकर सामने आ रहे हैं जिसका जवाब देना बिडेन प्रशासन और डेमोक्रेट के लिए मुश्किल हो गया है।

डेन क्रेनशाॅ ने अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान में छोड़े गए युद्धक विमानो, हेलीकॉप्टरों, ड्रोनों,हथियार और गोला बारूद, बख्तरबंद गाड़ियों, आधुनिक उपकरणों की सूची प्रस्तुत करते हुए बताया कि ये हथियार उतने हैं जितने विश्व के 85 प्रतिशत देशों के पास नहीं है। उन्होंने बिडेन को लताड़ते हुए कहा कि मिस्टर प्रेसिडेंट बिडेन, अब मामले को संभालिए जिसे आपने खड़ा किया है। भागने की कोशिश मत कीजिए। आपके हाथ खून से रंगे हैं। हम युद्ध के मैदान में हैं। युद्ध का अंत समझने की गलती मत कीजिए। आपने दुश्मन को एक और फायदेमंद मौका दिया है। यह सच है कि जो बिडेन ने सेना तथा खुफिया एजेंसियों के सुझाव को दरकिनार करते हुए अमेरिकी सेना सहित सैन्य कांट्रैक्टरों एवं अन्य को वापस करने का निर्णय किया। सेना के अंदर भी जो बिडेन को लेकर आक्रोश का भाव है। अफगानिस्तान से लौटे जवान का वीडियो वायरल हुआ है जिसमें कह रहा है कि हमने सब कुछ गड़बड़ कर दिया। जो कुछ 20 सालों में पाया था उसे न केवल खोया बल्कि बुरी तरह पलट दिया। लगभग यही भाव संपूर्ण सैन्य महकमे में है। जो बिडेन से काबुल हवाई अड्डे आतंकवादी हमला के बाद पूछा गया कि क्या आप जिम्मेवारी लेते हैं? उन्होंने कहा कि जो कुछ हुआ उसकी जिम्मेवारी मैं लेता हूं लेकिन इसमें यह जोड़ा कि नहीं भूलिए  कि पूर्व राष्ट्रपति ने 31 मई तक ही अमेरिकी सेना की वापसी का फैसला कर लिया था। उसके बाद पूरे अमेरिका में यह प्रश्न उठाया जाने लगा कि क्या जो बिडेन डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का अनुसरण करने के लिए राष्ट्रपति बने थे? इसमें उनके पास फिर से कुछ पराक्रम दिखाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। 

अमेरिकी नागरिकों की मृत्यु को आम अमेरिकी सहन नहीं कर पाते और उसमें भी अगर सेना के जवान मारे जाएं तो पूरे देश का माहौल ही अलग हो जाता है। इस तरह माना जा सकता है कि जो बिडेन ने तत्काल आम अमेरिकियों के आक्रोश को कम करने तथा अपनी कलंकित छवि को ठीक करने के लक्ष्य से ये हमले किए हैं। आईएएस खुरासान मॉडल तालिबान और अमेरिका दोनों का विरोधी है। लेकिन यहां भी कई प्रश्न खड़े होते हैं। क्या अमेरिका ने अपनी खुफिया सूचना के आधार पर ये हमले किए या फिर उनको तालिबान ने सूचना दी? अगर सूचना तालिबान ने दी तो कहीं ऐसा तो नहीं कि वह अपनी लड़ाई अमेरिका के माध्यम से लड़ना चाहता है? आखिर उसके दुश्मन से अगर अमेरिका लड़ रहा है तो तालिबान के लिए इससे राहत पर प्रसन्नता की और कोई बात हो नहीं सकती। काबुल हवाई अड्डे पर हमले के एक हफ्ते पहले आईएसकेपी के प्रमोशनल वीडियो क्लिप में तालिबान पर अमेरिका की कठपुतली होने और सच्चे शरिया का प्रचार नहीं करने का आरोप लगाया था। उसी संदेश में आईएस ने अफगानिस्तान में जिहाद के नए चरण का वादा किया। तो आईएस उस घोषणा के अनुसार लड़ाई के नए दौर की शुरुआत कर चुका है। प्रश्न है कि क्या बिडेन के नेतृत्व वाला अमेरिका अपनी वापसी के बाद भी इस तरह के हमले करेगा? काबुल हवाई अड्डे हमले का मास्टरमाइंड इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत के प्रमुख मौलवी अब्दुल्ला उर्फ असलम फारूकी को माना जा रहा है।  फारूकी को पिछले साल अप्रैल में अफगान सुरक्षा बलों ने गिरफ्तार किया था। लेकिन, जब तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर कब्जा कर लिया, तो उन्होंने बगराम जेल से सभी आतंकवादियों को रिहा कर दिया। अफगान सुरक्षा बलों की हिरासत में रहते हुए असलम फारूकी ने आईएसआई के साथ अपने संबंध स्वीकार किया था। पाकिस्तान ने उसके प्रत्यर्पण की मांग की थी जिसे तब अब्दुल गनी सरकार ने मना कर दिया था। तालिबान कहता है कि आईएसकेपी उसका कट्टर दुश्मन है, लेकिन उन्होंने उसे बगराम जेल से अन्य आतंकवादियों से साथ ही रिहा कर दिया। यह तालिबान के आम व्यवहार के विपरीत है। ध्यान रखने की बात यह भी है कि इस समय काबुल के सुरक्षा की जिम्मेवारी तालिबान ने हक्कानी समूह को दे दिया है और हक्कानी समूह का पूरा समर्थन आईएस केपी को रहा है। फारुकी पाकिस्तानी नागरिक है।  उसका मुख्य केंद्र अभी भी पाकिस्तान ही है। 

इन सारे सूत्रों को जोड़ने के बाद कोई एक निष्कर्ष निकालना कठिन होता है। तालिबान आईएसकेपी के लोगों को छोड़ते नहीं लेकिन उन्होंने फारुकी को आराम से छोड़ दिया। तालिबान हक्कानी समूह एक हैं तो फिर आईएसकेपी को हक्कानी का समर्थन क्यों है? जाहिर है ,जो बिडेन भले अपनी इज्जत बचाने की छटपटाहट में आईएसकेपी को निशाना बना रहे हों या भविष्य में निशाना बनाएंगे लेकिन साफ है कि इससे संबंधित सारे पहलुओं की विवेचना उनके प्रशासन ने नहीं की है। आशंका यह है कि तालिबान और अफगानिस्तान से जान छुड़ाकर भागने की हड़बड़ाहट में जो बिडेन ने कहीं एक नया मोर्चा तो नहीं खोल दिया। या तालिबान और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अमेरिका को फंसाने की चाल तो नहीं चली? सारे प्रश्न अमेरिका के हवाई हमले वाले नए तेवर से जुड़े हुए हैं। इतना जरूर स्वीकार करना होगा कि अमेरिका का हवाई हमला बताता है कि अफगानिस्तान से भागने की आतुरता के बावजूद जो बिडेन के लिए जान छुड़ा पाना  मुश्किल है। ऐसे हवाई हमलों से अमेरिकियों का गुस्सा शांत नहीं हो सकता और आईएएस से टकराव उन्हें पूरी तरह अफगानिस्तान से भागने नहीं देगा । भले धरती पर नहीं लेकिन आकाश के रास्ते अफगानिस्तान में अमेरिका बने रह सकता है। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर ,पांडव नगर कंपलेक्स ,दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 2708

शनिवार, 28 अगस्त 2021

काबुल हमले के भयावह निहितार्थ

अवधेश कुमार

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर हुए बम धमाकों ने पूरी दुनिया को कुछ स्पष्ट संदेश दिया है। आरंभ में केवल दो धमाकों और 13 -14 लोगों के मारे जाने की खबरें आ रही थीं। हालांकी यह अंदेशा था कि धमाके भी ज्यादा हो सकते हैं और मृतकों की संख्या भी। कम से कम सात धमाके हुए और 170 से ज्यादा लोगों के मारे जाने तथा 1400 के आसपास के घायल होने की खबरहै। भारी संख्या में घायलों की स्थिति खराब है। वहां अस्पतालों का संचालन करने वाली इटली  की एक संस्था के प्रबंधक मार्को पुनतिन ने आरंभ में ही कहा था कि हमले में घायल 60 लोगों का उपचार किया जा रहा है जबकि 10 घायल ऐसे थे जिन्होंने अस्पताल लाने के दौरान ही दम तोड़ दिया। अभी तक इतना साफ है कि इन धमाकों में 12 अमेरिकी नौसैनिक और एक नौसेना का चिकित्सा कर्मी मारा गया। अमेरिकी अधिकारी ही यह कहते सुने गए कि अमेरिकी सेना के 60 से अधिक जवान घायल हुए हैं और इनकी संख्या बढ़ सकती है। जाहिर है, अमेरिका के लिए यह सीधी चुनौती है तथा संपूर्ण दुनिया के लिए चेतावनी । अफगानिस्तान और तालिबान को लेकर के नए सिरे से खुलकर विचार विमर्श करने तथा रणनीति बनाने की आवश्यकता अगर विश्व समुदाय महसूस नहीं करता तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। 

इस हमले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि आईएस काबुल हवाई अड्डे पर हमला कर सकता है । इन्होंने अपने नागरिकों को काबुल हवाई अड्डे पर न जाने के प्रति अलर्ट भी जारी कर दिया । बावजूद इसके हमला कैसे हो गया ? अमेरिका और नाटो देशों को यह भी पता था कि पिछले दिनों ही तालिबान ने आईएस के चार आतंकवादियों को पकड़ा था। उनका क्या हुआ किसी को नहीं पता। संभव है उनका काम तमाम कर दिया गया हो। आम खबर ये थी कि काबुल हवाई अड्डे पर जाने के लिए अब कई स्तर की सुरक्षा व्यवस्था की गई है । फिर आत्मघाती बम विस्फोटक और बंदूक लिए आतंकवादी कैसे वहां तक पहुंच गया ? ब्रिटेन के विदेश मंत्री ने तो कहा कि उनके पास पहले से लिखित बयान मौजूद था कि आईएस का हमला होगा और क्या बोलना है। यह ऐसी स्थिति है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी । विश्व भर में जो देश आतंकवाद से पीड़ित हैं या आतंकवादियों के रडार पर हैं या जो आतंकवाद का अंत करना चाहते हैं वे विचार करें कि पूर्व चेतावनी और जानकारी रहते हुए भी बड़े देश अगर उनके खिलाफ पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था नहीं कर सकते तो फिर क्या होगा ?

 अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन को गुस्सा आना स्वाभाविक है। उन्होंने चेतावनी देते हुए यह तो कह दिया है कि हम माफ नहीं करेंगे। हम नहीं भूलेंगे। हम चुन-चुन कर तुमको मारेंगे। आपको इसका अंजाम भुगतना ही होगा। किंतु वे करेंगे क्या इसके संदर्भ में कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। वे यह भी कह रहे हैं कि काबुल हवाई अड्डे पर हुए हमलों में तालिबान और इस्लामिक स्टेट के बीच मिलीभगत का अब तक कोई सबूत नहीं मिला है। इसका मतलब क्या है? उनकी घोषणा यह भी है कि हम अफगानिस्तान में अमेरिकी नागरिकों को बचाएंगे तथा अफगान सहयोगियों को बाहर निकालेंगे और हमारा मिशन जारी रहेगा। अमेरिका पूरी तरह वापसी के निर्णय पर कायम है तथा अभी उसका उद्देश्य केवल अपने नागरिकों तथा सहयोगियों को वहां से बाहर निकालना है। उनके बयान का अर्थ यह भी है कि वे तालिबान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने जा रहे हैं। आईएसआईएस खुरासान समूह ने इस हमले की जिम्मेदारी स्वीकार की है और तत्काल इसे नकारने का कोई कारण नहीं है। आईएएस और तालिबान के बीच हिंसक संघर्ष चल रहा है। हम सामान्यतया मान कर चलते हैं कि वैश्विक जेहादी आतंकवाद के विश्व स्तर पर और अलग-अलग देशों में जितने समूह हैं उन सबकी विचारधारा एक होगी। यह सही नहीं है। एक समय अलकायदा विश्व भर के आतंकवादियों के लिए मुख्य प्रेरणा का स्रोत था भले वे उससे प्रत्यक्ष जुड़े हों या नहीं। उसी अलकायदा के अंदर से विद्रोह करके अल बगदादी निकला और उसने आईएस की स्थापना की। धीरे-धीरे अलकायदा कमजोर हुआ और विश्व भर में जिहादी मानसिकता के लोग आईएसआईएस से जुड़ने लगे। अलकायदा हाशिए पर गया आईएसआईएस मुख्य संगठन बना। 

आतंकवादी समूहों के बीच व्यापक मतभेद व शत्रुता का इससे बड़ा उदाहरण कुछ नहीं हो सकता। इराक में आतंकवादी समूह ने एक दूसरे के विरुद्ध भी हमला किया है। अफगानिस्तान तो इनका सबसे भयंकर उदाहरण बना है। तालिबान और इस्लामिक स्टेट एक ओर अमेरिका और नाटो के साथ अफगान सेना के विरुद्ध आतंकवादी हमले करते रहे तो एक दूसरे के विरुद्ध भी। आईएस वैश्विक स्तर पर इस्लामिक साम्राज्य यानी खलीफा का शासन स्थापित करना चाहता है, अलकायदा का भी यही लक्ष्य था और तालिबान उसके समर्थक थे। तालिबान की गतिविधि अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक ही सीमित रही। तालिबान ने अपना केंद्र बिंदु अफगानिस्तान को ही बनाया और अमेरिका के साथ समझौता कर लिया । इस कारण आईएस ही नहीं ,विश्व भर के अनेक जेहादी समूह तालिबान के विरुद्ध हैं। उनका मानना है कि तालिबान ने ओसामा बिन लादेन और उसके जैसे दूसरे जिहादी नेताओं के विचारों को तिलांजलि दे दिया है । वैश्विक जिहादी आतंकवाद का यह ऐसा पहलू है जिस पर अगर सही परिपेक्ष में विचार नहीं किया जाए तो कोई देश उपयुक्त नीति निर्धारित नहीं कर सकता। आने वाले समय में अफगानिस्तान में कुछ और समूह भी तालिबान के विरुद्ध हिंसक सक्रियता दिखा सकते हैं। दुर्भाग्य से इस समय अफगानिस्तान में तालिबान के हिंसक आधिपत्य को लेकर विश्व में जिस तरह का मतभेद है वैसा ही मतभेद आतंकवादी समूहों को लेकर भी रहा है। रूस खुलेआम तालिबान के साथ काम करने की इच्छा जता चुका है, बातचीत कर रहा है। चीन ने तो उनके प्रतिनिधिमंडल को पहले बीजिंग बुलाया, चीनी प्रतिनिधिमंडल काबुल गया। बड़ी शक्तियों के बीच यही मतभेद आतंकवादी समूहों का हौसला अफजाई करने वाला है। सीरिया और इराक में अमेरिका ,रूस, चीन जैसे देशों का आपसी मतभेद आईएस के खात्मे में बहुत बड़ी बाधा रहा है। यही स्थिति अफगानिस्तान और पाकिस्तान को लेकर भी है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन भले अपने जवानों की मृत्यु पर आंसू बहाए, पूरी दुनिया में अमेरिकी ठिकानों के झंडे झुकाने का ऐलान करें, सच यही है कि वर्तमान भयावह स्थिति के लिए तत्काल कोई एच देश और व्यक्ति जिम्मेदार है तो अमेरिका और जो बिडेन। तालिबान से बातचीत करने की पहल अमेरिका ने की ,समझौता उसने किया और जो बिडेन ने बिना गंभीरता से विचार किए, अफगान सेना के बैकअप यानी रणनीतिक मार्गदर्शन और आवश्यक सामग्रियों की आपूर्ति की व्यवस्था के संदर्भ में आत्मनिर्भर बनाए  एकाएक वापस आना आरंभ कर दिया। इस कदम ने 20 वर्षों के युद्ध को निष्फल कर दिया। मजहबी हिंसा वाले आतंकवादी समूह को आप मान्यता देंगे तो दूसरे आतंकवादी समूह उसके विरुद्ध खड़े वैसे भी होंगे। दूसरे आतंकवादी समूहों को यह भी संदेश मिलेगा कि अमेरिका अब हमसे लड़ना नहीं चाहता इसलिए जैसे चाहो हिंसा करो। हैरत की बात है कि अमेरिका को यह भी पता है कि सारे आतंकवादी समूह उसके जानी दुश्मन हैं, फिर भी उसने विशेष सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए न तो कोई अंतरराष्ट्रीय बैठक बुलाई न नाटो के देशों के साथ मिलकर प्रबंध ही किया। इस हमले के बाद भी जो बिडेन के नेतृत्व वाला अमेरिकी प्रशासन इस दिशा में कदम उठाना तो छोड़िए विचार करने के लिए भी तैयार नहीं है। हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का बयान है कि अमेरिका इस दिशा में विचार कर रहा है कि काबुल हवाई अड्डे की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए ताकि 31 अगस्त के बाद भी वहां से कोई निकलना चाहे तो सुरक्षित निकल सके ,दूसरे देशों के जहाजों का आवागमन हो सके। जब आपके सैनिक वापस ही आ जाएंगे ,अफगान सेना ने हथियार डाल दिया है तो यह व्यवस्था किसके जिम्मे होगी? अफगानिस्तान में नए आंतरिक और आपसी जिहादी युद्ध की यह नये सिरे से  शुरुआत है। आगे

 इससे भी भीषण संघर्ष देखने को मिलेगा और यह अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रह सकता। काबुल हमले के अगले दिन कज़ाकिस्तान के सैन्य अड्डे पर श्रृंखलाबद्ध धमाका इसका प्रमाण है।विश्व समुदाय इस खतरे को समझे तथा नए सिरे से तालिबान और अफगानिस्तान को लेकर अपनी नीति बनाए। 

अवधेश कुमार, ई- 30 ,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092 ,मोबाइल -98110 27208

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

डेसू मजदूर संघ ने गौरव के परिवार को 17 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दिलवाई

संवाददाता

नई दिल्ली। बीएसईएस में आउटसोर्सिंग व एएमसी आधार पर काम करने वाले कर्मचारी रोजाना अपनी जान पर खेलकर अपने कार्य करते हैं ताकि जनता को कोई परेशानी न हो मगर कभी-कभी तो कर्मचारियों की कार्य करते समय जान तक चली जाती है। पर बीएसईएस में ऐसे कर्मचारियों की कोई गिनती नहीं होती। ऐसे कर्मचारी को कोई भी अपना मानने को तैयार नहीं होता है।

बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड के लिए आउटसोर्सिंग पर गौरव लाइनमैन के पद पर काम करते थे। 10 अगस्त, 2021 को गौरव को काम करते समय करंट लग गया तभी उन्हें नजदीक के हॉस्पिटल ले जाया गया जहां पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत्यु घोषित कर दिया।

गौरव की बिजली का करंट लगने से उनका स्वर्गवास हो जाने के बारे में जब डेसू मजदूर संघ को पता चला तो वह लोग गौरव के घर गए और पूरी जानकारी ली। इसके बाद डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव, महामंत्री सुभाष चंद, दीपेंद्र कुमार तिवारी (BRPL) (आउटसोर्स के प्रधान), प्रदीप कुमार बरगोती (BRPL) (आउटसोर्स के जॉइंट सेक्रेटरी), रवींद्र पावर (BRPL), मुकेश जी (टैगोर गार्डन), राजबंत सिंह, विकास राठी, जितेंद्र, अम्बीकेस सुपरवाइजर, जय किशन, रामप्रसाद (BRPL टीम), अशोक कुमार (BYPL)(आउटसोर्स के अध्यक्ष), ऋषिपाल (BYPL)(आउटसोर्स के महामंत्री), प्रमोद वर्मा (आउटसोर्स के उपाध्यक्ष), दिनेश कुमार (आउटसोर्स के सर्किल चेयरमैन), सैन्तूल त्यागी (आउटसोर्स के संगठन मंत्री), अब्दुल रज्जाक खान (जॉइंट सेक्रेट्री नॉर्थ ईस्ट), पंकज कुमार शर्मा, वसन्त कुंज से इकबाल खान, संजीव कुमार, रविंद्र पाल सिंह, मुकेश कुमार यादव, राजवंत सिंह, कमल कान्त, संदीप कुमार, राजकुमार, रमेश चन्द, प्रदीप कुमार बरगोती एवं सभी यूनियन के पदाधिकारियों के अथक प्रयासों से स्वर्गीय गौरव की पत्नी पूनम को आर्थिक मदद के रूप में सत्रह लाख रुपए की धन राशि का PDC चैक दिलवाया जिसमें एक चैक 15 लाख और दूसरा चेक दो लाख की धनराशि का आर्थिक मदद के लिए दिलवाया। यह चेक डेसू मजदूर संघ के(महामंत्री) सुभाष चन्द ने स्वर्गीय गौरव की पत्नी पूनम को चेक दिया जिससे स्वर्गीय गौरव के परिवार को कुछ मदद मिल सकें।

डेसू मजदूर संघ के (महामंत्री) सुभाष चन्द ने कहा कि यह पैसे भाई गौरव की पूर्ति तो नहीं कर सकता। हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि स्वर्गीय गौरव के परिवार वालों को इस अपार दुःख व क्षति को सहन करने की शक्ति प्रदान करें व ईश्वर स्वर्गीय गौरव की आत्मा को शान्ति प्रदान करें और अपने श्री चरणों में स्थान दें।








गुरुवार, 19 अगस्त 2021

अफगानिस्तान में तालिबानी आधिपत्य

अवधेश कुमार

अफगानिस्तान की तस्वीरें अंदर से हिला देने वाली है। तालिबान की अफगानिस्तान में आधिपत्य के साथ विश्व समुदाय के अंदर फिर नए सिरे से चारों ओर इस्लामिक हिंसक कट्टरवाद के उभरने तथा आतंकवादी हमलों के बढ़ने की आशंकाएं बलवती हो रही है तो यह बिलकुल स्वाभाविक है। वैसे जिस तरह तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया है वह अपने आपमें भयावह है। पूरा परिदृश्य विचलित और आतंकित करने वाला है ।  एक घोषित मजहबी आतंकवादी संगठन सशस्त्र संघर्ष करते हुए देश पर आधिपत्य जमा ले, निर्वाचित व विश्व द्वारा मान्यता प्राप्त सरकार को सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर कर दे और विश्व समुदाय मूकदर्शक बना देखता रहे सामान्यतः इस स्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती। यह तथाकथित आधुनिक दुनिया है जहां संयुक्त राष्ट्रसंघ के सभी सदस्य देशों ने आतंकवाद को नष्ट करने का सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया हुआ है। ध्यान रखिए,  2001 का प्रस्ताव भी तब अफगानिस्तान के संदर्भ में ही था। तालिबान और अलकायदा की मजहबी आतंकवादी विचारधारा के विरुद्ध विश्व समुदाय का वह भी एक वैचारिक संकल्प था । इस दृष्टि से अफगानिस्तान में तालिबानी आधिपत्य आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी विडंबना है। 

अगस्त आरंभ होने के साथ तालिबान ने जिस ढंग से अफगानिस्तान के राज्य -दर राज्य कब्जा करना शुरू किया और अफगान सेना आत्मसमर्पण करती गई उसके बाद यही होना था। हैरत की बात यही है कि करीब 20 वर्षों से अफगान की भूमि पर मौजूद अमेरिका को जमीनी सच का पता नहीं चला। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने काबुल के पतन के लगभग दो सप्ताह पहले वक्तव्य दिया था कि तालिबान ऐसे दिखा रहे हैं मानो जीत रहे हैं जबकि अंतिम अध्याय लिखा जाना बाकी है। कुछ दिनों पहले अफगान पत्रकार बिलाल सरवरी ने एक विदेशी समाचार एजेंसी को जमीनी स्थिति बताते हुए कहा था कि तालिबान के कमांडर गुपचुप तरीके से अफगान सेना के कमांडरों तथा गांवों, जिलों और प्रांतीय स्‍तर पर महत्‍वपूर्ण नेताओं के साथ संपर्क बना रहे हैं। इसके लिए वे उनके कबीले, परिवार और दोस्‍तों की मदद ले रहे हैं ताकि  गुप्‍त समझौता किया जा सके। इसी वजह से अफगान सेना को हार का मुंह देखना पड़ रहा है। कंधार से आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि तालिबान आतंकवादी अफगान नेताओं और कमांडरों को आश्‍वासन दे रहे हैं कि अगर वे मदद करते हैं तो माफ कर दिया जाएगा। तालिबान मुख्यतः पश्तून संगठन है जो अफगानिस्तान की आबादी के 45 प्रतिशत हैं। कुछ ताजिक भी हैं। हालांकि तालिबान विजय क यही कारण नहीं हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ और लॉन्‍ग वॉर जनरल के संपादक बिल रोग्गियो का विस्तृत आकलन पिछले दिनों अमेरिका सहित दुनियाभर की मीडिया में प्रकाशित हुआ था । उन्‍होंने कहा कि यह वियतनाम में 1968 के बाद अमेरिका की सबसे बड़ा खुफिया नोनाकामी है। बिल का प्रश्न था कि यह कैसे हुआ कि तालिबान ने योजना बनाई, खुद को एकजुट किया, तैयार किया और देश भर में इतने बड़े आक्रामक अभियान को क्र‍ियान्वित किया वह भी सीआईए, डीआईए, एनडीएस और अफगान सेना की नाक के नीचे? उनके अनुसार अमेरिकी सेना और खुफिया अधिकारियों ने खुद को यह समझा लिया कि तालिबान बातचीत करेगा। तालिबानी आतंकियों की यह सैन्‍य रणनीति थी ताकि वार्ता की मेज पर इसका फायदा उठाया जा सके। अमेरिकी तालिबान की इस साजिश को पकड़ नहीं पाए कि तालिबान सैन्‍य ताकत के बल पर देश पर कब्‍जा कर सकता है। अमेरिका ने अफगान सेना की ताकत के बारे में गलत अनुमान लगाया कि वह एक साल तक तालिबान को रोक सकती है।

बिल की बात से कोई असहमत नहीं हो सकता। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि अफगान सेना में तालिबान को रोकने की पूरी क्षमता है और वे कम से कम एक साल तक उन्हें रोक सकते हैं। अमेरिका में लंबे समय से यह धारणा बन रही थी कि 11 सितंबर 2001 को हमला कराने वाला ओसामा बिन लादेन मारा जा चुका है तो हमारा वहां पड़े रहना मूर्खता है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो प्रश्न उठाते थे कि आखिर अमेरिका वहां क्यों है जबकि भारत ,चीन, रूस तक नहीं हैं? लेकिन पिछले कुछ सालों में अमेरिका में यह मुद्दा रह ही नहीं गया था। ट्रंप ने सैनिकों की वापसी की घोषणा की योजना भी बना ली थी लेकिन एकाएक वापस आने का उन्होंने निर्णय नहीं किया। वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने बिना सोचे विचारे 11 सितंबर की अंतिम तिथि निश्चित कर दी और फिर उसके बाद तालिबान के निर्वाचित सरकार उसके नियंत्रण में चलने वाली सेना के पैरों तले जमीन खिसक गई । अमेरिकी सैनिकों की आपसी का मतलब था वहां लड़ने वाली ढांचा का खत्म होना। जब ढांचा ही नहीं रहा तो अफगान सेना बेसहारा हो गई पिछले तीन सप्ताह में अमेरिका ने भारी बमबारी की लेकिन अफगानिस्तान के जमीनी हालात बिल्कुल बदल गए थे। इसमें यही होना था।

कोई अमेरिकी तालिबान का शासन अफगानिस्तान में नहीं चाहता होगा। जिस तालिबान के कट्टर मजहबी आतंकवादी शासन को अमेरिका ने उखाड़ फेंका वही इनके कारण इतनी आसानी से वापस आ गया। करीब 20 वर्षों बाद तालिबान जिस तरह वापस आए हैं उसमें अब उन्हें उखाड़ फेंकना अत्यंत कठिन है। संपूर्ण नाटो सेना और अमेरिकी सेना की शर्मनाक वापसी के बाद कोई संगठन, देश या देशों का समूह अफगानिस्तान में हाथ डालने का साहस नहीं करेगा। निश्चित रूप से 2001 और 2021 में अंतर है किंतु यह तालिबान के लिए ज्यादा अनुकूल है । कतर की राजधानी दोहा में उनका राजनीतिक मुख्यालय है जहां से वे अमेरिका सहित अन्य देशों के साथ बातचीत कर रहे थे। तब ऐसा नहीं था। इस बीच तालिबान ने अपने समर्थक देशों की मदद से ऐसे व्यक्तित्व विकसित कर लिए हैं जो विश्व के साथ सभ्य और सधी हुई भाषा में संवाद करते हैं, कूटनीतिक शब्दावली में बयान देते हैं।।बातचीत के कारण अनेक देशों के नेताओं और राजनयिकों के साथ उनके संबंध बने हैं। पहले केवल पाकिस्तान का हाथ उनके सिर पर था। पाकिस्तान का हाथ आज भी है और तालिबान की ताकत बढ़ाने तथा उनकी जीत में इसकी प्रमुख भूमिका है। इस बार चीन और रूस ने तालिबान के साथ संवाद बढ़ाया। चीन ने पाकिस्तान के माध्यम से तालिबान नेताओं से संपर्क किया, दोहा स्थित राजनीतिक ब्यूरो के प्रमुख मुल्लाह अब्दुल गनी बरादर के नेतृत्व में तालिबान प्रतिनिधिमंडल को बीजिंग बुलाकर बातचीत की। रूस तालिबान के साथ काम करने में स्पष्ट रुचि दिखा रहा है।

तालिबान ने अपने कट्टर इस्लामी विचारधारा में परिवर्तन किया है इसके प्रमाण अभी तक नहीं मिले हैं। अफगानिस्तान में 1996 से 2001 तक का तालिबानी शासन काल शरिया के नाम पर बर्बरता की मिसाल था। तालिबान उसी की पुनरावृत्ति करते हैं या थोड़ी उदारता दिखाते हैं यह भविष्य के गर्त में है लेकिन किसी भी परिस्थिति में उदार और खुला शासन नहीं  होगा । कंधार पर कब्जे के बाद जब तालिबान लड़ाके अजीज बैंक में गए तो उन्होंने काम कर रही 9 महिलाओं को घर जाने का आदेश दिया तथा ऐलान किया कि उनके पति या परिवार के पुरुष रिश्तेदारों वहां काम कर सकते हैं। सत्ता हाथ में आने के साथ ही उनके रंग बदलने लगे और उन्होंने महिलाओं और विरोधियों के साथ जो कुछ करना शुरू किया है वह भविष्य का ट्रेलर ही है । वास्तव में तालिबान एक ऐसी विचारधारा के झंडाबरदार हैं जो संपूर्ण आधुनिक सभ्यता को नकारती और उसके विनाश का लक्ष्य रखती है। इस तरह अफगानिस्तान में उनकी फिर से वापसी उस विचारधारा की विजय है जो सम्पूर्ण मानवता के लिए खतरा है । पहले तालिबान बिना अंतरराष्ट्रीय मान्यता के शासन करते रहे हैं। सत्ता से वंचित किए जाने तथा आतंकवादी संगठन घोषित होने के कारण प्रतिबंधित होने के बावजूद उनका अस्तित्व कायम रहा। उसी स्थिति में अपने समर्थक देशों के सहयोग से उसने संवाद के जरिए अघोषित मान्यता भी प्राप्त की। भारत के लिए विकट स्थिति पैदा हो गई । चीन और पाकिस्तान के वहां प्रभावी होने का अर्थ भारत के हितों पर सीधा कुठाराघात। भारत में वहां करीब 3 अरब डॉलर का निवेश किया है। इसके अलावा 34 प्रांतों में लगभग 400 परियोजनाएं शुरू की गई है। अफगानिस्तान के साथ रणनीतिक साझीदार समझौता भी अब गया। तालिबान की विजय से उत्साहित होकर आतंकवादी फिर से भारत को हिंसा में जलाने की कोशिशें बढ़ा सकते हैं। हम तालिबान शासन के साथ संबंध बनाते हैं तो वह उस विचारधारा को मान्यता देना है जहां से इस्लामी साम्राज्य की स्थापना के लिए हिंसा और आतंकवाद निकलता है। नहीं करते हैं तो आर्थिक सामरिक हित प्रभावित होंगे। मुख्य चिंता का विषय यह है एक आतंकवादी संगठन को किस तरह अमेरिका और उसके साथ ही देशों ने अपनी मूर्खता और नासमझी से इस स्थिति में ला दिया कि आज वह फिर से अफगानिस्तान की राजधानी काबुल सहित कुछ स्थानों को छोड़कर लगभग पूरे देश में अपना इस्लामी झंडा लहराने में सफल है।

अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर ,पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली :110092 ,मोबाइल :98210 27208

शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

जंतर मंतर धरने में हिंदुत्व समर्थकों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई

अवधेश कुमार

राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर इससे पहले धरना में भाषण देने वाले कब गिरफ्तार हुए इसके लिए पूरा इतिहास खंगालना होगा। इस तरह यह एक विरल मामला हो गया है। आरोप है कि समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण कानून, देश में एक कानून आदि की मांग के लिए आयोजित धरने में कुछ लोगों ने आपत्तिजनक भाषण दिए। निस्संदेह, कुछ भाषण अस्वीकार्य थे। किसी मजहब को आप पसंद नहीं करते हैं यह आपका विषय हो सकता है। किंतु उसके बारे में हिंसक और सांप्रदायिक वक्तव्य को भारतीय कानून मान्यता नहीं देता और दुनिया के किसी सभ्य समाज में इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस आधार पर देखें तो धरना में शामिल चिन्हित लोगों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई उचित लगती है। ऐसा नहीं हुआ तो दूसरे लोग भी इस तरह का भाषण देकर के और आग भड़का सकते हैं। 

जो कुछ भी हुआ या हो रहा है उसे अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण कहना होगा। यह बात सही है कि सरकारों द्वारा अल्पसंख्यक तुष्टीकरण एवं इससे जुड़े वोट बैंक की राजनीति के विरुद्ध देश में गैर मुस्लिम धर्मावलंबियों के बीच आक्रोश है। हिंदुओं के अंदर पिछले कुछ वर्षों में जागरण हुआ है। हिंदुत्व को लेकर आक्रामकता भी बढ़ी है। इस कारण ही देश की अनेक राजनीतिक पार्टियों को अपना वोट बचाने के लिए स्वयं को हिंदू धर्म के प्रति निष्ठावान साबित करने की श्रृंखला चल पड़ी है। हिंदुत्व समर्थकों के लिए यह उत्साह का विषय होना चाहिए। किंतु हिंदुत्व जैसे व्यापक और सर्व समावेशी विचार को स्थाई स्वीकृति दिलाने के लिए धैर्य, संयमित बयान संतुलन आदि की गहरी आवश्यकता है। हिंदुत्व समर्थकों में एक बड़ा वर्ग निश्चित रूप से इन मानकों पर खरा उतरता है। किंतु दूसरी और यह भी सच है कि बड़ी संख्या में अतिवादी और उग्र विचार रखने वाले भी इस समय हिंदुत्व के पुरोधा बन गए हैं और ये अपना ही पक्ष कमजोर करते हैं । लोकतंत्र में आपको अपनी मांग के लिए धरना प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है। समान नागरिक संहिता के पक्ष में तो उच्चतम न्यायालय और देश की कई उच्च न्यायालय अनेक बार टिप्पणियां कर चुका है। राजनीतिक दल मुस्लिम वोटों के बिखर जाने के भय से इस दिशा में कभी आगे नहीं आए। देश की स्थिति ऐसी हो गई है कि राष्ट्रीय स्तर पर इसके बारे में सर्वसम्मति कायम करना कठिन है। मांग नाजायज नहीं है। इसी तरह जनसंख्या नियंत्रण कानून के पक्ष में भी व्यापक वर्ग है। हालांकी इसे लेकर थोड़ा सतर्क होने की बात करने वाले भी हैं। यह भी सही है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए जिन देशों में कानून लगाओ लागू हुआ वह पूरी तरह सफल नहीं रहा। भारत में राजनीतिक पार्टियों के बीच इस पर सहमति नहीं हो सकती ,क्योंकि सबके सामने मुस्लिम वोट का सवाल है। हालांकि भाजपा शासित कुछ राज्यों ने इस दिशा में साधारण कदम बढ़ाए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भारत की विविधताओं को देखते हुए इस तरह का कानून बनाना और उसे लागू करना अत्यंत कठिन है । फिर इसके खतरे भी हैं। जिन देशों ने जनसंख्या का नियंत्रण किया वै बूढ़ों के देश हो चुके हैं या हो रहे है। आज पश्चिम के ही अनेक देश ज्यादा बच्चा पैदा करने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। चीन ने ही ,जिसने एक समय एक बच्चे की नीति को लागू करने की कोशिश की अब तीन बच्चे की अनुमति दे दी है है। 

जो भी स्थिति हो मुसलमानों के खिलाफ हिंसक और सांप्रदायिक बयान देना खतरनाक है, मूर्खता भी है और ऐसे लोगों से सावधान और सतर्क रहने की जरूरत है। हिंदुत्व  इस तरह की बात नहीं करता। हिंदुत्व सर्वधर्म समभाव में विश्वास करता है। विरोधियों के प्रति भी उनका मानस परिवर्तन करने की अनुशंसा हिंदुत्व में है। इस्लाम की कुछ बातों से अगर आपकी असहमति है तो उसे प्रकट करने का तरीका भी संयमित संतुलित होना चाहिए। दुर्भाग्य से पूरे भारत में बड़ी संख्या में लोग इसे नहीं समझते कि भारत जैसे देश में आप किसी एक मजहब को निशाने पर रखकर  हिंसा सांप्रदायिकता की कोशिश करेंगे तो उससे देश को क्षति होगी। इससे हिंदुत्व का पक्ष कमजोर होगा। ऐसे लोग उन लोगों के विचारों को, उनके पक्ष को सही ठहराते हैं जो आरोप लगाते हैं कि हिंदुत्व एक फासीवादी विचारधारा है और अगर हिंदुत्व स्वीकृत हुआ तो भारत में किसी मजहब के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा। यह बिल्कुल गलत है। हिंदुत्व में सभी धर्मों को अपनी उपासना पद्धति के अनुसार जीने और काम करने का की पूरी स्वतंत्रता है। यहां पर पुलिस कार्रवाई सही लगती है। 

लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। किसी धरना में ऐसे अनेक लोग शामिल होते हैं जिनको आयोजक तक नहीं जानते। जिन्हें वहां भाषण देने के लिए बुलाया जाता है वह भी वहां ज्यादातर लोगों को नहीं जानते। इसलिए किसी धरना में अगर कुछ अतिवादी लोगों ने आपत्तिजनक भाषण दिए तो वीडियो के अनुसार केवल उन पर कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि जो लोग वहां भाषण देने गए उनको आप दोषियों के बदले दोषी साबित कर दें। दुर्भाग्य से इस मामले में ऐसा हो रहा है।  जंतर -मंतर पर इससे भी खतरनाक भाषण, आपत्तिजनक नारों का लंबा रिकॉर्ड है। ऐसा नहीं सुना गया कि उसके कारण लोगों पर मुकदमा हुआ हो, पुलिस पूछताछ कर रही हो ,गिरफ्तारी हो रही हो। आम आदमी पार्टी के धरना में ,जिसमें अरविंद केजरीवाल सहित सारे नेता उपस्थित थे एक किसान ने आत्महत्या कर लिया। उस समय तो किसी ने इसकी जहमत नहीं उठाई कि केजरीवाल और बाकी लोगों से पूछताछ हो, उनकी गिरफ्तारी हो। हिंदुत्व के खिलाफ वहां अनेक बार आपत्तिजनक भाषण दिए गए।  भारत देश के ही खिलाफ वहां भाषण हुए हैं। भारतीय संविधान की प्रतियां तक वहां जलाई गई है। कभी नहीं सुना गया कि इस तरह की कार्रवाई हो। इस समय देश में जिस ढंग से विचारधारा की लड़ाई चल रही है उसमें सेक्येलरवाद की विकृत व्याख्या करने वाले तथाकथित सेकुलर ब्रिगेड को केवल यही कार्यक्रम नागवार गुजरा। उन लोगों ने सोशल मीडिया पर इसको  मुद्दा बनाया, पुलिस के पास कार्रवाई के अलावा कोई चारा नहीं था। जो लोग हिंदुत्व की व्यापक अवधारणा को समझते हैं और भारत सहित विश्व में उसकी स्वीकृति की कल्पना करते हैं उन्हें इस घटना से पूरी तरह सतर्क हो जाना चाहिए। आप अपनी मांग रखिए,अपनी बात कहिए लेकिन ध्यान रहे कि अतिवादी तत्व इसका दुरुपयोग कर आपके पक्ष को कमजोर न कर दें। इस समय समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण कानून आदि की मांग ही इनके कारण कमजोर पड़ गया।

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