सोमवार, 27 जुलाई 2020

यूपी के मुबारकपुर गांव की मानवी त्यागी ने किया दसवीं क्लास में टॉप

मानवी त्यागी
संवाददाता 
मुजफ्फरनगर। जिला मुजफ्फरनगर यूपी के मुबारकपुर गांव की मानवी त्यागी ग्रामीण माहोल के राखी पब्लिक स्कूल ठेठ देहात में होने के बावजूद मेघावी छात्रा मानवी त्यागी ने सीबीएसई के घोषित परिणाम 96.8 प्रतिशत स्कोर कर प्रथम स्थान प्राप्त किया। मानवी त्यागी ने अपनी माता पिता इन्दु त्यागी, अमित त्यागी व गांव का नाम रोशन करते हुए यूपी के मुजफ्फरनगर जिले में 12वां स्थान हासिल कर अपने आप में एक रिकार्ड बनाया है।
मानवी त्यागी बताती हैं कि मेरे स्कूल में शिक्षा का बहुत ही बेहतर माहौल है, मेरे शिक्षक और प्रिंसिपल मेरे परिणाम से बहुत ही ज्यादा खुश नज़र आये, वहीं मेरी क्लास टीचर अंजना गर्ग व प्रिंसिपल प्रमोद त्यागी ने अनेकों शुभकांमनाएं व बधाई दी मेरे उज्जवल भविष्य की कामना की, मेरे रिजल्ट से मेरे माता-पिता को जितनी खुशी हुई है, वह शब्दों बयान नहीं किया जा सकता। 
गांव के माहौल का शहर की तुलना में शिक्षा संसाधनों की कमी होने बावजूद, मानवी त्यागी ने एकदम ठेठ गांव की बेटी होकर हर किसी के लिए एक मिसाल कायम की है। योगी शिक्षा माडल से उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला है। जब से योगी आदित्यनाथ यूपी के मुख्यमंत्री बने हैं, तब से नारी को बहुत सम्मान मिला है, योगी शिक्षा माडल व माता-पिता और मेरे नाना सुखलाल त्यागी की प्रेरणा ने ही इस मुकाम तक पहुंचाया है। मेरे नाना सुखलाल त्यागी अपने जमाने में नवभारत टाइम्स में फोरमैन व इसके साथ कापी एडिटर के पद से सेवानिवृत्त हुए। मेरे नाना सुखलाल त्यागी की हिन्दी की गुणवत्ता ने ही इस उड़ान की मुकाम में मेरी उंचाई में चार चांद लगा दिए। शिरोमणि एवं गोल्डमेडलिस्ट मामा डॉक्टर संजय त्यागी व ममेरे भाई डाक्टर अनुराग त्यागी एडवांस एजुकेशन व बदलता सलेब्स, बदलती टेक्नोलॉजी के बारे बहुत सहायता करते हैं। 
मानवी त्यागी की माता इन्दु त्यागी व पिता अमित त्यागी दोनों शिक्षक हैं, भविष्य निर्माण के बारे में उनका कहना है। मेरे माता-पिता द्वारा दिया गया मेरा एक ही उद्देश्य है कि अब मुझे सिविल सर्विसेज की तैयारी कर देश सेवा का ही लक्ष्य बनायें रखना है तथा मेरे 96.8 प्रतिशत का श्रेय मेरे माता-पिता इन्दु त्यागी, व अमित त्यागी को ही जाता है, जो हर महीने मेरे पाठ्यक्रम का रिपोर्ट-कार्ड पर उनकी विशेष नज़र रहती थी।
सिविल सर्विसेज अथवा (सीडीएस) कंबाईड डिफेंस सर्विस की प्रेरणा देते हुए मेरे पिता अमित त्यागी का कहना हैं सीडीएस का चयन ही देश की सच्ची सेवा है। मानवी त्यागी का कहना है कि मुजफ्फरनगर जिले में दसवीं कक्षा में 12वां स्थान हासिल किया है, बारहवीं क्लास में जिले में प्रथम आने का आश्वासन देकर, अपने स्कूल के सभी छात्र/छात्राओं व अपने सभी शिक्षकों का आभार व्यक्त किया।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद स्कूल ने 10वीं में भी दिए शानदार नतीजे

  • पिछले वर्ष के मुकाबले 7 प्रतिशत अधिक छात्र हुए उत्तीर्ण,
  • स्कूल का रिजल्ट रहा 70.5 प्रतिशत
  • मुजाहिद ने 90.2 प्रतिशत के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया, दीपक कुमार ने 73.4 प्रतिशत के साथ द्वितीय और मौ. जैद 67.4 प्रतिशत के साथ तृतीय स्थान प्राप्त किया।
  • सभी विषयों में बच्चों ने अच्छे अंक प्राप्त कर अध्यापकों का नाम रोशन किया

संवाददाता

नई दिल्ली। राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद शास्त्री पार्क का इस बार सीबीएसई की 10वीं का परीक्षा परिणाम 70.5 प्रतिशत रहा जो पिछले वर्ष से 7 प्रतिशत अधिक है। जहां स्कूल का रिजल्ट पिछले वर्ष 63.5 प्रतिशत था वहीं यह अब 70.5 प्रतिशत हो गया है। जिसका श्रेय यहां के प्रधानाचार्य चांद बाबू व उनके स्टाफ (अध्यापकों) को जाता है जिन्होंने कम सुविधा में भी स्कूल के रिजल्ट में काफी सुधार किया है, जो लगातार जारी है। जहां 2019 में स्कूल का रिजल्ट 63.5 प्रतिशत था वहीं यह इस वर्ष बढ़कर 70.5 प्रतिशत हो गया है। इस परीक्षा में मुजाहिद ने 90.2 प्रतिशत के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया, दीपक कुमार ने 73.4 प्रतिशत के साथ द्वितीय और मौ. जैद 67.4 प्रतिशत के साथ तृतीय स्थान प्राप्त किया।
इस परीक्षा परिणाम पर स्कूल के प्रधानाचार्य चांद बाबू का कहना है कि हमारा स्कूल लगातार अपना शानदार प्रदर्शन कर रहा है जिसमें अध्यापकों की मेहनत रंग ला रही है जिसका परिणाम आपके सामने है। मैं अध्यापकों, छात्रों व उनके अभिभावकों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने कम सुविधा होने पर मुझ पर विश्वास किया और मेरा साथ नहीं छोड़ा। मैं आशा करता हूं कि आने वाले वर्षों में इससे भी अच्छा रिजल्ट आएगा।



मंगलवार, 14 जुलाई 2020

सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद स्कूल का रिजल्ट रहा 100 प्रतिशत

  •  दूसरे वर्ष भी स्कूल का रिजल्ट रहा 100 प्रतिशत
  • मो. सादिक (92.8%) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, मो. सितारे (89.4%) ने द्वितीय और मो. सलमान ने (79%) तृतीय स्थान प्राप्त किया।
  • सभी विषयों में बच्चों ने अच्छे अंक प्राप्त कर अध्यापकों का नाम रोशन किया

संवाददाता

नई दिल्ली। राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद शास्त्री पार्क का लगातार दूसरे वर्ष भी सीबीएसई का 12वीं का परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत रहा। जहां स्कूल का रिजल्ट पिछले वर्ष 100 प्रतिशत था वहीं इस बार भी यह 100 प्रतिशत हो गया है। जिसका श्रेय यहां के प्रधानाचार्य चांद बाबू व उनके स्टाफ (अध्यापकों) को जाता है जिन्होंने लगातार दूसरे वर्ष भी 12वीं का परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत रखा। जहां 2017 में स्कूल का रिजल्ट 41 प्रतिशत, 2018 में 93 प्रतिशत, 2019 में यह बढ़ कर 100 प्रतिशत हो गया और इस 
वर्ष भी 100 प्रतिशत है।
इस वर्ष मो. सादिक (92.8%) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, मो. सितारे (89.4%) ने द्वितीय और मो. सलमान ने (79%) तृतीय स्थान प्राप्त किया। वहीं पिछले वर्ष 2019 में रिज़वान ने 87.6 प्रतिशत अंक के साथ प्रथम स्थान, द्वितीय स्थान मोहम्मद ज़ैद 82.8 प्रतिशत तथा तृतीय स्थान मोहम्मद आसिफ 81.4 प्रतिशत नेे प्राप्त किया था।
इस परीक्षा परिणाम पर स्कूल के प्रधानाचार्य चांद बाबू का कहना है कि हमारा स्कूल लगातार अपना शानदार प्रदर्शन कर रहा है जिसमें अध्यापकों की मेहनत रंग ला रही है जिसका परिणाम आपके सामने है। मैं अध्यापकों, छात्रों व उनके अभिभावकों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने कम सुविधा होने पर मुझ पर विश्वास किया और मेरा साथ नहीं छोड़ा। मैं आशा करता हूं कि आने वाले वर्ष में भी ऐसा रिजल्ट आएगा और हमारा स्कूल भी दिल्ली के टॉप स्कूलों में गिना जाएगा।

रविवार, 28 जून 2020

डेसू मजदूर संघ ने चीनी सामान व चीनी राष्ट्रपति का पोस्टर जला विरोध किया

संवाददाता 

 नई दिल्ली। डेसू मजदूर संघ ने आईटीओ स्थित बीएसईएस के ऑफिस के बाहर डेसू मजदूर संघ के पदाधिकारियों व सदस्यों ने चीन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए चीनी सामान व चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पोस्टर जलाए का पुतला फूंका और चीनी सामान का पूरी तरह से बहिष्कार की मांग की। डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव की अगुवाई में एक रैली निकालकर गलवन घाटी में शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि के बाद चीन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। 

 डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने कहा कि भारत का हर नागरिक चीनी सामान का बहिष्कार कर एक सिपाही की ही भूमिका निभाएं। वहीं गलवान घाटी में शहीद हुए 20 सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का फोटो जलाकर विरोध प्रदर्शन किया।

डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने मोदी सरकार से मांग किया कि चीनी वस्तुओं के आयात से संबंधित लाइसेंस को तुंरत तत्काल निरस्त किए जाए। उन्होंने कहा कि जिन कंपनियों को चीन से सामान आयात करने के लाइसेंस दिए गए हैं। उसे तुरंत प्रभाव से निरस्त किए जाएं ताकि भारत के नागरिकों द्वारा चलाए जा रहे चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन पूर्ण रूप से सफल हो सके। उन्होंने आगे कहा कि हमें अपने देश में बने सामानों का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि चीन ने जो दुस्साहस किया है उसके लिए देश का हर व्यक्ति अब आर्थिक तौर पर उसका जवाब देगा।
इस मौके पर डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष श्री किशन यादव, महामंत्री सुभाष चन्द, ऋषि पाल,  अब्दुल रज्जाक, सभाजीत पाल, दिनेश,  सैन्तुल त्यागी, अशोक आदि मौजूद थे।



शुक्रवार, 26 जून 2020

इस तरह का विरोध और उपहास उचित नहीं

अवधेश कुमार

पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड द्वारा कोरोना संक्रमण को ठीक करने के दावे के साथ कोरेानिल नाम की औषधि सामने लाने के साथ देश में जिस तरह तूफान खड़ा किया गया है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। कोई नहीं कहता कि उस दवा के बारे में स्वामी रामदेव या अन्य लोग जो दावा कर रहे हैं उसे आंख मूंदकर स्वीकार कर लीजिए, लेकिन इस तरह का उपहास उड़ाना, उसे एक धोखाधड़ी बताना तथा अभियान चलाकर बदनाम करने की कोशिश किसी दृष्टि से तार्किक, मानवीय और उचित नहीं माना जा सकता। स्वामी रामदेव के पूर्व तीन कंपनियों ने एलोपैथी औषधियां बाजार में उतारी तो कोई हंगामा नहीं हुआ। हालांकि उन औषधियों से कोराना का संक्रमण दूर हो जाएगा इसकी गारंटी न कंपनी दे रही और न उसका उपयोग करने वाले डॉक्टर। प्रश्न है कि अगर पंतजलि आयुर्वेद यह दावा कर रहा है उसने इसका क्लिनिकल ट्रायल किया है, जिसमें उसे सफलता मिली है तो उसका परीक्षण करने में हर्ज क्या है? उनका दावा है कि कोरोना संक्रमित मरीजों पर परीक्षण के दौरान आरंभिक3-4 दिनों में 69 प्रतिशत और सात दिनों में 100 प्रतिशत मरीजों को स्वस्थ करने में सफलता मिली है। बिना इसकी जांच परख किए एगाबरगी झूठ करार दे देने का औचित्य क्या है? उत्तराखंड सरकार ने उस दवा को बेचने की स्वीकृति भी प्रदान की है।  

आयुष मंत्रालय ने तत्काल उस दवा के प्रचार और बिक्री को रोक दिया है। यह उसके अधिकार क्षेत्र में आता है और उसे अपने मानकों पर संतुष्ट होना ही चाहिए। उसने कहा है कि दवा से जुड़े वैज्ञानिक दावे के अध्ययन और विवरण के बारे में मंत्रालय को कुछ जानकारी नहीं है। पतंजलि को अनुसंधान, कोरोनिल में डाले गए जड़ी-बुटियों सहित नमूने के आकार, स्थान आदि सारी जानकारियों के साथ उन अस्पतालों का ब्योरा देने को कहा गया है, जहां अनुसंधान अध्ययन किया गया। संस्थागत नैतिकता समिति की मंजूरी भी दिखाने को कहा गया है। मंत्रालय उत्तराखंड सरकार के सम्बंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण से इस दवा को स्वीकृति देने संबंधी आदेश की कॉपी मांगी गई है। यह बिल्कुल उचित कदम है। मंत्रालय के बयान के एक अंश पर नजर डालिए, ‘संबद्ध आयुर्वेदिक औषधि विनिर्माता कंपनी को सूचित किया गया है कि आयुर्वेदिक औषधि सहित दवाइयों का इस तरह का विज्ञापन औषधि एवं चमत्कारिक उपाय (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 तथा उसके तहत आने वाले नियमों और कोविड-19 के प्रसार के मद्देनजर केंद्र सरकार की ओर से जारी निर्देशों से विनियमित होता है। ’ पतंजलि की ओर से भी आयुष मंत्रालय को पूरी जानकारी दे दी गई है। इसके अनुसार यह दवा पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट और नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, जयपुर ने मिलकर बनाई है। उनका दावा है कि क्लििनिकल कंट्रोल ट्रायल के लिए उन्होंने सारी स्वीकृतिंया लीं तथा रैंडमाइज्ड प्लेसबो कंट्रोल्ड क्लीनिकल ट्रायल के जितने भी मानक परिमितियां हैं, उन सभी को शत-प्रतिशत पूरा किया गया है। पहले एथिकल स्वीकृति ली गई, फिर भारत की क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री से ट्रायल की अनुमति मिली और इसके बाद दवा का ट्रायल शुरू हुआ। इसके अनुसार इंदौर और जयपुर में 280 मरीजों पर इसका ट्रायल किया गया। 

हम इन सारी बातों को बिना जांच किए झूठ कैसे कह सकते हैं? आयुष मंत्रालय का बयान बिल्कुल स्पष्ट है। उससे साफ होता है कि मंत्रालय नियमों को लेकर कितना सतर्क और सख्त है। इससे कोरोना जैसी नई बीमारी के प्रति उसकी संवेदनशीलता और जिम्मेवारी भी झलकती है। जाहिर है, फैसला आयुष मंत्रालय को करने देना चाहिए। मंत्रालय जब तक सारे मापदंडों पर परख नहीं लेगा कोरोना दवा के रुप में इसकी स्वीकृति नहीं दे सकता। जैसा हम जानते हैं भारत में आयुर्वेदिक दवाओं को मंजूरी देने का जिम्मा आयुष मंत्रालय के पास है। केन्द्रीय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद या सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज पूरी प्रक्रिया पर नजर रखती है।  एलोपैथिक दवाओं को स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशालय डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसिज के तहत आने वाले केन्द्रीय औषधिक मानक नियंत्रण संगठन या सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन स्वीकृति प्रदान करती है। इसी ने तीन कंपनियों की तीन एलापैथी दवाओं की स्वीकृति दी है। किंतु यहां कुछ बातें समझने की आवश्यकता है। आयुर्वेद एवं एलौपैथ प्रणाली में अनुसंधान, दवाओं के निर्माण, रोगों के निर्धारण, उनका उपचार आदि में मौलिक अंतर है। आयुर्वेद हमारे यहां लंबी और गहन साधाना, प्रयोगों, अनुभावों से आगे बढ़ीं और सशक्त हुईं। इसके लिए किसी डिग्री आदि की अवश्यकता नहीं थी। आयुर्वेद के जितने प्राचीन मानक ग्रंथ हैं वे सब ऋषि-मुनियों द्वारा रचित हैं। हमने आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुरुप आयुर्वेद के शिक्षालय अवश्य स्थापित किए, जो आवश्यक थे। अध्ययन, अनुसंधान और उपचार के लिए कुछ बड़े संस्थान भी खड़े किए गए हैं और किए जा रहे हैं। लेकिन आज भी हजारों ऐसे लोग हैं जो स्वयं जड़ी-बुटियों-वनस्पतियों से लेकर हमारे सामने उपलब्ध खाने-पीने की वस्तुओं से उपचार करते हैं और अनेक बार उसके चमत्कारिक परिणाम सामने आते हैं। काफी संख्या में ऐसे लोग हैं जो बताते हैं कि वे सारा इलाज करके हार गए थे, लेकिन फलां जगह के एक वैद्य ने या किसी गांव के बिना डिग्रीधारी व्यक्ति ने जड़ी-बुटियों, भस्मों से हमें ठीक कर दिया। कहने का तात्पर्य यह कि आयुर्वेद की किसी प्रक्रिया को समझने और जांचने का मानक वह नहीं हो सकता जो एलोपैथ का है। दोनों अलग-अलग स्वरुप की विधाएं हैं। इसका इस विधा के अनुरुप ही परीक्षण और अध्ययन करना होगा। आखिर जब एलोपैथ या दूसरी पैथियों की परख आयुर्वेद की कसौटियों के अनुसार नहीं हो सकती तो आयुर्वेद की दूसरी पैथियों के अनुसार क्यों होना चाहिए?

कोरोनिल कारगर दवा है या नहीं यह प्रश्न तो एक कंपनी से जुड़ा हुआ है और अब आयुष मंत्रालय को फैसला करना है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में यह दुखद तथ्य फिर सामने आया है कि हम अपने यहां गहन साधना से विकसित विधाओं को लेकर आत्महीनता के शिकार हैं। उपार की हर पैथी की अपनी विशेषता है और उसे स्वीकार करना चाहिए। किंतु आयुर्वेद एलोपैथ की तरह कोई नया आविष्कार नहीं कर सकता ऐसी सोच हमारी आत्महीनता को दर्शाती है। दूसरे, एलोपैथी दवाओं का ऐसा ताकतवर समूह है जो दूसरी पैथी को आसानी से मैदान में उतरने नहीं देता। वे अपनी दृष्टि से तरह-तरह के प्रश्न उठाते हैं तथा सरकारी तंत्र एवं बुद्धिजीवी उन्हीं मानकों पर आयुर्वेद को खरा उतरते देखना चाहते हैं। हम यह क्यों मान लेते हैं कि आयुर्वेद में ऐसी बीमारी की दवा विकसित नहीं हो सकती जिसमें एलोपैथ विफल हो रहा हो? कोरोना काल में ही हम देख रहे हैं कि करोड़ों लोग आयुर्वेदिक पद्धति के काढ़े का इस्तेमाल करके स्वयं को बचाए हुए हैं। हमने कोराना संक्रमित ऐसे मरीजों के बयान देखे हैं जो बता रहे हैं कि जब उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने वैद्यों की सलाह के अनुसार फलां-फलां जड़ी-बुटियों-वनस्पतियों का सेवन आरंभ किया और धीरे-धीरे बीमारी से मुक्त होते गए। जब कोई उसका आधुनिक विज्ञान की पद्धति से परीक्षण करेगा तो शायद परिणाम भी उसी तरह आएंगे जैसा ठीक होने वाले संक्रमित लोग बता रहे हैं। किंतु हम यह मानकर कि आयुर्वेद से कोरोना संक्रमण ठीक हो ही नहीं सकता इन सारे लोगों को झूठा करार देें यह तो किसी तरह तार्किक और नैतिक व्यवहार नहीं हुआ। हालांकि सरकार ने भी अब यही नीति बनाई है कि जिस भाषा में दुनिया समझती है उसी भाषा में उसे आयुर्वेद को समझाया जाए। पिछले दिनों केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि हम अपनी प्राचीन विद्या को बिल्कुल वैज्ञानिक तरीके से साबित करके दुनिया के सामने रखेंगे। दुनिया को जवाब देने के लिए यह नीति सही है और पतंजलि भी दावा कर रही है कि उसने इसीलिए उसका उसी तरीके से क्लिनिकल ट्रायल किया है। तो देखते हैं। किंतु ध्यान रखिए, आयुर्वेद में इस तरह के क्लििनिकल ट्रायल की न परंपरा रही है और न इसका ऐसा ढांचा विकसित हुआ। अब ऐसा करने की कोशिश हो रही है और यह सही है लेकिन आयुर्वेदिक या जड़ी-बुटियों से बने मिश्रणों के प्रभावों को परखने का एकमात्र तरीका यह नहीं हो सकता। वैसे भी कोरोनिल में जिन जड़ी-बुटियों मसलन, गिलोय, अश्वगंधा, तुलसी आदि के मिश्रण हैं उनसे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने की बात आयुष मंत्रालय भी मानता है। इनका काढ़ा तो लोग पी ही रहे हैं।  आयुष मंत्रालय ने इसके प्रचार और बिक्री पर रोक लगाई है तो उसे तीव्र गति से स्थापित मानकों पर इसकी पूरी जांच और परीक्षण करना चाहिए। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पलेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208


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