गुरुवार, 12 सितंबर 2019

भागवत और मदनी मुलाकात के मायने

 
संघ और जमीयत के बीच संवाद की शुरुआत

अवधेश कुमार

यह समाचार सामान्य नहीं है कि जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के साथ लंबी बातचीत की है। 30 अगस्त को संघ के झंडेवालान कार्यालय में दोनों की बातचीत काफी देर हुई। इसमें इस तरह की मीनमेख निकालने का कोई मायने नहीं है कि मदनी ही संघ कार्यालय क्यों गए और भागवत उनसे मिलने जमीयत के कार्यालय क्यों नहीं आए? जो मोटा-मोटी सूचना है उसके अनुसार भागवत को कोलकाता कार्यक्रम के लिए जाना था और मदनी से मुलाकात तय होने के कारण वे दिल्ली आए थे। बातचीत के बाद वे सीधे कोलकाता के लिए रवाना हो गए। हालांकि डेढ़ घंटे से ज्यादा चली इस मुलाकात के बारे में संघ ने औपचारिक रुप से कोई बयान नहीं दिया है लेकिन जमीयत की ओर से जरुर कुछ बातें कहीं गईं हैं। इसके अनुसार मदनी ने संघ प्रमुख को कहा कि इस समय मुसलमानों के अंदर भीड़ की हिंसा तथा तत्काल तीन तलाक के खिलाफ बने कानून को लेकर चिंता का माहौल है। मदनी ने कहा कि एक बड़े समुदाय में भय पैदा करके देश का विकास नहीं हो सकता। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि मदनी ने किस तरह की बातें रखीं होंगी। इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है। कोई यह कल्पना करे कि मदनी संघ प्रमुख के सामने जाकर केवल संघ एवं भाजपा सरकार की प्रशंसा करेंगे तो यह अव्यावहारिक होगा। भारत के भविष्य की दृष्टि से इस बैठक में जो बातचीत हुई उसका महत्व तो है ही किंतु इन दोनें की मलाकात का महत्व उससे कहीं ज्यादा है। दोनों ने यह निर्णय किया कि हमें मिलकर बात करनी है तो उसके पहले काफी कुछ विचार किया होगा।

वास्तव में जो जानकारी है आगे निरंतर संपर्क एवं संवाद पर दोनों नेताओं में सहमति बनी है। इसमें समन्वय की जिम्मेदारी संघ के सह संपर्क प्रमुख रामलाल को दी गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि यह प्राथमिक मुलाकात थी जिसने आगे खुलकर संवाद करने का आधार बना है। हालांकि इस देश में ऐसे लोगोें की संख्या कम नहीं है जिनको इस बैठक से ऐतराज होगा। ऐसे निहित स्वार्थी तत्व राजनीतिक, बौद्धिक, एनजीओ, सामाजिक सक्रियतावाद.. सभी क्षेत्रों में हैं। साथ ही संघ परिवार के अंदर भी इसके विरोधी होंगे और जमतयत तथा व्यापक मुस्लिम समाज के भीतर भी। बहुत सारे लोगों का पूरा अस्तित्व ही संघ विरोध पर टिका है। उनके लिए ऐसी बैठकें और संवाद कलेजे पर सांप लोटने जैसा होगा। किंतु जो लोग निष्पक्ष भाव से भारत में सामाजिक-सांप्रदायिक एकता और शांति की कामना करते हैं वे इस पहल से अवश्य प्रसन्न होंगे। हां, व्यावहारिकता का तकाजा है कि हम ज्यादा उत्साहित नहीं हो सकते। इसके कई कारण है। सबसे पहला तो यह कि बड़ी शक्तियां इसको विफल करने में लग गई होंगी। जो लोग मुस्लिम वोट बैंक के आधार पर राजनीति करते हैं उनका एक प्रमुख एजेंडा होगा, किसी तरह आगे संवाद को बाधित करना। ऐसे अन्य लोग भी सक्रिय हो चुके होंगे। अगर वाकई दोनों पक्ष संवाद में रुचि रखते हैं तथा देश में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए मिलकर काम करना चाहते हैं तो आलोचनाओं, विरोधों, उपहास, उत्तेजना पैदा किए जाने से निरपेक्ष रखते हुए आगे बढ़ना होगा। संघ और मुस्लिम संगठनों के बीच पहले भी संवाद हुए हैं लेकिन हमेशा ऐसी शक्तियों ने उसमें विध्न डालकर विफल कर दिया। पूर्व सरसंघचालक स्व. कुपहल्ली सीतारमैया सुदर्शन की ओर से इसकी लगातार कोशिशें की गईं। वे तो प्रमुख शहरों की मस्जिदों में स्वयं जाकर वहां के मौलवियों से चर्चा करते थे। इसके लिए उन्होंने इस्लाम धर्म की मान्य पुस्तकों का अध्ययन किया। दो दशक पहले लखनउ मंें सुदर्शन और संघ के प्रतिनिधियों के साथ मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ लंबी बैठक हुई। यह बात अलग है कि वह संवाद निरंतर जारी नहीं रहा। किंतु उनकी सहमति से संघ के प्रचारक इन्द्रेश कुमार ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच नामक संगठन खड़ा किया। वह संगठन अपनी सीमाओं में लगातार सक्रिय है।

हालांकि इस बैठक में उस संगठन की कोई भूमिका थी या नहीं स्पष्ट नहीं है। संघ हिन्दुओं का संगठन है तथा जमीयत मुसलमानों का इसमें तो किसी को संदेह नहीं हो सकता। बातचीत में निरंतरता रहेगी या नहीं रहेगी, यह गतिरोध का शिकार हो जाएगा या वाकई आगे निकलते हुए किसी सहयोग में परिणत होगा इस समय कुछ कहना कठिन है। न यह संभव है कि संघ अपना विचार बदल लेगा और न जमीयत ही। इतने वर्षों से काम करने वाले संगठन की विचारधारा का भी क्रमिक विकास होता है और एक समय आने के बाद वह रुढ़ हो जाता है। बावजूद निरंतर संवाद से एक दूसरे को समझा जाता है उससे अपने विचारों की बेहतर परख होती है। इससे गलफहमियां भी समझ में आतीं हैं और उनको दूर करने की संभावनाएं बनतीं हैं। अरशद मदनी ने कहा कि हमें बंद कमरों से बाहर निकलकर मिलकर काम करना चाहिए। इतनी उम्मीद अभी शायद जल्दबाजी होगी। किंतु मदनी ने अगर ऐसा कहा तो इसका मतलब है भागवत के साथ बातचीत काफी सद्भावनापूर्ण माहौल में हुई।

पिछले वर्ष भागवत ने राजधानी दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय संवाद आयोजित कर संघ के बारे मंे पूरे विस्तार से जानकारी दी। उसमें हर क्षेत्र के लोग आमंत्रित किए गए थे। उनमंें पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी दिए गए। वह पूरा संवाद सार्वजनिक है। उसमें भागवत ने हिन्दुत्व की उदार व्याख्या प्रस्तुत करते हुए संघ को उसका प्रतिनिधि बताया। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि यदि हम मुसलमानों को अपने से अलग मानते हैं तो यह हिन्दुत्व होगा ही नहीं। तो संघ का एक सर्वग्राही एवं समन्वयवादी चरित्र उन्होंने प्रस्तुत किया। उसका कुछ असर हुआ है। कई ऐसे लोग जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते थे उनकी भाषा बदली है। जो सूचना है मदनी  ने जब एक समुदाय के भय की बात की तो भागवत ने कहा कि हम जब हिन्दुत्व या हिन्दू राष्ट्र की बात करते हैं तो उसमें मुसलमान शामिल हैं। ये ऐसी बातें हैं जिनको जब तक विस्तारपूर्वक नहीं समझाया जाएगा तब तक समझ में नहीं आ सकता। हिन्दुत्व से जुड़ा कोई विचार कभी अनुदार नहीं हो सकता। लेकिन दूसरे मजहब के लोगों के अंदर इसका विश्वास पैदा होना चाहिए।

हालांकि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। जो मुस्लिम संगठन हैं उनको भी अपने व्यवहार से बताना होगा कि वे दूसरे मजहबों-पंथों का सम्मान करते हैं। जो भी हो देश और दुनिया के सबसे बड़े हिन्दू संगठन और भारत के बड़े मुस्लिम संगठन के बीच संवाद से कोई क्षति नहीं हो सकती। इसलिए इसको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अगर दोनों संगठनों के बीच विश्वास का हल्का भी पुल बना तो देश की अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। उदाहरण के लिए अभी उच्चतम न्यायालय में अयोध्या विवाद की सुनवाई हो रही है। न्यायालय कोई भी फैसला दे दे अगर दोनों पक्षों में तनाव बना रहे तो फिर उससे देश का भला नहीं हो सकता। अगर दोनों पक्षों के बीच संवाद है तो फैसले के बाद उसके अमल में लाने का वातावरण ही अलग होगा। वास्तव में सवाद से दूरियों की खाई कम हो सकतीं हैं। कुछ ऐसे मुद्दे हो सकते हैं जिन पर भविष्य में ये साथ काम भी कर सकते हैं। कहीं सांप्रदायिक तनाव में यदि दोनों संगठनों के नेता एक साथ लोगों के बीच जाए तो उसका चमत्कारिक असर हो सकता है।

किसी संगठन को अछूत मानकर चलने से किसी का भला नहीं है। हमारे देश में ऐसे लोगों का बड़ा वर्ग है जो मानता है कि संघ के साथ कोई काम किया ही नहीं जा सकता। ऐसा संगठन, जिसके 50 से ज्यादा अनुषांगिक संगठन हैं, जो मनुष्य जीवन के हर क्षेत्र में काम कर रहा है, देश से लेकर अनेक राज्यों में उसके ही परिवार के अंग भाजपा का शासन है उसे आप छांटकर देश में कोई बड़ा काम नहीं कर सकते। वैचारिक मतभेद या वैचारिक असहमति तो रहने वाली है। लेकिन उसमें भी देश और व्यापक रुप से मानव समुदाय के लिए साथ आने और काम करने की संभावना हमेशा रहती है। संघ और जमीयत के बातचीत की शुरुआत इस दिशा में एक मिसाल बने ऐसी कामना की जा सकती है। संघ ने अपने एक वरिष्ठ अधिकारी को इस काम में लगा दिया है तो इसका मतलब हुआ कि उसने संवाद आगे बढ़ाने का निर्णय कर लिया है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

भारत रुस संबंधों का नया अध्याय

 

अवधेश कुमार

रुस ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने पर जिस तरह खुलकर भारत का समर्थन किया उससे बड़ा प्रमाण संबंधों की गहराई का तत्काल कुछ नहीं हो सकता। सुरक्षा परिषद की बंद कमरे की मंत्रणा में रुस का मुखर तेवर भारत की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला साबित हुआ था। ऐसे समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिवसीय रुस यात्रा का महत्व बढ़ जाता है। हालांकि पूरी यात्रा के परिणामों को देखते हुए यह कहना गलत होगा कि मोदी ने केवल कश्मीर पर रुस के समर्थन को भविष्य के लिए सुदृढ़ कर आश्वस्त हो जाने के लक्ष्य सेह यात्रा किया था। इस यात्रा के आयाम काफी व्यापक थे। सच कहा जाए तो इस यात्रा से दोनों देशों के संबंधों में ऐसे अध्यायों की शुरुआत हुई है जिनके बारे में शायद पहले विचार नहीं किया गया था। मूल रुप में यह भारत रुस का 20 वां शिखर सम्मेलन था। रुस ने मोदी को अपने देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द एपोस्टल से सम्मानित करने का ऐलान पहले से किया हुआ था। पुतिन ने ईस्टर्न इकोनोमिक सम्मेलन में उन्हें विशेष अतिथि के रुप में आमंत्रित किया। यह रुस की नजर मंें प्रधानमंत्री मोदी और भारत के बढ़ते कद का परिचायक है। रुस ने मोदी की यात्रा को पर्याप्त महत्व दिया। व्लादिवोस्तोक पहुंचने पर मोदी ने कहा कि जहां 21वीं सदी में मानव विकास की नई गाथाएं लिखी जा रही हैं, ऐसे कर्मतीर्थ में आकर मुझे अपार खुशी हो रही है।

हालांकि 2014 से लेकर अब तक मोदी चार बार रूस की यात्रा कर चुके हैं। लेकिन इस यात्रा का महत्व सबसे अलग था। मोदी इस यात्रा में पूरी तैयारी से गए थे और रुस ने उसके समानांतर जवाबी तैयारी की थी। प्रधानमंत्री के साथ फिक्की का 50 सदस्यीय बड़ा प्रतिनिधिमंडल था। इसका सीधा अर्थ था कि सरकारी स्तरों से परे निजी स्तर पर व्यापार एवं निवेश को प्रोत्साहित किया जाएगा। साझा पत्रकार वार्ता मंे मोदी ने कहा भी कि हमने सहयोग को सरकारी दायरे से बाहर लाकर उसमें लोगों और निजी उद्योग की असीम ऊर्जा को जोड़ा है। हमारे रिश्तों को हम राजधानियों के बार भारत के राज्यों और रूस के अन्य क्षेत्रों तक ले जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी रूस के सुदूर पूर्व क्षेत्र (फार ईस्ट रीजन) की यात्रा करने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने मोदी को अपने देश के सुदूर पूर्व हिस्सों में विकास कार्यों की जानकारी दी। प्रधानमंत्री को कई मॉडल्स और प्रजेंटेशन के जरिए विभिन्न परियोजनाओं की जानकारी दी गई। दरअसल, रुस इस क्षेत्र का विकास चाहता है और उसमें वह भारतीय कंपनियों का ही नहीं कुशल भारतीय कामगारों का भी स्वागत करने को तैयार बैठा है। भारत के लिए भी यह अवसर उस क्षेत्र में निवेश कर लाभ उठाने तथा अपने मानव श्रम तक के निर्यात करने का है। व्लादिवोस्तोक में खनिज और ऊर्जा के बड़े भंडार मौजूद हैं। विदेश सचिव विजय गोखले ने प्रेस कॉन्फ्रेंस मंें जो जानकारी दी उसके अनुसार दुनिया में जहां कहीं भी मैनपावर की कमी है, भारत उन सभी जगहों पर स्किल्ड वर्कर्स या प्रशिक्षित कामगार भेजने पर काम रहा है। राजधानी मॉस्को से व्लादिवोस्तोक तक ट्रेन से पहुंचने में 7 दिन लगते हैं। यहां कम जनसंख्या की वजह से प्राकृतिक संसाधनों के खनन में भी परेशानी आती है। ऐसे में कृषि और खनन सेक्टर में भारत के लिए यह बड़ा मौका होगा। हमारे प्रशिक्षित लोग यहां काम कर दोनों देशों के विकास में योगदान दे सकते हैं।

दोनों देशों ने रक्षा, तकनीक, उर्जा से लेकर अंतरिक्ष मिशन तक 13 समझौते किए। प्रधानमंत्री ने विभिन्न क्षेत्रों में भारत और रूस के बीच साझेदारी की चर्चा करते हुए कहा कि आज हमारे बीच रक्षा, नाभिकीय उर्जा, अंतरिक्ष, बिजनस टु बिजनस समेत कई क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए सहमति बनी है। भारत में रूस के सहयोग से न्यूक्लियर प्लांट बन रहे हैं, कुछ समय पहले ही में भारत का एक प्रतिनिधिमंडल यहां पर आए और इस दौरान समझौतों को लेकर बातचीत हुई। भारत के एच-एनर्जी ग्लोबल लिमिटेड और रूस के नोवाटेक ने भारत और अन्य बाजारों में एलएनजी की आपूर्ति के लिए समझौता किया। इसके तहत नोवाटेक भारत, बांग्लादेश और अन्य बाजारों में एलएनजी की बिक्री के लिए भविष्य के एलएनजी टर्मिनल और संयुक्त उद्यम के गठन में निवेश करेगी। रक्षा जैसे क्षेत्र में रूसी उपकरणों के स्पेयर पार्ट्स दोनों देशों के संयुक्त उद्यम द्वारा बनाने पर हुआ समझौता रक्षा उद्योग को आगे बढ़ाने वाला साबित होगा। जैसा मोदी ने कहा भारत-रूस रक्षा, कृषि, पर्यटन, व्यापार में आगे बढ़ रहे हैं। अंतरिक्ष में दोनों देशों का सहयोग काफी ऊंचाई हासिल कर चुका है। गगनयान यानी भारतीय ह्यूमन स्पेस फ्लाइट के लिए भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिक रूस में प्रशिक्षण लेंगे। चेन्नै और व्लादिवोस्तोक के बीच एक समुद्री मार्ग तैयार किए जाने का प्रस्ताव रखा गया है। ओएनजीसी और कुछ हीरा कंपनियां अभी रूस के इस सुदूर पूर्वी इलाके में काम कर रही हैं। भारत-रूस इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण ट्रांस्पोर्ट गलियारा पर भी काम कर रहे हैं। यह 7200 किलोमीटर लंबा सड़क, रेल और समुद्र मार्ग होगा जो भारत, ईरान और रूस को जोड़ेगा। कॉरिडोर हिंद महासागर और फारस की खाड़ी से ईरान के चाबहार बंदरगाह होते हुए रूस के सेंट पीटर्सबर्ग को जोड़ेगा। भारत और रुस के अलग-अलग स्थानों से जुड़ाव के बाद नागरिक, व्यापारिक आदान-प्रदान कितना आसान हो जाएगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। प्रधानमंत्री मोदी ने रुस से आकर्टिक क्षेत्र भी खोलने का आग्रह किया है ताकि दूरियां और कम हों एवं उर्जा पर काम किया जा सके। 

इससे समझा जा सकता है कि कितने व्यापक स्तर पर संबंधों के विस्तार की आधारशीला रख दी गई। इसे ही संबंधों की सघनता कह सकते हैं। ध्यान रखिए, यह क्षेत्र चीन के बिल्कुल पास है। चीन ने वहां काफी निवेश किया हुआ है। इस तरह भले यह यात्रा छोटी यानी केवल 36 घंटे की थी लेकिन इसकी परिणति ऐतिहासिक है। अगर लोगों को जोड़ना है, रुस में निजी निवेश करना है, अपने कुशल मैनपावर को काम में लगाना है तो परियोजनाओं की जानकारी, संभावनाएं तथा आने-जाने के सुगम मार्ग चाहिए। इन पर काम आरंभ होने का मतलब भविष्य में रुस और भारत के संबंध का वर्णक्रम बिल्कुल बदला दिखेगा। इसके सामरिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता। पुतिन मोदी को ज्वेज्दा पोत निर्माण केंद्र भी दिखाने ले गए। यहां उन्होंने कुछ प्रदर्शनी भी देखी। संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान पुतिन ने भी कहा कि हमारी दोस्ती लगातार मजबूत हो रही है। हम लोग लगातार खुले और बढ़िया वातावरण में बातचीत कर रहे हैं। हमारी प्राथमिकता निवेश और व्यापार है, दोनों देशों के व्यापार में 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। हम भारत की कंपनियों का रूस में स्वागत करना चाहते हैं। हम भारत में मिसाइल प्रणाली और रायफल बनाने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

भारत ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम का सदस्य नहीं है, लेकिन मोदी राष्ट्रपति पुतिन के विशेष आमंत्रण पर इसकी पांचवी बैठक में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। मोदी ने वहां बदलते हुए बेहतर भारत की तस्वीर पेश की जिसे दुनिया ने सुना। उसी मंच से उन्होंने रूस के सुदूर पूर्व में 1 अरब डौलर के लाईन औफ क्रेडिट यानी विशेष शर्तों वाले ऋण का ऐलान कर सोदश दिया कि वह पूरे क्षेत्र में प्रभावी उपस्थिति की ओर अग्रसर है। इस मंच से भारत को रूस के सुदूर पूर्व को विकसित करने के साथ एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने का अवसर मिलेगा। सम्मेलन में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद और मंगोलिया के राष्ट्रपति खाल्तमागिन बत्तुलगा आदि भी शामिल थे। प्रधानमंत्री ने कम समय में ही इन नेताओं से भी अलग-अलग बातचीत की। वैसे अमेरिका के विरोध के बावजूद भारत द्वारा रुस से एस 400 मिसाइल प्रणाली खरीदने पर दिखाई दृढ़ता एवं उसका अग्रिम भुगतान कर देने से भी रुस का झुकाव ज्यादा बढ़ा है। अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोप ने रुस को प्रतिबंधित किया हुआ है, लेकिन भारत ने क्रीमिया और यूक्रेन पर रुस की नीति से असहमत होते हुए भी उसको बिल्कुल नजरअंदाज नहीं किया। इससे भारत और रुस के संबंधों में व्यापक बदलाव आ गया। रुस का झुकाव चीन की ओर ज्यादा हो गया था। वह पाकिस्तान को भी काफी महत्व देने लगा था। इस दौरे से साबित हो गया कि भारत उसकी प्राथमिकता में शामिल है। दोनों देशों की अनेक अंतरराष्ट्रीय मामले पर एकजुटता का व्यापक असर होगा। अफगानिस्तान को लेकर भी दोनों नेताओं के स्वर एक ही थे। पाकिस्तान और चीन वहां भारत की भूमिका बिल्कुल नहीं चाहता। इस मायने में दोनों नेताओं की यहघोषणा बहुत महत्वपूर्ण है कि हम आतंकवाद से मुक्त एक शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक बाहरी हस्तक्षेप से परे अफगानिस्तान देखना चाहते हैं।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

गुरुवार, 29 अगस्त 2019

बुद्धिमतापूर्ण कूटनीति की मिसाल

 अवधेश कुमार

फ्रांस के समुद्र किनारे बसे मनोरम दृश्यों वाले शहर बिआरित्ज में आयोजित जी 7 सम्मेलन पर दुनिया की नजर कई कारणों से रही होगी। किंतु विशेष आमंत्रित अतिथि के रुप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र की उपस्थिति से इसका आयाम विस्तृत हो गया था। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद पाकिस्तान ने जिस तरह से अपनी विदेश नीति को पूरी तरह भारत के खिलाफ झोंक दिया है उसमें दुनिया के एक हिस्से की नजर इस कारण भी थी कि मोदी वहां उपस्थित नेताओं से क्या बात करते हैं और नेतागण कश्मीर और भारत पर क्या बोलते हैं। सबसे ज्यादा ध्यान मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बैठक पर था। अगर दुनिया के कूटनीतिक इतिहास के आइने में देखा जाए तो दोनों नेताओं की बैठक का एक दृश्य उसके अध्याय में शामिल हो गया। ज्यादातर मीडिया ने उसी तस्वीर को अपने यहा सुर्खियां दी। ट्रंप यह कहते हुए मोदी के बायें हाथ पर अपने दायें हाथ की थपकी देते हैं कि ये अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं लेकिन यहां बोलना नहीं चाहते। इस पर मोदी ठहाका लगाते हैं और अपने बायें हाथ से उनके हाथ को पकड़े हुए दायें हाथ से ज्यादा जोर से थपकी लगाते हुए पकड़ लेते हैं। इस तरह के दृश्य दो देशों के नेताओं के शिखर सम्मेलन में शायद ही कभी सामने आया हो। इसीलिए अनेक विश्लेषकों ने उस दिन का दृश्य या सीन औफ द डे का नाम दे दिया। कूटनीति में शब्दों के साथ बडी लैंग्वेज यानी हाव-भाव का व्यापक महत्व होता है। तो आइए यह समझने की कोशिश करें कि मोदी ट्रंप के इस हाव-भाव और वहां दिए गए वक्तव्यों के मायने क्या हैं?

दोनों नेताओं के बीच प्रतिनिधिस्तरीय द्विपक्षीय बातचीत हुई। पत्रकारों के सामने आने के पहले रात में दोनों ने साथ भोजन किया था जिस दौरान भी बातचीत हुई थी। पत्रकारों ने कश्मीर पर सवाल पूछ लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने जो जवाब दिया वह वाकई अद्भुत था। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच कई द्विपक्षीय मामले हैं जिनका हम समाधान कर सकते है। हम इस पर दुनिया के किसी भी देश को कष्ट नहीं देना चाहते हैं। मोदी ने यह भी कहा कि भारत और पाकिस्तान, जो 1947 से पहले एक ही थे, मिलजुलकर अपनी समस्याओं पर चर्चा और समाधान भी कर सकते हैं। इस तरह के वक्तव्य की उम्मीद भारत में भी शायद ही किसी ने की होगी। हालांकि कश्मीर पर सवाल पूछा जाएगा इसकी पूरी उम्मीद मोदी को रही होगी इसलिए वे जवाब पहले से सोचकर गए होंगे। इस प्रकार से जवाब देने को आप श्रेष्ठ कूटनीति का उदाहरण मान सकते हैं। इसमें विनम्रता और शालीनता थी तो दृढ़ता और आत्मविश्वास भी था। साथ ही इसमें भारत की सक्षमता का संदेश देने का भाव भी था। मोदी यह भी कह सकते थे कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मामला है और अभी हमने जो किया है वह हमारा आंतरिक विषय है जिसमें कोई दूसरा पक्ष दखलंदाजी नहीं कर सकता या किसी पक्ष की दखलअंदाजी की इजाजत हम नहीं देंगे। यह रुखी भाषा होती और शायद ट्रंप जैसा नेता या दूसरे नेता इससे भीतर ही भीतर नाराज हो सकते थे। इसकी जगह उन्होंने एकदम सहज भाव से कह दिया कि हम किसी को कष्ट नहीं देना चाहते। यानी बात वही थी कि इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई आवश्यकता नहीं है, पर इसको शालीन तरीके से कह दिया गया। यह एक परिपक्व देश के परिपक्व नेतृत्व की परिपक्व कूटनीति मानी जाएगी। 

परिणाम देखिए। ट्रंप ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी पर उन्हें पूरा भरोसा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि चीजें पूरी तरह नियंत्रण में हैं। मुझे उम्मीद है कि वे कुछ अच्छा करने में कामयाब होंगे, जो बहुत अच्छा होगा। ट्रंप ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि भारत और पाकिस्तान मिलकर समस्याओं को सुलझा लेंगे। ट्रपं के इस वक्तव्य का महत्व इस मायने में है कि इसके पहले वे तीन बार 22 जुलाई को ह्वाइट हाउस में इमरान खान से मुलाकात के दौरान, फिर 2 अगस्त एवं 21 अगस्त को मध्यस्थता करने का बयान दे चुके थे। 21 अगस्त को उन्होंने कह दिया कि वहां धर्म का मामला भी है। हिन्दू और मुसलमान हैं। इसमें भारतीय कूटनीति का एकमात्र लक्ष्य यही हो सकता था कि बिना किसी प्रकार तनाव पैदा किए, संबंधों को सामान्य बनाए रखते हुए ट्रंप को समझा दिया जाए कि आपका स्टैंड सही नहीं है जिसे आपको बदलना चाहिए। ट्रंप का बयान बताता है कि इसमें भारत को कम से कम तत्काल पूरी सफलता मिली है। इसी में हाथ पकड़ने की शारीरिक भाषा का महत्व बढ़ जाता है। उस दौरान मोदी भी ठहाका लगा रहे थे और ट्रंप भी। उपस्थित पत्रकार भी हंस रहे थे। यह हाव-भाव बता रहा था कि दोनों के बीच व्यक्तिगत संबंधी कितना सहज और अनौपचारिक है। यह समानता के स्तर पर व्यवहार करने तथा एक दूसरे पर विश्वास को भी दर्शाता है। इसकी तुलना ह्वाइट हाउस में इमरान खान एवं डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात के समय के दृश्य से कीजिए। दोनों अगल-बलग बैठे हुए थे। पर इमरान खान बिल्कुल असहज थे। पूरा माहौल औपचारिक था। साफ दिख रहा था कि पाकिस्तानी पत्रकारों को पहले से तैयार करके रखा गया था कि क्या प्रश्न पूछना है। उसी अनुसार पत्रकार प्रश्न पूछते गए और इमरान ने जवाब दिया तथा ट्रंप ने उसी में कह दिया कि कश्मीर के मामले पर वे दोनों देशों के बीच मध्यस्थता को तैयार हैं। हालांकि बाद में उन्होेंने इसमें जोड़ा था कि अगर मोदी चाहें तो।

इस तरह सधी हुई कूटनीति से मोदी ने निर्धारित लक्ष्य हासिल कर लिया। वहां उपस्थित अन्य नेताओं से भी मोदी की बात हुई। जर्मन की चांसलर एंजेला मर्केल से, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन से भी आमने सामने की बातचीत हुई। हालांकि उसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है और उसके बाद पत्रकार वार्ता भी नहीं हुई जिनसे हम कुछ अंदाजा लगाएं। वैसे इमरान खान ने फोन पर इन दोनों नेताओं से बातचीत की थी। जाहिर है, इमरान ने भारत के खिलाफ ही अपना पक्ष रखा होगा। संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव एंटोनियो गुआटेरस से मुलाकात के बाद मोदी ने ट्वीट भी किया कि महासचिव के साथ बैठक शानदार रही। उसमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता आदि की चर्चा की जानकारी थी। एंटोनियो गुआटेरस पाकिस्तान के हस्तक्षेप के अनुरोध को यह कहकर ठुकरा चुके हैं कि मामला द्विपक्षीय है। थोड़े शब्दों मे कहा जाए तो भारत का लक्ष्य ट्रंप से अपने अनुकूल वक्तव्य दिलवा देना था। अमेरिका के राष्ट्रपति के अलावा दुनिया में किसी की हैसियत नहीं है कि वह मध्सस्थता का प्रस्ताव दे सके। उसके बाद भारत विरोधी देशों को भी नए सिरे से विचार करने को मजबूर होना पड़ रहा होगा। मोदी ने यह भी यूं ही नहीं कहा कि पाकिस्तान में चुनाव जीतने के बाद वहां के नए प्रधानमंत्री को मैंने फोन कर कहा था कि पाक और भारत दोनों को देशों को बीमारी, गरीबी, अशिक्षा आदि के खिलाफ लड़ना है। दोनों देश मिलकर इसके खिलाफ लड़ सकते हैं। इसका अर्थ भी साफ है कि हम तो शांतिपूर्ण विकास में साझेदारी करना चाहते हैं और हमारा इरादा आज भी यही है, पर पाकिस्तान साथ नहीं आता। यह अवसर नहीं था कि प्रधानमंत्री आक्रामक होकर पाकिस्तान पर आतंकवाद को पालने तथा जम्मू कश्मीर हिंसा कराने का सीधा आरोप लगाते। उन्होंने यह भी कह दिया कि राष्ट्रपति ट्रंप से भी हमारी इस संबंध में बात होती रहती है। पता नहीं क्या बात होती है, पर संदेश तो चला गया कि पाकिस्तान के संदर्भ में वे लगातार बात करते हैं। यानी यह मत समझिए कि हम पहली बार इस विषय पर बातचीत कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी कहा कि हम लोग व्यापार को लेकर बात कर रहे हैं, हम लोग सैन्य और दूसरी महत्वपूर्ण चीजों के बारे में बात कर रहे हैं।

इस तरह फ्रांस के बियारित्ज में परिपक्व और बुद्धिमतापूर्ण कूटनीति से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम ने जम्मू कश्मीर के संदर्भ में स्थिति को अपने पक्ष में मोड़ने में सफलता पाई है। ट्रपं का बयान भारत के लिए एक चुनौती बन गया था। मोदी ने फोन पर हुई बातचीत में अवश्य संकेतों में उन्हें समझाया होगा। किंतु मुलाकात के बाद ट्रंप का बयान बताता है कि उन्होंने अपनी समझ पर पुनिर्वचार किया है। आगे फिर उनमें कुछ बदलाव होता है तो देखेंगे। किंतु पाकिस्तान कितना हताश हो गया है इसका प्रमाण है इस मुलाकात के बाद इमरान खान का संबोधन जिसमें वे दुनिया को बता रहे हैं कि दोनों नाभिकीय शक्ति हैं और युद्ध हुआ तो केवल पाकिस्तान और भारत पर ही इसका असर नहीं होगा दुनिया भी इसकी चपेट में आएगी। एक ओर इस तरह का उत्तेजनापूर्ण भाषण और दूसरी ओर सहजता से मामले को द्विपक्षीय बताने तथा किसी तरह की आक्रामक बात न करने के आचरण में दुनिया भी अंतर कर रही होगी।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

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