गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

समझौते से असम में शांति की उम्मीद

अवधेश कुमार

यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि पूर्वाेत्तर के राज्यों से उग्रवाद खत्म करने के लक्ष्य की दृष्टि से केन्द्र सरकार, असम सरकार और बोडो उग्रवादियों के प्रतिनिधियों के बीच संपन्न असम समझौता काफी महत्वपूर्ण है। हालांकि इस समझौते के विरोध में बंद का भी आह्वान किया गया लेकिन इससे ज्यादा अंतर आएगा यह लगता नहीं। बोडो समूहों के साथ इस समझौते के विरोध में बंद का आह्वान गैर बोडों समूहों ने किया था। वास्तव में अगर यह समझौता अपने शब्दों और भावनाओं के साथ क्रियान्वित हुआ तो 50 साल से ज्यादा समय चला आ रहा बोडोलैंड विवाद समाप्त हो सकता है, जिसमें अब तक सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 2823 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। समझौते के बारे में जितनी जानकारी सामने आई है उसके अनुसार बोडो आदिवासियों को कुछ राजनीतिक अधिकार और समुदाय के लिए आर्थिक पैकेज दिया जाए। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि समझौते में असम की क्षेत्रीय अखंडता बरकरार रखने तथा बोडो समूहो ने अलग राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की प्रमुख मांग का परित्याग कर दिया है। यानी राज्य के विभाजन की मांग समाप्त हो गई है। वैसे पिछले 27 साल में यह तीसरा असम समझौता है और पूर्व के समझौतों के बावजूद शांति स्थापित नहीं हो सकी। इसलिए जो लोग कुछ संदेह व्यक्त कर रहे हैं उन्हें आप एकबारगी खारिज भी नहीं ंकर सकते। लेकिन यह पहली बार है जब किसी सरकार ने सभी समूहों से एक साथ समझौता किया है। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) एक दुर्दांत उग्रवादी समूह माना जाता है। इसके सभी चार धड़ों के नेतृत्वों एबीएसयू प्रमुख प्रमोद बोरो, बीटीसी प्रमुख हागरामा मोहीलरी, सोनोवाल और शर्मा ने हस्ताक्षर किए। लंबे समय से बोडो राज्य की मांग करते हुए आंदोलन चलाने वाले ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर किए।

इस नाते यह एक समग्र और समेकित समझौता है। वास्तव मंें इस दिशा में केन्द्र सरकार काफी समय से सक्रिय थी। गृहमंत्री अमित शाह भी सभी संगठनों के साथ बातचीत कर रहे थे। पूर्ण सहमति बनने के बाद गृह मंत्री की उपस्थिति में समझौता हुआ। समझौते के बाद नैशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के 1550 कैडरों ने हथियार सौंप कर आत्मसमर्पण कर दिया है। शाह ने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार बोडो लोगों से किए गए अपने सभी वायदों को समयबद्ध तरीके से पूरा करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा कि बोडो समझौते के बाद अब शांति, सद्भाव और एकजुटता का नया सवेरा आएगा। समझौते से बोडो लोगों के लिए परिवर्तनकारी परिणाम सामने आएंगे। यह प्रमुख संबंधित पक्षों को एक प्रारूप के अंतर्गत साथ लेकर आया है। यह समझौता बोडो लोगों की अनोखी संस्कृति की रक्षा करेगा और उसे लोकप्रिय बनाएगा तथा उन्हें विकासोन्मुखी पहल तक पहुंच मिलेगी। तो यह सरकार का वायदा है। 

इस समझौते का महत्व समझने के लिए बोडो आंदोलन पर संक्षिप्त नजर डालना जरुरी है। सबसे पहले तो यह समझने की जरुरत है कि बोडो असम का सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है। राज्य की कुल जनसंख्या में इनका अंश करीब 12 प्रतिशत है। इतिहास में झांके तो लंबे समय तक असम के बड़े हिस्से पर बोडो आदिवासियों का नियंत्रण रहा है। असम के चार जिलों कोकराझार, बाक्सा, उदालगुरी और चिरांग को मिलाकर बोडो टेरिटोरिअल एरिया डिस्ट्रिक का गठन किया गया था। बोडो लोगों ने वर्ष 1966-67 में राजनीतिक समूह प्लेन्स ट्राइबल काउंसिल ऑफ असम के बैनर तले अलग राज्य बोडोलैंड बनाए जाने की मांग की। यह आंदोलन हिंसक हो गया और फिर इसका नेतृत्व एनडीएफबी के हाथों आ गया। उसके बाद असम धू-धू कर जलने लगा। हिंसा, आगजनी तथा अन्य गैर कानूनी गतिविधियां इतनी बढ़ गई कि केंद्र सरकार ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून के तहत एनडीएफबी को गैरकानूनी घोषित कर दिया। समय के साथ बोडो उग्रवादियों पर हिंसा, जबरन उगाही और हत्या का आरोप भी लगा। इससे आंदोलन को धक्का लगा। 

लेकिन वर्ष 1987 में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन ने फिर से बोडोलैंड बनाए जाने की मांग की। यूनियन के नेता उपेंद्र नाथ ब्रह्मा ने असम को आधा-आधा बांटने की मांग की। यह नया दौर असम आंदोलन (1979-85) का परिणाम था जो असम समझौते के बाद शुरू हुआ। समझौते में असम के लोगों के हितों, उनकी परंपराओं, भाषा, संस्कृति आदि के संरक्षण की बात कही गई थी। बोडो लोगों ने आरोप लगाया कि उनकी पहचान के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। इसके बाद आंदोलन आरंभ हुआ। यह सच है कि 1985 समझौते का सही क्रियान्वयन नहीं हुआ। उस समझौते की धारा छः, जिसमें इनकी पहचान, संस्कृति, परंपरा के लिए समिति बनाने तथा उसकी अनुशंसा के आधार पर कदम उठाने की बात थी साकार हुआ ही नहीं। बोडो एक ओर राजनीतिक आंदोलनों कर रहे थे तो दूसरी ओर हथियारबंद समूहों ने अलग बोडो राज्य बनाने का संघर्ष आरंभ कर दिया। अक्टूबर 1986 में रंजन दाइमारी द्वारा उग्रवादी गुट बोडो सिक्यॉरिटी फोर्स के गठन का मामला सामने आया। इस समूह ने अपना नाम नैशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड एनडीएफबी कर लिया। जैसा उपर बताया गया इस एनडीएफबी ने राज्य में भयावह स्थिति पैदा की। हिन्दी और बांग्लाभाषियों की सामूहिक हत्याएं कीं। वर्ष 2012 में बोडो-मुस्लिम दंगों की भयावहता असम को झेलना पड़ा जिसमें भारी संख्या में लोग मारे गए एवं 5 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए। ध्यान रखने की बात है कि 1990 के दशक में सुरक्षा बलों ने एनडीएफबी के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन आरंभ कर दिया। इस कारण एनडीएफबी उग्रवादी पड़ोसी देश भूटान भाग गए। वहां से एनडीएफबी ने अपना अभियान जारी रखा। वर्ष 2000 में भूटान की शाही सेना ने भारतीय सेना के साथ मिलकर आतंकवाद निरोधक अभियान चलाया जिसमें एनडीएफबी की कमर टूट गई। कुछ ने आत्मसमर्पण किया तो कई मारे गए। लेकिन धीरे-धीरे इसने फिर सिर उठाना आरंभ किया। अक्टूबर 2008 में एनडीएफबी ने असम के कई हिस्सों में बम हमले करके अपनी हिंसक शक्ति का आभास कराया जिसमें 90 लोगों की मौत हो गई। एनडीएफबी के संस्थापक रंजन दिमारी को हमलों के लिए दोषी ठहराया गया। 

लेकिन यहां से एनडीएफबी में दरार आरंभ होता है। वस्तुतः हमले को लेकर एनडीएफबी में सहमति नहीं थी। इस कारण यह दो भागों में बंट गया। एनडीएफबी (पी) का नेतृत्व गोविंदा बासुमतारी और एनडीएफबी (आर) का नेतृत्व रंजन के हाथों आया। वर्ष 2009 में एनडीएफबी (पी)ने केंद्र सरकार के साथ बाचतीत शुरू की लेकिन विशेष परिणाम नहीं निकला। वर्ष 2010 में रंजन दिमारी को बांग्लादेश ने गिरफ्तार करके भारत को सौंप दिया। दोनों ही गुट केंद्र के साथ बातचीत कर रहे थे। अगर उस समय ठीक से कोशिश की जाती तो मामला सुलझ सकता था। वर्ष 2012 में इंगती कठार सोंगबिजित ने एनडीएफबी (आर) से खुद को अलग कर लिया और एनडीएफबी (एस) बनाया। समझौते की संभावना के कारण वर्ष 2013 में रंजन को जमानत मिल गई। माना जाता है कि इंगती के गुट ने दिसंबर 2014 में 66 आदिवासियों की हत्या की। यह गुट बातचीत के खिलाफ था। वर्ष 2015 में इंगती की जगह पर बी साओरैग्वारा ने गुट की कमान संभाली। बाद में इंगती ने एनडीएफबी (एस) से अलग होकर अपना अलग गुट बना लिया। इस तरह पूरा समूह 4 भागों में बंट गया। इसीलिए केन्द्र ने इन चारों समूहों से समझौता किया है। जो जेल में थे उनसे भी बातचीत होती रही। समझौते पर सहमति के बाद दाईमारी को जेल से रिहा किया गया था।

पूरी पृष्ठभूमि को समझने के बाद यह कल्पना करना आसान है कि अगर समझौता सफल हो गया तो नरेन्द्र मोदी सरकार की यह ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। असम में हिंसा, उपद्रव और दंगे का मूल कारण बोडो समस्या में ही निहित थी। उल्फा का जो गुट बचा हुआ है वह काफी कमजोर हो चुका है। बोडो का समाधान करने के बाद उल्फा के बचे-खुचे लड़ाकुओं को आराम से नियंत्रित किया जा सकता है। समझौते के विरोध में चार जगहों पर गणतंत्र दिवस के दिन विस्फोट करके उल्फा आई ने सरकार को चुनौती दी है। निस्संदेह, ऐसे समूह हैं जो समझौते के पक्ष में नहीं हैं। उन्हीं ने 12 घंटे का बंद भी बुलाया था जिसका बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) के तहत आने वाले चार जिलों कोकराझार, बक्सा, चिरांग और उदलगुड़ी जिलों में असर हुआ। लेकिन समझौते के क्रियान्वयन की प्रक्रिया आरंभ होने के साथ इसमें कमी आएगी। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि समझौते को बीटीसी प्रमुख हागरामा मोहीलरी का पूरा समर्थन प्राप्त है। हालांकि वहां जातीय एवं सांप्रदायिक विभाजन इतना तीखा हो चुका है उसे पूरी तरह सामान्य बनाने में समय लगेगा, लेकिन सबसे शक्तिशाली और प्रभावी पक्ष यदि समझौता के अमल में सहयोग कर रहा है और सरकार ने ईमानदारी से काम किया तो तनाव भी कम होगा एवं लोगों का विश्वास भी कायम होगा। वैसे भी विरोध करने वालों में राजनीतिक हित देखने वालों से लेकर सांप्रदायिक आधार पर विचार करने वाले समूह भी शामिल हैं। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208



मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

(12.38) 28-01-2020 To 03-02-2020

इस अंक में क्या है?
-जनसंख्या नियंत्रण कानून समय की मांग, पर इसे भी कुछ लोग विवादित बनाने में लगे
-कोबी ब्रायंट की मौत पर रो रही है पूरी दुनिया
-आंदोलन कुचलने के ये नए ‘लांछन शस्त्र’
-शाहीन बाग में दुकानें बंद होने से धंधा चैपट
-देखो हंस मत देना
-अमित शाह और दूसरे मंत्री शाहीन बाग जाएं और बातचीत कर रास्ता खुलवाएंः केजरीवाल
-शाह दिल्ली जैसा कोई सरकारी स्कूल भाजपा शासित राज्य में दिखाएंः सिसोदिया
-दिल्ली के विकास को अगले स्तर तक ले जाने में मेरी मदद करें: केजरीवाल
-सातवीं बार मैदान में हैं शोएब इकबाल
-164 उम्मीदवार करोड़पति, 13 कैंडिडेट के पास 50 करोड़ से अधिक की संपत्ति
-दिल्ली में 672 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे 1.47 करोड़ मतदाता
-बिना अधिसूचना के क्लस्टर बसों में मुफ्त यात्रा का कदम खराब होगाः हाई कोर्ट
-15 साल की गौ-सेवा का परिणाम है पद्मश्री पुरस्कारः रमजान खान
-पटना के महिला कॉलेज ने बुर्के पर पाबंदी वापस ली
-7 मार्च को अयोध्या जाएंगे उद्धव ठाकरे
-डायमंड बुक्स ने प्रस्तुत की मुख्तार अब्बास नकवी की फिक्शन बुक ‘बलवा’
-5 महीने बाद कश्मीर में 2जी मोबाइल इंटरनेट सेवा बहाल, 301 वेबसाइट ही चला पाएंगे यूजर्स
-अच्छा प्रदर्शन नहीं करने वाले अधिकारियों को किया जाएगा जबरन सेवानिवृत्तः गडकरी
-बी आनंद एनसीएम के सचिव नियुक्त
-मत करो शादी से पहले सेक्स, सरकार ने दिया आदेश
-केरल की मस्जिद में हिंदू विवाह सामाजिक एकता का सबसे बड़ा उदाहरण
-पाकिस्तानी हल्क को है परफेक्ट लड़की की तलाश
-घाना में लागू होगी मोदी सरकार की उज्जवला जैसी योजना, भारत करेगा मदद
-खेत से लेकर खाने की थाली तक होती है अन्न की बर्बादी, इसे रोकना जरूरी
-स्टाइलिश दिखने के लिए पहनें नये कलेवर के स्कार्फ और मफलर
-रहस्य, रोमांच और आश्चर्य की अनोखी दुनिया रामोजी फिल्म सिटी
-अधिक मात्रा में काजू का सेवन खराब कर सकता है स्वास्थ्य
-किंग कोहली आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में टॉप पर बरकरार
-मुंबई में होगा आईपीएल 2020 का फाइनल
-कौन फैसला करता है कि किसे अवॉर्ड मिलेगा? पद्म श्री न मिलने पर विनेश फोगाट
-फ्रेंचाइजी क्रिकेट खेलने वाली टीमों को टी20 विश्व कप में कितना होगा फायदा?
-कंगना का अगला धमाका होगी फिल्म तेजस, एयरफोर्स पायलट का निभाएंगी किरदार
-खुल गया रेखा की मांग के सिंदूर का राज
-बॉलीवुड में जोर-शोर से उठाया जाता है गे-लेस्बियन का मुद्दा
-फिटनेस मेरे लिए जीवन जीने का एक तरीका हैः अनिल कपूर











धर्मपुरा वार्ड 233 की पूर्व निगम पार्षद तुलसी गांधी आम आदमी पार्टी में शामिल

संवाददाता
पूर्वी दिल्ली। गांधी नगर विधानसभा के धर्मपुरा वार्ड 233 की पूर्व निगम पार्षद तुलसी गांधी अपने समर्थकों के साथ आम आदमी पार्टी में शामिल हो गई हैं। वह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ी थी और भाजपा के उम्मीदवार को हराया था। उन्हें संजय सिंह ने अपने आवास पर पार्टी की टोपी और पटका पहनाकर पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दिलवाई। 
संजय सिंह ने कहा केजरीवाल जी की कार्यशैली को देखकर लोग अपनी पुरानी पार्टी छोड़कर आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं।
 















 

शनिवार, 25 जनवरी 2020

खतरनाक विस्तार को रोकने के लिए शाहीन बाग का अंत जरुरी

 

अवधेश कुमार

राजधानी दिल्ली का शाहीन बाग इन दिनोें देश में तो सुर्खियां बना ही हुआ है, सुर्खियां बनाने वालों की कृपा से अनेक दूसरे देशों में भी यह चर्चा में है। वहां जाइए और चुपचाप घटनाक्रमों, लोगों की गतिविधियों, उनकी आपसी बातचीत सबका पर्यवक्षण करिए। आपके सामने यह साफ हो जाएगा कि पूरा धरना ही झूठ, भ्रम, गैर जानकारी, नासमझी, , पाखंड , सांप्रदायिक सोच तथा भाजपा, संघ एवं नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के प्रति एक बड़े वर्ग के अंदर व्याप्त नफरत की सम्मिलित परिणति है। भाजपा विरोधी राजनीतिक पार्टियां और संगठन भी इस तरह की नफरत और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने मेें भूमिका निभा रहे हैं। झूठ यह है कि नागरिकता संशोधन कानून मुसलमानों के खिलाफ है। कई लोग कहते मिल जाएंगे कि मोदी और शाह मुसलमानों को बाहर निकालना चाहता है या हमें कैद में रख देगा। यह भ्रम है जिसे योजनापूर्वक फैलाया गया है। गैर जानकारी का तो साम्राज्य है। ज्यादातर को पता ही नहीं कि नागरिकता कानून, एनपीआर या एनआरसी क्या है। जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते वो बातें वहां सुनने को मिल जाएंगी। नासमझी यह है कि इसके पीछे भूमिका निभाने वाले कुछ लोग मानते हैं कि इससे मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनेगा एवं यह समय के पूर्व ही गिर जाएगी। इस लेखक को टीवी पर लगातार दिखने वाले एक मौलाना ने स्वयं कहा कि सरकार अब जाने वाली है। पाखंड यह कि इसके पीछे गंदी राजनीति है, इस पर आने वाले भारी खर्च को अदृश्य शक्तियां वहन कर रहीं हैं और कहा जा रहा है कि लोग खर्च कर रहे हैं। सांप्रदायिक सोच के बारे में तो प्रमाण देने की जरुरत ही नहीं है। आप पूरी व्यवस्था देख लीजिए, इतना भारी संसाधन बिना पूर्व योजना के आ ही नहीं सकता। इसका वित्तपोषण भी एक रहस्य बना हुआ है कि आखिर कौन इतना खर्च कर रहा है। 

इस बहुप्रचारित धरना, जिसे भारत का सबसे बड़े आंदोलन की संज्ञा दी जा रही है का यही सच है। इसमें छः श्रेणी के लोगों की भूमिका है। ऐसे लोग हैं जिनके अंदर वाकई यह भय पैदा कर दिया गया है कि मोदी सरकार पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ काम कर रही है इसलिए हमको अपनी रक्षा के लिए वहां जाना चाहिए। दूसरी श्रेणी में वे लोग हैं जिनको पूरा सच मालूम है लेकिन मोदी और भाजपा से नफरत में उन्होंने यह आग लगाई है और वे वहां डटे हुए हैं ताकि आग बूझे नहीं। तीसरी श्रेणी में वे हैं जिनका आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं। वे या तो अपने नेता, मालिक या अन्य के कहने या फिर पैसे एवं अन्य लालच में आते हैं। चौथी श्रेणी नेताओं की हैं जो वहां इसलिए जा रहे हैं ताकि वे मुसलमानों के हमदर्द बनकर उनका वोट पा सकें। पांचवी श्रेणी उनका है जो जेएनयू से लेकर जामा मस्जिद एवं कई जगहों पर देश विरोधी नारों से लेकर उत्पात के कारण बने हैं और उनको लगता है कि इसके साथ जुड़कर वे ज्यादा ताकतवर होंगे एवं सरकार पर दबाव बढ़ेगा। छठी श्रेणी मजहबी कट्टरपंथियों का है जो देश में अपनी सोच का जेहादी माहौल पैदा करने लिए सक्रिय रहे हैं। अगर इन सबको साथ मिला दें तो सकल निष्कर्ष यह है कि हर हाल में मोदी सरकार को मुसलमान विरोधी, सांप्रदायिक, लोकतंत्र का हनन करने वाला करार देकर देश एवं दुनिया में बदनाम करना तथा इसे कमजोर कर देना है। हालांकि इसमें सफलता मिलने की संभावना इसलिए नहीं है कि ऐसे झूठ और फरेब पर आधारित प्रदर्शनों से मोदी सरकार का समर्थन ज्यादा बढ़ेगा। 

आज की स्थिति यह है कि राजधानी दिल्ली का बड़ा वर्ग जिनकी संख्या लाखों में है, वो इस धरना के कारण लगने वाले जाम से परेशान होकर इसके खिलाफ है। लोग विरोध मेें प्रदर्शन भी करने लगे हैं। मीडिया के बड़े समूह द्वारा तथ्य सामने रखने तथा अलग-अलग संगठनों द्वारा मुहल्ला सभाओं में नागरिकता कानून का सच बताने से मुस्लिम समुदाय के अंदर भी यह भाव पैदा हो रहा है कि इस कानून से हमारा तो कोई लेना-देना है नहीं। यह भाव जैसे-जैसे बढ़ रहा है मोदी विरोधी अभियानकर्ता एनपीआर एवं एनआरसी की बात करते हए बता रहे हैं कि एनपीआर में तुमसे पहचान मांगा जाएगा, तुम्हारे खानदान का विवरण मांगा जाएगा और नहीं देने पर तुम्हारे नाम के सामने सब लिख दिया जाएगा तथा एनआरसी में तुम्हारा नाम नहीं होगा। इस तरह तुम भारत के नागरिक नहीं रहोगे। यहां तक दुष्प्रचार है कि उसके बाद तुमको जिस सेंटर में रखा जाएगा वहां मोदी और शाह केवल एक शाम तुमको भोजन देगा। आप अगर शाहीन बाग नहीं गए हैं तो आपको इस पर सहसा विश्वास नहीं होगा लेकिन वहां चले जाइए तो आपको इन महान विचारों से सामना हो जाएगा। सबसे भयावह स्थिति इस तथाकथित आंदोलन में छोटे-छोटे बच्चों का दुरुपयोग है। उनके अंदर किस तरह का जहर भरा जा रहा है यह उनके बयानों एवं नारों से मिल जाएगा। एक बच्चा-बच्ची जिसे आजादी का अर्थ नहीं मालूम उसे रटवाकर नारा लगवाया जा रहा है। एक बच्ची को पूरा बयान रटा दिया गया है जिसमें वह कह रही है कि मोदी और शाह हमें मारने वाला है हम उसको मार डालेंगे। 

इस तरह बच्चों के अंदर सांप्रदायिकता और हिंसा का बीज बोने वाले आखिर देश को कहां ले जाना चाहते हैं? इन बच्चों का क्या दोष है? लेकिन यह भी रणनीति है। बच्चों और महिलाओं को आगे रखो ताकि दुनिया की मीडिया यह सुने और इन पर कोई कार्रवाई हो तो फिर हमें छाती पीटने का मौका मिल जाए कि महिलाओं और बच्चों के साथ बर्बरता की गई। इनके नेताओं के मुंह से बार-बार यही निकलता है कि महिलाएं यहां अपने अधिकारों के लिए और संविधान की रक्षा के लिए लड़ रही है तो उनके बच्चे कहां जाएंगे। वे बच्चे जो कह रहे हैं वो उन्होंने वहां देखा है उन्हें किसी ने सिखाया नहीं है। एक बच्चा नारा लगा रहा है कि जो हिटलर की चाल चलेगा और उसके साथ सब बोल रहे हैं कि वो हिटलर की मौत करेगा।  कोई बच्चा बिना सिखाएं यह नारा बोल सकता है क्या? महिलाओं को आगे रखने की रणनीति के तहत दिल्ली में ही कई जगहों पर ऐसे धरने आयोजित किए जा रहे हैं, तथा देश के कुछ दूसरे हिस्सों में भी। ये बच्चे कितने खतरनाक मानसिकता से बड़े होंगे और क्या करेंगे यह सोचकर ही भय पैदा हो जाता है। 

प्रश्न है कि यह ऐसे ही चलेगा या इस पर पूर्ण विराम लगाया जाएगा? यह कहना कि विरोध-प्रदर्शन-आंदोलन हमारा संवैधानिक अधिकार है इस खतरनाक अभियान का सरलीकरण करना है। सबसे पहले तो किसी विरोध या आंदोलन का तार्किक आधार होना चाहिए। नागरिकता कानून मुसलमानों के खिलाफ है नहीं। एनपीआर 2010 में हुआ, 2015 में उसको अद्यतन किया गया। कोई समस्या नहीं आई। वह मूल जनगणना का भाग है एवं सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए आवश्यक है। एनआरसी अभी आया नही। जब आएगा और उसमें कुछ आपत्तिजनक बातें होंगी तो उसका विरोध किया जाएगा। इस समय ऐसा कुछ है नहीं। तो जिस विरोध का कोई तार्किक आधार नहीं है, जो विरोध दूसरे के अधिकारों का हनन कर रहा है, जिसमेें बच्चों का रैडिकलाइजेशन किया जा रहा है, जिसमें एक समुदाय को भड़काने जैसे सांप्रदायिकता के तत्व साफ दिख रहे हैं, जिसका पूरा उद्देश्य ही कुत्सित राजनीति है यानी मोदी-शाह को बदनाम कर सरकार को फासीवादी साबित करो....वह संवैधानिक अधिकार के तहत नहीं आ सकता। संविधान में मौलिक अधिकार के साथ मौलिक कर्तव्य भी हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि अधिकारों के नाम पर ऐसी स्थिति पैदा कर दें जिनसे दूसरे के लिए कर्तव्य पालन कठिन हो जाए और वह भी सुनियोजित राजनीतिक साजिश के तहत। 

साफ है कि शाहीन बाग का अंत नहीं होगा तो इसका जहरीला विस्तार और जगह हो सकता है। कारण, इसमें अलग-अलग कुत्सित उद्देश्य से लगे लोग जानते हैं कि इसे जगह-जगह फैलाएं बिना वे मोदी सरकार को खलनायक बना देने में कामयाब नहीं होंगे। इसलिए ज्यादा विस्तार से पहले ही इसे रोकना होगा। इसके कारण देश के बड़े वर्ग में गुस्सा पैदा हो रहा है। तो खतरा यह है कि कहीं प्रतिक्रिया में वो वर्ग इनको चुनौती देने लगा तो फिर स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी। इसलिए जरुरी है कि इसे अभी ही रोका जाए। इस बात की चिंता किए बिना कि ये क्या दुष्प्रचार करेंगे, ये आगे क्या करेंगे और राजनीतिक पार्टियां इसे किस तरह लेंगी इसका कानूनी तरीके से अंत किया जाए।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208


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