गुरुवार, 20 मई 2021

एक व्यक्ति को खलनायक बनाने का अभियान मानवता विरोधी है

अवधेश कुमार

माना जाता है कि आपदा बड़े से बड़े निष्ठुर ह्रदय वालों के अंदर भी मानवीय संवेदना पैदा कर देती है। प्रायः संकट के समय घोर शत्रु भी द्रवित होकर मानवीय भूमिका निभाने लगते हैं। भारत में बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, नेताओं, एनजीओवादियों, एक्टिविस्टों का एक समूह ऐसा है जिनका हृदय कोरोना महाआपदा में भी नहीं पिघला। आप अगर सोशल मीडिया पर लगातार नजर रख रहे हैं तो इन सबकी गतिविधियां तीन बिंदुओं तक सीमित हैं-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सारे संकट का महाखलनायक साबित करना, स्वयं को आपदा में बिना स्वार्थ के 24 घंटे सबकी यथासंभव सहायता, सहयोग और मदद करने वाला बताना और विपक्ष की कुछ सरकारों व नेताओं का समर्थन करना। कोरोना के वर्तमान प्रकोप का सामना करने में भारत की संपूर्ण व्यवस्था कमजोर पड़ी है इस दयनीय अवस्था को कोई नकार नहीं सकता। इसमें प्रधानमंत्री सहित उनकी सरकार की जितनी जिम्मेवारी है उसकी आलोचना निश्चित रूप से होनी चाहिए। ठोस तथ्यों और तर्कों से की गई ऐसी आलोचनाएं अपना प्रभाव दिखाती हैं तथा सरकारें इसके अनुसार कदम उठाने को भी विवश होती है। किंतु आप सारी समस्याओं के लिए प्रधानमंत्री मोदी को ही दोषी साबित करेंगे तो न इससे सरकार पर कोई असर होगा न उनके समर्थक इससे प्रभावित होंगे और न ही कोई सार्थक उद्देश्य हासिल हो सकता है। वैचारिक घृणा में की गई जा रही बेसिर पैर की आलोचनाएं, निंदा आदि स्वभाविक ही जनसमूह पर प्रभाव डालने में विफल होतीं हैं।

वास्तव में संकट काल में जब एकजुट खड़ा होना चाहिए, आम जन की हौसला अफजाई करनी चाहिए, स्वयं सुरक्षित रहते हुए दूसरे को सुरक्षित करने तथा जो संक्रमण या किसी अन्य कारणों से पीड़ित हैं उनकी सहायता करने के लिए आगे आना चाहिए उस समय भी ये कुत्सित राजनीति से बाज नहीं आ रहे। जिस तरह ये लोग स्वयं को मसीहा साबित कर रहे हैं उसका सच भी वही नहीं है जो इनकी सोशल मीडिया अभिव्यक्तियों में दिखता है। उदाहरण के लिए इस अभियान की एक प्रमुख झंडाबरदार महिला सोशल मीडिया पर बता रही हैं कि उनके यहां लगातार लोगों के मैसेज, फोन आदि आ रहे हैं और वो ज्यादा से ज्यादा लोगों की मदद कर रहीं हैं। एक मित्र ने इसके परीक्षण के लिए उनको फोन किया। उनके साथ आधा घंटा से ज्यादा समय तक फोन पर बात होती रही। इस बीच कोई फोन नहीं आया न उन्होंने स्वयं कहा किमैसेज आ रहे हैं जरा एक बार देख लेती हूं, इमरजेंसी हो सकती है या ऐसा कोई संकेत उधर से नहीं आया कि वाकई वो सहायता करने में व्यस्त हैं। स्वयं के द्वारा जांचा गया यह एक उदाहरण बताने के लिए पर्याप्त है कि ये किस तरह लोगों की सहायता और सेवा का ढोंग कर रहे हैं। इस महाआपदा के काल में हजारों लोग, जिनमें पत्रकार, बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट, राजनेता, साधु-संत, मौलवी,उलेमा, पादरी, किसान, मजदूर, शिक्षक, नौकरशाह आदि सब शामिल है अनेक प्रकार से संक्रमित मरीज, उनके परिवार तथा उनसे प्रभावित होने वाले लोगों की जो भी संभव है सेवा-सहायता कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर सोशल मीडिया पर दिखावा नहीं करते। हां सोशल मीडिया का सेवा-सहायता के लिए उपयोग कर रहे हैं। अगर आप उनको फोन करेंगे तो थोड़ी देर में ही पता चल जाएगा कि वाकई उनके पास दूसरे फोन आ रहे हैं।

इनमें भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सरकार की आलोचना कर रहे हैं और यह वाजिब भी है। लेकिन वास्तविक सेवा-सहायता करने वाले अधिकतर एक ही व्यक्ति को महाखलनायक साबित करने की मानसिक व्याधि से पीड़ित नहीं हैं। मनुष्यता और इंसानियत की एकमात्र कसौटी यही है कि संकट के समय ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, दुश्मनी, वैचारिक मतभेद आदि का परित्याग कर एकजुटता के साथ काम किया जाए। देश के बड़े वर्ग ने ऐसा चरित्र पेश भी किया है। जिनको बहुत कुछ करना नहीं है और जिनका एकमात्र एजेंडा यही है कि किसी तरह नरेंद्र मोदीको बदनाम किया जाए उनके लिए इंसानियत या मनुष्यता की कसौटी के कोई मायने न पहले थे ना आज हैं ना आगे रहेंगे।  क्या इनके सोशल मीडिया दुष्प्रचार से आम जनता मान लेगी कि कोरोना क दूसरे विस्फोट के लिए मुख्य दोषी मोदी हीं हैं? क्या लोगों की समझ में यह नहीं आएगा कि स्वास्थ्य मुख्यतः राज्यों का विषय है? क्या लोगों के ध्यान में नहीं आएगा कि राज्यों में चलने वाली स्वास्थ्य सेवाएं, जिनमें सरकारी और निजी अस्पताल दोनों शामिल हैं राज्य सरकारों के नियंत्रण में? अगर यह समूह संतुलित रूप से केंद्रों के साथ राज्यों में सत्तारूढ़ संपूर्ण राजनीतिक प्रतिष्ठान की नाकामियों, उनके जनविरोधी कदमों को तथ्योें के साथ रखता तो इनका असर होता। कोरोना का वर्तमान विस्फोट कई सम्मिलित कारकों की संहारक परिणति है। इसमें प्रकृति, समय, कोरोनावायरस का चरित्र, हम सबका सामूहिक व्यवहार, कोराूना नियंत्रण करने के पहले के कदमों की आर्थिक कीमत से उत्पन्न परेशानियों का दबाव, केंद्र एवं राज्य सरकारों की लापरवाहियां तथा अनुभवों के आधार पर भविष्य के पूर्वोपाय न करने करने की विफलता जैसे कारक शामिल हैं। इस समय ऑक्सीजन एक बड़ा संकट है। क्या दिल्ली,महाराष्ट्र जैसे कोरोना से सबसे ज्यादा आघात झेलने वाले राज्य सरकारें और उनके स्वास्थ्य महकमे को इसका अनुभव नहीं हुआ था? आगे ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं हो इसके लिए क्या किया? दिल्ली को राशि भी दी गई ताकि ऑक्सीजन प्लांट विकसित हो। अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्या मोदी विरोधी समूह का यह दायित्व नहीं बनता है कि इनको भी सामने लाएं? उद्धव ठाकरे सरकार ने महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा कोरोना का दंश झेलने के बावजूद ऑक्सीजन प्लांट लगाने-लगवाने में किंचित रुचि नहीं दिखाई। क्या महाराष्ट्र में मचे वर्तमान हाहाकार के लिए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सहित उनकी सरकार और उसमें शामिल राजनीतिक दलों, स्वास्थ्य महकमे व प्रशासन को खलनायक नहीं माना जाएगा? तो यह  समूह ये बातें क्यों नहीं उठाता? प्रश्न यह भी है कि जो निजी अस्पताल ऑक्सीजन ऑक्सीजन ऑक्सीजन की रट लगाते हुए न्यायालयों का दरवाजा खटखटा रहे हैं क्या उन्होंने अपने लिए ऑक्सीजन प्लांट लगाने की कोई कोशिश की? इन सबको खलनायक की श्रेणी में क्यों न खड़ा किया जाए?

आश्चर्य देखिए कि यह समूह इन लूटेरे अस्पतालों को हीरो बना रहा है क्योंकि ये सरकार के विरुद्ध न्यायालय चले गए या बोल रहे है। कोई निजी अस्पताल अपने आईसीयू के लिए जितने बिस्तर रखता है उन सबके लिए सभी उपयुक्त संसाधन उसके पास होना चाहिए जिसमें ऑक्सीजन भी शामिल है। अगर इन्होंने नहीं किया तो ये अपराधी हैं। समूह इन आपराधिक सच्चाइयों को उजागर नहीं करता। चुनाव प्रचार के लिए क्या केवल मोदी, अमित शाह और भाजपा दोषी हैं? केरल में कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां, मुस्लिम लीग चुनाव प्रचार नहीं कर रही थी? मुख्यमंत्री पी विजयन के कोरोना संक्रमित होने के बावजूद वहां चुनाव अभियान चल रहे थे। भाजपा वहां छोटी पार्टी है इसलिए इसका चुनाव अभियान इन दलों से छोटा रहा। फिर भी आप केरल कोरोना संकट के लिए मोदी को ही दोषी साबित कर रहे हैं। तमिलनाडु में भी भाजपा छोटी पार्टी है। ऐसी कौन पार्टी है, जो मतदान होने तक वहां चुनाव प्रचार में संपूर्ण शक्ति के साथ नहीं लगी  थी? पश्चिम बंगाल में भी क्या भाजपा अकेले चुनाव प्रचार कर रही थी? ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की सभाओं में क्या लोग नहीं आ रहे थे? क्या वामपंथी पार्टियां, कांग्रेस और आईएसएफ की सभाएं बिना लोगों के हो रही थी? अगर कोरोना फैलाव में चुनावी सभाओं और रैलियों की भूमिका है तो इसके लिए सभी पार्टियां समान रूप से दोषी हैं और केरल तमिलनाडु जैसे राज्य में गैर भाजपा दल ज्यादा दोषी हैं। हालांकि यह कहना कठिन है कि उन राज्यों में चुनाव प्रचार नहीं होते तो कोरोना नहीं फैलता। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, कर्नाटक, तेलंगना आदि राज्यों में कोरोना चुनावी राज्यों से पहले और ज्यादा भयावह रूप में फैला? यह अलग से विचार का विषय है।

ये सारे ऐसे प्रश्न हैं जिनका निष्पक्ष उत्तर दिया जाना चाहिए? जब निष्पक्षता और मनुष्यता यहीं तक सीमित हो कि सारी समस्या के लिए एक व्यक्ति को खलनायक बनाकर उसकी छवि को लांछित किया जाए  जिससे उसके और पार्टी के प्रति लोगों में नाराजगी पैदा हो और वह सत्ता से बाहर हो जाए तो फिर सच के साथ खड़े नहीं हो सकते। यही यह समूह कर रहा है। इससे दुर्भाग्यपूर्ण और दिल दहलाने वाला व्यवहार कुछ नहीं हो सकता। संकट की घरी में जानी दुश्मन भी अपनी दुश्मनी को परे रखकर सेवा और सहयोग में लग जाते हैं। इस समूह के लोगों से भी इतना अनुरोध तो किया ही जाएगा कि कुछ समय के लिए इंसानियत और मानवीयता के नाते एक व्यक्ति से घृणा की मानसिकता से बाहर आएंझ यह विकट काल है जो हम सबसे एक संवेदनशील भूमिका की मांग कर रहा है। जो इससे चूक कर राजनीतिक विरोधी और घृणा अभियान में लगे रहेंगे उनके साथ भी प्रकृति और इतिहास न्याय करेगा। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208, 8178547992

शुक्रवार, 14 मई 2021

महाआपदा में निःस्वार्थ सहायता का आचरण उम्मीद पैदा करता है

अवधेश कुमार 

कोरोना महाआपदा में नकारात्मक सूचनाओं का ऐसा अंबार है कि हमारे चारों ओर घट रहीं सकारात्मक घटनायें उनमें दब गईं हैं। वास्तव में चरमराती स्वास्थ्य सेवाओं और उनसे उत्पन्न डर और हताशा के बीच ऐसे समाचार और दृश्य सामने आ रहे हैं जो फिर यह उम्मीद पैदा करते हैं कि विकट परिस्थितियों में देश के लोगों, संस्थाओं संगठनों आदि का बड़ा समूह भारी जोखिम उठाकर भी समर्पण और संकल्प के साथ सेवा भाव से काम करने को तत्पर है। कोई भी आपदा अकेले केवल सरकारों के लिए चुनौतियां खड़ी नहीं करती, समाज के लिए भी करती है। अगर समाज का बड़ा समूह इसे समझता है तो वह अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार खड़ा होता है, आगे आता है और उन चुनौतियों को दूर करने या कम करने की यथासंभव कोशिश करता है। एक संवेदनशील सतर्क और सक्रिय समाज का यही लक्षण है। तमाम हाहाकार और कोहराम के बीच हमारे सामने मने ऐसी खबरें लगातार आ रहीं है जिसमें धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, सेवा संगठन-समूह या कुछ निजी लोग भी अपने-अपने तरीकों से पीड़ित व प्रभावित लोगों की सहायता कर रहे हैं। गाजियाबाद से एक समाचार ने पूरे देश का ध्यान खींचा जहां एक गुरुद्वारे ने घोषणा की कि कोई भी मरीज अगर ऑक्सीजन के बिना छटापटा रहा है तो आप हमारे पास ले आइए, हम उनको तब तक ऑक्सीजन देते रहेंगे जब तक या तो किसरी अस्पताल में उनको जगह नहीं मिल जाती या वे इस स्थिति में नहीं आ जाते कि घर लौटक आइसोलेट होकर चिकित्सा करा सकें। लगातार कोरना पीड़ित वहां जा रहे हैं, उनको ऑक्सीजन मिल रहा है। वहां पर अस्पतालों को फोन किया जा रहा है और अनेक मरीज कुछ घंटे  ऑक्सीजन के बाद स्थिति सुधरने पर अपने घर वापस आ गए। 

ऐसे कुछ और समाचारों पर नजर डालेंगे तो इनके विस्तार और प्रभाव का अहसास हो जाएगा। जोधपुर से खबर आई कि वहां के कुछ व्यापारियों ने मिलकर ऑक्सीजन बैंक शुरू किया है। ब्लड बैंक की तर्ज पर चलने वाला यह ऑक्सीजन बैंक केवल कोरोना में ही नहीं हर विकट परिस्थिति में स्थायी रुप से अस्पतालों को, व्यक्तियों को ऑक्सीजन मुहैया कराएगा। शायद हममें से किसी को आश्चर्य हो कि दो-तीन दिनों के अंदर ही करोड़ों रुपए इसके लिए इकट्ठे हो गए और ऑक्सीजन बैंक चालू होने की स्थिति में है। हम उन औद्योगिक घरानों की चर्चा नहीं करेंगे जो भारी मात्रा में ऑक्सीजन के साथ अन्य सहायता के साथ आगे आएं हैं। हालांकि आने वाले कुछ दिनों में ऑक्सीजन की आपूर्ति मांग के अनुरूप हो जाएगी लेकिन विकट परिस्थिति में जब चारों ओर हाहाकार हो तब इस ढंग की संस्थाएं उम्मीद जगातीं है। ये दों तो केवल उदाहरण हैंए देशभर में अलग-अलग न जाने कितनी संस्थाओं, गुरुद्वारों, मंदिरों, व्यापारिक समूहों, राजनीतिक दलों तथा निजी लोगों ने अपनी ओर से ऑक्सीजन मुहैया कराना शुरु किया और जितना संभव है करा रहे हैं। हमारे देश के बुद्धिजीवियों में धार्मिक संस्थाओं की आलोचना करने का फैशन है। वे भी आगे आकर काम कर रहे हैं।  धार्मिक संस्थाओं की ओर से देश भर में कोविड केयर सेंटर बनाए गए हैं और बनाए जा रहे हैं। निरंकारी मिशन, राधास्स्वामी सत्संग, सावन कृपाल रूहानी मिशन, चिन्मय मिशन, स्वामीनारायण मंदिर, रामकृष्ण मिशन आदि तो वो नाम हैं जिनके कोविड केयर केन्द्रों के समाचार और तस्वीरें राष्ट्रीय मीडिया में स्थान पा रहीं हैं। क्षेत्रीय स्थानीय मीडिया में छोटी - बड़ी धार्मिक संस्थाओं की कोरोना मरीजों के उपचार, उनकी देखभाल तथा अन्य गतिविधियों के समाचार प्रतिदिन आ रहे हैं। सच यह है कि जिस धार्मिक संस्था की भी थोड़ी क्षमता है वो किसी न किसी रुप में सेवा कर रहा है। यहां तक कि मंदिर, मठ, गुरुद्वारे और मस्जिदों ने भी कोविड केयर के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। आरंभ में मुंबई के एक जैन मंदिर को चिकित्सा की सभी व्यवस्था के साथ कोविड केयर सेंटर में तब्दील करने की खबर आई। उसके बाद देशभर से ऐसी खबरें आने लगीं। इसी तरह पहले वडोदरा की जहांगीरपुरा मस्जिद द्वारा कोरोना मरीजों के लिए अपने परिसर में बेड का इंतजाम करने की खबर आई। उसके बाद कई जगहों से मस्जिद परिसर में कोरोना मरीजों के इलाज के इंतजाम किए जाने की सूचना आ रही है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने व्यवस्थित तरीके से सेवा अभियान चलाने के लिए सभी राज्यों के प्रभारियों की नियुक्ति कर दी। उससे जुड़े संगठन अपनी क्षमता के अनुसार कई तरीकों से काम कर रहे हैं। जगह-जगह पूरे देश में इनका कार्यक्रम चल रहा है।  कुछ संगठन से जुड़ कर कर रहे हैं तो निजी स्तर पर भी, सेवा भारती, वनवासी कल्याण केंद्र, विश्व हिंदू परिषद, मजदूर संघ, विद्यार्थी परिषद आदि के कार्यकर्ता अपने-अपने स्थानों पर छोटे-बड़े समूह बनाकर कई तरीकों से सहायता  कर रहे हैं। कोई टीकाकरण अभियान में सहयोग कर रहा है, छोटे-बड़े कोविड केयर या आइसोलेशन सेंटर बनाए गए हैं, एंबुलेंस की व्यवस्था कर रहे हैं, दवाइयां और ऑक्सीजन की उपलब्धता में भी लगे हैं.. मरीज को भर्ती करानने में सहयोग  कर रहे हैं, भोजन उपलब्ध करा रहे हैं...। इन सबके लिए नंबर भी जारी किए है।ं कई जगह हेल्प सेंटर बने हैं । कहीं-कहीं निश्चित समय पर फोन नंबर पर डॉक्टर डॉक्टर उपलब्ध कराए गए हैं जो बचाव या कोविड-19 संक्रमितों के इलाज के लिए सुझाव देते हैं।

 इसी तरह राजनीतिक दलों में भी अकेले भाजपा नहीं, कांग्रेस और दूसरे दल भी अपने-अपने क्षेत्रों में सेवा सहायता में लगे हैं। दिल्ली में ही युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने मिलकर भोजनालय शुरू किया है जिससे अस्पतालों में मरीजों के रिश्तेदारों को भोजन कराया जा रहा है।   व्हाट्सएप से लेकर सोशल मीडिया पर अनेक लोगों के नंबर आपको मिले हैं जहां फोन करने पर आपको भोजन उपलब्ध हो सकता है। कोरोना आपदा के समय खासकर लॉकडाउन में केवल अस्पतालों और मरीज वाले परिवारों में ही नहीं, अनेक घरों में भी ंखाने की समस्याएं पैदा होतीं हैं। आप फोन पर बताते हैं और उतनी संख्या में भोजन के पैकेट आप तक पहुंच जाते हैं। गुरुद्वारों, मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं से लेकर अनेक सेवा संस्थाएं, एनजीओ, निजी समूह आदि दिन रात इसमें लगे हैं। कहीं-कहीं भोजन यान चल रहा है जो बिना पूर्व सूचना के लोगों तक घूम-घूमकर भोजन पहुंचा रहे हैं। राजधानी दिल्ली के इर्द-गिर्द कई जगहों से खबर आई कि सोसायटी के लोगों ने अपने अपार्टमेंट के अंदर के कम्युनिटी हॉल, क्लब रूम आदि को ही कोविड-19 सेंटर में बदल दिया। वहां सामान्य तौर पर आवश्यकता पड़ने वाली औषधियों से लेकर डॉक्टर और नर्स तक की व्यवस्था है। कुछ लोगों ने भी समूह बनाए हैं जिनके व्हाट्सएप नंबरों पर मेसेज से आपकी कई समस्याएं हल हो जातीं हैं। मसलन, कुछ समूह दवा उपलब्ध कराता है। आपने किसी दवा की मांग की तो उनका समूह यह पता करता है कि दवा कहां उपलब्ध है और वहां से वो मंगाकर पहुंचा रहे हैं। 

वास्तव में इस तरह की गतिविधियों को आप लिखने लगें तो पन्ने भरते जाएंगे लेकिन सिलसिला खत्म नहीं होगा।यही भाव और आचरण उम्मीद पैदा करतीहै कि चाहे संकट कितना भी बड़ा हो हम उसका सफलतापूर्वक सामना करेंगे और विजीत भी होंगे। इससे यह भी पता चलता है कि हमारे देश और समाज की जैसी निराशाजनक तस्वीरें बनाई जा रहीं वैसा है नहीं। वाकई सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। लोगों के अंदर आज भी बिना सरकारी सहायता के निस्वार्थ भाव से अपना खर्च करके दुखी-पीड़ित लोगों की सेवा व हरसंभव सहायता करते हुए संकट का मुकाबला करने का जज्बा कायम है। जिस देश में धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व गैर राजनीतिक संगठन ही नहीं राजनीतिक दल और निजी लोग संकट में अपने संसाधनों के साथ हाथ बंटाने निकल जाएंगे उस देश का भविष्य कभी भी अंधकारमय नहीं हो सकता। इससे यह भी साबित हुआ है कि हमारे राजनीतिक वैचारिक मतभेद जितने गहरे हों, एक दूसरे की हम भले जितनी आलोचना करें, अंततः आपदा का सामना करने के लिए सब काम करेंगे। ऐसे भाव और व्यवहार वाले जनसमूह का सरकारी-गैर सरकारी तंत्रों पर प्रभाव भी पड़ता है। आखिर 2-3 दिनों में ऑक्सीजन पैदा करने वाले प्लांट इसी देश में तैयार हो रहे हैं। जिस तंत्र की हम आलोचना करते हैं और सही करते हैं वही इस काम को भी अंजाम दे रहा है। सामाजिक दूरी और अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए लोगों द्वारा उसमें भी यथासंभव सहयोग करने की तस्वीरें आ रहीं हैं। तो कामना करिए और उम्मीद भी रखिए कि इसी तरह का सामूहिक आचरण देश का बना रहेगा। हां, ऐसे व्यवहार केवल आपदा, विपत्ति और संकट के समय तक ही सीमित न रहे, सामान्य दिनों में भी दिखे। पहले आपदा से निपटें और फिर इस चरित्र को स्थाई भाव बनाने के लिए काम करें।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः11009, मोबाइलः9811027208, 8178547992

 

शनिवार, 1 मई 2021

चेस्ट फिजियोथेरेपी कोरोना संक्रमण के लिए वरदान: डॉ. आसिफ हुसैन

डॉ. आसिफ हुसैन
मो. रियाज़

नई दिल्ली। आज पूरी दुनिया में कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है, कोरोना संक्रमण को झेल रहे मरीजों के लिए चेस्ट फिजियोथेरेपी बहुत उपयोगी है। कोरोना संक्रमण की वजह से मरीजों के सीनों और फेफड़ों में कई तरह की समस्या हो सकती है, ऐसे में लोगों में सांस फूलने की समस्या दिखे तो इसमें चेस्ट फिजियोथेरेपी कारगर साबित हो सकता है, चेस्ट फिजियोथेरेपी की मदद से मरीज खुद को पूरी तरह से ठीक और तंदुरुस्त कर सकता है।

कोरोना संक्रमित के कई लक्षणों में सांस लेने में दिक्कत भी एक प्रमुख लक्षण माना गया है, इसका सीधा संबंध फेफड़ों से होता है। कोरोना के अलावा फेफडों के कई ऐसे रोग है जिन्हें खतरनाक समझा जाता है जैसे:  अस्थमा, सीओपीडी, सिस्टिक फाइब्रोसिस आदि।  चेस्ट फिजियोथेरेपी में कई प्रकार का ग्रुप होता है जैसे पोस्चरल ड्रैनेज, चेस्ट पर्फ्यूजन, चेस्ट वाइब्रेशन, टर्निंग, डीप ब्रीथिंग एक्सरसाइज और भी ऐसी कई थैरेपी शामिल होती है। जब फेफड़े ठीक से काम नहीं करते या इससे जुड़ी गंभीर बीमारी हो तो फिजियोथेरेपी का सहारा पेशेंट को लेना चाहिए। चिकित्सा क्षेत्र में इसका नाम चेस्ट फिजियोथेरेपी दिया गया है।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

उम्मीद रखिए, इस अंधियारी रात की भी सुबह होगी

अवधेश कुमार

निसंदेह जिस पर विपत्ति आती है उसका दर्द वही जानता है। हम सब महसूस कर सकते हैं लेकिन भुगतना तो उन्हीं को पड़ता है। जिनको भुगतना पड़ रहा है उनके सामने आप चाहे नीति और विचार के जितने वाक्य सुना दें तत्काल उनका मानस उसे ग्रहण करने की स्थिति में नहीं होता। चाहे कितनी बड़ी आपदा हो, विनाश का हाहाकार हो, चारों ओर मौत का भय व्याप्त हो, मनुष्य के नाते हमें भविष्य के लिए आशा की किरण की ही तलाश करनी होती है। अगर हमने उम्मीद खो दी, हमारा हौसला पस्त हो गया ,साहस ने ही जवाब दे दिया तो फिर किसी आपदा पर विजय पाना कठिन हो जाएगा। कोरोना की महाआपदा से घिरे देश में मचा कोहराम कोई भी देख सकता है। जिनके अपने या अपनों की चिंताएं जली हैं उनको कहें कि हौसला बनाए रखिए... ये भी दिन गुजर जाएंगे, अच्छे दिन आएंगे तो ये बातें उनके गले आसानी से नहीं उतरेंगी, बल्कि इस समय शूल की तरह चुभती हुई भी लगेगी। मैंने अपने फेसबुक पोस्ट में लोगों से अपना हौसला बनाए रखने, अपनी सुरक्षा करने के साथ दूसरों को भी हौसला देने की अपील की थी। बड़ी संख्या में उत्तर सकारात्मक थे पर कुछ जवाब ऐसे भी थे जिनको हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। किसी ने लिखा कि अगर घर के सदस्य की या रिश्तेदार की चिता जल रही हो तो ये बातें किस काम की। उनके अनुसार एक ही दिन में कई चिताएं जला कर लौटे हैं। ये दिन भी गुजर जाएंगे पर एक मित्र ने लिखा कि पता नहीं तब तक हम जीवित होंगे या नहीं।

  ये दोनों बातें निराशाजनक लग सकती हैं किंतु कोरोना से जिस प्रकार का घटाटोप कायम हुआ है उसमें सामान्य मनुष्य की यह स्वाभाविक दारुण अभिव्यक्ति है। जिस तरह ऑक्सीजन और औषधियों के लिए देशभर के अस्पतालों में हाहाकार मचा है, ऑक्सीजन के अभाव में लोगों के घुट-घुट कर दम तोड़ने के समाचार आ रहे हैं, अस्पतालों में मरीज को भर्ती कराने के लिए सौ जुग्गतें करनी पड़ रहीं है उसमें हर घर मिनट-मिनट डर और आतंक के साए में जी रहा है। मेरे व्हाट्सएप मैसेज के उत्तर में एक जानी-मानी एंकर ने लिखा कि सर, हम सब कुछ कर रहे हैं फिर भी हर क्षण इस डर में जी रहे हैं कि पता नहीं क्या होगा, बाहर कदम रखने में डर लग रहा है। यह किसी एक व्यक्ति की आवाज नहीं है पूरे देश का अंतर्भाव यही है। मैंने जितने व्हाट्सएप किए उनमें से ज्यादातर के उत्तर कहीं न कहीं अंतर्मन में व्याप्त भय और भविष्य की चिंता से लवरेज थे।

कोई कुछ कहे लेकिन इस समय पूरा भारत ऐसे ही घनघोर निराशा में जी रहा है और चिंता का शिकार है। हम सबने अपने जीवन में कई महामारियों का सामना किया है लेकिन एक-एक व्यक्ति को इतने दहशत में जीते कभी नहीं देखा। कोरोना के बारे में चिकित्सकों एवं वैज्ञानिको के एक बड़े समूह की राय है कि यह इतनी बड़ी बीमारी है नहीं जितनी बड़ी बन या बना दी गई है। किंतु यह अलग से विचार कर विषय है। भारत में डर और निराशा का सामूहिक अंतर्भाव कोरोना की आपदा से बड़ी आपदा है। प्रश्न है ऐसी स्थिति में हमारे सामने रास्ता क्या है? ऐसे मुश्किल वक्त में कोई सरल उत्तर व्यवहारिक रास्ता नहीं हो सकता। लेकिन जीवन क्रम की ऐतिहासिक सच्चाई को भी हम नकार नहीं सकते। सृष्टि के आरंभ से मनुष्य ने न जाने कितनी आपदाएं, विपत्तियां, विनाशलीलाएं देखीं, उनका सामना किया और उन सबसे निकलते हुए जीवन अपनी गति से आगे बढ़ती रही। यही पूरी सृष्टि का क्रम रहा है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में तो संपूर्ण प्रलयों का विवरण है। प्रलय में सब कुछ नष्ट हो जाता है। बावजूद वहां से फिर जीवन की शुरुआत होती ही है। हर प्रलय के बाद नवसृजन यही जीवन का सच है। जो ईश्वर में विश्वास करते हैं यानी आस्तिक हैं वे मानते हैं कि हर घटित के पीछे ईश्वरीय महिमा है। कोई अवैज्ञानिक अंधविश्वासी सोच कह कर खारिज कर दे, पर ऐसी सोच से यह भावना कायम रहती है कि जब घटनाएं ईश्वर की देन है तो इनका सकारात्मक तरीके से सामना करना, सहना और जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश करते रहना है। इस धारणा से यह उम्मीद भी पैदा होती है कि ईश्वर ने बुरे दिन दिए हैं तो वही अच्छे दिन भी लाएगा। इस एक धारणा ने मनुष्य को सृष्टि के आरंभ से अभी तक हर विपरीत परिस्थितियों से जूझने और उससे उबर कर जीवन क्रम को आगे बढ़ाने की शक्ति प्रदान की है।

तो इस तरह की शक्ति हमारे आपके अंदर है और उसी से वर्तमान आपदा का भी सामना करना पड़ेगा। आप ईश्वर पर विश्वास न भी करें तो प्रकृति की गति और उसके नियमों को मानेंगे ही। अगर हर घटना की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है तो इसमें अच्छी बुरी दोनों प्रकार की घटनाएं शामिल हैं। इस सिद्धांत में ही यह सच अंतर्निहित है कि बुरी घटना की विपरीत प्रतिक्रिया अच्छी ही होगी। तो भौतिकी का यह सिद्धांत भी उम्मीद जगाती है कि निश्चित रूप से निराशा और हताशा के वर्तमान घटाटोप से प्रकृति अपनी प्रतिक्रियाओं द्वारा हमें उबारेगी। षड् दर्शनों के विद्वान आपको इसे ज्यादा बेहतर तरीके से समझा सकेंगे। हमारे यहां बुजुर्ग धर्म और इतिहास से ऐसी कहानियां बचपन से सुनाते थे, विद्यालयों की पाठ पुस्तकों में पढ़ाई जातीं थी जिनमें जीवन पर आईं विपत्तियां और उसमें अविचल रह कर जूझने और विजय पाने की प्रेरणा मिलती थी। इस दौर में साहित्य, धर्म, दर्शन, इतिहास, समाजशास्त्र आदि विषयों की ओर युवाओं की रुचि घटी है, स्कूली पाठ्यपुस्तकों से भी वैसी कथाएं गायब है और इन सबका परिणाम हमारे सामूहिक मनोविज्ञान पर पड़ा है। लेकिन जो कुछ हम व्यवहार में भुगतते हैं वह भी हमें सीख देता है। हमारे आसपास ही ऐसे परिवार होंगे या स्वयं हम ही वैसे परिवार से आते होंगे जहां किसी बीमारी या घटना में एक साथ बड़ी संख्या में हमारे प्रियजन चल बसे। ऐसी त्रासदीयों के व्यावाहारिक और मानसिक संघात से पीड़ित होते हुए भी हम अपने को संभालते और जीवन की गाड़ी को आगे खींचते हैं। यही जीवन है। जब विनाशकारी तूफान आता है तो फसलें नष्ट हो जाती हैं.. बड़े-बड़े पेड़ भी जड़ों से उखड़ जाते हैं... लगता है पूरी प्रकृति बिखर गई हो लेकिन धरती बंजर नहीं होती। बीज फिर से अंकुरित होते हैं, फसलें फिलहाल आती हैं, वनस्पतियां फिर अठखेलियां करने लगती हैं। मनुष्य अपनी जीजीविषया में फिर फसलें लगाने निकलता है और सफल होता है। जीवन क्रम इसी तरह आगे बढ़ता है। प्रकृति और जीवन के ये दोनों पहलू सच हैं। इसका कोई एक पहलू पूरा सच नहीं हो सकता। तूफान और विनाश भी प्रकृति चक्र के अंगभूत घटक हैं तो फिर नए सिरे से बीजों का अंकुरण और पौधों का उगना भी। कोरोना अगर इस चक्र में तूफान है तो यकीन मानिए इसके बाद फिर जीवन की हरियाली लहलहाती दिखेगी।

हमारे जीवन को क्षणभंगुर कहा गया है। अगले क्षण हम जीवित रहेंगे इसकी कभी कोई गारंटी नहीं होती। लेकिन हम यह सोचकर अकर्मक नहीं हो जाते कि जब आने वाले किसी क्षण में हमारी मौत होनी है तो ज्यादा उद्यम क्यों करें ,हाथ-पांव क्यों मारे। हम हर दिन अपने जीवन को बेहतर बनाने की उम्मीद से अपने कर्मों में रत रहते हैं। कोई ऐसी अंधियारी रात नहीं हो सकती जिसका अंत सुबह से नहीं हो। हर अंधकारपूर्ण रात के बाद सूर्य का प्रकाश निकलना ही है। इसलिए बिल्कुल सच मानिए यह आपदा भी जाएगा और हमारी कोशिशों से ही जाएगा। उसके बाद हम सब फिर अपनी स्वाभाविक भूमिका में पहले की भांति या उससे ज्यादा उत्साह से सक्रिय होंगे। अभी रास्ता यही है कि हम स्वयं और परिजनों को सुरक्षित रखें, दूसरों की सुरक्षा को खतरे में ना डालें तथा अपना हौसला बनाए रखते हुए एक दूसरे की ममद करें व अन्यों को भी हौसला देने की कोशिश करें।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208, 8178547992

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