शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

बंदिशें हटने के साथ जम्मू कश्मीर

 

अवधेश कुमार

जम्मू कश्मीर में पोस्ट पेड मोबाइल सेवाएं चालू हो चुकीं हैं। यह कदम साबित करता है कि सरकार की दृष्टि में 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाने तथा राज्य के पुनर्गठन के बाद जम्मू कश्मीर की स्थिति काफी सुधर गई है। पिछले 8 अक्टूबर को राज्यपाल ने घोषणा की कि 10 अक्टूबर से सैलानी प्रदेश में आ सकते हैं। राज्य प्रशासन ने सैलानियों के घाटी छोड़ने और वहां न जाने संबंधी अडवाइजरी को करीब 2 महीने बाद वापस ले लिया। अनुच्छेद 370 को खत्म करने से 3 दिन पहले 2 अगस्त को एक सिक्यॉरिटी अडवाइजरी जारी कर अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों को कश्मीर छोड़ने की सलाह दी थी। इस एडवायजरी को वापस लेना जम्मू कश्मीर के अतीत और वर्तमान को देखते हुए बहुत बड़ी घोषणा है। इसका मतलब यह भी हुआ कि सुरक्षा समीक्षा में भी सकारात्मक संकेत मिले हैं। ऐसा नहीं होता तो राज्य प्रशासन सैलानियों को बुलाने का रास्ता प्रशस्त नहीं करता। इसी तरह सारे विद्यालय खोले जा चुके हैं। 24 अक्टूबर को बीडीसी चुनाव कराने का फैसला भी महत्वपूर्ण है। तो क्या यह मान लिया जाए कि जम्मू कश्मीर और लद्दाख अब सामान्य होने के करीब है?

ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी। मोबाइल सेवाएं बहाल होते ही शोपियां से सेब लेकर राजस्थान जा रहे ट्रकपर हमला एवं चालक का मारा जाना तथा श्रीनगर में हथगोला फेंकना इसका प्रमाण है कि आतंकवादी अशांति के पूरे प्रयास करेंगे। लद्दाख मे तो कोई समस्या नहीं है किंतु जम्मू कश्मीर वर्षों से असामान्य राज्य रहा है और सीमा पार से आतंकवाद जारी रहने तथा अलगाववादियों को समर्थन देने तक उसका पूरी तरह सामान्य होना कठिन है। वहां के मुख्यधारा के नेताओं की भी यही रणनीति रही है कि कश्मीर को किसी तरह सामान्य राज्य न बनने दिया जाए ताकि केन्द्र पर उनका दबाव बना रहे एवं उनकी घटिया राजनीति और कुशासन पर खतरा पैदा न हो। दूसरी स्थिति में तो काफी बदलाव है, किंतु इसकी चर्चा आगे। आज की स्थिति यह है कि करीब 90 प्रतिशत पाबंदियां खत्म की जा चुकीं हैं। वस्तुतः आठ से 10 थाना क्षेत्रों के अलावा लोगों की आम गतिविधियों पर लगी पाबंदियां हट चुकी हैं। जम्मू-कश्मीर में 16 अगस्त से ही पाबंदियां धीरे-धीरे हटाई जाने लगीं और सितंबर का पहला हफ्ता आते-आते अनेक हटा लिए गए। आंशिक रूप से 17 अगस्त को लैंडलाइन सेवाएं बहाल की गईं और 4 सितंबर को इसे पूरी तरह बहाल कर दिया गया। उसके बाद पोस्टपेड उपभोक्ताओं के लिए इनकमिंग मोबाइल सेवाएं बहाल की गई। आउटगोइंग मोबाइल सेवाओं पर रोक जारी थी जो हटा दी गई है। हां, मुक्त इंटरनेट बहाल करने में समय लगेगा। इंटरनेट से आतंकवादियों और उनके समर्थकों के बीच संपर्क का खतरा है। जब तक मोटा-मोटी निश्चिंतता नहीं हो जाती पूरी तरह इंटरनेट एवं प्रीपेड मोबाइल सेवा बहाल करने में समस्या है। हालांकि पर्यटकों की सुविधा के लिए पर्यटक स्थलों पर इंटरनेट सेवा बहाल की जा रही है। 

संचार सेवा को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर छाती पीटने वालों के दबाव में यदि सरकार काम करती तो अभी तक न जाने कितनी आतंकवादी घटनाएं घट जाती। जम्मू कश्मीर की स्थिति को देखते हुए इतना बड़ा कदम उठाने के पूर्व इस तरह के प्रतिबंध तथा इसमें बाधा बनने वाले नेताओ को ससम्मान नजरबंद या कैद करना आवश्यक था। इसी कारण जम्मू कश्मीर इस दौरान शांत रहा। पाबंदी का असर यह हुआ कि लंबे समय बाद एक भी व्यक्ति दो महीने से ज्यादा समय में आतंकवादी हमले का शिकार नहीं हुआ। इस बीच आठ आतंकवादियों को मारा गया, कई गिरफ्तार हुए। निस्संदेह, आम लोगों को ज्यादा परेशानियां हुईं लेकिन इसे प्रसव पीड़ा की तरह लिया जाना चाहिए। इस बीच आतकवादी संगठनों ने लोगों को डराने की कोशिश की। पोस्टर तग लगाए गए लेकिन उसके जवाब में भी पोस्टर लगे। 2008, 2010 और 2016 में आतंकवादियों ने अपनी बात न मानने पर हत्याएं कीं थी।

वैसे पाबंदियों को जिस तरह सैन्य आपातकाल के रुप में चित्रित किया गया वह सही भी नहीं था। सात अक्टूबर को केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि कश्मीर में 196 में से केवल दस थाना क्षेत्रों में ही धारा 144 लगी हुई है। मीडिया को प्रतिबंधित करने की बात भी सही नही है। राजधानी दिल्ली से गए पत्रकार वहां से रिपोर्ट करते रहे। इंटरनेट के कारण समस्या थी लेकिन वे पत्रकार ही बताते रहे कि मीडिया पर पांबंदी की बात गलत हैं। स्थानीय समाचार पत्र भी निकलते रहे। हां, 16 या 20 पृष्ठ के अखबार 10-12 पृष्ठ में आते रहे। घाटी के ज्यादातर अखबारों का भारत विरोधी, आतंकवादी, अलगाववादी समर्थक तेवर को देखते हुए ऐसी परिस्थिति में उन पर थोड़ी निगरानी आवश्यक थी। वैसे भी वहां के ज्यादातर अखबार या तो सरकार के परोक्ष मदद से निकलते हैं या अलगाववादी उनको वित्त उपलब्ध कराते हैं। कठिनाइयां थीं जो कि स्वाभाविक है लेकिन उसका चित्रण झूठ और अतिवाद पर आधारित था। उच्चतम न्यायालय में  एक याचिका जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय पहुुंच नहीं पाने की डाली गई तो एक बच्चों को नजरबंद करने की। ये दोनों आरोप गलत निकले और मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं को फटकार भी लगाई।

सरकार ने अपनी ओर से कुछ कोशिशें लोगों की कठिनाइयां दूर करने के लिए भी कीं। मसलन, बकरीद के दिन सामग्रियां पहुंचाने, राशन की कुछ सामग्रियों की आपूर्ति सुनिश्चित करने, सेब की खरीदारी करने या बाहर जाने के लिए ट्रकों की व्यवस्था, बीमारों को अस्पताल पहुंचाने आदि। सरकार ने 5000 करोड़ में घाटी का 50 प्रतिशत सेब खरीदने का ऐलान किया। पुलवामा के डीसी सैयद राशिद सेब बाजारों में पहुंचाने के लिए रोजाना 300 ट्रक का बंदोबस्त किया गया है। 3 सितंबर को अमित शाह ने दिल्ली मिलने आए पंचों और सरपंचों के लिए पुलिस सुरक्षा तथा 2-2 लाख रुपये का बीमा कवरेज देेने की घोषणा की।

अब आएं सबसे ज्यादा चर्चा वाले पहलू यानी नेताओं की नजरबंदी एवं कैद पर। सरकार ने करीब चार हजार लोगों को हिरासत में या नजरबंद रखा था। इनमें से करीब 700 लोग मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से संबंध रखते हैं। 17 सितंबर को  केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने जम्मू कश्मीर प्रशासन को कह दिया था कि कोई भी व्यक्ति चाहे वो कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, अगर वह कश्मीर में कानून व्यवस्था का उल्लंघन करता है या लोगों को भड़काने का प्रयास करता है तो उसके खिलाफ पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट (पीएसए) लगा दिया जाए। फारूक अब्दुल्ला को पीएसए के तहत हिरासत में ले लिया गया। इससे पहले वे करीब एक माह से भी ज्यादा समय तक नजरबंद थें। 370 पर भिन्न मत रखने वाले और भी कुछ लोगों पर पीएसए लगाया गया है। हालांकि राजनीतिक नेताओं व कार्यकर्ताओं की रिहाई भी शुरू हो चुकी है। जम्मू प्रांत में मुख्यधारा के सभी प्रमुख राजनीतिक नेताओं को नजरबंदी से मुक्त कर दिया गया है। घाटी में नेताओं की पृष्ठभूमि और संवैधानिक परिवर्तन पर उनकी विचारधारा का आकलन करने के बाद रिहा करने की प्रक्रिया चल रही है। नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, कांग्रेस नेशनल कांफ्रेंस, पीपुल्स कांफ्रेंस, माकपा और अवामी इत्तेहाद पार्टी से जुड़े करीब तीन दर्जन प्रमुख नेताओं को मुक्त कर दिया गया। हालांकि राज्य के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा पीपुल्स कांफ्रेंस के चेयरमैन सज्जाद गनी लोन और नौकरशाही छोड़ राजनीति में सक्रिय हुए शाह फैसल समेत कई नेताओं की रिहाई की संभावना नहीं है। तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों डॉ. फारूक अब्दुल्ला, उमर और महबूबा व कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं ने रिहाई के लिए बांड व अन्य प्रशासनिक शर्तों को मानने से इनकार कर दिया है। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष जीए मीर को भी मुक्त कर दिया। जो जानकारी आ रही है प्रशासन नेताओं को कह रहा है कि ब्लौक विकास परिषद के चुनाव प्रक्रिया में किसी रुप में भाग लेने को इच्छुक लोग मुक्त हैं। इसके तहत भी काफी लोग मुक्त हुए है। हां, रिहा होने वालों से यह वचन लिया जा रहा है कि वो कोई भी ऐसी गतिविधि न करें, जिससे हालात बिगडऩे की आशंका हो। ऐसा होने पर उन्हें हिरासत में ले लिया जाएगा। बड़े नेता शर्त मानने को तैयार नहीं है इसलिए उनको रिहा नहीं किया जाएगा। अभी तक जो राजनीतिक व्यक्ति नजरबंद हैं या दूसरे राज्यों की जेलों में कैद हैं, उनसे दो बार पूछा गया है कि वे मुख्यधारा में लौटना चाहें तो सरकार उनकी पूरी मदद करेगी। वैसे नेता कुछ भी कहें घाटी की फिजां बदल रहीं हैं। 31 अगस्त को ही खबर आई कि जम्मू-कश्मीर से 575 युवा सेना में भर्ती हुए हैं।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408,9811027208

 

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

इस जल त्रासदी से सबक ले पूरा देश

अवधेश कुमार

भारत के जो राज्य हर वर्ष बाढ़ का कहर झेलते हैं उनमें बिहार का स्थान सबसे उपर है। हालांकि 1975 के बाद कभी इसकी राजधानी पटना को जलप्लावित होते नहीं देखा गया था। 50 वर्ष की आयु वालो को तो 1975 की भयावह जल त्रासदी की याद भी नहीं होगी। हालांकि तब बारिश के साथ नदियों का पानी बाढ़ का मुख्य कारण था। इस बार गंगा, सोन और पुनपुन तीनों नदियों का जल स्तर सामान्य था। यानी पूरी त्रासदी केवल बारिस के पानी से पैदा हुई। वैसे तो देश के 14 से ज्यादा राज्यों में बाढ़ ने अपना कहर दिखाया। 1800 के आसपास लोग बाढ़ के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं और अरबों का नुकसान हुआ। बिहार में भी करीब 150 लोग अपनी जान गंवा बैठे। संयुक्त राष्ट्रसंघ की रिपोर्ट कहती है कि भारत दुनिया भर में बाढ़ की सर्वाधिक विनाश का शिकार होने वाले शीर्ष पांच देशों में शामिल है। हर वर्ष औसत 1600 लोग बाढ़ के कारण जान गंवाते हैं। इस आंकड़े को यदि ध्यान में लाएं तो पहला निष्कर्ष यह आएगा कि जब हर वर्ष बाढ़ कहर मचाती ही है तो फिर इतनी हाय तौबा क्यों? मीडिया द्वारा पटना की बाढ़ को लगातार टीवी चैनलों पर दिखाए जाने से गुस्साएं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पत्रकारों से पूछा भी कि क्या पटना का पानी ही सबसे बड़ा मुद्दा है? उन्होंने दूसरे दिन पत्रकारों को यहां तक कह दिया कि आप लोगों की कोई जरुरत नहीं है। उनके अधिकारी एक चैनल से इतने नाराज थे कि उसके पत्रकारों को मुख्यमंत्री आवास के अंदर नहीं जाने दिया गया। मुख्यमंत्री कार्यालय के एक बड़े अधिकारी एक पत्रकार को धक्का देते देखे गए। ऐसा अभद्र दृश्य नीतीश के शासन में पहले नहीं देखा गया था। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पटना में बाढ़ की भयावहता और मीडिया के कवरेज से मुख्यमंत्री कितने परेशान और खिझे हुए थे।
नीतीश कुमार ने इसे जलवायु परिवर्तन यानी धरती का तापमान बढ़ने से मौसम में आ रही अस्तव्यस्तता को जिम्मेवार ठहरा दिया। यानी सरकारी तंत्र की तो इसमें कोई गलती थी ही नहीं। यह सच है कि पांच दिनों तक लगातार मुसलाधार वर्षा होगी तो पानी जमा होगा। ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कि बारिश हो और पानी तुरत कहीं विलीन हो जाए। वर्षा होगी तो पानी धरती पर दिखेगा ही। कई सालों से बिहार सूखे से त्रस्त था। सूखा के पहले भी सितंबर के दूसरे सप्ताह के बाद बारिस लगभग न के बराबर हो रही थी। हालांकि सामान्य तौर पर जब मौसम चक्र संतुलित था तो बारिश अक्टूबर के पहले दो सप्ताह तक होती ही थी। वर्तमान बारिश हथिय नक्षत्र का था। इसका नाम हथिया इसीलिए पड़ा क्योंकि इस नक्षत्र में सबसे मोटी बारिश लगातार होती है। पांच दिनांें में 440 मिलीमीटर पानी असाधारण स्थिति थी। किंतु जिस तरह का दृश्य पटना में दिखा वह भी अकल्पनीय था। छः फूट तक पानी किसी राज्य की राजधानी में जमा हो जाए तो यह सरकार की जल निकासी व्यवस्था के ध्वस्त होने से लेकर शहर की पूरी बसावट की योजना में व्याप्त अस्त-व्यस्तता को साबित करता है। दूसरे, उस दौरान जिस तरह लोगों को पानी तक के लिए छटपटाते देखा गया, अनेक परिवारों को चार-चार दिन तक कुछ खाने को नहीं मिला, लोग पानी के कारण अपने घरों में कैद रहे वह भी अस्वीकार्य है।
यह आपदा प्रंबंधन की हमारी दयनीय विफलता को दर्शाता है। क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि किसी प्रदेश का उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री पानी के कारण तीन दिनों तक अपने ही घर में कैद होने को विवश हो जाएं? जब उप मुख्यमंत्री तक को समय पर बाहर नहीं निकाला जा सका तो अन्यों की क्या हालत हुई होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। हालांकि उपमुख्यमंत्री बाहर आने के साथ एक जगह अपने साथ के बचाव दल को दूसरे फंसे लोगों को निकालने का निर्देश देते देखे गए। यह प्रशंसनीय व्यवहार था। किंतु इससे शासन की विफलता ढंक नहीं जाती। 

वैसे मीडिया ने तो केवल पटना को ही दिखाया, अन्यथा बिहार के कई शहरों और सैकड़ों गांवों को इसी तरह की त्रासदी का शिकार होना पड़ा। अगर केन्द्र एवं प्रदेश सरकारें पटना जल त्रासदी को सबक के रुप में ले तो इसकी भयावहता को भविष्य में काफी हद तक कम किया जा सकता है। पटना को हमारे यहां शहरों में जल निकासी, कूड़ा निस्तारण प्रबंधन के चरमरा जाने तथा अनियोजित बस्तियों के लगातार बढ़ते जाने का प्रतीक मानना होगा। यह साफ हो गया था कि पटना की नालियां गंदगी और कूड़े से भर गईं है। अन्य शहरों की तरह वहां भी पिछले दो दशक से ज्यादा में इतने आवासीय एवं व्यावसायिक भवनों का बेतरतीब तरीके से निर्माण हुुआ है कि उनके लिए पर्याप्त नागरिक सुविधा विकसित कर पाना नगर निगम तो छोड़िए किसी के वश की बात नहीं। यही नहीं बिहार के जयादातर शहरों में सीवर की कोई योजना ही नही है। निर्माणों का एक बड़ा भाग वास्तव में विनाश को आमंत्रण देने वाले हैं। भारी बारिश में यदि जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त हो तो ऐसे मारक जमाव की स्थिति पैदा नहीं होगी। यह ठीक है कि पानी निकलने में समय लगेगा लेकिन अगर नदी का स्तर शहर की सतह से नीचे है तो निकलता रहेगा। यहां तो ऐसा दृश्य था मानो जल निकासी के लिए बने सारे नालों में दरवाजा बंद कर दिया गया हो। यह इसलिए पैदा हुई क्योंकि नालों की पर्याप्त सफाई बरसों से नही हुई है। पटना नगर निगम के बजट पर मत जाइए। बजट आवंटन अपने-आप सब कुछ नहीं होता। जिन कार्यों के लिए ये आवंटित हैं उनको साकार किया जाना चाहिए। सच तो यह है कि समय के साथ जल निकासी व्यवस्था तथा कूड़ा प्रबंधन का जैसा ढांचा विकसित होना चाहिए वैसा हुआ ही नहीं। इसमें नागरिक चेतना का विकास भी जरुरी है। हमारी जिम्मेवारी भी है कि हम कूड़ा कहां और कैसे फेंकते हैं इसका ध्यान रखें। उसको जल निकासी पथ में डालेंगे तो यह हमारे लिए एक दिन डुबा देने का कारण बनेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान की लगातार अपील, इस पर किए जा रहे खर्च और व्यापक जन जागरण के बावजूद हमारे देश के बड़े वर्ग का कूड़ा निस्तारण का शर्मनाक आचरण नहीं बदल रहा। यह सब केवल पटना की स्थिति नहीं है। कुछेक अपवादों को छोड़कर पूरे भारत की मोटा-मोटी तस्वीर ऐसी ही है।
प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से जल वचाव का आह्वान किया है और उस पर सरकार योजना बनाकर खर्च भी कर रही है। खूब प्रचार हो रहा है। लेकिन पटना में देखा गया कि लोग बारिश के पानी को बचाने के प्रति भी सतर्क नहीं थे, अन्यथा बड़े भाग को पीने के पानी का संकट नहीं होता। जाहिर है, सरकारों को जल निकासी के साथ, कूड़ा प्रबंधन एवं बस्तियों व आवासीय परिसरो के निर्माण को व्यवस्थित करने के लिए सतत भागीरथ प्रयत्न के साथ आम जन के आचरण में भी व्यापक या कुछ मायनों में आमूल बदलाव की आवश्यकता है। ऐसा नहीं हुआ तो फिर विपत्ति को हम आमंत्रित करते रहेंगे। केवल छाती पीटने से कुछ नहीं होने वाला। इसके साथ यह भी सच है कि पटना में आपदा प्रबंधन यानी राहत और बचाव ऑपरेशन बिल्कुल उंट के मुंह मे जीरा के फोरन जैसा ही था। पिछले वर्ष केरल में आई भयानक बाढ़ में भारत का आपदा प्रबंधन विश्व स्तर का दिखा था और उसकी प्रशंसा हुई थी। किंतु पटना में जितने व्यापक पैमाने पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन, राज्य आपदा प्रबंधन से लेकर स्थानीय विभागों एवं वायुसेना का संसाधन झोंका जाना चाहिए वह नदारद था। यह दोनों सरकारों की ओर से अमानवीय रवैया था। दो दिनों तक तो कोई दिखा ही नहीं। सब कुछ नियति के भरोसे। जब दिखे तो चारों ओर त्राहि-.त्राहि के बीच इतनी कम संख्या में राहतकर्मी और उनके साथ सामग्रियों का सीमित भंडार क्षोभ पैदा करने वाला था। भारत के आपदा प्रबंधन की इसी वर्ष संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी प्रशंसा की थी। यह सच है कि आज भारत के पास विश्व स्तर का राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन है। यदि आवश्यकता का सही आकलन करके राहत व बचाव अभियान चलाया जाता तो तस्वीर बिल्कुल अलग होती। कुल मिलाकर कहने की आवश्यकता यह कि पटना की जल त्रासदी से केन्द्र व राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और आम नागरिकों को सबक लेकर भविष्य के लिए अपने आचरण में व्यापक बदलाव करना होगा।
अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शेख हसीना की भारत यात्रा

अवधेश कुमार

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की चार दिवसीय यात्रा समाप्त हो चुकी है। हसीना ने 3 और 4 अक्टूबर को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम यानी विश्व आर्थिक मंच की बैठक में हिस्सा लिया था। उसके बाद उनकी द्विपक्षीय यात्रा हुई। इसमें उन्होंने राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने उनसे अलग से मुलाकात कर कई मुद्दों पर चर्चा की। भारत-बांग्लादेश बिजनेस फोरम को संबोधित करते हुए शेख हसीना ने जब हिन्दी में कहा कि मैंने अपने खानसामे को बोल दिया है कि अब से खाने में प्याज मत डालना तो वहां उपस्थित सभी को सुखद आश्चर्य हुआ। हसीना ने कहा, ‘‘प्याज से थोड़ी दिक्कत हो गई हमारे लिए। मुझे मालूम नहीं क्यों आपने प्याज भेजना बंद कर दिया। थोड़ा सा नोटिस अगर देते तो दूसरी जगह से ला सकते थे। आगे से अगर किसी भी तरह से ऐसा कुछ करना है, तो हमें थोड़ा पहले बता देना।’’ हिन्दी में बोलने से पता चलता है कि भारत के साथ उनका कितना आंतरिक जुड़ाव है। भारत ने उनसे प्याज की आपूर्ति का वायदा किया है। देश में प्याज की बढ़ती कीमतों को थामने के लिए 29 सितंबर को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने हर तरह के प्याज के निर्यात पर रोक लगा दी थी। इसका उल्लेख इसलिए आवश्यक है ताकि आम भारतीय को यह समझ में आ जाए कि द्विपक्षीय संबंधों में छोटी-छोटी चीजों का कितना महत्व है। किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री प्याज को लेकर शिकायत कर सकतीं हैं। निकट पड़ोसी मित्र देशों से संबंध बेहतर करने के लिए कई बार अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की जरुरत होती है।

शेख हसीना के काल में बांग्लादेश ने भारत के साथ संबंधों को विश्वास का आधार देने के लिए पूरी कोशिश की है। संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा के अधिवेशन में शेख हसीना ने पाकिस्तान द्वारा बांग्लादेश में किए गए नरसंहार एवं महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कारों का चित्रण कर मानवाधिकारों पर इमरान के प्रवचन की धज्जियां उड़ा दीं थीं। हालांकि यह कहना कठिन है कि भारत और बांग्लादेश के बीच 1971 के मुक्ति संग्राम की भावना व्याप्त है, पर यह निश्चित तौर कहा जा सकता है कि शेख हसीना द्वारा सत्ता संभालने के बाद से संबंध बिल्कुल सामान्य पटरी पर आ गए हैं। यह हमारी रणनीति पर निर्भर है कि हम मुक्ति संग्राम की भावनाओं को कैसे जीवित रखें। वैसे बांग्लादेश में अभी भी उस समय को याद करने वाले लोग हैं जो भारत के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। उस समय जैसा माहौल था यदि भारत बांग्लादेश को अपना भाग बनाता तो एक छोटे वर्ग को छोड़कर पूरा समर्थन मिलता। भारत ने ऐसा नहीं किया। इसका अहसान मानने वाले वहां हैं। किंतु यह भी सच है कि पिछले वर्षों में भारत विरोधियों की संख्या वहां बढ़ गई थी। कट्टरपंथियों की एक बड़ी जमात भारत विरोधी है। भारत को इसका ध्यान रखते हुए संबंधों को गति देनी पड़ती है।

 मोदी और शेख हसीना की मुलाकात के बाद भारत-बांग्लादेश में 7 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इसमें बंदरगाहों (चटगांव और मोंगला), जल संसधान, युवा मामलों, शिक्षा, संस्कृति और तटीय निगरानी शामिल हैं। इससे इलाज व शिक्षा के लिए बांग्लादेशी नागरिकों को असानी से आने-जाने की सुविधा प्राप्त होगी। लेकिन इनमें भारत की तरफ से ढाका को तटीय निगरानी राडार तंत्र मुहैया कराने का समझौता सबसे अहम है। भारत इससे ना सिर्फ बांग्लादेश को एक प्रभावशाली सुरक्षा घेरा दे सकेगा बल्कि बंगाल की खाड़ी से लेकर अपने समूचे पूर्वी तट की निगरानी भी बेहतर तरीके से कर सकेगा। चीन की तरफ से भी बांग्लादेश को निगरानी तंत्र देने की कोशिश हो रही थी। 2016 में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने ढाका दौरे पर बांग्लादेश की समुद्री सुरक्षा की बात कही थी। भारत ने ऐसा करके चीन को लगभग वंचित कर दिया है। इस तरह की व्यवस्था भारत ने अपने पूर्वी तट पर स्थित देश मालदीव को भी दी है। यह बहुत बड़ी बात है। भारत जिस तरह समुद्र में अपनी प्रभावी उपस्थिति बढ़ाने की रणनीति पर चल रहा और दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों सहित ऑस्ट्रेलिया और जापान तक का समर्थन हालिस हुुआ है वह भविष्य में विश्व की एक प्रमुख समुद्री शक्ति के रुप में भारत को खड़ा करने वाला है। भारत बांग्लादेश को कई तरह के रक्षा उपकरण भी बेचना चाहता है और इसके लिए 50 करोड़ डॉलर की राशि बतौर कर्ज भी उपलब्ध कराई गई है।

मोदी और हसीना ने वीडियो लिंक के जरिये तीन परियोजनाओं का उद्घाटन किया। ये हैं पूर्वात्तर भारत की ईंधन जरूरत पूरी करने के लिए बांग्लादेश से थोक में एलपीजी आयात, खुलना में एक कौशल विकास संस्थान और ढाका के रामकृष्ण मिशन में विवेकानंद भवन की परियोजनाबांग्लादेश महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में एक  डाक टिकट जारी करेगा। इस तरह एक वर्ष में भारत और बांग्लादेश के प्रधानमंत्रियों ने संयुक्त रुप से 12 परियोजनाओं का उद्घाटन कर दिया है। जैसा प्रधानमंत्री मोदी ने कहा बांग्लादेश से भारी मात्रा एलपीजी आपूर्ति दोनों देशों के लिए लाभकारी है।  इससे बांग्लादेश में निर्यात, आमदनी और रोजगार बढ़ेगा, ट्रांसपोर्टेशन की दूरी 1500 किमी कम हो जाने से आर्थिक लाभ भी होगा और पर्यावरण को भी कम नुकसान होगा। बांग्लादेश के पास गैस का भरपूर भंडार है जिसे भारत को देने की बात पिछले दो दशक से चल रही है। पूर्व यूपीए सरकार के कार्यकाल में बांग्लादेश से भारत तक गैस पाइपलाइन बिछाने की भी बात हुई थी लेकिन वहां राजनीतिक विरोध की वजह से इसे टाल दिया गया। अभी ट्रकों के जरिये एलपीजी को भारत लाया जाएगा। भारत पहले इस पड़ोसी देश को पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति शुरू करने के लिए एक पाइपलाइन बिछा रहा है। इसी तरह बांग्लादेश-इंडिया प्रफेशनल स्किल डिवेलपमेंट इंस्टिट्यूट बांग्लादेश के औद्योगिक विकास के लिए कुशल मानव शक्ति और तकनीशियन तैयार करेगा। ढाका के रामकृष्ण मिशन में विवेकानंद भवन की परियोजना दोनों महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा का केन्द्र होगा। अभी इसका महत्व किसी को न समझ में आए, पर भविष्य में सांस्कृतिक निकटता की दृष्टि से इसका प्रभाव सामने आएगा। विवेकानंद भवन में 100 से अधिक विश्वविद्यालयी छात्रों और शोधकर्ताओं के रहने की व्यवस्था की गई है।

अगर सातों समझौतों, तीन परियोजनओं के उद््घाटन दोनों नेताओं की पत्रकार वार्ता तथा संयुक्त बयान को एक साथ मिलाकर देखें तो यह साफ हो जाएगा कि भारत बांग्लादेश केवल कहने के लिए औपचारिक रुप से मित्र देश नहीं हैं, व्यवहार में भावनात्मक लगाव इसी स्तर का है। पत्रकार वार्ता में नरेंद्र मोदी का यह कहना बिल्कुल सही था कि दोनों देशों ने दुनिया के सामने पड़ोसी देशों के रिश्तों का बेहतरीन उदाहरण रखा है। संयुक्त बयान और समझौतों का लब्बोलुआब यही है कि भारत अपना विशाल बाजार बांग्लादेश के लिए खोलकर उसे आर्थिक लाभ पहुंचाने को तैयार है, तो पड़ोसी देश भी भारत की रणनीतिक चिंताओं को दूर करने के लिए तत्पर है। जो सूचना है दोनों नेताओं की बातचीत में कश्मीर व एनआरसी का मुद्दा भी उठा। हसीना ने स्वाभाविक ही एनआरसी पर चिंता जताईं, क्योंकि इसका निशाना घुसपैठिए हैं जिनमें सबसे ज्यादा संख्या बांग्लादेशियों की है। बांग्लादेश इसे स्वीकार नही करता। न्यूयॉर्क में मोदी हसीना मुलाकात में भी यह मुद्दा उठा था। मोदी ने अपनी ओर से उन्हें जितना आश्वासन देना था दिया होगा लेकिन यह मुद्दा आने वाले समय में दोनों के बीच विवाद का कारण बनेगा। यह सच है कि बांग्लादेशियों की भारी संख्या भारत में है और वे अवैध रुप से आए हैं। किंतु वे बांग्लादेशी ही हैं यह बात बांग्लादेश को समझा पाना कठिन होगा। शेख हसीना ने तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा भी उठाया। यह मामला लंबे समय लटका हुआ है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री जल बंटवारे में हिस्सा कम करने को तैयार नहीं हैं। दोनों देशों के संबंधों को देखते हुए नदी जल बंटवारा विवाद हमें शीघ्र निपटाना होगा। बांग्लादेश की फेनी नदी से त्रिपुरा को जलापूर्ति पर सहमति हो गई है। इसी तरह रोहिंग्या मुसलमानों का मामला है। बांग्लादेश भी इनसे छुटकारा चाहता है और भारत भी। हालांकि ये रोहिंग्या वर्षों पहले बांग्लादेश के क्षेत्र से ही म्यान्मार गए थे। बावजूद आज ये म्यान्मार के ही नागरिक हैं। दोनों देश म्यान्मार को इसके लिए तैयार करेंगे, पर इनके पुनर्वास के साथ कटृटरता और हिंसक व्यवहार से निपटने के लिए म्यान्मार को मदद भी करनी होगी।

आतंकवाद और अतिवाद से निपटना भारत के लिए चुनौती है। इसमें बांग्लादेश ने पूरा साथ दिया है। अनेक आतंकवादियों को फांसी पर चढ़ाया है तथा भारत को भी सौंपा है। शख हसीना ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई को बांग्लादेश जारी रखेगा। भारत ने शेख हसीना को पूरा महत्व देते हुए उनके स्वागत समारोह में विभिन्न देशों के दिल्ली स्थित करीब 80 राजदूतों को भी आमंत्रित किया था। यह शेख हसीना के लिए एक बेहतर जनसंपर्क अभियान का समारोह बन गया था। दोनों देश जब एक दूसरे को पसंद करते हैं तो अनेक क्षेत्रों सहयोग का रास्ता आसानी से निकल जाता है। अनेक विवादित मुद्दों का हमने समाधान किया है। 1974 की भू-सीमा संधि को स्वीकार करते हुऐ गलियारों की अदला-बदली को मोदी और हसीना ने पूरा कर लिया है। उम्मीद करनी चाहिए कि आपसी विश्वास और सहयोग का भाव आगे भी विवाद को कभी संबंधों में रोड़ा नहीं बनने देगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

महान संस्कृति वाले देश के नेता का उद्बोध

 

अवधेश कुमार 

विश्व मंच पर किसी देश के नेता जो कुछ बोलते हैं और जिस तरह बोलते हैं उसी से उस देश की नीति और लक्ष्य का विश्व समुदाय अनुमान लगाता है तथा देश एवं नेता की छवि भी उसी अनुसार निर्मित होती है। तो प्रश्न उठता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में जो भाषण दिया उससे उनकी और देश की कैसी छवि निर्मित हुई? क्या उनका भाषण वाकई ऐसा था जिसने भारत के कद को उंचा किया तथा विरोधी देशों द्वारा जो कुछ भ्रम और गलतफहमी पैदा की गई थी उसे दूर करने में सफल हुआ? कूटनीति का श्रेष्ठ तरीका यही माना जाता है कि यदि कोई विरोधी देश जरुरत से ज्यादा बदनाम कर रहा हो तो भी उसका जवाब दिए और नाम लिए बिना आप अपने देश की भूमिका और सोच को सकारात्मक तरीके से अभिव्यक्त करने तक सीमित रहिए। इससे बिना कहे कि दुश्मन को जवाब मिल जाता है। सफलता का एक सूत्र यह है कि आप किसी को छोटा करने में परिश्रम की बजाय स्वयं को बड़ा बनाने में अपनी क्षमता लगाइए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यही किया है। निर्धारित 15 मिनट से एक मिनट अधिक के उद्बोधन में भारत के कद को इतना उंचा उठा दिया कि उसके सामने पाकिस्तान तो क्या अनेक देश नहीं ठहरते। भारत की ओर से विश्व कल्याण का जो भाव प्रकट किया गया, संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसी वैश्विक संस्थाओं में परिवर्तन की जिस दृष्टिकोण से वकालत की गई वैसा किसी नेता की ओर से नहीं किया गया। इतने संक्षिप्त भाषण में भारत राष्ट्र की सम्पूर्ण विश्वदृष्टि या यों कहें ब्रह्माण्डीय दृष्टि उन्होंने रख दी। विश्व मंच पर हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता संस्कृति वाले देश के नेता से ऐसी ही पूरे विश्व समुदाय को प्रेरणा देने वाली , भारत राष्ट्र का व्यापक लक्ष्य स्पष्ट करने वाली तथा सम्पूर्ण विश्व कल्याण के भाव से काम काम करने की भावना वाले उद्बोधन की अपेक्षा थी। पांच वर्ष पहले भी जब मोदी ने महासभा को संबोधित किया था तो इसी तरह वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवंतु सुखिनः की बात रखते हुए संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा था और फिर उन्होंने वर्तमान उद्बोधन से एक और अध्याय उसमंें जोड़ दिया। उस समय के उद्बोधन का ही प्रभाव था कि जब मोदी ने योग दिवस का प्रस्ताव रखा तो कुछ ही दिनों के अंदर 177 देशों के समर्थन से वह पारित हो गया। इस बार उन्होेंने कोई एक नया प्रस्ताव नहीं रखा है लेकिन स्वयं भारत, विश्व समुदाय और संयुक्त राष्ट्रसंघ के लिए करने का कुछ स्पष्ट सूत्र उन्होंने दे दिया। उदाहरण के लिए उन्होंने कहा कि आज दुनिया का स्वरूप बदल रहा है। आधुनिक टेक्नॉलजी, समाज जीवन, निजी जीवन, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, कनेक्टिवीटी और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सामूहिक परिवर्तन आ रहा हैं। इन परिस्थितियों में हम सभी के पास अपनी-अपनी सीमाओं के भीतर सिमट जाने का विकल्प नहीं है। इस नए दौर में हमें बहुपक्षीय होना होगा और संयुक्त राष्ट्र को नई शक्ति और नई दिशा देनी ही होगी।

 एक ओर तो दुनिया की दूरिया सिमट रहीं हैं, सम्पूर्ण व्यवस्था पर इसका असर है, लेकिन ज्यादातर राष्ट्र अपनी सीमाओं के अंदर संकुचित रहते हुए नीतियांें का अनुसरण करते हैं। इससे विश्व को केवल क्षति ही होनी है। इसलिए सभी का हित इसी में है कि सब अपना दायरा व्यापक करें, यह समझें कि परस्परालंबन ही एकमात्र रास्ता है तथा उसी अनुरुप संयुक्त राष्ट्र में परिवर्तन हो। ऐसा कहने के पहले मोदी ने हर व्यक्ति के समझने लायक सरल भाषा में समझाया था कि भारत हमेशा विश्व कल्याण के भाव से ही अपनी भूमिका निभाता रहा है। हर जीव में शिव देखना यानी पूरे ब्रहांड में जो कुछ है सबमें एक ही आत्मत्व यानी ईश्वर का दर्शन करना हमारी संस्कृति का मूलाधार रहा है। जब सभी एक ही तत्व के अंग हैं तो फिर किसी देश से ईर्ष्या, दुश्मनी और यहां तक कि युद्ध करने की मानसिकता का कोई कारण ही नहीं है। उन्होंने युद्ध की जगह बुद्ध देने की बात की। जनकल्याण से जगकल्याण को जोड़ा।ं सामाजिक-आर्थिक विकास तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ सहस्राब्दि लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में भारत क्या कर रहा है इसकी चर्चा उन्होंने की लेकिन इन सबको भी विश्व के उन देशों के लिए प्रेरणा बताया जो अपने यहां गरीबी, बीमारी, गंदगी जैसी समस्याआंे से जूझ रहे हैं। यह सच है कि आज भारत से प्रेरणा लेकर और इसके सहयोग से भी अनेक देश अपने यहां उन अभियानों को चला रहे हैं जो भारत ने किया है।

यहीं पर प्रधानमंत्री प्रश्न करते हैं कि आखिर हम यह सब कैसे कर पा रहे हैं? आखिर नए भारत में बदलाव तेजी से क्यों आ रहा है? फिर उसका जवाब देते हैं कि भारत हजारों वर्ष पुरानी एक महान संस्कृति है जिसकी अपनी जीवंत परंपराए हैं, जो वैश्विक सपनों को अपने में समेटे हुए है। हमारा प्राणत्तव है, जनभागीदार से जनकल्याण। अगर कुछ देश किसी देश या समाज को कुछ देते हैं तो उसके पीछे दयाभाव रहता है। भारतीय संस्कृति इसे अपना कर्तव्य मानती है। इसलिए भारत जो भी प्रयास कर रहा है उसमें कुछ देश तक अवश्य सीमित हैं लेकिन वह सारे विश्व और हर देश के लिए है। हमारे वेद और उपनिषद बताते भी हैं कि उठो और विश्व कल्याण में अपने को लगा दो।

 ऐसा भी नहीं है कि प्रधानमंत्री ने केवल सैद्धांतिक बातें कीं। उन्होंने कुछ ठोस साकार कदमों के उदाहरण भी दिए। इस समय वैश्विक तापमान से हमारे अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है। यह सही है कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के आधार पर भारत को इसमें योगदान काफी कम है। लेकिन इसके समाधान के लिए कदम उठाने वालों में भारत एक अग्रणी देश है। एक ओर अगर भारत 450 गीगीवॉट अक्ष्य उर्जा का लक्ष्य पाने के लिए काम कर रहा है तो दूसरी ओर स्वयं पहल करके अंतरराष्ट्रीय सौर संगठन खड़ा किया है। इसके माध्यम से उन सारे देशों को सौर उर्जा अपनाने के लिए प्रेरित और सहयोग किया जा रहा है जहां सूर्य की रोशनी बहुतायत में उपलब्ध हैं। धरती के तापमान से भयावह और विनाशाकारी आपदायें विश्व में पैदा हो रहीं हैं। भारत ने इस स्थिति को देखते हुए कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिएंट इन्फ्रास्ट्रकर बनाने की पहल की है। इससे दुनिया को जोड़ने की कोशिश हो रही है ताकि पा्रकृतिक आपदाओं से निपटा जा सके। तीसरे, प्रधानमंत्री का यह कहना भी सही है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ शांति मिशन में सबसे ज्यादा बलिदान भारत ने दिया है। यानी हम केवल कहते नहीं कदम भी उठा रहे हैं क्योंकि हमारे देश का हजारों वर्षों से एक ही लक्ष्य रहा है विश्व कल्याण। लेकिन शांति चाहिए तो फिर आतंकवाद के खिलाफ तो उठना ही होगा। प्रधानमंत्री ने यहां किसी देश का नाम नहीं लिया और कहा कि हमारी आवाज में आतंक के खिलाफ दुनिया को सतर्क करने की गंभीरता भी है और आक्रोश भी। हम मानते हैं कि यह किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की और मानवता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। आतंक के नाम पर बंटी हुई दुनिया उन सिद्धांतों को ठेस पहुंचाती है, जिनके के आधार पर संयुक्त राष्ट्र का जन्म हुआ। इस तरह आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान भी है तो मानवता की खातिर। आतंकवाद के खिलाफ मोदी कड़ा वक्तव्य दे सकते थे जिस तरह उन्होनें ह्युस्टन में दिया लेकिन यहां एक नई थीम में ही उसे रखकर दुनिया को प्रेरित करना श्रेष्ठ दर्शन और कूटनीति कही जाएगी।

भारत का लक्ष्य शांति है। मोदी ने 3 हजार वर्ष पूर्व भारत के महान तमिल कवि कण्यन कुंगुनरनार को उद्वृत किया कि यादम उरे, यादमकुडे यानी हम सभी स्थानों के लिए अपनेपन का भाव रखते हैं, और सभी लोग हमारे अपने हैं। यह है भारत की संस्कृति। देश की सीमाओं से परे अपनत्व की यही भावना तो भारतभूमि की विशेषता है। हम गांधी जी की 150 वीं जयंती मना रहे हैं जिन्होेने सत्य और अहिंसा का उपदेश दिया। फिर उन्होंने स्वामी विवेकानंद के अमेरिका के शिकागो में धर्म संसद के उस संदेश से अपना भाषण खत्त किया कि हारमनी ऐंड पीस ऐंड नॉट डिसेंशन यानी शांति और सद्भावना। प्रधानमंत्री को पता था कि इमरान क्या बोलने वाले हैं। बिना कहे हुए उनके सारे आरोपों का जवाब भी इस भाषण में निहित था कि हमारे देश के संस्कार में युद्ध, आतंक, वैमनस्व या किसी को पीड़ा देना है ही नहीं। हम तो केवल मानव कल्याण के लक्ष्य से काम करते हैं। अगर दुनिया इन दोनों भाषणों की तुलना करेगी तो पलड़ा किसके पक्ष में झुकेगा यह बताने की आवश्यकता नहीं। थोड़े शब्दों में कहें तो इस भाषण को समग्रता में देखा जाना चाहिए जो भारतीय संस्कृति के अनसार विश्व के लिए प्रेरक, विश्व को भविष्य की दिशा देनेवाला तथा उसमें भारत की भूमिका भी स्पष्ट करने वाला था। इसे एक महान परंपरा वाले राष्ट्र के परिपक्व राजनेता का उद्बोधन माना जाएगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष : 01122483408,9811027208

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

इन राज्यों का चुनावी उंट किस करवट बैठेगा

 अवधेश कुमार

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने अन्य पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों से परे जितने कम समय में चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा की वह प्रशंसनीय है। हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल 2 नवंबर एवं महाराष्ट्र का 9 नवंबर को खत्म हो रहा है। चुनाव आयोग के लिए उसके पूर्व चुनाव प्रक्रिया संपन्न करना अनिवार्य था। 21 अक्टूबर को दोनों राज्यों में मतदान संपन्न हो जाएगा एवं 24 अक्टूबर को मतगणना। तो आइए दोनों राज्यों के राजनीतिक समीकरणों तथा चुनावी संभावनाओं का पूर्वावलोकन करें। यह चुनाव नरेन्द्र मोदी सरकार-2 के संसद के पहले सत्र में रिकॉर्डतोड़ काम करने के आलोक में हो रहा है। वर्षों से भाजपा के घोषणा पत्र में शामिल अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर से खत्म किया जा चुका है। एक साथ तीन तलाक को अपराध बनाने का कानून भी बन चुका है। ध्यान रखिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अभी तक की अपनी सभाओं में इनको मुद्दा बनाया है। प्रधानमंत्री ने दोनों मामलों पर कांग्रेस ही नहीं राकांपा के शरद पवार को भी कठघरे में खड़ा किया है। इसका अर्थ स्पष्ट है। 370 एवं तीन तलाक तथा इन पर कांग्रेस एवं राकांपा की भूमिका इन चुनावों में बहुत बड़ा मुद्दा होगा। यह सच है कि पाकिस्तान ने कांग्रेस नेताओं के बयानों को भारत के खिलाफ अपने प्रचार एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रतिवदेनों में शामिल किया है। इसका असर मतदाताओं पर कितना होगा यह देखने लायक है।

महाराष्ट्र के पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा एवं शिवसेना के बीच ढाई दशक में पहली बार गठबंधन नहीं हुआ था। लेकिन भाजपा कुल 288 में से 122 सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि शिवेसना 63 पर सिमट गई। बाद की परिस्थितियों में दोनों को मिलकर सरकार बनाने को विवश होना पड़ज्ञ। इसके मुकाबले कांग्रेस को 42 एवं राकांपा को 41 सीटें मिलीं थीं। भाजपा को 27.81 प्रतिशत तथा शिवेसना को 19.35 प्रतिशत मत मिला था। इसके समानांतर कांग्रेस को 17.95 प्रतिशत तथा राकांपा को 17.24 प्रतिशत मत मिला। यदि दोनों को मिला दे ंतो कांग्रेस राकांपा को 35.19 प्रतिशत एवं भाजपा शिवसेना को 46.16 मिला। इस तरह दोनों के बीच करीब 11 प्रतिशत मतों का अंतर था। एआइएमआइएम ने 0.93 प्रतिशत मत लेकर 2 सीटें जीतीं थीं। अगर कांग्रेस के 94 लाख 96 हजार 95 और राकांपा के 91 लाख 22 हजार 285 मतों को मिला दे ंतो 1 करोड़ 86 लाख 18 हजार 380 हो जाता है। दूसरी ओर भाजपा के 1करोड़ 47 लाख 9 हजार 276 तथा शिवसेना के 1 करोड़ 2 लाख 35 हजार 970 मतों को मिलने पर 2करोड़ 49 लाख 45 हजार 246 मत होते हैं। इस तरह दोनों के मतों में 83 लाख 26 हजार 866 मतों का अंतर था। लोकसभा चुनाव में भाजपा एवं शिवेसना में समझौता हो गया था। भाजपा ने 23 तथा शिवसेना ने 18 सीटें जीतीं। राकांपा ने 4 तथा कांग्रेस ने केवल एक सीट जीतीं। भाजपा का 27.59 प्रतिशत और शिवसेना का 23.29 प्रतिशत मिलकर 50.88 प्रतिशत मत हो जाता हैं इसके सामनांतर कांग्रेस के 16.27 प्रतिशत एवं राकांपा 15.52 प्रतिशत को मिला दे ंतो यह 31.79 प्रतिशत ही होता है। इस तरह दोनों के बीच करीब 19 प्रतिशत मतों का अंतर है। इतने भारी मतों को पाटना तभी हो सकता है जब सरकार के खिलाफ व्यापक असंतोष हो या विपक्ष के विरुद्ध लहर।

 हरियाणा में भाजपा ने 90 में से 47 सीटें पर जीतकर पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई। 19 सीटें लेकर दूसरे स्थान पर आईएनएलडी एवं 15 सीटों के साथ कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही। अन्य ने 9 सीटें प्राप्त कीं जिनमें शिरोमणी अकाली दल और बसपा को 1-1, हरियाणा जनहित कांग्रेस को 2, और निर्दलीयों ने 5 सीटें शामिल थीं। भाजपा ने 33.20 प्रतिशत, आईएनएलडी ने 24.11 प्रतिशत और कांग्रेस ने 20.58 प्रतिशत मत मिला। बसपा ने 4.37 प्रतिशत, हरियाणा जनहित कांग्रेस ने 3.57 प्रतिशत मत प्राप्त किया था।  भाजपा को 41 लाख 25 हजार 285, आईएनएलडी को 29 लाख96 हजार 203 तथा कांग्रेस 25 लाख 57 940 मत मिला था। हरियाणा जनहित कांग्रेस ने 4 लाख 43 हजार 444 तथा बसपा ने 5 लाख 42 हजार 985 मत पाए थे।  हरियाणा लोकसभा चुनाव में में भाजपा को 58.02 प्रतिशत तथा कांग्रेस को 28.42 प्रतिशत मत मिला। सभी 10 सीटें भाजपा के खाते में गईं। भाजपा का अपना मत ही विधानसभा चुनावो से 25 प्रतिशत ज्यादा हो गया। अगर दोनों चुनावों के मतों के अनुसार गणना करें तो भाजपा के निकट कोई पार्टी नहीं है। महाराष्ट्र की तरह हरियाणा में भी भाजपा को हराने के लिए उसके खिलाफ जनता में व्यापक असंतोष तथा विपक्ष यानी कांग्रेस के पक्ष में लहर चाहिए।

अब दोनों राज्यों की राजनीतिक स्थिति पर नजर दौड़ाएं। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद से महाराष्ट्र में कुल 16 विधायकों तथा 16 पूर्व विधायकों ने पाटी छोड़कर भाजपा एवं शिवसेना का दामना थामा है। नारायण राणे ने अपनी पार्टी स्वाभिमान पक्ष की भाजपा में विलय की घोषणा कर दी है। इस स्थिति का अर्थ यही है कि दूसरी पार्टियों के नेताओंं को लग रहा है कि अगर प्रदेश की राजनीति में  प्रासंगिकता बनाए रखनी है तो भाजपा या शिवेसना की ओर प्रयाण करना होगा। पांच वर्ष तक महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता ही लोकसभा चुनाव के समय भाजपा के पक्ष में प्रचार कर पार्टी में आ जाते हैं और मंत्री भी बन जाते हैं। आज की स्थिति यह है कि भाजपा ने शिवेसना को छोड़ दिया होता तो शिवेसना से भी भारी संख्या में नेता भाजपा की ओर भागने की कोशिश करते। तो यह है महाराष्ट्र की स्थिति। हरियाणा में आईएनएलडी बंट चुकी है। दुष्यंत चौटाला जननाययक जनता पार्टी बनाकर चुनाव में मैदान में उतरे हैं। कांग्रेस में अंदर इतना कोहराम मच गया था कि अपनी बात पहुंचाने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को रैली कर पार्टी नेतृत्व की यह कहते हुए आलोचना करनी पड़ी कि यह पहले वाली कांग्रेस नहीं है। हालांकि सोनिया गांधी ने एकता के लिए अशोक तंवर की प्रदेश अध्यक्ष पद से छुट्टी कर दी लेकिन पार्टी में चुनाव पूर्व एकता कामय करना कठिन है। हरियाणा में भी दूसरी पार्टियों के नेताओं ने भारी संख्या में भाजपा का दामन थामा है।

परंपरागत चुनावी विश्लेषण के दायरे में कोई महाराष्ट्र एवं हरियाणा के जातीय-सांप्रदायिक समीकरणों के अनुसार गणना कर सकता है कि फलां जाति का इतना मत और फलां समुदाय का इतना मत फलां के पक्ष में जाता हैं। आज का सच यह है कि 2014 के आम चुनाव से जातीय एवं सांप्रदायिक समीकरणों को धक्का लगना आरंभ हुआ और वह प्रक्रिया पीछे नहीं लौटी है। नरेन्द्र मोदी का नाम ज्यादातर प्रदेशों में सभी समीकरणों पर भारी पड़ा है। पिछले चुनावों के बाद भाजपा ने दोनों राज्यों में लीक से हटकर मुख्यमंत्री दिया था। महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडणवीस प्रदेश के दूसरे ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने तथा हरियाणा में भजनलाल के बाद दूसरी बार मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में किसी गैर-जाट को मुख्यमंत्री बनाया गया। पिछली बार चुनाव से पहले भाजपा ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया था। इस बार दोनों राज्यों में मतदाताओं के सामने मुख्यमंत्री विद्यमान हैं। ये किसी प्रभावी जातीय समीकरण में नहीं आते। ऐसा नहीं है कि प्रदेशों में समस्यायें नहीं हैं, सरकारों के खिलाफ मुद्दे नहीं हैं ऐसा भी नहीं है। कितु एक तो देश के स्तर पर मोदी और शाह की लोकप्रियता, प्रदेशों के स्तर पर फडणवीस तथा खट्टर व अन्य मंत्रियों की लगभग स्वच्छ छवि तथा देश एवं प्रदेश दोनों में हताश विपक्ष उन मुद्दों को उस सीमा तक ले जाने में सक्षम नहीं है कि वह दोनों सरकारों को कठघरे में खड़ा होकर जवाब देने को विवश कर सके। दोनों प्रदेश सरकारों ने कम से कम पूर्व सरकारों की तुलना में निराश अवश्य किया है। वैसे भी अनुच्छेद 370 हटाने तथा पाकिस्तान के भारत के खिलाफ आग उगलने के विरुद्ध शांत रहकर मोदी सरकार ने जिस तरह दुनिया में उसे अलग-थलग करने में सफलता पाई है उसका जनमानस पर व्यापक असर है। विपक्ष सरकार के विरुद्ध जम्मू कश्मीर या पाकिस्तान को लेकर जितनी आलोचना करता है उतनी ही मात्रा में जनता उसके खिलाफ जाती है। यह मुद्दा दोनों प्रदेशों में प्रबल है। दोनों प्रदेशों में कांग्रेस के नेताओं ने जनता का मूड भांपकर ही तो पार्टी लाईन से अलग होकर अनुच्छेद 370 हटाए जाने का समर्थन कर दिया। तीन तलाक विरोधी कानून भाजपा के हिन्दुत्व के अनुकूल है। तो हिन्दुत्व एवं राष्ट्रीयता दोनों का माहौल है। इस माहौल में हो रहे चुनाव इससे प्रभावित नहीं होंगे ऐसा नहीं माना जा सकता।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092,दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

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