शनिवार, 6 जुलाई 2019

भारत की आकांक्षाओं को पूरा करने का विश्वास दिलाने वाला बजट

 

अवधेश कुमार

संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण से बजट की दिशा, चरित्र और नीतियों का  आभास मिल गया था। आर्थिक सर्वेक्षण नरेन्द्र मोदी सरकार के द्वितीय कार्यकाल का रोडमैप ही था। इसमें प्रधानमंत्री के अगले पांच वर्षों में भारत को 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य के साथ चुनाव पूर्व भाजपा के संकल्प पत्र में घोषित सामाजिक-आर्थिक विकास की वर्तमान स्थितियों एवं उसकी कार्ययोजनाआंें का भी संकेत था। वित्त मंत्री ने उन सबको समाहित करते हुए आम आदमी की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले कदमों के साथ आर्थिक चुनौतियों का सामना करने वाला भारत की सामूहिक आकांक्षओं को पूरी तरह अभिव्यक्त करते हुए एक संतुलित बजट पेश किया है। अंतरिम बजट में भारत को समृद्धतम देश बनाने के लिए दस आयाम घोषित किया गया था। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इसकी चर्चा करते हुए कहा भी यह एक निरंतरता का बजट है। 10 आयामों की चर्चा करते हुए सीतारमण ने फिजिकल-सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर तक और मेक इन इंडिया से लेकर ब्लू इकॉनमी तक की चर्चा की। वस्तुतः अंतरिम बजट को और सशक्त किया गया है। उन्होंने अपने बजट भाषण की शुरुआत 5000 अरब डॉलर का लक्ष्य पाने के साथ की। यह सच है कि जब नरेन्द्र मोदी सरकार सत्ता में आई थी तो भारत की अर्थव्यवस्था 1.85 खबर अमेरिकी डॉलर की थी। इस वर्ष वह 2.7 खरब डॉलर तक पहुुंची। कुछ ही समय में यह 3 खरब डॉलर की हो जाएगी। इसके आधार पर 5 खरब डॉलर तक लक्ष्य पाने की उममीद अव्यावहारिक नहीं है।

बजट इस बड़े लक्ष्य पर केन्द्रित अवश्य है लेकिन इसको पाने के लिए समाज के निचले तबके के कल्याण से लेकर उच्चतर तबके की जिम्मेदारियां तय की गईं हैं। इसे सबका बजट और संतुलित बजट कहा जा सकता है। इसमें अर्थव्यवस्था के समक्ष सारी चुनौतियों का हल करने की कोशिश है, आधारभूत संरचना पर फोकस है तो कारोबारी,उद्योग, किसान, गांव,गरीब,असंगठित क्षेत्र मंें काम करने वालों, खुदरा व्यापारियों आदि के कल्याण के लिए काफी कुछ किया गया है। शहरी आबादी, युवाओं, महिलाओं सबके लिए बजट में काफी कुछ है। बजट की थीम यह है कि अर्थव्यवस्था के सभी अंगों को एक साथ मिलाकर समग्रता में ध्यान दिया जाए तो उसका परिणाम हर क्षेत्र के बीच संतुलन बनाने के रुप में सामने आएगा। 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए 4 प्रतिशत से नीचे मुद्रास्फीति एवं आठ प्रतिशत की विकास दर चाहिए। पिछले वित्त वर्ष के अंतिम तिमाही में विकास दर 5.8 प्रतिशत पर आ गया था। इसका मुख्य कारण एनबीएफसी यानी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की खस्ताहाली, विनिर्माण एवं कृषि विकास का धीमापन माना गया था।  बजट मे वित्त मंत्री ने एनबीएफसी की समस्याओं के समाधान के लिए सारे संभव कदम उठाए गए हैं। चरमरा रहे बैंकों के लिए 70 हजार करोड़ के पुनर्पूंजीकरण का ऐलान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मोदी सरकार के कार्यकाल में नए कानूनों के कारण 4 लाख करोड़ का कर्ज वसूला गया है। एनपीए में एक लाख करोड़ की कमी आ गई है। बैंकों के पास धन आने का मतलब हुआ उद्योग और करोबार को कर्ज के लिए धन की उपलब्धता। इस तरह विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन मिल सकता है। वित्त मंत्री ने कहा कि आजादी के पूर्व जो भावना स्वदेशी की थी वही भावना अब मेक इन इंडिया का है।

तो मेक इन इंडिया के लिए बजट में जितने प्रावधान हैं उनसे उम्मीद जगती है कि भारत विनिर्माण हब का ठोस केन्द्र हो सकता है। अगले पांच वर्ष में 100 लाख करोड़ रुपया आधारभूत संरचना तथा 25 लाख करोड़ रुपया कृषि एवं ग्रामीण आधारभूत संरचना के लिए खर्च की घोषणा बहुत बड़ी है। अंतर्राष्ट्रीय वित्त पर नजर रखने वाले जानते हैं कि बाजार में भारी धन निवेश के लिए पड़ा हुआ है। आपको बस उनको अपने यहां लाने के लिए कोशिश करनी है। यह ऐसी महात्वाकांक्षी योजना है जिसके साकार होेने के बाद वाकई जैसा प्रधानमंत्री ने कहा न्यू इंडिया की कल्पना साक्षात होगी। इसके लिए बजट जो कहता है उसे देखिए। इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंसिंग के लिए साधनों को लेकर कई सुधारों के प्रस्ताव किए गए हैं। क्रेडिट गारंटी एन्हैंसमेंट कॉर्पाेरेशन के लिए आरबीआई से नोटिफेशन आ चुका है। इसकी स्थापना 2019-20 में हो जाएगी। इन्फ्रास्ट्रक्चर डेट फंड्स और एनबीएफसी की ओर से जारी डेट सिक्यॉरिटीज में एफआईआई और एफआई निवेश को घरेलू निवेशकों को निश्चित अवधि के लिए ट्रांसफर करने की अनुमति दी जाएगी। वित्त मंत्री ने सड़क, जलमार्ग और वायुमार्ग को मजबूती प्रदान करने के सरकार के लक्ष्यों का जिक्र किया।

वास्तव मे 5000 खरब डॉलर पाना लक्ष्य है और उसका पूरा आधार बनाया गया है। पहली बार उपभोग पर फोकस की बजाय  विकास की वृद्धि को बचत, निवेश और निर्यात के अच्छे चक्र से बनाए रखने की बात है। निवेश, विशेषकर निजी निवेश विकास का मुख्य प्रेरक होता है, जो मांग, क्षमता, निर्माण, श्रम उत्पादकता में वृद्धि करता है। पिछले पांच वर्षों में इन्सॉल्वंसी ऐंड बैंकरप्ट्सी कोड जैसे बड़े सुधारों के कारण हमारी अर्थव्यवस्था छलांग लगाने को तैयार है। जैसा बजट में साफ किया गया है कि मुद्रास्फीति  लगातार नियंत्रण मंें है और रहेगी जो कि विकास को ताकत देगा। गहराई से देखा जाए तो बजट ने मांग, नौकरियों, निर्यात की विभिन्न आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए इन्हें अलग समस्याओं के रूप में नहीं, बल्कि एक साथ जोड़कर प्रावधान और नीतियां बनाई गईं हैं। मोदी सरकार ने पिछले 1000 दिनों में 130 से 135 कि.मी. लंबी सड़कें रोज बनाईं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ग्रीन टेक्नॉलजी के इस्तेमाल से 30 हजार किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई जा चुकी हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तीसरे चरण में 1.25 लाख कि.मी. सड़कों को अगले पांच सालों में अपग्रेड किया जाएगा। इस पर 80,250 करोड़ रुपये की लागत आएगी।

कृषि की ओर आएं तो इसमें व्यापक निवेश की बात है। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए पहले की नीतियों को आगे बढ़ाया गया है। इसमें कृषि से जुड़े उद्योगों पर भी फोकस है। कहा गया है कि अन्नदाता को ऊर्जादाता बनाने के लिए हमारे पास कार्यक्रम हैं। उदाहरण के लिए सौर उर्जा ईकाइयों से किसान उर्जा बचाकर उसकी बिक्री कर सकते हैं। बजट मंे सबसे बड़ी बात यह है कि आने वाले समय में किसानों के लिए बजट लाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। स्किम ऑफ फंड फॉर अपग्रेडेशन ऐंड रीजनरेशन ऑफ ट्रेडिशनल इंडस्ट्रीज (स्फूर्ति) योजना के तहत ज्यादा कॉमन फसिलिटी सेंटर्स स्थापित किए जाएंगे और ऐग्रो रूरल इंडस्ट्री सेक्टर में 75 हजार स्किल्ड आंट्रप्रन्योर्स तैयार किए जाएंगे। ह2022 तक सभी को आवास, बचे सभी परिवारों को शौचालय, इच्छुक सभी परिवारों को रसोई गैस कनेक्शन, सभी को बिजली, पेयजल उपलब्ध कराने की घोषणा गांवों के जीवन स्तर में कितना बदलाव जाएगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

बजट का एक सिद्धांत अमीरांे पर कर लगाओ और गरीबों का कल्याण करों है।  उदाहरण के लिए 2 से 5 करोड़ आय पर 3 प्रतिशत अधिभार लगेगा। 5 करोड़ रुपये सालाना से अधिक आय वाले लोगों पर 7 प्रतिशत अतिरिक्त अधिभार लगेगा। कारोबार में नकदी के प्रयोग को कम करने के लिए प्रावधान किया गया है कि एक खाते में 1 साल में 2 करोड़ से ज्यादा की निकासी होगी तो 2 प्रतिशत टीडीएस कट जाएगा। निस्संदेह, एक वर्ग को यह पसंद नहीं आएगा। किंतु देश को विकास के लिए धन चाहिए तो अमीरों को उसका भार वहन करना ही होगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि 400 करोड़ रुपये का कारोबार करने वाली कंपनियों को अब 25 प्रतिशत की दर से कॉरपोरेट कर देना होगा। इससे पहले 250 करोड़ रुपये तक का कारोबार करने वाली कंपनियों पर कम दर से कर लगाया गया था। इन दोनों को एक साथ मिलाकर देखना चाहिए। आम आय कर स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया गया है। अंतरिम बजट को कायम रखते हुए 5 लाख रुपये सालाना से अधिक आय पर ही कर देना होगा। नौकरीपेशा लोगों के लिए मानक छूट (स्टैंडर्ड डिडक्शन) की सीमा 40 हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दी गई। अब नौकरी-पेशा लोग दो घरों के लिए एचआरए का आवेदन कर सकते हैं। एचआरए पर कर छूट 1.80 लाख रुपये से बढ़कर 2.40 लाख कर दी है। मध्यम वर्ग के लिए 45 लाख का घर खरीदने पर कर्ज के ब्याज पर 3.5 लाख रुपये की छूट मिलेगी। पहले यह 2 लाख रुपये थी। इस ऐलान से 15 साल की अवधि के आवास कर्ज पर लाभार्थी को सात लाख रुपये तक का फायदा होगा। इस तरह निम्न मध्यम वर्ग एवं मध्यम वर्ग के लिए यह बजट बेहतर प्रावधान लेकर आया है। यह लोगों को घर खरीदने के लिए प्रेरित करेगा और आवास क्षेत्र को गति देगा। जैसा हम जानते हैं सबसे ज्यादा रोजगार आवास निर्माण क्षेत्र से ही मिलता है। इस तरह आवास एवं आधारभूत संरचना संबंधी निर्माण भारत को विकसित देशों की श्रेणी में ही लाएगा बल्कि रोजगार और करोबार का व्यापक अवसर प्रदान करेगा।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है यह भारत के सभी वर्गो और क्षेत्रों की विकास को परवान चढ़ाने के लिए सभी संभाव उपाय करते हुए आकांक्षओं को बढ़ाने और उसे पूरा करने का विश्वास दिलाने वाला बजट है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

सोमवार, 1 जुलाई 2019

चीनी कंपनी के सीसीटीवी कैमरे न लगाने के लिए सीएम आवास पर प्रदर्शन कर ज्ञापन दिया

संवाददाता

नई दिल्ली। जनशक्ति पार्टी (राष्ट्रीय) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्वाला सिंह के नेतृत्व में दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे के खिलाफ मोर्चा खोला और दिल्ली के मुख्यमंत्री आवास पर इस विषय पर जांच करने के लिए ज्ञापन दिया।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्वाला सिंह ने बताया कि दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं परंतु यह सीसीटी वी कैमरे एक चाइनीज कंपनी हिकविजन के हैं। जिससे देश की सुरक्षा को खतरा होने की संभावना है। हमारा पड़ोसी मुल्क चाइना जिसकी बुरी नजर हमेशा भारत पर होती है, चाइना में बैठे-बैठे हमारे देश के राजधानी के कोने-कोने को देख सकता है। जिससे देश के जनता अधिकारियों शासन-प्रशासन और सरकारों को सुरक्षा का खतरा है। उन्होंने बताया कि हमने सीएम जी मिलने का समय लिया था पर जब हम यहां आए तो सीएम जी अपने सभी पार्टी सहयोगियों के साथ वहां से जा चुके थे।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्वाला सिंह ने आगे बताया इसलिए हमने यह ज्ञापन उस समय मौजूद कैंपस इंचार्ज गुरुदत्त रंगा को सौंपा और उनसे लगभग 1 घंटे तक बातचीत हुई जिसमें हमने देश की सुरक्षा में चीन की सेंध होने की संभावना जताते हुए एक पारदर्शी निरीक्षण की मांग की गई और पार्टी नेता कृष्ण कुमार पटैरिया ने गुरुदत्त रंगा को तकनीकी पहलुओं से रूबरू कराया गया और सबूतों के साथ उन्हें यह बताया गया कि इन कैमरों से देश की सुरक्षा को कैसे खतरा होने की पूरी संभावना है जिसकी तत्काल जांच की जानी चाहिए। साथ ही पटैरिया ने चेतवानी दी कि अगर इसकी पारदर्शी जांच नहीं हुई तो हम सड़कों से सुप्रीम कोर्ट तक का रास्ता अपनाएंगे।











 

शनिवार, 29 जून 2019

तीन तलाक के विरुद्ध कानून बनना जरुरी

 

अवधेश कुमार

राष्ट्रपति के अभिभाषण में तीन तलाक और हलाला की स्पष्ट चर्चा का मतलब ही था कि सरकार इसके खिलाफ फिर से विधेयक लाने की तैयारी कर चुकी है। इसलिए विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 17वीं लोकसभा में जब अपने पहले विधेयक के रूप में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019’ पेश किया तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन पूरा दृश्य लगभग दिसंबर 2018 वाला ही था। विपक्ष की ओर से इसके विरोध में वही सारे तर्क दिए गए जो पहले दिए जा चुके थे। किंतु इस बार सबसे पहले इसे लाए जाने के तरीके का ही विरोध किया गया। अंततः लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने पेपर स्लिप से वोटिंग कराई और 74 के मुकाबले 186 मतों के समर्थन से विधेयक पेश हुआ। इस स्थिति में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अगर विधेयक पेश करने में ही बाधा आई एवं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित कई दलों ने इसका तीखा विरोध किया तो फिर इसका भविष्य क्या होगा? क्या इसकी दशा फिर पूर्व की भांति होगी? सरकार के पिछले कार्यकाल में यह लोकसभा में पारित हो गया लेकिन राज्यसभा में  लंबित रह गया। इस कारण इसे अध्यादेश के रुप में कायम रखा गया। प्रश्न यह भी है कि क्या इसके विरोध में जो तर्क दिए जा रहे हैं वे वाकई स्वीकार्य हैं या केवल राजनीतिक नजरिए से विरोध के लिए विरोध किया जा रहा है?

एआईएमएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का विरोध और तर्क जाना हुआ है। उनका विरोध मुख्यतः पांच पहलुओं पर है। एक, तलाक सिविल मामला है। इसे अपराध बनाना गलत है। दो, अगर उच्चतम न्यायालय ने फैसला दे दिया कि एक साथ तीन तलाक से तलाक हो नहीं सकता तो फिर कानून क्यों? तीन, पति को जेल में डाल देंगे तो महिला को गुजारा-भत्ता कौन देगा? चार, यह मौलिक अधिकारों की धारा 14 और 15 का उल्लंघन है। पांच, यह हिन्दू और मुसलमानों में भेद करता है। इस बार कांग्रेस के सांसद शशि थरुर ने लोकसभा में पार्टी का मत रखा। थरूर ने कहा कि मैं तीन तलाक को खत्म करने का विरोध नहीं करता लेकिन इस विधेयक का विरोध कर रहा हूं। तीन तलाक को आपराधिक बनाने का विरोध करता हूं। मुस्लिम समुदाय ही क्यों, किसी भी समुदाय की महिला को अगर पति छोड़ता है तो उसे आपराधिक क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए। सिर्फ मुस्लिम पतियों को सजा के दायरे में लाना गलत है। यह समुदाय के आधार पर भेदभाव है। कांग्रेस ने पिछली बार लोकसभा में बहिगर्मन किया था। इस बार वह जिस तरह विरोध कर रही है उसमें कहना कठिन है कि जिस दिन इसे पारित करने के लिए रखा जाएगा तो वह मतदान में भाग लेगी या बहिगर्मन करेगी।

इन सारे विरोधों को सच की कसौटी पर कसिए। तलाक अवश्य सिविल मामला है। इस्लाम में तीन तलाक के दो प्रकार मान्य हैं, तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन। एक साथ तीन तलाक यानी तलाक-ए-विद्दत मान्य नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने 23 अगस्त 2017 को 395 पृष्ठों के अपने ऐतिहासिक फैसले इसके मजहबी, संवैधानिक, सामाजिक सारे पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए इसे गैर मजहबी एवं असंवैधानिक करार दिया था। असदुद्दीन ओवैसी जिस ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लौ बोर्ड का प्रतिनिधित्व करते हैं उसने तथा जमियत-ए-उलेमा-ए हिन्द ने तलाक ए विद्दत के पक्ष में जितने तर्क दिए न्यायालय ने सबको खारिज कर दिया। इसने कई तर्क दिए थे। जैसे यह पर्सनल लौ का हिस्सा है और इसलिए न्यायालय इसमें दखल नहीं दे सकता। तलाक के बाद उस पत्नी के साथ रहना पाप है और सेक्यूलर न्यायालय इस पाप के लिए मजबूर नहीं कर सकता। पर्सनल लॉ को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। यह आस्था का विषय है, संवैधानिक नैतिकता और बराबरी का सिद्धांत इस पर लागू नहीं होगा। पर्सनल लौ बोर्ड ने तो यह तर्क भी दिया कि इसे इसलिए जारी रखा जाए ताकि कोई पति पत्नी से गुस्सा होकर उसकी हत्या न कर दे। इसने महिलाओं की कम समझ होने का हास्यास्पद तर्क भी दिया। न्यायालय ने इन सारी दलीलों को ठुकरा दिया तो ये विरोध के लिए अलग कुतर्क ले आए हैं। न्यायलय ने साफ कर दिया कि इस्लाम में इसे कहीं मान्यता नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह कि अगर यह इस्लाम में मान्य नहीं है, गैर कानूनी भी है तो फिर यह सिविल मामला नहीं हो सकता। कोई व्यक्ति अपनी झनक, अहम् या वासना में एक महिला को क्षण भर में तलाक-तलाक-तलाक कहकर उसे पत्नी के अधिकारों से वंचित करता है तो यह स्पष्ट तौर पर आपराधिक कृत्य है। एक आपराधिक कृत्य के खिलाफ अपराध कानून ही बनाया जा सकता है। हां, अगर इस्लाम में मान्य तरीके से तीन तलाक होता है तो वह सिविल है और उसमें यह कानून लागू नहीं हो सकता। सभी समुदायों को शामिल करने का तर्क हास्यास्पद है। तीन तलाक या तलाक-ए-विद्दत केवल इस्लाम में है तो इसमें दूसरे समुदाय को कैसे शामिल किया जा सकता है। हिन्दुओं में तलाक लेने के लिए पूरी कानूनी प्रक्रिया है जिसका बिना पालन किए आप पत्नी को उसके अधिकारों से बेदखल करते हैं तो सजा के भागीदार हैं। उच्चतम न्यायालय ने एक साथ तीन तलाक को अमान्य करार दिया लेकिन उसके बाद भी ऐसा हो रहा है तो क्या किया जाए? परित्यक्त पत्नियां थाने जातीं हैं लेकिन पुलिस के पास ऐसा कानून नहीं जिसके तहत वह मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करे। जैसा लोकसभा में बताया गया 2017 से तीन तलाक के 543 मामले, उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद 239 मामले, अध्यादेश के बाद भी 31 मामले सामने आए। जिस समय उच्चतम न्यायालय का फैसला आया उस समय सरकार का मत भी यही था कि घरेलू हिंसा कानून से काम चल जाएगा। किंतु अनुभव आया कि यह पर्याप्त नहीं है। इसलिए कानून अपरिहार्य है। मौलिक अधिकारों की धारा 14 कानून के समक्ष समानता तथा धारा 15 लिंग, मजहब, नस्ल, जाति आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। सच कहा जाए तो यह कानून महिलाओं को न्याय दिलाकर इन धाराओं का पालन करने वाला है।

यह भी ध्यान रखने की बात है कि विपक्ष के विरोध एवं सुझावों के अनुरुप मूल विधेयक में कुछ बदलाव किए गए। वर्तमान विधेयक के अनुसार प्राथमिकी तभी स्वीकार्य की जाएगी जब पत्नी या उसके नजदीकी खून वाले रिश्तेदार दर्ज कराएंगे। विपक्ष और कई संगठनों की चिंता थी कि प्राथमिकी का कोई दुरुपयोग कर सकता है। दूसरे, पति और पत्नी के बीच पहल होती है तो मैजिस्ट्रेट समझौता करा सकते हैं। तीन, तत्काल तीन तलाक गैरजमानती अपराध बना रहेगा लेकिन अब इसमें ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि मजिस्ट्रेट पीड़िता पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर जमानत दे सकते हैं। विधेयक के अनुसार मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा मां के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपी को उसका भी गुजारा देना होगा। यह तर्क विचित्र है कि अगर पति को जेल हो गया तो गुजारा भत्ता कौन देगा? मूल प्रश्न है कि किसी निर्दोष, निरपराध पत्नी के खिलाफ इस्लाम विरोधी अमानवीय कृत्य और अपराध करने वाले व्यक्ति को सजा क्यों नहीं होनी चाहिए? इस्लाम में निकाह बिल्कुल पारदर्शी व्यवस्था है जिसमें दो वयस्कों की सहमति से उपस्थित लोगों और काजी के सामने अनुबंध को साकार किया जाता है। इस तरह के सामाजिक, धार्मिक और विधिक अनुबंध को बिना किसी रस्म के अंत करने का अपराध करने वालों को तो कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए। इसी से भय पैदा होगा एवं दूसरे सनकी सजा के भय से ऐसा करने से परहेज करंेेगे। कड़ा कानून ऐसे सामाजिक-धार्मिक अपराधों में भय निरोधक की भूमिका निभाता है।

अब प्रश्न है इस विधेयक के भविष्य का। लोकसभा में कोई समस्या है नहीं। राज्यसभा में इस समय 236 सदस्य हैं। बहुमत के लिए 119 सदस्यों का समर्थन चाहिए। इस समय राजग की संख्या इस प्रकार है- भाजपा 75, अन्नाद्रमुक 13, जदयू 6, अकाली दल-शिवसेना-नामित 3-3, आरपीआई-एजीपी 1-1। इसमें दो निर्दलीय अमर सिंह और सुभाष चंद्रा को मिलाकर 107 हो जाती है। 5 सदस्यांें वाले बीजद ने सरकार के साथ रचनात्मक सहयोग की घोषणा की है। दो सदस्यों वाले वाईएसआर कांग्रेस का समर्थन भी मिल जाएगा। 6 सदस्यों वाले टीआरएस का रुख साफ नहीं है लेकिन सरकार बात कर रही है। 1-1 सदस्यों वाले एनपीएफ और बीपीएफ को साथ लाने में समस्या नहीं है। इस विधेयक के पारित होने के बीच ही होने वाले राज्य सभा चुनावों में भाजपा को 3 सीटें मिलना तय है। जद यू सहित विरोध करने वाले कुछ दूसरे दलों को बहिर्गमन कराकर सरकार विधेयक को पारित करा सकती है। तो इस बार एक साथ तीन तलाक पर उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले को मूर्त रुप देने वाले विधेयक के कानून में परिणत होने की संभावना पहले से ज्यादा प्रबल है। अगर ऐसा हुआ, जिसकी संभावना है तो यह कानून के द्वारा महिलाओं को न्याय दिलाने वाले एक सामाजिक क्रांति का आधार बन जाएगा।

अवधेश कुमार, ईः30,गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

 

बुधवार, 26 जून 2019

बायोमेट्रिक मशीन के विरोध में बैठक का आयोजन

संवाददाता

नई दिल्ली। डेसू मजदूर संघ ने 25 जून की शाम को सूरजमल पार्क में बायोमेट्रिक मशीन के विरोध में एक बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक की अध्यक्षता डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने की। इस बैठक में सैकड़ों की संख्या में सभी बिजली कंपनी में आउटसोर्स और एएमसी स्टाफ के कर्मचारी शामिल हुए। इस बैठक में आउटसोर्स और एएमसी के कर्मचारियों की बायोमेट्रिक मशीन पर हाजिरी लगाने के संबंध में चर्चा हुई। इस संबंध में चर्चा करते हुए डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने कहा कि जब तक बिजली कम्पनी सभी आउटसोर्स और एएमसी स्टाफ को सीटीसी पर या समान काम का समान वेतन नहीं देती तब तक डेसू मजदूर संघ बिजली कम्पनियों द्वारा आउटसोर्स और एएमसी की हाजिरी बायोमेट्रिक मशीन द्वारा अगर ली जाती है तो वह इसका विरोध करेगी। उन्होंने कहा कि हम आपके साथ थे, आपके साथ हैं और आपके साथ ही खड़े रहेंगे। इस बैठक में बिजली कंपनियों के अधिकारियों ने डेसू मजदूर संघ की मांगों को मान लिया है और आश्वासन दिया है कि वह जल्द ही इस समस्या पर विचार करके सभी आउटसोर्स और एएमसी के कर्मचारियों को बायोमेट्रिक मशीन पर हाजिरी से निजात दिलवाएगी। इस बैठक में डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष श्री किशन यादव, महामंत्री सुभाष चन्द, दिल्ली विद्युत बोर्ड एम्पलाॅइज यूनियन के महामंत्री श्री बिस्मबर दत्त, रिषी पाल, पवन कुमार, अब्दुल रज्जाक, मनोज विद्रोही, सतीश भाठी, सैनतुल त्यागी आदि मौजूद थे।
 











 
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