बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

भविष्य में याद किया जाएगा इस बजट को

अवधेश कुमार

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 का बजट प्रस्तुत करते हुए गुरु रविंद्र नाथ टैगोर की यह पंक्ति सुनाई- उम्मीद ऐसी चिड़िया है जो अंधेरे में भी चहचहाती है। पूरे वर्ष में कोरोना के संकट ने जिस ढंग से दुनिया सहित भारत की अर्थव्यवस्था को धक्का पहुंचाया उसके कारण समाज के हर तबके के मनोविज्ञान में चिंता और निराशा सघन हुई। इन परिस्थितियों में बजट ऐसा चाहिए था जो लोगों के अंदर उनके और संपूर्ण देश के बेहतर भविष्य की उम्मीद पैदा करे, देश के समक्ष समस्याएं और चुनौतियां जितनी गहरी है उनका वास्तविक मूल्यांकन कर उनसे निपटने और सामना करने के लिए साहसपूर्ण व्यावहारिक प्रभावी कदम उठाने का जोखिम ले...। क्या मोदी 2 सरकार के इस दूसरे बजट को हम इस कसौटी पर खरा पा सकते है? तीन दिनों पूर्व संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने बजट की दिशा का संकेत दे दिया था। साफ था गरीबों,किसानों के कल्याण, आम आदमी के जेब में खरीद के लिए धन आने, विकास के पथ पर सरपट दौड़ने का रास्ता तैयार करने और साहस के साथ जोखिम भरे सुधार सरकार के मूल लक्ष्य होंगे। 

इस समय कृषि कानून के विरोध में राजधानी में किसान संगठनों का एक आंदोलन चल रहा है। बड़े वर्ग का ध्यान इस ओर रहा होगा कि कृषि और किसानों से संबंधित क्या घोषणाएं होती हैं। विस्तार से समस्त प्रावधानों का यहां उल्लेख संभव नहीं है, लेकिन कृषि और ग्रामीण आधारभूत संरचना,कृषि के लिए कर्ज की राशि, फसलों के न्यूनतम मूल्य, कृषि से संबंधित उद्योगों को प्रोत्साहित करने, नष्ट होने वाले 22 फसलों को ऑपरेश ग्रीन में शामिल करने आदि बातें निश्चय ही आकर्षक हैं। यह पहली बार है जब कृषि आधारभूत संरचना के धन का उपयोग कृषि उत्पाद बाजार समिति यानी एपीएमसी के लिए भी किया जा सकेगा। जो लोग मंडियों को खत्म किए जाने की साजिश का आरोप लगा रहे थे उनको कम से कम तत्काल तो उत्तर मिल गया होगा। वैसे गांव कृषि और किसान को हम संपूर्ण व्यवस्था से अलग करके नहीं देख सकते। इसी तरह समाज और अर्थव्यवस्था के सम्पूर्ण हिस्सों को गांव, गरीब, किसानों से अलग नहीं कर करते। संतुलित बजट वही माना जाएगा जब समाज, अर्थ और व्यवस्था से जुड़े सभी पहलुओं को आवश्यकता, उपादेयता, अनुपात के अनुसार स्थान दिया जाए। राजनीति को अलग करके विचार करें तो यह स्वीकार करना होगा कि सीतारमण का बजट इन मायनों में संतुलित  है। 

यह पहले से साफ था कि स्वास्थ्य को पूरी तरह भारतीय परंपराओं को भी सशक्त करते हुए विश्वस्तरीय बना देने के लिए सारे पहलुओं को समेटे हुए व्यापक योजना और प्रावधान होंगे। स्वास्थ्य का कुल बजट 2 लाख 23000 करोड़ है। यानी आवंटन रिकॉर्ड 137 प्रतिशत बढ़ा है। इसमें 64,180 करोड़ रुपए के बजट के साथ प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना शुरू होगी। इस कार्यक्रम के अर्थ से ही स्पष्ट है कि इसका लक्ष्य क्या है। 70 हजार गांवों के वेलनेस सेंटर्स को इससे मदद मिलेगी। 602 जिलों में क्रिटिकल केयर अस्पताल शुरू होंगे। नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल या राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केन्द्र को मजबूत किया जाएगा। इंटीग्रेटेड हेल्थ इन्फॉर्मेशन पोर्टल शुरू किया जाएगा ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं या पब्लिक हेल्थ लैब्स को कनेक्ट कर सकें। 15 हेल्थ इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर्स शुरू किए जाएंगे, नौ बायो सेफ्टी लेवल लैब शुरू होंगी। बजट में गांव से शहर तक स्वास्थ्य ढांचे को ऐसा बना देने का लक्ष्य है जिसमें सबको उचित इलाज और स्वस्थ रहने का आधार उपलब्ध हो सके। इस नाते भी यह बजट ऐतिहासिक है। 

 विकसित देशों की कतार में खड़े होने के लिए भारत हर क्षेत्र से जुड़े आधारभूत ढांचा को वैश्विक स्तर पर लाना अपरिहार्य है। इस पर पहले भी फोकस हुआ है। मोदी सरकार ने आरंभ से ही इसकी पूरी कोशिश की है। पिछले बजट में 110 लाख करोड़ रुपये पांच वर्षों में खर्च की घोषणा हुई थी। कोरोना आघात से बाहर निकलने का संकेत देते हुए इस बजट में ऐसे प्रावधान हैं जिनसे 2020 की भी भरपाई हो जाए। 1.10 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड आवंटन तो केवल रेलवे के लिए हैं। भारतमाला परियोजना के लिए 3.3 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान है। रेलवे ने राष्ट्रीय रेल योजना 2030 बनाया है ताकि भविष्य के लिए पूरी तरह तैयार रेल प्रणाली बनाई जा सके। मार्ग आधारभूत संरचना के लिए आर्थिक गलियारे बनाए जाएंगे। सड़क परियोजनाओं को चुनावी राजनीति का तोहफा बताना आसान है। लेकिन क्या इसकी आवश्यकता नहीं थी? बंगाल में 25 हजार करोड़ रुपए से हाईवे का निर्माण , 34 हजार करोड़ रुपए असम में नेशनल हाईवेज पर, 65 हजार करोड़ रुपए से केरल में 1100 किमी नेशनल हाईवे  का निर्माण आदि को चुनावी जनरिए से देखा जा सकता है। किंतु तमिलनाडु में तो भाजपा बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं कर रही होगी। वहां भी 3500 किमी नेशनल हाईवेज परियोजना के तहत 1.03 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा है। इसे देश की आवश्यक आधारभूत संरचना को वर्तमान एवं भविष्य के अनुरुप सशक्त करने की दृष्टि से देखना उचित होगा। आधारभूत ढांच के क्षेत्र में केवल निर्माण और विस्तारों की ही घोषणाएं नहीं है। डेवलपमेंट फाइनेंशियल इंस्टीट्यूट यानी विकास वित्तीय संस्थान की जरूरत बताते हुए एक विधेयक लाने की घोषणा है। सार्वजनिक आधारभूत ढांचा के मुद्रीकरण पर ध्यान देने की घोषण है। इसके लिए नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन शुरू होगी। इसका एक डैशबोर्ड बनेगा ताकि इस मामले में हो रही तरक्की को देखा जा सके। 

निस्संदेह, कोई भी बजट सबको संतुष्ट नहीं कर सकता। पर जरा दूसरे नजरिए से देखिए। ऐेसे संकट के काल में 34.83 लाख करोड़ का बजट असाधारण साहस का परिचय देने वाला है। आप कोरोना काल में वित्त मंत्री द्वारा घोषित तीन पैकेजों, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना तथा रिजर्व बैंक की योजना को मिला दीजिए तो 20 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि सरकार पहले ही दे चुकी है। इनको साथ मिलाकर देखिए और राजनीतिक नजरिए से परे होकर विचार करिए। चीन ने सीमा पर और उसके परे भारत के अंतरराष्ट्ीय-क्षेत्रीय रक्षा हितों के समक्ष जो चुनौतियां पेश कर दीं हैं उसमें भारत के पास रक्षा व्यवस्था को किसी स्थिति से निपटने के लिए कमर कसने के अलावा कोई चारा नहीं था। 4 लाख 78 हजार करोड़ की राशि का आवंटन करना पड़ा है। अगर सबके सिर से बोझ कम कर दिया जाए तो धन आएगा कहां से? विदेशी निवेश के लिए भी आपको पूरा ढांचा उपलब्ध कराना ही होगा और इसकी पूरी कोशिश बजट में है। हम न भूलें कि किसी के सिर पर करों का बोझ बढ़ाया नहीं गया है।

 कई लोग अलग-अलग विषय उठाकर बजट की हमेशा आलोचना करते हैं। बजट को समग्रता में देखने से ही आप सही निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं, खंड-खंड में विचार करने से नहीं। उदाहरण के लिए जो पूछ रहे हैं कि इसमें रोजगार के लिए क्या किया गया है उनको ध्यान रखना चाहिए कि आधारभूत संरचना के जितनी परियोजनाएं हैं , ग्रामीण आधारभूत संरंचना या शहरी, स्वच्छ जल मिशन, मिशन पोषण कार्यक्रम, शिक्षा क्षेत्र के कदम... सबमें बिना घोषणा के करोड़ों रोजगार के अवसर पैदा होंगे।स्वास्थ्य मूल राज्यों का विषय है लेकिन पूरी योजना साकार हुई तो स्वास्थ्य क्षेत्र की पूरी तस्वीर बदल जाएगी। देश का कौन सा वर्ग और क्षेत्र इसमें समाहित नहीं होगा? इसमें कितने लोगों को रोजगार मिलेगा जरा इसकी कल्पना करें। आर्थिक विकास में इसका सतत स्थायी योगदान होगा। अर्थव्यवस्था आम मनुष्य के जीवन से अलग हटके नहीं हो सकती । व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र बनता है। इसलिए राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण का आधार और उसकी दिशा भी बजट में दिखाई देनी चाहिए। आप ध्यान देंगे तो 100 सैनिक विद्यालय खोलने की ऐतिहासिक घोषणा इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आने वाली पीढ़ी को अनुशासित, मानसिक रूप से संतुलित व देश के लिए समर्पित संस्कारों से ओतप्रोत करने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। आज इसका महत्व समझ में नहीं आए लेकिन भविष्य में जब इसके योगदान का मूल्यांकन होगा तो निश्चित रूप से 2021-22 के बजट को याद किया जाएगा। इसी तरह राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद की योजना है। अन्य भाषाओं की पुस्तकों का हिंदी में, हिंदी की पुस्तकों का अन्य भाषाओं में, अन्य भाषाओं की पुस्तकों का भी दूसरी अन्य भाषाओं में होने से संपूर्ण देश में पढ़ने लिखने वाले लोगएक दूसरे की सभ्यता संस्कृति से परिचित होंगे। इससे सांस्कृतिक विविधता वाले देश में एकता का पुनर्जागरण होगा । यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की एक आधार भूमि बन सकती है। इसी तरह उच्च शिक्षा के लिए आयोग, केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना, हजारों विद्यालयों का उन्नतिकरण, आदिवासियों के लिए और एकलव्य विद्यालयों की स्थापना एवं उन्नतिकरण, आदिवासी छात्रों की छात्रवृत्ति का नए सिरे से रचना, अनुसंधान एवं अन्वेषण के लिए मोटी राशि और व्यवस्थाएं आदि भविष्य में महाशक्ति की भूमिका निभाने के लिए भारतीय प्रतिभा तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। 

इस तरह कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि कोरोना संकट के काल में आघात पहुंची अर्थव्यवस्था को, निराश-उदास-हताश भारतीय मानस को तथा भारत को लेकर दुनिया की धारणा को फिर से उम्मीद, विश्वास और सकारात्मक लक्ष्यों की पटरी पर दौड़ाने की दृष्टि से यह बजट याद किया जाएगा। 

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

अखिल भारतीय जेटीवीएस संघ ने मुंबई में लोकल ट्रेन शुरू करने पर रेल मंत्री पीयूष गोयल का धन्यवाद किया

 मो. रियाज़

नई दिल्ली। अखिल भारतीय जेटीवीएस संघ के संयोजक जमील अहमद ने मुंबई में लोकल ट्रेन शुरू करने पर रेल मंत्री पीयूष गोयल का धन्यवाद किया। जमील अहमद ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि महानगर मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली मुंबई लोकल ट्रेन सेवा को 1 फरवरी से जनता के लिए शुरू किया गया है जिससे मुंबई के निवासियों को बहुत लाभ पहुंचेगा। मुंबई लोकल में हर रोज लगभग 80 लाख से अधिक लोग सफर करते हैं। मुंबई लोकल ट्रेन सेवा शुरू होने से मुंबई की जनता काफी खुश है।
उन्होंने आगे कहा जनता व हमारी अखिल भारतीय जेटीवीएस संघ राज्य के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे जी व माननीय रेल मंत्री श्री पीयूष गोयल जी का व अखिल भारतीय जेटीबीएस संघ के मुंबई अध्यक्ष श्री नंद कुमार देशमुख का भी धन्यवाद करती है जिन्होंने समय-समय पर अपनी आवाज माननीय रेल मंत्री को पहुंचाई। उन्होंने मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली मुंबई लोकल ट्रेन सेवा को पुन: शुरू करके लोगों को काफी राहत दी है।
उन्होंने आगे कहा कि माननीय रेल मंत्री श्री पीयूष गोयल जी से अखिल भारतीय जेटीवीएस संघ आशा करती है कि मुबंई की तरह दिल्ली, कोलकाता और पूरे देश में जल्द से जल्द लोकल और सुपरफास्ट ट्रेनें शुरू की जाएंगी। मुंबई लोकल ट्रेन सेवा बहाल करने के लिए एक बार फिर माननीय रेल मंत्री श्री पीयूष गोयल जी का हम धन्यवाद करते हैं।

रविवार, 31 जनवरी 2021

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने 170 बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई

 

संवाददाता

नई दिल्ली । नई पीढ़ी-नई सोच संस्था की ओर से 170 बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई। संस्था की ओर से हर बार की तरह इस बार भी पल्स पोलियो टीकाकरण कैम्प लगाया गया जिसमें 170 बच्चों ने पोलियो की दवा पी। 
यह कैम्प संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की जनता क्लीनिक बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क में लगाया गया। कैम्प में बच्चों को पोलियो की ड्राप्स सुबह 9 बजे से ही पिलाई जाने लगी थी और शाम 4 बजे तक 170 बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाई गई।
संस्था के पदाधिकारियों और सदस्यों ने घर-घर जाकर लोगों को पोलियो ड्राप्स पिलाने के लिए प्राोरित किया और पोलियो की ड्राप्स न पिलाने के नुकसान बताए।
संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन ने कहा कि संस्था हमेशा हर तरह के राष्ट्रीय प्रोग्राम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है और बीच-बीच में जनता को भी इन प्रोग्रामों के प्रति जागरूक करती है। संस्था के सदस्यों ने आज पूरी दिन लोगों के घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो केंद्र पर 0-5 वर्ष के बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाने के लिए कहा।
संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज ने कहा कि सरकार द्वारा चलाई जा रही मुहिम को हम जनता तक पहुंचा रहे हैं। आज पोलियो जड़ से खात्मे की ओर जा चुका है दूसरी बीमारियों पर भी सरकार जल्द कामयाबी हासिल कर लेगी और कुछ बीमारियों पर कामयाबी हासिल कर चुकी है।
संस्था के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी ने कहा कि हमारी पूरी कोशिश रहती है कि हम लोगों की मदद करते रहें क्योंकि दूसरों की मदद करने में जो सुकून मिलता है वह और किसी दूसरे काम में नहीं मिलता। 
समाजसेवी अब्दुल खालिक ने कहा कि लोगों को अपने बच्चों को हमेशा सरकार के कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए चाहे वह कोई भी हो और यह तो बच्चों के जीवन से जुड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि लोग आज भी बच्चों को पोलियो की दवा नहीं पिलाते हैं जो कि गलत है।
इस अवसर पर संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन, संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मौ. रियाज, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी, सदरे आलम, आजाद, मौ. सज्जाद, शान बाबू, इरफान आलम, यामीन, मो. मुन्ना अंसारी, अब्दुल रज्जाक, मो. सलीम आदि मौजूद थे।










डेसू मजदूर संघ का डिवीजन पहाड़ गंज ने किया स्वागत, कई को दी गई जिम्मेदारी

मो. रियाज़

नई दिल्ली। डेसू मजदूर संघ ने गत दिनों बीएसईएस यमुना पावर में आऊटसोर्स के कर्मचारियों को पद देकर उन्हें पदाधिकारी घोषित किया है। यह सभी पदाधिकारी आउटसोर्सिंग स्टाफ की परेशानी को दूर करने में मदद करेंगे। उसी कड़ी में डिवीजन जीटीआर कंप्लेंट सेंटर न्यू जाफराबाद में एक स्वागत समारोह का आयोजन किया गया जिसमें डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव व आऊटसोर्स के ईस्ट दिल्ली के ज्वाइंट सेक्रेट्री अब्दुल रज्जाक का डिवीजन जीटीआर कंप्लेंट सेंटर न्यू जाफराबाद की पूरी टीम के साथ ऋषि पाल, दिनेश, सैन्तुल त्यागी, अशोक कुमार आदि ने जोरदार स्वागत किया गया।

डेसू मजदूर संघ की इकाई डिवीजन पहाड़ गंज में भव्य स्वागत समारोह का आयोजन किया गया। इस भव्य स्वागत समारोह के मुख्य अतिथि थे डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव। इस अवसर पर डिवीजन पहाड़ गंज की ओर से डेसू मजदूर संघ की मुख्य टीम का फूल मालाओं से जोरदार स्वागत किया गया।

भव्य स्वागत समारोह में अध्यक्ष किशन यादव ने डिवीजन पहाड़ गंज एएमसी में कुछ लोगों को नई जिम्मेदारी दी। इसमें शास्त्री यादव को बीजी रोड शिकायत केंद्र का जोनल अध्यक्ष, पप्पू झा को राम नगर शिकायत केंद्र का जोनल अध्यक्ष, बिस्मबर झा को पी पी क्वाटर शिकायत केंद्र का जोनल अध्यक्ष, दुबेश शर्मा को आराम बाग का जोनल अध्यक्ष बनाया गया। इन चारों को डिवीजन पहाड़ गंज में काम करने वाले कर्मचारियों की समस्या का निवारण करने की जिम्मेदारी दी गई है।

वैसे आपको बता दें डेसू मजदूर संघ बीएसईएस यमुना पावर व राजधानी में काम करने वाले मजदूरों के हक के लिए काम करती है चाहे वह कर्मचारी आउटसोर्स पर ही काम क्यों नहीं करता हो।

इस अवसर पर डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि हम सभी को एक दूसरे की मदद के लिए हमेशा खड़े रहना चाहिए ताकि किसी भी साथी को ऐसा न लगे कि वह अकेला है। हम सभी एक दूसरे की परेशानी में साथ हैं और जिन लोगों को आज जिम्मेदारी दी गई है वह भी अपनी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाएंगे।

स्वागत समारोह में डेसू मजदूर संघ आउटसोर्स के अध्यक्ष अशोक, आउटसोर्स के उपाध्याय प्रमोद वर्मा, आउटसोर्स के महामंत्री ऋषि पाल, आउटसोर्स के सर्कल चेयरमैन दिनेश कुमार, आउटसोर्स के संगठन मंत्री सैन्तुल त्यागी, आउटसोर्स के जाॅइंट सेक्रेटरी नोर्थ ईस्ट अब्दुल रज्जाक खान, सहयोगी मेंबर्स संजय शर्मा, उमेश कुमार इत्यादि भी मौजूद थे।

बुधवार, 27 जनवरी 2021

इस हिंसा के असली दोषी

अवधेश कुमार
निस्संदेह, गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजधानी दिल्ली में ट्रैक्टर परेड के नाम पर हुई हिंसा के कारण पूरे देश में क्षोभ का माहौल है। लेकिन अगर आप कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर आंदोलन कर रहे नेताओं के बयान और तेवर देखिए तो आपका गुस्सा ज्यादा बढ़ जाएगा। इनमें से कोई भी इस हिंसा के लिए स्वयं को दोषी मानने को तैयार नहीं है। अभी भी दिल्ली पुलिस और सरकार को निशाना बनाया जा रहा है। ज्यादा से ज्यादा ये पंजाब के एक अभिनेता और एक दूसरे दूसरे नेता को इसके लिए दोषी ठहरा रहे हैं। वास्तव में यह सब अपनी जिम्मेदारी, अपने दोष से बचने की धूर्ततापूर्ण रणनीति है। पूरा देश जानता है कि गणतंत्र दिवस पर ट्रेक्टर परेड न निकालने के लिए सरकार ने अपील की, दिल्ली पुलिस ने भी कई कारणों के आधार पर कहा कि आप कृपया रैली ना निकालें, अनेक बुद्धिजीवियों- पत्रकारों ने अपने अपने अनुसार तर्कों से ट्रैक्टर परेड को अनुचित करार दिया...। बावजूद वे डटे रहे। इनका कहना था कि एक ओर अगर जवान परेड कर रहे होंगे तो दूसरी ओर किसान भी परेड करेंगे। उन्होंने कहा कि हमारा ट्रैक्टर मार्च निकलकर रहेगा और निकाला। तो फिर हिंसा के लिए ये स्वयं को क्यों नहीं जिम्मेवार मानते?
आंदोलनरत 37 संगठनों ने बाजाब्ता हस्ताक्षर करके पुलिस के सामने कुछ वायदे किए थे। उदाहरण के लिए ट्रैक्टरों के साथ ट्रौलियां नहीं होंगी, उन पर केवल 3 लोग सवार होंगे, केवल तिरंगा और किसान संगठन का झंडा होगा, कोई हथियार डंडा आदि नहीं होगा, आपत्तिजनक नारे नहीं लगाए जाएंगे, पुलिस के साथ तय मार्गों पर  अनुशासित तरीके से परेड निकाली जाएगी आदि आदि। आपने देखा ट्रैक्टरों के साथ ट्रौलियां भी थी जिनमें डंडे, रॉड और अन्य सामग्रियां भी भरी थी। ट्रैक्टरों पर काफी लोग बैठे थे। आपत्तिजनक नारे भी लग रहे थे। आखिर परेड में शामिल होने वाले लोग पुलिस के साथ किए गए वायदे का पालन करें इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी? जाहिर है, इन नेताओं ने प्राथमिक स्तर पर भी इसे सुनिश्चित करने की कोशिश नहीं की। दूसरे, यह तय हो गया था कि गणतंत्र दिवस के परेड समाप्त होने यानी 12:00 बजे के बाद ही ट्रैक्टर परेड निकाली जाएगी। इसके विपरीत 8:30 बजे से ही ट्रैक्टर परेड निकालने की होड़ मच गई। जगह-जगह पुलिस को उनको रोकने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही थी। तीन जगह से ट्रैक्टर परेड निकलना था- गाजीपुर, सिंधु और टिकरी। तीनों जगह यही स्थिति थी। क्या इन नेताओं का दायित्व नहीं था कि वे तय समय का पालन करते और करवाते? गणतंत्र परेड का सम्मान करना और करवाना इनका दायित्व था। परिणाम हुआ कि गाजीपुर से निकलने वाले परेड के लोगों ने अक्षरधाम, पांडव नगर पहुंचते-पहुंचते स्थिति इतनी बिगाड़ दी की पुलिस को आंसू गैस के गोले तक छोड़ने पड़े। उन्हें काफी समझाया गया कि अभी गणतंत्र दिवस परेड का समय है, आपका परेड 12:00 से निकलना है.. कृपया, जहां है वहीं रहें..। वे मानने को तैयार नहीं। इसमें पुलिस और सरकार कहां दोषी है?
विडंबना देखिए किसान नेता आरोप लगा रहे हैं कि दिल्ली पुलिस ने उन मार्गों पर भी बैरिकेट्स लगा दिए जो ट्रेक्टर परेड के लिए निर्धारित थे। राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड संपन्न होने तक अनेक रास्तों को पुलिस बैरिकेड लगाकर हमेशा बंद रखती है। जब तक परेड अपने गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंच जाता ये बैरिकेड नहीं हटाए जाते। गणतंत्र दिवस परेड करीब 11:45 बजे खत्म हुआ। उसके बाद ही किसानों का ट्रैक्टर परेड निकल सकता था। ये पहले ही घुस गए और जगह-जगह से निर्धारित मार्गों को नकार कर दूसरे मार्गों पर भागने लगे। आखिर आईटीओ पर जबरन लुटियंस दिल्ली में घुसने की जिद करने का क्या कारण था? आईटीओ पर उधम मचाया गया, ट्रैक्टरों से पुलिस को टक्कर मारने की कोशिश हुई, उनका रास्ता रोकने के लिए जो बसें लगाई गई उनको तीन-तीन चार-चार ट्रैक्टरों से मार-मार कर पलटने की कोशिश हुई, लाठी-डंडों रडों से उनके शीशे तोड़े गए। पुलिस आरम्भ में अनुनय विनय करती रही। पूरी दिल्ली में जगह-जगह ऐसा ही दृश्य था। ट्रैक्टर ऐसे चल रहे थे मानो वह कोई तेज रफ्तार से चलने वाली कारें हों। ट्रैक्टरों को तेज दौड़ा कर पुलिस को खदेड़ा जा रहा था। आम आदमियों को खदेड़ा जा रहा था। भयभीत किया जा रहा था। क्या यही अनुशासन का पालन है?
ये जानते थे कि लाल किला तीनों स्थलों के निर्धारित मार्गाे में कहीं नहीं आता था। भारी संख्या में लोग लालकिले तक पहुंचे। वहां अंदर घुस कर किस ढंग से खालसा पंथ का झंडा लगाया गया, किस तरह  पुलिसवाले घायल हुए, कैसे लोगों को मारा पीटा गया, तलवारें भांजी गई यह सब देश ने देखा। गणतंत्र झांकियों को भी नुकसान पहुंचाया गया। जहां से 15 अगस्त को प्रधानमंत्री झंडा फहराते हैं उस स्थल पर तोड़फोड़ की गयी। ये सारे कृत्य डरा रहे थे। खालसा पंथ का सम्मान संपूर्ण भारतवर्ष करता है, करेगा लेकिन लालकिले पर झंडा लगाकर वे देश और दुनिया को क्या संदेश देना चाहते थे? गणतंत्र दिवस के अवसर पर ऐसा करने का क्या औचित्य हो सकता था?
पूरा देश शर्मसार हुआ है। खालसा झंडा की जगह लाल किला नहीं हो सकता। इससे उसकी पवित्रता भी भंग हुई है। किंतु क्या इन सबकी आशंका पहले से नहीं थी? क्या पुलिस ने आगाह नहीं किया था? क्या मीडिया ने नहीं बताया था कि किसान आंदोलन के नाम पर अनेक खालिस्तानी समर्थक तत्व अपना एजेंडा चला रहे हैं? पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के सजायाफ्ता हत्यारे की तस्वीरें लगाकर लंगर चलाई जाती थी। इनका पूरा विवरण अखबारों में छपा था। शहीद ए खालिस्तान नामक पुस्तक का वितरण हुआ जिसमें भिंडरावाले को महिमामंडित किया गया था। और तो छोड़िए पंजाब में लुधियाना के कांग्रेसी सांसद ने बताया कि खालिस्तान के नाम पर जनमत संग्रह 2020 का समर्थन करने वाले  और अपराधी तत्व आंदोलन में शामिल हो गए हैं। कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था। किसान नेता उल्टे पूछते थे कि क्या हम खालिस्तानी समर्थक और देशद्रोही हैं? जो वास्तविक किसान संगठन, वास्तविक किसान नेता और वास्तविक किसान हैं उनको किसी ने खालिस्तानी या माओवादी या अराजक हिंसक नहीं कहा था। लेकिन ऐसे तत्व उसमें शामिल थे। तो जो लोग इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं क्या उनको यह सब दिखाई नहीं पड़ रहा था? अगर दिखाई पड़ रहा था तो. इनसे आंदोलन को अलग करने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए? ट्रैक्टर परेड शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो, अलगाववादी, हिंसक तत्व लाभ उठा कर गणतंत्र दिवस को गुंडा तंत्र दिवस में ना बदले इसके लिए इन्होंने क्या पूर्व उपाय किए?
देश इन सारे प्रश्नों का उत्तर चाहता है। आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं ने ऐसा कोई कदम उठाया ही नहीं तो बताएंगे क्या। वास्तव में निर्धारित समय और मार्गों का पालन न करने, बैरिकेडों को तोड़ने, पुलिस के साथ झड़प और अन्य गड़बड़ियों की शुरुआत सिंधु बॉर्डर से हुई लेकिन कुछ ही समय में टिकरी और गाजीपुर सीमा से भी ऐसी ही तस्वीरें सामने आने लगी। किसान नेता तीनों मार्गाे पर कहीं भी परेड में शामिल नहीं दिखे। कायदे से इन सबको अपने क्षेत्रों में परेड के साथ या उसके आगे चलना चाहिए था। जाहिर है, इन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा। वैसे भी अगर कोई आंदोलन इस ढंग से हिंसा और अलगाववाद को अंजाम देने लगे तो उसकी जिम्मेदारी केवल उनकी नहीं होती जो ऐसा करते हैं बल्कि मुख्य जिम्मेवारी नेतृत्वकर्ताओं की ही मानी जाती है। आंदोलन का नेतृत्व आप कर रहे हैं, पुलिस को आप वचन देते हैं, सरकार से आप बातचीत करते हैं, मीडिया में आप बयान देते हैं, अगर यह परेड अहिंसक तरीके से संपन्न हो जाता तो उसका श्रेय आप लेते तो फिर देश को शर्मसार करने का दोष भी आपके सिर जाएगा। कायदे से दिल्ली पुलिस को सबसे पहले इनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी। मुकदमे दर्ज हुए लेकिन अपराध की तुलना में हलेकी धाराएं लगीं हैं। इस आंदोलन का वास्तविक चरित्र और चेहरा सामने आ गया है। वैसे भी तीनों कृषि कानूनों का मामला इस समय उच्चतम न्यायालय में है। वहां की समिति इस पर बातचीत कर रही है। उच्चतम न्यायालय फैसला देगा। देश में कृषि कानूनों का जितना समर्थन है उसकी तुलना में यह विरोध अत्यंत छोटा है। अगर कानून में दोष हैं तो उसके लिए सरकार ने स्पष्टीकरण देने और संशोधन करने की बात कही है। यही लोकतंत्र में शालीन तरीका होता है। दोनों पक्ष बातचीत करके बीच का रास्ता निकालते हैं। लेकिन इस आंदोलन को उस सीमा तक ले जाया गया जहां से बीच का रास्ता निकलने की गुंजाइश खत्म हो गई।सारे बयान भाषण भड़काने वाले थे। आंदोलन में शामिल वांछित - अवांछित.. सभी प्रकार के लोगों के अंदर गुस्सा पैदा करने वाले थे। इस तरह की हठधर्मिता और झूठ का परिणाम ऐसा ही होता है। अच्छा होता किसान नेता देश से क्षमा मांगते तथा स्वयं ही अपने को कानून के हवाले कर देते। इन्होंने नहीं किया तो फिर .....।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली - 110092, मोबाइल - 9811027208, 8178547992
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