शनिवार, 21 मार्च 2020

भारत ने संकट में भी सबकी चिंता करने का चरित्र पेश किया

 

अवधेश कुमार

यह दृश्य निश्चय ही पूरी दुनिया के लिए प्रेरक था। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ यानी सार्क देशों के नेता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोरोना वायरस और उसके होने वाले अन्य प्रभावों से लड़ने के लिए एक दूसरे के साथ सहयोग की पेशकश कर रहे थे। बड़े देशों के नेता यह अवश्य कहते हैं कि साझा चुनौतियां का सामना मिलकर करना चाहिए, यहां तक कहा जाता है कि अगर किसी महामारी या प्राकृतिक आपदा से कोई एक या कई देश जूझ रहा हो तो विश्व समुदाय को एकजुट होकर उसका सहयोग करना चाहिए, पर व्यवहार में इस समय ऐसा होता नहीं दिखता। कोरोना वायरस से घबराए और अपने को बचाने में लगे देश विश्व की तो छोड़िए, पड़ोसियों तक की चिंता नहीं कर रहे। उसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सार्क देशों के बीच सहयोग की पहल कर भारत की विश्व बंधुत्व और वसुधैव कुटुम्बकम पर आधारित परंपरागत चरित्र का परिचय दिया है। जब उन्होंने ट्वीट किया कि सार्क देशों के नेताओं को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए साझा रणनीति बनाने तथा सहयोग करने पर चर्चा करनी चाहिए तो पाकिस्तान को छोड़कर सभी देशों के प्रमुखों ने इसका स्वागत किया। ट्वीट में मोदी ने कहा था कि हम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपने नागरिकों को स्वस्थ रखने के उपायों पर चर्चा कर सकते हैं। हम एकजुट होकर दुनिया के सामने एक मिसाल पेश कर सकते हैं और इसे स्वस्थ रखने में योगदान दे सकते हैं। तय समय पर कॉन्फ्रेंस हुआ और पाकिस्तान को छोड़कर सभी देशों ने सकारात्मक बातचीत की। 

ऐसा भी नहीं था यह कॉन्फ्रेंस केवल औपचारिक बातचीत तक सीमित रही। सार्क देशों में कोरोना से निपटने के लिए कोविड-19 इमरजेंसी फंड बनाने की घोषणा करते हुए मोदी ने भारत की ओर से इसमें एक करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 74 करोड़ रुपये) देने का एलान किया। मोदी ने यह भी कहा कि भारत के विशेषज्ञ डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों व वैज्ञानिकों की टीम सार्क के देशों के कहने पर कहीं भी जाने के लिए पूरी तरह तैयार है। मोदी के प्रस्ताव के अनुसार एक हफ्ते के भीतर सार्क देशों में कोरोना से निपटने में जुटे विशेषज्ञों की वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें वे अपने-अपने अनुभवों को साझा करने के साथ ही एक-दूसरे की मदद करने योग्य मुद्दों पर चर्चा करेंगे। मोदी ने कहा कि भारत सार्क के साथी देशों के साथ इस महामारी पर निगरानी के सॉफ्टवेयर को भी साझा करने को तैयार हैं। साथ ही इसके इस्तेमाल का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। मोदी ने सभी देशों को अपने देश की उन्नत चिकित्सा सुविधा साझा करने की पेशकश की। इस तरह मोदी ने सार्क के बीच पहल कर विश्व समुदाय के लिए एक उदाहरण पेश किया है। पाकिस्तान को छोड़कर सभी सार्क देशों ने इसे सकारात्मक ढंग से लिया। मोदी के ट्वीट प्रस्ताव के साथ ही सबने इस पहल की प्रशंसा करते हुए इसमें भागीदारी की बात की थी। सम्मेलन में श्रीलंका, नेपाल, मालदीव, भूटान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने तो खराब स्वास्थ्य के बावजूद इसमें हिस्सा लिया। लेकिन पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री इमरान खान की जगह स्वास्थ्य मामलों के विशेष सहायक जफर मिर्जा को भेज दिया। सम्मेलन के दौरान भी सभी सार्क देश कोरोना से निपटने के लिए साझा रणनीति पर चर्चा कर रहे थे, वहीं पाकिस्तान ने इससे निपटने में चीन का गुणगान करते हुए उससे सीखने की सलाह के साथ कश्मीर मुद्द उठाया। प्रधानमंत्री मोदी ने समय की नजाकत को भांपते हुए पाकिस्तान के हरकत की अनदेखी की तथा लक्ष्य के अनुरुप बैठक का सकारात्मक माहौल में अंत किया। 

देखा जाए तो यहां से केवल कोरोना वायरस में सहयोग का ही नहीं सार्क के जीवन में भी एक नए दौर की शुरुआत हुई है। पाकिस्तान के रवैये को देखते हुए भारत ने उसे दरकिनार कर अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय सहयोग को प्रमुखता दिया है तथा सार्क सम्मेलन पिछले चार सालों से स्थगित है। इस्लामाबाद सम्मेलन का भारत के बहिष्कार का साथ अन्य सभी देशों ने दिया था। भारत ने इसकी जगह बिम्सटेक को महत्व देना शुरु किया था। पूरी दुनिया को आतंकित करने वाले कोरोना वायरस से लड़ने के साथ कायम हुई एकजुटता यदि ठोस परिणाम लाता है जिसकी संभावना है तो फिर भविष्य में इसका विस्तार अन्य क्षेत्रों में हो सकता है। वैसे भी भारत ने अपने वायदे के अनुरुप सार्क देशों के लिए एक उपग्रह का प्रक्षेपण कर दिया है।  सार्क देशों में दुनिया की पूरी आबादी का पांचवां हिस्सा रहता है। इस नाते यहां सहयोग की संभावनां व्यापक हैं। मोदी ने सहयोग एवं साझेदारी की पहले भले अब की है लेकिन भारत ने कोरोना वायरस सामने आने के साथ ही अपने देश को रक्षित करने के समानांतर भारत की वैश्विक भूमिका का निर्वहन करना आरंभ कर दिया था। सम्मेलन के दौरान बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मुहम्मद सालिह ने कोरोना ग्रस्त इलाकों से अपने नागरिकों को बचाने के लिए मोदी की तारीफ की। अगर भारत ने इनके नागरिकों को दुष्प्रभावित देशों से नहीं निकाला होता तो ये भारत का आभार कैसे व्यक्त करते। यह तथ्य कम लोगों को मालूम है कि चीन में कोरोना वायरस का प्रकोप सामने आने ही मोदी ने वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को मदद की पेशकश की, विस्तृत पत्र लिखा। चीन को सबसे पहले चिकिस्ता सामग्री भेजने वाला देश भारत था। सबसे अंतिम 26 फरवरी को भारत ने 15 टन सामग्री वुहान भेजी थी। विदेश मंत्रलय के नेतृत्व में वहां से भारत के अलावा सात दूसरे देशों के 36 नागरिकों को भी निकाला गया। इसमें मेडागास्कर, दक्षिण अफ्रीका व अमेरिका के भी नागरिक थे। जापान से जब 27 फरवरी को भारतीयों को निकाला गया तो उनके साथ दक्षिण अमेरिकी देश पेरू समेत पांच दूसरे देशों के नागरिकों को भी निकाला गया। ईरान मेें तो चार वैज्ञानिक दलों के साथ एक पूरी लेबोरेटरी भेजी गई है। दक्षिण कोरिया को मदद की पेशकश की गई तो सिंगापुर को भी। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मोदी ने टेलीफोन पर बातचीत की तो उन्होंने कोरोनावायरस से लड़ने के लिए मास्क समेत अन्य चिकित्सा सामग्रियों की मांग की और भारत ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। वास्तव में मोदी लगातार दुनिया के नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मोरिसन से लेकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन इनमें शामिल हैं। 

प्रधानमंत्री अब जी 20 देशों के बीच सहयोग पर बातचीत कर रहे हैं।  वे नेताओं को कोरोना वायरस को लेकर एक सामूहिक नीति बनाने तथा एक दूसरे के बीच सहयोग विकसित करने पर बातचीत कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा है कि मैं इस बात से भी अवगत हूं कि पीएम मोदी जी20 देशों के बीच सामंजस्य बनाने को उत्सुक दिख रहे हैं। मेरे ख्याल से यह सराहनीय प्रसास है। ऑस्ट्रेलिया निश्चित रूप से इसका समर्थन करता है और यह संदेश भेजा जा चुका है। हालांकि विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत की तरफ से समूह-20 की बैठक बुलाने का कोई आह्वान अभी नहीं किया गया है लेकिन प्रधानमंत्री की वैश्विक नेताओं के साथ बातचीत में एक साझा रणनीति बनाने का सुझाव जरूर दिया गया है। दुनिया की स्थिति इसके विपरीत है। चीन और अमेरिका के बीच एक तरह से कूटनीतिक लड़ाई शुरू  हो गई है। पहले अमेरिका की तरफ से चीन पर आरोप लगाया गया कि उसने महामारी को रोकने की कोशिशों में सुस्ती बरती और दुनिया को इस हालात में पहुंचाने का वह दोषी है। चीन की तरफ से अमेरिकी सेना पर यह दोषारोपण किया गया कि वुहान में कोरोना वायरस को लाने में उसकी भूमिका संदिग्ध है। हालांकि चीन के आरोप पर कोई देश विश्वास करने वाला नहीं है। पर इसमें तनातनी देखी जा सकती है। अमेरिका द्वारा यूरोप से आवागमन पर प्रतिबंध लगाने के कारण कई यूरोपीय देशों ने नाराजगी व्यक्त कर दी है। 

कहने का तात्पर्य यह कि दुनिया के देश या तो अपने मंे उलझे हैं या फिर उनके बीच आपस में तनाव है। एकमात्र भारत ही है जिसके नेता ने पड़ोसियों के साथ सहयोग की पहल की और उसे विस्तारित करते हुए विश्व समुदाय की चिंता करने वाले देश के रुप में स्वयं को प्रस्तुत किया है। वैसे भी वैश्विक महामारी के लिए वैश्विक रणनीति और सहयोग का ढांचा होना चाहिए। यह काम इस समय भारत के अलावा कोई नहीं कर रहा। मोदी ने इस मामले में पड़ोसी प्रथम नीति के तहत सार्क देशों के साथ सहयोग के एक ढांचे की शुरुआत की और उसके बाद विश्व स्तर पर पहल किया है। ऐसे ही संकट में किसी देश और उसके नेतृत्व की पहचान होती है। अभी तक भारत एवं उसका नेतृत्व दुनिया के लिए श्रेष्ठ उदाहरण बनकर उभरा है जिसका असर लंबे समय मे विश्व पटल पर कई रुपों में दिखाई देगा। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

बुधवार, 18 मार्च 2020

(12.45) 17-03-2020 To 23-03-2020

इस अंक में क्या है

-स्वास्थ्य ही नहीं अर्थव्यवस्था को भी तेजी से प्रभावित कर रहा है कोरोना
-कोरोना का छाना, सिंधिया का जाना व संसद में हंगामा
-दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाईश रहे...
-कारगिल के सेनापति जॉर्ज फर्नांडिस जिनकी रगों में बसा था हिन्दुस्तान
-दिल्ली में 31 तक 50 से अधिक लोगों वाले कार्यक्रमों पर रोक, जिम-नाइट क्लब भी बंद
-मिर्जा गालिब को भारत रत्न दिए जाने की राज्यसभा में उठी मांग
-कोरोना से दिहाड़ी मजदूर भी प्रभावित, नहीं मिल रहा काम
-एमबीए वाले को रेलवे में मिली खलासी की नौकरी
-जेएनयू की सड़क का नाम ‘वीर सावरकर’ रखना शर्म की बातः आइशी
-तीन वर्ष में उत्तर प्रदेश ने अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त कियाः योगी आदित्यनाथ
-कोरोना वायरस से संक्रमितों के इलाज का पूरा खर्चा उठाएगी बिहार सरकारः नीतीश कुमार
-तेलंगाना विधानसभा में सीएए, एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पास
-दिल्ली दंगे: अब तक 718 मामले दर्ज, 3400 से ज्यादा लोग हिरासत में लिया गया
-भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर ने बनाई आजाद समाज पार्टी
-संघ की शाखाओं में हुई बढ़ोतरी, तीन हजार शाखाएं बढ़ीं
-कोरोना वायरस का असर, न्यूयॉर्क में सभी स्कूल,रेस्तरां और बार बंद
-कोरोना वायरस का कहर, ईरान के धार्मिक नेता आयतुल्ला हाशीम बाथेई की हुई मौत
-अमेरिका की अलबामा प्रतिनिधि सभा ने नमस्ते को अपनाने से इनकार किया
-अब पता चला क्यों इतनी तेजी से फैलता है कोरोना वायरस
-पुतिन 12 साल और बने रह सकते हैं रूस के राष्ट्रपति, तोड़ेंगे तानाशाह स्टालिन का रिकॉर्ड
-कोरोना का डर मोहें सतावै
-त्वचा संबंधी समस्याओं से छुटकारा दिलाती है कच्ची हल्दी
-फ्रिक्शनल थेरेपी क्या है, यह कैसे आपकी खूबसूरती बरकरार रखता है?
-फेफड़ों को हेल्दी बनाए रखने के लिए खाएं यह चीजें
-टयूलिप गार्डन देखने चलें कश्मीर
-क्या आप जानते हैं कैसे सजाएं पुराने कपड़ों से अपने घर को
-विश्व कप 1975: जब हार की कसक बनी थी भारतीय हाकी टीम के लिये जीत की प्रेरणा
-रोहित ने कहा, कोविड-19 के कारण दुनिया को थमते हुए देखना दुखद
-कोई नहीं जानता, कब शुरू होगा आईपीएल
-सपना चैधरी ने अपने बॉयफ्रेंड से कर ली सगाई
-दीपक ठाकुर और सोमी खान की शादी की तस्वीरें हुई वायरल
-जावेद अख्तर के सुनहरे शब्दों ने बदल दी थी आमिर खान की तकदीर
-अमिताभ बच्चन ने ‘अंग्रेजी मीडियम’ की अभिनेत्री को भेजा खत









शुक्रवार, 13 मार्च 2020

भयावह साजिश का इससे बड़़ा सबूत और क्या चाहिए

अवधेश कुमार

शाहीनबाग धरना, दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा तथा इसके पूर्व जामिया हिंसा को लेकर हुई हाल की पांच गिरफ्तारियों ने एक बार फिर इस खतरनाक सच को साबित किया है कि इनके पीछे देश विरोधी जेहादी-आतंकवादी-सांप्रदायिक शक्तियां सक्रिय हैं। दिल्ली पुलिस ने आठ मार्च को ओखला विहार के जामिया नगर इलाके से इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रॉविंस (आईएसकेपी) मॉड्यूल से जुड़े कश्मीरी दंपती को गिरफ्तार किया। कश्मीर के रहने वाले 36 वर्षीय जहांजेब सामी और उसकी पत्नी 39 वर्षीय हीना बशीर बेग गिरफ्तार होने के पहले शाहीन बाग व जामिया के प्रदर्शन में लगातार सक्रिय थे। इसके एक दिन बाद त्रिलोकपुरी से दानिश अली नाम के एक 33 वर्षीय युवा को गिरफ्तार किया गया जो पीएफआई का सक्रिय सदस्य है। यह भी शाहीनबाग से लेकर जामिया आंदोलन में सक्रिय था। हालांकि इसकी गिरफ्तारी उत्तरपूर्व दिल्ली में हुई हिंसा के संदर्भ में थी। उससे पूछताछ के आधार पर पीएफआई के अध्यक्ष परवेज़ अहमद और सचिव मोहम्मद इलियास को गिरफ्तार किया। उन पर दिल्ली दंगों के साथ शाहीनबाग को फंडिंग करने का आरोप है। हमारे देश के एक्टिविस्टों का एक वर्ग पुलिस के सारे दावों को नकारेगा एवं इनको निर्दोष साबित करने की कोशिश करेगा। आईएसआईएस से जुड़े पति-पत्नी के घर से यह बयान आ ही गया है कि वे तो कश्मीर में इंटरनेट बंद होने के कारण दिल्ली गए थे, क्योंकि उनकी कंपनी वही चली गई थी। लेकिन मूल सवाल यह है कि आखिर पुलिस की विशेष शाखा ने इन्हीं को क्यों गिरफ्तार किया जबकि शाहीनबाग एवं जामिया हिंसा व प्रदर्शनों में काफी संख्या में लोग शामिल थे? यही बात दानिश अली के मामले में भी लागू होता है। 

अभी तक जो जानकारी सामने आई है उसके अनुसार पुलिस को शाहीनबाग में ऐसे लोगों के शामिल होने की सूचना मिली थी जिनका संबंध आईएस जैसे संगठन से है तथा ये नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शनों का इस्तेमाल मुस्लिम युवाओं को भड़काकर हिंसा और आतंकी हमले के लिए करना चाहते थे। जहांजेब और हीना की पहचान पुलिस ने कर ली और इन पर नजर रखी जा रही थी। आगे बढ़ने के पहले आईएसकेपी के बारे में थोड़ी जानकारी जरुरी है। यह अफगानिस्तान में आईएसआईएस का सहयोगी संगठन है। खुरासान मॉड्यूल का मूल आधार पाकिस्तान-अफगान सीमा पर है। यह खतरनाक हमले करता है। तालिबान अमेरिका समझौते के बाद इसने अफगानिस्तान में बड़े हमले किए हैं। यह धन जुटाने के लिए अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश से सीधे जुड़ा है। इसे भारत से भी धन भेजे जाने की खबरें सामने आती रही हैं। खुरासान अफगानिस्तान का वह ऐतिहासिक क्षेत्र है, जिसमें अफगानिस्तान और ईरान के हिस्से शामिल थे। यहां ध्यान रखने की बात है कि आईएस ने विश्व इस्लामी साम्राज्य का जो नक्शा जारी किया था उसमें खुरासान में ही भारत के काफी क्षेत्र को शामिल किया था। आईएस ने इस क्षेत्र के लिए अपने कमांडर की नियुक्ति की भी घोषणा कर दी थी। आईएस खुरासान में तालिबान छोड़ने वाले और विदेशी लड़ाके दोनों शामिल हैं। इस संगठन को बेहद क्रूर माना जाता है। कश्मीरी युवाओं में यह फिदायीन हमलावर संगठन लोकप्रिय है। इसके लिए भर्ती दक्षिण एशिया से हो रही है। 

 ये दोनों सोशल मीडिया के माध्यम से संगठन की गतिविधियां फैला रहे थे। सीएए-एनआरसी के विरोध को जिंदा रखने के लिए दोनों आरोपी प्रदर्शनकारियों के अंदर जिहाद की बातें करते थे। दोनों सोशल मीडिया तथा ह्वाटस्टएप कौल के जरिए लगातार अफागानिस्तान के आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के संपर्क में थे। संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ भी सड़क पर उतरने के लिए इन्होंने उकसाया। इसके खिलाफ भड़काने वाली सामग्री भी ये लोग तैयार करके फैला रहे थे। जो लोग इन्हें मासूम साबित करने पर तुले हैं उन्हें इस बात का अवश्य जवाब देना चाहिए कि जहांजेब ने अलग-अलग नामों से सोशल मीडिया अकाउंट क्यों बनाया हुआ था? इसके कई कई फर्जी आईडी मिले हैं। ये टेलिग्राम, फेसबुक, थ्रीमा, श्योर स्पॉट, इंस्टाग्राम, ट्विटर आदि सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर एक्टिव थे। किसी कंपनी में सामान्य सॉफ्टवेयर का काम करने वाला इतने प्लेटफार्म पर और कई नामों से इतना सक्रिय नहीं रहता जितना ये थे। यही नहीं दोनों पति-पत्नी इंडियन मुस्लिम यूनाइट नाम का एक सोशल अकाउंट चला रहे थे। क्यों? वास्तव में ये आईएस की जेहादी विचारधारा से युवाओं को प्रभावित कर जेहादी गतिविधियां करने को प्रेरित कर रहे थे। जांच में यह बात भी सामने आई है कि ये सीएए के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों को फ्री कश्मीर के नारे लगवाते थे। ये दिल्ली के अलावा मुंबई और उत्तर प्रदेश के कई शहरों में भी लोगों को सीएए का डर दिखाते, उन्हें कौम के खिलाफ बड़ी साजिश बताते थे। पूछताछ में दोनों ने बताया कि वह आईएस की पत्रिका स्वात-अल-हिंद के फरवरी महीने के संस्करण को प्रकाशित करवाने में शामिल थे। इस पत्रिका को 24 फरवरी को ऑनलाइन जारी किया गया था। इसमें सीएए का विरोध कर रहे लोगों से जिहादी रास्ता अपनाने की अपील की गई थी। इसमें लिखा था कि लोकतंत्र आप लोगों को नहीं बचा पाएगा। जहांजेब शामी ने बीटेक किया है, जबकि हिना ने एमसीए किया है। दोनों अपनी विशेषज्ञता के कारण सोशल मीडिया एवं आधुनिक तकनीकों के उपयोग में निष्णात हैं। इनके घर से सीएए विरोधी और समुदाय के खिलाफ काफी सामग्रियां मिलीं हैं। 

इतने विवरण के बाद शाहीनबाग धरना तथा देश के अलग-अलग जगहों पर शाहीनबाग विस्तारित धरने, प्रदर्शनों को लेकर क्या किसी को संदेह रह जाता है कि इसके पीछे व्यापक गहरी साजिश है? उत्तर प्रदेश एवं असम की हिंसा में पीएफआई की संलिप्तता के इतने प्रमाण मिले हैं कि केन्द्रीय गृहमंत्रालय के पास इनको प्रतिबंधित करने की अनुशंसाएं विचाराधीन है। जामिया हिंसा के बारे में भी पुलिस ने जो आरोप पत्र न्यायालय में डाला है उसमें भी पीएफआई का नाम है। शाहीनबाग में जिस तरह के भड़काउ भाषण हो रहे थे, जैसी सामग्रियां बंटती रहीं हैं और वहां जिस तरह हर प्रकार के संसाधन उपलब्ध रहे हैं उनसे किसी भी निष्पक्ष व्यक्ति के अंदर कई प्रकार के संदेह पैदा होते थे। केन्द्र सरकार को पूरी तरह मुस्लिम विरोधी बताना तथा उसके खिलाफ मरने-मारने के लिए तैयार करने की बातें खुलेआम होती रहीं हैं। उसमें चेहरे से तो आप पहचान नहीं सकते थे कि बोलने वाला कौन है? इसकी पृष्ठभूमि क्या है? यह किस उद्देश्य से यहां सक्रिय है। अब अगर आईएस जैसे संगठन की भूमिका तक वहां सामने आ रही है तो इसी से समझा जा सकता है कि साजिश कितनी गहरी और खतरनाक है। यह बिल्कुल संभव है कि आने वाले समय में और भयावह जानकारियां सामने आएं। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का एक दस्तावेज सामने आया है जिसमें दलितों और मुस्लिमों को इकट्ठा कर भारत को अस्थिर करने की योजना है। संभव है उसको भी अमल में आने की कोशिशें हुईं हों। दिसंबर हिंसा के पीछे पीएफआई से जुड़े संगठनोें के खाते में 120 करोड़ रुपया आने तथा हिंसा के साथ तेजी से जमा होने एवं निकालने का पूरा आंकड़ा तथ्यों के साथ सामने रखा जा चुका है। पता नहीं और कौन-कौन से संगठन या उससे प्रभावित भारत विरोधी जेहादी, माओवादी या अन्य प्रकार की हिंसक और सांप्रदायिक विचारधारा मे परिणत मस्तिष्क इसके पीछे सक्रिय हैं। यह बात तो आसानी से समझ में आती है कि जो नागरिकता कानून तीन देशों से धार्मिक रुप से उत्पीड़ित और अपनी सम्मान गंवाकर पलायन कर शरण के लिए आए लुटे-पिटे लोगों को नागरिकता देने के लिए है उसे मुसलमानों के खिलाफ झूठे दुष्प्रचार को लोगों के दिमाग तक पहुंचाने वालों का एक प्रभावी तंत्र अवश्य होगा। कैसे निहायत ही झूठ को इनने लोगों के दिमाग में उतार दिया कि मोदी और शाह मुसलमानों के खिलाफ है, वह आपकी नागरिकता छीन लेगा, आपको जेलों में डाल देगा या देश से बाहर भी निकाल देगा। यह किसी छोटे तंत्र के वश के बाहर है। अब जब पीएफआई के बाद आईएस तक की भूमिका सामने आ गई है तो फिर यह समझने में देर नहीं लगना चाहिए किस तरह की शक्तियां भारत को अशांत करने के लिए सक्रिय हैं। दिल्ली हिंसा में पीएफआई की भले पहली गिरफ्तारी है किंतु आने वाले समय में और गिरफ्तारियां एवं तथ्य सामने आएंगे। एनआईए इसकी ज्यादा गहराई से जांच करेगी। यह उन लोगों को भी सोचना चाहिए जो इनके बहकावे में आकर प्रदर्शनों में शामिल हुए या सांप्रदायिक उकसावे में आकर हिंसक गतिविधियों तक में संलिप्त हो गए। साथ ही पुलिस प्रशासन को भी इसका जवाब देना चाहिए कि आखिर इतने भयानक तत्वों की भूमिका सामने आने के बाद भी शाहीनबाग जैसे अवैध और नासूर बन चुके धरना को खत्म करने में समस्या क्या है?

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208


मंगलवार, 10 मार्च 2020

शनिवार, 7 मार्च 2020

जेएनयू देशद्रोह मामले में राजनीति

 

अवधेश कुमार

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार द्वारा देशद्रोह के चार साल पुराने मामले में मुकदमा चलाने के लिए दिल्ली पुलिस को मंजूरी दिए जाने के साथ जो विवाद पैदा हुआ है उसे बिल्कुल स्वाभाविक माना जाना चाहिए। जेएनयू में देशद्रोही नारे के साथ हुई कानूनी कार्रवाई के बाद राजनीतिक दलों ने जैसा हंगामा किया था, जेएनयू में इन नारा लगाने वाले छात्रों के समर्थन में जैसी सभाएं हुईं उसे याद करिए तो वर्तमान विवाद कुछ नहीं है। जब गैर भाजपा दलों के ज्यादातर नेताओं ने नारा लगाने वालों के पक्ष में एकजुटता दिखाई, सरकार को फासीवादी से लेकर आपातकाल लगाने और न जाने क्या क्या कहा तो वे इन पर मुकदमा चलाने की अनुमति का समर्थन कैसे कर सकते हैं? पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम की प्रतिक्रिया सबसे पहले आई। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि दिल्ली सरकार की समझ भी राजद्रोह कानून को लेकर केंद्र सरकार से कम नहीं है। कन्हैया कुमार और अन्य के खिलाफ भारतीय दंड सहिंता (आईपीसी) की धारा 124ए और 120बी के तहत राजद्रोह का केस चलाने की मंजूरी देने का कड़ा विरोध करता हूं। दूसरी पार्टियां कह रहीं हैं कि भाजपा और आप एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक केजरीवाल सरकार फाइल पर पंजा डाले चुपचाप बैठी थी तब तक वो सही थी लेकिन जैसे ही उसने अनुमति दी वह खलनायक हो गई। क्या मुकदमा चलाने की अनुमति मांगने वाली फाइल पर कोई निर्णय होना ही नहीं चाहिए था?

चिदंबरम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की घोषणा पत्र समिति के अध्यक्ष थे जिसमें देशद्रोह कानून खत्म करने का वायदा किया गया था। अगर आप एक वर्ष में न्यायिक कार्रवाई को देखें तो न्यायालय ने बार-बार पूछा कि अनुमति क्यों नहीं मिल रही है? न्यायालय ने कई बार टिप्पणियां की कि सरकार स्थायी रुप से फाइल को दबाकर नहीं रख सकती। जिन लोगों को न्यायालय पर विश्वास है उनको तो मांग करनी चाहिए थी कि दिल्ली सरकार मुकदमा चलाने वाली फाइल को क्लियर करे। आखिर न्यायालय बिना तथ्यों के किसी को सजा तो दे नहीं सकता। नियमों के मुताबिक जांच एजेंसियों को राजद्रोह के मामलों में आरोपपत्र दाखिल करने के लिए राज्य सरकार की मंजूरी लेनी होती है। दिल्ली सरकार के रवैये को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने 14 जनवरी 2019 को पटियाला हाउस की विशेष अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया। आरोप पत्र दाखिल होने के बाद अगली तारीख पर न्यायालय ने दस दिनों में मंजूरी लाने का समय दिया था। कायदे से 24 जनवरी को इसकी अनुमति मिल जानी चाहिए थी। 20 जनवरी 2019 को न्यायालय ने दिल्ली के विधि विभाग से बिना अनुमति लिए बगैर आरोप पत्र दाखिल करने दिल्ली पुलिस से सवाल भी किए थे। पुलिस ने अदालत से कहा था कि वह 10 दिनों में विधि विभाग व अन्य संबंधित विभागों से मंजूरी ले लेगा। 6 फरबरी 2019 को न्यायालय ने नाराजगी जताते हुए कहा कि वे अनिश्चितकाल तक फाइल को लेकर बैठ नहीं सकते। इसके बाद यह बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि किस तरह दिल्ली सरकार ने एक औपचारिकता पूरी करने के नाम पर न्यायिक प्रक्रिया को बाधित रखा। 

 14 जनवरी  2019 को दिल्ली पुलिस ने जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत 10 लोगों के खिलाफ जो आरोपपत्र दाखिल किया था उस पर नजर डालना आवश्यक है। जेएनयू परिसर में 9 फरवरी 2016 को जिस तरह के नारे लगे उसे देश हजारों बार सुन चुका है। यह कार्यक्रम संसद हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को फांसी दिए जाने की बरसी पर आयोजित किया गया था। 1200 पृष्ठों के आरोप पत्र में कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य, शेहला रशीद, अकीब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उमर गुल, रेयेया रसूल, बशीर भट और बसरत के नाम शामिल हैं। 36 अन्य के नाम आरोपपत्र की कॉलम संख्या-12 में हैं जिनके खिलाफ सबूतों केा अपर्याप्त बताया गया है। आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह), 323 (किसी को चोट पहुंचाने के लिए सजा), 465 (जालसाजी के लिए सजा), 471 (फर्जी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को वास्तविक के तौर पर इस्तेमाल करना), 143 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होने के लिए सजा), 149 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होना), 147 (दंगा फैलाने के लिए सजा) और 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत आरोप लगाए गए हैं। इन धाराओं को लेकर यकीनन दो मत हो सकते हैं। किंतु पुलिस ने इसमें काफी प्रमाण और तथ्य पेश किए हैं। आरोपपत्र में सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल फोन के फुटेज,फोरेंसिक और फेसबुक डेटा के साथ दस्तावेजी प्रमाण हैं। वीडियो व फोन की लोकेशन भी सबूत के तौर है। 50 पृष्ठों में साक्ष्य व दस्तावेजों की सूची है। घटनास्थल पर मौजूद लोगों की पहचान फेसबुक डेटा का विश्लेषण और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के जरिए की गई। आरोपियों के फेसबुक प्रोफाइल में कई सबूत हाथ लगे। एक आरोपी ने नारेबाजी की वीडियो अपने फेसबुक पर डाल रखी थी। इन आरोपियों ने पूछताछ में बताया कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा छात्रों को लेकर आने के लिए कहा गया था। जो वीडियो मिले, उन सबकी फोरेंसिक जांच कराई गई और सही साबित होने के बाद आरोप पत्र में शामिल किया गया। 90 गवाहों के नाम है। भीड़ द्वारा भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह, इंशाअल्लाह.... नारेबाजी के विडियो पर फरेंसिक साक्ष्य भी पेश किए हैं। 

पुलिस के साक्ष्य एवं गवाह कहां तक ठहरते हैं इस बारे में कोई टिप्पणी करना उचित नहीं है। आरोप पत्र में कहा गया है कि 9 फरवरी 2016 की गतिविधि के लिए अनुमति की प्रक्रिया भी पूरी नहीं की गई थी। प्रदर्शनकारियों को रोका गया और बताया गया कि कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं है। कन्हैया कुमार आगे आए और सुरक्षा अधिकारी के साथ बहस करने लगे और भीड़ में मौजूद लोगों ने नारेबाजी शुरू कर दी। हालांकि कन्हैया कुमार ने स्वयं नारे लगाए या नहीं या जिन लोगों ने नारे लगाए उनको इनका समर्थन था या नहीं इनको साबित करना आसान नहीं होगा। इस तरह मामले की न्यायिक परिणति के बारे में कुछ भी कहना कठिन है। फैसला जो भी हो, लेकिन जो नारे लगे उसे देश विरोधी मानने में किसी को संकोच नहीं हो सकता। नारों पर ध्यान दीजिए- ‘तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’, ‘ तुम कितने मकबूल मारोगे हर घर से मकबूल निकलेगा’, ‘अफजल के अरमानों को हम मंजिल तक पहुंचाएंगे’, ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’, ‘ हम क्या चाहें आजादी, हक हमारा आजादी’, ‘कहकर लेंगे आजादी,कश्मीर मांगे आजादी’, ‘कश्मीर की आजादी तक, जंग रहेगी जंग रहेगी, भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी जंग रहेगी’.........। इन नारों से पूरे देश का खून खौल गया था। अफजल को 9 फरवरी, 2013 और मकबूल भट को 11 फरवरी, 1984 को फांसी दी गई थी। जेएनयू में ‘द कंट्री विदाउट ए पोस्ट ऑफिस’ के नाम से कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसके पोस्टर पर छोटे अक्षरों में लिखा था- , ‘लोकतांत्रिक अधिकार- आत्मनिर्णय के समर्थन के लिए कश्मीरी लोगों के संघर्ष के साथ एकजुटता में।.....अफजल और मकबूल की ज्यूडिशियल किलिंग यानी न्यायिक हत्या के खिलाफ। पोस्टर की ये पंक्तियां भी देश विरोधी थीं। 

न्यायालय इन्हें देशद्रोह का मामला मानेगा या नहीं यह कानूनी पेचीदगियों का मामला हो सकता है, पर ये विचार भारत विरोधी हैं इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। कोई भारत की बर्बादी का नारा लगाए, भारत को तोड़ने का नारा लगाए, जिन्हें हमारे उच्चतम न्यायालय ने फांसी की सजा दी और राष्ट्रपति ने उस पर अपनी मुहर लगाई हो उसे न्यायिक हत्या कहे, पाकिस्तान जिन्दाबाद बोले....... उसे भारत विरोधी नहीं तो और क्या कहा जा सकता है? अफजल और मकबूल के अरमानों को पूरा करने के संकल्प का अर्थ क्या है? क्या ये उसी तरह बनना चाहते हैं? यह तो देश का दुर्भाग्य है कि ऐसा मामला भी राजनीतिक विकृति का शिकार हो गया, अन्यथा इसके दोषियों को चिन्हित कर अब तक सजा मिल जानी चाहिए थी तथा पूरे देश का एक स्वर में इसका समर्थन मिलना चाहिए था। वैसे उमर खालिद ने 10 जुलाई 2016 को अपने फेसबुक पोस्ट पर हिजबुल आतंकवादी बुरहान मुजफ्फर वानी की तुलना अर्जेंटीना के मार्क्सवादी क्रांतिकारी चे ग्वेरा से कर डाली। उसने लिखा वानी आजाद जिया आजाद मरा...-  ‘चे ग्वेरा ने कहा था कि अगर मैं मारा भी जाऊं तो मुझे तब तक फर्क नहीं पड़ता, जब तक कोई और मेरी बंदूक उठाकर गोलियां चलाता रहेगा। शायद यही शब्द बुरहान वानी के भी रहे होंगे। - उमर ने लिखा, कश्मीर पर कब्जे का खात्मा हो। भारत, तुम उन लोगों को कैसे हराओगे जिन्होंने अपने डर को हरा दिया है। हमेशा ताकतवर रहो बुरहान। एक आतंकवादी का इस तरह महिमामंडित कर उसका समर्थन करना देश विरोधी गतिविधि ही तो मारना जाएगा। ऐसे लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की औपचारिकता में इतनी देरी दिल दहलाने वाली है। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर-01122483408, 09811027208  


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