रविवार, 18 जुलाई 2021

क्या दलित हिन्दू हैं डॉ. अंबेडकर व महात्मा गांधी के दृष्टिकोण

बसंत कुमार

यदि किसी से पूछ लिया जाए कि आपके गांव में कितने हिन्दू, कितने मुसलमान या अन्य धर्मों के लोग हैं, प्राय यह जवाब होता है कि मेरे यहां इतने प्रतिशत हिन्दू हैं, इतने प्रतिशत मुस्लिम हैं, इतने प्रतिशत ईसाई हैं और इतने प्रतिशत दलित हैं। यानि व्यवहारिक रूप में सनातनी हिन्दू दलितों को हिन्दू नहीं मानते, जबकि देश की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां, जो दलित हिन्दू ने धर्म छोड़कर अन्य धर्मों में धर्मांतरण कर लिया है, उन्हें संविधान में अनुसूचित जातियों के आरक्षण का लाभ नहीं देना चाहती। भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद श्री दुष्यंत गौतम ने एक मुलाकात के दौरान मुझसे एक प्रश्न किया, ‘जो हिन्दुओं ने दलितों के साथ अत्याचार किए उसकी जानकारी हर दलित को है पर दलितों के हित के लिए जो काम नरेंद्र मोदी सरकार कर रही है उसकी जानकारी दलितों तक नहीं पहुंच पाती।’ इन परस्पर विरोधी धारणाओं के निराकरण हेतु ‘क्या दलित हिन्दू हैं’ के विषय में देश के दो सर्वमान्य समाज सुधारकों डॉ. अंबेडकर और महात्मा गांधी के दृष्टिकोण को जानना आवश्यक है।

गांधी जी की विचारधारा एक सनातनी हिन्दू ढांचे में विकसित हुई थी उनके मन में किसी के प्रति द्वेष या घृणाभाव नहीं था वहीं डॉ. अंबेडकर के मन में अपने कटु अनुभवों के कारण हिन्दू धर्म की सामाजिक व्यवस्था व रूढ़िवादिता के प्रति रोष अवश्य था, उनके कठोर और उग्र विचारों के कारण कांग्रेसजन उनसे दूरी बनाकर रखते थे। वे ज्योतिबा फुले, गोविंद राना डे और गोपाल गणेश आगरकर के विचारों से प्रभावित थे और दलितों-वंचितों पर हो रहे अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने के लिए प्रतिबद्ध थे। गांधी जी जाति प्रथा और छुआछूत के प्रश्न पर इतने प्रखर तो नहीं थे परन्तु उनके चिन्तन में जाति के आधार विषमता तथा शोषण का निरंतर विरोध झलकता है। उन्होंने यंग इंडिया के नवम्बर 1920 के अंक में ‘ब्राह्मण और ब्राह्मणेत्तर’ नामक निबंध में अपने विचार स्पष्ट करते हुए कहा कि अंग्रेजों ने स्वतंत्रता आंदोलन कमजोर करने के लिए ब्राह्मण और ब्राह्मणेत्तर के प्रश्न को राजनीतिक रंग दे दिया। डॉ. अंबेडकर गांधी जी के विचारों से पूरी तरह से असहमत थे और उनको पूर्ण विश्वास था कि गांधी जी का दलित प्रेम एक ढोंग है। अवसरवादी फिरंगी सरकार ने गांधी जी और डॉ. अंबेडकर के विचारों की भिन्नता का पूरा फायदा उठाया और वर्ष 1932 में मुसलमानों एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिए विधानमंडल में कुछ सीटें आरक्षित कर दीं। इस नए कानून से दलित वर्ग को भी अल्पसंख्यक का दर्जा देकर उन्हें हिन्दू धर्म से अलग करने की तैयारी शुरू हुई। यरवदा जेल में बंद गांधी जी ने खबर पाते ही इस कानून का विरोध किया। उनका यह मत था कि यह भारतीय स्वाधीन आंदोलन पर सीधा हमला है और यह दलितों को धर्म परिवर्तन की ओर धकेलने का सीधा षड्यंत्र है।

गांधी जी इसके विरोध में 20 सितम्बर 1932 को आमरण अनशन पर बैठ गए। कई राजनीतिक दलों ने इसे गांधी जी का राजनीतिक स्टंट कहकर विरोध किया। परन्तु डा. अंबेडकर ने भारी दबाव के आगे इस विषय पर गांधी जी का साथ दिया, यदि डॉ. अंबेडकर ने गांधी जी का साथ नहीं दिया होता तो भारत के धर्म के आधार पर भारत-पाकिस्तान विभाजन ही नहीं बल्कि दलितों के लिए एक अलग देश पर भारत-पाकिस्तान विभाजन होता। पर महान राष्ट्रवादी डॉ. अंबेडकर ने गांधी जी का साथ दिया और पूना पैक्ट के तहत दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल का विचार त्याग कर उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। डॉ. अंबेडकर ने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उच्च शिक्षा प्राप्त की थी तथा अमेरिकी नस्लवाद, अलगाववाद से भलीभांति परिचित थे। फ्रेंच रिवोल्यूशन का उन पर गहरा प्रभाव था, इसलिए वे समानता, बंधुता और अधिकारों की लड़ाई लड़ते रहे। यद्यपि अंग्रेज दलित वर्ग को गले लगाता था, बराबर बिठाता था, छुआछूत नहीं मानता था पर इस उदारता के पीछे की छिपी नीयत को बाबा साहब जानते थे और कहते थे कि अछूतों का भला ईसाई धर्म को स्वीकार करने में नहीं हो सकता, उनका भला तो हिन्दू समाज में व्याप्त छुआछूत को समाप्त करके ही हो सकता है। वे प्राय कहते थे कि यदि हिन्दू धर्म को बचाना है तो ब्राह्मणवाद को समाप्त करना होगा। बाबा साहब कहते हैं कि ‘मुझे अच्छा नहीं लगता जब कुछ लोग कहते हैं कि हम पहले भारतीय हैं और बाद में हिन्दू और मुसलमान हैं। धर्म, भाषा संस्कृति आदि की प्रतिस्पर्धी निष्ठा के रहते हुए भारतीयता के प्रति निष्ठा नहीं पनप सकती। मैं चाहता हूं लोग पहले भी भारतीय हों और अंत तक भारतीय रहें, भारतीय के अलावा कुछ नहीं।’ (बाबा साहब अंबेडकर: राइटिंग्स एंड स्पीचेज ख. 2 पृ. 195)

डॉ. अंबेडकर समझ गए थे कि दलितों की स्थिति में परिवर्तन समता मूल्क समाज की स्थापना के लिए आवश्यक है। यही कारण है कि वे अर्थशास्त्र के साथ-साथ जाति प्रथा के उद्गम विकास, प्रभाव पर निरंतर कार्य करते रहे। वे हिन्दू विधि व्यवस्था के प्रेणता, मनुस्मृति के निर्माता मनुमहाराज को जाति प्रणाली का निर्माता नहीं मानते थे क्योंकि वे यह मानते थे कि जाति मनु से पहले अस्तित्व में थी। इसलिए यह कहना भूल होगी कि जाति श्रेणियों का निर्माण शास्त्राsं और स्मृतियों ने किया। इन शास्त्राsं और स्मृतियों ने ब्राह्मणों की शक्ति पाकर जाति प्रथा को धार्मिक व सामाजिक आधार प्रदान किया। बाबा साहब आगे कहते हैं, ‘वंश की दृष्टि से सभी लोग संकर हैं, सांस्कृतिक एकता उनकी एकरूपता के कारण हैं। इस बात को मानकर चलते हुए मैं यह कहने का साहस कर सकता हूं कि संकर रचना के बावजूद सांस्कृतिक एकता में कोई भी देश भारत का मुकाबला नहीं कर सकता। इसमें न केवल भौगोलिक एकता है उसमें ज्यादा गहरी और मूलभूत एकता है। सांस्कृतिक एकता तो एक छोर से दूसरे छोर तक सारे देश में व्याप्त है, लेकिन इस सांस्कृतिक एकरूपता के कारण ही जाति की गुत्थी को सुलझाना अत्यंत कठिन हो जाता है।’ (डॉ. अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज ख. 2 पृ. 22)

गांधी जहां एक ओर वर्ण व्यवस्था का समर्थन करते हैं वहीं अंबेडकर उसे पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं, इस बिन्दु पर दोनों के विचारों में अंतर रहा और दोनों में कभी भी समझौता नहीं हो पाया। इसी कारण डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई तथा एक वर्ग समाज की स्थापना पर अटल रहे। उनका विश्वास था कि जाति प्रथा के धार्मिक सिद्धांतों की जड़ों में मट्ठा डाले बिना जाति प्रथा से मुक्ति असंभव है। दलितों को धार्मिक अनुशासन में घेर कर उच्च शिक्षा, संस्कृति व दर्शन से वंचित रखा गया, फलत वे आशक्त हो गए और विदेशी आक्रांताओं से रौंदे जाते रहे। हमारी पराजय के मूल में जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था की गहरी भूमिका रही।

गांधी जी हिन्दू धर्म के माथे पर कलंक (गोधरा 5/11/1917) में अपने आलेख में यह अफसोस जाहिर करते हैं कि ‘वर्ण की मेरी व्याख्या के हिसाब से तो आज हिन्दू धर्म में वर्ण धर्म का अमल होता ही नहीं। ब्राह्मण नाम रखने वाले क्या पढ़ाना छोड़ बैठे हैं और अन्य धंधे में लगे हैं। यही बात थोड़ी बहुत अन्य वर्गों के विषय में सच है।’ वास्तव में जाति प्रथा खत्म करने की बेचैनी उतनी गांधी जी को नहीं थी जितनी डॉ. अंबेडकर को थी। एक बार गांधी जी ने कहा था ‘मैं दलित वर्ग का किसी अन्य वर्ग की कीमत पर स्वराज नहीं चाहता, यह मेरे विचार से स्वराज होगा ही नहीं होगा। मेरा विचार है कि जिस समय भारत अंत शुद्धि कर लेगा, वह तभी आजाद होगा उससे पहले नहीं।’ (द कलेक्टेड वर्कस ऑफ महात्मा गांधी ख. 14, पृ. 15) इसके उलट डॉ. अंबेडकर का दृष्टिकोण एकदम साफ था कि जाति प्रथा को एकदम नष्ट किए बिना इस देश से अस्पृश्यता को समाप्त नहीं किया जा सकता। इसी कारण वे अंग्रेजी राज्य को सच्चा शैतान मानने के बजाय जाति प्रथा को देश का सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं।

गोलमेज कांफ्रेंस में भी गांधी जी और डॉ. अंबेडकर के बीच वैचारिक मतभेद उभरे पर डॉ. अंबेडकर अपनी बात पर अड़े रहे। गांधी जी ने कहा ‘पृथक मतदाता सूची और आरक्षण उस कलंक को नहीं धो सकते जो दलित जातियों का नहीं सनातनी हिन्दुओं का कलंक है।’

गांधी जी कहते थे ‘मेरे मत से हमारी दुर्गति का कारण जाति प्रथा नहीं है, हमारी गुलामी का कारण हमारा लोभ और अनिवार्य गुणों के प्रति हमारी उपेक्षा है। मेरा विश्वास है कि जाति प्रथा ने हिन्दू धर्म को विघटन से बचाया है।’ (दि कलेक्टेड वर्कस ऑफ महात्मा गांधी पृ. 83) इसके विपरीत डॉ. अंबेडकर भारत के पतन और गुलामी का कारण जाति प्रथा को मानते थे। गांधी जी गीता के चातुर्वर्ण्य विभाजन को ठीक मानकर उसका समर्थन करते थे और गांधी जी का यह समर्थन डॉ. अंबेडकर को मंजूर नहीं था इसलिए वे एक दिन के हिन्दू धर्म से नाता तोड़कर भारत में ही पल्लवित व पुष्पित बौद्ध धर्म की शरण में चले गए।

बाबा साहब ने कहा ‘हमारे देश ने बार-बार स्वतंत्रता क्यों खोई, आए दिन हम विदेशी हुकूमत में क्यों जकड़े गए। क्योंकि यह देश कभी एकत्रित होकर शत्रु के समक्ष खड़ा नहीं हुआ। समाज का एक छोटा वर्ग ही सामने आया और उसे जिसने पराजित किया वही विजेता बन गया, इसका प्रमुख कारण है हिन्दुओं की विनाशकारी जाति व्यवस्था। इसी विरोधी विचारधारा के कारण गांधी जी और डॉ. अंबेडकर कभी एक न हो सके। 1936 में अंबेडकर के ‘भाषण प्रथा उन्मूलन’ पर गांधी जी ने कहा कि वर्ण व्यवस्था हमें सिखाती है कि हम सब अपने बाप-दादा के पेशे को अपनाते हुए अपनी जीविका चलाएं, यह हमारे अधिकारों का नहीं अपितु हमारे कर्तव्यों का निर्धारण करती है। किन्तु गांधी की इस टिप्पणी पर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर निरंतर असहज होते रहे। यद्यपि दोनों ने विदेशों में आधुनिक शिक्षा ग्रहण की थी परन्तु दोनों की सोच में जमीन-आसमान का अंतर था। जहां गांधी जी पारंपरिक सनातनी विचारधारा का समर्थन करते थे वहीं डॉ. अंबेडकर आधुनिक विकासवादी विचारधारा का समर्थन करते थे।

यह सच है कि गांधी जी और डॉ. अंबेडकर के हिन्दू समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था को लेकर अपने-अपने विचार थे पर वे दोनों ही दलितों या अछूतों को हिन्दू धर्म से अलग नहीं मानते थे पर कुछ अज्ञानी हिन्दू मठाधीश दलितों को हिन्दू धर्म का हिस्सा नहीं मानते और उनकी इसी अज्ञानता के कारण सनातनी हिन्दू संस्कृति का पतन होता रहा है।

 (लेखक भारत सरकार के पूर्व उपसचिव एवं कई पुस्तकों के लेखक हैं।)



हर युग में डॉ. अंबेडकर की सार्थकता

बसंत कुमार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक पूज्य मोहन जी भागवत ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के विषय में एक बार कहा था कि यदि डॉ. अंबेडकर राजनेता होते तो वह उच्च कोटि के राजनेता होते, यदि वह एक अर्थशास्त्राr होते तो वह अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्राr होते और यदि वह एक समाज सुधारक होते तो उच्च कोटि के समाज सुधारक होते। एक कानूनविद् के रूप में उनके ज्ञान के कारण ही उन्हें संविधान सभा की प्रारूप समिति का चेयरमैन बनाया गया और उनके प्रयास से देश को एक खूबसूरत संविधान मिला। अब 21वीं सदी में पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हुए पर आज बाबा साहब व उनके सिद्धांत पूर्ण रूप से सार्थक हैं।

कुछ ही दिनों में देश में अंबेडकर जयंती मनाई जाने वाली है और सभी दल चाहे वह वामपंथी हों, दक्षिणपंथी हों या वह मध्यमार्गी हों सभी यह दर्शाने का प्रयास करेंगे कि वह बाबा साहब डॉ. अंबेडकर को अपना आदर्श मानते हैं पर क्या कोई दल अंबेडकर के आदर्शों को मानता है। पर उन्होंने संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन के रूप में जो संविधान देश को दिया उसने पूरे देश को तमाम विविधताओं के बावजूद एक में बांधकर रखा है। अपने खुद के जीवन में कितनी उपेक्षाओं, कितने तिरस्कार, कितने अपमान उन्होंने झेले परन्तु उन्होंने आहत मन की तनिक भी आहट संविधान निर्माण में नहीं आने दी। विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद उन्होंने यही कहा कि मैं भारत में ही रहूंगा और भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करूंगा।

संविधान निर्माण में उन्होंने कितना दुष्कर कार्य किया इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संविधान निर्माण में 7435 प्रस्ताव आए जिनमें से 4100 से अधिक प्रस्तावों को अलग किया गया और बाद में 2431 प्रस्तावों को स्वीकृत करने में कामयाबी हासिल की। भारत के हर नागरिक के ससम्मान जीवन के लिए उन्होंने भारतीय संविधान में मूलभूत अधिकारों की व्यवस्था दी जिसके अंतर्गत अनुच्छेद 14, 15, 16, 17 और 18 के माध्यम से समता का अधिकार, अनुच्छेद 19, 20, 21 एवं 22 में स्वतंत्रता का अधिकार, अनुच्छेद 23 व 24 में शोषण के विरुद्ध अधिकार दिया। बाबा साहब यह भलीभांति जानते थे कि भारत विभिन्न धर्मों एवं धार्मिक आस्थाओं का देश है इसी कारण उन्होंने संविधान में अनुच्छेद 25, 26, 27 एवं 28 में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की व्यवस्था की। इन मूल अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए अनुच्छेद 32 की व्यवस्था की गई, जिसके अंतर्गत मूल अधिकारों का हनन होने पर कोई भी नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर सकता है। अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को अपनी स्वेच्छा से अपने सामाजिक और शैक्षणिक अधिकार के अंतर्गत अपनी शैक्षणिक संस्थाएं खड़ी करने का अधिकार है।

एक अर्थशास्त्री और एक विजनरी के रूप में भी बाबा साहब का योगदान अद्वितीय है। श्रमिकों के कल्याण हेतु और श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए विधि मंत्री के रूप में अनेक कानून बनाए। मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी, मजदूरों की भविष्य निधि के लिए व्यवस्था दी और मजदूर और मालिक के बीच बेहतर संवाद पर बल दिया। उन्होंने देश के संविधान के साथ-साथ एक आर्थिक ढांचे का निर्माण किया। सेंट्रल वॉटरवेज इरिगेशन एंड नेविगेशन कमीशन को स्थापित करने की योजना एवं दामोदर वैली प्रोजेक्ट, हीरा कुंड प्रोजेक्ट तथा पानी और सिंचाई से संबंधित कई प्रोजेक्ट बाबा साहब के मस्तिष्क की उपज थे। भारत में रिजर्व बैंक की स्थापना के समय हिल्टन यंग कमीशन ने डॉ. अंबेडकर के दिए गए सुझावों को आधार बनाया। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उन्होंने रिसर्च के दौरान एक थिसिस लिखीö‘नेशनल डिवीडेंट ऑफ इंडिया’ जो 1924 में प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने फाइनेंस कमीशन का कंसेप्ट दिया और उसी कंसेप्ट के आधार पर भारत में फाइनेंस कमीशन की स्थापना भी हुई। आज से सात दशक पूर्व उन्होंने महिला सशक्तिकरण की बात की और उन्होंने राइट टू एडॉप्शन और सम्पत्ति का अधिकार देकर महिलाओं को सुरक्षा दी।

देश में एकता और समरसता के बाबा साहब प्रबल पक्षधर थे इसीलिए जब संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़ने के लिए शेख अब्दुल्ला ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को तो पंडित नेहरू ने प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. अंबेडकर के पास शेख अब्दुल्ला को भेजा, पर डॉक्टर अंबेडकर ने इसे मना कर दिया क्योंकि वह अनुच्छेद 370 के प्रबल विरोधी थे परन्तु नेहरू जी की जिद के कारण बहुमत के आधार पर अनुच्छेद 370 लागू हुआ। परन्तु डॉ. अंबेडकर के कारण संविधान में यह लिख दिया गया कि यह अनुच्छेद अस्थायी होगा और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साहसिक फैसले से अगस्त 2019 में अंतत इस विभाजनकारी प्रोविजन को समाप्त कर दिया गया।

बाबा साहब के आर्थिक दृष्टिकोण को मूर्तरूप देने के लिए प्रधानमंत्री बनने के पश्चात श्री नरेंद्र मोदी ने अपने प्रशासन का मूल मंत्र ‘सबका साथ-सबका विकास’ निर्धारित किया। गरीब व वंचित लोगों को देश की बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने के लिए जनधन योजना प्रारंभ की जिससे देश के करोड़ों लोग बैंकों में खाता खोलकर देश की बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। बाबा साहब की 125वीं जयंती मनाने के लिए संसद में विशेष सत्र का आयोजन किया गया। इस अवसर पर संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री जी ने कहा कि जन सामान्य की गरिमा और देश की अखंडता के लिए बाबा साहब की भूमिका को हम नकार नहीं सकते। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के नाते डॉ. अंबेडकर ने अनुच्छेद 368 के विषय में कहा था ‘संविधान एक आधारभूत दस्तावेज है जो राज्य के तीनों अंगोंöकार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका की स्थिति और शक्तियों को परिभाषित करता है। यह कार्यपालिका की शक्तियों और विधायिका की शक्तियों को नागरिकों के प्रति भी परिभाषित करता है जैसे कि हमारे मौलिक अधिकारों के विषय में किया है। वस्तुत संविधान का उद्देश्य राज्यों के अंगों का सृजन करना मात्र नहीं है बल्कि उसके अधिकार को सीमित करना है क्योंकि यदि उसके अधिकार में कोई सीमा नहीं लगाई गई तो वह पूर्ण निरंकुशता होगी। विधायिका किसी भी कानून को बनाने में स्वतंत्र हो, कार्यपालिका कोई भी निर्णय लेने में स्वतंत्र हो तो इसकी परिणिति अराजकता में होगी।’

बाबा साहब धर्मविरोधी व अधार्मिक दृष्टिकोण से कतई सहमत नहीं थे और उनके अनुसार धर्म मनुष्य के सामाजिक जीवन का अंग है तथा व्यक्ति की धरोहर है। धर्म की सामाजिक शक्ति में बाबा साहब का दृढ़ विश्वास था। इसी कारण वामपंथियों के भौतिकवाद से सदैव असहमत रहते थे। वामपंथियों के भौतिकवादी सिद्धांतों की जड़ों पर प्रहार करते हुए डॉ. अंबेडकर कहते हैं कि कुछ लोगों का सोचना है कि धर्म समाज के लिए आवश्यक नहीं है, मैं इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करता, मैं धर्म की आधारशिला को जीवन और समाज के व्यवहारों के लिए आवश्यक मानता हूं। डॉ. अंबेडकर का धर्म दर्शन (पृष्ठ 70) वहीं लाइन एंड मिशन (पृष्ठ 305) पर वह कहते हैं कि मैं धर्म चाहता हूं परन्तु धर्म के नाम पर किसी भी प्रकार का पाखंड या ढोंग नहीं चाहता।

बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की महत्ता का पता इसी बात से लगता है कि अगर किसी को सरकार पर प्रहार करना है तो कोटेशन बाबा साहब का देता है और अगर किसी को अपना बचाव करना होता है तो कोटेशन बाबा साहब का काम आता है। मतलब उनमें कितनी दूरदृष्टि थी, कितना विजन था कि आज भी विरोध करने के लिए वह मार्गदर्शक हैं, शासन चलाने के लिए वह मार्गदर्शक हैं और जो न्यूट्रल हैं उनके लिए भी मार्गदर्शक हैं। बाबा साहब के विचार हर पीढ़ी के लिए, हर कालखंड के लिए, हर तबके के लिए उपकारक हैं। उनके विचारों में एक ताकत थी जो राष्ट्र के लिए समर्पित थी और उसमें वह सामर्थ्य था जो 100 वर्ष बाद भी देश कैसा होगा यह देख सकता थे। परन्तु यह देश का दुर्भाग्य था कि निजी स्वार्थ की राजनीति के कारण देश का सर्वोच्च सम्मान 42 वर्षों के बाद मिला और विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने ढंग और मतलब से उनको प्रस्तुत करते रहे और एक महान राष्ट्र निर्माता को मात्र दलित आइकॉन के रूप में प्रस्तुत करते रहे।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उपसचिव हैं।)

 

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

उत्तर प्रदेश जनसंख्या नीति का विरोध औचित्यहीन

अवधेश कुमार

उत्तर प्रदेश की नई जनसंख्या नीति पर कई हलकों से आ रही नकारात्मक प्रतिक्रियाएं दुखद अवश्य हैं परअनपेक्षित नहीं। भारत में जनसंख्या नियंत्रण और इससे संबंधित नीति पर जब भी बहस होती है तस्वीर ऐसी ही उभरती है। हालांकि सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री का बयान दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाएगा। वे कह रहे हैं कि पहले नेता, मंत्री और विधायक बताएं कि उनके कितने बच्चे हैं और उनमें कितने अवैध हैं। इस तरह की उदंड प्रतिक्रियाओं की ऐसे वरिष्ठ नेता से उम्मीद नहीं की जा सकती। सपा सांसद सफीकुर्रहमान बर्क यदि कह रहे हैं कि कोई कानून बना लीजिए बच्चे पैदा होने हैं वे होंगे, अल्लाह ने जितनी रूहें पैदा कीं हैं वे सब धरती पर आएंगे तो किसी को हैरत नहीं होगी। बर्क ऐसे ही मजहबी और सांप्रदायिक बयानों के लिए जाने जाते हैं। किंतु खुर्शीद कांग्रेस के सेकुलर सभ्य शालीन चेहरा है। लंबे समय से देश में सोचने समझने वालों का बड़ा तबका आबादी को नियंत्रण में रखने के लिए किसी न किसी तरह की नीति लागू करने की आवाज उठाता रहा है। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से दिए जाने वाले भाषण के लिए आम लोगों से सुझाव मांगे तो उसमें सबसे ज्यादा संख्या में जनसंख्या नियंत्रण कानून का सुझाव आया था। तो इसके पक्ष में व्यापक जन भावना है और अर्थशास्त्रियों समाजशास्त्रीय द्वारा लगातार बढ़ती आबादी पर चिंता प्रकट की गई है। प्रश्न है कि जनसंख्या नियंत्रण नीति में ऐसा क्या है जिसके विरूध्द तीखी प्रतिक्रिया होनी चाहिए? क्या वाकई यह एक मजहब यानी मुसलमानों के खिलाफ है जैसा आरोप लगाया जा रहा है?

उत्तर प्रदेश विधि आयोग ने जब जनसंख्या नियंत्रण नीति का दस्तावेज जारी किया था तभी सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से दोष निकालने वालों ने एक-एक शब्द छान मारा। उसमें किसी तरह के मजहब का कोई जिक्र नहीं था और योगी आदित्यनाथ द्वारा जार नीति वही है। इसमें दो से ज्यादा बच्चा पैदा करने पर सरकारी नौकरियों में आवेदन करने का निषेध या सरकारी सुविधाओं से वंचित करने या फिर राशन कार्ड में चार से अधिक नाम नहीं होने का बिंदु सभी मजहबों पर समान रूप से लागू होगा। इसमें कहीं नहीं लिखा है कि केवल मुसलमानों पर लागू होगा। आबादी मान्य सीमा से न बढ़े, उम्र, लिंग और मजहब के स्तर पर संतुलन कायम रहे यह जिम्मेवारी भारत के हर नागरिक की है। विरोध का तार्किक आधार हो तो विचार किया जा सकता है। लेकिन इसे मुसलमानों को लक्षित नीति कहना निराधार है। नीति में वर्ष 2026 तक जन्मदर को प्रति हजार आबादी पर 2.1 तथा वर्ष 2030 तक 1.9 लाने का लक्ष्य रखा गया है। क्या यह एक मजहब से पूरा हो जाएगा? जनसंख्या नियंत्रण के लिए हतोत्साहन और प्रोत्साहन दोनों प्रकार की नीतियां या कानून की मांग की जाती रही है। इसमें दो से अधिक बच्चों को कई सुविधाओं और लाभों से वंचित किया गया है तो उसकी सीमा में रहने वाले, दो से कम बच्चा पैदा करने वाले या दो बच्चा के साथ नसबंदी कराने वालों के लिए कई प्रकार के लाभ और सुविधाओं की बातें हैं। अपनी आबादी के जीवन गुणवत्ता तथा क्षमता विकास किसी सरकार का उद्देश्य होना चाहिए। इसमें बच्चों और किशोरों के सुंदर स्वास्थ्य उनके शिक्षा के लिए भी कदम हैं। मसलन 11 से 19 वर्ष के किशोरों के पोषण, शिक्षा व स्वास्थ्य के बेहतर प्रबंधन के अलावा, बुजुर्गों की देखभाल के लिए व्यापक व्यवस्था भी की जाएगी। नई नीति में आबादी स्थिरीकरण के लिए स्कूलों में हेल्थ क्लब बनाये जाने का प्रस्ताव भी है। साथ ही डिजिटल हेल्थ मिशन की भावनाओं के अनुरूप प्रदेश में अब नवजातों, किशोरों व बुजुर्गों की डिजिटल ट्रैकिंग भी कराने की योजना है। जनसंख्या नियंत्रण केवल कानून का नहीं सामाजिक जागरूकता का भी विषय है और इस पहलू पर फोकस किया गया है। मुख्यमंत्री ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि सामाजिक जागरूकता के लगातार अभियान चलाए जाएंगे और इसकी शुरुआत भी कर दी।

उत्तर प्रदेश की जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से लगातार ज्यादा रहा है। वर्ष 2001-2011 के दौरान प्रदेश की जनसंख्या वृद्धि दर 20.23ः रही, जो राष्ट्रीय औसत वृद्धि दर17.7ः से अधिक है। इसे अगर राष्ट्रीय औसत के आसपास लाना है तो किसी न किसी प्रकार के कानून की आवश्यकता है। यह कानून इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। हालांकि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय प्रवृत्ति जनसंख्या बढ़ाने की है। एक बच्चा कानून कठोरता से लागू करने वाले चीन को तीन बच्चे पैदा करने की छूट देनी पड़ी है क्योंकि इस कारण वहां आबादी में युवाओं की संख्या घटी है जबकि बुजुर्गों की बढ़ रही है। अनेक विकसित देश इसी असंतुलन के भयानक शिकार हो गए हैं। युवाओं की संख्या घटने का अर्थ काम करने वाले हाथों का कम होना है, जिसका देश की आर्थिक- सामाजिक प्रगति पर विपरीत असर पड़ता है। दूसरी ओर बुजुर्गों की बढ़ती आबादी का मतलब देश पर बोझ बढ़ना है। इसलिए अनेक देश ज्यादा बच्चा पैदा करने के लिए प्रोत्साहनों की घोषणा कर रहे हैं। भारत में भी इस पहलू का विचार अवश्य किया जाना चाहिए। हम अगर भविष्य की आर्थिक महाशक्ति माने जा रहे हैं तो इसका एक बड़ा कारण हमारे यहां युवाओं की अत्यधिक संख्या यानी काम के हाथ ज्यादा होना है। जनसंख्या नियंत्रण की सख्ती से इस पर असर पड़ेगा और भारत की विकास छलांग पर ग्रहण लग सकता है। किंतु यह भी सही है कि तत्काल कुछ समय के लिए जनसंख्या वृद्धि कम करने का लक्ष्य पाया जाए और उसके बाद भविष्य में ढील दी जाए। चीन ने कहा भी है कि एक बच्चे की नीति से उसने 46 करोड़ बच्चे का जन्म रोकने में सफलता पाई।

यह सच है कि भारत में हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध की आबादी वृद्धि दर लगातार नीचे आई है तो मुसलमानों की और कहीं-कहीं ईसाइयों की वृद्धि दर बढी है। इसमें यह सलाह भी दी जाती रही है कि चूंकी भारत में जनसंख्या नियंत्रण की कठोर नीति लागू करना संभव नहीं, इसलिए हिंदुओं, सिखों, बौद्धों और जैनियों ज्यादा बच्चा पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इन्हें तीन बच्चे पैदा करने की प्रेरणा देने के लिए अभियान चलाने की भी सलाह दी जाती रही है। उत्तर प्रदेश में भी हिंदुओं, सिखों, बौद्धों और जैनियों की आबादी विस्तार की गति 2011 की जनगणना के 10 साल में घटी तो मुस्लिमों व ईसाइयों की बढ़ी। वर्ष 2001-11 के 10 साल में हिंदुओं की आबादी में बढ़ोतरी की रफ्तार 0.88 प्रतिशत घटी। 2001 की जनगणना में प्रदेश में 80.61 प्रतिशत हिंदू थे, जबकि 2011 की जनगणना में इनकी संख्या 79.73 प्रतिशत रह गई। इसी तरह सिखों व बौद्धों की आबादी .08-08 प्रतिशत तथा जैनियों की आबादी में .25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके विपरीत मुस्लिमों की आबादी 0.77 प्रतिशत बढ़ी। वर्ष 2001 की जनगणना में मुस्लिम आबादी 18.49 प्रतिशत थी जो 2011 में 19.26 प्रतिशत हो गई। दस साल पहले जहां ईसाई कुल जनसंख्या के 0.12 प्रतिशत थे वे 0.17 प्रतिशत हो गए। हम चाहे जो भी तर्क दें गैर मुस्लिमों में उनकी आबादी वृद्धि को लेकर व्यापक चिंता है। जिस देश का मुस्लिम मजहब के आधार पर विभाजन हो चुका है वहां इस तरह का भय आधारहीन नहीं माना जा सकता। कुछ कट्टर मजहबी व राजनीतिक नेता आबादी वृद्धि को संसदीय लोकतंत्र में अपनी ताकत का आधार बनाकर उकसाते हैं। शफीकुर्रहमान अकेले नहीं हैं। इनकी आपत्ति का संज्ञान लेना आत्मघाती होगा। ये अपने समाज के ही दुश्मन हैं। वस्तुतः इसका विरोध करने, इस पर प्रश्न उठाने की जगह इसकी आम स्वीकृति का अभियान चलाना हर मजहब के प्रमुख लोगों का दायित्व है। सच कहें तो उत्तर प्रदेश सरकार ने साहसी फैसला किया है। इसका समर्थन किया जाना चाहिए ताकि दूसरे राज्य भी प्रेरित होकर आगे आएं। हालांकि आबादी में उम्र संतुलन के प्रति लगातार सतर्क रहना होगा ताकि युवाओं की आबादी और उद्यमों हाथों में विश्व के नंबर एक का स्थान हमसे न छीन जाए।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

चुनाव परिणाम के संदेश स्पष्ट हैं

अवधेश कुमार

उत्तर प्रदेश जिला पंचायत चुनाव परिणामों ने उन सबको चौंकाया है जो पिछले ग्राम पंचायत चुनाव के आधार पर मान चुके थे कि भाजपा के लिए अत्यन्त कठिन राजनीतिक चुनौती की स्थिति पैदा हो चुकी है। कुल 75 में से 67 स्थानों पर भाजपा के अध्यक्षों का निर्वाचन निश्चित रूप से कई संकेत देने वाला है। चूंकी इस समय प्रदेश में समस्त राजनीतिक कवायद, बयानबाजी, विश्लेषण  आदि अगले वर्ष आरंभ में होने वाले विधानसभा चुनाव की दृष्टि से सामने आ रहे हैं इसलिए कई बार हमारे सामने भी जमीनी सच्चाई नहीं आ पाती। ठीक है कि जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव को हम विधानसभा चुनाव का ट्रेलर नहीं मान सकते। लेकिन इससे प्रदेश की राजनीति के कई पहलुओं की झलक अवश्य मिलती है। वैसे ग्राम पंचायतों के चुनाव को भी हम आगामी चुनाव का पूर्व दर्शन नहीं मान सकते थे लेकिन उस समय के बयानों और विश्लेषणों को देख लीजिए। बहरहाल, पंचायत चुनावों के राजनीतिक पहलुओं को समझने के पहले यह ध्यान रखना जरूरी है बसपा इन चुनावों से अपने को दूर रखती है और कांग्रेस प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में कहीं है नहीं। जाहिर है ,मुकाबला भाजपा और सपा के बीच ही था। तो इस समय हमारे सामने इन दो पार्टियों की  ही तस्वीर है।

तो सबसे पहले सपा। सपा ने पूरे चुनाव पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है। उसने पुलिस, प्रशासन व चुनाव अधिकारियों पर धांधली के आरोप लगाए हैं तथा इनके विरुद्ध का आयोग में लिखित शिकायत भी की है। अखिलेश यादव अपने बयान में इसे लोकतंत्र का ही अपहरण बता रहे हैं। हम आप इसे जिस तरह लें लेकिन न कोई निष्पक्ष विश्लेषक इसे न स्वीकार करेगा और न आम जनता के गले ही उतरेगा कि अधिकारियों ने धांधली करके भाजपा उम्मीदवारों को जीता दिया है। हम पिछले लंबे समय से भारतीय राजनीति का यह हास्यास्पद दृश्य देख रहे हैं कि जब भाजपा के पक्ष में परिणाम आता है तो विपक्ष ईवीएम का सवाल जरूर उठाता है। इसके विपरीत जहां विपक्ष की विजय होती है वहां ईवीएम पर कोई प्रश्न नहीं उठता यानी वह बिल्कुल सही काम कर रहा होता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि हमारी राजनीति में जमीनी वास्तविकता से कटने के कारण शीर्ष स्तर से लेकर नीचे के नेताओं को पता ही नहीं रहता कि आखिर जन समर्थन की दिशा क्या है। चूंकी राजनीतिक दल अपना जनाधार खोने को स्वीकार न कर दोष भाजपा, चुनाव आयोग , ईवीएम के सिर डालते हैं इसलिए वे ईमानदार विश्लेषण नहीं कर पाते और जब विश्लेषण ही नहीं होगा तो फिर जनाधार दुरुस्त करने के कदम भी नहीं उठाए जाते।

वास्तव में इस परिणाम के बाद अखिलेश यादव के साथ सपा के शीर्ष नेताओं को जिले से प्राप्त रिपोर्टों के आधार पर आपस में बैठकर विश्लेषण करना चाहिए था। इससे उनको वस्तुस्थिति का आभास हो जाता। अभी विधानसभा चुनाव में सात आठ महीने का समय है। इसका उपयोग कर  सांगठनिक और वैचारिक रूप से अपनी पार्टी को चुनाव के लिए बेहतर तरीके से तैयार करने की कोशिश कर सकते थे। जब आप मानेंगे ही नहीं कि समस्या आपकी पार्टी और आपके जनाधार में है तो आपको सच्चाई नहीं  दिख सकती। मीडिया में ऐसे दृश्य सामने आए जब सपा के वरिष्ठ नेता जिला पंचायत चुनाव में अपने ही नेताओं से गिड़गिड़ा रहे थे। क्यों? इसलिए कि वे स्वयं सपा के लिए काम करने को तैयार नहीं थे। कई जगह तो निर्धारित सपा उम्मीदवारों ने नामांकन के समय ही मुंह फेर लिया। अखिलेश यादव को इनके विरुद्ध कार्रवाई तक करनी पड़ी। आखिर यह कैसे संभव हुआ की 21 जिला पंचायतों में भाजपा के अध्यक्ष निर्विरोध निर्वाचित हो गए? केवल इटावा में ही सपा उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो सके। अगर सपा के उम्मीदवार सामने खड़े हो जाते तो कम से कम निर्विरोध निर्वाचन नहीं होता। जब आपकी पार्टी की ही आंतरिक दशा ऐसी है तो कैसे मान लिया जाए कि धांधली से सपा की पराजय हो गई है? अगर सपा सच्चाई को स्वीकार कर नए सिरे से चुनाव के लिए पार्टी एवं जनता के स्तर पर कमर कसने का अभियान नहीं चलाती तो उसके चुनावी भविष्य को लेकर सकारात्मक भविष्यवाणी करनी कठिन होगी।

निश्चित रूप से भाजपा के लिए यह परिणाम आत्मविश्वास बढाने वाला है। खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता को लेकर प्रदेश में पार्टी के अंदर या बाहर जो नकारात्मक धारणा निर्मित हुई या कराई गई थी उस पर जबरदस्त चोट पड़ा है। वैसे तो केंद्र ने पहले ही साफ कर दिया था कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़ा जाएगा। बावजूद सत्य से निराभासी लोगों द्वारा कुछ किंतु परंतु लगाया जा रहा था। इस चुनाव परिणाम के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस भाषा में विजय की बधाई दी है उसने इस पर स्थाई विराम लगा दिया है। उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ इसे योगी के नेतृत्व की विजय करार दिया है। अगर चुनाव में इतना शानदार प्रदर्शन नहीं होता तो योगी का नेतृत्व भले कायम रहता, न केंद्रीय नेतृत्व इस तरह बधाई देता न उनका स्वयं का आत्मविश्वास बढ़ता और न कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा होता। तो जिला पंचायत चुनाव को भले हम आप विधानसभा चुनाव की पूर्वपीठिका नहीं माने लेकिन आत्मविश्वास का यह माहौल योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा को पूरे उत्साह से विधानसभा चुनाव में काम करने को प्रेरित करेगा। किसी भी संघर्ष में चाहे वह चुनावी हो या फिर युद्ध का मैदान आत्मविश्वास और उत्साह की परिणाम निर्धारित करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह स्थिति भविष्य की दृष्टि से भाजपा के पक्ष में जाता है और स्वभाविक ही विपक्ष के विरुद्ध।

यहां से अगर कुछ अप्रत्याशित नकारात्मक स्थिति पैदा नहीं हुई तो हम चुनाव तक भाजपा को गतिशील और आक्रामक तेवर में देख सकते हैं जो उसकी स्वाभाविकता है। पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद यह गुम दिख रहा था। भाजपा की दृष्टि से इस समय उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य देखिए।  योगी के नेतृत्व में प्रदेश पार्टी ईकाई को एकजुट किया जा चुका है, केन्द्रीय नेतृत्व काफी पहले से चुनाव की दृष्टि से सक्रिय है,नेताओं के अलावा पूरे प्रदेश के जिम्मेवार कार्यकर्ताओं से संपर्क-संवाद का एक चरण पूरा हो गया है, विधायकों के प्रदर्शन तथा जनाधार का सर्वेक्षण आधारित अध्ययन भी आ चुका है। विपक्ष इस मामले में काफी पीछे है। विपक्ष के बीच जब एकजुटता नहीं होती तथा वे अपने चुनावी भविष्य को लेकर अनिश्चय में होते हैं तो इसका लाभ सामान्य सत्तारूढ़ पार्टी को मिलता है। उत्तर प्रदेश में अभी सपा, बसपा और कांग्रेस के बयानों को देखें। वे भाजपा के साथ स्वयं भी एक दूसरे को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। जिला पंचायत चुनाव के बाद समय को भांपते हुए जिस तरह का संयम ,धैर्य और बुद्धि चातुर्य का इन्हें परिचय देना चाहिए इनका आचरण उसके विपरीत है। बसपा कह रही है कि कांग्रेस ,भाजपा और सपा के शासन में कभी निष्पक्ष चुनाव हो ही नहीं सकता जबकि बसपा के काल में होता है। कांग्रेस कह रही है कि बसपा भाजपा की बी टीम है। जवाब में बसपा कह रही है कि कांग्रेस के सी का मतलब कनिंग है। 2014 से 2019 तक के चुनाव परिणामों ने साबित किया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा शीर्षतम बिंदु पर है और शेष दल इतने नीचे हैं कि सामान्य अवस्था में उनके वहां तक पहुंचने की कल्पना नहीं हो सकती । पिछले तीन दशकों में कोई भी पार्टी चुनाव परिणामों में भाजपा की तरह सशक्त होकर नहीं बढ़ी। जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव परिणामों ने यही संदेश दिया है कि कम से कम अभी उसके बड़े पराभव के दौर की शुरुआत नहीं हुई है। विपक्षी दलों ने इन सात वर्षों में वैचारिकता, संगठन और राजनीतिक संघर्ष व अभियानों के स्तर पर संदेश तक नहीं दिया कि वे प्रदेश की राजनीति में भाजपा के वर्चस्व को तसशक्त चुनौती देने से संकल्पित भी हैं। चुनाव के पूर्व कुछ दलों से गठबंधन, जातीय एवं सांप्रदायिक समीकरणों को साधने आदि नुस्खे विफल साबित हो रहे हैं। जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव परिणामों के बाद भी विपक्ष की ओर से किसी तरह की राजनीतिक प्रखरता और ओजस्विता नहीं प्रदर्शित हो रही, मिलजुल कर मुकाबला करने का संकेत तक नहीं मिल रहा। इसमें यह मान लेना कठिन है कि जिला पंचायत अध्यक्षों का चुनाव परिणाम विधानसभा तक विस्तारित नहीं होगा। हां अगर इस चुनाव परिणाम से चौकन्ना होकर सपा,  बसपा जैसी पार्टियां कमर कसकर अभी से प्रखर राजनीतिक अभियान चलाने,मुद्दों पर संघर्ष करने का माद्दा दिखाती तो हल्की उम्मीद पैदा हो सकती थी। जब ऐसा है ही नहीं तो फिर इनके पक्ष में परिणाम आने की कल्पना इस समय नहीं की जा सकती।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली:110092, मोबाइल: 9811027208

रविवार, 4 जुलाई 2021

शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए ने किया डॉक्टरों को कोरोना योद्धा गौरव सम्मान से सम्मानित

मो. रियाज़

नई दिल्ली। कोरोना वायरस के वैश्विक संकट-काल में समाज और देश को बचाने के लिए पूरी ईमानदारी से डाक्टर व उनके सहयोगी लगे रहे। इसी सेवा-निष्ठा के लिए शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने डॉक्टरों के साथ-साथ दिल्ली सिविल डिफेंस के वॉलिंटियर्स को कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान देकर सम्मानित किया।

अभी कुछ दिन पहले भी शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना काल मे समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों, सफाईकर्मियों, दिल्ली सिविल डिफेंस के वालंटियर्स, बिजली विभाग के कर्मचारियों, समाजसेवियों आदि को उनकी सेवा-निष्ठा के लिए कोरोना योद्धा गौरव सम्मान देकर सम्मानित किया था।

अब तक शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना महामारी के दौरान अलग-अलग क्षेत्र में अपनी सेवा दे रहे 400 से अधिक कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित कर चुकी। आज भी अपने कार्यालय पर शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन, आरडब्ल्यूए सदस्य मुमताज, विनोद झा, प्रदीप जैन, समाजसेवी जफर हुसैन आदि ने 100 से अधिक डॉक्टरों व दिल्ली सिविल डिफेंस के कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया। 

विदित हो दिल्ली ने कोरोना के खिलाफ अपनी सबसे मुश्किल जंग कोरोना योद्धाओं के मजबूत इरादे की वजह से ही लड़ी है। दिल्ली के हीरों ने अपने परिवारों की चिंता ना करते हुए दिन-रात बस दिल्ली को सुरक्षित बनाने में जुटे हुए हैं। लेकिन कोरोना वायरस महामारी के संकटकाल में कोरोना योद्धाओं को भी कोरोना के संक्रमण का शिकार होना पड़ा फिर भी इन कोरोना योद्धाओं के हौसलों को पस्त नहीं कर पाया। अपने योद्धाओं का जोश, जुनून और लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी के समर्पण का तहे दिल से शुक्रिया और सम्मान देने के लिए ही शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देने की शुरुआत की।

इस मौके पर शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन ने कहा कि हमने तो सिर्फ एक शुरुआत की है ताकि कोरोना योद्धाओं को एक छोटा सा सम्मान दे सकें जिससे यह योद्धा इस कोरोना महामारी की लड़ाई में अपने आप को अकेला न महसूस करें। यह सम्मान उन्हें नई ऊर्जा देगा।

उन्होंने कहा कि हमारी आरडब्ल्यूए आगे भी ऐसे कोरोना योद्धाओं को सम्मानित करती रहेगी जिन्होंने इस वैश्विक संकट-काल में समाज और देश को बचाने के लिए अपने जीवन की भी परवाह नहीं की और लोगों की सेवा की और अब भी कर रहे हैं। हमें जैसे-जैसे कोरोना वायरस महामारी के संकटकाल में सेवा करने वाले कोरोना योद्धाओं का पता चल रहा है। वैसे-वैसे हम उन्हें गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित कर रहे हैं जिससे उनके हौंसलों में कोई कमी न आ सके।

दिल्ली सिविल डिफेंस के वालिंटियर पवन कुमार ने कहा कि यह सम्मान हम जैसे सिविल डिफेंस के वालिंटियरों को एक नई ऊर्जा देगा और हम और अच्छा करने की कोशिश करेंगे। यह कुछ लोगों के लिए कागज का एक टुकड़ा हो सकता है पर यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा सम्मान है। मैं शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए का धन्यवाद करता हूं जिन्होंने मुझे यह सम्मान देकर एक नई ऊर्जा दी है।


 
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