शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

एक नए केजरीवाल का दर्शन


अवधेश कुमार

अरविन्द केजरीवाल के शपथग्रहण समारोह ने ज्यादातर विपक्षी दलों को धक्का पहुंचाया होगा। इस विजय के बाद विपक्ष ने जिस तरह का उत्साह दिखाया था उससे ऐसा लग रहा था कि वर्तमान माहौल में राजधानी दिल्ली का रामलीला मैदान भाजपा विरोधी विपक्षी जमावड़े का मंच बनेगा। निश्चय ही ज्यादातर नेता शपथग्रहण के निमंत्रण का इंतजार कर रहे होंगे। केजरीवाल ने किसी विपक्षी नेता को निमंत्रण नहीं दिया। इस समय नागरिकता संशोधन कानून, एनपीआर एवं एनआरसी को लेकर विपक्ष ने जिस तरह भाजपा विरोध माहौल बनाया हुआ है उसे देखें तो यह असामान्य राजनीतिक घटना लगेगी। जाहिर है, इसका भविष्य की राजनीति के लिए गंभीर मायने हैं। इस पर विचार करना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को शपथग्रहण में आने का निमंत्रण दिया था। यह बात अलग है कि वाराणसी में निर्धारित कार्यक्रम होने के कारण उन्होंने विनम्रतापूर्वक अपनी कठिनाई से अवगत कराई। वास्तव में शपथग्रहण समारोह का पूरा माहौल, विपक्ष की अनुपस्थिति तथा केजरीवाल द्वारा दिए गए भाषण ने मोदी सरकार के विरोधियों की कल्पनाओं और उम्मीदों से बिल्कुल अलग संकेत दिए हैं। तो क्या हैं वे संकेत? क्या हैं उनके मायने? क्या हो सकता है राजनीति पर इसका असर?

इन प्रश्नों पर इसलिए भी विचार करना जरुरी है क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद ही कुछ लोग केजरीवाल को मोदी विरोधी विपक्षी एकता का चेहरा बनाने की बात करने लगे थे तो कुछ कहने लगे थे कि यह विपक्षी एकता की गंगोत्री साबित होगी जो मोदी और शाह को बहा ले जाएगी। पूरे देश ने रामलीला मैदान से एक ऐसे केजरीवाल का चेहरा देखा जो टकराव की जगह केन्द्र के साथ समन्वय व सहयोग की नीति अपनाने की बात कर रहा था। उनके पूरे भाषण में एक शब्द केन्द्र सरकार ही नहीं, दिल्ली में भाजपा शासित नगर ईकाइयों के खिलाफ भी नहीं थी। बल्कि उन्होंने अपने भाषण मेें यह कहा कि प्रधानमंत्री आज किसी और कार्यक्रम में व्यस्त हैं हमें उनके साथ सभी मंत्रियों को आशीर्वाद चाहिए। शायद ही कोई केजरीवाल से ऐसी बातों की उम्मीद कर रहा था। उन्होंने दो करोड़ दिल्लवासियों की बात की तो देश की भी। ऐसा लग रहा था जैसे एक नेता दिल्ली और देश के विकास के लिए मिल जुलकर काम करने का आह्वान कर रहा हो। उन्होंने भारत के दुनिया की एक बड़ी शक्ति होने का विश्वास भी प्रकट किया। कोई विपक्षी नेता देश के महाशक्ति होने के विश्वास का भाषण नहीे करता। इसके उलट मोदी सरकार की आलोचना में कई नेता सीमा का अतिक्रमण कर देश को ही छोटा दिखा देते हैं। गहराई से विचार करेंगे तो केजरीवाल ने स्वयं के बारे में दिल्ली के विकास पर काम करने के साथ देश को भी आगे बढ़ाने में योगदान करने के लिए तैयार नेता होने का संदेश दिया। 

इसे अगर बोले गए शब्दों के अनुसार विचार करें तो भारतीय राजनीति के लिए इसके अर्थ काफी गहरे हैं। नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो छः करोड़ गुजरातियों की बात हमेशा करते थे। उसके साथ वे यह भी कहते थे कि हम गुजरात का विकास कर देश के विकास में योगदान करते हैं। यह राष्ट्रवाद उन्मुख क्षेत्रीयता थी। ठीक यही रास्ता केजरीवाल अपनाते दिख रहे हैं। दूसरे, उन्होंने एक शब्द टकराव का नहीं बोला। इसकी जगह कहा कि चुनाव में एक दूसरे पर हमला होता है लेकिन यह चुनाव खत्म होने के साथ ही खत्म हो जाना चाहिए। किसी ने किसी को भी वोट किया हो मैं सभी का मुख्यमंत्री हूं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यही आदर्श स्थिति होनी चाहिए। राजनीति का मूल उद्देश्य जनता की सेवा है। इसमें चुनाव एक प्रतिस्पर्धा है जिसमें जो सत्ता तक पहुंचा उसे सब कुछ भुलाकर सेवा के काम में लग जाना चाहिए और विपक्ष को भी सकारात्मक व्यवहार करना चाहिए। चुनाव की कटुता आगे बिल्कुल न दिखे। विपक्ष अपनी भूमिका निभाए लेकिन अवरोधक बनकर नहीं। वहां विरोध करे जहां सरकार जनहित के विपरीत काम कर रही हो। प्रदेश की सरकारें केन्द्र से अनावश्यक राजनीतिक टकराव की जगह मिलकर जनहित और देशहित में काम करे तो भारत कम समय में ही न केवल अपनी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समाधान कर लेगा बल्कि अपनी विशेष सांस्कृतिक पहचान के साथ विश्व की पहली कतार का देश भी बन जाएगा। हर भारतीय का यही तो सपना है। अगर अरविंद केजरीवाल एक प्रदेश के मुख्यमंत्री के रुप में ऐसा सोचते हैं तो पहली नजर में इसका स्वागत होना ही चाहिए। 

समस्या यह है कि केजरीवाल ने 2011 से 2020 तक इतनी बार अपनी ही घोषणाओं और वक्तव्यों के विपरीत काम किया है तथा उसे सही भी ठहराया है कि सहसा विश्वास नहीं होता कि उनका ह्रदय परिवर्तन हो गया होगा। जो व्यक्ति  हर बात में मोदी को खलनायक बता रहा हो वह आशीर्वाद मांगने लगे, तिरंगा को सिरमौर बनाने तथा देश को उच्च शिखर पर ले जाने की बात करने लगे तो अचरज होगा ही। मुख्यमंत्री के लिए धूर्त शब्द का प्रयोग करना उचित नहीं है इसलिए उन्हें चतुर नेता कहूंगा। उनके अभिनय की कला उन्हें सर्वाधिक चतुर नेता की श्रेणी में लाकर खड़ा करती है। जब तक हम उनके कहे हुए को आगे लंबे समय तक आचरण में बदलता न देख लें, यही मानेंगे कि ये सब उनके चतुर अभिनय का ही भाग होगा। हालांकि कामना यही होगी कि वाकई अपने अनुभवों से उन्होंने सीखा हो और केवल राजनीतिक लाभ के लिए बोलने और कदम उठाने के लिए देश और दिल्ली के हित में ईमानदारी से केन्द्र के साथ एक टीम के रुप में काम करें। 

वैसे कुछ बातें चुनाव के समय से ही दिख रही थी। वे मोदी का नाम तक लेने से बच रहे थे। भाजपा के हिन्दुत्व और राष्ट्रीयता की काट के लिए उन्होंने रणनीतिक हिन्दुत्व व राष्ट्रवाद को अपनाया। इसका चुनावी लाभ उनको मिला है। उन्हें पता है कि दिल्ली में अब उनके सामने केवल भाजपा ही है जिसकी ताकत मोदी सरकार की जन कल्याणकारी योजनाएं, विदेश स्तर पर भारत का बढ़ा हुआ सम्मान और बदली छवि तथा वैचारिक स्तर पर हिन्दुत्व एवं राष्ट्रवाद है। तो राजनीति में चुनावी लाभ लेने तक विदेश को छोड़कर अन्य पहलू  अपनाने में हर्ज नहीं है। 14 फरबरी 2015 को जब वे रामलीला मैदान में शपथ ले रहे थे तो उनके सिर पर टोपी थी। इस बार कपाल पर बड़ा सा चंदन था। श्रवण कुमार द्वारा माता-पिता की तीर्थ यात्रा कराने की चर्चा उन्होंने की। यह निष्ठावान हिन्दू होने का ही तो संकेत था। तो मोदी की गुजरात राजनीतिक मॉडल के अनुरुप दिल्ली की क्षेत्रीय राजनीति पर कायम रहते हुए उसे राष्ट्रवाद से जोड़ना तथा भाजपा की ओर मतदाताओं को जाने से रोकने के लिए हिन्दुत्व का छौंक देते रहना। साथ ही मोदी की जन लोकप्रियता का ध्यान रखते हुए उनकी आलोचना स्वयं न करना। इसमें विपक्षी गोलबंदी के लिए जगह तत्काल तो नहीं है। अगर राजनीतिक परिस्थितियां नहीं बदली तो कम से कम अगले कुछ समय तक उनकी राजनीतिक धारा यही बनी रहेगी। यह वर्तमान समय के आम विपक्षी पार्टी का रवैया नहीं है। ध्यान रखिए, चुनाव में भी उन्होंने किसी विपक्षी नेता को अपने पक्ष में भाषण देने के लिए नहीं बुलाया, जबकि वो स्वयं चन्द्रबाबू नायडू के लिए प्रचार करने गए थे। इसका एक संकेत यही है कि वे मोदी विरोधी विपक्ष की राजनीति का भाग बनने से बचेंगे। आगे का नहीं कह सकते लेकिन विपक्ष के लिए तत्काल यह निराशाजनक है। पंजाब में भी वे अकेले ही चलने की कोशिश करेंगे। वे केन्द्र के साथ कुछ समय तक अवश्य सहयोग करके चलेंगे। उनके सहयोगी बताते हैं कि मोदी एवं उनकी टीम के कुछ सदस्यों ने पिछले कुछ समय में विकास से लेकर, पर्यावरण, यातयात, यमुना सफाई.... आदि पर जिस तरह खुलकर सहयोग किया है उससे वे अपना विचार बदलने को बाध्य हुए हैं। सहयोग का उत्तर आप असहयोग और निंदा से तो नहीं दे सकते। उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक इसी नीति पर चले रहे हैं और उनके साथ केन्द्र की ओर से कोई समस्या नहीं। हालांकि नवीन पटनायक केजरीवाल की तरह अभिनय और अति लोकप्रियतावादी कदमों से बचते हैं। 

बहरहाल, जब तक इसके अतिरिक्त कुछ सामने नहीं आता हमें मानकर चलना होगा कि 16 फरबरी 2020 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले केजरीवाल काफी हद तक एक बदले हुए नेता नजर आए हैं। किसी की एक शब्द आलोचना नहीं, आमूल-चूल बदलाव की कोई अव्यावहारिक क्रांतिकारी वायदा नहीं, लोगों के अंदर उत्तेजना पैदा करने का भी कोई वक्तव्य नहीं। केवल मिलजुलकर का करने की चाहत। प्रधानमंत्री का सम्मान से नाम। देश की राजनीति पर भी उन्होंने कुछ नहीं बोला। केवल अपनी योजनाओं की अन्य राज्यों द्वारा अपनाने की बात की। नागरिकता संशोधन कानून से लेकर एनपीआर एवं एनसीआर पर पूरे चुनाव प्रचार से लेकर शपथग्रहण तक की उनकी चुप्पी भी बहुत कुछ कहती है। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208


मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

(12.41) 18-02-2020 To 24-02-2020

इस अंक में क्या है

-दीनदयाल जी होते तो दिल्ली चुनावों के नतीजों पर क्या कहते?
-राज्यसभा में खाली हो रही है 68 सीटें, विपक्षी ताकत होगी कम
-क्या दिल्ली में स्टार प्रचारकों के प्रचार न करने की वजह से हारी कांग्रेस
-क्या दिल्ली के जनादेश का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा
-सितारों जैसी चमक वाली कांग्रेस इन कारणों से शून्य में विलीन हो गई
-दिल्ली में करारी हार के बाद भाजपा में बैठकों का दौर, भविष्य की रणनीति पर विचार
-केजरीवाल कैबिनेट में किसको क्या मिला
-होली के बाद अपना बजट पेश करेगी दिल्ली सरकारः सिसोदिया
-जनता के भरोसे को टूटने नहीं दूंगाः अनिल कुमार वाजपेयी
-केंद्र सरकार 2025 तक तपेदिक खत्म करने पर काम कर रही हैः हर्षवर्धन
-तलाक पर भागवत का बयान संस्कारी नहीं, अहंकारी हैः कांग्रेस
-ट्रंप के रोडशो के दौरान तैनात रहेंगे 10 हजार से अधिक पुलिसकर्मी
-तेजस्वी की हाईटेक लग्जरी बस गरीब बीपीएल कार्ड धारक के नाम पर हैः मंत्री
-शून्य तक पहुंचने के लिए बहुत तेजी दिखा रही है कांग्रेस पार्टी
-फेसबुक रैंकिंग पर डोनाल्ड ट्रम्प रहे नंबर वन
-1 महीने के राष्ट्रव्यापी अभियान में आप 1 करोड़ लोगों को जोड़ेगा
-इस देश में भारी मात्रा में बिक रहे हैं चमगादड़, कोरोना वायरस का नहीं किसी को डर!
-भारतीयों का जलवा, नारायण मूर्ति के दामाद ऋषि सुनक बने ब्रिटेन के नए वित्त मंत्री
-कोरोना वायरसः मास्क की किल्लत की वजह से डॉक्टरों को दिए गए डायपर पहनने के निर्देश
-गांधी जी स्वयं को कट्टर सनातनी हिंदू मानते थेः मोहन भागवत
-कर्मचारियों की तलाशी लेने वाली कम्पनी एप्पल पर लगा भारी जुर्माना
-उस जगह जरूर जाइए जहां नल-नील ने बनाया था श्रीराम के लिए सेतु
-सर्दियों में ऐसे करें बालों की देखभाल, बाल रहेंगे मुलायम और चमकदार
-ऐसा मंदिर जहां चूहों को भोग लगाने से प्रसन्न होती है माता
-लड़कों के लुक को खास बनाते हैं यह हेयर स्टाइल
-पेस अभी एक साल और खेल सकते हैः भूपति
-2009 के आतंकी हमले के बाद कुमार संगकारा फिर करेंगे पाकिस्तान दौरा
-न्यूजीलैंड के खिलाड़ियों को बेहतर बनाने में आईपीएल का है बहुत बड़ा योगदानः गाविन लार्सन
-धोनी में अभी बहुत क्रिकेट बाकी है,  अपने संन्यास का समय वो खुद तय करेंगे: शुक्ला
-मैंने केवल दो फिल्मों में ‘मोनोलॉग’ कहे हैंः कार्तिक आर्यन
-बिग बोस 13 के विजेता बनें सिद्धार्थ शुक्ला, असीम रियाज ने दी कांटे की टक्कर
-जब उर्वशी रौतेला करने लगी आई लव यू बोलने की जिद्द
-क्या सच में  वरुण धवन का नताशा के साथ हो गया है रोका?








शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

चौंकाने वाला नहीं है परिणाम

 

अवधेश कुमार

दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम ने शायद ही किसी को चौंकाया होगा। हां, इसके विश्लेषण को लेकर अवश्य कई राय हो सकते हैं। आरंभ से ही पूरा चुनाव आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल की ओर एकपक्षीय लग रहा था। सारे मतदान पूर्व सर्वेक्षणों ने इसका संकेत भी दे दिया था। कुछ विश्लेषकों ने तो यहां तक टिप्पणी कर दी थी कि आप 2015 के अपने पुराने अंकगणित के आसपास पहुंच सकती है। भाजपा को भी इसका अहसास निश्चित रुप से रहा होगा। लेकिन भाजपा नेतृत्व केजरीवाल के पक्ष में सहानुभूति और समर्थन की लहर की काट करने में सफल नहीं हो पा रहा था। अमित शाह को स्वयं कूदना पड़ा। उनके आक्रामक अभियान तथा चुनाव प्रबंधन की कुशलता ने असर डालना आरंभ किया। भाजपा के निरुत्साहित पड़े कार्यकर्ता सक्रिय हुए। इसका असर हम उसके मतों में करीब सात प्रतिशत की वृद्धि के रुप में देख रहे हैं। कंतु कुल मिलाकर यह कहने में हर्ज नहीं है कि वह केजरीवाल की काट तलाश नहीं कर पाई। तो क्यों हुआ ऐसा?

अपने-अपने नजरिए से इसका उत्तर दिया जा रहा है। इस परिणाम को किसी तरह नागरिकता संशोधन कानून, धारा 370 हटाने, शाहीन बाग धरने के आक्रामक विरोध से जोड़कर देखना गलत विश्लेषण होगा। सारे सर्वेक्षणों का निष्कर्ष यही था कि इन मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार को भारी बहुमत का समर्थन प्राप्त है। जनता कह रही थी कि हम दिल्ली में वोट केजरीवाल को दंेेगे लेकिन धारा 370 हटाने और नागरिकता कानून पर केन्द्र सरकार का समर्थन करते हैं। लोगों ने ज्यादातर सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री के रुप में नरेन्द्र मोदी को पसंद किया तो बतौर मुख्यमंत्री केजरीवाल को। इस सच को नकारकर आप कोई भी निष्कर्ष दे देंगे तो वह सच नहीं होगा। सच तो यह है कि केजरीवाल पिछले एक वर्ष से चुनाव के मोड में आ गए थे। आप उनके वक्तव्यों, तेवर तथा कार्यप्रणाली में आए परिवर्तनों को साफ-साफ देख सकते थे। छः महीना पहले से तो वे केवल चुनावी केन्द्रित वक्तव्य एवं फैसले कर रहे थे। सच कहें तो महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा, चुनाव के पूर्व महीने में ज्यादातर लोगों के बिजली बिल को माफ कर देना तथा पानी के बिल में भारी माफी ने इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह ऐसा लोकप्रियतावादी कदम था जिसकी काट किसी पार्टी के पास नहीं थी। भारत का आम मानस इस तरह के लोकप्रियतावादी कदमों की ओर तात्कालिक रुप से आकर्षित होता है। हालांकि भाजपा ने भी अपने संकल्प पत्र में स्पष्ट किया कि वे सत्ता में आए तो बिजली, पानी के दर में कटौती जारी रहेगा। उन्होंने भी केजरीवाल की तरह कुछ लोकप्रियतावादी घोषणाएं की। मसलन, दो रुपए किलो आटा, छात्रों को साईकिल एवं इलेक्ट्कि स्कूटर आदि। इसका कुछ असर भी हुआ लेकिन असर इतना नहीं थी कि भाजपा आप की विजय को रोक दे। 

भाजपा का प्रदेश नेतृत्व इस मुगालते में था कि केजरीवाल ने 2015 के अपने चुनावी वायदों को पूरा नहीं किया है तथा अब उनकी छवि पुराने आंदोलनकारी भी नहीं है, इसलिए उनको जनता के बीच कठघरे में खड़ा कर पराजित करना कठिन नहीं होगा। वे भूल गए कि केजरीवाल परंपरागत राजनेता नहीं हैं। अपने कार्यकाल के अंतिम समय में उन्होंने घोषणा पत्र के कुछ अंशों को क्रियान्वित करना आरंभ कर दिया और इसका भी असर हुआ।  केजरीवाल की रणनीति है कि दिल्ली में जो अच्छा हुआ, विकास हुआ उसका श्रेय लो तथा जो नहीं हुआ उसके लिए यह बताओ कि केन्द्र करने नहीं दे रहा, उप राज्यपाल बाधा बने हुए हैं या फिर भाजपा की बहुमत वाली नगर ईकाइयां काम नहीं कर रहीं हैं। जिस शैली में वे बोलते हैं उनका जवाब उसी शैली में प्रभावी तरीके से देने वाला भाजपा के पास प्रदेश में कोई नेता नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी को काफी लंबा समय मिला लेकिन वे केजरीवाल के समानांतर न अपना कद बना सके और न विपक्ष के नाते उनको कभी दबाव में लाने में कामयाब हो सके। हालांकि वे परिश्रम तो करते रहे, लेकिन उसमें केजरीवाल के तौर-तरीकों का सूक्ष्मता से विश्लेषण कर उसके अनुरुप सुनियोजित रणनीति का अभाव हमेशा बना रहा। केजरीवाल ऐसे नेता हैं जिन्हें केन्द्र द्वारा किए गए कामों का भी श्रेय लेने तथा उसके लिए पोस्टर जारी कर दिल्लीवासियों को बधाई देने में तनिक भी हिचक नहीं। यह भाजपा को परेशान तो करती थी, वे खंडन भी कर रहे थे, पर उस रुप में नहीं जिससे बहुमत मतदाताओं को विश्वास हो जाए कि वे सच बोले रहे हैं एवं केजरीवाल का दावा झूठ है। 

कायदे से देखा जाए तो चुनाव मंे सबसे बड़ा मुद्दा एक आंदोलनकारी और नायक के रुप में उभरे केजरीवाल का वैचारिक एवं व्यवहारिक बदलाव या पतन होना चाहिए। 2011 से 2013 के केजरीवाल के कार्यों एवं वक्तव्यों की उनमें अब झलक तक नहीं मिलती। अपने अधिनायकवादी चरित्र के कारण उन्होंने उन सारे साथियों को अलग होने के लिए विवश कर दिया जो अन्ना अभियान से लेकर पार्टी के निर्माण एवं 2015 के चुनाव में विजय तक उनके साथ थे। भाजपा इसे मुद्दा बनाने में सफल नहीं रही। कहा गया है कि आक्रमण सबसे बड़ा बचाव है। किसी तरह के संघर्ष में विजय का यह सबसे बड़ा सूत्र है। भाजपा इस रणनीति में माहिर मानी जाती है, पर विपक्ष में रहते हुए वह ऐसी स्थिति कायम नही ंकर सकी जिसमें केजरीवाल एवं उनके साथियों को बचाव के लिए विवश होना पड़ता। केजरीवाल ने पूरे चुनाव अभियान के बीच अत्यंत ही सधी हुई राजनीति की तथा उनका संयत रुख लगातार बना रहा। एक समय नरेन्द्र मोदी के लिए निंदा के शब्दों का प्रयोग करने वाले तथा हर बात में सीधे उनको निशाना बनाने वाले केजरीवाल ने अचानक अपना रुख बदल दिया। उन्होंने मोदी पर हमला या उनकी सीधी आलोचना बिल्कुल बंद कर दी। 2019 के लोकसभा चुनाव में तीसरे स्थान पर पहुंचने के पीछे एक विश्लेषण यह था कि मोदी पर ज्यादा हमला जनता ने पसंद नहीं किया। दूसरे, हिन्दुत्व, सांपद्रयाकिता एवं सेक्यूलरवाद पर भी उन्होंने कुछ बोलने से परहेज किया। मोदी से लेकर इन मुद्दों पर वे जैसे ही आक्रामक होते भाजपा को उनको कठघरे में खड़ा करने का मौका मिल जाता। यहां तक कि जब अयोध्या में मंदिर निर्माण पर प्रधानमंत्री ने लोकसभा में ट्रस्ट की घोषणा की तो सारी पार्टियों ने उसकी आलोचना की, चुनाव को लेकर समय पर सवाल उठाया लेकिन केजरीवाल ने समर्थन कर दिया। उन्होंने कहा कि मंदिर बनना चाहिए, ट्रस्ट का चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। उनहोंने अपने को हार्ड राष्ट्रवादी बताया। इस तरह भाजपा को कोई अवसर उन्होने नहीं दिया। उल्टे एक चैनल पर उन्होंने हनुमान चालिसा गाया, हनुमान मंदिर जाकर ट्विट किया और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने उनकी आलोचना कर दी तो इसका उन्होंने अपनी शैली में पूरा उपयोग किया कि हनुमान चलीसा पढ़ने और हनुमान जाने पर भाजपा मुझे गालियां दे रही हैै, वह हनुमान जी की आलोचना कर रही है, कह रही है कि मुझे भगवान की पूजा-पाठ का अधिकार नहीं है। इसका जवाब भाजपा के पास हो ही नहीं सकता था। 

 केजरीवाल को आभास था कि मुसलमानों का एकमुश्त वोट उनकी पार्टी को मिलेगा, क्योंकि कांग्रेस मुख्य लड़ाई में है नहीं। इस विश्वास के कारण उन्होंने शाहीनबाग पर स्वयं चुप्पी धारण कर ली। मनीष सिसोदिया ने एक बार अवश्य कह दिया कि हम शाहीनबाग के साथ है लेकिन बाद में वे भी शांत हो गए। भाजपा ने अपनी रणनीति से शाहीनबाग के बारे में केजरीवाल को कोई बयान देने के लिए मजबूर नहीं किया। चुनाव मंे यह मुद्दा था। जिन लोगों को धरना के कारण आने-आने में परेशानी हो रह थी वे सब उसके खिलाफ थे, स्वयं प्रधानमंत्री ने इसे संयोग नहीं प्रयोग तथा एक डिजायन बताकर अपने मूल समर्थकों को सीधा संदेश दिया। इन सबका असर हुआ लेकिन भाजपा इसे दिल्ली में इतना बड़ा मामला नहीं बन सकी जिससे कि मतों का एकत्रीकरण इसके पक्ष में हो सके। एक महत्वपूर्ण भूमिका कांग्रेस के प्रदर्शन ने निभाई। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 22 प्रतिशत से ज्यादा मत काट लिया तो आप तीसरे स्थान पर सिमट गई। शीला दीक्षित के देहांत के बाद लोकसभा चुनाव में लड़ाई में आने का संकेत दे चुकी कांग्रेस फिर हाशिए पर चली गई। 67 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई। वैसे कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व की रणनीति भी थी कि किसी तरह दिल्ली में भाजपा को रोकना है, इसलिए उन्होंने कुछ प्रमुख नेताओं की सीटों को छोड़कर परिश्रम ही नहीं किया। अगर कांग्रेस पर्याप्त मात्रा में वोट काट लेती और संघर्ष त्रिकोणीय होता तो भाजपा को लाभ मिल जाता। ऐसा नहीं हो सका। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208


मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

(12.40) 11-02-2020 To 17-02-2020

इस अंक में क्या है
-दिल्ली चुनाव धर्म और विचारधारा के बीच वर्चस्व की लड़ाई बन गया था
-दिल्ली एम्स का नया ओपीडी ब्लाॅक तैयार, मरीजों को अब नहीं करना होगा लंबा इंतजार
-आखिर किस सनक में थाईलैंड मॉल में की सिरफिरे सैनिक ने गोलीबारी?
-महापुरुषों के विरोध पर केंद्रित राजनीति?
-आखिर कौन हैं के. पराशरण जिनके पते को बनाया गया राम मंदिर ट्रस्ट का दफ्तर
-एग्जिट पोल में आप की बड़ी जीत का अनुमान, केजरीवाल फिर बन सकते हैं मुख्यमंत्री
-भाजपा नेताओं का दावाः एक्जिट पोल होंगे फेल, भाजपा बनाएगी सरकार
-बेटियों से बदसलूकी कतई बर्दाश्त नहीं होगी: अरविंद केजरीवाल
-महाराष्ट्र सरकार के सस्ती बिजली देने पर क्या बोले अरविंद केजरीवाल
-लोकतंत्र के महापर्व की एक झलक
-आरक्षण संबंधी अदालती फैसले पर पुनरीक्षण याचिका दायर करे सरकारः शरद यादव
-सस्ती शिक्षा पर चर्चा आयोजित कराने को लेकर मिला नोटिस
-टिड्डी दल के कारण उत्पन्न समस्या को घोषित किया जाए राष्ट्रीय आपदाः बेनीवाल
-वैलेंटाइन डे से पहले बजरंग दल की चेतावनी
-राम जन्मभूमि ट्रस्ट की पहली बैठक 19 फरवरी को
-भाजपा शासन में संविधान पर लगातार हमले हो रहे हैंः कुमारी शैलजा
-खुशी है कि भारत का बंटवारा हुआ, नहीं तो मुस्लिम लीग देश को चलने नहीं देतीः नटवर सिंह
-चीन की मदद को आगे आया भारत, पीएम मोदी ने राष्ट्रपति शी जिंपिंग को लिखी चिट्ठी
-यूएस से अलग होने के बाद ब्रिटिश वीजा में किए गए यह बड़े बदलाव
-इमरान की पार्टी ने हिंदुओं का अपमान करने वाले पोस्टरों को लेकर एक नेता को निलंबित किया
-डब्ल्यूएचओ ने दी चेतावनी! चंद सेकेंड में फैलता है कोरोना वायरस
-चीन के अलावा और किन शहरों में कोरोना वायरस ने मचाया अपना तांडव
-भाग निकला मलाला को गोली मारने वाला आतंकी!
-आखिर क्यों अचानक अमेरिका ने अपने नागरिकों पाकिस्तान न जाने की दी चेतावनी
-शादी के बाद हनीमून पर जाने की प्लानिंग कर रहे हैं तो यह जगह हैं सबसे बेस्ट
-वैलेंटाइन को खास बनाने के लिए इन जगहों पर करें सेलिब्रेट
-सिंगल लोग भी खुशनुमा तरीके से मनाएं वैलेंटाइन डे
-वैलेंटाइन डे पर करें ऐसा मेकअप, पार्टनर की निगाहें टिकी रहे आप पर
-हंसी-हंगामा
-अब यह खिलाड़ी बनेगा पाकिस्तान की वनडे टीम का कप्तान
-क्रिकेट के भगवान से मिली 16 साल की शेफाली वर्मा, बचपन का सपना हुआ सच!
-पहली बार भारत दौरे पर आए पाकिस्तान टीम के आखिरी सदस्य का हुआ निधन
-हॉकी क्वीन रानी रामपाल की चाहत, बायोपिक में ये एक्ट्रेस करे उनका रोल
-सुविधाएं कनाडा की लेकिन पैसा भारत में कमा रही हैं ‘‘दिलबर’’ गर्ल नोरा फतेही
-मैं खुश हूं कि लोगों को मेरा काम पसंद आ रहा, खुद को सीमित नहीं करना चाहतीः अलाया
-संस्कारी बहू से हिना खान बनीं बोल्ड
-कोई मिला कूड़े में खाना ढूंढ़ते तो कोई पागलखाने में... पाई-पाई को मोहताज ये बॉलीवुड सितारे









गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

समझौते से असम में शांति की उम्मीद

अवधेश कुमार

यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि पूर्वाेत्तर के राज्यों से उग्रवाद खत्म करने के लक्ष्य की दृष्टि से केन्द्र सरकार, असम सरकार और बोडो उग्रवादियों के प्रतिनिधियों के बीच संपन्न असम समझौता काफी महत्वपूर्ण है। हालांकि इस समझौते के विरोध में बंद का भी आह्वान किया गया लेकिन इससे ज्यादा अंतर आएगा यह लगता नहीं। बोडो समूहों के साथ इस समझौते के विरोध में बंद का आह्वान गैर बोडों समूहों ने किया था। वास्तव में अगर यह समझौता अपने शब्दों और भावनाओं के साथ क्रियान्वित हुआ तो 50 साल से ज्यादा समय चला आ रहा बोडोलैंड विवाद समाप्त हो सकता है, जिसमें अब तक सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 2823 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। समझौते के बारे में जितनी जानकारी सामने आई है उसके अनुसार बोडो आदिवासियों को कुछ राजनीतिक अधिकार और समुदाय के लिए आर्थिक पैकेज दिया जाए। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समझौते में असम की क्षेत्रीय अखंडता बरकरार रखने तथा बोडो समूहो ने अलग राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की प्रमुख मांग का परित्याग कर दिया है। यानी राज्य के विभाजन की मांग समाप्त हो गई है। वैसे पिछले 27 साल में यह तीसरा असम समझौता है और पूर्व के समझौतों के बावजूद शांति स्थापित नहीं हो सकी। इसलिए जो लोग कुछ संदेह व्यक्त कर रहे हैं उन्हें आप एकबारगी खारिज भी नहीं ंकर सकते। लेकिन यह पहली बार है जब किसी सरकार ने सभी समूहों से एक साथ समझौता किया है। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) एक दुर्दांत उग्रवादी समूह माना जाता है। इसके सभी चार धड़ों के नेतृत्वों एबीएसयू प्रमुख प्रमोद बोरो, बीटीसी प्रमुख हागरामा मोहीलरी, सोनोवाल और शर्मा ने हस्ताक्षर किए। लंबे समय से बोडो राज्य की मांग करते हुए आंदोलन चलाने वाले ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर किए।

इस नाते यह एक समग्र और समेकित समझौता है। वास्तव मंें इस दिशा में केन्द्र सरकार काफी समय से सक्रिय थी। गृहमंत्री अमित शाह भी सभी संगठनों के साथ बातचीत कर रहे थे। पूर्ण सहमति बनने के बाद गृह मंत्री की उपस्थिति में समझौता हुआ। समझौते के बाद नैशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के 1550 कैडरों ने हथियार सौंप कर आत्मसमर्पण कर दिया है। शाह ने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार बोडो लोगों से किए गए अपने सभी वायदों को समयबद्ध तरीके से पूरा करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा कि बोडो समझौते के बाद अब शांति, सद्भाव और एकजुटता का नया सवेरा आएगा। समझौते से बोडो लोगों के लिए परिवर्तनकारी परिणाम सामने आएंगे। यह प्रमुख संबंधित पक्षों को एक प्रारूप के अंतर्गत साथ लेकर आया है। यह समझौता बोडो लोगों की अनोखी संस्कृति की रक्षा करेगा और उसे लोकप्रिय बनाएगा तथा उन्हें विकासोन्मुखी पहल तक पहुंच मिलेगी। तो यह सरकार का वायदा है। 

इस समझौते का महत्व समझने के लिए बोडो आंदोलन पर संक्षिप्त नजर डालना जरुरी है। सबसे पहले तो यह समझने की जरुरत है कि बोडो असम का सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है। राज्य की कुल जनसंख्या में इनका अंश करीब 12 प्रतिशत है। इतिहास में झांके तो लंबे समय तक असम के बड़े हिस्से पर बोडो आदिवासियों का नियंत्रण रहा है। असम के चार जिलों कोकराझार, बाक्सा, उदालगुरी और चिरांग को मिलाकर बोडो टेरिटोरिअल एरिया डिस्ट्रिक का गठन किया गया था। बोडो लोगों ने वर्ष 1966-67 में राजनीतिक समूह प्लेन्स ट्राइबल काउंसिल ऑफ असम के बैनर तले अलग राज्य बोडोलैंड बनाए जाने की मांग की। यह आंदोलन हिंसक हो गया और फिर इसका नेतृत्व एनडीएफबी के हाथों आ गया। उसके बाद असम धू-धू कर जलने लगा। हिंसा, आगजनी तथा अन्य गैर कानूनी गतिविधियां इतनी बढ़ गई कि केंद्र सरकार ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून के तहत एनडीएफबी को गैरकानूनी घोषित कर दिया। समय के साथ बोडो उग्रवादियों पर हिंसा, जबरन उगाही और हत्या का आरोप भी लगा। इससे आंदोलन को धक्का लगा। 

लेकिन वर्ष 1987 में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन ने फिर से बोडोलैंड बनाए जाने की मांग की। यूनियन के नेता उपेंद्र नाथ ब्रह्मा ने असम को आधा-आधा बांटने की मांग की। यह नया दौर असम आंदोलन (1979-85) का परिणाम था जो असम समझौते के बाद शुरू हुआ। समझौते में असम के लोगों के हितों, उनकी परंपराओं, भाषा, संस्कृति आदि के संरक्षण की बात कही गई थी। बोडो लोगों ने आरोप लगाया कि उनकी पहचान के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। इसके बाद आंदोलन आरंभ हुआ। यह सच है कि 1985 समझौते का सही क्रियान्वयन नहीं हुआ। उस समझौते की धारा छः, जिसमें इनकी पहचान, संस्कृति, परंपरा के लिए समिति बनाने तथा उसकी अनुशंसा के आधार पर कदम उठाने की बात थी साकार हुआ ही नहीं। बोडो एक ओर राजनीतिक आंदोलनों कर रहे थे तो दूसरी ओर हथियारबंद समूहों ने अलग बोडो राज्य बनाने का संघर्ष आरंभ कर दिया। अक्टूबर 1986 में रंजन दाइमारी द्वारा उग्रवादी गुट बोडो सिक्यॉरिटी फोर्स के गठन का मामला सामने आया। इस समूह ने अपना नाम नैशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड एनडीएफबी कर लिया। जैसा उपर बताया गया इस एनडीएफबी ने राज्य में भयावह स्थिति पैदा की। हिन्दी और बांग्लाभाषियों की सामूहिक हत्याएं कीं। वर्ष 2012 में बोडो-मुस्लिम दंगों की भयावहता असम को झेलना पड़ा जिसमें भारी संख्या में लोग मारे गए एवं 5 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए। ध्यान रखने की बात है कि 1990 के दशक में सुरक्षा बलों ने एनडीएफबी के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन आरंभ कर दिया। इस कारण एनडीएफबी उग्रवादी पड़ोसी देश भूटान भाग गए। वहां से एनडीएफबी ने अपना अभियान जारी रखा। वर्ष 2000 में भूटान की शाही सेना ने भारतीय सेना के साथ मिलकर आतंकवाद निरोधक अभियान चलाया जिसमें एनडीएफबी की कमर टूट गई। कुछ ने आत्मसमर्पण किया तो कई मारे गए। लेकिन धीरे-धीरे इसने फिर सिर उठाना आरंभ किया। अक्टूबर 2008 में एनडीएफबी ने असम के कई हिस्सों में बम हमले करके अपनी हिंसक शक्ति का आभास कराया जिसमें 90 लोगों की मौत हो गई। एनडीएफबी के संस्थापक रंजन दिमारी को हमलों के लिए दोषी ठहराया गया। 

लेकिन यहां से एनडीएफबी में दरार आरंभ होता है। वस्तुतः हमले को लेकर एनडीएफबी में सहमति नहीं थी। इस कारण यह दो भागों में बंट गया। एनडीएफबी (पी) का नेतृत्व गोविंदा बासुमतारी और एनडीएफबी (आर) का नेतृत्व रंजन के हाथों आया। वर्ष 2009 में एनडीएफबी (पी)ने केंद्र सरकार के साथ बाचतीत शुरू की लेकिन विशेष परिणाम नहीं निकला। वर्ष 2010 में रंजन दिमारी को बांग्लादेश ने गिरफ्तार करके भारत को सौंप दिया। दोनों ही गुट केंद्र के साथ बातचीत कर रहे थे। अगर उस समय ठीक से कोशिश की जाती तो मामला सुलझ सकता था। वर्ष 2012 में इंगती कठार सोंगबिजित ने एनडीएफबी (आर) से खुद को अलग कर लिया और एनडीएफबी (एस) बनाया। समझौते की संभावना के कारण वर्ष 2013 में रंजन को जमानत मिल गई। माना जाता है कि इंगती के गुट ने दिसंबर 2014 में 66 आदिवासियों की हत्या की। यह गुट बातचीत के खिलाफ था। वर्ष 2015 में इंगती की जगह पर बी साओरैग्वारा ने गुट की कमान संभाली। बाद में इंगती ने एनडीएफबी (एस) से अलग होकर अपना अलग गुट बना लिया। इस तरह पूरा समूह 4 भागों में बंट गया। इसीलिए केन्द्र ने इन चारों समूहों से समझौता किया है। जो जेल में थे उनसे भी बातचीत होती रही। समझौते पर सहमति के बाद दाईमारी को जेल से रिहा किया गया था।

पूरी पृष्ठभूमि को समझने के बाद यह कल्पना करना आसान है कि अगर समझौता सफल हो गया तो नरेन्द्र मोदी सरकार की यह ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। असम में हिंसा, उपद्रव और दंगे का मूल कारण बोडो समस्या में ही निहित थी। उल्फा का जो गुट बचा हुआ है वह काफी कमजोर हो चुका है। बोडो का समाधान करने के बाद उल्फा के बचे-खुचे लड़ाकुओं को आराम से नियंत्रित किया जा सकता है। समझौते के विरोध में चार जगहों पर गणतंत्र दिवस के दिन विस्फोट करके उल्फा आई ने सरकार को चुनौती दी है। निस्संदेह, ऐसे समूह हैं जो समझौते के पक्ष में नहीं हैं। उन्हीं ने 12 घंटे का बंद भी बुलाया था जिसका बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) के तहत आने वाले चार जिलों कोकराझार, बक्सा, चिरांग और उदलगुड़ी जिलों में असर हुआ। लेकिन समझौते के क्रियान्वयन की प्रक्रिया आरंभ होने के साथ इसमें कमी आएगी। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि समझौते को बीटीसी प्रमुख हागरामा मोहीलरी का पूरा समर्थन प्राप्त है। हालांकि वहां जातीय एवं सांप्रदायिक विभाजन इतना तीखा हो चुका है उसे पूरी तरह सामान्य बनाने में समय लगेगा, लेकिन सबसे शक्तिशाली और प्रभावी पक्ष यदि समझौता के अमल में सहयोग कर रहा है और सरकार ने ईमानदारी से काम किया तो तनाव भी कम होगा एवं लोगों का विश्वास भी कायम होगा। वैसे भी विरोध करने वालों में राजनीतिक हित देखने वालों से लेकर सांप्रदायिक आधार पर विचार करने वाले समूह भी शामिल हैं। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208



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