शनिवार, 4 अप्रैल 2020

तबलीगी जमात का कृत्य कोरोना से संघर्ष के सारे कदमों पर पानी फेरने वाला

 

अवधेश कुमार

तबलीगी जमात के प्रति सहानुभूति दिखाने वाले सबसे पहले कुछ खबरों पर नजर डाल लें। राजधानी दिल्ली में कई जगहों पर तबलीगी जमात के कोरोना के संदिग्ध मरीजों द्वारा अस्पताल में स्वास्स्थ्यकर्मी के साथ बदतमीजी का मामला सामने आने के बाद अस्पतालों और क्वारंटाइन सेंटरों पर पुलिस बल तैनात करने करना पड़ा है। दिल्ली सरकार और अस्पतालों के अधिकारी शिकायतें कर रहे हैं कि ये लोग क्वारैंटाइन सेंटरों, असपतालों में मेडिकल स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं, गालियां दे रहे हैं, उनके ऊपर थूक फेंक रहे हैं। दक्षिण-पूर्वी दिल्ली में रेलवे के पृथक केंद्रों में रखे गए, तबलीगी जमात के कार्यक्रम से जुड़े करीब 160 लोगों ने उनकी जांच कर रहे डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया और उनपर थूका। निजामुद्दीन मरकज में तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों में से 167 को तुगलकाबाद में रेलवे के पृथक केंद्रों में लाया गया था। उत्तर रेलवे के प्रवक्ता दीपक कुमार ने कहा कि पृथक केंद्रों में उन्होंने स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार किया और खुद को दिए जा रहे भोजन को लेकर आपत्ति जताई...यहां तक कि उन्होंने उन्हें देख रहे डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों पर थूक तक दिया। तबलीगी जमात में शामिल एक सदस्य ने बुधवार राजीव गांधी सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल की छठी मंजिल पर स्थित आइसोलेशन वार्ड के कमरे में भर्ती इस कोरोना संदिग्ध ने दस मिनट तक कूदने का नाटक किया। गाजियाबाद के एमएमजी अस्पताल प्रशासन की शिकायत पर तो तबलीगी जमातियों के खिलाफ अश्लील हरकत करने, स्वास्थ्यकर्मियों को धमकियां देने, हंगामा करने आदि के आरोप में प्राथमिकी दर्ज करानी पड़ी है। 

ये कुछ उदाहरण पर्याप्त हैं यह साबित करने के लिए स्वयं को धर्म प्रचार समूह बताने वाले तबलीगी जमात के लोगों का चरित्र और आचरण कैसा है। बहरहाल, आज का सच यही है कि निजामुद्दीन मरकज में आयोजित तबलीगी जमात सम्मेलन में भाग लेने वाले भारत में कोरोना कोविड 19 का सक्रमण के सबसे बड़े समूह बन गए हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 2300 पॉजिटिव मामलों में से 645 से ज्यादा निजामुद्दीन मरकज से जुड़े हुए हैं। देश भर में तबलीगी जमात के जो 9000 लोगों की पहचान की गई है, उनमें से 1300 लोग विदेशी हैं। इन्हें कोरंटाइन में रखा गया है। इस तरह भारत के कुल मरीजों में 27 प्रतिशत से ज्यादा तथा मृतकों में करीब 33 प्रतिशत अभी तक तबलीगी जमात के लोग ही हैं। राजधानी में तो कुल 350 संक्रमितों में से 290 निजामुद्दीन मरकज से ही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने साफ कहा है कि मरकज के कारण कोविड-19 के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है। जिन 22 राज्यों से आए लोगों का पता चला है वो सब खतरे के दायरे में आ गए हैं। ये कोरोना के चलते-फिरते टाइम टिक-टिक करते टाइम बम हैं। आशंका यह बढ़ रही है केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने अपने परिश्रम तथा प्रबंधन से एवं आम भारतीयों ने अपने संयम, संतुलन से इच्छाओं का दमन कर, घरों में बंद रहकर दुनिया के प्रमुख देशों की तुलना में कोरोना के प्रसार को काबू में रखने में जो सफलताएं पाईं हैं वो इनकी करस्तानियों से नष्ट हो सकता है। 

ये कैसे रंग बदलते हैं इसका उदाहरण देखिए। तब्लीगी जमात के प्रमुख मौलाना साद ने 2 अप्रैल को अपने समर्थकों के लिए एक मिनट 15 सेकंड का ऑडियो जारी किया है जिसमें वो अपने बारे में दावा कर रहे हैं कि मैं दिल्ली में ही सेल्फ क्वारैंटाइन में हूं। वो जमात के सदस्यों से अपने घरों में रहने, सरकार के निर्देशों का पालन करने और कहीं पर एकसाथ एकत्रित ना होने की अपील कर रहे हैं। क्या मासूमियत है! इन्हीं मौलाना साद का ऑडियो-वीडियो यू ट्यूब पर था जिसे हटा दिया गया। कोरोना संकट आरंभ होने से लेकर लौकडाउन तक वे लगातार अपनी तकरीरे देते रहे। उसमें वे कोरोना को खड़ा किया गया झूठा हौव्वा, जानबूझकर मुसलमानों के खिलाफ साजिश करार देते हैं। वे कहते हैं कि इसे मुसलमानों को मुसलमानों से अलग करने के लिए लाया गया है ताकि वो एक दूसरे से मिलें-जुलें नहीं। मस्जिद में रहो, यदि तुम्हारी मौत हो जाती है तो इससे अच्छी मौत हो ही नहीं सकती है। ..ऐेेसी उनकी कई तकरीरें हैं। इन्हें हजारों लोगों ने सुना। कोरोना को लेकर उनकी क्या मानसिकता होगी इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। जिस तरह से मरकज के लोगों की तलाश में या विदेश से आए लोगों को पता चलने पर उनको बचाने गई डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की टीम पर जगह-जगह हमले हुए वे इस बात के प्रमाण हैं कि इनके दिमाग में मजहबी कट्टरता या इस्लाम के नाम पर कितना जहर भर दिया गया है। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थिति मरकज से लोगों को निकालने में पुलिस-प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ी। 36 घंटे तक चलाए गए ऑपरेशन के बाद एक अप्रैल सुबह 4 बजे मरकज खाली कराया गया था। मरकज से 2,361 लोग निकाले गए।  

मरकज में आने वाले लोगों का संबंध जिन 22 राज्यों से जुड़ रहा है उनमें तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, असम, उत्तरप्रदेश, तेलंगाना, पुडुचेरी, कर्नाटक, अंडमान निकोबार, आंध्रप्रदेश, श्रीनगर, दिल्ली, ओडिशा, प.बंगाल, हिमाचल, राजस्थान, गुजरात, मेघालय, मणिपुर, बिहार, केरल और छत्तीसगढ़ शामिल है। गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को इन्हें ढूंढकर तुरंत कोरंटाइन करने जांच करने तथा विदेशियों को देश से बाहर निकालने का आदेश दिया है। गृह मंत्रालय ने 960 विदेशी नागरिकों को ब्लैकलिस्ट में डालते हुए जमात से संबंधित गतिविधियों में लिप्त पाए जाने पर उनका पर्यटन वीजा रद्द करन का फैसला किया है। सरकार ने विदेशियों की वीजा को देखा तो पता चला कि इनमें से अधिकतर पर्टयन वीजा पर भारत आए हैं। इसमें सरकार का कहना है कि ये किसी धार्मिक कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकते। पर्यटन वीजा पर आकर मजहब का प्रचार करने, मजहबी जलसों में तकरीरें करने की तो शायद ही किसी देश में अनुमति हो। 

तबलीगी जमात के इस अपराधिक कृत्य के बावजूद प्रमुख मुस्लिम संगठनों और नेताओं द्वारा इनकी मुखर आलोचना न करना इसका ऐसा पहलू है जो हैरान करता है। उल्टे जो नेता और संगठन तबलीगी जमात से असहमति रखते थे, वे  भी समर्थन में आ गए हैं। ये क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि जमात के लोगों ने अपने प्रति, मुस्लिम समुदाय के प्रति तथा देश के प्रति भयानक अपराध किया है। यह मुस्लिम समाज के ही खिलाफ है। जमात के 20 लोग मर चुके हैं। इतनी सख्ंया में संक्रमितों तथा मृतकों का अपराधी कौन माना जाएगा? जब मार्च के आरंभ से ही एडवायजरी जारी की जा रही थी कि बड़ी संख्या में न जुटें,  मेलजोल से अलग रहें, बहुत आवश्यक न हो तो यात्रा न करंें, तो इसका पालन जमात को क्यों नहीं करना चाहिए था? दूसरे, 12 मार्च को दिल्ली सरकार ने 200 से ज्यादा लोगों के एकत्रित होने को प्रतिबंधित कर दिया था। इसके बावजूद उनका सम्मेलन आयोजित हुआ, क्योंकि जमात के अमीर मौलाना साद एवं उनके समर्थकों के लिए इन एडवाजरियों तथा दिल्ली सरकार का आदेश इस्लाम के प्रतिकूल था। यह कट्टर मानसिकता ही समस्या है। 

अगर इनने अनजाने में किया होता तो इन्हें क्षमा भी किया जा सकता था। लेकिन इन्होंने सब कुछ जानते हुए घोषित करके दिशा-निर्देशों, आदेशों और एडवायजरी का उल्लंघन किया। जमात का यह कैसा इस्लाम है? दूसरे धर्मों के सारे केन्द्र आम लोगों के लिए बंद किए जा चुके थे। तबलीगी जमात के लोगों का इससे कोई लेना-देना ही नहीं था। अगर यह संगठन मजहब का प्रचार करता है तो फिर ऐसा कृत्य कैसे कर सकता है जिससे इनके लोगों की जान तो जाए ही दूसरे भी चपेट में आकर जीवन गंवा दें? यह ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब देश को तो तलाशना ही है, स्वयं मुस्लिम समुदाय को इसकी ज्यादा जरुरत है। निजामुद्दीन मरकज जलसे से निकलने के बाद लोग जिन क्षेत्रों से और जिन साधनों से गुजरे और उस बीच उनके साथ जितने लोग संपर्क में आए उन सबका पता करना मुश्किल है। समस्या यह भी है कि इनमें से अनेक यह स्वीकारते ही नहीं कि वो निजामुद्दीन मरकज के कार्यक्रम में गए थे, जबकि उनका नाम सूची में है। इस कारण पुलिस को इनके साथ सख्ती बरतनी पड़ रही है। एक मजहबी संगठन के लोग इस तरह झूठ बोलें तो उससे ही पता चल जाता है कि इसमें कैसी मानसिकता पैदा की जाती है। सवाल यह भी है कि आखिर ये लगातार अपील के बाद स्वयं सामने क्यों नहीं आए हैं? पुलिस को क्यों जगह-जगह इनको ढूंढकर लाना पड़ रहा है? क्या ये चाहते हैं उनके कारण कोरोना का प्रकोप बढ़े? यह कितना बड़ा अपराध है इस पर जरा विचार करिए। ये जगह-जगह और डॉक्टरों पर थूकते क्यों हैं, जबकि इन्हें मालूम है कि थूकने से संक्रमण फैलता है? तो क्या ये जानबूझकर संक्रमण फैलाना चाहते हैं? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर इनके व्यवहार को देखते हुए न में देना जरा कठिन है। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208 





शुक्रवार, 27 मार्च 2020

भयावह स्थिति में लौकडाउन के अलावा चारा क्या है

 

अवधेश कुमार

दुनिया की स्थिति निस्संदेह भयावह है। 190 देश कोरोनावायरस की चपेट में आ चुके हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 25 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है तथा संक्रमित लोगों की संख्या पांच लाख को पार चुकी है। इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 21 दिनों को लौक डाउन की घोषणा देश को इस महामारी से बचाने एवं सुरक्षित रखने का एकमात्र श्रेष्ठ विकल्प है।स्थिति ज्यादा डरावना इसलिए है क्योंकि संक्रमितों और मृतकों की संख्या उन देशों में ज्यादा है जो विकसित व शक्तिसंपन्न हैं और जिनकी स्वास्थ्य सेवाएं सर्वोत्तम मानी जाती हैं। अमेरिका जैसी विश्व की महाशक्ति के यहां मरने वालों का आंकड़ा 1200 को पार कर चुका है। वहां इस समय 85 हजार से ज्यादा लोग कोरोना संक्रमित हैं। इटली के लिए यह सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी साबित हो रही हैं। वहां आठ हजार के आसपास लोग मारे जा चुके हैं और 80 हजार के आसपास संक्रमित हैं। पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है। अस्पतालों में जगह नहीं है और मैदानों में कैम्प लगाए गए हैं। डॉक्टर बीमारों में जवानों का इलाज कर रहे हैं तो बुजूर्ग अपने हाल पर छोड़े जा रहे हैं। इटली के प्रधानमंत्री ने पूरी तरह हथियार डाल दिया है। उन्हांेने कहा है कि स्थिति पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। हमारी सारी शक्ति खर्च हो चुकी है। स्पेन में कोरोना ने करीब 4000 से ज्यादा लोगों की जान ले ली है। ब्रिटेन में 400 तो फ्रांस में 1200 से ज्यादा लोग संक्रमण के बाद जान गंवा चुके हैं। स्पेन में स्वास्थ्यकर्मी ही संक्रमित हो रहे हैं और उनको आइसोलेशन में रखने के कारण समस्याएं आ रहीं हैं। मैड्रिड के कई अस्पतालों में संक्रमण फैल चुका है। इन्हें हर घंटे सैनिटाइज किया जा रहा है। 

वस्तुतः चीन के बाद यूरोप और अमेरिका इसका सबसे बड़ा शिकार हो चुका है। इसके बावजूद कि इन देशों ने अपने सारे संसाघन बचाव व चिकित्सा में झांेक दिए हैं। अमेरिका में स्वास्थ्य आपातकाल लागू है। अमेरिका के कम से कम 16 राज्यों ने अपने नागरिकों को घर में रहने का आदेश जारी किया है। फ्रांस सहित अनेक देशों में सेना उतारनी पड़ी है। सच कहा जाए दुनिया के सभी प्रमुख देशों में लॉक डाउन की स्थिति है। यह स्वयं सोचने की बात है कि जब इन साधनसंपन्न देशों की ऐसी दशा है तो अगर यह महामारी विकासशील और गरीब देशों को अपनी चपेट में ले लिया तो फिर क्या होगा? यही प्रश्न हमें अपने आपसे पूछना है। सच यह है कि कोरोना की चपेट से अब कम ही देश बचे हैं। पहले अफ्रिका से खबर नहीं आ रही थी लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब वहां से कोरोना संक्रमण की पुष्टि शुरु कर दी है। भारत में 11 मार्च तक केवल 71 मामले थे। अब वह 700 को पार गया है। इसका अर्थ हुआ कि संख्या तेजी से बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस गेब्रियिसोस ने 23 मार्च को कहा कि कोरोनावायरस महामारी तेजी से बढ़ रहा है। पहले मामले से एक लाख तक पहुंचने में 67 दिन का समय लगा लेकिन दो लाख पहुंचने में 11 दिन और दो से तीन लाख पहुंचने में चार दिन का समय लगा। केवल दो दिनों में चार लाख और एक दिन में पांच लाख। तो यह है स्थिति। 

तो इसे यहीं रोकना जरुरी है। जैसा हम जानते हैं कोई दवा इसे नहीं रोक सकती। जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल का यह वक्तव्य वायरल हो रहा है कि हमारा अपना व्यवहार संक्रमण को फैलने से रोकने व धीमा करने का सबसे प्रभावी तरीका है। चांसलर मर्केल खुद ही आइसोलेशन में हैं। इसका एकमात्र रास्ता है अपने को बिल्कुल कैद कर देना। कोरोना महामारी को उस हमले की तरह देखना होगा जहां चारों ओर से बमबारी हो रही है, गोलियां बरस रहीं हैं और नीचे बारुदी सुरंग बिछा है। जैसे ही आप निकले कि आप उसकी जद में आ गए। सामान्य युद्ध में तो आप अकेले मरते हैं। कोरोना महामारी के युद्ध में यदि आपको वारयस का बम लगा, गोली लगी तो आपको तत्काल पता भी नहीं चलेगा और आप घर लौटकर अपने परिवार, मित्र, रिश्तेदार और न जाने कितनों की जिन्दगी ले लंेगे। यूरोप के बारे में जितनी जानकारी आई है उसका निष्कर्ष यही है कि समय पर कदम न उठाने यानी लोगों की आवाजही पर रोक न लगाने, एक साथ इकट्ठा होने पर बंदिश न लगाने आदि के कारण ही कोरोना महामारी ने इतना भयावह रुप लिया है। 

अमेरिका की सर्जन जर्नल डॉक्टर जेरोम एडम्स ने एक इंटरव्यू में कहा कि उनके यहां मरने वालों में से 53 प्रतिशत की उम्र 18 से 49 साल के बीच थी। यह उस धारणा से अलग है कि ज्यादातर बुजूर्ग ही इस महामारी से अपनी जान गंवा रहे हैं। तो यह सोचना ठीक नहीं कि हम अगर जवान हैं तो हमारी मौत इससे नहीं हो सकती। पटना में कतर से आए एक 38 वर्षीय युवक की मौत हो गई। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने बताया है कि देश में 8 हजार से ज्यादा लोगों को सरकार के क्वारैंटाइन सेंटर में रखा गया है और 2 लाख के आसपास लोग कॉम्युनिटी सर्विलांस पर हैं। यह समय ऐसा है कि क्वारैंटाइन में रह रहे सभी लोगों की मदद की जाए। ये सारे लोग कोरोना संक्रमित नहीं हैं, लेकिन संदिग्ध तो हैं। यह संख्या सामान्य नहीं है। विदेश से आए भारी संख्या में लोगों ने वायदे के अनुसार अपने को आइसोलेशन में नहीं रखा। तो उनकी पहचान कर जबरन आइसोलेशन में रखने के कदम उठाए जा रहे हैं। दिल्ली में 1 मार्च से विदेश से आने वाले 35 हजार लोगों की पहचान हुई है और सारे जिला मजिस्ट्रेट को उन्हें आइसोलेशन में रखने का आदेश दिया गया है। यह कितना कठिन है इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं। इसमें लॉक डाउन या कफ्ॅयू को जनता और देश के हित में ही कहा जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले संबोधन में लोगों से घरों में रहने की अपील की थी और उसका असर भी हुआ। बहुमत घरों में या जहां हैं वहीं अपने को कैद रखे हुए था। किंतु एक बड़ी संख्या बाहर निकल रही थी। वे समझ नही रहे थे कि वायरस के चेन को तोड़ना है तो सड़कों, बाजारों सबको कुछ दिनों तक के लिए खाली रखना पड़ेगा। भारत में अभी तक वही लोग संक्रमित हुए हैं जो या तो विदेशों से आए या विदेशों से आए लोगों के संपर्क में थे। चेन को तोड़ने के लिए ही पहले सारे अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को प्रतिबंधित किया गया, फिर घरेलू उड़ानें को, यात्री रेलें बंद की गईं तो ज्यादातर राज्यों ने पहले अंतरराज्यीय बसांे ंको और फिर राज्यों के अंदर सामन्य बस संचालन को रोक दिया है। मेट्रों बंद किया गया। और अब पूर्ण बंदी।

यह संक्रमण पैदा होने और उसके विस्तार को रोकने के लिए अपरिहार्य हैं। इसके बाद बारी लोगांेे की है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने लोगों को समझाते हुए कहा कि मान लो हमारे यहां 25-30 हजार कोरोना संक्रमित हो गए तो हम कुछ नहीं कर सकते। तब लॉक डाउन करने का कोई फायदा भी नहीं होगा। सारे अस्पताल मिलकर भी इलाज नहीं कर सकते। यह पूरे भारत वर्ष पर लागू होता है। अगर राजधानी दिल्ली इसे संभालने की स्थिति में नहीं होगी तो कौन शहर और राज्य इसमें सक्षम हो सकेगा? कोई नहीं। यूरोप में इतनी बुरी इसीलिए हुई, क्योंकि जनवरी में मामला सामने आने के बावजूद वहां लोगों की आवाजाही को प्रतिबंधित करने से लेकर बचाव के अन्य कदम नहीं उठाए गए। वहां तो हवाई अड्डों पर अनिवार्य स्क्रीनिंग तक की व्यवस्था नहीं हुई। भारत ने जनवरी से ही स्क्रीनिंग शुरु की और जांच भी। वास्तव में ऐसे पूर्वोपाय के कारण ही हमारे देश में स्थिति नियंत्रण में है। जिस चीन की बात हो रही है वहां हुबेई प्रांत के साथ 20 राज्यों में ऐसा लॉक डाउन किया गया जो हमारे यहां के कर्फ्यू से ज्यादा सख्त था। वायरस के केन्द्र वुहान शहर और उसके आसपास के इलाकों में आवश्यक सेवा ही नहीं, मेडिकल स्टोर तक बंद कर दिए गए। जिसे लेकर आशंका हुई उसे सेना जबरदस्ती उठा लेती। इसमें अनेक त्रासदियां हुंईं। अनेक होटल और घर ध्वस्त कर दिए गए। वहां कोई धरना-प्रदर्शन हो नही सकता। हमारे यहां स्थिति जितनी बिगड़ जाए तो वैसा कर ही नहीं सकते। निस्संदेह, लोगों को परेशानियां हो रहीं हैं, लेकिन अगर स्वयं को, परिवार को, देश को बचाना है तो फिर इसे सहन करने का ही विकल्प है। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पलेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

शनिवार, 21 मार्च 2020

भारत ने संकट में भी सबकी चिंता करने का चरित्र पेश किया

 

अवधेश कुमार

यह दृश्य निश्चय ही पूरी दुनिया के लिए प्रेरक था। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ यानी सार्क देशों के नेता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोरोना वायरस और उसके होने वाले अन्य प्रभावों से लड़ने के लिए एक दूसरे के साथ सहयोग की पेशकश कर रहे थे। बड़े देशों के नेता यह अवश्य कहते हैं कि साझा चुनौतियां का सामना मिलकर करना चाहिए, यहां तक कहा जाता है कि अगर किसी महामारी या प्राकृतिक आपदा से कोई एक या कई देश जूझ रहा हो तो विश्व समुदाय को एकजुट होकर उसका सहयोग करना चाहिए, पर व्यवहार में इस समय ऐसा होता नहीं दिखता। कोरोना वायरस से घबराए और अपने को बचाने में लगे देश विश्व की तो छोड़िए, पड़ोसियों तक की चिंता नहीं कर रहे। उसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सार्क देशों के बीच सहयोग की पहल कर भारत की विश्व बंधुत्व और वसुधैव कुटुम्बकम पर आधारित परंपरागत चरित्र का परिचय दिया है। जब उन्होंने ट्वीट किया कि सार्क देशों के नेताओं को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए साझा रणनीति बनाने तथा सहयोग करने पर चर्चा करनी चाहिए तो पाकिस्तान को छोड़कर सभी देशों के प्रमुखों ने इसका स्वागत किया। ट्वीट में मोदी ने कहा था कि हम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपने नागरिकों को स्वस्थ रखने के उपायों पर चर्चा कर सकते हैं। हम एकजुट होकर दुनिया के सामने एक मिसाल पेश कर सकते हैं और इसे स्वस्थ रखने में योगदान दे सकते हैं। तय समय पर कॉन्फ्रेंस हुआ और पाकिस्तान को छोड़कर सभी देशों ने सकारात्मक बातचीत की। 

ऐसा भी नहीं था यह कॉन्फ्रेंस केवल औपचारिक बातचीत तक सीमित रही। सार्क देशों में कोरोना से निपटने के लिए कोविड-19 इमरजेंसी फंड बनाने की घोषणा करते हुए मोदी ने भारत की ओर से इसमें एक करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 74 करोड़ रुपये) देने का एलान किया। मोदी ने यह भी कहा कि भारत के विशेषज्ञ डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों व वैज्ञानिकों की टीम सार्क के देशों के कहने पर कहीं भी जाने के लिए पूरी तरह तैयार है। मोदी के प्रस्ताव के अनुसार एक हफ्ते के भीतर सार्क देशों में कोरोना से निपटने में जुटे विशेषज्ञों की वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें वे अपने-अपने अनुभवों को साझा करने के साथ ही एक-दूसरे की मदद करने योग्य मुद्दों पर चर्चा करेंगे। मोदी ने कहा कि भारत सार्क के साथी देशों के साथ इस महामारी पर निगरानी के सॉफ्टवेयर को भी साझा करने को तैयार हैं। साथ ही इसके इस्तेमाल का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। मोदी ने सभी देशों को अपने देश की उन्नत चिकित्सा सुविधा साझा करने की पेशकश की। इस तरह मोदी ने सार्क के बीच पहल कर विश्व समुदाय के लिए एक उदाहरण पेश किया है। पाकिस्तान को छोड़कर सभी सार्क देशों ने इसे सकारात्मक ढंग से लिया। मोदी के ट्वीट प्रस्ताव के साथ ही सबने इस पहल की प्रशंसा करते हुए इसमें भागीदारी की बात की थी। सम्मेलन में श्रीलंका, नेपाल, मालदीव, भूटान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने तो खराब स्वास्थ्य के बावजूद इसमें हिस्सा लिया। लेकिन पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री इमरान खान की जगह स्वास्थ्य मामलों के विशेष सहायक जफर मिर्जा को भेज दिया। सम्मेलन के दौरान भी सभी सार्क देश कोरोना से निपटने के लिए साझा रणनीति पर चर्चा कर रहे थे, वहीं पाकिस्तान ने इससे निपटने में चीन का गुणगान करते हुए उससे सीखने की सलाह के साथ कश्मीर मुद्द उठाया। प्रधानमंत्री मोदी ने समय की नजाकत को भांपते हुए पाकिस्तान के हरकत की अनदेखी की तथा लक्ष्य के अनुरुप बैठक का सकारात्मक माहौल में अंत किया। 

देखा जाए तो यहां से केवल कोरोना वायरस में सहयोग का ही नहीं सार्क के जीवन में भी एक नए दौर की शुरुआत हुई है। पाकिस्तान के रवैये को देखते हुए भारत ने उसे दरकिनार कर अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय सहयोग को प्रमुखता दिया है तथा सार्क सम्मेलन पिछले चार सालों से स्थगित है। इस्लामाबाद सम्मेलन का भारत के बहिष्कार का साथ अन्य सभी देशों ने दिया था। भारत ने इसकी जगह बिम्सटेक को महत्व देना शुरु किया था। पूरी दुनिया को आतंकित करने वाले कोरोना वायरस से लड़ने के साथ कायम हुई एकजुटता यदि ठोस परिणाम लाता है जिसकी संभावना है तो फिर भविष्य में इसका विस्तार अन्य क्षेत्रों में हो सकता है। वैसे भी भारत ने अपने वायदे के अनुरुप सार्क देशों के लिए एक उपग्रह का प्रक्षेपण कर दिया है।  सार्क देशों में दुनिया की पूरी आबादी का पांचवां हिस्सा रहता है। इस नाते यहां सहयोग की संभावनां व्यापक हैं। मोदी ने सहयोग एवं साझेदारी की पहले भले अब की है लेकिन भारत ने कोरोना वायरस सामने आने के साथ ही अपने देश को रक्षित करने के समानांतर भारत की वैश्विक भूमिका का निर्वहन करना आरंभ कर दिया था। सम्मेलन के दौरान बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मुहम्मद सालिह ने कोरोना ग्रस्त इलाकों से अपने नागरिकों को बचाने के लिए मोदी की तारीफ की। अगर भारत ने इनके नागरिकों को दुष्प्रभावित देशों से नहीं निकाला होता तो ये भारत का आभार कैसे व्यक्त करते। यह तथ्य कम लोगों को मालूम है कि चीन में कोरोना वायरस का प्रकोप सामने आने ही मोदी ने वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को मदद की पेशकश की, विस्तृत पत्र लिखा। चीन को सबसे पहले चिकिस्ता सामग्री भेजने वाला देश भारत था। सबसे अंतिम 26 फरवरी को भारत ने 15 टन सामग्री वुहान भेजी थी। विदेश मंत्रलय के नेतृत्व में वहां से भारत के अलावा सात दूसरे देशों के 36 नागरिकों को भी निकाला गया। इसमें मेडागास्कर, दक्षिण अफ्रीका व अमेरिका के भी नागरिक थे। जापान से जब 27 फरवरी को भारतीयों को निकाला गया तो उनके साथ दक्षिण अमेरिकी देश पेरू समेत पांच दूसरे देशों के नागरिकों को भी निकाला गया। ईरान मेें तो चार वैज्ञानिक दलों के साथ एक पूरी लेबोरेटरी भेजी गई है। दक्षिण कोरिया को मदद की पेशकश की गई तो सिंगापुर को भी। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मोदी ने टेलीफोन पर बातचीत की तो उन्होंने कोरोनावायरस से लड़ने के लिए मास्क समेत अन्य चिकित्सा सामग्रियों की मांग की और भारत ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। वास्तव में मोदी लगातार दुनिया के नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मोरिसन से लेकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन इनमें शामिल हैं। 

प्रधानमंत्री अब जी 20 देशों के बीच सहयोग पर बातचीत कर रहे हैं।  वे नेताओं को कोरोना वायरस को लेकर एक सामूहिक नीति बनाने तथा एक दूसरे के बीच सहयोग विकसित करने पर बातचीत कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा है कि मैं इस बात से भी अवगत हूं कि पीएम मोदी जी20 देशों के बीच सामंजस्य बनाने को उत्सुक दिख रहे हैं। मेरे ख्याल से यह सराहनीय प्रसास है। ऑस्ट्रेलिया निश्चित रूप से इसका समर्थन करता है और यह संदेश भेजा जा चुका है। हालांकि विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत की तरफ से समूह-20 की बैठक बुलाने का कोई आह्वान अभी नहीं किया गया है लेकिन प्रधानमंत्री की वैश्विक नेताओं के साथ बातचीत में एक साझा रणनीति बनाने का सुझाव जरूर दिया गया है। दुनिया की स्थिति इसके विपरीत है। चीन और अमेरिका के बीच एक तरह से कूटनीतिक लड़ाई शुरू  हो गई है। पहले अमेरिका की तरफ से चीन पर आरोप लगाया गया कि उसने महामारी को रोकने की कोशिशों में सुस्ती बरती और दुनिया को इस हालात में पहुंचाने का वह दोषी है। चीन की तरफ से अमेरिकी सेना पर यह दोषारोपण किया गया कि वुहान में कोरोना वायरस को लाने में उसकी भूमिका संदिग्ध है। हालांकि चीन के आरोप पर कोई देश विश्वास करने वाला नहीं है। पर इसमें तनातनी देखी जा सकती है। अमेरिका द्वारा यूरोप से आवागमन पर प्रतिबंध लगाने के कारण कई यूरोपीय देशों ने नाराजगी व्यक्त कर दी है। 

कहने का तात्पर्य यह कि दुनिया के देश या तो अपने मंे उलझे हैं या फिर उनके बीच आपस में तनाव है। एकमात्र भारत ही है जिसके नेता ने पड़ोसियों के साथ सहयोग की पहल की और उसे विस्तारित करते हुए विश्व समुदाय की चिंता करने वाले देश के रुप में स्वयं को प्रस्तुत किया है। वैसे भी वैश्विक महामारी के लिए वैश्विक रणनीति और सहयोग का ढांचा होना चाहिए। यह काम इस समय भारत के अलावा कोई नहीं कर रहा। मोदी ने इस मामले में पड़ोसी प्रथम नीति के तहत सार्क देशों के साथ सहयोग के एक ढांचे की शुरुआत की और उसके बाद विश्व स्तर पर पहल किया है। ऐसे ही संकट में किसी देश और उसके नेतृत्व की पहचान होती है। अभी तक भारत एवं उसका नेतृत्व दुनिया के लिए श्रेष्ठ उदाहरण बनकर उभरा है जिसका असर लंबे समय मे विश्व पटल पर कई रुपों में दिखाई देगा। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

बुधवार, 18 मार्च 2020

(12.45) 17-03-2020 To 23-03-2020

इस अंक में क्या है

-स्वास्थ्य ही नहीं अर्थव्यवस्था को भी तेजी से प्रभावित कर रहा है कोरोना
-कोरोना का छाना, सिंधिया का जाना व संसद में हंगामा
-दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाईश रहे...
-कारगिल के सेनापति जॉर्ज फर्नांडिस जिनकी रगों में बसा था हिन्दुस्तान
-दिल्ली में 31 तक 50 से अधिक लोगों वाले कार्यक्रमों पर रोक, जिम-नाइट क्लब भी बंद
-मिर्जा गालिब को भारत रत्न दिए जाने की राज्यसभा में उठी मांग
-कोरोना से दिहाड़ी मजदूर भी प्रभावित, नहीं मिल रहा काम
-एमबीए वाले को रेलवे में मिली खलासी की नौकरी
-जेएनयू की सड़क का नाम ‘वीर सावरकर’ रखना शर्म की बातः आइशी
-तीन वर्ष में उत्तर प्रदेश ने अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त कियाः योगी आदित्यनाथ
-कोरोना वायरस से संक्रमितों के इलाज का पूरा खर्चा उठाएगी बिहार सरकारः नीतीश कुमार
-तेलंगाना विधानसभा में सीएए, एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पास
-दिल्ली दंगे: अब तक 718 मामले दर्ज, 3400 से ज्यादा लोग हिरासत में लिया गया
-भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर ने बनाई आजाद समाज पार्टी
-संघ की शाखाओं में हुई बढ़ोतरी, तीन हजार शाखाएं बढ़ीं
-कोरोना वायरस का असर, न्यूयॉर्क में सभी स्कूल,रेस्तरां और बार बंद
-कोरोना वायरस का कहर, ईरान के धार्मिक नेता आयतुल्ला हाशीम बाथेई की हुई मौत
-अमेरिका की अलबामा प्रतिनिधि सभा ने नमस्ते को अपनाने से इनकार किया
-अब पता चला क्यों इतनी तेजी से फैलता है कोरोना वायरस
-पुतिन 12 साल और बने रह सकते हैं रूस के राष्ट्रपति, तोड़ेंगे तानाशाह स्टालिन का रिकॉर्ड
-कोरोना का डर मोहें सतावै
-त्वचा संबंधी समस्याओं से छुटकारा दिलाती है कच्ची हल्दी
-फ्रिक्शनल थेरेपी क्या है, यह कैसे आपकी खूबसूरती बरकरार रखता है?
-फेफड़ों को हेल्दी बनाए रखने के लिए खाएं यह चीजें
-टयूलिप गार्डन देखने चलें कश्मीर
-क्या आप जानते हैं कैसे सजाएं पुराने कपड़ों से अपने घर को
-विश्व कप 1975: जब हार की कसक बनी थी भारतीय हाकी टीम के लिये जीत की प्रेरणा
-रोहित ने कहा, कोविड-19 के कारण दुनिया को थमते हुए देखना दुखद
-कोई नहीं जानता, कब शुरू होगा आईपीएल
-सपना चैधरी ने अपने बॉयफ्रेंड से कर ली सगाई
-दीपक ठाकुर और सोमी खान की शादी की तस्वीरें हुई वायरल
-जावेद अख्तर के सुनहरे शब्दों ने बदल दी थी आमिर खान की तकदीर
-अमिताभ बच्चन ने ‘अंग्रेजी मीडियम’ की अभिनेत्री को भेजा खत









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