रविवार, 6 जून 2021

शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए ने किया गौरव सम्मान देकर कोरोना योद्धाओं को सम्मानित

मो. रियाज़
नई दिल्ली। कोरोना वायरस के वैश्विक संकट-काल में समाज और देश को बचाने के लिए समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों, सफाईकर्मियों, दिल्ली सिविल डिफेंस के वालंटियर्स, बिजली विभाग के कर्मचारियों, समाजसेवियों आदि की सेवा-निष्ठा के लिए शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान देकर सम्मानित कर रही है।

यह संस्था अब तक कोरोना महामारी के दौरान अलग-अलग क्षेत्र में अपनी सेवा दे रहे 200 कोरोना योद्धाओं को सम्मान पत्र देकर सम्मानित कर चुकी। आज भी अपने कार्यालय पर शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन, समाजसेवी नियाज़ अहमद उर्फ पप्पू मंसूरी, नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के उपाध्यक्ष मोहम्मद रियाज़, नफीस चौधरी, आशीष तिवारी, दिल्ली सिविल डिफेंस के डिवीजन वार्डन आर.बी. यादव ने 100 से अधिक कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया। इस सम्मान को पाने वाले दिल्ली पुलिस के जवान, दिल्ली सिविल डिफेंस के वालिंटियर, दिल्ली होम गार्ड के वॉलिंटियर, क्षेत्रीय डॉक्टर, मीडिया कर्मी, बिजली विभाग के कर्मचारी, समाजसेवी संस्थाओं के सदस्य व पदाधिकारी, सोशल वर्कर आदि थे।

विदित हो दिल्ली, कोरोना के खिलाफ अपनी सबसे मुश्किल जंग कोरोना योद्धाओं के मजबूत इरादे की वजह से ही लड़ रही है। दिल्ली के हीरो अपने परिवार की चिंता ना करते हुए दिन-रात बस दिल्ली को सुरक्षित बनाने में जुटे हुए हैं। लेकिन कोरोना वायरस महामारी के संकटकाल में कोरोना योद्धाओं को भी कोरोना के संक्रमण का शिकार होना पड़ा है फिर भी कोरोना इनके हौसलों को पस्त नहीं कर पाया है। अपने योद्धाओं का जोश, जुनून और लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी के समर्पण का तहे दिल से शुक्रिया और सम्मान देने के लिए ही शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देने की शुरुआत की।

इस मौके पर शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन ने कहा कि हमने सिर्फ एक शुरुआत की है ताकि कोरोना योद्धाओं को एक छोटा सा सम्मान दे सकें जिससे यह योद्धा इस कोरोना महामारी की लड़ाई में अपने आप को अकेला न महसूस करें। यह सम्मान उन्हें नई ऊर्जा देगा।

हमारी आरडब्ल्यूए आगे भी ऐसे कोरोना योद्धाओं को सम्मानित करती रहेगी जिन्होंने इस वैश्विक संकट-काल में समाज और देश को बचाने के लिए अपने जीवन की भी परवाह नहीं की और लोगों की सेवा की।

हमें जैसे-जैसे कोरोना वायरस महामारी के संकटकाल में सेवा करने वाले कोरोना योद्धाओं का पता चल रहा है। वैसे-वैसे हम उन्हें संस्था की ओर से सम्मान पत्र देकर सम्मानित कर रहे हैं जिससे उनके हौंसलों में कोई कमी न आ सके। 

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के उपाध्यक्ष मोहम्मद रियाज़ ने कहा कि

कोरोना काल में लोग रिश्तों को भी भूल गए थे। मदद के लिए दूसरे लोगों का सहारा लेना पड़ रहा था। लेकिन ऐसी परिस्थिति में जब अपनों से साथ छोड़ा तो कारोना योद्धा मदद के लिए आगे आए। आज अगर कोरोना से राहत मिली है तो उसमें सरकार के साथ-साथ कोरोना योद्धाओं का काफी सहयोग रहा है। इनलोगों ने अपने जान की परवाह नहीं करते हुए अपनी जिम्मेदारी निभाई। यह इनके जज्बे को दिखाता है। इनका हर सम्मान इनके लिए कम है। जहां हमलोग घर में बैठे थे वहीं स्वास्थ्य विभाग, पुलिस, मीडिया व कुछ स्वयंसेवी संगठनों के लोग अपने कर्तव्य को निभा रहे थे।

दिल्ली सिविल डिफेंस के डिवीजन वार्डन आर.बी. यादव ने कहा कि यह सम्मान सिविल डिफेंस के वालिंटियर को एक नई ऊर्जा देगा और वह और अच्छा करने की कोशिश करेंगे। यह कुछ लोगों के लिए कागज का एक टुकड़ा हो सकता है पर यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा सम्मान है। मैं व मेरी पूरी टीम शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए का धन्यवाद करती है जिन्होंने हमें सम्मान देकर एक नई ऊर्जा दी है।







 
 
 

गुरुवार, 3 जून 2021

धैर्य रखें, समय पर मिलेगा जवाब

अवधेश कुमार

मैं या आप अकेले नहीं है जिन्होंने कोरोना के झंझावात में अपने या अपनों के अपने को खोया है। पता नहीं कितने लोग संवेदना पर बड़े पत्थर डालकर शांत दिखने की कोशिश कर रहे हैं। जब चारों ओर हाहाकार और मातम का माहौल हो तो विरोधी और शत्रु हर तरह से प्रहार करने की कोशिश करते हैं। विदेशी मीडिया में भारत विरोधी दुष्प्रचारचरम पर है। टाइम पत्रिका ने लिखा कि पहली बार भारत में पाया गया कोरोना वायरस के बी 1.617 वैरीअंट से विश्वभर को खतरा पैदा हो गया है। यह 44 देशों में पाया जा चुका है। ब्रिटेन के चीफ मेडिकल ऑफिसर क्रिस व्हिटी का बयान है कि भारत में मिला वैरीअंट ज्यादा संक्रामक है। वैरीअंट के लगातार मिलने के बाद इस बात का खतरा ज्यादा है कि मरीजों की संख्या बढ़ सकती है। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की हेल्थ मैट्रिक्स इवेलुएशन इंस्टीट्यूट कह रहा है कि भारत में हर दिन आठ लाख व्यक्ति संक्रमित हो रहे होंगे। उनका आकलन है कि मृतकों की सही संख्या ढाई लाख नहीं (तब संख्या इतनी ही थी) साढ़े सात लाख होगी। इसके विशेषज्ञ शोधकर्ताओं ने कहा है कि भारत में कोरोनावायरस के प्रकोप की सही तस्वीर का पता लगाना असंभव है। यानि भारत झूठा है। इन्होंने अगस्त तक मृतकों की संख्या 15 लाख होने का अनुमान भी जता दिया है ।

विश्व स्वास्थ संगठन या डब्लूएचओ ने सबसे पहले कह दिया कि यह वैरिएंट भारत में ही पाया गया और 44 देशों में पहुंचा है। हालांकि भारत के कड़े रूख के बाद डब्लूएचओ ने सारे वैरिएंट का अलग नामकरण कर दिया है, पर उसके कारण ही कई ओर से इसे इंडियन वैरिएंट कहा जाने लगा था। विडंबना देखिए, विश्व स्वास्थ संगठन ने कोरोना प्रकोप के दौरान ऐसा एक कदम नहीं उठाया जिससे विश्व को इससे लड़ने में मदद मिले। उसने बार-बार केवल डर और भय पैदा किया है। कोविड-19 का जो वायरस दिसंबर 2019 में पाया गया उसका स्रोत वैज्ञानिकों के अनुसार चीन का वुहान प्रांत था। विश्व स्वास्थ संगठन चीन को कुछ कहने का साहस आज तक नहीं दिखा सका। उसने भारत में कोरोना की दूसरे लहर के बारे में भी कोई भविष्यवाणी नहीं की। अगर यह 44 देशों में पाया गया है जिनमें अमेरिका के साथ यूरोप के देश भी शामिल हैं तो क्यों न माने कि वैरीअंट इन्हीं में कहीं से निकला होगा?

 गहराई से देखेंगे तो आपको भारत विरोधी दुष्प्रचार का एक अंतरराष्ट्रीय पैटर्न दिखाई देगा। लांसेट जैसी विज्ञान की पत्रिका अगर राजनीतिक लेख लिखकर वास्तविकता से दूर भारत की बिल्कुल भयावह विकृत तस्वीर पेश करें और भारत सरकार को इस तरह लांछित करे मानो जानबूझकर मानवीय त्रासदी की स्थिति तैयार की गई तो मान लेना चाहिए कि शत्रु चारों ओर सक्रिय हैं। इनमें कोई रचनात्मक सुझाव नहीं, तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं। भारत के टीके को कमतर बताने का अभियान भी विश्व स्तर पर चल रहा है। कोरोना की पहली लहर में जब भारत ने अपने देश से हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन दवाइयां विश्व भर को आपूर्ति करनी शुरू कर दी तब भी इसी तरह का दुष्प्रचार किया गया। मेडिकल भाषाओं में तथाकथित रिपोर्टो को उल्लिखित कर कहा गया कि यह कोरोना में प्रभावी ही नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस पर मुहर लगा दी। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन जैसी सस्ती दवा के समानांतर दुनिया भर की बड़ी कंपनियों ने अनेक महंगी दवाइयां, इंजेक्शन कोरोना के नाम पर बाजार में झोंकी, उन्हें प्रभावी बताया और खूब मुनाफा कमाया। अभी तक यह जारी है। जब अपने ही देश में दुष्प्रचार की बड़ी-बड़ी मशीनें नकारात्मक तथ्यों और आरोपों का छिड़काव कर रहीं हैं तो फिर विदेशियों का मुंह कैसे बंद किया जाएगा।

जो विकट स्थिति है उसमें केंद्र व राज्य सरकारों, जिम्मेवार राजनीतिक दलों, विवेकशील पत्रकारों - बुद्धिजीवियों - एक्टिविस्टों के सामने एक ही चारा है, मिलजुल कर इस अमानवीय और क्रूर दौर का अंत करें । हम इन सबका प्रत्युत्तर देने में उलझ गए तो कोरोना से संघर्ष का प्राथमिक कार्य प्रभावित होगा। वैसे विश्व के स्तर पर ही इनको प्रत्युत्तर मिलना आरंभ हो गया है। उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ के मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स की प्रतिष्ठित वेबसाइट ईयूरिपोर्टर ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत विरोधी रिपोर्ट और लेखों का विश्लेषण कर सबको कटघरे में खड़ा किया है। इसने लिखा है कि न सही तथ्य देखे गए, न तथ्यों का विश्लेषण किया गया बल्कि बड़ी दवा कंपनियों के प्रभाव में आकर भारत के बारे में नकारात्मक रिपोर्ट और लेख लिखे गए। ऐसे समय जब भारत के साथ खड़ा होना चाहिए मीडिया के इस समूह ने निहायत ही गैर जिम्मेदार भूमिका निभाई है। लांसेट की आलोचना करते हुए बताया गया है कि उसकी एशिया संपादक एक चीनी मूल की महिला हैं जिन्होंने भारत विरोधी लेख लिखा था। अमेरिका की ही जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी ने दुनिया के कई देशों के कोरोना संक्रमण और उससे होने वाली मौतों के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए कहा है कि भारत कोरोना से होने वाली मौतों के मामले में अभी सबसे सुरक्षित देशों में से एक है। यूनिवर्सिटी ने भारत को फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, अमेरिका, स्वीडन, ब्रिटेन, इटली, स्पेन, ब्राजील जैसे देशों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित बताया है। विश्व में सबसे बेहतर स्वास्थ ढांचा का दावा करने वाले देश अमेरिका विश्व में कोविड-19 वाली मौतों में लगमग छह लाख के साथ सबसे ऊपर है।

 कहने का तात्पर्य  कि हमें धैर्य रखना चाहिए। भारत विरोधी दुष्प्रचार में शामिल सबको समय पर उत्तर मिलेगा। हमारे देश ने अपना एक स्वतंत्र टीका विकसित किया तथा एक संयुक्त स्तर पर। डीआरडीओ ने जो 2डीजी औषधि बनाई वह विश्व में अपने किस्म की अकेली कोरोना औषधि है। ये बड़ी उपलब्धियां हैं। अमेरिका में मीडिया से लेकर सरकार अपने टीके को विश्व में सबसे ज्यादा 95% प्रभावी होने का प्रचार करती है। टीका बनाने वाले दूसरे देश भी अपना प्रचार कर रहे हैं। भारत में अपने ही टीके की पहले खिल्ली उड़ाई गई, उसके बारे में नकारात्मक धारणा फैलाई गई, मीडिया में नकारात्मक बहस हुए, लेख लिखे गए। विदेश में बैठे दुष्प्रचारकों को भी भारत से ही तो आधार मिलता है। अगर राहुल गांधी के ट्वीट का स्वर यह हो कि भारत के लोगों को दूसरे देशों में घुसने नहीं देंगे तो इसे विश्व स्तर पर सुर्खियां दी जाएंगी। अभी तक किसी देश ने भारत के बारे में इस तरह की टिप्पणी नहीं की। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जब प्रतिदिन टीवी पर आकर ऑक्सीजन की कमी और उसके कारण मरीजों की मौत और अस्पतालों में व्यवस्था न होने की विकृत राजनीति करेंगे तो यह विश्व मीडिया में भी जाएगा।

लेकिन झूठ की आयु ज्यादा दिन नहीं होती। हमारे लिए विकट समय है। दूसरी लहर के आकलन में चुकें हुई हैं, पहली लहर से अनुभव लेकर जन चेतना को जागरूक करने के लिए जो होना चाहिए था नहीं हुआ, स्वास्थ्य व्यवस्था में जो सुधार चाहिए था ठीक प्रकार से नहीं किया गया, समाज के स्तर पर भी लापरवाही ज्यादा बरती गई, कुछ नेताओं ने भी कोरोना कहां है… टीके  नहीं लगाएंगे जैसे बयानों से गलतफहमी पैदा की। हम इन सबका घातक दुष्परिण झेल रहे हैं। पर जब झंझावात थमेगा शोधकर्ता, विश्लेषक अभी कही गई अनेक बातों को फिर से समझने की कोशिश करेंगे। यह देखा जाएगा कि कोरोना से घोषित मौतों में केवल कोरोना के कारण कितनी मौतें हुईं क्योंकि कोरोना से हुई मौतों में बड़ी संख्या उनकी है जिनको कई प्रकार की गंभीर बीमारियां थी और उसी में वे संक्रमित भी हुए। दूसरे,  निजी अस्पतालों ने मौत के आंकड़े बढ़ाने और तस्वीर को भयावह करने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई? सच्चाई आज न कल उनसे पूछी जाएगी और छानबीन भी होगी। पूछा जाएगा कि आपने अपने महंगे आईसीयू के लिए औक्सीजन की व्यवस्था क्यों नहीं रखी? विश्व स्तर पर दुष्प्रचार को तो खैर उत्तर मिलेगा ही। वैसे वर्तमान भीषण चक्रवात को सही तरीके से नियंत्रित करना तथा उसकी पुनरावृत्ति न होने का ठोस पूर्वोपाय ही सबसे बड़ा जवाब होगा। हम सबने अपने दिल के अंदर जगह बनाए किसी न किसी को खोया है और इसका गम और क्षोभ हमारे अंदर है किंतु ऐसे दुष्प्रचारों का सहभागी होना जो चले गए उनके और देश के प्रति भी अपराध होगा।

अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली :110092,मोबाइल :9811027208, 8178547992

गुरुवार, 27 मई 2021

अभूतपूर्व वैश्विक सहायता भारत के वैश्विक साख और सम्मान का प्रमाण

अवधेश कुमार

जिस तरह विश्व समुदाय ने भारत के लिए खुले दिल से सहयोग और सहायता का हाथ बढ़ाया है वह अभूतपूर्व है। आपदाओं में वैश्विक सहायता पर काम करने वालों का मानना है कि इस तरह का सहयोग पहले किसी एक देश को नहीं मिला था। भारत तक जल्दी आवश्यक सहायता सामग्रियां पहुंचे इसके लिए सैन्य संसाधनों तक का इस्तेमाल किया जा रहा है। अभी तक40से ज्यादा देशों से सहायता सामग्रियां भारत पहुंच चुकीं हैं। हम अपने देश की सरकार और उसकी नीतियों की जितनी आलोचना करें इस प्रश्न का उत्तर देना ही होगा कि इतने सारे देश इस तरह अभूतपूर्व तरीके से भारत के साथ क्यों खड़े हुए हैं?ध्यान रखिए, भारत ने किसी देश से सहायता मांगी नहीं है।  सभी देश और संस्थाएं अपनी ओर से ऐसा कर रहीं हैं। इसका अर्थ निष्पक्षता से ढूंढिए तो यही कहा जाएगा कि भारत की वैश्विक छवि और इसका प्रभाव विश्व समुदाय पर कायम है।

जो सामग्रियां आ रहीं हैं उनमें स्वाभाविक ही ऑक्सीजन उत्पादक संयंत्र,ऑक्सीजन सांद्रक, छोटे और बड़े ऑक्सीजन सिलेंडर, टेस्ट किटों के अलावा कोरोना मरीजों के लिए आवश्यक औषधियों में रेमडेसिविर,टोसिलिज़ुमैब, फेवीपिरवीर,कोरोनावीर आदि हैं। अमेरिका से सबसे ज्यादा सामग्रियां आईं हैं। ह्वाइट हाउस प्रवक्ता का बयान है कि हम दिन रात काम कर रहे हैं जिससे भारत को आवश्यक सामग्रियां मिलती रहे. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा है कि हम एक मित्र और भागीदार के रूप में भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भारत के लिए एक फेसबुक पोस्ट लिखा। इसमें उन्होंने भारत भेजे जाने वाली सामग्रियों का जिक्र करते हुए भारत के साथ खड़े होने की प्रतिबद्धता जताई। हम जानते हैं कि भारत एक मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। फ्रांस और भारत हमेशा एकजुट रहे हैं। ऐसे ही बयान कई देशों की ओर से आए हैं। भारत में रूस के राजदूत निकोले कुदाशेव के अनुसार रूस से दो तत्काल उड़ानें भारत में20टन के भार का मेडिकल कार्गो लेकर आ चुकी हैं। स्वयं महामारी से जूझने वाले स्पेन ने भीसामग्रियां भेजीं हैं। 

सच कहें तो भारत को मदद देने की वैश्विक मुहिम व्यापक हो चुकी है। किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि भारत के लिए विश्व समुदाय इस तरह दिल खोलकर साथ देने आएगा। इसके उदाहरण कम ही होंगे जब सहायता के लिए एक देश दूसरे देश को आवश्यक सहयोग कर रहे हैं जिससे आसानी से सामग्रियां पहुंच सके। उदाहरण के लिए फ्रांस ने खाड़ी स्थित अपने देश की एक गैस निर्माता कंपनी से दो क्रायोजेनिक टैंकर भारत को पहुंचाने की इच्छा जताई तो कतर ने उसे तत्काल स्वीकृति दी। इजरायल के नई दिल्ली स्थित राजदूत रॉन मलका ने कहा कि भारत के साथ अपने संबंधों को देखते हुए उनकी सरकार ने एक टास्क फोर्स गठित किया है ताकि भारत को तेजी से मदद पहुंचाई जा सके। इजरायल की कई निजी कंपनियां, एनजीओ और वहां की आम जनता भारत को मदद देने लिए आगे आई हैं। इसे लिखे जाने तक इजरायल की मदद का चौथा जहाज भारत पहुंच चुका था।   केवल देश औरसंस्थाएं ही भारत की सहायता नहीं कर रहीं, अनेक देशों के नागरिक तथा विश्व भर के भारतवंशी भी इस समय हरसंभव योगदान करने के लिए आगे आ रहे हैं। जापान, इजरायल के स्थानीय नागरिक सामग्रियां भेज रहे हैं। कई यूरोपीय देशों में स्थानीय एनजीओ की कोशिशों से काफी बड़े पैमाने पर चिकित्सा सामग्रियां जुटाई जा रही है, जो भारत पहुंचने लगी हैं। विदेशी नागरिक अपने पैसे से आक्सीजन कंसंट्रेटर्स खरीद कर भारतीय मिशनों को भेज रहे हैं। सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर जैसे खाड़ी के क्षेत्र में रहने वाले प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी गई सामग्रियां पहुंच रहीं हैं। कई देशों में भारतीय मूल के डॉक्टरों ने भी आनलाइन मेडिकल परामर्श मुफ्त में देने का अभियान चलाया हुआ है। सिंगापुर में रहने वाले भारतीयों ने वहां की सरकार के माध्यम से बड़ी खेप भारत भेजी है। 

लेकिन इसके समानांतर देसी-विदेशी मीडिया का एक धड़ा, एनजीओ आदि अपने व्यापक संपर्कों का प्रयोग कर कई प्रकार का दुष्प्रचार कर रहे हैं। मसलन, विदेशी सहायता सामग्रियां तो वहां जरुरतमंदों तक पहुंच ही नहीं रही.... सामग्रियां कहां जा रहीं हैं किसी को नहीं पता......आने वाली सामग्रियां तो सप्ताह-सप्ताह भर हवाई अड्डों पर ही पड़ी रहती हैं आदि आदि। आपको सैंकड़ों बयान मिल जाएंगे जिससे आपके अंदर यह तस्वीर बनेगी कि कोहराम से परेशान होते हुए भी भारत सरकार इतनी गैर जिम्मेवार है कि वह इनका वितरण तक नहीं कर रही या गोपनीय तरीके से इनका दुरुपयोग कर रही है।  अमेरिकी विदेश मंत्रालय की एक ब्रीफ़िंग में भी यह मुद्दा उठाया गया। एक पत्रकार ने पूछा कि भारत को भेजे जा रहे अमेरिकी करदाताओं के पैसे की जवाबदेही कौन लेगा? क्या अमेरिकी सरकार यह पता कर रही है कि भारत को भेजी जा रही मेडिकल मदद कहाँ जा रही है? यह बात अलग है कि उन्हें टका सा उत्तर मिला। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि हम आपको यक़ीन दिलाना चाहते हैं कि अमेरिका इस संकट के दौरान अपने साझेदार भारत का ख्याल रहने के लिए प्रतिबद्ध है। बीबीसी के एक संवाददाता ने इस मुद्दे पर ब्रिटेन के फ़ॉरेन कॉमनवेल्थ एंड डेवलपमेंट ऑफ़िस एफसीडीओ तक से बात की। उसने पूछा कि क्या उसके पास इस बात की कोई जानकारी है कि ब्रिटेन की ओर से भेजे गए वेंटिलेंटर्स समेत तमाम मेडिकल मदद भारत में कहाँ बाँटी गई? यहां भी उत्तर उसी तरह।  फ़ॉरन कॉमनवेल्थ एंड डेवलपमेंट ऑफिस ने कहा कि भारत को भेजे जा रहे मेडिकल उपकरणों को यथासंभव कारगर तरीक़े से पहुँचाने के लिए ब्रिटेन इंडियन रेड क्रॉस और भारत सरकार के साथ काम करता आ रहा है। यह भारत सरकार तय करेगी कि ब्रिटेन की ओर से दी जा रही मेडिकल मदद कहाँ भेजी जाएगी और इसे बाँटे जाने की प्रक्रिया क्या होगी। ये दो उदाहरण यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि एक ओर महाअपादा से जूझते देश में जिससे जितना बन पड़ रहा है कर रहा है और दूसरी ओर किस तरह का माहौल भारत के खिलाफ बनाने के कुत्सित प्रयास हो रहे हैं। केंद्र सरकार को इस कारण सफाई देनी पड़ी। जो जानकारी है उसके अनुसार सरकार ने सामग्रियों के आने के पूर्व से ही इसकी तैयारी कर दी थी। सीमाशुल्क विभाग को त्वरित गति से क्लियरेंस देने, कार्गों से सामग्रियों को तेजी से बाहर निकालने आदि के लिए एक टीम बन गई। स्वास्थ्य मंत्रालय ने26अप्रैल से वितरण की तैयारी शुरू कर दी थी। मदद कैसे बाँटी जाए इसके लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर यानी एसओपी2मई को जारी की गई।  राहत सामग्री वाल विमान भारत पहुँचते ही इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी के हाथ आ जाता है। सीमाशुल्क विभाग से क्लियरेंस मिलन के बाद मदद की यह खेप एक दूसरी एजेंसी एचएलएल लाइफ़केयर के हवाले की जाती है। यह एजेंसी सामानों को देश भर में भेजती है। कहां कितना किस रुप में आपूर्ति करनी है इसलिए सारी सामग्रियों को खोलकर उनकी नए सिरे से गंतव्य स्थानों के लिए पैकिंग करना होता है।  सामान कई देशों से आ रहे हैं और उनकी मात्रा भी अलग.अलग हैं। वो अलग-अलग समय में अलग-अलग संख्या में आती है। कई बार तो सामग्रियां उनके साथ आई सूची से भी मेल नहीं खातीं। इन सबके होते हुए भी सामग्रियां सब जगह व्यवस्थित तरीके से पहुंच रहीं है।

 हमें दुष्प्रचारकों के आरोपों पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों और द्विपक्षीय संबंधों में जिस तरह की भूमिका निभाई है उसका विश्व समुदाय पर सकारात्मक असर है। भारत के प्रति सद्भावना और सम्मान है । आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने कहा भी कि कठिन समय में भारत ने हमारी सहायता की और अब हमारी बारी है। इजरायल के राजदूत का यही बयान है कि महामारी के आरंभ में जब हमें जरुरत थी भारत आगे आया तो इस समय हम अपने दोस्त के लिए केवल अपनी जिम्मेवारी पूरी कर रहे हैं। यह स्वीकार करने में समस्या नहीं है कि कठिन समय में हमारी अपनी हैसियत, साख, सम्मान और हमारे प्रति अंतरराष्ट्रीय सद्भावना आसानी से दिखाई दे रही है। बिना मांगे इतने सारे देशों द्वारा व्यापक पैमाने पर सहयोग तथा इसके संबंध में दिए गए बयान इस बात के प्रमाण हैं कि भारत का सम्मान और साख विश्व स्तर पर कायम है।

अवधेश कुमारए ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्सए दिल्ली 110092, मोबाइलः9811027208, 8178547992

 

 

 

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