शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

चुनाव परिणाम के संदेश स्पष्ट हैं

अवधेश कुमार

उत्तर प्रदेश जिला पंचायत चुनाव परिणामों ने उन सबको चौंकाया है जो पिछले ग्राम पंचायत चुनाव के आधार पर मान चुके थे कि भाजपा के लिए अत्यन्त कठिन राजनीतिक चुनौती की स्थिति पैदा हो चुकी है। कुल 75 में से 67 स्थानों पर भाजपा के अध्यक्षों का निर्वाचन निश्चित रूप से कई संकेत देने वाला है। चूंकी इस समय प्रदेश में समस्त राजनीतिक कवायद, बयानबाजी, विश्लेषण  आदि अगले वर्ष आरंभ में होने वाले विधानसभा चुनाव की दृष्टि से सामने आ रहे हैं इसलिए कई बार हमारे सामने भी जमीनी सच्चाई नहीं आ पाती। ठीक है कि जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव को हम विधानसभा चुनाव का ट्रेलर नहीं मान सकते। लेकिन इससे प्रदेश की राजनीति के कई पहलुओं की झलक अवश्य मिलती है। वैसे ग्राम पंचायतों के चुनाव को भी हम आगामी चुनाव का पूर्व दर्शन नहीं मान सकते थे लेकिन उस समय के बयानों और विश्लेषणों को देख लीजिए। बहरहाल, पंचायत चुनावों के राजनीतिक पहलुओं को समझने के पहले यह ध्यान रखना जरूरी है बसपा इन चुनावों से अपने को दूर रखती है और कांग्रेस प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में कहीं है नहीं। जाहिर है ,मुकाबला भाजपा और सपा के बीच ही था। तो इस समय हमारे सामने इन दो पार्टियों की  ही तस्वीर है।

तो सबसे पहले सपा। सपा ने पूरे चुनाव पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है। उसने पुलिस, प्रशासन व चुनाव अधिकारियों पर धांधली के आरोप लगाए हैं तथा इनके विरुद्ध का आयोग में लिखित शिकायत भी की है। अखिलेश यादव अपने बयान में इसे लोकतंत्र का ही अपहरण बता रहे हैं। हम आप इसे जिस तरह लें लेकिन न कोई निष्पक्ष विश्लेषक इसे न स्वीकार करेगा और न आम जनता के गले ही उतरेगा कि अधिकारियों ने धांधली करके भाजपा उम्मीदवारों को जीता दिया है। हम पिछले लंबे समय से भारतीय राजनीति का यह हास्यास्पद दृश्य देख रहे हैं कि जब भाजपा के पक्ष में परिणाम आता है तो विपक्ष ईवीएम का सवाल जरूर उठाता है। इसके विपरीत जहां विपक्ष की विजय होती है वहां ईवीएम पर कोई प्रश्न नहीं उठता यानी वह बिल्कुल सही काम कर रहा होता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि हमारी राजनीति में जमीनी वास्तविकता से कटने के कारण शीर्ष स्तर से लेकर नीचे के नेताओं को पता ही नहीं रहता कि आखिर जन समर्थन की दिशा क्या है। चूंकी राजनीतिक दल अपना जनाधार खोने को स्वीकार न कर दोष भाजपा, चुनाव आयोग , ईवीएम के सिर डालते हैं इसलिए वे ईमानदार विश्लेषण नहीं कर पाते और जब विश्लेषण ही नहीं होगा तो फिर जनाधार दुरुस्त करने के कदम भी नहीं उठाए जाते।

वास्तव में इस परिणाम के बाद अखिलेश यादव के साथ सपा के शीर्ष नेताओं को जिले से प्राप्त रिपोर्टों के आधार पर आपस में बैठकर विश्लेषण करना चाहिए था। इससे उनको वस्तुस्थिति का आभास हो जाता। अभी विधानसभा चुनाव में सात आठ महीने का समय है। इसका उपयोग कर  सांगठनिक और वैचारिक रूप से अपनी पार्टी को चुनाव के लिए बेहतर तरीके से तैयार करने की कोशिश कर सकते थे। जब आप मानेंगे ही नहीं कि समस्या आपकी पार्टी और आपके जनाधार में है तो आपको सच्चाई नहीं  दिख सकती। मीडिया में ऐसे दृश्य सामने आए जब सपा के वरिष्ठ नेता जिला पंचायत चुनाव में अपने ही नेताओं से गिड़गिड़ा रहे थे। क्यों? इसलिए कि वे स्वयं सपा के लिए काम करने को तैयार नहीं थे। कई जगह तो निर्धारित सपा उम्मीदवारों ने नामांकन के समय ही मुंह फेर लिया। अखिलेश यादव को इनके विरुद्ध कार्रवाई तक करनी पड़ी। आखिर यह कैसे संभव हुआ की 21 जिला पंचायतों में भाजपा के अध्यक्ष निर्विरोध निर्वाचित हो गए? केवल इटावा में ही सपा उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो सके। अगर सपा के उम्मीदवार सामने खड़े हो जाते तो कम से कम निर्विरोध निर्वाचन नहीं होता। जब आपकी पार्टी की ही आंतरिक दशा ऐसी है तो कैसे मान लिया जाए कि धांधली से सपा की पराजय हो गई है? अगर सपा सच्चाई को स्वीकार कर नए सिरे से चुनाव के लिए पार्टी एवं जनता के स्तर पर कमर कसने का अभियान नहीं चलाती तो उसके चुनावी भविष्य को लेकर सकारात्मक भविष्यवाणी करनी कठिन होगी।

निश्चित रूप से भाजपा के लिए यह परिणाम आत्मविश्वास बढाने वाला है। खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता को लेकर प्रदेश में पार्टी के अंदर या बाहर जो नकारात्मक धारणा निर्मित हुई या कराई गई थी उस पर जबरदस्त चोट पड़ा है। वैसे तो केंद्र ने पहले ही साफ कर दिया था कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़ा जाएगा। बावजूद सत्य से निराभासी लोगों द्वारा कुछ किंतु परंतु लगाया जा रहा था। इस चुनाव परिणाम के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस भाषा में विजय की बधाई दी है उसने इस पर स्थाई विराम लगा दिया है। उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ इसे योगी के नेतृत्व की विजय करार दिया है। अगर चुनाव में इतना शानदार प्रदर्शन नहीं होता तो योगी का नेतृत्व भले कायम रहता, न केंद्रीय नेतृत्व इस तरह बधाई देता न उनका स्वयं का आत्मविश्वास बढ़ता और न कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा होता। तो जिला पंचायत चुनाव को भले हम आप विधानसभा चुनाव की पूर्वपीठिका नहीं माने लेकिन आत्मविश्वास का यह माहौल योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा को पूरे उत्साह से विधानसभा चुनाव में काम करने को प्रेरित करेगा। किसी भी संघर्ष में चाहे वह चुनावी हो या फिर युद्ध का मैदान आत्मविश्वास और उत्साह की परिणाम निर्धारित करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह स्थिति भविष्य की दृष्टि से भाजपा के पक्ष में जाता है और स्वभाविक ही विपक्ष के विरुद्ध।

यहां से अगर कुछ अप्रत्याशित नकारात्मक स्थिति पैदा नहीं हुई तो हम चुनाव तक भाजपा को गतिशील और आक्रामक तेवर में देख सकते हैं जो उसकी स्वाभाविकता है। पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद यह गुम दिख रहा था। भाजपा की दृष्टि से इस समय उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य देखिए।  योगी के नेतृत्व में प्रदेश पार्टी ईकाई को एकजुट किया जा चुका है, केन्द्रीय नेतृत्व काफी पहले से चुनाव की दृष्टि से सक्रिय है,नेताओं के अलावा पूरे प्रदेश के जिम्मेवार कार्यकर्ताओं से संपर्क-संवाद का एक चरण पूरा हो गया है, विधायकों के प्रदर्शन तथा जनाधार का सर्वेक्षण आधारित अध्ययन भी आ चुका है। विपक्ष इस मामले में काफी पीछे है। विपक्ष के बीच जब एकजुटता नहीं होती तथा वे अपने चुनावी भविष्य को लेकर अनिश्चय में होते हैं तो इसका लाभ सामान्य सत्तारूढ़ पार्टी को मिलता है। उत्तर प्रदेश में अभी सपा, बसपा और कांग्रेस के बयानों को देखें। वे भाजपा के साथ स्वयं भी एक दूसरे को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। जिला पंचायत चुनाव के बाद समय को भांपते हुए जिस तरह का संयम ,धैर्य और बुद्धि चातुर्य का इन्हें परिचय देना चाहिए इनका आचरण उसके विपरीत है। बसपा कह रही है कि कांग्रेस ,भाजपा और सपा के शासन में कभी निष्पक्ष चुनाव हो ही नहीं सकता जबकि बसपा के काल में होता है। कांग्रेस कह रही है कि बसपा भाजपा की बी टीम है। जवाब में बसपा कह रही है कि कांग्रेस के सी का मतलब कनिंग है। 2014 से 2019 तक के चुनाव परिणामों ने साबित किया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा शीर्षतम बिंदु पर है और शेष दल इतने नीचे हैं कि सामान्य अवस्था में उनके वहां तक पहुंचने की कल्पना नहीं हो सकती । पिछले तीन दशकों में कोई भी पार्टी चुनाव परिणामों में भाजपा की तरह सशक्त होकर नहीं बढ़ी। जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव परिणामों ने यही संदेश दिया है कि कम से कम अभी उसके बड़े पराभव के दौर की शुरुआत नहीं हुई है। विपक्षी दलों ने इन सात वर्षों में वैचारिकता, संगठन और राजनीतिक संघर्ष व अभियानों के स्तर पर संदेश तक नहीं दिया कि वे प्रदेश की राजनीति में भाजपा के वर्चस्व को तसशक्त चुनौती देने से संकल्पित भी हैं। चुनाव के पूर्व कुछ दलों से गठबंधन, जातीय एवं सांप्रदायिक समीकरणों को साधने आदि नुस्खे विफल साबित हो रहे हैं। जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव परिणामों के बाद भी विपक्ष की ओर से किसी तरह की राजनीतिक प्रखरता और ओजस्विता नहीं प्रदर्शित हो रही, मिलजुल कर मुकाबला करने का संकेत तक नहीं मिल रहा। इसमें यह मान लेना कठिन है कि जिला पंचायत अध्यक्षों का चुनाव परिणाम विधानसभा तक विस्तारित नहीं होगा। हां अगर इस चुनाव परिणाम से चौकन्ना होकर सपा,  बसपा जैसी पार्टियां कमर कसकर अभी से प्रखर राजनीतिक अभियान चलाने,मुद्दों पर संघर्ष करने का माद्दा दिखाती तो हल्की उम्मीद पैदा हो सकती थी। जब ऐसा है ही नहीं तो फिर इनके पक्ष में परिणाम आने की कल्पना इस समय नहीं की जा सकती।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली:110092, मोबाइल: 9811027208

रविवार, 4 जुलाई 2021

शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए ने किया डॉक्टरों को कोरोना योद्धा गौरव सम्मान से सम्मानित

मो. रियाज़

नई दिल्ली। कोरोना वायरस के वैश्विक संकट-काल में समाज और देश को बचाने के लिए पूरी ईमानदारी से डाक्टर व उनके सहयोगी लगे रहे। इसी सेवा-निष्ठा के लिए शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने डॉक्टरों के साथ-साथ दिल्ली सिविल डिफेंस के वॉलिंटियर्स को कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान देकर सम्मानित किया।

अभी कुछ दिन पहले भी शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना काल मे समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों, सफाईकर्मियों, दिल्ली सिविल डिफेंस के वालंटियर्स, बिजली विभाग के कर्मचारियों, समाजसेवियों आदि को उनकी सेवा-निष्ठा के लिए कोरोना योद्धा गौरव सम्मान देकर सम्मानित किया था।

अब तक शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना महामारी के दौरान अलग-अलग क्षेत्र में अपनी सेवा दे रहे 400 से अधिक कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित कर चुकी। आज भी अपने कार्यालय पर शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन, आरडब्ल्यूए सदस्य मुमताज, विनोद झा, प्रदीप जैन, समाजसेवी जफर हुसैन आदि ने 100 से अधिक डॉक्टरों व दिल्ली सिविल डिफेंस के कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया। 

विदित हो दिल्ली ने कोरोना के खिलाफ अपनी सबसे मुश्किल जंग कोरोना योद्धाओं के मजबूत इरादे की वजह से ही लड़ी है। दिल्ली के हीरों ने अपने परिवारों की चिंता ना करते हुए दिन-रात बस दिल्ली को सुरक्षित बनाने में जुटे हुए हैं। लेकिन कोरोना वायरस महामारी के संकटकाल में कोरोना योद्धाओं को भी कोरोना के संक्रमण का शिकार होना पड़ा फिर भी इन कोरोना योद्धाओं के हौसलों को पस्त नहीं कर पाया। अपने योद्धाओं का जोश, जुनून और लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी के समर्पण का तहे दिल से शुक्रिया और सम्मान देने के लिए ही शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देने की शुरुआत की।

इस मौके पर शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन ने कहा कि हमने तो सिर्फ एक शुरुआत की है ताकि कोरोना योद्धाओं को एक छोटा सा सम्मान दे सकें जिससे यह योद्धा इस कोरोना महामारी की लड़ाई में अपने आप को अकेला न महसूस करें। यह सम्मान उन्हें नई ऊर्जा देगा।

उन्होंने कहा कि हमारी आरडब्ल्यूए आगे भी ऐसे कोरोना योद्धाओं को सम्मानित करती रहेगी जिन्होंने इस वैश्विक संकट-काल में समाज और देश को बचाने के लिए अपने जीवन की भी परवाह नहीं की और लोगों की सेवा की और अब भी कर रहे हैं। हमें जैसे-जैसे कोरोना वायरस महामारी के संकटकाल में सेवा करने वाले कोरोना योद्धाओं का पता चल रहा है। वैसे-वैसे हम उन्हें गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित कर रहे हैं जिससे उनके हौंसलों में कोई कमी न आ सके।

दिल्ली सिविल डिफेंस के वालिंटियर पवन कुमार ने कहा कि यह सम्मान हम जैसे सिविल डिफेंस के वालिंटियरों को एक नई ऊर्जा देगा और हम और अच्छा करने की कोशिश करेंगे। यह कुछ लोगों के लिए कागज का एक टुकड़ा हो सकता है पर यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा सम्मान है। मैं शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए का धन्यवाद करता हूं जिन्होंने मुझे यह सम्मान देकर एक नई ऊर्जा दी है।


 

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

शीर्ष न्यायालय के फैसले से तस्वीर स्पष्ट होगी

अवधेश कुमार

पिछले वर्ष हुए दिल्ली दंगों के तीन आरोपियों देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत और इसके लिए की गई टिप्पणियों को उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनवाई के लिये स्वीकार करना महत्वपूर्ण है। हालांकि शीर्ष न्यायालय ने उनके जमानत को रद्द नहीं किया लेकिन सुनवाई के लिए मामले को स्वीकार करने के संकेत के मायने हैं।  ध्यान रखिए कि तत्काल कोई फैसला या अंतिम मंतव्य न देते हुए भी शीर्ष न्यायालय ने कहा है कि उच्च न्यायालय के फैसले को देश के किसी भी न्यायालय में नजीर न माना जाए। पूरा मामला गैर कानूनी रोकथाम कानून यानी यूएपीए से जुड़ा है और उच्च न्यायालय ने इस पर भी टिप्पणियां की है। शीर्ष न्यायालय द्वारा ऐसा कहने के बाद अब इस कानून के तहत बंद आरोपियों के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को उद्धृत नहीं किया जाएगा। कभी कोई पक्षकार अवइसका हवाला नहीं दे सकेगा। 15

जून को तीनों आरोपियों को जमानत देने के फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यूएपीए, नागरिकता संशोधन कानून, विरोध प्रदर्शन पर पुलिस प्रशासन के रुख पर काफी तीखी टिप्पणियां की थी। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि सरकार विरोध प्रदर्शन दबाने की चिंता में प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधियों में फर्क नहीं कर पा रही है। इससे विरोध प्रदर्शन और आतंकवादी गतिविधियों की रेखा धुंधली हो रही है। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि हिंसा नियंत्रित हो गई थी और इस मामले में यूपीए लागू ही नहीं होगा।

वास्तव में दिल्ली दंगे और यूएपीए को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय की यह असाधारण प्रतिक्रिया है। दिल्ली पुलिस की याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि यह मामला महत्वपूर्ण है और इसके देशव्यापी परिणाम हो सकते हैं। जिस तरह कानून की व्याख्या की गई है संभवत: उस पर शीर्ष न्यायालय की व्याख्या की जरूरत होगी। शीर्ष न्यायालय ने यह भी कहा है कि नोटिस जारी किया जा रहा है और दूसरे पक्ष को भी सुना जाएगा। यह स्वाभाविक है, क्योंकि न्यायालय कभी भी एक पक्ष को सुनकर कोई फैसला नहीं दे सकता। इसलिए शीर्ष न्यायालय द्वारा तीनों आरोपियों को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगना न्यायिक प्रक्रिया का स्वाभाविक अंग है। तो जुलाई के तीसरे सप्ताह में होने वाली सुनवाई पर पूरे देश की नजर होगी।

वास्तव में अगर जमानत पर दिए गए उच्च न्यायालय के फैसले को पढें तो ऐसा लगता है जैसे उसने  यूएपीए कानून के तहत विहित प्रक्रिया को काफी हद तक पलटि है। जमानत के लिये दायर याचिका में आरोपियों पर लगे आरोपों पर बात करने के साथ उसने संपूर्ण कानून पर टिप्पणी कर दी है। जिस तरह की टिप्पणियां है उससे लगता है जैसे न्यायालय तीनों आरोपियों को भी दोषी नहीं मानती। जैसा हम जानते हैं शाहीनबाग में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक मुख्य मार्ग को घेर कर दिए गए धरने का दिल्ली में विस्तार करने के लिए प्रकट आक्रामकता फरवरी में दंगों में परिणत हो गया। इसमें 53 लोग मारे गए जिसमें पुलिसकर्मी भी थे और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए। यह हिंसा उस समय हुई थी जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आए थे। साफ है कि हिंसा के पीछे सुनियोजित साजिश थी ताकि नागरिकता संशोधन कानून के आधार पर सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा सुननी पड़े। आरोपी वास्तविक दोषी हैं या नहीं इस पर अंतिम फैसला न्यायालय करेगा। नागरिकता संशोधन कानून को हालांकि देश के बहुमत का समर्थन प्राप्त था और है लेकिन एक वर्ग उसका विरोधी भी था और आज भी है। किसी लोकतांत्रिक समाज का यह स्वाभाविक लक्षण है। किंतु इसका अभिप्राय नहीं कि हम किसी कानून का विरोध करते हैं तो हमें सड़क घेरने, आगजनी करने, निजी-सार्वजनिक संपत्तियों को किसी तरह का नुकसान पहुंचाने, पुलिस पर हमला करने और इसके लिए अलग-अलग तरीकों से लोगों को भड़काने का भी अधिकार मिल जाता है। यह सब भयानक अपराध के दायरे में आते हैं। दंगों के दौरान लोगों ने देखा कि किस तरह योजनाबद्ध तरीके से कई प्रकार के बम बनाए गए थे, अवैध हथियारों का उपयोग हुआ था, सरकारी निजी संपत्ति संपत्तियां जलाई गई थीं, निर्मम तरीके से हत्यायें हुईं थीं। जाहिर है, इसके साजिशकर्ताओं को कानून के कटघरे में खड़ा कर उनको सजा दिलवाना पुलिस का दायित्व है।

उच्च न्यायालय के सामने नागरिकता संशोधन कानून की व्याख्या का प्रश्न नहीं था। बावजूद उसने लिखा है कि प्रदर्शन के पीछे यह विश्वास था कि नागरिकता संशोधन कानून एक समुदाय के खिलाफ है। जब भी कोई व्यक्ति या समूह आतंकवादी हमला करता है या कोई बड़े नेता की हत्या करता है तो उसका तर्क इसी तरह का होता है कि उन्होंने एक समुदाय, एक समाज, एक व्यक्ति के साथ नाइंसाफी की। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी के हत्यारों का तर्क भी तो यही था।  न्यायालय पता नहीं क्यों इस मूल बात पर विचार नहीं कर पाया कि प्रदर्शन के अधिकार में  सड़कों को घेरने, पुलिस से मुठभेड़ करने, हिंसा द्वारा मेट्रो रोकने से लेकर लोगों को मारने और बम फेंकने का अधिकार शामिल नहीं होता। यह तर्क भी आसानी से गले नहीं उतरता कि अगर हिंसा नियंत्रित हो गई तो यूएपीए लागू ही नहीं होगा। अगर हिंसा की साजिश बड़ी हो और उसे पुलिस और खुफिया एजेंसियां विफल कर दें तो क्या उनके साजिशकर्ताओं पर कानून लागू नहीं होता? व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह ने विस्फोट के लिए जगह-जगह बम लगा दिए और पुलिस ने उसे पकड़कर निष्क्रिय कर दिया तो क्या इससे अपराध की तीव्रता कम हो जाएगी?

निश्चय ही उच्चतम न्यायालय का अंतिम फैसला आने के पूर्व हम कोई निष्कर्ष नहीं दे सकते। न्यायिक मामलों में पूर्व आकलन की गुंजाइश नहीं होती। बावजूद कुछ संकेत मिलता है। वस्तुतः उच्च न्यायालय का भी अपना सम्मान है। उच्चतम न्यायालय उसके फैसले पर नकारात्मक टिप्पणी करने या माननीय न्यायाधीशों के बारे में ऐसी कोई टिप्पणी करने से प्रायः बचता है जिससे   उनके सम्मान को किसी तरह धक्का पहुंचे। हमने देखा है कि उच्च न्यायालय के फैसलों को रद्द करते हुए भी उच्चतम न्यायालय ज्यादातर मामलों में केवल मुकदमे के गुण-दोष तक ही अपनी टिप्पणियां सीमित रखता है। यही इस मामले में भी दिख रहा है। शाहीनबाग धरने को लेकर उस समय भी उच्चतम न्यायालय ने तीखी टिप्पणियां की थी। न्यायालय ने सड़क घेरना, आवाजाही को बंद करना आदि को अपराध करार दिया था। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया जिनमें आंदोलनकारियों के धरना प्रदर्शन के अधिकार को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि कानून और संविधान की सीमाओं के तहत ऐसा किया जाए तथा सड़कों पर चलने वालों या उनके आसपास के दुकानदारों के अधिकार का भी ध्यान रखा जाए। न्यायालय ने यहां तक कहा है कि अगर वे सड़कों, गलियों या ऐसे सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा करते हैं तो पुलिस को उसे खाली कराने का अधिकार हासिल हो जाता है। उच्च न्यायालय ने इस बारे में कुछ नहीं कहा है। निश्चित रूप से आगे की सुनवाई में यह विषय भी सामने आएगा। सांप्रदायिक और कुत्सित वैचारिक सोच के आधार पर सुनियोजित हिंसा, आतंकवाद आदि भारत नहीं संपूर्ण विश्व की समस्या है। ऐसे मामलों के आरोपियों पर विचार करते समय न्यायालय सामान्यतः अतीत, वर्तमान और भविष्य के संपूर्ण  परिप्रेक्ष्य का ध्यान रखता रहा है। पिछले दो दशकों में हुई ऐसी हिंसा के मामलों में आए फैसलों और टिप्पणियां इसके प्रमाण हैं। उच्चतम न्यायालय द्वारा  अंतिम मंतव्य देने से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी तथा सांप्रदायिकता हिंसा, आतंकवाद आदि फैलाने के साजिशकर्ताओं से कानूनी स्तर पर मुकाबला करने वाली एजेंसियों के सामने भी स्पष्ट तस्वीर होगी।

अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली :110092, मोबाइल :9811027208

रविवार, 27 जून 2021

बुलंद मस्जिद कालोनी के अधूरे पड़े विकास कार्य जल्द होंगे पूरे, सीसीटीवी कैमरों व वाईफाई से लैस होगी पूरी कालोनी : अनिल वाजपेयी

मो. रियाज़

नई दिल्ली। गांधी नगर विधानसभा के विधायक अनिल वाजपेयी ने आज बुलंद मस्जिद कालोनी में समाजसेवी इरशाद के कार्यालय का उद्घाटन किया। इस मौके पर विधायक अनिल बाजपेयी का इरशाद अहमद व आम जनता ने फूलमालाओं से जोरदार स्वागत किया।
इस उद्घाटन अवसर पर उनको कालोनी की हर एक परेशानी से अवगत करवाया गया जैसे पीने के पानी की समस्या, सफाई, नाली व सड़कों का पूरा न बना होना आदि। जिसको सुनने के बाद विधायक जी ने लोगों को आश्वासन दिया कि बुलंद मस्जिद कालोनी के अधूरे पड़े विकास कार्य जल्द पूरे होंगे, आपकी पूरी कालोनी सीसीटीवी कैमरों व वाईफाई से लैस होगी।

आपको बता दें कि बुलंद मस्जिद कालोनी का विकास कार्य काफी समय से रूका पड़ा है यह कार्य इनके पिछले कार्यकाल में ही पूरा हो जाना चाहिए था पर ठेकेदार की लापरवाही के कारण यह कार्य समय पर पूरा नहीं हो पाया। इसी बीच दिल्ली विधानसभा के चुनावों की घोषणा हो जाने के कारण ठेकेदार ने कार्य में लापरवाही बरती। चुनाव खत्म होने के बाद विधायक जी के कहने पर यह कार्य दोबारा शुरू हुआ ही था कि दिल्ली में दंगे शुरू हो गए और ठेकेदार को एक बार फिर कार्य न करने का बहाना मिल गया और रही सही कमी को कोरोना ने पूरा कर दिया। जब लोगों ने विधायक से शिकायत की तो ठेकेदार ने कोरोना के बहाना बनाया और कहा कि उसे अभी मजदूर नहीं मिल रहे हैं जैसे ही मजदूर मिलेंगे काम को शुरू करवा दिया जाएगा पर समय बीतता गया पर ठेकेदार के बहाने खत्म होने का नाम नहीं ले रहे थे जिससे परेशान होकर विधायक जी ने उसका ठेका रद्द करवा दिया।

नए ठेकेदार को ठेका मिला और काम शुरू हुआ था पर कोरोना की दूसरी लहर के कारण कार्य बीच में ही रुक गया। अब कोरोना की दूसरी लहर खत्म हो गई है और दिल्ली में काम दुबारा शुरू हो गए हैं।
इस मौके पर अनिल वाजेपयी ने सभी को बताया कि आपकी बुलंद मस्जिद कालोनी के अधूरे पड़े विकास कार्य जल्द पूरे होंगे। आपकी पूरी कालोनी भी सीसीटीवी कैमरों व वाईफाई से लैस होगी।
उन्होंने आगे कहा कि मैं हर रविवार को या हफ्ते में एक दिन जनता की समस्या सुनने के लिए इरशाद भाई के ऑफिस में आऊंगा। आपको मेरे कार्यालय में चक्कर लगाने की जरूरत नहीं है अब आपका विधायक आपके बीच आकर आपके कार्य करेगा। मैंने जनता से वादा किया था कि खुद आपके द्वार आकर आपकी समस्या का समाधान करूंगा।
उन्होंने इरशाद, डाक्टर पाशा, लियाकत खान, मोहम्मद रियाज़, शमीम टीवी वाले, नियाज अहमद उर्फ पप्पू मंसूरी, अब्दुल जब्बर, मोहम्मद सुहैल आदि का शुक्रिया अदा किया और कहा कि मैं आपके बीच हमेशा रहूंगा और आपकी परेशानी मेरी परेशानी है। आप मुझे कभी भी याद कर सकते हैं।

 


 

बुधवार, 23 जून 2021

पूर्व निगम पार्षद तुलसी गांधी ने किया वैक्सीनेशन सेंटर का दौरा

 


18+ वालों का वेक्सिनेशन शुरू होने पर किया सीएम अरविंद केजरीवाल का धन्यवाद

मो. रियाज़
नई दिल्ली। गांधी नगर विधानसभा के अंतर्गत आने वाले बुलंद मस्जिद कॉलोनी के स्कूल में बने वैक्सीनेशन सेंटर पर अब 18 साल से ऊपर के लोगों को भी कोरोना वैक्सीन लगने लगी है। 
आज पूर्व निगम पार्षद तुलसी गांधी व गांधी नगर के मनोनीत निगम पार्षद हसीबुल हसन ने अपनी टीम के साथ वैक्सीनेशन सेंटर का दौरा किया। इस दौरान पूर्व निगम पार्षद तुलसी गांधी ने वैक्सीन लगवाने आए लोगों से भी बातचीत की और अधिक से अधिक संख्या में लोगों से वैक्सीन लगवाने की अपील की। साथ ही बुलंद मस्जिद स्कूल में 18+ वालों का वेक्सिनेशन शुरू करवाने पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का धन्यवाद किया।

गांधी नगर के मनोनीत निगम पार्षद हसीबुल हसन कहा कि सीएम अरविंद केजरीवाल जी की सोच से आज हमारी दिल्ली में जहां वोट वहीं वैक्सीन योजना रंग ला रही है जिसको लेकर विपक्षी पार्टियों को इस तरह की बातें हजम नहीं हो रही हैं। 

वहीं सीएम की ओर से बुलंद मस्जिद वेक्सिनेशन सेंटर के लिए नामित इंचार्ज कमल अरोड़ा ने कहा कि सभी को वैक्सीन अवश्य लगवानी चाहिए। जिससे हम न केवल खुद सुरक्षित रह सकेंगे बल्कि अपने परिवार व देश को सुरक्षित करने में भी सहयोग कर सकेंगे।
इस मौके पर डीके गांधी उर्फ अब्दुल्ला गांधी अहमद, मो. रियाज़, सोनम वर्मा, महजबी, धंनजय जैन, दीपक हिंदुस्तानी, डा. पासा, लियाकत खान, महेश चौहान, अनीस खान, अब्दुल जब्बार आदि उपस्थित रहे।
 


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