शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

चौंकाने वाला नहीं है परिणाम

 

अवधेश कुमार

दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम ने शायद ही किसी को चौंकाया होगा। हां, इसके विश्लेषण को लेकर अवश्य कई राय हो सकते हैं। आरंभ से ही पूरा चुनाव आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल की ओर एकपक्षीय लग रहा था। सारे मतदान पूर्व सर्वेक्षणों ने इसका संकेत भी दे दिया था। कुछ विश्लेषकों ने तो यहां तक टिप्पणी कर दी थी कि आप 2015 के अपने पुराने अंकगणित के आसपास पहुंच सकती है। भाजपा को भी इसका अहसास निश्चित रुप से रहा होगा। लेकिन भाजपा नेतृत्व केजरीवाल के पक्ष में सहानुभूति और समर्थन की लहर की काट करने में सफल नहीं हो पा रहा था। अमित शाह को स्वयं कूदना पड़ा। उनके आक्रामक अभियान तथा चुनाव प्रबंधन की कुशलता ने असर डालना आरंभ किया। भाजपा के निरुत्साहित पड़े कार्यकर्ता सक्रिय हुए। इसका असर हम उसके मतों में करीब सात प्रतिशत की वृद्धि के रुप में देख रहे हैं। कंतु कुल मिलाकर यह कहने में हर्ज नहीं है कि वह केजरीवाल की काट तलाश नहीं कर पाई। तो क्यों हुआ ऐसा?

अपने-अपने नजरिए से इसका उत्तर दिया जा रहा है। इस परिणाम को किसी तरह नागरिकता संशोधन कानून, धारा 370 हटाने, शाहीन बाग धरने के आक्रामक विरोध से जोड़कर देखना गलत विश्लेषण होगा। सारे सर्वेक्षणों का निष्कर्ष यही था कि इन मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार को भारी बहुमत का समर्थन प्राप्त है। जनता कह रही थी कि हम दिल्ली में वोट केजरीवाल को दंेेगे लेकिन धारा 370 हटाने और नागरिकता कानून पर केन्द्र सरकार का समर्थन करते हैं। लोगों ने ज्यादातर सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री के रुप में नरेन्द्र मोदी को पसंद किया तो बतौर मुख्यमंत्री केजरीवाल को। इस सच को नकारकर आप कोई भी निष्कर्ष दे देंगे तो वह सच नहीं होगा। सच तो यह है कि केजरीवाल पिछले एक वर्ष से चुनाव के मोड में आ गए थे। आप उनके वक्तव्यों, तेवर तथा कार्यप्रणाली में आए परिवर्तनों को साफ-साफ देख सकते थे। छः महीना पहले से तो वे केवल चुनावी केन्द्रित वक्तव्य एवं फैसले कर रहे थे। सच कहें तो महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा, चुनाव के पूर्व महीने में ज्यादातर लोगों के बिजली बिल को माफ कर देना तथा पानी के बिल में भारी माफी ने इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह ऐसा लोकप्रियतावादी कदम था जिसकी काट किसी पार्टी के पास नहीं थी। भारत का आम मानस इस तरह के लोकप्रियतावादी कदमों की ओर तात्कालिक रुप से आकर्षित होता है। हालांकि भाजपा ने भी अपने संकल्प पत्र में स्पष्ट किया कि वे सत्ता में आए तो बिजली, पानी के दर में कटौती जारी रहेगा। उन्होंने भी केजरीवाल की तरह कुछ लोकप्रियतावादी घोषणाएं की। मसलन, दो रुपए किलो आटा, छात्रों को साईकिल एवं इलेक्ट्कि स्कूटर आदि। इसका कुछ असर भी हुआ लेकिन असर इतना नहीं थी कि भाजपा आप की विजय को रोक दे। 

भाजपा का प्रदेश नेतृत्व इस मुगालते में था कि केजरीवाल ने 2015 के अपने चुनावी वायदों को पूरा नहीं किया है तथा अब उनकी छवि पुराने आंदोलनकारी भी नहीं है, इसलिए उनको जनता के बीच कठघरे में खड़ा कर पराजित करना कठिन नहीं होगा। वे भूल गए कि केजरीवाल परंपरागत राजनेता नहीं हैं। अपने कार्यकाल के अंतिम समय में उन्होंने घोषणा पत्र के कुछ अंशों को क्रियान्वित करना आरंभ कर दिया और इसका भी असर हुआ।  केजरीवाल की रणनीति है कि दिल्ली में जो अच्छा हुआ, विकास हुआ उसका श्रेय लो तथा जो नहीं हुआ उसके लिए यह बताओ कि केन्द्र करने नहीं दे रहा, उप राज्यपाल बाधा बने हुए हैं या फिर भाजपा की बहुमत वाली नगर ईकाइयां काम नहीं कर रहीं हैं। जिस शैली में वे बोलते हैं उनका जवाब उसी शैली में प्रभावी तरीके से देने वाला भाजपा के पास प्रदेश में कोई नेता नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी को काफी लंबा समय मिला लेकिन वे केजरीवाल के समानांतर न अपना कद बना सके और न विपक्ष के नाते उनको कभी दबाव में लाने में कामयाब हो सके। हालांकि वे परिश्रम तो करते रहे, लेकिन उसमें केजरीवाल के तौर-तरीकों का सूक्ष्मता से विश्लेषण कर उसके अनुरुप सुनियोजित रणनीति का अभाव हमेशा बना रहा। केजरीवाल ऐसे नेता हैं जिन्हें केन्द्र द्वारा किए गए कामों का भी श्रेय लेने तथा उसके लिए पोस्टर जारी कर दिल्लीवासियों को बधाई देने में तनिक भी हिचक नहीं। यह भाजपा को परेशान तो करती थी, वे खंडन भी कर रहे थे, पर उस रुप में नहीं जिससे बहुमत मतदाताओं को विश्वास हो जाए कि वे सच बोले रहे हैं एवं केजरीवाल का दावा झूठ है। 

कायदे से देखा जाए तो चुनाव मंे सबसे बड़ा मुद्दा एक आंदोलनकारी और नायक के रुप में उभरे केजरीवाल का वैचारिक एवं व्यवहारिक बदलाव या पतन होना चाहिए। 2011 से 2013 के केजरीवाल के कार्यों एवं वक्तव्यों की उनमें अब झलक तक नहीं मिलती। अपने अधिनायकवादी चरित्र के कारण उन्होंने उन सारे साथियों को अलग होने के लिए विवश कर दिया जो अन्ना अभियान से लेकर पार्टी के निर्माण एवं 2015 के चुनाव में विजय तक उनके साथ थे। भाजपा इसे मुद्दा बनाने में सफल नहीं रही। कहा गया है कि आक्रमण सबसे बड़ा बचाव है। किसी तरह के संघर्ष में विजय का यह सबसे बड़ा सूत्र है। भाजपा इस रणनीति में माहिर मानी जाती है, पर विपक्ष में रहते हुए वह ऐसी स्थिति कायम नही ंकर सकी जिसमें केजरीवाल एवं उनके साथियों को बचाव के लिए विवश होना पड़ता। केजरीवाल ने पूरे चुनाव अभियान के बीच अत्यंत ही सधी हुई राजनीति की तथा उनका संयत रुख लगातार बना रहा। एक समय नरेन्द्र मोदी के लिए निंदा के शब्दों का प्रयोग करने वाले तथा हर बात में सीधे उनको निशाना बनाने वाले केजरीवाल ने अचानक अपना रुख बदल दिया। उन्होंने मोदी पर हमला या उनकी सीधी आलोचना बिल्कुल बंद कर दी। 2019 के लोकसभा चुनाव में तीसरे स्थान पर पहुंचने के पीछे एक विश्लेषण यह था कि मोदी पर ज्यादा हमला जनता ने पसंद नहीं किया। दूसरे, हिन्दुत्व, सांपद्रयाकिता एवं सेक्यूलरवाद पर भी उन्होंने कुछ बोलने से परहेज किया। मोदी से लेकर इन मुद्दों पर वे जैसे ही आक्रामक होते भाजपा को उनको कठघरे में खड़ा करने का मौका मिल जाता। यहां तक कि जब अयोध्या में मंदिर निर्माण पर प्रधानमंत्री ने लोकसभा में ट्रस्ट की घोषणा की तो सारी पार्टियों ने उसकी आलोचना की, चुनाव को लेकर समय पर सवाल उठाया लेकिन केजरीवाल ने समर्थन कर दिया। उन्होंने कहा कि मंदिर बनना चाहिए, ट्रस्ट का चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। उनहोंने अपने को हार्ड राष्ट्रवादी बताया। इस तरह भाजपा को कोई अवसर उन्होने नहीं दिया। उल्टे एक चैनल पर उन्होंने हनुमान चालिसा गाया, हनुमान मंदिर जाकर ट्विट किया और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने उनकी आलोचना कर दी तो इसका उन्होंने अपनी शैली में पूरा उपयोग किया कि हनुमान चलीसा पढ़ने और हनुमान जाने पर भाजपा मुझे गालियां दे रही हैै, वह हनुमान जी की आलोचना कर रही है, कह रही है कि मुझे भगवान की पूजा-पाठ का अधिकार नहीं है। इसका जवाब भाजपा के पास हो ही नहीं सकता था। 

 केजरीवाल को आभास था कि मुसलमानों का एकमुश्त वोट उनकी पार्टी को मिलेगा, क्योंकि कांग्रेस मुख्य लड़ाई में है नहीं। इस विश्वास के कारण उन्होंने शाहीनबाग पर स्वयं चुप्पी धारण कर ली। मनीष सिसोदिया ने एक बार अवश्य कह दिया कि हम शाहीनबाग के साथ है लेकिन बाद में वे भी शांत हो गए। भाजपा ने अपनी रणनीति से शाहीनबाग के बारे में केजरीवाल को कोई बयान देने के लिए मजबूर नहीं किया। चुनाव मंे यह मुद्दा था। जिन लोगों को धरना के कारण आने-आने में परेशानी हो रह थी वे सब उसके खिलाफ थे, स्वयं प्रधानमंत्री ने इसे संयोग नहीं प्रयोग तथा एक डिजायन बताकर अपने मूल समर्थकों को सीधा संदेश दिया। इन सबका असर हुआ लेकिन भाजपा इसे दिल्ली में इतना बड़ा मामला नहीं बन सकी जिससे कि मतों का एकत्रीकरण इसके पक्ष में हो सके। एक महत्वपूर्ण भूमिका कांग्रेस के प्रदर्शन ने निभाई। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 22 प्रतिशत से ज्यादा मत काट लिया तो आप तीसरे स्थान पर सिमट गई। शीला दीक्षित के देहांत के बाद लोकसभा चुनाव में लड़ाई में आने का संकेत दे चुकी कांग्रेस फिर हाशिए पर चली गई। 67 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई। वैसे कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व की रणनीति भी थी कि किसी तरह दिल्ली में भाजपा को रोकना है, इसलिए उन्होंने कुछ प्रमुख नेताओं की सीटों को छोड़कर परिश्रम ही नहीं किया। अगर कांग्रेस पर्याप्त मात्रा में वोट काट लेती और संघर्ष त्रिकोणीय होता तो भाजपा को लाभ मिल जाता। ऐसा नहीं हो सका। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208


मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

(12.40) 11-02-2020 To 17-02-2020

इस अंक में क्या है
-दिल्ली चुनाव धर्म और विचारधारा के बीच वर्चस्व की लड़ाई बन गया था
-दिल्ली एम्स का नया ओपीडी ब्लाॅक तैयार, मरीजों को अब नहीं करना होगा लंबा इंतजार
-आखिर किस सनक में थाईलैंड मॉल में की सिरफिरे सैनिक ने गोलीबारी?
-महापुरुषों के विरोध पर केंद्रित राजनीति?
-आखिर कौन हैं के. पराशरण जिनके पते को बनाया गया राम मंदिर ट्रस्ट का दफ्तर
-एग्जिट पोल में आप की बड़ी जीत का अनुमान, केजरीवाल फिर बन सकते हैं मुख्यमंत्री
-भाजपा नेताओं का दावाः एक्जिट पोल होंगे फेल, भाजपा बनाएगी सरकार
-बेटियों से बदसलूकी कतई बर्दाश्त नहीं होगी: अरविंद केजरीवाल
-महाराष्ट्र सरकार के सस्ती बिजली देने पर क्या बोले अरविंद केजरीवाल
-लोकतंत्र के महापर्व की एक झलक
-आरक्षण संबंधी अदालती फैसले पर पुनरीक्षण याचिका दायर करे सरकारः शरद यादव
-सस्ती शिक्षा पर चर्चा आयोजित कराने को लेकर मिला नोटिस
-टिड्डी दल के कारण उत्पन्न समस्या को घोषित किया जाए राष्ट्रीय आपदाः बेनीवाल
-वैलेंटाइन डे से पहले बजरंग दल की चेतावनी
-राम जन्मभूमि ट्रस्ट की पहली बैठक 19 फरवरी को
-भाजपा शासन में संविधान पर लगातार हमले हो रहे हैंः कुमारी शैलजा
-खुशी है कि भारत का बंटवारा हुआ, नहीं तो मुस्लिम लीग देश को चलने नहीं देतीः नटवर सिंह
-चीन की मदद को आगे आया भारत, पीएम मोदी ने राष्ट्रपति शी जिंपिंग को लिखी चिट्ठी
-यूएस से अलग होने के बाद ब्रिटिश वीजा में किए गए यह बड़े बदलाव
-इमरान की पार्टी ने हिंदुओं का अपमान करने वाले पोस्टरों को लेकर एक नेता को निलंबित किया
-डब्ल्यूएचओ ने दी चेतावनी! चंद सेकेंड में फैलता है कोरोना वायरस
-चीन के अलावा और किन शहरों में कोरोना वायरस ने मचाया अपना तांडव
-भाग निकला मलाला को गोली मारने वाला आतंकी!
-आखिर क्यों अचानक अमेरिका ने अपने नागरिकों पाकिस्तान न जाने की दी चेतावनी
-शादी के बाद हनीमून पर जाने की प्लानिंग कर रहे हैं तो यह जगह हैं सबसे बेस्ट
-वैलेंटाइन को खास बनाने के लिए इन जगहों पर करें सेलिब्रेट
-सिंगल लोग भी खुशनुमा तरीके से मनाएं वैलेंटाइन डे
-वैलेंटाइन डे पर करें ऐसा मेकअप, पार्टनर की निगाहें टिकी रहे आप पर
-हंसी-हंगामा
-अब यह खिलाड़ी बनेगा पाकिस्तान की वनडे टीम का कप्तान
-क्रिकेट के भगवान से मिली 16 साल की शेफाली वर्मा, बचपन का सपना हुआ सच!
-पहली बार भारत दौरे पर आए पाकिस्तान टीम के आखिरी सदस्य का हुआ निधन
-हॉकी क्वीन रानी रामपाल की चाहत, बायोपिक में ये एक्ट्रेस करे उनका रोल
-सुविधाएं कनाडा की लेकिन पैसा भारत में कमा रही हैं ‘‘दिलबर’’ गर्ल नोरा फतेही
-मैं खुश हूं कि लोगों को मेरा काम पसंद आ रहा, खुद को सीमित नहीं करना चाहतीः अलाया
-संस्कारी बहू से हिना खान बनीं बोल्ड
-कोई मिला कूड़े में खाना ढूंढ़ते तो कोई पागलखाने में... पाई-पाई को मोहताज ये बॉलीवुड सितारे









गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

समझौते से असम में शांति की उम्मीद

अवधेश कुमार

यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि पूर्वाेत्तर के राज्यों से उग्रवाद खत्म करने के लक्ष्य की दृष्टि से केन्द्र सरकार, असम सरकार और बोडो उग्रवादियों के प्रतिनिधियों के बीच संपन्न असम समझौता काफी महत्वपूर्ण है। हालांकि इस समझौते के विरोध में बंद का भी आह्वान किया गया लेकिन इससे ज्यादा अंतर आएगा यह लगता नहीं। बोडो समूहों के साथ इस समझौते के विरोध में बंद का आह्वान गैर बोडों समूहों ने किया था। वास्तव में अगर यह समझौता अपने शब्दों और भावनाओं के साथ क्रियान्वित हुआ तो 50 साल से ज्यादा समय चला आ रहा बोडोलैंड विवाद समाप्त हो सकता है, जिसमें अब तक सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 2823 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। समझौते के बारे में जितनी जानकारी सामने आई है उसके अनुसार बोडो आदिवासियों को कुछ राजनीतिक अधिकार और समुदाय के लिए आर्थिक पैकेज दिया जाए। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समझौते में असम की क्षेत्रीय अखंडता बरकरार रखने तथा बोडो समूहो ने अलग राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की प्रमुख मांग का परित्याग कर दिया है। यानी राज्य के विभाजन की मांग समाप्त हो गई है। वैसे पिछले 27 साल में यह तीसरा असम समझौता है और पूर्व के समझौतों के बावजूद शांति स्थापित नहीं हो सकी। इसलिए जो लोग कुछ संदेह व्यक्त कर रहे हैं उन्हें आप एकबारगी खारिज भी नहीं ंकर सकते। लेकिन यह पहली बार है जब किसी सरकार ने सभी समूहों से एक साथ समझौता किया है। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) एक दुर्दांत उग्रवादी समूह माना जाता है। इसके सभी चार धड़ों के नेतृत्वों एबीएसयू प्रमुख प्रमोद बोरो, बीटीसी प्रमुख हागरामा मोहीलरी, सोनोवाल और शर्मा ने हस्ताक्षर किए। लंबे समय से बोडो राज्य की मांग करते हुए आंदोलन चलाने वाले ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर किए।

इस नाते यह एक समग्र और समेकित समझौता है। वास्तव मंें इस दिशा में केन्द्र सरकार काफी समय से सक्रिय थी। गृहमंत्री अमित शाह भी सभी संगठनों के साथ बातचीत कर रहे थे। पूर्ण सहमति बनने के बाद गृह मंत्री की उपस्थिति में समझौता हुआ। समझौते के बाद नैशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के 1550 कैडरों ने हथियार सौंप कर आत्मसमर्पण कर दिया है। शाह ने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार बोडो लोगों से किए गए अपने सभी वायदों को समयबद्ध तरीके से पूरा करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा कि बोडो समझौते के बाद अब शांति, सद्भाव और एकजुटता का नया सवेरा आएगा। समझौते से बोडो लोगों के लिए परिवर्तनकारी परिणाम सामने आएंगे। यह प्रमुख संबंधित पक्षों को एक प्रारूप के अंतर्गत साथ लेकर आया है। यह समझौता बोडो लोगों की अनोखी संस्कृति की रक्षा करेगा और उसे लोकप्रिय बनाएगा तथा उन्हें विकासोन्मुखी पहल तक पहुंच मिलेगी। तो यह सरकार का वायदा है। 

इस समझौते का महत्व समझने के लिए बोडो आंदोलन पर संक्षिप्त नजर डालना जरुरी है। सबसे पहले तो यह समझने की जरुरत है कि बोडो असम का सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है। राज्य की कुल जनसंख्या में इनका अंश करीब 12 प्रतिशत है। इतिहास में झांके तो लंबे समय तक असम के बड़े हिस्से पर बोडो आदिवासियों का नियंत्रण रहा है। असम के चार जिलों कोकराझार, बाक्सा, उदालगुरी और चिरांग को मिलाकर बोडो टेरिटोरिअल एरिया डिस्ट्रिक का गठन किया गया था। बोडो लोगों ने वर्ष 1966-67 में राजनीतिक समूह प्लेन्स ट्राइबल काउंसिल ऑफ असम के बैनर तले अलग राज्य बोडोलैंड बनाए जाने की मांग की। यह आंदोलन हिंसक हो गया और फिर इसका नेतृत्व एनडीएफबी के हाथों आ गया। उसके बाद असम धू-धू कर जलने लगा। हिंसा, आगजनी तथा अन्य गैर कानूनी गतिविधियां इतनी बढ़ गई कि केंद्र सरकार ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून के तहत एनडीएफबी को गैरकानूनी घोषित कर दिया। समय के साथ बोडो उग्रवादियों पर हिंसा, जबरन उगाही और हत्या का आरोप भी लगा। इससे आंदोलन को धक्का लगा। 

लेकिन वर्ष 1987 में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन ने फिर से बोडोलैंड बनाए जाने की मांग की। यूनियन के नेता उपेंद्र नाथ ब्रह्मा ने असम को आधा-आधा बांटने की मांग की। यह नया दौर असम आंदोलन (1979-85) का परिणाम था जो असम समझौते के बाद शुरू हुआ। समझौते में असम के लोगों के हितों, उनकी परंपराओं, भाषा, संस्कृति आदि के संरक्षण की बात कही गई थी। बोडो लोगों ने आरोप लगाया कि उनकी पहचान के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। इसके बाद आंदोलन आरंभ हुआ। यह सच है कि 1985 समझौते का सही क्रियान्वयन नहीं हुआ। उस समझौते की धारा छः, जिसमें इनकी पहचान, संस्कृति, परंपरा के लिए समिति बनाने तथा उसकी अनुशंसा के आधार पर कदम उठाने की बात थी साकार हुआ ही नहीं। बोडो एक ओर राजनीतिक आंदोलनों कर रहे थे तो दूसरी ओर हथियारबंद समूहों ने अलग बोडो राज्य बनाने का संघर्ष आरंभ कर दिया। अक्टूबर 1986 में रंजन दाइमारी द्वारा उग्रवादी गुट बोडो सिक्यॉरिटी फोर्स के गठन का मामला सामने आया। इस समूह ने अपना नाम नैशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड एनडीएफबी कर लिया। जैसा उपर बताया गया इस एनडीएफबी ने राज्य में भयावह स्थिति पैदा की। हिन्दी और बांग्लाभाषियों की सामूहिक हत्याएं कीं। वर्ष 2012 में बोडो-मुस्लिम दंगों की भयावहता असम को झेलना पड़ा जिसमें भारी संख्या में लोग मारे गए एवं 5 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए। ध्यान रखने की बात है कि 1990 के दशक में सुरक्षा बलों ने एनडीएफबी के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन आरंभ कर दिया। इस कारण एनडीएफबी उग्रवादी पड़ोसी देश भूटान भाग गए। वहां से एनडीएफबी ने अपना अभियान जारी रखा। वर्ष 2000 में भूटान की शाही सेना ने भारतीय सेना के साथ मिलकर आतंकवाद निरोधक अभियान चलाया जिसमें एनडीएफबी की कमर टूट गई। कुछ ने आत्मसमर्पण किया तो कई मारे गए। लेकिन धीरे-धीरे इसने फिर सिर उठाना आरंभ किया। अक्टूबर 2008 में एनडीएफबी ने असम के कई हिस्सों में बम हमले करके अपनी हिंसक शक्ति का आभास कराया जिसमें 90 लोगों की मौत हो गई। एनडीएफबी के संस्थापक रंजन दिमारी को हमलों के लिए दोषी ठहराया गया। 

लेकिन यहां से एनडीएफबी में दरार आरंभ होता है। वस्तुतः हमले को लेकर एनडीएफबी में सहमति नहीं थी। इस कारण यह दो भागों में बंट गया। एनडीएफबी (पी) का नेतृत्व गोविंदा बासुमतारी और एनडीएफबी (आर) का नेतृत्व रंजन के हाथों आया। वर्ष 2009 में एनडीएफबी (पी)ने केंद्र सरकार के साथ बाचतीत शुरू की लेकिन विशेष परिणाम नहीं निकला। वर्ष 2010 में रंजन दिमारी को बांग्लादेश ने गिरफ्तार करके भारत को सौंप दिया। दोनों ही गुट केंद्र के साथ बातचीत कर रहे थे। अगर उस समय ठीक से कोशिश की जाती तो मामला सुलझ सकता था। वर्ष 2012 में इंगती कठार सोंगबिजित ने एनडीएफबी (आर) से खुद को अलग कर लिया और एनडीएफबी (एस) बनाया। समझौते की संभावना के कारण वर्ष 2013 में रंजन को जमानत मिल गई। माना जाता है कि इंगती के गुट ने दिसंबर 2014 में 66 आदिवासियों की हत्या की। यह गुट बातचीत के खिलाफ था। वर्ष 2015 में इंगती की जगह पर बी साओरैग्वारा ने गुट की कमान संभाली। बाद में इंगती ने एनडीएफबी (एस) से अलग होकर अपना अलग गुट बना लिया। इस तरह पूरा समूह 4 भागों में बंट गया। इसीलिए केन्द्र ने इन चारों समूहों से समझौता किया है। जो जेल में थे उनसे भी बातचीत होती रही। समझौते पर सहमति के बाद दाईमारी को जेल से रिहा किया गया था।

पूरी पृष्ठभूमि को समझने के बाद यह कल्पना करना आसान है कि अगर समझौता सफल हो गया तो नरेन्द्र मोदी सरकार की यह ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। असम में हिंसा, उपद्रव और दंगे का मूल कारण बोडो समस्या में ही निहित थी। उल्फा का जो गुट बचा हुआ है वह काफी कमजोर हो चुका है। बोडो का समाधान करने के बाद उल्फा के बचे-खुचे लड़ाकुओं को आराम से नियंत्रित किया जा सकता है। समझौते के विरोध में चार जगहों पर गणतंत्र दिवस के दिन विस्फोट करके उल्फा आई ने सरकार को चुनौती दी है। निस्संदेह, ऐसे समूह हैं जो समझौते के पक्ष में नहीं हैं। उन्हीं ने 12 घंटे का बंद भी बुलाया था जिसका बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) के तहत आने वाले चार जिलों कोकराझार, बक्सा, चिरांग और उदलगुड़ी जिलों में असर हुआ। लेकिन समझौते के क्रियान्वयन की प्रक्रिया आरंभ होने के साथ इसमें कमी आएगी। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि समझौते को बीटीसी प्रमुख हागरामा मोहीलरी का पूरा समर्थन प्राप्त है। हालांकि वहां जातीय एवं सांप्रदायिक विभाजन इतना तीखा हो चुका है उसे पूरी तरह सामान्य बनाने में समय लगेगा, लेकिन सबसे शक्तिशाली और प्रभावी पक्ष यदि समझौता के अमल में सहयोग कर रहा है और सरकार ने ईमानदारी से काम किया तो तनाव भी कम होगा एवं लोगों का विश्वास भी कायम होगा। वैसे भी विरोध करने वालों में राजनीतिक हित देखने वालों से लेकर सांप्रदायिक आधार पर विचार करने वाले समूह भी शामिल हैं। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208



मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

(12.38) 28-01-2020 To 03-02-2020

इस अंक में क्या है?
-जनसंख्या नियंत्रण कानून समय की मांग, पर इसे भी कुछ लोग विवादित बनाने में लगे
-कोबी ब्रायंट की मौत पर रो रही है पूरी दुनिया
-आंदोलन कुचलने के ये नए ‘लांछन शस्त्र’
-शाहीन बाग में दुकानें बंद होने से धंधा चैपट
-देखो हंस मत देना
-अमित शाह और दूसरे मंत्री शाहीन बाग जाएं और बातचीत कर रास्ता खुलवाएंः केजरीवाल
-शाह दिल्ली जैसा कोई सरकारी स्कूल भाजपा शासित राज्य में दिखाएंः सिसोदिया
-दिल्ली के विकास को अगले स्तर तक ले जाने में मेरी मदद करें: केजरीवाल
-सातवीं बार मैदान में हैं शोएब इकबाल
-164 उम्मीदवार करोड़पति, 13 कैंडिडेट के पास 50 करोड़ से अधिक की संपत्ति
-दिल्ली में 672 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे 1.47 करोड़ मतदाता
-बिना अधिसूचना के क्लस्टर बसों में मुफ्त यात्रा का कदम खराब होगाः हाई कोर्ट
-15 साल की गौ-सेवा का परिणाम है पद्मश्री पुरस्कारः रमजान खान
-पटना के महिला कॉलेज ने बुर्के पर पाबंदी वापस ली
-7 मार्च को अयोध्या जाएंगे उद्धव ठाकरे
-डायमंड बुक्स ने प्रस्तुत की मुख्तार अब्बास नकवी की फिक्शन बुक ‘बलवा’
-5 महीने बाद कश्मीर में 2जी मोबाइल इंटरनेट सेवा बहाल, 301 वेबसाइट ही चला पाएंगे यूजर्स
-अच्छा प्रदर्शन नहीं करने वाले अधिकारियों को किया जाएगा जबरन सेवानिवृत्तः गडकरी
-बी आनंद एनसीएम के सचिव नियुक्त
-मत करो शादी से पहले सेक्स, सरकार ने दिया आदेश
-केरल की मस्जिद में हिंदू विवाह सामाजिक एकता का सबसे बड़ा उदाहरण
-पाकिस्तानी हल्क को है परफेक्ट लड़की की तलाश
-घाना में लागू होगी मोदी सरकार की उज्जवला जैसी योजना, भारत करेगा मदद
-खेत से लेकर खाने की थाली तक होती है अन्न की बर्बादी, इसे रोकना जरूरी
-स्टाइलिश दिखने के लिए पहनें नये कलेवर के स्कार्फ और मफलर
-रहस्य, रोमांच और आश्चर्य की अनोखी दुनिया रामोजी फिल्म सिटी
-अधिक मात्रा में काजू का सेवन खराब कर सकता है स्वास्थ्य
-किंग कोहली आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में टॉप पर बरकरार
-मुंबई में होगा आईपीएल 2020 का फाइनल
-कौन फैसला करता है कि किसे अवॉर्ड मिलेगा? पद्म श्री न मिलने पर विनेश फोगाट
-फ्रेंचाइजी क्रिकेट खेलने वाली टीमों को टी20 विश्व कप में कितना होगा फायदा?
-कंगना का अगला धमाका होगी फिल्म तेजस, एयरफोर्स पायलट का निभाएंगी किरदार
-खुल गया रेखा की मांग के सिंदूर का राज
-बॉलीवुड में जोर-शोर से उठाया जाता है गे-लेस्बियन का मुद्दा
-फिटनेस मेरे लिए जीवन जीने का एक तरीका हैः अनिल कपूर











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