मंगलवार, 13 अगस्त 2019

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

इतिहास की भूलों का अंत और नए इतिहास का निर्माण

 
अवधेश कुमार

तो अब अनुच्छेद 370 इतिहास बन गया और उसके साथ 35 ए अपने-आप मर गया। जब राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह अपन हाथों में विधेयकों और संकल्पों की प्रतियां लेकर बोलने को खड़े हुए थे शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि वाकई वो इतिहास बदलने का दस्तावेज लेकर आए हैं। जैसे ही शाह ने कहा कि महोदय, मैं संकल्प प्रस्तुत करता हूं कि यह सदन अनुच्छेद 370(3) के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति द्वारा जारी की जाने वाली निम्नलिखित अधिसूचनाओं की सिफारिश करता है हंगामा आरंभ हो गया। एक ओर वाह-वाह तो दूसरी ओर विरोध। उन्होंने हंगामे के बीच ही पढ़ा कि संविधान के अनुच्छेद 370(3) के अंतर्गत भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 खंड 1 के साथ पठित अनुच्छेद 370 के खंड 3 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति संसद की सिफारिश पर यह घोषणा करते हैं कि यह दिनांक जिस दिन भारत के राष्ट्रपति द्वारा इस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए जाएंगे और इसे सरकारी गैजेट में प्रकाशित किया जाएगा उस दिन से अनुच्छेद 370 के सभी खंड लागू नहीं होंगे, सिवाय खंड 1 के। हालांकि लोकसभा में हंगामा नीं हुआ। जिनको भी धारा 370 के अतीत और प्रावधानों तथा उसके परिणामों का पता है उनके लिए यह असाधारण तथा इतिहास को पूरी तरह बदल देने वाला कदम है। जम्मू कश्मीर को तीन भागों में बांटकर लद्दाख को अलग तथा जम्मू कश्मीर को केन्द्रशासित बनाने का फैसला भी अभूतपूर्व है।

यह आम धारणा थी कि धारा 370 को जम्मू-कश्मीर से हटाने का फैसला करने के लिए संसद का बहुमत पर्याप्त नहीं होगा। चूंकि इसे जम्मू कश्मीर की संविधान सभा ने भी पारित किया था इसलिए उसका कोई रास्ता निकालना होगा। संविधानविदों ने साफ कर दिया था कि राष्ट्रपति को अनुच्छेद 370 के उपबंध (3) के तहत अनुच्छेद 370 को खत्म करने का अधिकार है। शाह ने सदन में धारा 370 के खंड 3 का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रपति महोदय ने एक नोटिफिकेशन निकाला है, कॉन्स्टिट्यूशन ऑर्डर निकाला है, जिसके अंदर उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा का मतलब जम्मू-कश्मीर की विधानसभा है। चूंकि संविधान सभा तो अब है नहीं। इसलिए, संविधान सभा के अधिकार जम्मू-कश्मीर विधानसभा में निहित होते हैं। चूंकि वहां राज्यपाल शासन है, इसलिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा के सारे अधिकार संसद के दोनों सदन के अंदर निहित है। राष्ट्रपति के इस आदेश को साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। इसके पहले कांग्रेस पार्टी 1952 में और 1962 में धारा 370 में इसी तरीके से संशोधन कर चुकी है। इस तरह इसको  असंवैधानिक कहना गलत है।

वस्तुतः इस अनुच्छेद ने जम्मू-कश्मीर को अजीब तरह से विशेष अधिकारों वाला बना दिया था। उसका अलग संविधान था। जम्मू कश्मीर ने 17 नवंबर 1956 को अपना संविधान लागू किया था। इसका झंडा भी अलग था। कश्मीर में धारा 356 का भी इस्तेमाल नहीं हो सकता था। जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती थी। भारत का अलग और कश्मीर का अलग। 35 ए के कारण जम्मू कश्मीर को अपनी नागरिकता देने का अलग से अधिकार था। भारतीय संसद जम्मू-कश्मीर के मामले में सिर्फ तीन क्षेत्रों-रक्षा, विदेश मामले और संचार के लिए कानून बना सकती थी। इसके अलावा किसी कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र सरकार को राज्य सरकार की मंजूरी की जरुरत पड़ती थी।। शहरी भूमि कानून (1976) भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता था। जम्मू-कश्मीर के घोषित नागरिकों के अलावा कोई जमीन नहीं खरीद सकते थे। जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 साल होता था। जम्मू-कश्मीर में महिलाओं पर शरियत कानून लागू होता था। कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर ले तो उस महिला की जम्मू-कश्मीर की नागरिकता खत्म हो जाती थी। यदि कोई कश्मीरी महिला पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से शादी करती थी, तो उसके पति को भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जाती थी। धारा 370 के चलते कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता मिल जाती थी। जम्मू-कश्मीर में पंचायत के पास कोई अधिकार नहीं था। जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले चपरासी को आज भी ढाई हजार रूपये ही बतौर वेतन मिल रहे थे।  कश्मीर में अल्पसंख्यक हिंदुओं और सिखों को आरक्षण नहीं मिलता था। जम्मू-कश्मीर में भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं था। वोट का अधिकार सिर्फ वहां के स्थायी नागरिकों को ही था। दूसरे राज्य के लोग यहां वोट नहीं दे सकते और न चुनाव में उम्मीदवार बन सकते थे। सूचना का अधिकार (आरटीआई), शिक्षा का अधिकार (आरटीई) लागू नहीं होता था। यहां सीएजी भी लागू नहीं था। बताने की आवश्यकता हीं कि अनुच्छेद 370 के हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में ये सारी स्थितियां पूरी तरह खत्म हो गईं हैं। अब जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान पूरी तरह से लागू होगा। अलग झंडा नहीं होगा। यानी राष्ट्रध्वज तिरंगा रहेगा। दोहरी नागरिकता नहीं होगी। यहां पर राष्ट्रपति शासन लागू होगा। जम्मू कश्मीर पुलिस अब राज्यपाल को रिपोर्ट करेगी। अब देश का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में संपत्ति खरीद पाएगा।  नरेंद्र मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद भारत का कोई भी नागरिक वहां के मतदाता और प्रत्याशी बन सकते हैं। कश्मीर विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश होगा। विधानसभा का कार्यकाल 6 साल की जगह 5 साल होगा।

लोगों के अंदर हमेशा 370 को लेकर गलतफहमी पैदा की गई। कहा गया कि जम्मू कश्मीर का भारत में विलय विशेष था और इस कारण उसे विशेष अधिकार दिया गया। उनके साथ कुछ विशेष वायदा किया गया। आप 26 अक्टूबर 1947 का विलय पत्र देख लीजिए। वह हूबहू वही है जो दूसरे रियासतोें के विलय के लिए बना था। तो किसके और कब वायादा किया गया? गोपालस्वामी आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप पेश किया था जो बाद में धारा 370 बनी। लेकिन यह कश्मीर में भारत के विलय के दो वर्ष बाद की बात थी। यह शेख अब्दुल्ला को अनावश्यक विशेष महत्व देने का परिणाम था। डॉ. अंबेदकर ने इसे देश की एकता और अखंडता के खिलाफ बताकर स्वयं को अलग कर लिया। नेहरु जी के कहने पर शेख अब्दुल्ला अंबेदकर के पास गए। अंबेदकर ने उन्हें डांटा कि तुम चाहते हो कि शेष भारत के लोगों को कोई अधिकार जम्मू कश्मीर में न मिले और तुम्हें शेष भारत में सारे अधिकार मिल जाए। नेहरु जी की जिद के कारण सरदार पटेल ने सदस्यों का समझाबुझाकर इसे अस्थायी एवं संक्रमणकालीv प्रावधान के रुप में रखवा दिया। यह नेहरु जी कृपा थी कि 1951 में राज्य को अपना अलग संविधान सभा गठित करने की अनुमति दी गई। नवंबर 1956 में राज्य के संविधान का कार्य पूरा हुआ। 26 जनवरी 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया। जो प्रावधान अस्थायी है उसे कब तक लागू रखा जाना चाहिए? अनंतकाल तक रखना तो संविधान निर्माताओं की भावनाओं का ही अपमान होता। यह जम्मू कश्मीर के भारत के साथ सम्पूर्ण रुप से एकाकार होने की मार्ग की बाधा बन गया था। साथ ही वहां के नेताओं को इस मायने में निरंकुश बना दिया था कि वे चाहे जितना भ्रष्टाचार करें उनकी गर्दन तक हाथ पहुंचाना मुश्किल था। वह पहले तीन और बाद मे दो परिवारों की जागीर जैसा हो गया था। इस तरह इतिहास के भयंकर भूल का परिमार्जन हुआ है और नए इतिहास निर्माण की शुऊआत हुई है।

कुप्रबंधन के कारण जम्मू कश्मीर जिस हालत में पहंच गया है उसमें उसकी वर्तमान राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्थिति बनाए रखना भी उचित नहीं होता। लद्दाख के लोग वर्षों से केद्रशासित प्रदेश बनाने की मांग कर रहे थे। जम्मू के लोग भी कश्मीर से अलग होना चाहते थे। यह आम शिकायत थी और इसमें सच्चाई भी थी कि घाटी के नेताओं ने जम्मू और लद्दाख के साथ लगातार अन्याय किया। आप सरकार नौकरियों से लेकर विकास की राशि खर्च होने का अनुपात देख लीजिए आपको सच पता चल जाएगा। वैसे भी जम्मू कश्मीर की समस्या का समाधान करना है तो केन्द्र की भूमिका वैधानिक रुप से प्रभावी होनी चाहिए। इसलिए पुनर्गठन के तहत राज्य को दो भागों में बांटकर केन्द्रशासित प्रदेश में बदलने का निर्णय कश्मीर के भविष्य की दृष्टि, राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद  तथा लोकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए बिल्कल उचित है। अब जम्मू कश्मीर विधानसभा वाला केन्द्र शासित प्रदेश होगा जबकि लद्दाख चंडीगढ़ की तरह बिना विधानसभा वाला केन्द्र शासित प्रदेश रहेगा। जम्मू और कश्मीर में दिल्ली और पुडुचेरी की तरह विधानसभा होगी। लद्दाख में चंडीगढ़ की तरह मुख्य आयुक्त होगा। जब स्थिति अनुकूल हो जाएगा तो फिर जम्मू कश्मीर को राज्य बना दिया जाए।

 इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की घोषणा की जा चुकी है। लेकिन उच्चतम न्यायालय संसद के विरुद्ध जाकर इसे पुनर्बहाल करने का आदेश देगा यह मानने का कोई कारण नहीं है। भाजपा पर लंबे समय से आरोप लगता था कि वह अपने घोषणा पत्र में वायदा तो करती है, पर 370 हटाने के लिए कभी पहल तक नहीं करती। 35 ए को भी नहीं हटाती। तो एक बार में ही दोनों खत्म और जम्मू कश्मीर पर पंजा जमाये बैठे राजनीतिक नेताओं के वर्चस्व का भी अंत। इस मायने में जम्मू कश्मीर का वास्तविक विलय अब हुआ है। तो इससे इतिहास बदला और नया इतिहास निर्माण हुआ। इतिहास निर्माण की हर प्रक्रिया चुनौती भरी होती है। भारत के मस्तकपर 370 जैसे घाव का औपरेशन हो गया है। साहस और संतुलन के साथ आगे के कदम उठाने होंगे।

अवधेश कुमार, ईः30,गणेश नगर,पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष-01122483408, 9811027208

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

समाज सुधार का ऐतिहासिक कदम

 

अवधेश कुमार

देश में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या थी जो यह मानने को तैयार नहीं थे कि एक साथ तीन तलाक को अपराध करार देने वाला विधेयक भारतीय संसद में पारित हो जाएगा। खासकर राज्य सभा के अंकगणित तथा सार्वजनिक स्तर पर नेताओं के आचरण एवं वक्तव्यों को देखने के बाद वहां से इसके पारित हो जाने को लेकर आशंकाये ंतो अंत तक थीं। जब उच्च सदन में यह 99 बनाम 84 मत से पारित हो गया तब लगा कि वाकई भारत की सोच में बदलाव आ रहा है। भाजपा के लिए अपने ही नहीं राजग के अंकगणित से भी इसे पारित कराना संभव नहीं था। छः सदस्यों वाली जद यू इसके खिलाफ थी। लेकिन चमत्कार देखिए, विरोध करने वाले कई दलों ने मतदान के समय बहिर्गमन कर दिया, अनेक सांसद आए ही नहीं। हम इसे भाजपा का सदन प्रबंधन कह सकते हैं लेकिन दूसरी ओर इसके राजनीतिक मायने काफी महत्वपूर्ण हैं। एक समय राजनीतिक का माहौल ऐसा था जिसमें माना जाता था कि अल्पसंख्यकों से संबंधित मुद्दों पर चाहे वो गलत ही क्यों न हो खुलकर बोलना या आरपार का कोई स्टैंड लेना वोट की दृष्टि से जोखिम भरा हो जाएगा। इसलिए ऐसे मामले प्रायः संसद में आते ही नहीं थे। आखिर 33 वर्ष पहले कट्टरपंथियों के दबाव में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को झुकना पड़ा एवं शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलट दिया गया, क्योंकि मुस्लिम नेताओं ने तर्क दिया कि यह हमारे पर्सनल कानून में दखल है जिसे हम सहन नहीं करेंगे। वैसे ऑल इंेिडया मुस्लिम पर्सनल लौ बोर्ड अभी भी मानने को तैयार नहीं है और इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने का ऐलान कर दिया है।

इस पृष्ठभूमि में एक साथ तीन तलाक के खिलाफ भारत में कानून बन जाएगा यह कल्पना आसानी से की भी नहीं जा सकती थी। ऐसा नहीं है कि इसका विरोध नहीं हुआ। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से लेकर नामी मुस्लिम संगठनों, अपने समाज में सम्मानित अनेक मौलानाओं, नेताओं ने इसका लगातार विरोध किया। देश में अलग-अलग प्रदर्शन भी हुए। दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ा प्रदर्शन हुआ जिसमें महिलाओं को इकट्ठा कर बताया गया कि जिसके लिए यह कानून बनाने का दावा किया जा रहा है वही विरोध कर रहीं हैं। पिछली सरकार के दौरान दो बार यह विधेयक राज्य सभा में गिरा। लेकिन सरकार ने अध्यादेश के द्वारा कानून को जारी रखा। संसद सत्र के पहले दिन 21 जून को ही इसे लोकसभा में पेश किया गया। लोकसभा में इसे पेश होेने को लेकर प्रक्रियागत प्रश्न उठाए गए एवं सभापति को इसके लिए मतदान कराना पड़ा। कहने का तात्पर्य यह कि इसक रास्ता अत्यंत कठिन था। 1985-86 की मानसिकता में जीने वाले मान रहे थे कि विरोध में ऐसा वातावरण बना देंगे कि कोई दूसरी पार्टी समर्थन नहीं करेगी एवं यह कानून नहीं बन पाएगा। इनने उच्चतम न्यायालय में भी तर्क दिया था कि यह सदियों से चली आ रही धार्मिक रीति है जिसमें एक सेक्यूलर न्यायालय दखल नहीं दे सकता। उच्चतम न्यायालय ने 23 अगस्त 2017 को 395 पृष्ठों के अपने ऐतिहासिक फैसले में कुरान शरीफ, हदीस, इस्लामी कानूनों एवं इस्लामी देशों के यहां की स्थितियों का उदाहरण देकर साबित कर दिया कि यह गैर इस्लामी है। इस तरह उसे असंवैधानिक करार दे दिया गया।

यहां से विरोधियों ने संगठित अभियान चलाया कि जब उच्चतम न्यायालय ने एक साथ तीन तलाक को अवैध करार दे दिया यानी तलाक हुआ ही नही ंतो फिर यह कानून बनाने का कोई मतलब नहीं है। इसे मुस्लिम विरोधी साबित करने का पूरा अभियान चला और अभी भी चल रहा है। समय की धारा जब बदलती है तो समाज सुधार के ऐसे-ऐसे साहसी कानूनी कदम उठ जाते हैं जिनकी एक समय कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। विरोध करने वालों का तर्क तीव्र धारा में तृणमूल की तरह बह जाती है। अजीब-अजीब तर्क दिए गए। मसलन, तलाक एक सिविल मामला है इसे अपराध बनाना गलत है। आप पति को जेल में डाल देंगे तो फिर महिला को गुजारा-भत्ता कौन देगा? यह हिन्दू और मुसलमानों में भेद करता है। मुस्लिम समुदाय ही क्यों, किसी भी समुदाय की महिला को अगर पति छोड़ता है तो उसे आपराधिक क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए। कितने हास्यास्पद तर्क थे। इस्लाम में मान्य तीन तलाक तो कायम है। मान्य तरीके से दिया गया तीन तलाक सिविल मामाला है लेकिन एक साथ तीन तलाक यानी तलाक-ए-विद्दत मान्य नहीं है। जब मान्य नहीं है और गैर कानूनी है तो यह सिविल नहीं अपराध है और इसलिए इसे अपराध मानकर ही कानून बनना चाहिए था। सभी समुदायों को इसमें शामिल करने का तर्क निराधार था क्योंकि तीन तलाक या तलाक-ए-विद्दत केवल इस्लाम में है। हिन्दुओं में तो 1955 के पहले तलाक था ही नहीं। हिन्दुओं में तलाक लेने के लिए  कानूनी प्रक्रिया है जिसका पालन किए बिना आप पत्नी को उसके अधिकारों से बेदखल करते हैं तो सजा के भागीदार हैं। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद महिलायें एक साथ तीन तलाक कहकर घर से निकाले जाने पर पुलिस के पास जातीं थीं लेकिन पुलिस कार्रवाई करे तो किस कानून के आधार पर यह समस्या थी। इसलिए यह कानून जरुरी हो गया था।

 हालांकि आरंभिक प्रावधानों का विरोध करने पर कुछ बदलाव किए गए। जैसे, प्राथमिकी केवल पत्नी या उसके नजदीकी खून वाले रिश्तेदार दर्ज करा पाएंगे। पति और पत्नी के बीच पहल होती है तो मैजिस्ट्रेट समझौता करा सकते हैं। तीन तलाक गैरजमानती अपराध बना रहेगा लेकिन अब इसमें ऐसी व्यवस्था कर दी गई है, जिसके बाद मैजिस्ट्रेट इसमें जमानत दे सकता है लेकिन इससे पहले पत्नी की सुनवाई करनी होगी। सजा तीन साल ही रहेगी। मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा मां के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपी को उसका भी गुजारा देना होगा। यह तर्क विचित्र है कि अगर पति को जेल हो गया तो गुजारा भत्ता कौन देगा? 1955 में बने हिन्दू विवाह कानून में पति की उम्र 21 साल और पत्नी की 18 वर्ष रखी गई जिसके उल्लंघन पर दो साल की सजा का प्रावधान किया गया। यदि पत्नी के रहते हुए पति ने दूसरी शादी की या फिर पत्नी ने दूसरा पति कर लिया तो 7 साल की सजा होगी। 1961 में दहेज के खिलाफ बने कानून में दहेज लेने पर 5 साल और मांगने पर 2 साल की सजा  का प्रावधान है। 1986 में इसे गैरजमानती अपराध करार दिया गया। भारतीय दंड संहिता में 1983 में 498 ए लाया गया जिसमें पति की क्रूरता पर तीन साल की सजा का प्रावधान किया गया। इन सबमें तो तर्क नहीं दिया गया कि परिवार कैसे चलेगा। वैसे एक तीन तलाक का हथियार इस्तेमाल करने वाले पूरे समाज के अपराधी हैं और उनके साथ उसी तरह का व्यवहार कानून को करना चाहिए। कड़ा कानून ऐसे सामाजिक-धार्मिक अपराधों में भय निरोधक की भूमिका निभाता है।

हो सकता है बहुत लोगों को इसका ऐतिहासिक महत्व अभी समझ में न आए। किंतु यह समाज सुधार का इतना बड़ा कदम है जिसके परिणाम आने वाले समय में देखने को मिलेंगे। एक साथ तीन तलाक के भय से महिलाआंें को गुलाम की तरह जीवन जीने को विवश करने की स्थिति खत्म होंगी।  मुस्लिम महिलायें निर्भय होकर अपनी सोच के अनुसार भूमिका निभाने की ओर अग्रसर होंगी। जिनके साथ तीन तलाक का अन्याय हो गया अब न्यायालय से उनको न्याय मिलेगा जो पहले उपलब्ध नहीं था। हालांकि समाज के सुधार के ऐसे कदमों मंें समाज का पूरा सहयोग चाहिए। उसके बगैर यह सफल नहीं होगा। मजहब की गलत सोच रखने वाले प्रतिगामी तत्व समाज और परिवार में माहौल आसानी से बदलने नहीं देते। इसलिए समाज के विवेकशील लोगों को आगे आना होगा। दूसरे, हर कानून के दुरुपयोग की संभावना रहती है। इसका भी ध्यान रखना होगा।

इसका राजनीतिक महत्व इस मायने में है कि मुस्लिम मतों के लिए हमेशा लालायित रहने वाली पार्टियां पीडीपी, टीआरएस, जद यू और तूलगू देशम जैसे कई दलों ने मतदान से बाहर रहने का साहस दिखाया। राज्यसभा में कम से कम 14 सदस्य मौजूद नहीं थे, जिनमें कांग्रेस के ऑस्कर फर्नांडीज और राकांपा के शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल जैसे नेता शामिल हैं। सपा के भी कुछ सांसद मतदान में शामिल नहीं हुए। क्यों? ध्यान रखिए, बसपा, सपा, पीडीपी, एआईडीएमके ने विधेयक का विरोध किया था। केवल बीजू जनता दल के सांसद प्रसन्न आचार्य ने कहा कि हमारी पार्टी और ओडिशा में हमारी सरकार महिला सशक्तिकरण के लिए लगातार काम करती आई है। यह समीकरण ही देश के बदलते वातावरण का परिचायक है। 2014 एवं 2019 में भाजपा की प्रचंड विजय ने पार्टियों के अंदर यह भाव पैदा किया है कि जनता का रुख बदला हुआ है जिसमें ऐसे विधेयकों के विरोध में जाकर मतदान करना हमारी राजनीति के लिए उल्टा पड़ सकता है। सभी पार्टियांे में हलचल मचा हुआ है। इस सोच का आने वाले समय की राजनीति पर भी व्यापक प्रभाव पड़ते हुए हम देखेंगे।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

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