अवधेश कुमार
सुन्नी वक्फ बोर्ड
द्वारा अयोध्या मामले पर आगे न बढ़ने के निर्णय के बावजूद औल इंडिया मुस्लिम
पर्सनल बोर्ड पुनर्विचार याचिका डलवाएगा। जमीयत उलेमा हिंद का एक गुट भी न्यायालय
जा रहा है। वस्तुतजः अयोध्या मामले पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से देश के बहुमत ने
यह सोचते हुए राहत की सांस ली कि 491 वर्ष के विवाद का बेहतरीन हल निकल आया है।
किंतु कुछ ही मिनट बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी यह कहते हुए
सामने आ गए कि हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, यह विरोधाभासी है....और
इसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। इसके बाद असदुद्दीन ओवैसी यह कहते हुए सामने आए कि हमारे
साथ इंसाफ नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम है लेकिन इनफौलिबल नहीं है यानी ऐसा
नहीं है जो गलती नहीं कर सके। उसके बाद उन्होंने उच्चतम न्यायालय पर जिस तरह की टिप्पणियां
कीं और अभी भी कर रहे हैं वो सब देश के सामने है। ये वो लोग हैं जो फैसले के पहले तेज
आवाज मंे यह कहते थे कि हम तो उच्चतम न्यायालय का फैसला मानेंगे लेकिन दूसरे पक्ष मानेंगे
कि नहीं उनसे पूछिए। वास्तव में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका
डालने का जो फैसला किया वह दुर्भाग्यपूर्ण, दुखदायी और क्षोभ पैदा
करने वाला तो है लेकिन इसमें आश्चर्य का कोई पहलू नहीं है। फैसले के साथ ही यह साफ
दिखने लगा था कि कुछ मुस्लिम चेहरे जिनका वजूद ही अयोध्या विवाद पर टिका है और जो देश
मंे स्वयं को एकमात्र मुसलमानों का नेता बनने का ख्वाब पाल रहे हैं वे इस मुद्दे को
यूं ही हाथ से जाने नहीं देंगे।
वास्तव में फैसले के
बाद आम मुसलमानों की प्रतिक्रिया यही थी कि अब इस मामले को यही समाप्त किया जाए। लेकिन
इसके विरूद्ध ये लोग सक्रिए हो गए। जब याचिकाकर्ता कहने लगे कि हम अपील नहीं करेंगे
तो उन पर प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव बनाने की पूरी कोशिश हुई और आज अगर मुस्लिम पर्सनल
लौ बोर्ड के चार पक्षकार अपील के लिए तैयार हैं तो इसके पीछे निहित स्वार्थी तत्वों
का दबाव ही है। जिलानी ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर याचिकाकर्ताओं में से कोई नहीं
जाएगा तब भी मुस्लिम समाज से कोई याचिका डाल सकता है क्योंकि यह पूरे समुदाय का मसला
है। तो जो इस सीमा तक तैयार हैं वे पुनर्विचार याचिका नहीं डालेंगे ऐसा मानने का कोई
कारण नहीं हैंं। जरा सोचिए अगर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी अस्तित्व में नहीं आता तो
जफरयाब जिलानी को कौन जानता? यही बात अनेक के साथ लागू होता है। पुनर्विचार याचिका में जाना
हर वादी-प्रतिवादी का हक है। किंतु यह आम या दो-चार व्यक्तियांे के बीच का मामला नहीं
है। इससे भारत के अंदर और बाहर रहने वाले करोड़ों हिन्दुओं की भावनायें जुड़ी हैं,
जबकि बाबरी का महत्व
इस्लाम मंे कुछ भी नहीं है। फिर ये जिन तर्को के साथ पुनर्विचार के लिए जा रहे हैं
उन सबका उच्चतम न्यायालय पहले ही जवाब दे चुका है।
इन्होंने दस तर्क दिए
हैं। एक, उच्चतम न्यायालय ने माना है कि बाबर के सेनापति मीरबाकी की ओर से मस्जिद का निर्माण
कराया गया था। दो, 1857 से 1949 तक बाबरी मस्जिद की तीन गुंबदों वाली इमारत और अंदरुनी हिस्सा
मुस्लिमों के कब्जे में माना गया है। तीन, न्यायालय ने माना है कि बाबरी मस्जिद में
आखिरी नमाज 16 दिसंबर, 1949 को पढ़ी गई थी यानी वह मस्जिद के रूप में
थी। चार, न्यायालय ने माना है कि 22-23 दिसंबर,
1949 की रात को चोरी से या फिर जबरदस्ती मूर्तियां रखी गई थीं। पांच, गुंबद के नीचे कथित
रामजन्मभूमि पर पूजा की बात नहीं कही गई है। ऐसे में यह जमीन फिर रामलला विराजमान के
पक्ष में क्यों दी गई? छः, न्यायालय ने खुद अपने फैसले में कहा है कि रामजन्मभूमि को पक्षकार
नहीं माना जा सकता। फिर उसके आधार पर ही फैसला क्यों दिया गया? सात, न्यायालय ने माना है
कि 6 दिसंबर, 1992 में मस्जिद को गिराया जाना गलत था तो मंदिर के लिए फैसला क्यों
दिया गया। आठ, न्यायालय ने कहा कि हिंदू सैकड़ों साल से पूजा करते रहे हैं,
इसलिए जमीन रामलला
को दी जाती है, जबकि मुस्लिम भी तो वहां इबादत करते रहे हैं। नौ, जमीन हिंदुओं को दी
गई है इसलिए 5 एकड़ जमीन दूसरे पक्ष को दी जाती है। न्यायालय ने संविधान के
142 का इस्तेमाल कर यह बात कही। इसमें वक्फ ऐक्ट का ध्यान नहीं रखा गया, उसके मुताबिक मस्जिद
की जमीन कभी बदली नहीं जा सकती है। एवं दस, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
के आधार पर ही न्यायालय ने यह माना कि किसी मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण नहीं
हुआ था।
सच यह है कि इन दसों
प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय के 40 दिनों की बहस में दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क और तथ्य दिए
थे। फैसले में इन सबका जवाब दिया गया है। सबसे अंतिम तर्क मस्जिद के लिए जमीन के प्रश्न
को लीजिए। न्यायालय ने इसे क्षतिपूर्ति नहीं कहा है। केवल इतना कहा है कि न्यायालय
अगर मुस्लिमों के हक को नजरअंदाज करती है तो न्याय नहीं होगा। संविधान हर धर्म को बराबरी
का हक देता है और सहिष्णुता तथा परस्पर शांतिपूर्ण सह अस्तित्व हमारे देश और यहां के
लोगों की सेक्यूलर प्रतिबद्धता को मजबूत करते हैं। इसने कहा कि आवंटित भूमि का क्षेत्र
तय करते हुए यह आवश्यक है कि मुस्लिम समुदाय को भूमि दी जाए। न्यायालय ने माना ही नहीं
है कि वहां मूल रुप से मस्जिद था।ं पीठ ने कहा है कि अधिसंभाव्यता की प्रबलता के आधार
पर अंदर पाई गई संरचना की प्रकृति इसके हिंदू धार्मिक मूल का होने का संकेत देती है
जो 12 वीं सदी की है। निस्संदेह, संविधान पीठ ने कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यह नहीं
बता पाया कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी। लेकिन न्यायालय ने सुन्नी वक्फ बोर्ड
और अन्य मुस्लिम पक्षकारों द्वारा सर्वेक्षण की रिपोर्ट खारिज किए जाने के सारे तर्क
अमान्य करार दिए। कहा कि पुरातात्विक प्रमाणों को महज एक ओपिनियन करार दे देना भारतीय
पुरातत्व सवेक्षण का अपमान होगा। पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई से पता चला कि विवादित
मस्जिद पहले से मौजूद किसी संरचना पर बनी है। ढहाए गए ढांचे के नीचे एक मंदिर था,
इस तथ्य की पुष्टि
पुरातत्व सर्वेक्षण करती है। खुदाई ने पहले से मौजूद 12वीं सदी की संरचना
की मौजूदगी की पुष्टि की है। संरचना विशाल है और उसके 17 कतारांे में बने 85 खंभों से इसकी पुष्टि
भी होती है। नीचे बनी हुई वह संरचना जिसने मस्जिद के लिए नींव मुहैया करायी,
स्पष्ट है कि वह हिन्दू
धार्मिक मूल का ढांचा था।
इसमें यह कहना कि जब
उसने तोड़कर बनाने के प्रमाण दिए ही नहीं उसके आधार पर फैसला कैसे दे दिया गया बिल्कुल
हास्यास्पद है। मौजूदा न्याय प्रणाली को जिस तरह के प्रत्यक्ष साक्ष्य की आवश्यकता
होती है उसकी बात न्यायालय ने कही है। कोई स्वर्ग से उतरकर बताने तो आएगा नहीं कि मेरे
सामने मंदिर तोड़ी जा रही थी। आगे बढ़िए तो न्यायालय ने साफ कहा है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड
यह साबित नहीं कर पाया कि विवादित जगह पर उसका बिना किसी बाधा के लंबे समय तक कब्जा
रहा। व्यवधान के बावजूद साक्ष्य यह बताते हैं कि प्रार्थना पूरी तरह से कभी बंद नहीं
हुई। मुस्लिमों ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया, जो यह दर्शाता हो कि
वे 1857 से पहले मस्जिद पर पूरा अधिकार रखते थे। इस बात के पूरे सबूत हैं कि राम चबूतरा
और सीता रसोई पर हिंदू 1857 से पहले भी पूजा करते थे। मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण
1528 में कराया था लेकिन यह स्थल दशकों से निरंतर संघर्ष का केन्द्र रहा। पीठ ने कहा
कि 1856-57 में सांप्रदायिक दंगा भड़कने से पहले हिंदुओं को परिसर में पूजा करने से नहीं रोका
गया। 1856-57 के दंगों के बाद पूजा स्थल पर रेलिंग लगाकर इसे बांट दिया गया
ताकि दोनों समुदायों के लोग पूजा कर सकें। 1934 में हुए दंगे इशारा
करते हैं कि बाद में अंदर के आंगन का मसला गंभीर तकरार का मुद्दा बन गया। इसके स्पष्ट
साक्ष्य हैं कि हिंदू विवादित ढांचे के बाहरी हिस्से में पूजा करते थे। कानून-व्यवस्था
और शांति बनाए रखने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने परिसर को भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित
करते हुए छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की। भीतरी बरामदे का इस्तेमाल
मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिंदू पूजा के लिए करने लगे।
इसे देखने के बाद बोर्ड
का कौन सा प्रश्न अनुत्तरित है जिसके लिए ये पुनर्विचार याचिका लेकर जा रहे है? न्यायालय ने हर उस
पहलू की जांच की है जो इससे जुड़े हैं। श्रीरामलला विराजमान के बारे में न्यायालय ने
कहा कि 1989 में भगवान श्रीराम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी। अयोध्या
में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी पूजा-सेवा जारी रही। फैसले में रामजन्मभूमि
के पक्ष में ऐसे-ऐसे साक्ष्य और तर्क हैं जिनको किसी सूरत में खारिज नहीं किया जा सकता।
इन सबको यहां प्रस्तुत करना संभव नहीं। जानबूझकर ये खत्म हो चुके विवाद को बनाए रखना
चाहते हैं। प्रश्न है क्यों? इससे तो सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा। आवश्यक है कि विवेकशील मुस्लिम
निहित स्वार्थी नेताओं की मुखालफत करें। मुस्लिम समाज की ओर से मुखर विरोध ही इनका
बेहतर जवाब हो सकता है।
अवधेश कुमार,
ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स,
दिल्लीः110092,
दूरभाषः01122483408,
9811027208
पुनर्विचार याचिका
का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण
अवधेश कुमार
सुन्नी वक्फ बोर्ड
द्वारा अयोध्या मामले पर आगे न बढ़ने के निर्णय के बावजूद औल इंडिया मुस्लिम
पर्सनल बोर्ड पुनर्विचार याचिका डलवाएगा। जमीयत उलेमा हिंद का एक गुट भी न्यायालय
जा रहा है। वस्तुतजः अयोध्या मामले पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से देश के बहुमत ने
यह सोचते हुए राहत की सांस ली कि 491 वर्ष के विवाद का बेहतरीन हल निकल आया है।
किंतु कुछ ही मिनट बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी यह कहते हुए
सामने आ गए कि हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, यह विरोधाभासी है....और
इसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। इसके बाद असदुद्दीन ओवैसी यह कहते हुए सामने आए कि हमारे
साथ इंसाफ नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम है लेकिन इनफौलिबल नहीं है यानी ऐसा
नहीं है जो गलती नहीं कर सके। उसके बाद उन्होंने उच्चतम न्यायालय पर जिस तरह की टिप्पणियां
कीं और अभी भी कर रहे हैं वो सब देश के सामने है। ये वो लोग हैं जो फैसले के पहले तेज
आवाज मंे यह कहते थे कि हम तो उच्चतम न्यायालय का फैसला मानेंगे लेकिन दूसरे पक्ष मानेंगे
कि नहीं उनसे पूछिए। वास्तव में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका
डालने का जो फैसला किया वह दुर्भाग्यपूर्ण, दुखदायी और क्षोभ पैदा
करने वाला तो है लेकिन इसमें आश्चर्य का कोई पहलू नहीं है। फैसले के साथ ही यह साफ
दिखने लगा था कि कुछ मुस्लिम चेहरे जिनका वजूद ही अयोध्या विवाद पर टिका है और जो देश
मंे स्वयं को एकमात्र मुसलमानों का नेता बनने का ख्वाब पाल रहे हैं वे इस मुद्दे को
यूं ही हाथ से जाने नहीं देंगे।
वास्तव में फैसले के
बाद आम मुसलमानों की प्रतिक्रिया यही थी कि अब इस मामले को यही समाप्त किया जाए। लेकिन
इसके विरूद्ध ये लोग सक्रिए हो गए। जब याचिकाकर्ता कहने लगे कि हम अपील नहीं करेंगे
तो उन पर प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव बनाने की पूरी कोशिश हुई और आज अगर मुस्लिम पर्सनल
लौ बोर्ड के चार पक्षकार अपील के लिए तैयार हैं तो इसके पीछे निहित स्वार्थी तत्वों
का दबाव ही है। जिलानी ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर याचिकाकर्ताओं में से कोई नहीं
जाएगा तब भी मुस्लिम समाज से कोई याचिका डाल सकता है क्योंकि यह पूरे समुदाय का मसला
है। तो जो इस सीमा तक तैयार हैं वे पुनर्विचार याचिका नहीं डालेंगे ऐसा मानने का कोई
कारण नहीं हैंं। जरा सोचिए अगर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी अस्तित्व में नहीं आता तो
जफरयाब जिलानी को कौन जानता? यही बात अनेक के साथ लागू होता है। पुनर्विचार याचिका में जाना
हर वादी-प्रतिवादी का हक है। किंतु यह आम या दो-चार व्यक्तियांे के बीच का मामला नहीं
है। इससे भारत के अंदर और बाहर रहने वाले करोड़ों हिन्दुओं की भावनायें जुड़ी हैं,
जबकि बाबरी का महत्व
इस्लाम मंे कुछ भी नहीं है। फिर ये जिन तर्को के साथ पुनर्विचार के लिए जा रहे हैं
उन सबका उच्चतम न्यायालय पहले ही जवाब दे चुका है।
इन्होंने दस तर्क दिए
हैं। एक, उच्चतम न्यायालय ने माना है कि बाबर के सेनापति मीरबाकी की ओर से मस्जिद का निर्माण
कराया गया था। दो, 1857 से 1949 तक बाबरी मस्जिद की तीन गुंबदों वाली इमारत और अंदरुनी हिस्सा
मुस्लिमों के कब्जे में माना गया है। तीन, न्यायालय ने माना है कि बाबरी मस्जिद में
आखिरी नमाज 16 दिसंबर, 1949 को पढ़ी गई थी यानी वह मस्जिद के रूप में
थी। चार, न्यायालय ने माना है कि 22-23 दिसंबर,
1949 की रात को चोरी से या फिर जबरदस्ती मूर्तियां रखी गई थीं। पांच, गुंबद के नीचे कथित
रामजन्मभूमि पर पूजा की बात नहीं कही गई है। ऐसे में यह जमीन फिर रामलला विराजमान के
पक्ष में क्यों दी गई? छः, न्यायालय ने खुद अपने फैसले में कहा है कि रामजन्मभूमि को पक्षकार
नहीं माना जा सकता। फिर उसके आधार पर ही फैसला क्यों दिया गया? सात, न्यायालय ने माना है
कि 6 दिसंबर, 1992 में मस्जिद को गिराया जाना गलत था तो मंदिर के लिए फैसला क्यों
दिया गया। आठ, न्यायालय ने कहा कि हिंदू सैकड़ों साल से पूजा करते रहे हैं,
इसलिए जमीन रामलला
को दी जाती है, जबकि मुस्लिम भी तो वहां इबादत करते रहे हैं। नौ, जमीन हिंदुओं को दी
गई है इसलिए 5 एकड़ जमीन दूसरे पक्ष को दी जाती है। न्यायालय ने संविधान के
142 का इस्तेमाल कर यह बात कही। इसमें वक्फ ऐक्ट का ध्यान नहीं रखा गया, उसके मुताबिक मस्जिद
की जमीन कभी बदली नहीं जा सकती है। एवं दस, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
के आधार पर ही न्यायालय ने यह माना कि किसी मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण नहीं
हुआ था।
सच यह है कि इन दसों
प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय के 40 दिनों की बहस में दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क और तथ्य दिए
थे। फैसले में इन सबका जवाब दिया गया है। सबसे अंतिम तर्क मस्जिद के लिए जमीन के प्रश्न
को लीजिए। न्यायालय ने इसे क्षतिपूर्ति नहीं कहा है। केवल इतना कहा है कि न्यायालय
अगर मुस्लिमों के हक को नजरअंदाज करती है तो न्याय नहीं होगा। संविधान हर धर्म को बराबरी
का हक देता है और सहिष्णुता तथा परस्पर शांतिपूर्ण सह अस्तित्व हमारे देश और यहां के
लोगों की सेक्यूलर प्रतिबद्धता को मजबूत करते हैं। इसने कहा कि आवंटित भूमि का क्षेत्र
तय करते हुए यह आवश्यक है कि मुस्लिम समुदाय को भूमि दी जाए। न्यायालय ने माना ही नहीं
है कि वहां मूल रुप से मस्जिद था।ं पीठ ने कहा है कि अधिसंभाव्यता की प्रबलता के आधार
पर अंदर पाई गई संरचना की प्रकृति इसके हिंदू धार्मिक मूल का होने का संकेत देती है
जो 12 वीं सदी की है। निस्संदेह, संविधान पीठ ने कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यह नहीं
बता पाया कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी। लेकिन न्यायालय ने सुन्नी वक्फ बोर्ड
और अन्य मुस्लिम पक्षकारों द्वारा सर्वेक्षण की रिपोर्ट खारिज किए जाने के सारे तर्क
अमान्य करार दिए। कहा कि पुरातात्विक प्रमाणों को महज एक ओपिनियन करार दे देना भारतीय
पुरातत्व सवेक्षण का अपमान होगा। पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई से पता चला कि विवादित
मस्जिद पहले से मौजूद किसी संरचना पर बनी है। ढहाए गए ढांचे के नीचे एक मंदिर था,
इस तथ्य की पुष्टि
पुरातत्व सर्वेक्षण करती है। खुदाई ने पहले से मौजूद 12वीं सदी की संरचना
की मौजूदगी की पुष्टि की है। संरचना विशाल है और उसके 17 कतारांे में बने 85 खंभों से इसकी पुष्टि
भी होती है। नीचे बनी हुई वह संरचना जिसने मस्जिद के लिए नींव मुहैया करायी,
स्पष्ट है कि वह हिन्दू
धार्मिक मूल का ढांचा था।
इसमें यह कहना कि जब
उसने तोड़कर बनाने के प्रमाण दिए ही नहीं उसके आधार पर फैसला कैसे दे दिया गया बिल्कुल
हास्यास्पद है। मौजूदा न्याय प्रणाली को जिस तरह के प्रत्यक्ष साक्ष्य की आवश्यकता
होती है उसकी बात न्यायालय ने कही है। कोई स्वर्ग से उतरकर बताने तो आएगा नहीं कि मेरे
सामने मंदिर तोड़ी जा रही थी। आगे बढ़िए तो न्यायालय ने साफ कहा है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड
यह साबित नहीं कर पाया कि विवादित जगह पर उसका बिना किसी बाधा के लंबे समय तक कब्जा
रहा। व्यवधान के बावजूद साक्ष्य यह बताते हैं कि प्रार्थना पूरी तरह से कभी बंद नहीं
हुई। मुस्लिमों ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया, जो यह दर्शाता हो कि
वे 1857 से पहले मस्जिद पर पूरा अधिकार रखते थे। इस बात के पूरे सबूत हैं कि राम चबूतरा
और सीता रसोई पर हिंदू 1857 से पहले भी पूजा करते थे। मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण
1528 में कराया था लेकिन यह स्थल दशकों से निरंतर संघर्ष का केन्द्र रहा। पीठ ने कहा
कि 1856-57 में सांप्रदायिक दंगा भड़कने से पहले हिंदुओं को परिसर में पूजा करने से नहीं रोका
गया। 1856-57 के दंगों के बाद पूजा स्थल पर रेलिंग लगाकर इसे बांट दिया गया
ताकि दोनों समुदायों के लोग पूजा कर सकें। 1934 में हुए दंगे इशारा
करते हैं कि बाद में अंदर के आंगन का मसला गंभीर तकरार का मुद्दा बन गया। इसके स्पष्ट
साक्ष्य हैं कि हिंदू विवादित ढांचे के बाहरी हिस्से में पूजा करते थे। कानून-व्यवस्था
और शांति बनाए रखने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने परिसर को भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित
करते हुए छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की। भीतरी बरामदे का इस्तेमाल
मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिंदू पूजा के लिए करने लगे।
इसे देखने के बाद बोर्ड
का कौन सा प्रश्न अनुत्तरित है जिसके लिए ये पुनर्विचार याचिका लेकर जा रहे है? न्यायालय ने हर उस
पहलू की जांच की है जो इससे जुड़े हैं। श्रीरामलला विराजमान के बारे में न्यायालय ने
कहा कि 1989 में भगवान श्रीराम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी। अयोध्या
में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी पूजा-सेवा जारी रही। फैसले में रामजन्मभूमि
के पक्ष में ऐसे-ऐसे साक्ष्य और तर्क हैं जिनको किसी सूरत में खारिज नहीं किया जा सकता।
इन सबको यहां प्रस्तुत करना संभव नहीं। जानबूझकर ये खत्म हो चुके विवाद को बनाए रखना
चाहते हैं। प्रश्न है क्यों? इससे तो सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा। आवश्यक है कि विवेकशील मुस्लिम
निहित स्वार्थी नेताओं की मुखालफत करें। मुस्लिम समाज की ओर से मुखर विरोध ही इनका
बेहतर जवाब हो सकता है।
अवधेश कुमार,
ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स,
दिल्लीः110092,
दूरभाषः01122483408,
9811027208