मंगलवार, 12 मई 2020

समस्त कनेक्ट फाउंडेशन ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के शास्त्री पार्क क्षेत्र में बांटी राशन किट

संवाददाता 
नई दिल्ली। शिक्षा और राहत कार्यों के क्षेत्र में कार्यरत दिल्ली स्थित सामाजिक संगठन, समस्त कनेक्ट फाउंडेशन ने आज शहर के उत्तर पूर्वी जिले के शास्त्री पार्क क्षेत्र में कोविड-19 और लॉक डाउन के मद्देनजर गरीब मजबूर परिवारों के बीच खाने पीने और रोज़मर्रा की ज़रूरी वस्तुएं वितरित किए। 
इस अभियान के अन्तर्गत तृतीय चरण में विशेष रूप से 71 परिवारों में ज़रूरी वस्तुएं, क्षेत्रीय लोगों की उपस्थिति में और सुरक्षा और स्वास्थ्य के सभी नियमों को क्रियान्वित करते हुए वितरित हुईं।
संस्था के निदेशकों श्री ज़फ़र इमाम खान, श्रीमति विनीता सूद और श्री जितेन्द्र प्रसाद केशरी, समाजसेवी श्री मुदस्सिर खान, श्री मोहम्मद रियाज़, श्री आज़ाद, श्री अब्दुल रज़्ज़ाक़, श्री मोहम्मद एजाज,  समाजसेविका श्रीमति शकीला उर्फ रिहाना दाई आदि ने क्षेत्रीय लोगों का राहत सामग्री के सफलतापूर्वक वितरण के लिए आभार प्रकट किया।
संस्था पहले भी लॉकडाउन में जरूरतमंदों को  कई जगहों पर खाद्य सामग्री बांट चुकी है। 
इस बार भी संस्था द्वारा राशन किट बनाकर दी गई जिसमें आटा, चावल, चीनी, 2 तरह की दालें, आलू, प्याज, बेसन, चना, कचरी, नमक, तेल, 3 तरह के मसाले, चाय पत्ती, सेवई, नहाने का साबुन, बर्तन धोने का साबुन, कपड़े धोने का सर्फ, बिस्कुट।
 





 

शुक्रवार, 8 मई 2020

जिम्मेवारी से लोग वापस जाएं

अवधेश कुमार

केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में फंसे लोगों को उनके गृह राज्यों में भेजने की हरि झंडी से स्वाभाविक ही लाखों लोगों को तत्काल राहत अनुभव हुआ होगा। कई राज्य सरकारों और केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए भी यह एक बड़ी समस्या से निजात पाने की हरि झंडी जैसी है। गृहमंत्रालय ने अपने आदेश में कहा है कि सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश अपने यहां फंसे लोगों को उनके गृह राज्यों में भेजने के लिए एक मानक प्रॉटोकॉल तैयार करें। यह साफ है कि केन्द्र ने अपनी इच्छा से इसकी अनुमति नहीं दी है। जो स्थिति पैदा हो गई थी उसमें उसके पास एक ही विकल्प का था कि इसके लिए कोई रास्ता निकाला जाए। दूसरे राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में रहने वाले लोगों के समूहों ने जिस तरह ऑन लाइन अभियानों से लेकर, सोशल मीडिया का इस्तेामल करते हुए इसे मानवीय मुद्दा बना दिया था, कई जगहों पर सोशल डिसटेंसिंग तक तोड़कर बाहर निकल आ रहे थे, कहीं-कहीं सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए धरना और अनशन तक करने लगे थे उसमें राज्यों में भी समस्याएं पैदा हो रहीं थी। कई राज्य सरकार केन्द्र से मांग कर रहे थे कि उन्हें अपने यहां से लोगों को बाहर निकालने या अपने लोगों को लाने की अनुमति दी जाए। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने इसके लिए विशेष रेल की व्यवस्था की मांग की थी। इस पर राजनीति शुरु हो गई थी सो अलग। मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की वीडियो कॉन्फ्रेंस से आयोजित बैठक में भी यह मुद्दा उठा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके लिए एक स्पष्ट प्रोटोकॉल की मांग की।  शायद सरकार ने लाकडाउन खत्म होने के बाद किसी अफरातफरी की स्थिति से बचने के इरादे से भी ऐसा किया हो। 

बहरहाल,  लोगों की वापसी हो रही हैओ इसक दिशानिर्देश और खाका हमारे सामने है। इसके आधार पर अलग अलग राज्यों मे फंसे मजदूर, छात्र, तीर्थयात्री, पर्यटक बसों व रेलों से घर लौट सकते हैं। वैसे इस अनुमति का अर्थ यह नहीं है कि कोई कहीं से निकलकर अपने मूल गांव या शहर चला जाएगा। यह काम राज्यों को करना है। अगर कहीं पर कोई समूह फंसा हुआ है और वह अपने मूल निवास स्थान जाना चाहता है तो राज्य सरकारें आपसी सहमति के साथ इसकी व्यवस्था कर सकतीं हैं। गृहमंत्रालय का जो दिशानिर्देश हमारे सामने है उसके अनुसार वापसी की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए राज्य नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करेंगे। वापस जाने वाले सभी लोगों का पंजीकरण करना होगा। नोडल अधिकारियों की जिम्मेदारी होगी कि वह फंसे हुए लोगों का रजिस्ट्रेशन कराएं। वापसी की प्रक्रिया शुरू होने के पहले सभी की स्क्रीनिंग की जाएगी और जिनमें कोरोना के लक्षण नहीं होंगे, सिर्फ उन्हें ही इजाजत की जाएगी। वापसी के बाद उनका एक बार फिर से स्वास्थ्य परीक्षण किया जाएगा। उन्हें 14 दिन तक क्वारेंटाइन में रहना होगा। गृहमंत्रालय ने इन सभी के मोबाइल में आरोग्य सेतु एप को डाउनलोड करने को कहा है ताकि क्वाररंटीन के दौरान उन पर नजर रखी जा सके। स्थानीय स्वास्थ्य कर्मी इन सभी के स्वास्थ्य की समय-समय पर जांच करते रहेंगे।पहले दिशानिर्देश मे केवल बस का उल्लेख किया गया था लेकिन राज्यों की मांग पर रेलों की अनुमति मिल गई। 

देखा जाए तो गृहमंत्रालय ने अपने दिशानिर्देश में पूरी कोशिश की है जिससे एक दूसरे के संपर्क में आकर संक्रमित होने, किसी संक्रमित के वापस जाने या फिर वापस जाने के बाद स्वास्थ्यकर्मियों की नजर से दूर रहने की संभावना न रहे। राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में पहुंचने वाले लोगों का पूरा ब्यौरा रखा जाएगा तथा आरोग्य सेतु से उन पर नजर भी। बसों और रेलों को सैनिटाइज किया जाएगा। साथ ही इसमें बैठने के दौरान शारीरिक दूरी के नियम को सख्ती से अपनाए जाने की भी बात है जो संभव है। जहां से चलेंगे वहां और जहां पहुंचेंगे वहां अगर स्वास्थ्य विभाग की टीम उनकी जांच करेगी तो किसी के संक्रमित होकर परिवार और समाज में घुल मिल जाने की संभावना ही नहीं रहेगी। इसी तरह उनको 14 दिनों के लिए आइसोलेशन या कोरंटाइन करने से भी खतरा कम हो जाएगा। जरूरत पड़ी तो उन्हें अस्पतालों/स्वास्थ्य केंद्रों में भी भर्ती किया जा सकता है। उनकी समय-समय पर जांच होती रहेगी। लोगों को किस रास्ते से ले जाना है यह तक करने की जिम्मेवारी भी राज्य सरकारों की हैं। इसमें निश्चित रुप से यह ध्यान रखा जाएगा कि हॉटस्पॉट या संक्रमित क्षेत्रों से बचकर बसों को निकाला जाए। तो जोखिम से बचने के सारे संभव उपाय किए गए हैं। 

यहां ध्यान रखने की बात है कि इसके पहले भी केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के बीच कई तरह की छूट का ऐलान किया है। संक्रमित क्षेत्रों को छोड़कर कपड़ा उद्योग, निर्माण, रत्न एवं आभूषण जैसे 15 बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में काम शुरू करने की छूट दी थी। कृषि कार्य, ग्रॉसरी की दुकानें खोलने, फल-सब्जी बेचने वाले, स्टेशनरी, इलेक्ट्रीशियन-मैकेनिक, प्लंबर आदि को भी छूट दी जा चुकी थी। अब इन छूटों का काफी विस्तार हो गया है। तो धीरे-धीरे कोरोना प्रकोप से बचने का विचार करते हुए आर्थिक और अन्य आवश्यक गतिविधियांें की आजादी मिली है। लेकिन इन छूटों और लोगों की एक राज्य/केन्द्रशासित प्रदेशों से दूसरी जगह ले जाने में मौलिक अंतर है। ध्यान रखिए, लाख मांगों के बावजूद बड़े बाजारों, मौल एवं मल्टीप्लेक्स आदि को अभी खोलने की अनुमति नहीं है। अगर किसी क्षेत्र में उद्योग, काश्तकारी या दूकानों की खोलने की अनुमति है और वहां कोई संक्रमित पाया जाता है तो उसे आसानी से मिनट में बंद कराया जा सकता है। किंतु एक बार देश के अलग-अलग राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों से लोगों का आवागमन आरंभ हो गया तो किसी विपरीत परिस्थिति में भी इनको अचानक पूरी तरह रोक देना कठिन होगा। हमने दिल्ली से महाराष्ट्र के मुंबई, ठाणे, पुणे, गुजरात, केरल तथा कर्नाटक के कई स्थानों पर उग्र भीड़ और प्रदर्शन देखे हैं। इसमें कई तरह के जोखिम और भी हैं। मसलन, जाते समय भारी समूह का या गंतव्य तक पहुंचने के बाद स्वास्थ्य परीक्षण ठीक प्रकार से हर जगह किया ही जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। संभव है अनेक जगह केवल औपचारिकताएं पूरी की जाएं। दूसरे, घर पहुंचने के बाद स्वयं व्यक्ति परिवार में आइसोलेशन में 14 दिनों रहने के आत्मानुशासन का वचन निभा पाएगा इसमें भी संदेश की गुंजाइश है। सबसे बड़ी बात कि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि किस राज्य से कितन लोग कहां जाएंगे। उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, झारखंड,पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश के ही कई करोड़ लोग काम के सिलसिले में दूसरे राज्यों में हैं। पढ़ाई के लिए तो है हीं। लौकडाउन के बीच इस तरह इतनी संख्या में लोगों को लाने-ले जाने का अनुभव हमें नहीं है।   

कायदे से तो यह स्थिति पैदा ही नहीं होनी चाहिए थी। पर्यटन या तीर्थाटन या किसी वाणिज्यिक या पेशागत यात्रा पर  आए फंसे लोगों की समस्याएं समझ आ सकतीं हैं। हालांकि कोविड 19 जैसे खतरनाक महामारी की आपात स्थिति में अपनी जान बचाने के लिए जहां हैं वहीं रहना जरुरी है। इसमें कष्ट और समस्याएं आ रहीं हैं लेकिन अपने और परिवार की जान जोखिम में डालने की बजाय इसे सहन करना ही बेहतर विकल्प होता। फिर भी इस श्रेणी के लोगों की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता था। किंतु जो लोग कहीं लंबे समय से काम कर रहे हैं या छात्र हैं आरंभ से ही उनकी उचित व्यवस्था तथा काउंसेलिंग के द्वारा तस्वीर बदली जा सकती थी। कई राज्य सरकारें इसमें विफल रहीं हैं। बेसहारा लोग हजारों मील दूर पैदल निकल पड़े, कुछ त्रासदियां भी हुईं। राजस्थान के कोटा का उदाहरण लीजिए। वह कोचिंग का हब है। अरबों का कारोबार है। राज्य को खासा आमदनी होती है एवं हजारों को रोजगार मिलता है। यह सरकार की जिम्मेवारी थी कि कुछ अधिकारियों को छात्रों से संपर्क और संवाद में लगाएं, उनकी काउंसेलिंग करे तथा समस्याओं के समाधान की कोशिश। छात्र जो कुछ बता रहे हैं उनसे साफ है कि उनको उनके हवाले छोड़ दिया गया। इसी तरह दिल्ली या मुंबई में कामगारों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति तथा उनसे स्थानीय अधिकारियों के संपर्क के अभाव ने विकट स्थिति पैदा की। मुंबई के धारावी में अभी तक आवश्यक राशन सभी को उपलब्ध नहीं हो सका है। खाने तक के लाले हो जाएं और उस पर बीमारी का भय तो कौन रुकना चाहेगा। हालांकि ऐसे भी मामले देखने में आए जहां सारी व्यवस्थाओं के बावजूद लोगों ने रुकना पंसद नहीं किया। एक कारण केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा राहत एवं सहायता भी है। शहरों मंें जिसके पास न राशन कार्ड है, न पहचान पत्र और न बैंक खाता उनको लाभ नहीं मिल रहा। गांव या अपने मूल शहर जाते ही उनको सारे लाभ मिल जाते हैं। जो भी हो अब जब हरि झंडी मिल गई है तो उसको पूरी सतर्कता से अंजाम देने की कोशिश होनी चाहिए। पूरी जिम्मेवारी से यह काम करना होगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

समस्त कनेक्ट फाउंडेशन द्वारा जरूरतमंदों के बीच बांटी गई आवश्यक सामग्री

संवाददाता
 
नई दिल्ली। शिक्षा और राहत कार्यों के क्षेत्र में कार्यरत दिल्ली स्थित सामाजिक संगठन, समस्त कनेक्ट फाउंडेशन ने आज शहर के भजनपुरा और सीलमपुर क्षेत्रों में covid-19 और लॉक डाउन के मद्देनजर गरीब बेसहारा परिवारों के बीच खाने पीने और रोज़मर्रा की ज़रूरी वस्तुएं  वितरित किया। 
इस अभियान के अन्तर्गत बुलंद मस्जिद कालोनी में विशेष रूप से 55 परिवारों में ज़रूरी वस्तुएं, क्षेत्रीय लोगों की उपस्थिति में और सुरक्षा और स्वास्थ्य के सभी नियमों को क्रियान्वित करते हुए वितरित हुई।
संस्था के निदेशकों श्री ज़फ़र इमाम खान, श्रीमति विनीता सूद और श्री जितेन्द्र प्रसाद केशरी, समाजसेवी श्री मुदस्सिर खान, श्री मोहम्मद रियाज़, श्री आज़ाद, श्री अब्दुल रज़्ज़ाक़, श्री मोहम्मद एजाज,  समाज सेविका श्रीमति शकीला उर्फ रिहाना दाई आदि ने क्षेत्रीय लोगों का कार्य के सफलतापूर्वक निष्पादन के लिए आभार प्रकट किया।
संस्था पहले भी लॉकडाउन में जरूरतमंदों को  कई जगहों पर खाद्य सामग्री बांट चुकी है। इस बार संस्था द्वारा प्रत्येक राशन किट में 5 किलो आटा, 5 किलो चावल, 2 किलो चीनी, 1 किलो मसूर की दाल, 1 किलो चने की दाल, 2 किलो आलू, 2 किलो प्याज, आधा किलो बेसन, आधा किलो काले चना, आधा किलो कचरी, 1 किलो नमक, 1 किलो सरसो के तेल की शीशी, 100 ग्राम मिर्च, 100 ग्राम हल्दी, 100 ग्राम धनिया, 100 ग्राम चाय पत्ती, 250 ग्राम सेवई, 2 नहाने वाले साबुन, 2 कपड़े धोने वाले साबुन इत्यादि चीजें दी गईं।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

संतों की हत्या पर राष्ट्रीय आक्रोश स्वाभाविक

अवधेश कुमार

महाराष्ट्र के पालघर में दो निर्दोष, निरपराध संतों की भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या का दृश्य देखकर पूरे देश में आक्रोश व्याप्त है। सच यही है कि अगर लॉकडाउन नहीं होता तो अभी तक साधू-संत, उनके समर्थक और देश के आम लोग भारी संख्या में सड़कांें पर होते। इस तरह किसी निरपराध, निर्दोष संन्यासी की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाए और देश में आक्रोश नहीं हो तो फिर यह मरा हुआ समाज ही कहलाएगा। महाराष्ट्र सरकार कह रही है कि उसने काफी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया है और भी गिरफ्तारियां होंगी तथा किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा। सच है कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 100 से ज्यादा लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। जिस तरह के वीडियो सामने आए हैं उन्हें देखकर तो विश्वास ही नहीं होता कि किसी कानून के राज में ऐसा भी हो सकता है। हालांकि हमने भीड़ की हिंसा के भयावह और दिल दहला देने वाले दृश्य पहले भी देखें और हर बात वेदना और क्षोभ पैदा हुआ है। उसका असर भी हुआ है। दोषी पकड़े गए हैं। उनको सजाए भी हुईं हैं। किंतु इस एक घटना ने फिर से कई प्रश्न उभार दिए हैं जिनका उत्तर हमें तलाशना ही होगा। 

इस पूरे प्रकरण को देखने के बाद पुलिस की विफलता और उसकी ओर से कोताही साफ झलकती है। इसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। 14 अप्रैल की रात नौ बजे के आसपास की घटना है। आखिर उस समय इतना विलंब नहीं हुआ था कि इसकी सूचना जिला, प्रमंडल और उससे उपर पहुंचाई न जा सके। अगर यह सूचना पहुंची तो जिला प्रशासन, जिला पुलिस प्रशासन तथा उसके उपर के अधिकारियों ने क्या किया यह प्रश्न पूरा देश पूछ रहा है। क्या मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे एवं गृह मंत्री देशमुख तक यह सूचना पहुंची ही नहींअगर पहुंची तो उनको भी स्पष्ट करना चाहिए कि तत्काल उन्होंने क्या कदम उठाए या क्या निर्देश दिए। ध्यान रखिए, पुलिस की दैनिक विज्ञप्ति में यह घटना 17 अप्रैल को भी शामिल नहीं था। क्यों? 18 तारीख को यह विज्ञप्ति में शामिल हुई और उसमें भी यह जितनी बड़ी घटना है उतनी बड़ी नहीं बताई गई। इसका अर्थ क्या है? क्या जिला प्रशासन इसे मामूली घटना मानकर इतिश्री करने की राह पर था? इसी रुप में उपर के अधिकारियों एवं राजनीतिक नेतृत्व को सूचित किया गया? लगता तो ऐसा ही है। सारे बयान वीडियो वायरल होने के बाद आ रहे हैं। इसका तो अर्थ हुआ कि वीडियो अगर वायरल नहीं होता तो इसे मामूली भीड़ की हिंसा या सामान्य दंगा आदि का स्वरुप देकर फाइलों में बंद कर दिया जाता। 

पुलिस और प्रशासन के इस रवैये से गुस्सा ज्यादा पैदा होता है। पालघर के जिस क्षेत्र में यह घटना हुई वहां से चिंतित करने वाली खबरें बीच-बीच में आतीं रहीं हैं। वहां माओवादियों की गतिविधियों की भी सूचनाएं रहीं हैं। धर्मांतरण पर भी विवाद हुआ है। उस क्षेत्र में कम्युनिस्टों का प्रभाव भी है तभी तो स्थानीय विधानसभा से माकपा के उम्मीदवार लगातार विजयी होते रहे हैं। ध्यान रखने की बात है कि 14 अप्रैल को कोरोना पर काम के लिए गई डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की टीम पर भी भीड़ ने वहां हमला किया था। उस टीम में शामिल डॉक्टर का कहना है कि किसी तरह वे जान बचाने में सफल हो गए अन्यथा हमला पूरा जानलेवा था। निश्चित ही इसकी सूचना पुलिस एवं प्रशासन को थी। इसका जवाब तो उसे देना ही होगा कि इसके बाद उसने वहां सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने के लिए क्या कदम उठाए? किंतु यहा राजनीतिक नेतृत्व का दायित्व था कि विस्तार से पता लगाए कि क्या और कैसे हुआ? उसके साथ त्वरित कदम उठाए एवं देश को आश्वस्त करे। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमित हैं। कोरोना से मृतकों की संख्या में वह पहले स्थान पर है। ऐसे राज्य मे ंतो कोरोना मामलों का पता लगाने, उससे बचाव के लिए कोरंटाइन करने तथा उपचार में लगे डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की टीम की सुरक्षा की ज्यादा पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए। साफ है कि प्रशासन और पुलिस ने स्थिति की गंभीरता को भांपकर वहां सुरक्षा व्यवस्था नहीं की, अन्यथा ये दो निर्दोष संतोें और उनके चालक की जान नहीं जाती। 

दुख इस बात का भी है कि कुछ स्वनामधन्य बुद्धिजीवी और पत्रकार यही सवाल उठा रहे हैं कि वो साधू लौकडाउन में निकले ही क्यों? यह तथ्य सामने है कि सूरत में जूना अखाड़ा के उनके एक साधू की मृत्यु हो गई थी जिनको समाधी देने जाना था। हालांकि रास्ते में इन्होंने पुलिस को अवश्य बताया होगा तभी तो उतना आगे निकल गए थे। हालांकि हम इस मीन-मेख में नहीं जाएंगे क्योंकि यह पहलू यहां किसी दृष्टि से प्रासंगिक नहीं हैं। वे दुख में अपने साथी साधू की अंतिम क्रिया के लिए जा रहे थे। किंतु यह तो नहीं हो सकता कि लौकडाउन में कोई कहीं जाए तो दूसरों को उन्हें पीट-पीट कर मार डालने का अधिकार मिल जाता है? सबसे महत्वपूर्ण बात कि प्रश्न यह क्यों नहीं उठ रहा कि आखिर उतनी संख्या में लौकडाउन तोड़कर लोग सड़कों पर क्यों थे? वे कैसे आ गए? असल लॉकडाउन तो वे लोग तोड़ रहे थे जो सड़कों पर थे। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों का बयान यह साबित करता है कि वहां भीड़ कई दिनों से एकत्रित हो रही थी। पुलिस की संख्या चाहे तीन हो लेकिन घटना के समय वह उपस्थित तो है। वह भीड़ को हटाने के लिए कुछ नहीं कर रही थी। प्रश्न तो उठेगा कि पुलिस ने भीड़ को भगाने का प्रयत्न क्यों नहीं किया? पूरे वीडियो में पुलिस न तो इन निरपराध साधुओं को बचाने का प्रयास करती है और न ही लोगों को सड़कों से हटने के लिए कहती है। महाराष्ट्र जैसे सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमित प्रदेश मे ंतो लौकडाउन अन्य राज्यों से भी ज्यादा सख्त होना चाहिए। 

साफ है कि वहां पहले से लौकडाउन की धज्ज्यिां अफवाहों के कारण उड़ाई जा रहीं थीं। अब आइए घटना पर। वन विभाग के नाके में दोनों साधू एवं चालक हैं। भीड़ की ऐसी अवस्था में सामान्य समझ की बात है कि जो लोग उनके निशाने पर हैं उनको पहले भवन से निकाला नहीं जाता। पहले भीड़ को शांत किया जाता है। पुलिस वाले ने साधुओं और चालक को बाहर क्यों निकाला? वह दृश्य किसी को भी हिला देता है कि 70 वर्ष के साधू कल्पवृक्षगिरि महाराज पुलिस के पास जान बचाने के लिए छिपते हैं और पुलिस वाला उनको भीड़ के बीच छोड़ देता है। उनको बचाने की कोशिश तक नहीं करता, एक बार फायर भी नहीं करता। अगर पुलिस कोशिश करती फिर विफल हो जाती तो उसे क्षमा किया जा सकता था। उसने कोशिश ही नहीं की। इसे आप क्या कहेंगे? इसकी तो गहराई से जांच होनी चाहिए कि उसने ऐसा क्यों किया? पुलिस वालों का निलंबन पर्याप्त नहीं है। उन पर तो मुकदमा दर्ज होना चाहिए था। पालघर के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का यह कहना कि पुलिस ने कोशिश की लेकिन भीड़ ज्यादा होने से सफल नहीं हुई वास्तव में अपने बचाव में दिया गया बयान ही माना जाएगा। जो कुछ वीडियो में दिख रहा है उसे कौन झुठला सकता है? क्या वीडियो में किसी को कहीं भी पुलिस साधुओं का बचाव करते हुए या भीड़ को समझाते-चेतावनी देते हुई सुनाई देती है या दिखती है

चूंकि पुलिस और प्रशासन अपना दोष स्वीकारने की जगह बचाव में लगा हुआ है इसलिए संदेह ज्यादा गहरा होता है। ये हत्यायें पहली नजर में त्वरित गुस्सा का परिणाम नहीं लगती। चोरी, बच्चा चोरी, डकैती आदि की बातें तो मनगढंत ही हैं। यह भी अब साफ हो रहा है कि उस क्षेत्र में काफी दिनों से कई प्रकार की अफवाहें फैलाई जा रहीं थी। लोगों को उकसाया जा रहा था। मोबाइल पर मेसेज आ रहे थे। जाहिर है, कुछ शक्तियां किसी न किसी तरह की हिंसा कराने की साजिश रच रहीं थीं। यह प्रशासन का दायित्व था कि उसका संज्ञान लेकर सुरक्षोपाय तथा लोगों का भ्रम दूर करने की कोशिश करता। ऐसे किसी प्रयास की कोई सूचना नहीं है। ऐसा लगता है कि जानबूझकर साजिश रची गई थी। संभव है साधुओं की हत्या से साजिश में लगे असामाजिक तत्व प्रदेश व देश में सांप्रदायिक हिंसा की स्थिति पैदा करना चाहते हों। लौकडाउन को ध्वस्त करने की कोशिश बार-बार सामने आ रहीं हैं। इसलिए इसकी गहराई से जांच हो एवं केवल सामने दिखने वाले चेहरे नहीं, वास्तविक दोषियों को कानून के कठघरे में खड़ा किया जाए। इसके लिए मकोका सबसे उपयुक्त कानून होगा। महाराष्ट्र सरकार को ध्यान रखना होगा कि नगा साधुआंे ने ही नहीं, अनेक अखाड़ों, संत-संगठनों, शंकराचार्य सहित काफी सम्मानित संतों ने लौकडाउन के बाद महाराष्ट्र कूच का ऐलान कर दिया है। स्थिति को संभालने के लिए जरुरी है कि दोषियों को पकड़ने के साथ पुलिस-प्रशासन के जिम्मेवार तत्वों पर भी कड़ी कार्रवाई हो। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडवव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208 

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

जमात को कानूनी शिकंजे में कसना जरुरी

अवधेश कुमार

इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय एशिया के सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती मुंबई के धारावी में कोरोना वायरस के कई नए मरीज सामने आए हैं। इनमें से कुछ मरीज ऐसे हैं, जो दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में आयोजित तबलीगी जमात के कार्यक्रम में हिस्सा लेकर लौटे थे। हजारों झुग्गी झोपड़ियों की घनी बस्ती वाले धारावी क्षेत्र में कोरोना संक्रमित लोगों की कुल संख्या दो दर्जन से ज्यादा हो गई है। इनमें से सात की मौत हो चुकी है। इसमें नौ अप्रैल को 70 साल की एक महिला ने दम तोड़ दिया। उससे पहले एक अप्रैल को 56 वर्षीय व्यक्ति की मौत हुई थी। यह व्यक्ति तबलीगी जमात के कार्यक्रम से लौटे लोगों के संपर्क में आया था। जमात से लौटे महिलाओं के साथी पुरुष धारावी के शाहू नगर जामा मस्जिद में रुके थे। महिलाएं बलिगा नगर में जिस फ्लैट में रुकी थीं, मृतक व्यक्ति उसी का मालिक था। ऐसी जानकारी है कि जमात से लौटे इन सभी लोगों के साथ 24 मार्च को केरल के कोझिकोड निकलने से पहले मृतक ने समय गुजारा था। वस्तुतः जमात में शामिल होकर 22 मार्च को मुंबई लौटी पांच महिलाएं मृतक के ही एक अन्य फ्लैट में रुकी थीं। एक अप्रैल को पहली मौत के बाद ही बीएमसी ने उसके संपर्क में आए लोगों की तलाश शुरू कर दी थी। चूंकि मृतक के परिवार की तरफ से इस मामले में पूरा सहयोग नहीं मिला, इसलिए पुलिस उसके कॉल रेकॉर्ड्स  के आधार पर पता कर रही है कि वह किसके-किसके संपर्क में आया था। इस बीच, धारावी में काम करने वाले एक सफाईकर्मी और एक डॉक्टर के कोरोना पॉजिटिव होने का मामला सामने आया है। 

धारावी से शुरुआत करने का उद्देश्य यह बताना था कि किस तरह तबलीगी जमात ने पूरे देश की जान को भयावह जोखिम में डाल दिया है। दिल्ली से केरल और महाराष्ट्र तक के सूत्र को जोड़िए तो तस्वीर साफ हो जाएगी। अगर धारावी के जमातियों का संपर्क इतना व्यापक था तो अन्यों का भी ऐसा ही होगा और उन्होंने भी अपने साथ कोरोना की आग को उन सारे जगहों पर फैलाने में भूमिका निभाई जहां-जहां से ये गुजरे और ठहरे। इसके दूसरे पहलू को देखिए। धारावी में लाखों की संख्या में लोग रहते हैं। गलियां काफी संकरी हैं। आते-जाते वक्त भी आपका शरीर एक दूसरे को छूता रहता है। इसमें सोशल डिस्टेंसिंग का पालन संभव ही नहीं। जिस क्षेत्र को सील किया गया है या जो लोग क्वारंटीन किए गए हैं, वे भी नियमों का पालन नहीं कर पा रहे हैं। अगर धारावी में कोरोना फैल गया तो क्या स्थिति होगी इसकी कल्पना मात्र से ही रांेगटे खड़े हो जाते हैं। अगर जमाती न होते तो यहां संक्रमण होता ही नहीं। वास्तव में महाराष्ट्र आज अगर संक्रमण एवं मौत के मामले में सभी राज्यों में सबसे उपर है तो इसका मुख्य कारण जमातियों का गैर जिम्मेवार आपराधिक व्यवहार ही है। 

यह केवल महाराष्ट्र की बात नहीं है। 10 अप्रैल को असम के सिलचर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जो पहली मौत हुई वह निजामुद्दीन के तबलीगी जमात कार्यक्रम शामिल हुआ था। भारत में कोराना वायरस के बढ़ते मरीजों की केस हिस्ट्री पर नजर डालने से ये दो तथ्य बिल्कुल साफ होते हैं-या तो वह जमाती है, उसके संपर्क में आया है या फिर वह सउदी अरब या वहां मक्का या कुछ खाड़ी देश से लौटा है। बिहार में सीवान कोरोना का सबसे बड़ा केन्द्र बना है तो इसका कारण यही है। वहां ओमान से लौटे एक युवक के गैर जिम्मेवार आचरण ने कोहराम मचा दिया। वहां संक्रमितों की संख्या बढ़ने से बिहार की मीडिया उसे सीवान की जगह प्रदेश का वुहान कहने लगा है। देश भर में कुल संक्रमितों की संख्या के अनुसार विचार करें तो 35 प्रतिशत सीधे तबलीगी जमात के हैं। शेष में ज्यादातर इनके संपर्क में आए या फिर जिस दूसरी श्रेणी की हमने बात की वे हैं। तमिलनाडु के कुल मरीजों में 90 प्रतिशत से ज्यादा सीधे जमात से जुड़े हैं तो राजधानी दिल्ली के करीब 65 प्रतिशत। सच यह है कि अगर तबलीगी जमात के लोगों ने अपना, परिवार एवं देश के लोगोें के जीवन का ध्यान रखते हुए जिम्मेवार रवैया अपनाया होता तो भारत इस समय कोरोना पर लॉकडाउन एवं सोशल डिस्टेंसिंग द्वारा काबू करने वाले देशों की श्रेणी में होता। मजहबी कट्टरता, जाहिलपन में जमाती तथा दूसरी श्रेणी के लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया। इस कारण स्वयं एवं पूरे देश को संकट में डाल दिया है। 

किंतु दुर्भाग्य देखिए कि इस सच को सामने रखने को मुसलमान विरोधी या उनको बदनाम करने की साजिश बताया जा रहा है। सबसे चिंता का विषय है कि अभी तक मुसलमानों के बड़े संस्थानों एवं नामी मजहबी नेताओं में से किसी ने जमात के रवैये की आलोचना नहीं की है। इसके उलट सब उनके बचाव में लगे हैं। कुछ लोग उच्चतम न्यायालय तक चले गए इस अपील के साथ कि तबलीगी जमात को बदनाम करने का अभियान बंद कर दिया जाए। कौन बदनाम कर रहा है?  पूरे देश में लगातार जमातियों से अपील की जाती रही कि आप बाहर आइए ताकि आपके लक्षणों के अनुसार कोरंटाइन करने या संक्रमित होने पर उपचार किया जाए। ज्यादातर को तलाश कर जबरन निकालना पड़ा है। कई जगह कुछ लोग तब सामने आए जब यह घोषित कर दिया गया कि नहीं आने पर मुकदमा किया जाएगा। उसके बाद कुछ निकलकर सामने आए। दूसरे, उनकी जान बचाने के लिए तलाशने पहुंचे स्वास्थ्यकर्मियों एवं पुलिस को इनकी हिंसा का शिकार होना पड़ा है। किसी तरह लाया गया तो कोरंटाइन सेंटरों एवं अस्पतालों में वे अनुशासन मानने को तैयार नहीं। उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज करने पड़े हैं। इसके बावजूद काफी लोग निकलकर नहीं आए हैं। केवल महाराष्ट्र में 162 जमातियों पर प्राथमिकी दर्ज हुई है। यह बात सामान्य सोच में नहीं आ सकती कि किसी को यह पता चल गया हो कि कोरोना से उसकी जान खतरे है, जहां वह है वहां लोगांे को खतरे में डाल रहा है लेकिन अपील पर अपना चेक कराने या इलाज कराने सामने नहीं आए, जब उसे पकड़ा जाए तो वह हिंसा करे और अस्पताल में भर्ती कराने पर डॉक्टर से लेकर अन्य स्वास्थ्यकर्मियों का जीना मुहाल कर दे। इससे पता चलता है कि इनको मानसिक रुप से कितना खतरनाक बना दिया गया है। इस तरह कोरोना संकट के तो ये कारण बने ही हैं, भविष्य में देश के लिए खतरे का साफ संकेत दे रहे हैं। इस तरह की मानसिकता वाले अपने साथ समाज के दुश्मन हैं। इनका खुलेआम समर्थन भी कट्टर मानसिकता और व्यवहार का ही पर्याय है। 

मानसिक रुप से कट्टर बनाए जा चुके ऐसे लोग अपने आका के अलावा किसी की बात आसानी से नहीं मानते। वे स्वयं भी मरेंगे और दूसरों को भी मारेंगे। आतंकवादी आत्मघाती दस्ता किस मानसिकता में बनते हैं? इतना भयानक अपराध करके देश को संकट में डालने के बाद यदि कुछ अपनी जान बचाने के लिए अच्छा व्यवहार करने भी लगे तो इससे इनके मूल चरित्र को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। काफी संख्या में अभी भी ये छिपे हैंं और बाहर नहीं आ रहे। किंतु इसमें आश्चर्य जैसा कुछ नहीं है। जिस संगठन का प्रमुख ही छिप जाए उसके सदस्यांें का आचरण इसके उलट नहीं हो सकता। मौलाना साद को पुलिस ने नोटिस भेजा। उनसे26 सवाल पूछे गए। उन्होंने इनका जवाब देने की बजाय अपने को कोरंटाइन में होने का एक संदेश जारी कर दिया। कोरंटाइन में होने से पुलिस और स्वास्थ्यकर्मी के सामने आने में क्या बाधा हो सकती है? यह केवल मानसिकता का प्रश्न है। एक मानसिकता तो यह रही है कि कानून और सरकारों की एडवायजरी हमारे ठेंगे पर। भले मृत्यु हो जाए लेकिन पुलिस-प्रशासन की बात मानकर समर्पण करने की सोच ही नहीं है। इसका निष्कर्ष तो यही निकलता है कि जैसे ये मान चुके हैं कि अल्लाह के अलावा उन पर किसी का कानून और एडवायजरी लागू नहीं होता। मौलाना साद ने भले अपनी तकरीरों में सीधे यह पंक्ति नहीं बोला लेकिन उनके कहने का सीधा अर्थ यही था। इसके आधार पर पैदा हुई लाखों जमातियों की मानसिकता कोरोना संकट के भयावह प्रसार का कारण बन रहा है। 

इस समय कोरोना है तो इसमें इनका दोष दिख रहा है लेकिन इनकी खतरनाक मानसिकता एवं व्यवहार का मामला काफी विस्तृत है। इस संगठन की गहराई से जांच कर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि इस वृक्ष से निकलते विष को रोका जा सके। ऐसा नहीं करने का परिणाम देश को भुगतना पड़ेगा। सबसे बढ़कर मानसिकता के उपचार को लेकर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। मुस्लिम समाज के जो लोग या संगठन इसमें साथ देने को तैयार नहीं, या सरेआम जमात के बचाव में लगे हैं ....उनको भी चिन्हित कर कानून की सीमाओं में लाया जाए। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208



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