बुधवार, 23 जून 2021
पूर्व निगम पार्षद तुलसी गांधी ने किया वैक्सीनेशन सेंटर का दौरा
शुक्रवार, 18 जून 2021
चीन ने युवाओं की घटती संख्या को रोकने के लिए तीन बच्चे की अनुमति दी
चीन द्वाराअपने दंपत्तियों को तीन बच्चे पैदा करने की अनुमति जिस ढंग से विश्व भर की मीडिया की सुर्खियां बनी वह स्वाभाविक ही है। भारत में जहां पिछले काफी समय से जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग जोर पकड़ चुकी है उसमें इस खबर ने आम लोगों को चौंकाया होगा। इस कानून की मांग करने वाले ज्यादातर लोगों का तर्क था कि चीन की एक बच्चे की नीति की तर्ज पर हमारे यहाँ भी कानून बने। इन लोगों को वर्तमान नीति जारी करते समय चीन द्वारा दिए गए अपने जनगणना के आंकड़ोंके साथ नीति बदलने के लिए बताए गए कारणों पर अवश्य गौर करना जाहिए। हालांकि जो लोग चीन और संपूर्ण दुनिया में जनसंख्या को लेकर बदलती प्रवृत्ति पर नजर रख रहे थे उनके लिए इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। एक समय जनसंख्या वृद्धि समस्या थी लेकिन आज चीन सहित विकसित दुनिया के ज्यादातर देश जनसंख्या वृद्धि की घटती दर, युवाओं की घटती तथा बुजुर्गों की बढ़ती संख्या से चिंतित हैं और अलग - अलग तरीके से जनसंख्या बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
सातवीं राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार चीन की जनसंख्या 1.41178 अरब हो गई है जो 2010की तुलना में5.8 प्रतिशत यानी7.2 करोड़ ज्यादा है। इनमें हांगकांग और मकाउ की जनसंख्या शामिल नहीं है। इसके अनुसार चीन की आबादी में 2019 की लगभग 1.4 अरब की तुलना में 0.53 प्रतिशत वृद्धि हुई है। सामान्य तौर पर देखने से 1.41 अरब की संख्या काफी बड़ी है और चीन का सबसे ज्यादा आबादी वाले देश का दर्जा कायम है, लेकिन 1950 के दशक के बाद से यह जनसंख्या वृद्धि की सबसे धीमी दर है। वहां 2020 में महिलाओं ने औसतन 1.3 बच्चों को जन्म दिया है। यही दर कायम रहा तो जनसंख्या में युवाओं की संख्या कम होगी, बुदूर्गों की बढ़ेगी तथा एक समय जनसंख्या स्थिर होकर फिर नीचे गिरने लगेगी। चीन में 60 वर्ष से ज्यादा उम्र वालों की संख्या बढ़कर 26.4 करोड़ हो गई है जो पिछले वर्ष से 18.7 प्रतिशत ज्यादा है। चीन के एनबीएस यानी नेशनल ब्यूरो औफ स्टैटिस्टिक्स ने कहा है कि जनसंख्या औसत आयु बढ़ने से दीर्घकालिक संतुलित विकास पर दबाव बढ़ेगा। इस समय चीन में कामकाजी आबादी या 16 से 59 आयुवर्ग के लोग 88 करोड़ यानी करीब 63. 3 प्रतिशत हैं। यह एक दशक पहले 70.1 प्रतिशत थी। यही नहीं 65 वर्ष या उससे ऊपर के उम्र वालों की संख्या 8.9 प्रतिशत से बढ़कर 13.5 प्रतिशत हो गई है। आबादी का यह अनुपात चीन ही नहीं किसी देश के लिए चिंता का विषय होगा। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक चीन की लगभग 44 करोड़ आबादी 60 की उम्र में होगी। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जून 2019 में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि चीन में आबादी में कमी आएगी और भारत 2027 तक दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश हो जाएगा।
चीन पहले से इसे लेकर सतर्क हो गया था और उसने 2013 में ढील दी और 2015 में एक बच्चे की नीति ही खत्म कर दी। लेकिन 2013 में इसके लिए शर्त तय कर दी गई थी। दंपति में से कोई एक अपने मां-बाप की एकमात्र संतान हो, तभी वे दूसरे बच्चे को जन्म दे सकते हैं। दूसरे बच्चे की अनुमति के लिए आवेदन करना पड़ रहा था। इसे भी खत्म किया गया लेकिन जनसंख्या बढ़ाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जनसंख्या व़द्धि को रोकने के लिए चीन ने 1979 में एक बच्चे की नीति लागू की थी। इसके तहत ज्यादातर शहरी पति-पत्नी को एक बच्चा और ज्यादातर ग्रामीण को दो बच्चे जन्म देने का अधिकार दिया गया। पहली संतान लड़की होने पर दूसरे बच्चे को जन्म देने की स्वीकृति दी गई थी। चीन का कहना है कि एक बच्चे की नीति लागू होने के बाद से वह करीब 40 करोड़ बच्चे के जन्म को रोक पाया। तो एक समय जनसंख्या नियंत्रण उसके लिए लाभकारी था, पर अब यह बड़ी समस्या बन गई है। वास्तव में ज्यादा युवाओं का मतलब काम करने के ज्यादा हाथ और ज्यादा बुजुर्ग अर्थात देश पर ज्यादा बोझ। चीन की यह चिंता स्वाभाविक है कि अगर काम करने के आयुवर्ग के लोगों की पर्याप्त सख्या नहीं रही तो फिर देश की हर स्तर पर प्रगति के सोपान से पीछे चला जाएगा।
आज बढ़ती बुजुर्गों की आबादी से अनेक देश मुक्ति चाहते हैं और इसके लिए कई तरह की नीतियां अपना रहे हैं। पूरे यूरोप में जन्मदर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। कई देशों में प्रति महिला जन्मदर उस सामान्य 2.1 प्रतिशत से काफी नीचे आ गई है जो मौजूदा जनसंख्या को ही बनाए रखने के लिए जरूरी है। उदाहरण के लिए डेनमार्क में जन्म दर 1.7 पर पहुंच गई है और वहां इसे बढ़ाने के लिए कुछ सालों से विभिन्न अभियान चल रहे हैं। दंपतियों की छुट्टी के दिन बड़ी संख्या में गर्भधारण के मामलों को देखते हुए सरकार ने विज्ञापन अभियान के जरिए पति-पत्नी को एक दिन की छुट्टी लेने को भी प्रोत्साहित किया। विज्ञापन कंपनियां दंपतियों को ज्यादा से ज्यादा सेक्स के लिए तैयार करने के लिए विज्ञापन में भावनात्मक पहलुओं को ज्यादा उभारा जा रहा है। एक विज्ञ युवा दंपतियों के माता-पिता से बेटे-बहू और बेटी-दामाद को छुट्टी पर भेजने को कहती है। इसमें एक युवा जोड़े को सेक्स करने की कोशिश करतेभी दिखाया गया है। विज्ञापन का टैगलाइन है- डेनमार्क के लिए करो, अपनी मां के लिए करो (डू-इट-फोर डेनमार्क, डू-इट-फॉर-यूअर-मॉम)। इटली की सरकार तीसरा बच्चा पैदा करने वाले दंपती को कृषि योग्य जमीन देने की घोषणा कर चुकी है।2017 के आंकड़ों के अनुसारजापान की जनसंख्या 12.68 करोड़ थी। अनुमान है कि घटती जन्मदर के कारण 2050 तक देश की जनसंख्या 10 करोड़ से नीचे आ जाएगी। वहां ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए कई तरह के प्रोत्साहन दिए गए है।
भारत की ओर आएं तो 2011 की जनगणना के अनुसार 25 वर्ष तक की आयु वाले युवा कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत तक 35 वर्ष तक वाले 65 प्रतिशत थी। इन आंकड़ों से साबित होता है कि भारत एक युवा देश है। भारत की औसत आयु भी कई देशों से कम है। इसका सीधा अर्थ है कि दुनिया की विकसित महाशक्तियां जहां ढलान और बुजुर्गियत की ओर हैं वहीं भारत युवा हो रहा है। भारत को भविष्य की महाशक्ति मानने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का तर्क यही रहा है कि इसकी युवा आबादी 2035 तक चीन से ज्यादा रहेगी और यह विकास में उसे पीछे छोड़ देगा। लेकिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 2018 में जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2050 तक बुजुर्गों की संख्या आज की तुलना में तीन गुना अधिक हो जाएगी। उस जनगणना के अनुसार करीब दस करोड़ लोग 60वर्ष से ज्यादा उम्र के थे। हर वर्ष इसमें करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। इसके अनुसार ऐसे लोगों की संख्या वर्तमान 8.9 प्रतिशत से बढ़कर 2050 में 19.4 प्रतिशत यानी करीब 30 करोड़ हो जाएगी। उस समय तक 80 साल से अधिक उम्र के व्यक्तियों की संख्या भी 0.9 प्रतिशत से बढ़कर 2.8 प्रतिशत हो जाएगी। जाहिर है, जो प्रश्न इस समय चीन और दुनिया के अनेक देशों के सामने है वो भारत के सामने भी आने वाला है। उस दिशा में अभी से सचेत और सक्रिय होनो की आवश्यकता है। जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग करने वालों को यह पहलू अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। अगर समाज का एक तबका बच्चे पैदा करने पर नियंत्रण नहीं रख रहा है तो उसका निदान अलग तरीके से तलाशना होगा।
अवधेश कुमार, ई :30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली:110092, मोबाइल :9811027208, 8178547992
गुरुवार, 17 जून 2021
शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए ने किया गौरव सम्मान देकर सिविल डिफेंस के कोरोना योद्धाओं को सम्मानित
रविवार, 13 जून 2021
मंसूरी फैडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए मेहंदी हसन मंसूरी
शुक्रवार, 11 जून 2021
समय आ रहा है जब दुष्प्रचारों का जवाब मिलेगा
देश के परिश्रम और जिजीविषा से कोरोना का आतंकित करने वाला झंझावात फिर एक बार ढलान पर आ गया है। हममें से अनेक लोगों ने अपनों को खोया या अपने लोगों को परिजनों को खोते देखा है। ऐसी विकट परिस्थितियों में शत्रु और विरोधी ज्यादा तीखा प्रहार करते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि इस माहौल में उनकी बातों को समर्थन मिलेगा। इसमें सच और झूठ को अलग करने का सामूहिक विवेक कमजोर पड़ता है। जब कोरोना प्रकोप चरम पर था तो विदेशी मीडिया में भारत विरोधी दुष्प्रचार सहनशीलता की सीमा पार कर गया। टाइम पत्रिका ने लिखा कि पहली बार भारत में पाया गया कोरोना वायरस के बी 1.617 वैरीअंट से विश्वभर को खतरा पैदा हो गया है। यह 44 देशों में पाया जा चुका है। ब्रिटेन के चीफ मेडिकल ऑफिसर क्रिस व्हिटी का बयान था कि भारत में मिला वैरीअंट ज्यादा संक्रामक है। वैरीअंट के लगातार मिलने के बाद इस बात का खतरा ज्यादा है कि मरीजों की संख्या बढ़ सकती है।
वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की हेल्थ मैट्रिक्स इवेलुएशन इंस्टीट्यूट कह रहा थाउकि भारत में हर दिन आठ लाख व्यक्ति संक्रमित हो रहे होंगे। उनका आकलन था कि मृतकों की सही संख्या ढाई लाख नहीं (तब संख्या इतनी ही थी) साढ़े सात लाख होगी। इसके विशेषज्ञ शोधकर्ताओं ने कहा कि भारत में कोरोनावायरस के प्रकोप की सही तस्वीर का पता लगाना असंभव है। यानि भारत झूठा है। इन्होंने अगस्त तक मृतकों की संख्या 15 लाख होने का अनुमान भी जता दिया ।
आप सोचिए किस तरह संगठित तरीके से भारत की छवि तार-तार करने का अभियान चल रहा था। विश्व स्वास्थ संगठन ने सबसे पहले कहा कि नया वैरिअंट भारत में ही पाया गया और 44 देशों में पहुंचा है। विश्व स्वास्थ संगठन ने कोरोना प्रकोप के दौरान ऐसा एक कदम नहीं उठाया जिससे विश्व को इससे लड़ने में मदद मिले। उसने बार-बार केवल डर और भय पैदा किया है। कोविड-19 का जो वायरस दिसंबर 2019 में पाया गया उसका स्रोत वैज्ञानिकों के अनुसार चीन का वुहान प्रांत था। विश्व स्वास्थ संगठन चीन को कुछ कहने का साहस आज तक नहीं दिखा सका। उसने भारत में कोरोना की दूसरे लहर के बारे में भी कोई भविष्यवाणी नहीं की। हां, उसे नया वेरिएंट का स्रोत भारत में अवश्य दिख गया। अगर यह 44 देशों में पाया गया जिनमें अमेरिका के साथ यूरोप के देश भी शामिल हैं तो क्यों न माने कि वैरीअंट इन्हीं में कहीं से निकला होगा?
गहराई से देखेंगे तो आपको भारत विरोधी दुष्प्रचार का एक अंतरराष्ट्रीय पैटर्न दिखाई देगा। लांसेट जैसी विज्ञान की पत्रिका ने जिस तरह राजनीतिक लेख लिखकर वास्तविकता से दूर भारत की बिल्कुल भयावह विकृत तस्वीर पेश की और भारत सरकार को इस तरह लांछित किया मानो जानबूझकर मानवीय त्रासदी की स्थिति तैयार की गई। साफ था कि शत्रु चारों ओर सक्रिय थे। इनमें कोई रचनात्मक सुझाव नहीं, तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं। भारत के टीके को कमतर बताने का अभियान भी विश्व स्तर पर चल रहा है। कोरोना की पहली लहर में जब भारत ने अपने देश से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवाइयां विश्व भर को आपूर्ति करनी शुरू कर दी तब भी इसी तरह का दुष्प्रचार किया गया। मेडिकल भाषाओं में तथाकथित रिपोर्टो को उल्लिखित कर कहा गया कि यह कोरोना में प्रभावी ही नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस पर मुहर लगा दी। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन जैसी सस्ती दवा के समानांतर दुनिया भर की बड़ी कंपनियों ने अनेक महंगी दवाइयां, इंजेक्शन कोरोना के नाम पर बाजार में झोंकी, उन्हें प्रभावी बताया और खूब मुनाफा कमाया। बाद में साबित हुआ कि वो दवाइयां अनुपयोगी और हानिकारक थीं।
लेकिन जब अपने ही देश में दुष्प्रचार की बड़ी-बड़ी मशीनें नकारात्मक तथ्यों और आरोपों का छिड़काव कर रहीं हों तो विदेशियों का मुंह कैसे बंद किया जाएगा। वैसी विकट स्थिति में केंद्र व राज्य सरकारों, जिम्मेवार राजनीतिक दलों, विवेकशील पत्रकारों - बुद्धिजीवियों - एक्टिविस्टों के सामने एक ही रास्ता होता है, प्रत्युत्तर देने में उलझने की बजाय मिलजुल कर पहले अमानवीय और क्रूर दौर का अंत करें।
अब जब भारत ने कोरोना को नियंत्रित कर लिया है तो क्या इनका दायित्व नहीं बनता कि इसे भी स्थान दें। हालाँकि उस दौर में भी विश्व के स्तर पर ही इनको प्रत्युत्तर मिलना आरंभ हो गया था। उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ के मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स की प्रतिष्ठित वेबसाइट ईयूरिपोर्टर ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत विरोधी रिपोर्ट और लेखों का विश्लेषण कर सबको कटघरे में खड़ा किया था। इसने लिखा कि न सही तथ्य देखे गए, न तथ्यों का विश्लेषण किया गया बल्कि बड़ी दवा कंपनियों के प्रभाव में आकर भारत के बारे में नकारात्मक रिपोर्ट और लेख लिखे गए। ऐसे समय जब भारत के साथ खड़ा होना चाहिए मीडिया के इस समूह ने निहायत ही गैर जिम्मेदार भूमिका निभाई है। लांसेट की आलोचना करते हुए बताया गया कि उसकी एशिया संपादक एक चीनी मूल की महिला हैं जिन्होंने भारत विरोधी लेख लिखा था।
अमेरिका की ही जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी ने दुनिया के कई देशों के कोरोना संक्रमण और उससे होने वाली मौतों के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए कहा कि भारत कोरोना से होने वाली मौतों के मामले में अभी सबसे सुरक्षित देशों में से एक है। यूनिवर्सिटी ने भारत को फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, अमेरिका, स्वीडन, ब्रिटेन, इटली, स्पेन, ब्राजील जैसे देशों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित बताया। विश्व में सबसे बेहतर स्वास्थ ढांचा का दावा करने वाले देश अमेरिका विश्व में कोविड-19 वाली मौतों में लगमग छह लाख के साथ सबसे ऊपर है। अमेरिकी मीडिया को यह दिखाई नहीं दिया कि भारत जैसे 130 करोड़ वाले देश का आंकड़ा इससे आधा पर है?
अच्छा है कि भारत ने अपना धैर्य बनाए रखा है। भारत विरोधी दुष्प्रचार में शामिल सबको उत्तर दिया जाना चाहिए लेकिन समय पर। हमारे देश ने अपना एक स्वतंत्र टीका विकसित किया तथा एक संयुक्त स्तर पर। डीआरडीओ ने जो 2डीजी औषधि बनाई वह विश्व में अपने किस्म की अकेली कोरोना औषधि है। ये बड़ी उपलब्धियां हैं। अमेरिका में मीडिया से लेकर सरकार अपने टीके को विश्व में सबसे ज्यादा 95% प्रभावी होने का प्रचार करती है। टीका बनाने वाले दूसरे देश भी अपना प्रचार कर रहे हैं। भारत में अपने ही टीके की पहले खिल्ली उड़ाई गई, उसके बारे में नकारात्मक धारणा फैलाई गई, मीडिया में नकारात्मक बहस हुए, लेख लिखे गए। विदेश में बैठे दुष्प्रचारकों को भी भारत से ही तो आधार मिलता है। अगर राहुल गांधी के ट्वीट का स्वर यह हो कि भारत के लोगों को दूसरे देशों में घुसने नहीं देंगे तो इसे विश्व स्तर पर सुर्खियां दी जाएंगी। अभी तक किसी देश ने भारत के बारे में इस तरह की टिप्पणी नहीं की। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जब प्रतिदिन टीवी पर आकर ऑक्सीजन की कमी और उसके कारण मरीजों की मौत और अस्पतालों में व्यवस्था न होने की विकृत राजनीति करेंगे तो यह विश्व मीडिया में भी जाएगा।
झूठ की आयु ज्यादा दिन नहीं होती। भारत के लिए विकट समय था। दूसरी लहर के आकलन में चुकें हुई , पहली लहर से अनुभव लेकर जन चेतना को जागरूक करने के लिए जो होना चाहिए था नहीं हुआ, स्वास्थ्य व्यवस्था में जो सुधार चाहिए था ठीक प्रकार से नहीं किया गया, समाज के स्तर पर भी लापरवाही ज्यादा बरती गई, कुछ नेताओं ने भी कोरोना कहां है… टीके नहीं लगाएंगे जैसे बयानों से गलतफहमी पैदा की। भारत ने इन सबका घातक दुष्परिणाम झेला है।जब झंझावात पूरी तरह थमेगा शोधकर्ता, विश्लेषक अनेक बातों को फिर से समझने की कोशिश करेंगे। विश्व स्तर पर दुष्प्रचार को तो उत्तर मिलेगा, यह भी देखा जाएगा कि कोरोना से घोषित मौतों में केवल कोरोना के कारण कितनी मौतें हुईं क्योंकि कोरोना से हुई मौतों में बड़ी संख्या उनकी है जिनको कई प्रकार की गंभीर बीमारियां थी और उसी में वे संक्रमित भी हुए। दूसरे, निजी अस्पतालों ने मौत के आंकड़े बढ़ाने और तस्वीर को भयावह करने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई? सच्चाई आज न कल उनसे पूछी जाएगी और छानबीन भी होगी। पूछा जाएगा कि आपने अपने महंगे आईसीयू के लिए औक्सीजन की व्यवस्था क्यों नहीं रखी?
अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली :110092,मोबाइल :9811027208, 8178547992
http://nilimapalm.blogspot.com/
musarrat-times.blogspot.com














