गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

चुनाव परिणमों की घ्वनियां सुने देश


अवधेश कुमार

जम्मू कश्मीर के जिला विकास परिषद या डीडीसी के चुनाव परिणामों के संदेश अत्यंत सरल और स्पष्ट हैं। वहां एकछत्र और बेरोकटोक शासन चलाने के अभ्यस्त राजनीतिक दल इसकी चाहे जैसी व्याख्या करें इससे प्रदेश में परिवर्तन की ध्वनि स्पष्ट रुप से सुनाई पड़ रही है। फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और  उमर अब्दुल्ला कह रहे हैं कि यह गुपकार गठबंधन के पक्ष में आया परिणाम है। उमर अब्दुल्ला ने तो यहां तक कह दिया कि डीडीसी चुनावों में लोगों ने भाजपा को करारा जवाब दिया है। वे इसे धारा 370 हटाए जाने के खिलाफ जनादेश भी बता रहे हैं। हम चुनाव आयोग द्वारा दिया आंकड़ा देखेें या इनकी विशेषज्ञ टिप्पणी को स्वीकार करें। गुपकार गठबंधन को ये लोग ऐसा शक्तिशाली और प्रतिरक्षित मोर्चा मान रहे थे जिसकी किलेबंदी कोई भेद नहीं सकता। कल्पना यह थी कि हम साथ मिल गए तो प्रदेश में कोई टिकेगा नहीं और सारे चुनाव जीतकर हम पहले की तरह जो चाहेंगे करेंगे। फारुख इतने बौरा गए कि धारा 370 को फिर से लागू करने के लिए चीन से मदद लेने का बयान दे दिया। मेहबूबा कहने लगीं कि यहां तीरंगे को हाथ लगाने वाला नहीं मिलेगा। गाल बजाना कोई इनसे सीखे। निस्संदेह, स्थानीय राजनीतिक समीकरण में जब तक कश्मीर की राजनीति में हो रहा परिवर्तन निश्चित रुपाकार ग्रहण नहीं करता, इनकी सम्मिलित ताकत को कोई नकार नहीं सकता। किंतु इस चुनाव परिणाम ने साबित कर दिया है कि इनका प्रभाव अब चूक रहा है। ऐसा न होता तो एक दूसरे के साथ सांप और नेवला का युद्ध लड़ने वाले अब्दुल्ला और मेहबूबा को मिलकर चुनाव नहीं लड़ना पड़ता। बावजूद इसके क्या इस जनादेश को इनकी उम्मीदों के अनुरुप कहा जा सकता है?

इसका सीधा उत्तर है नहीं। गुपकार 112 सीटें जीतकर सबसे बड़ा गठबंधन अवश्य बना है, पर भाजपा को 75 स्थान पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनने से ये नहीं रोक सके। भाजपा मतों में 38.74 प्रतिशत के साथ आगे है। गुपकार को 32.96 प्रतिशत मत मिले हैं जो भाजपा से 5.78 प्रतिशत कम है। भाजपा को कुल 4 लाख 87 हजार 364 मत मिले जबकि गुपकार के साथ कांग्रेस का भी मत मिला दंे तो यह 4 लाख 77 हजार के आसपास है। कल्पना करिए अगर सात दलों ने मिलकर चुनाव नहीं लड़ा होता तो परिणाम कैसा होता? निर्दलीयों की 50 स्थानों पर विजय भी इन दलों से मोहभंग का ही संकेत है। सबसे बड़ी बात घाटी में भाजपा के तीन प्रत्याशियों द्वारा गुपकार को हराकर प्राप्त किया गया विजय है। कई स्थानों पर उसके उम्मीदवारों ने ठीक-ठाक मत हासिल किए हैं। वास्तव में परिणामों के आंकड़ें बता रहे हैं कि अगर भाजपा ने प्रदेश में अपनी गोटी ठीक से सजाई और कुछ दलों को ताकत दिया तो फिर अब्दुल्ला और मुफ्ती की राजनीति हाशिए पर कदमताल करती दिखेगी। इन लोगों का चुनाव में एक ही एजेंडा था- अगर धारा 370 और 35 ए को वापस लाना है, प्रदेश को सम्पूर्ण भारत से अलग विशेष राज्य की तस्तरी में सजाने की ताकत पानी है तो गुपकार को गले लगाओ एवं भाजपा को भगाओ। अगर पूरे प्रदेश में इनकी बातों का असर होता हो इन्हें एकतरफा विजय मिलती। ऐसा नहीं हुआ तो इसका अर्थ है। इनके उम्मीदवार इतनी संख्या में जीते भी तो इस कारण कि दूसरे दल या उम्मीदवार कम ताकतवर थे या उनका भी मोटा-मोटी एजेंडा यही था। आखिर कांग्रेस भी धारा 370 हटाए जाने का विरोध कर रही है। वहां के नेता गुपकार के साथ होने की बात करते हैं। भाजपा का अभी तक पूरे प्रदेश में विस्तार नहीं हुआ है। इस चुनाव से एक जोरदार ध्वनि यह निकल रही है कि धारा 370 हटाने के नरेन्द्र मोदी सरकार के फैसले को जनता ने नकारा नहीं है। अगर यही चुनाव एकाध साल बात होते तो शायद परिणामों ने गुपकार के नेताओं की नींद छीन ली होती।

नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह को परिणामों की ध्वनि ठीक से सुननी चाहिए। जिस तरह उन्होंने धारा 370 हटाने के पहले प्रदेश में सख्ती की और उसे आगे बनाए रखा उससे उनके प्रति विश्वास बढ़ा था। बाद में भावुकता में आकर एवं तथाकथित लोकतांत्रिक प्रक्रिया आरंभ करने की जल्दबाजी के कारण निर्मित और घनीभूत होते माहौल तथा इससे राजनीति में बनते नए समीकरण की संभावना को धक्का लग गया। पहले फारुख अब्दुल्ला, फिर उमर को रिहा करना किसे रास आया इसका पता एकबार करवा लेना चाहिए। जो मेहबूबा लगातार भारत विरोधी बयान देतीं रहीं उनको रिहा करना धारा 370 हटाने की भावना को कमजोर करने वाला था। इनके भ्रष्टाचार और कुशासन को जनता ने भुगता है। धारा 370 हटाना इतिहास की भयानक आत्मघाती भूल का अंत करना था। इससे प्राप्त विशेषाधिकार की मलाई मुख्यतः वहां नेताओं, अधिकारियों व बलशाली-प्रभावशाली तबके ही चट कर जाते थे। इनके भ्रष्टाचार के कारनामे जिस तरह सामने आए हैं उनके बाद अलग से कोई प्रमाण देने की आवश्यकता है क्या? ये खुले मैदान की राजनीति में नहीं, जेल मंे समय बिताने के हकदार हैं। जनता ने भी भारी संख्या में निर्दलीयों को चुनकर तथा भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनाकर यही कहा है। अब्दुल्ला पिता-पुत्र एवं मुफ्ती को भी अब यह आवाज सुनाई पड़ रही होगी, पर मोदी-शाह को इसे सुनने की ज्यादा जरुरत है।    

मान लीजिए परिणामों में भाजपा पिछड जाती तो क्या इससे गुपकार की बातों पर मुहर माना जाता? पहली बार उन तबकों को मतदान करने का मौका मिला जिन्हें इन पार्टियों ने प्रदेश का नागरिक ही नहीं माना था। जिला विकास परिषद के साथ पंचों एवं सरपंचों के चुनाव में पश्चिमी पाकिस्तान से आए लोगों को मतदान का अधिकार दिया गया। यही उन वाल्मिकी परिवारों के साथ भी हुआ जिन्हें वर्षों पहले सफाई के लिए लाकर बसाया गया पर वे प्रदेश के नागरिक नहीं बने। क्या इन सबको मतदान का हक नहीं मिलना चाहिए था? गुपकार घोषणा की ध्वनि यही है। इन लोगों को मतदान करते वक्त कैसा महसूस हुआ होगा इसकी हम आप केवल कल्पना कर सकते हैं। वहां बसपा को भी दो सीटें इसी कारण प्राप्त हुई क्योंकि वाल्मिकी परिवारों को मतदान का अवसर मिला। यही नहीं जम्मू कश्मीर की जनता को भी पहली बार जिला विकास परिषद के चुनावों में मत डालने का अवसर मिला। आज तक इनने जिला विकास परिषद का चुनाव ही नहीं कराया। इनके शासनकाल में तीन स्तरीय पंचायती राज साकार नहीं हो सका। 70 वर्षों में पहली बार यह चुनाव आयोजित हुआ तथा अब जाकर वहां के लोगों को तीन स्तरीय पंचायती राज प्राप्त हुआ है। जम्मू करूमीर के निवासियों ने साक्षात अनुभव किया है कि धारा 370 हटने के बाद पंचायतों को ताकत मिली है, उनके हक की राशि सीधे खाते में गई, वे खुद स्थानीय स्तर पर विकास के अनेक  काम कराने लगे, अधिकारी उन तक पहुुंचने लगे। इन सबका सपना भी ये नहीं देख सकते थे। इससे वहां का मनोविज्ञान किस तरह निर्मित हो रहा होगा इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। ध्यान रखिए, पंचायत के दो स्तरीय चुनावों का कश्मीर के दलों ने बहिष्कार किया था। जनता ने इनकी एक न सुनी। उनके पास अस्तित्व बचाने की मजबूरी आ गई थी। अगर वे इस चुनाव में भाग नहीं लेते तथा आपसी नफरत और दुश्मनी भुलाकर एक साथ नहीं आते तो उनके पास दिन में तारे गिनने का ही काम बचता। यह स्थिति धारा 370 हटाने के कारण ही पैदा हुई। अलगाववादी तक चुनाव बहिष्कार की घोषणा करने का साहस नहीं दिखा पाए। आखिर जम्मू कश्मीर में 51 प्रतिशत मतदान सामान्य बात नहीं है। अनेक स्थानों पर लोगों ने पहले की उदासीनता को दरकिनार कर मतादन किया। उदाहरण के लिए श्रीनगर शहर में लोकसभा चुनाव में 7.9 प्रतिशत और पंचायत चुनाव में 14.5 प्रतिशत मतदान हुआ जबकि वर्तमान चुनाव में 35.3 प्रतिशत। एक साथ ठंढ, कोरोना, आतंकवाद आदि की चुनौतियों को दरकिनार कर लोगों ने मतदान किया तो साफ है कि वो नई व्यवस्था को अपने हक में मान इसको ह्रदयंगम करने की ओर बढ़ रहे हैं। इस प्रक्रिया को और बल देने की आवश्यकता है।

जिला विकास परिषद के चुनाव परिणामों से निकलती ध्वनियों को जो नहीं सुन रहे उनको सुनाना जरुरी है। केन्द्र में भी सरकार और विपक्ष सभी इसे सुने तथा इसके अनुरुप अपनी नीतियां निर्धारित करें। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208



रविवार, 13 दिसंबर 2020

हैदराबाद परीक्षण में भाजपा के सफल होने के मायने

अवधेश कुमार

भाजपा ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम में 48 सीटें जीतकर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन या एआईएमआईएम को 44 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर सिमटा देगी तथा सत्तारुढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति या टीआरएस 55 सीटों तक सीमित रहकर बहुमत से वंचित रह जाएगी इसकी उम्मीद कम ही लोगों को रही होगी। आखिर एक्ज्टि पोलों में भी टीआरएस को बहुमत मिलता दिखाया गया था। ध्यान रखिए 2016 में टीआरएस 150 में से 99 वॉर्ड जीतकर बहुमत प्राप्त किया था, जबकि एआईएमआईएम 44 सीटें तथा भाजपा को केवल चार सीटेें मिलीं थीं। चार से 48 की उछाल सामान्य नहीं है।  वोट के अनुसार भाजपा टीआरएस से केवल 0.25 प्रतिशत वोट पीछे है। अगर भाजपा को सिर्फ 8500 वोट और मिलते तो वह पहले स्थान पर होती।  2016 में टीआरएस को कुल 14,68,618 वोट मिले थे। इस बार यह घटकर 12,04,167 रह गया। तब भाजपा को केवल 3,46,253 वोट मिला था। इस उसके वोटों की संख्या है,11,95,7112016 में उसे 10.34 प्रतिशत वोट मिला था जबकि इस बार 34.56 प्रतिशत। यह असाधारण छलांग है। हालांकि ओवैसी का वोट 2016 में 15.85% से बढ़कर 18.28% हो गया है। इसका कारण मुस्लिम मतों का उसके पक्ष में ध्रुवीकरण है। वास्तव में भाजपा ने जिस तरह ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम का चुनाव लड़ा वो बहुत लोगों को हैरत में डालने वाला था। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह के नेतृत्व मंे हर चुनाव को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लड़ना भाजपा का स्वभाव बन चुका है इसके पीछे उसका स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य होता है। इस तरह हैदराबाद नगर निगम चुनाव को वर्तमान भाजपा के स्वभाव के अनुरुप माना जा सकता है। किंतु नहीं। यहीं तक सीमित कर देने से इसका व्यापक परिप्रेक्ष्य ओझल हो जाएगा। प्रश्न है कि भाजपा के राजनीतिक लक्ष्य थे क्या?

चुनाव प्रचार के दौरान अपनाए गए तेवरों तथा परिणाम के बाद आ रहीं प्रतिक्रियाओं से इसे काफी हद तक समझा जा सकता है। सच यह है कि हैदराबाद भाजपा के लिए उसकी अपनी दृष्टि में अनेक अन्य ऐसे चुनावों से परे व्यापक राजनीतिक महत्व वाला था। चुनाव अभियानों ने इसे काफी हद तक स्पष्ट कर दिया था अब परिणामों ने उनको और पुष्ट किया है। स्वयं गृह मंत्री अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर जैसे नेताओं को भाजपा ने उतारा, भूपेन्द्र यादव को चुनाव प्रभारी बनाया तथा दक्षिण के उभरते युवा नेता तेजस्वी सूर्या सहित अनेक नेताओं को वहां केन्द्रित कर दिया तो यह यूं ही नहीं था। महाराष्ट्र मूल के लोगों को खींचने के लिए जावडेकर के अलावा देवेंद्र फडणवीस तक को बुलाया गया। अमित शाह एवं आदित्यनाथ तक ने रोड शो किया। अगर हैदराबाद एवं तेलांगना तक सीमित होकर विचार करें तो भाजपा को भी पता था कि उसे बहुमत नहीं मिलेगा, किंतु वर्तमान प्रदर्शन उसे संतुष्ट करने वाला है तथा इससे भविष्य के लिए उम्मीद काफी बढ़ गई है। भाजपा के प्रदेश प्रमुख बी संजय कुमार ने इसे भगवा हमला कहा है। अन्य नेताओं के बयानों में भी आपको टीआरएस का विकल्प होने के दावों के साथ हिन्दुत्व के मुद्दे तथा ओवैसी का उल्लेख मिल रहा है।ं

वास्तव में भाजपा के लिए यह स्थानीय यानी हैदराबाद से लेकर तेलांगना तथा दक्षिण मंे विस्तार के साथ वैचारिक और राजनीतिक तौर पर राष्ट्रव्यापी संदेश की दृष्टि से महत्व को समझना होगा। ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम देश के सबसे बड़े नगर निगमों में से एक है। इसका सालाना बजट 6 हजार 150 करोड़ रुपए का है। इसकी आबादी तकरीबन 80 लाख है, जिसमें से 40 प्रतिशत से ज्यादा आबादी मुस्लिम है। इसमें हैदराबाद, रंगारेड्डी, मेडचल-मल्काजगिरि और संगारेड्डी समेत 4 जिलंे आते हैं। विधानसभा की 24 और लोकसभा की 5 सीट आती है। असदुद्दीन ओवैसी यहीं से लोकसभा सांसद हैं। प्रदेश की राजनीति के लिए इसका महत्व समझने में अब कठिनाई नहीं होनी चाहिए। हालांकि राजनीतिक तौर पर तेलांगना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर नरेन्द्र मोदी सरकार के साथ खड़े नजर आते हैं, संसद में सहयोग करते हैं, पर वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भाग नहीं हैं। तेलांगना में भाजपा का आधार वर्षों पुराना है। संयुक्त आंध्र का के इस इलाके से उसे सीटें मिलतीं थीं। हैदराबाद प्रदर्शन पर पार्टी का बयान है हम टीआरएस का विकल्प बनकर उभर रहे हैं। वैसे भी कांग्रेस और तेदेपा का जनाधार नेस्तनाबूद होने के बाद भाजपा के लिए स्थान बनता है। तो तय मानिए हैदराबाद नगर निगम के साथ भाजपा ने 2023 विधानसभा चुनाव के लिए प्रयाण कर दिया है। भाजपा टीआरएस के लिए बड़ी चुनौती पेश करेगी। टीआरएस कह रही है कि तेलांगना केवल हैदराबाद नहीं है, लेकिन यह मोदी और शाह की भाजपा है जो रुकना और बैठना या स्थिर रहना नहीं जानती वह हैदराबाद को प्रदेश के कोने-कोने में विस्तारित करने की योजना पर काम कर रही होगी। चुनाव प्रचार में भाजपा नेता लगातार ओवैसी और टीआरएस के बीच अंदरुनी अपवित्र गठबंधन का आरोप लगाते रहे। वे प्रश्न उठाते थे कि आखर एआईएमआईएम ने केवल 51 उम्मीदवार ही क्यों उतारे? यह प्रचार वह आगे भी जारी रखेगी। ध्यान रखिए, 2018 में तेलंगाना विधानसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ एक सीट और 7.1 प्रतिशत मत मिला था। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उसने चार सीटों पर कब्जा करने के साथ 19.45 प्रतिशत मत प्राप्त किए। अभी पिछले नवंबर में दुब्बाक विधानसभा उपुचनाव में उसने अप्रत्याशित विजय प्राप्त की। उस चुनाव में भाजपा ने टीआरएस और ओवैसी की पार्टी के बीच अंदरुनी गठबंधन को प्रचार का प्रमुख हथियार बनाया था। इसका असर हुआ। कांग्रेस की दुर्दशा में हो क्या सकता है? कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में गठबंधन के कारण उसे 21 सीटें मिलीं थीं। लोकसभा चुनाव में भी उसे तीन सीटें एवं 29.48 प्रतिशत मत ले थे।

वैसे भी अगर नगर निगम के चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे तथा हिन्दुत्व का अपेक्षित असर हो सकता है तो विधानसभा में क्यों नहीं। भाजपा दक्षिण के राज्यों में जहां संभव है वहां अकेले नही ंतो दलों के गठबंधन से अपने विस्तार की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। कुछ ही समय पहले अमित शाह ने चेन्नई की यात्रा की और वहां अन्नाद्रमुक तथा कुछ अन्य दलों के साथ मिलकर मजबूती से चुनाव लड़ने का सीधा संदेश दिया। केरल में वह दिन रात एक कर रही है तथा उसका मत जिस तरह बढ़ रहा है उसमें आश्चर्य नहीं आने वाले समय में वह प्रदेश की एक सशक्त पार्टी बन जाए। इसी से भाजपा की दृष्टि में इसके राष्ट्रीय फलक की प्रतिध्वनि सुनाई देने लगती है। ओवैसी केवल एक लोकसभा सीट जीतते हैं, पर वे देश में मुसलमानों के सबसे मुखर तथा कट्टर नेता के रुप में उभर चुके हैं। ओवैसी आक्रामक मुस्लिमवाद के प्रतीक बन चुके हैं और उनके विरोधी उन्हें मोहम्मद अली जिन्ना का अवतार घोषित करते हैं। हैदराबाद के उनके गढ़ में भाजपा नेताआों द्वारा खुलेआम उनका नाम लेकर चुनौती देने का असर राष्ट्रव्यापी असर होना निश्चित है। भाजपा यह संदेश देने में सफल है कि ओवैसी और उनके समर्थकों को चुुनौती देकर काबू करने में वही सफल हो सकती है। यह संदेश वाकई निकल रहा है कि अगर आवैसी के प्रभाव विस्तार को रोकना है तो भाजपा का समर्थन करना ही होगा। योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह ओवैसी पर हमला किया, फेैजाबाद को अयोध्या तथा इलाहाबाद को प्रयागराज करने की तर्ज पर सत्ता में आने के बाद हैदराबाद को भाग्यनगर करने का वायदा किया वह भाजपा की ऐसी रणनीति है जिससे उसका जनाधार देशव्यापी मजबूत होगा। स्थानीय मुद्दों को साइड किया और राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाया। नगर निगम के चुनाव अक्सर बिजली, पानी, सड़क, कूड़ा-करकट जैसे स्थानीय मुद्दे गौण रहे तथा राष्ट्रीय और हिन्दुत्व की ध्वनि गूंजती रही। सर्जिकल स्ट्राइक, जम्मू कश्मीर से 370 का अंत, बांग्लादेशी घुसपैठिए, रोहिंग्या सब थे। तेजस्वी सूर्या कहते थे कि ओवैसी भाइयों ने तो केवल रोहिंग्या मुसलमानों का विकास करने का काम किया है। ओवैसी को वोट भारत के खिलाफ वोट है।

 इसकी प्रतिध्वनि आपको आगामी पश्चिम बंगाल चुनाव तथा आगे तमिलनाडु, केरल तक सुनाई पड़ेगी। पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए ममता बनर्जी बहुत बड़ी अवरोध हैं पर इसने प्रदेश को अपना एक किला बना देने के लिए पूरी शक्ति लगा दिया है। हैदराबाद की विजय ने भाजपा के अंदर आत्मविश्वास और उत्साह परवान चढ़ा दिया है। इसका असर उसके चुनावी व्यवहार में दिखाई देगा। हैदराबाद के नुस्खे पूरी शक्ति से बंगाल में आजमाए जाएँगे। वहां 29 प्रतिशत मुसलमानों के कारण ओवैसी भी कूद रहे हैं। तो वहां चुनाव अभियान में हैदराबाद आएगा ही। ओवैसी भाजपा के लिए बिन मांगे वरदान जैसा साबित हो रहे हैं। तो तैयार रहिए अभी से पूरे पश्चिम बंगाल में हैदराबाद की गूंज ज्यादा प्रभावी तरीके से सुनने के लिए।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली - 110092


सोमवार, 30 नवंबर 2020

किशन यादव को सर्वसम्मति से दुबारा डेसू मजदूर संघ का प्रेसिडेंट चुना गया

संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय मजदूर संघ के अजमेरी गेट, नई दिल्ली के ऑफिस में किशन यादव को सर्वसम्मति से डेसू मजदूर संघ का अध्यक्ष चुना गया। भारतीय मजदूर संघ से सम्बद्ध डेसू मजदूर संघ का पंजीकरण संख्या 1336 है।
डेसू मजदूर संघ की कार्यकारिणी की बैठक भारतीय मजदूर संघ के अजमेरी गेट, नई दिल्ली के ऑफिस में हुई जिसकी अध्यक्षता डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने की। इस बैठक की शुरुआत पुरानी कार्यकारिणी को भंग करके की गई और सभी कार्यकारिणी सदस्यों का चुनाव दुबारा चुनाव द्वारा हुआ। इसमें सर्वसम्मति से चुनाव अधिकारी के लिए भारतीय मज़दूर संघ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष प्रेम सिंह नागर का नाम रखा गया व इनके साथ ही प्रदेश महामंत्री अवनीश मिश्रा और लीगल सेल के बी एस रावत उपस्थित रहे जिनकी देखरेख में सर्वसम्मति से निम्न पदाधिकारियों का चयन किया गया।
किशन यादव (बीवाईपीएल) को प्रेसिडेंट, मुकेश कुमार भारद्वाज (बीवाईपीएल) को वर्किंग प्रेसिडेंट, विजय कुमार (बीवाईपीएल) व के.आर. मीणा (बीआरपीएल) को वाइस प्रेसिडेंट, सुभाष चंद (बीआरपीएल) को जनरल सेक्रेटरी, हंस राज (बीवाईपीएल) को सेक्रेटरी, अनिल यादव (बीवाईपीएल) व राजवंत (बीआरपीएल) को ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी, अजीत कुमार  (बीवाईपीएल) को जॉइंट सेक्रेटरी, जितेंद्र कुमार  (बीवाईपीएल) को ऑफिस सेक्रेटरी, आर. बी. भारती (बीआरपीएल) को लीगल सेक्रेटरी, अरुण बंसल (बीवाईपीएल) को प्रेस सेक्रेटरी और सुभाष पाल (बीवाईपीएल) को कोषाध्यक्ष चुना गया।
इस चुनाव के बाद बैठक में कुछ प्रस्ताव पास किये गए जैसे 1. दिल्ली की पाँचो कंपनियों में काम करने वाले सभी डे्सू मजदूर संघ यूनियन की सदस्यता ग्रहण कर सकता है  जिसमें एएमसी के कर्मचारी, आऊटसोर्स  के कर्मचारी, एचआरएमएस के कर्मचारी, एसएलए के कर्मचारी, डाइवर कर्मचारी, सफाई कर्मचारी, जीपीए कर्मचारी। 2. पांचों बिजली कंपनियों में काम करने वाले ठेका कर्मचारियों को पक्का किया जाए, इसकी पूरी कोशिश की जाएगी। 3. करूण मूलक आधार पर आश्रितों के बच्चों को नौकरी पर रखा जाए। 4. जिस कर्मचारी को मिनियम वेज नहीं मिल रहा है उस कर्मचारी को मिनियम वेज दिलाना है आदि।
इस मौके पर आउटसोर्स  जनरल बॉडी मेंबर्स डेसू मजदूर संघ आउटसोर्स  महामंत्री ऋषि पाल, आउटसोर्स संगठन मंत्री सैन्तुल त्यागी, आउटसोर्स ज्वाइंट सेक्रेट्री अब्दुल रज्जाक, सहयोगी मेंबर्स संजय शर्मा, उमेश कुमार इत्यादि भी मौजूद थे।







गुरुवार, 5 नवंबर 2020

शास्त्री पार्क में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन जाकिर खान का जोरदार स्वागत किया

 संवाददाता

नई दिल्ली। गांधी नगर विधानसभा के शास्त्री पार्क वार्ड ई-25 के कादरी मस्जिद, शास्त्री पार्क क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय की एक बैठक हुई इसमें मुख्य अतिथि दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन जाकिर खान थे व गांधीनगर विधानसभा के मनोनीत निगम पार्षद हसीबुल हसन उर्फ राजू भी मौजूद थे।
यह बैठक समाजसेवी फैजी खान उर्फ बबली भाई की दुकान के बाहर हुई। इस मौके पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन जाकिर खान व गांधीनगर विधानसभा के मनोनीत निगम पार्षद हसीबुल हसन उर्फ राजू  का
फूलमालाओं से स्वागत करते हुए दोनों अतिथियों का बैठक में आने के लिए शुक्रिया अदा किया। फैजी खान उर्फ बबली भाई बता कि इस बैठक को करने का मकसद सिर्फ इतना था कि आज हमारे समाज के लोगों को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं है कि हम अपने अधिकारों के लिए कहां जा सकते हैं या किससे मदद ले सकते हैं। इसलिए हमने आज चेयरमैन जाकिर खान साहब को बुलाया है जो आयोग के अंतर्गत हमारे अधिकारों से हमें जानकारी देंगे। क्षेत्र की कुछ समस्याओं के लिए हमने अपने मनोनीत निगम पार्षद हसीबुल हसन को बुलाया है। वह भी हमारी परेशानी को दूर करेंगे।
समीर मंसूरी ने कहा कि हम सभी मुख्यमंत्री केजरीवाल का शुक्रिया अदा करते हैं कि उनकी परखी नजर ही है जिन्होंने जाकिर खान जैसे जमीनी स्तर के व्यक्ति को अल्पसंख्यक आयोग का चेयरमैन बनाया जो समाज कि हर तकलीफ को समझते हैं और उनके बीच जाकर उनका हल निकालने की कोशिश करते हैं।
समाजसेवी मारूफ अली ने बताया कि बुलंद मस्जिद कालोनी में आयोग की ओर से एक डिस्पेंसरी का काम काफी लंबे समय तक हुआ और लगभग डिस्पेंसरी तैयार है पर उसका काम बीच में ही रुक गया है। चैयरमेन साहब इस ओर ध्यान दें ताकि लोगों को इलाज के लिए कहीं ओर न जाना पड़े।
इस पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन जाकिर खान ने कहा कि इसके बारे में मैं पता करता हूं और किस कारण यह काम रुका हुआ है। मैं कोशिश करूंगा कि यह जल्द चालू हो जाए। उन्होंने अल्पसंख्यकों के लिए आयोग द्वारा चलाई जा रही योजनाओं से अवगत करवाया और भरोसा दिलाया कि दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग आपकी हर परेशानी में आपके साथ है। उन्होंने कहा कि आप जब चाहें मेरे ऑफिस आ सकते हो या मुझे बुला सकते हो। दिल्ली सरकार की कई सारी योजना अल्पसंख्यकों के लिए बनी है उनको भी दिलावाने की हर संभव कोशिश की जाएगी। उन्होंने ने आगे कहा कि मैं आपको बता दूं कि दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग छह अल्पसंख्यकों समुदाय के लिए काम करता है जैसे मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, जैन ओर पारसी। इसलिए आप की परेशानी में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग आपकी पूरी मदद की जाएगी।
गांधीनगर विधानसभा के मनोनीत निगम पार्षद हसीबुल हसन उर्फ राजू ने कहा कि मुझे कुछ समस्याओं से अवगत करवाया गया है जिसे जल्द दूर कर दिया जाएगा। मैं आपकी परेशानी में आपके साथ खड़ा हूँ आपकी परेशानी मेरी परेशानी है। आप कभी भी मुझे बुलाएं या फोन कर दें आप लोगों की समस्याओं पर जल्द से जल्द कार्य शुरू होगा और कार्य पूरा होने के बाद आपको सूचित भी कर दिया जाएगा।
उन्होंने आगे कहा कि मैं आप सभी लोगों को भरोसा दिलाता हूं कि विधानसभा में जितनी भी दिक्कत आ रही है उनको भी जल्द से जल्द दूर किया जाएगा और वादा किया आयोग के साथ मिलकर काम करेंगे। सरकार से मिलने वाली सभी स्कीम घर-घर पहुंचाएंगे।
इस कार्यक्रम में समाजसेवी नियाज अहमद उर्फ पप्पू मंसूरी ने सभी मेहमानों का शुक्रिया अदा किया। इस बैठक में समीर मंसूरी, रिजवान बेकरी वाले, सिद्दीक भाई, मारूफ अली, दीपक जैन उर्फ दीपक हिन्दुस्तानी, शमीम कुरैशी व समाज के वरिष्ठ लोगोंं ने हिस्सा लिया।

 

 


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