शनिवार, 13 अप्रैल 2019

चुनावी समर में कांग्रेस अब बचाव की मुद्रा में

 अवधेश कुमार

निस्संदेह, कांग्रेस के लिए यह लोकसभा चुनाव करो या मरो की तरह है। हालांकि पिछले वर्ष तीन राज्यों में मिली सफलता से उसका मनोविज्ञान काफी बदला था लेकिन उसे पता है कि विधानसभा चुनाव और लोकसभा की प्रकृति और प्रवृति काफी अलग है। 2014 का आम चुनाव उसके लिए ऐसा आघात था दुःस्वप्नों में भी जिसकी कल्पना कांग्रेस नेताओं ने नहीं की होगी। 2019 उनके लिए उस मर्मांतक आघात से बाहर निकलने का बड़ा अवसर है। किंतु चुनाव नजदीक आते-आते जो स्थितियां निर्मित हो रहीं हैं उनका ठीक से अवलोकन किया जाए तो कांग्रेस के लिए चिंता के अनेक वाजिब कारण उभरते हैं। भाजपा एवं उसके सहयोगी दलों को ऐसे-ऐसे मुद्दे मिल रहे हैं जिनके समक्ष कांग्रेस हमलावर नहीं रह सकती। उसके पास जवाब देने का ही विकल्प है। इस तरह विपक्ष के नाते सरकार के विरुद्ध उसके आक्रामक रहने तथा इसका चुनावी लाभ लेने की उम्मीद पर गहरा असर पड़ा है। किसी भी संघर्ष का मान्य नियम आक्रमण ही सबसे बड़ा बचाव है। मोर्चे पर आपके सामने बचाव की स्थिति जितनी पैदा होती है फतह का लक्ष्य उतना ही कमजोर होता जाता है। चुनाव परिणामों के पूर्व इस तरह का अंतिम निष्कर्ष देना जोखिम भरा है, पर कम से कम इस समय की पूरी स्थितियां ऐसी हैं।

  अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाला मामले में जांच लंबे समय से चल रहीं हैं और इसमें संदिग्ध अनेक लोगों के नाम भी हमारे सामने पहले से आ चुके हैं। पिछले वर्ष 4-5 दिसंबर को इस सौदे के बिचौलिये क्रिश्चियन मिशेल जेम्स के दुबई से प्रत्यर्पित किए जाने के बाद से कई नए तथ्य सामने आए हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने चौथा पूरक आरोप पत्र विशेष न्यायालय में प्रस्तुत किया है। क्रिश्चियन मिशेल दुबई से लेकर यहां तक यही तर्क दे रहा है उसको राजनीतिक एजेंडे के तहत फंसाया गया है। उसके आरोप का निवारण न्यायालय करेगा। किंतु, उसके द्वारा इस सौदे में दूसरे बिचौलियों तथा अगस्ता वेस्टलैंड की सहयोगी कंपनी फिनमेकेनिका के अधिकारियों को भेजे गए संदेशों में जिस तरह कुछ कूट नाम आए हैं उनसे कांग्रेस का असहज होना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए इसमें इटली की मां के पुत्र का उल्लेख है जिसके बारे में कहा गया है कि वह प्रधानमंत्री बनने वाला है। यह 2009 के पूर्व की स्थिति है। इसमें एपी, आरजी एवं एफएएम जैसे शब्द संक्षेप हैं। स्विट्जरलैंड में बिचौलिये गुइडो हैश्के की मां के घर से बरामद दस्तावेजों में ये नाम हैं। इसके साथ उस समय के मंत्रियों, नेताओं, रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों, नौकरशाहों से लेकर पत्रकारों तक के नाम हैं। कांग्रेस इसके पीछे राजनीतिक प्रतिशोध तलाश सकती है। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ईडी को इलेक्शन ढकोसला बता भी दिया। पर इससे सौदे में कांग्रेसी नेताओं के संलिप्त होने का संदेह खत्म नहीं हो जाता। एपी को अहमद पटेल माना जा रहा है तो एफएएम को फैमिली। हम इसक् बारे में निश्चयात्मक रूप से कुछ नहीं कह सकते। आरजी को रजत गुप्ता कहें या राहुल गांधी? किंतु संदेह की सूई तो घुमाई ही जा सकती है। आखिर फैमिली का मतलब क्या हो सकता है?

कांग्रेस बचाव में जितना संभव है तर्क दे रही है, कितु भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसे अपनी सभाओं में उठा रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह कि इस मामले में सरकार आक्रामक है और राजनीति में इसके मायने हम सब जानते हैं। यह संयोग है या और कुछ कि 2014 के आम चुनाव में यूपीए सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप तथा प्रियंका बाड्रा के पति रॉबर्ट बाड्रा के जमीन घोटाले बड़े मुद्दे थे और 2019 आते-आते फिर लगता है जैसे घड़ी की सूई घूमकर वहीं पहुंच रही है। अंततः प्रवर्तन निदेशालय को बाड्रा से पूछताछ करने की अनुमति न्यायालय ने दी और इसमें आई जानकारियां देश के सामने हैं। बाड्रा को अग्रिम जमानत मिली हुई है लेकिन न्यायालय उसे कभी भी रद्द कर सकता है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि ईडी, सीबीआई या आयकर विभाग की सारी कार्रवाइयां केवल राजनीतिक बदले की परिणति है, पर इसे देश भी मान लेगा कहना कठिन है। इनमें से ज्यादातर मामले यूपीए के समय ही सामने आए एवं उनकी जांच भी आरंभ हुई। कांग्रेस ने इसका रास्ता यह चुना है कि जिन नेताओं या उनसे जुड़े लोगों पर आरोप हैं उनको आरोपी न मानकर उत्पीड़ित माना जाए। ऐसे नेताओं को पूरा महत्व देकर कांग्रेस संदेश देने की कोशिश कर रही है कि जांच एजेंसियों की कार्रवाइयों या न्यायालयी प्रक्रियाओं से वह अप्रभावित है। वे सब चुनाव में पूरी तरह सक्रिय हैं।

कांग्रेस की समस्या है कि अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर सोनिया गांधी एवं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक आरोपी हैं एवं न्यायालय से जमानत पर बाहर हैं। जब इन शीर्ष नेताओं पर ही आरोप हों तो वो अन्यों पर कैसे कार्रवाई कर सकते हैं? उदाहरण के लिए पी. चिदम्बरम और उनके पुत्र कार्ति चिदम्बरम पर एअरसेल मैक्सिस एवं आईएनएक्स मामले में सीबीआई एवं प्रवर्तन निदेशालय जांच काफी आगे बढ़ा चुकी है। कार्ति तो गिरफ्तार होकर जेल भी गए, पी चिदम्बरम को न्यायालय से गिरफ्तार न किए जाने का बार-बार आदेश लेना पड़ रहा है। कांग्रेस ने कार्ति को पी. चिदम्बरम के क्षेत्र तमिलनाडु के शिवगंगा से उम्मीदवार बना दिया है। हालांकि उसका कोई सक्रिय राजनीतिक जीवन नहीं रहा है। चिदम्बरम पार्टी के मुख्य नीति-निर्धारकों में शुमार हैं। अहमद पटेल पूरी तरह सक्रिय हैं। रॉबर्ट बाड्रा के कारण प्रियंका को पहले राजनीति मं सीधे लाने से कांग्रेस बच रही थी। अब वे कांग्रेस का चेहरा बनाई जा चुकीं हैं। इसका असर नेतृत्व के आत्मविश्वास पर तो पड़ता ही है, लोगों के बीच संदेश भी वही नहीं जाता तो राजनीतिक रणनीति के रुप में पार्टी देना चाहती है। ये जहां भी सक्रिय होंगे वहां स्थानीय भाजपा एवं राजग के नेता-कार्यकर्ता इनके खिलाफ आरोपों का प्रचार करेंगे। कार्ति के खिलाफ दोनों मामलों में आरोप शिवगंगा में खूब उछल रहे हैं।

कांग्रेस के नीति-निर्धारकों में कुछ नेता ऐसे हैं जिनने अपनी सोच से भी पार्टी को नुकसान पहुंचाया है। घोषणा पत्र में देशद्रोह कानून खत्म करने से लेकर सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून में बदलाव तथा जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बलों की संख्या घटाने आदि को शामिल कर राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले पर भाजपा को पूरी तरह हमलावर बनने का आधार दे दिया है। इसमें कांग्रेस रक्षात्मक है। तज कहें तो कांग्रेस ने भाजपा  के हाथों मनचाहा मुद्दा थमा दिया है। सुरक्षा और जम्मू कश्मीर पर कांग्रेस का यह रुख बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है। इसमें कांग्रेस पार्टी के पास बचाव ही एकमात्र रास्ता है। इन रणनीतिकारों ने प्रियंका बाड्रा की उत्तर प्रदेश में धर्मनिष्ठ हिन्दू की छवि बनाने के लिए यात्रायें कराईं। किंतु अयोध्या का संदेश उल्टा गया। वो अयोध्या जाकर भी रामजन्मभूमि का दर्शन करने नहीं गईं और इस बाबत पूछने पर कहा कि यह विवाद में है। अयोध्या की राजनीति तो रामजन्मभूमि के पिच से ही खेली जा सकती है। अगर आप उसे ही बाहर करेंगे तो इसका उल्टा संदेश जाएगा। भाजपा ने इसे भी मुद्दा बना दिया है। भाजपा कह रही है कि हमारे लिए वह विवादास्पद स्थान है ही नहीं। कांग्रेस ने रामजन्मभूमि मंदिर का समर्थक होने की जो छवि बनाई थी वह प्रियंका की यात्रा से लगभग ध्वस्त हो गई है। राहुल गांधी को अमेठी के साथ केरल के वायनाड से लड़ाने का फैसला भी जोखिम भरा है। कांग्रेस कह रही है कि इससे दक्षिण भारत के तीन प्रमुख राज्यों केरल, तमिलनाडु एवं कर्नाटक पर असर होगा। ठीक इसके विपरीत संदेश यह निकल रहा है कि राहुल गांधी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में इसलिए गए हैं ताकि जीत सुनिश्चित हो सके। इसका दो विपरीत प्रभाव है। एक, राहुल पर अमेठी में जीत को लेकर आश्वस्त न होने के कारण केरल भागने का आरोप लग रहा है। विरोधी संदेश दे रहे हैं कि जब पार्टी का सबसे बड़ा नेता अपने परंपरागत क्षेत्र में ही जीत को लेकर सुनिश्चित नहीं है तो फिर देश भर में उसके अन्य उम्मीदवारों की हालत कैसी होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता  है। दूसरे, यह राहुल गांधी की पिछले दो वर्षों से निष्ठावान हिन्दू की निर्मित की गई छवि को लुंठित करने वाला कदम है। उनके नामांकन पत्र दाखिल करने के दौरान तथा उसके बाद आयोजित रोड शो में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के झंडों ने भी अपना काम किया है। भाजपा इसे कांग्रेस की मुस्लिमपरस्ती का प्रमाण बता रही है और कांग्रेस अपना बचाव कर रही है।     

इन सबका मतदाताओं पर क्या असर हो सकता है इसकी जरा कल्पना करिए और फिर निष्कर्ष निकालिए कि इस समय चुनावी रणक्षेत्र में कांग्रेस कहां खड़ी है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

"ब्यूनेस ब्यूटी एकेडमी" ने इंस्टेंट एडवांस्ड ब्यूटी कोर्स सीखने की क्लॉस शुरू की

संवाददाता

नई दिल्ली।  "ब्यूनेस ब्यूटी एकेडमी" सभी आवेदकों को बूट कैंप नामक एक 360 डिग्री स्मार्ट सैलून ग्रूमिंग कोर्स के लिए आमंत्रित कर रहा है। इस ब्यूटी पाठ्यक्रम में सभी तकनीकी और सौंदर्य सत्र शामिल होंगे जो छात्रों को सैलून प्रबंधन के हर पहलू में प्रशिक्षित करेंगे। आमतौर पर, इस तरह के पाठ्यक्रम 6 महीने से 1 वर्ष के समय अवधि में कवर किए जाते हैं, लेकिन "ब्यूनेस ब्यूटी अकादमी" में, हम समझते हैं कि समय क़ीमती हैं , इसलिए हमारे पास फ़ास्ट ब्यूटी सर्टिफिकेशन  कोर्स हैं,  CIDESCO  सर्टिफाइड ट्रेनर्स द्वारा 1.5 से 2 महीने के भीतर कैंडिडेट्स को ट्रैन किया जायेगा। इस पाठ्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय स्तर के काम की ट्रेनिंग दी जाएगी।

ब्यूटी इंडस्ट्री में हेयर स्टाइलिस्ट, ब्यूटीशियन, स्किन केयर स्पेशलिस्ट, एस्थेटिशियन, नेल टेक्नीशियन जैसे कई व्यवसाय हैं। उनकी ड्यूटी हेयर स्टाइलिंग, कलरिंग, पेडीक्योर, मैनीक्योर, फेशियल ट्रीटमेंट से लेकर अन्य स्पा ट्रीटमेंट में भिन्न होती है। इनके अलावा, कई अन्य त्वचा और हेयर उपचार हैं जो उपस्थिति को बढ़ाने के लिए अन्य उपकरण जैसे वैक्यूम, गैल्वेनिक मशीन आदि के माध्यम से किए जाते हैं। यह सौंदर्य उद्योग को आगे बढ़ने के लिए कैरियर विकल्पों की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदान करता है। बूट कैंप का मुख्य उद्देश्य ब्यूटी कोर्स के लिए सैलून प्रबंधन का व्यापक ज्ञान-आधार प्रदान करना और फ्रेशर्स के साथ-साथ प्रोफेशनल कैंडिडेट्स  से  100% संतोषजनक सेवा प्रदान करने में मदद करना है।

भारत में, एक फ्रेशर सालाना 1.5 से 2 लाख तक की आय के साथ एक अच्छा  काम शुरू कर सकता है। अगर हाथ में एक प्रोफेशनल डिग्री हो तो वह प्रति वर्ष 6 लाख की आय की उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन पैकेज प्रमुख रूप से कोर्स द्वारा चुने गए विशिष्ट खंड पर निर्भर करता है। पहले भी, ब्यूनेस ने अपने छात्रों को भारत और दुबई के हाई-एंड सैलून जैसे अच्छे प्लेसमेंट में मदद की है।

पात्रता मानदंड: सौंदर्य उद्योग की सेवा के लिए रुचि और जुनून फ्रेशर्स, साथ प्रोफ़ेशनल भी आवेदन कर सकते हैं।

पता: गुरुग्राम और सूरत


शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

कांग्रेस के लिए वायनाड के खतरे बड़े हैं

 अवधेश कुमार

वायनाड को तमिल और मलयालम के शब्द नाड का विस्तार माना जाता है जिसका अर्थ होता है धान की खेती। किंतु इस समय तो केरल का वायनाड राजनीति का चर्चित खेत बन गया है। राहुल गांधी का अमेठी के साथ वायनाड से चुनाव लड़ने के कारण यह सर्वाधिक हौट सीटों में से एक हो चुका है। साफ है कि एडक्कल गुफाओं, झरनों वं अन्य पर्यटक स्थलों के कारण प्रसिद्ध वायनाड चुनाव तक मुख्य चर्चा का केन्द्र बना रहेगा। चूंकि यहां की कुछ चोटियां समूह समुद्र तल से 2100 मीटर तक उंची हैं, इसलिए यह ट्रैकिंग के लिए भी लोकप्रिय है। राहुल गांधी के उम्मीदवार बनने के बाद यह तत्काल राजनीतिक ट्रैकिंग का क्षेत्र भी बन गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटोनी के अनुसार पिछले कई हफ्ते से मांग उठ रही थी कि राहुल दक्षिण भारत से भी चुनाव लड़ें। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक से नेताओं के ऐसे बयान आए जिनमें राहुल गांधी को अपने राज्य से चुनाव लड़ने का आमंत्रण दिया गया था। ऐसे आमंत्रणों को सार्वजनिक कराने के पीछे मुख्यतः पार्टियों की राजनीतिक रणनीति की भूमिका सर्वोपरि होती है। इससे एक वातावरण बनाकर घोषणा की जाती है ताकि लगे कि वाकई उनके नेता की इतनी लोकप्रियता है कि कई राज्य एक साथ उनको चुनाव लड़ने के लिए अपने यहा बुला रहे हैं।

राहुल गांधी को राष्ट्रीय स्तर पर बड़े कद का नेता साबित करना कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति है और उसके तहत पिछले तीन सालों में काफी कुछ किया गया है। यह कदम भी उसी रणनीति का अंग है। वैसे भी अमेठी के लोगों को सामान्य तौर पर समझाना शायद कठिन होता कि परिवार की परंपरागत सीट के साथ उन्हें दूसरी किसी सीट से लड़ने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई। अब वे कह सकते हैं कि जनता और कार्यकर्ताओं की मांग को देखते हुए उन्हें ऐसा करना पड़ा है। अमेठी में 2009 के मुकाबले 2014 में जीत का अंतर काफी कम हो जाने और 2017 में यहां की सारी विधानसभा सीटें हार जाने के तर्क को हम परे रखते हैं। राहुल अमेठी में पराजय के डर से भागेंगे यह नहीं माना जा सकता। तो फिर? नेताओं के दो सीटों से लड़ने का यह कोई पहला मामला नही है। इसलिए राहुल का यह कदम असामान्य नहीं है। किंतु दो स्थानों से लड़ने के पीछे कुछ अन्य कारण भी होते हैं। मसलन, 2014 में नरेन्द्र मोदी वडोदड़ा और वाराणसी दो जगह से लड़े। वे तब गुजरात छोड़ने का संदेश नहीं देना चाहते थे तथा वाराणसी से पूरे उत्तर प्रदेश में पार्टी के पक्ष में बेहतर माहौल की कल्पना थी। निश्चय ही कांग्रेस यह संदेश तो देना ही चाहती है कि उनके नेता की उत्तर के अलावा दक्षिण में भी लोकप्रियता है। इसके साथ दक्षिण के राज्यों में पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने की भी सोच निहित होगी। कांग्रेस भारत की सबसे बड़ी पार्टी तभी तक थी जब तक उत्तर के अलावा दक्षिण में भी उसका प्रभाव था। 1977 में पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस साफ हो गई लेकिन आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु में पार्टी का प्रदर्शन शानदार रहा। 2009 में यदि कांग्रेस 1991 के बाद पहली बार 200 पार कर पाई तो इसका एक कारण दक्षिण में उसका प्रदर्शन ठीक-ठाक था। केरल में उसे तब 13 सीटें मिलीं थीं।

कांग्रेस वायनाड के चुनाव के पीछे इसके सांस्कृतिक और भौगोलिक महत्व को उल्लिखित करती है। वास्तव में केरल का भाग होते हुए भी वायनाड सीट की सीमा एक ओर कर्नाटक के मैसूर और चामराजनगर तथा दूसरी ओर तमिलनाडु के नीलगिरि क्षेत्र से लगती है। पार्टी मानती है  कि राहुल का यहा से चुनाव लड़ना एक तरह से पूरे दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व होगा। कांग्रेस का तर्क मान लेते हैं। किंतु वायनाड ही क्यों का जवाब इतने से नहीं मिलता। एक बड़ा कारण तो यही है कि कांग्रेस के लिए यह सुरक्षित सीट है। परिसीमन के बाद 2009 में वायनाड अस्तित्व में आया था और तब से दोनों बार उसकी ही विजय हुई। 2009 में भाजपा को 3.85 प्रतिशत एवं 2014 में 8.83 प्रतिशत मत मिला। यह 2009 में चौथे एवं 2014 में तीसरे स्थान पर थी। हालांकि केरल में भाजपा का जनाधार इस बीच काफी विस्तृत हुआ है। बावजूद वह अपने गठबंधन के साथ इस सीटे से बहुत बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद नहीं कर सकती। इसलिए हम इसकी चर्चा यहीं छोड़ते हैं। तो सुरक्षित सीट एक प्रमुख कारण लगता है। लेकिन यह सुरक्षित है क्यों? वस्तुतः मुख्य बात वहां के सामाजिक समीकरण की है। दरअसल, वायनाड संसदीय क्षेत्र में वायनाड एवं मल्लपुरम की तीन-तीन विधानसभा क्षेत्र और कोझिकोड की एक विधानसभा सीट आती है। मल्लपुरम की आबादी में 70.04 प्रतिशत मुस्लिम एवं 27.5 प्रतिशत हिन्दू हैं। यहां 2 प्रतिशत ईसाई भी हैं। वायनाड लोकसभा क्षेत्र में हां 56 प्रतिशत मुसलमान एवं 44 प्रतिशत हिन्दू एवं ईसाई हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा यानी यूडीएफ में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग भी शामिल है जिसका यहां अच्छा प्रभाव है। कहने का तात्पर्य यह कि यहां की मुस्लिम आबादी राहुल के लिए इसे सुरक्षित सीट बना देती है।

इस सच को समझने के बाद आप कांग्रेस की रणनीति को लेकर सही निष्कर्ष निकाल सकते हैं। केरल में लोकतांत्रिक मोर्चा एवं वाममोर्चा दोनों के बीच मुस्लिम मतों को लेकर प्रतिस्पर्धा रही है। वहां भाजपा के मजबूत न होने के कारण संघ के कार्यकर्ताओं के बड़े वर्ग का मत भी इन दोनों मोर्चा के उस घटक की ओर जाता था जो मुसलमान उम्मीदवारों को हरा सकते थे। अब स्थिति बदली है। पिछले सालों में भाजपा यहां मजबूत हुई है। हिन्दुओं के बड़े तबके का आकर्षण यहां भाजपा बनी है। इसी कारण सबरीमाला पर भाजपा के आक्रामक होने के था कि पराजय का राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य कारण पार्टी की हिन्दू विरोधी एवं मुस्लिमपरस्त छवि बन जाना था। इसका लाभ भाजपा को मिला। इसे खत्म करने के लिए राहुल गांधी की निष्ठावान हिन्दू की छवि निर्माण करने की सुनियोजित कोशिशें हुईं हैं। पिछले वर्ष तीन राज्यों में विजय के बाद उसे शायद इस रणनीति के सफल होने का अहसास भी हुआ है। इसीलिए प्रियंका बाड्रा को भी उसी रास्ते पर चलाया जा रहा है। किंतु कांग्रेस के हिन्दुत्व की सीमा है। वह चुनावों में मुस्लिम मत खिसक जाने का जोखिम भी नहीं उठाना चाहती। चुनाव आते-आते केरल से उसे अपना आवरण बदलना पड़ रहा है। आंध्र एवं तेलांगना में भी उसकी यही दशा है। तो राहुल मुस्लिम बहुल क्षेत्र से खड़ा होकर यह संदेश देने की भी कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस ने उनका साथ छोड़ा नहीं है। इस तरह राहुल का वायनाड से लड़ना कांग्रेस के हिन्दुत्व एवं उसके परंपरागत सेक्यूलरवाद, जिसका व्यवहार में अर्थ मुस्लिमपरस्तता हो गया था, के बीच झूलने का परिचायक है।

भाजपा ने इस पहलू को मुद्दा बना भी दिया है। इसलिए वायनाड राहुल जीत तो सकते हैं, क्योंकि वहां मुसलमान वामोर्चा की जगह उनको प्राथकिता देंगे। मुसलमानों को भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी ही दिखाई देंगे। किंतु ऐसा न हो कि दूसरे राज्यों में इसके विपरीत संदेश चले जाएं। भाजपा ने इसे जिस तरह मुद्दा बनाया है उसमें इसकी संभावना बढ़ रही है। दो नावों की सवारी हमेशा खतरनाक होती है। वामोर्चा के नेताओं ने राहुल एवं कांग्रेस के इस रवैये पर जितना तीखा हमला बोला है उसके मायने भी है। वे प्रश्न उठा रहे हैं कि कांग्रेस को अगर भाजपा के खिलाफ लड़ना है तो उसे यह सीट चुनने की क्या जरुरत थी? यहां तो वह हमसे लड़ रही है, इसलिए हम राहुल को हराने के लिए काम करेंगे। नरेन्द्र मोदी और भाजपा के खिलाफ एकजुटता का रोमांस तो पहले ही खत्म हो रहा था, केरल से उसका एक कर्कश स्वर और जुड़ गया है। यह विपक्ष के बिखराव ही नहीं, अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए एक दूसरे के विरुद्ध ही भिड़ जाने का संदेश देने वाला कदम है। इसका कुछ न कुछ मनोवैज्ञानिक असर तो देश भर के मतदाताओं पर होगा। और जो होगा वह कांग्रेस के अनुकूल तो नहीं ही हो सकता। राहुल गांधी और कांग्रेस के रणनीतिकारों को न भूलना चाहिए कि सोनिया गांधी को भी 1999 में अमेठी के अलावा कर्नाटक में कांग्रेस के लिए तब तक सबसे सुरक्षित सीट बेल्लाड़ी से लड़ाया गया था। वे वहां से जीतीं और कर्नाटक में उसे 18 सीटें भी मिलीं लेकिन अन्य राज्यों में उसका प्रदर्शन खराब रहा तथा कांग्रेस ने तब तक की सबसे कम 114 सीटें जीतने का रिकॉर्ड बना लिया।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

रविवार, 31 मार्च 2019

बसंत यादव के परिवार को 10 लाख रुपये की सहायता दिलवाई

संवाददाता

नई दिल्ली। बीएसईएस में आउटसोर्सिंग व ए एम सी  आधार पर काम करने वाले कर्मचारी अपनी जान पर खेलकर कार्य करते हैं। कभी-कभी तो कर्मचारियों की कार्य करती समय जान तक चली जाती है पर बीएसईएस में ऐसे कर्मचारियों की कोई गिनती नहीं होती। ऐसे कर्मचारी को कोई अपना मानने को तैयार नहीं होता है।
12.02.2019 को नूर-ए-इलाही ग्रिड में एक कर्मचारी जिसका नाम बसंत यादव था वह वहां ड्रिल का कार्य करते समय हाई टेंशन तार की चपेट में आ गया और वह 90 प्रतिशत जल गया जिससे उसे नाजुक हालत में अस्पताल में भर्ती करवाया गया परंतु वह बच नहीं पाए और 1 अप्रैल 2019 को अस्पताल में दम तोड़ दिया।
तभी मजदूरों के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं डेसू मजदूर संघ, दिल्ली विधुत बोर्ड एम्पलाॅइज यूनियन व कर्मचारी यूनियन वालों ने ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर करवाई और इनको हक दिलवाने के लिए आवाज उठाई। मजदूरों के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं के पदाधिकरियों व सदस्यों ने मैनेजमेंट के अधिकारियों से बातचीत करके बसंत यादव के परिवार को 10 लाख रुपये की सहायता राशि दिलवाई। इस कार्य में सौरभ सूदन, किशन यादव, विशेम्बर दत्त, सुभाष चंद, भूले राम, राजेन्द्र चैहान, ओमपाल, मनीष कटारिया, पवन कुमार व अब्दुल रज्जाक के साथ समस्त बीवाईपीएल के कर्मचारी और अधिकारियों का सहयोग रहा।

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

भारत बना अंतरिक्ष सामरिक महाशक्ति

 अवधेश कुमार

27 मार्च इतिहास के महत्वपूण अध्याय में दर्ज हो गया हे। भारत ने जैसे ही 300 कि. मी. पृथ्वी की कक्षा में लाइव लियो उपग्रह को निशाना बनाकर ध्व्सत किया अंतरिक्ष सामरिक क्षेत्र की चौथी महाशक्ति बन गया। अभी तक यह क्षमता अमेरिका, रुस और चीन को हासिल थी। जब 11 जनवरी 2007 को चीन ने धरती से छोड़े गए मध्यम दूरी के बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र द्वारा अंतरिक्ष में 537 मिल यानी 865 किलोमीटर पर स्थित अपने मौसम संबंधी पुराने उपग्रह को नष्ट किया तो दुनिया में हंगामा मचा था। 12 वर्षों बाद भारत ने वही क्षमता हासिल की है। हालांकि राजनीति ने भारत की इस महान वैज्ञानिक उपलब्धि को थोड़ा फीका किया हे लेकिन इससे जो कुछ हो गया उसका महत्व खत्म नहीं हो जाता। दुनिया के प्रमुख देश भौचक्क हैं कि आखिर भारत ने ऐसा कैसे कर लिया। जिस तरह 1998 में नाभिकीय परीक्षण हो जाने के पहले दुनिया को भनक तक नहीं लगी ठीक वैसे ही इस मामले में हुआ है।

यह कोई सामान्य उपलबिध नहीं हे। लाइव उपग्रह तीव्र गति से अपने कक्ष में चक्कर लगाते रहते हैं। पृथ्वी की अपनी गति है। उसमें निशाना लगाना आसान नहीं होता। यह वैसे ही है जैसे रायफल से निकली हुई गोली को दूसरी गोली से निशाना बनाना। सिर्फ तीन मिनट में सफलतापूर्वक ऑपरेशन पूरा किया गया। भारत ने ऐसा करके दुनिया में अंतरिक्ष सामरिक क्षमता की अपनी धाक जमा लिया है। उपग्रह रोधी मिसाइल या ए सैट यानी एंटी सेटेलाइट मिसाइल विकसित करना सामान्य होता तो फ्रांस रुस जर्मनी जापान जैसे देश ऐसा कर चुके होते थे। इसके लिए भारत को कहीं से भी तकनीकी सहयोग नहीं मिलना था। लेकिन हमारे वैज्ञानिकों ने सम्पूर्ण स्वदेशी तकनीक और अुसंधान पर आधारित अग्नि मिसाइल और अडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम को मिलाकर ए सैट मिसाइल प्रणाली तैयार कर दिया। आम मिसाइल में वारहेड अपने लक्ष्य से टकराते हैं और विस्फोट में नष्ट कर देते हैं। भारत ने एंटी सेटेलाइट मिसाइल यानी उपग्रह रोधी मिसाइल में बिना विस्फोटक यानी बारुद के उपग्रह को नष्ट करने का काम किया है। इसमें काइनेटिक उर्जा का उपयोग हुआ जिसमें केवल भौतिक प्रतिक्रिया से उपग्रह नष्ट होते हैं। तो हमारे पास उपग्रह रोधी मिसाइल आ गया है। वैसे आजतक किसी भी युद्ध में इस तरह के हथियारों का उपयोग नहीं किया गया है। लेकिन अब यह जरुरी हो गया है। इस श्रेणी के मिसाइल का उपयोग केवल उपग्रह नष्ट करने तक ही सीमित नहीं है। इससे आकाश से लेकर धरती पर किसी भी गतिमान अस्त्र का पीछा कर उसे नष्ट करने की क्षमता हमारे पास आ गई है। उपग्रह काफी छोटे होते हैं। जब उनको नष्ट किया जा सकता है तो उस तरह की छोटा कोई भी लक्ष्य वेधा जा सकता है।

वस्तुतः 2012 में जब हमने अग्नि 5 मिसाइल का परीक्षण किया उसके बाद ही ऐसा करने की क्षमता आ गई थी। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के पूर्व अध्यक्ष वी. के. सारस्वत तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व अध्यक्ष माधवन नायर ने कहा है कि तत्कालीन सरकार के साहस न दिखाने के कारण भारत को इतना समय लगा। बकौल सारस्वत उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सहालकार एवं राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सामने पूरा प्रेंजेंटेशन दिया था। बहुत ध्यान से सुना देखा गया लेकिन हरि झंडी नहीं मिली। सरकार बदलने के बाद यही प्रेजेंटेशन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने प्रस्तुत किया गया तो उन्होंने आगे बढ़ने की अनुमति दे दी और परिणाम सामने है। भारत ने मिशन शक्ति कोड नाम से इस पर काम आरंभ किया। छः महीने से 300 वैज्ञानिक इस मिशन में लगे थे। देश की सुरक्षा और सामरिक शक्ति को बढ़ाने के लिए बहुत साहस की आवश्यकता है। भारत अंतरिक्ष में हथियार होड़ का पक्षधर कभी नहीं रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपने संबोधन में कहा कि मैं विश्व समुदाय को आश्वस्त करना चाहता हूं कि हमने जो यह नई क्षमता हासिल की है, वह किसी के विरुद्ध नहीं है। भारत अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ के विरुद्ध रहा है। हम अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण विकास के लिए उपयोग करने की नीति पर कायम हैं। हम कभी भी युद्ध को बढ़ावा नहीं दंेगे। हमारा कदम बिल्कुल सुरक्षात्मक है। वास्तव में यह संक्षिप्त अंतरिक्ष सामरिक डॉक्ट्रिन यानी सिद्धांत हो गया। भारत के जिम्मेवार रिकॉर्ड को देखते हुए पाकिस्तान के अलावा कोई शंका उठा भी नहीं सकता है। चीन ने जब ऐसा किया तो जापन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। अमेरिका ने कहा था कि चीन का कदम शांति की उसकी घोषित नीति के अनुमूल नहीं है। तो यह भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि एवं प्रमुख देशों के साथ विश्वसनीय संबंधों की परिणति है कि तीखी प्रतिक्रिया हमारे खिलाफ नहीं आ रही है।

यह सुरक्षात्मक, क्षेत्रीय-अंतरराष्ट्रीय सामरिक शक्ति संतुलन तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से भी बहुआयामी उद्देश्यों वाला कदम है। भारत अंतरिक्ष की एक प्रमुख शक्ति है। अलग-अलग उपयोगों के लिए हमारे उपग्रह अंतरिक्ष में सक्रिय हैं। जीवन के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उपग्रहों की भूमिका है और हमारे उपग्रह रक्षा, आपदा प्रबंधन, टेलीविजन, मोबाइल, रेडियो, मनोरंजन, कृषि, मौसम की जानकारी, नेविगेशन, शिक्षा, मेडिकल आदि हर क्षेत्र में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इतने विस्तार के बाद इनकी सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है। जब 12 वर्ष पहले चीन ने यह साबित कर दिया कि वह अंतरिक्ष में किसी भी मिसाइल को मार गिरा सकता है तो फिर हम आंखें मूंदकर नहीं रह सकते। हमें अपने उपग्रहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य था। जासूसी के लिए भी उपग्रहों का इस्तेमाल होता है। अब कोई हमारे क्षेत्र में ऐसा साहस नहीं कर पाएगा। भारत अनेक देशों का उपग्रह प्रक्षेपित करता है। उनके लिए संदेश है कि समय आने पर भारत उनके उपग्रहों की रक्षा भी कर सकता है। एशिया में चीन को अकेले इस मामले मे महाशक्ति रहने देना शक्ति संतुलन के सिद्धांत के विपरीत है। भारत सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए प्रयासरत है तो उसे हर दृष्टि से अपनी क्षमता दर्शाने की आवश्यकता है। वर्तमान विश्व व्यवस्था में आर्थिक विकास के साथ सामरिक क्षमता ही महाशक्ति बनकर वैश्विक भूमिका निभाने की अर्हंता हो चकी है। अब भारत जल, नभ, थल के साथ अंतरिक्ष की सामरिक क्षमता भी हासिल कर चुका है। नाभिकीय ताकत तो हम हैं हीं।

कहने का तात्पर्य यह कि भारत ने इस उपलब्धि से अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल किया है। इससे राष्ट्र का अपनी क्षमता के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है तथा गौरवबोध होता है। तो यह क्षण भारत के प्रति आत्मगौरव का बोध कराने वाला है जिसे राजनीति मलीन कर रही है। राजनीति को परे रखकर देश की महान उपलब्धि में सहभागी होने की बजाय हम आपस में आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हैं। विपक्षी दलों की समस्या है कि प्रधानमंत्री ने इसकी घोषणा क्यांें की? दुर्भाग्यपूर्ण आपत्ति है। प्रधानमंत्री को छोड़कर ऐसे मामलों पर देश और दुनिया को संबोधित कौन कर सकता था? इसमें अपनी उपलब्धियों को बताने के साथ भारत की अंतरिक्ष सामरिक नीति के बारे में दुनिया के आश्वस्त भी करना था। यह भूमिका राजनीतिक नेतृत्व ही निभा सकता था। किंतु भारत की राजनीति जिस अवस्था में पहुंच गई है उसमें इससे परे कुछ सकारात्मक उम्मीद कर भी नहीं सकते। चीन ने जब यह कारनामा किया तो तो वहां से कभी एक शब्द विरोध मे ंनहीं आया। आ भी नहीं सकता था। अमेरिका ने 26 मई 1958 से 13 अक्टूबर 1959 के बीच 12 परीक्षण किए, लेकिन ये सभी असफल रहे थे। वहां किसी ने प्रश्न नहीं उठाया कि ऐसा क्यों हो रहा है। रुस जब सोवियत संघ था तो उसने अंतरिक्ष की सामरिक महाशक्ति बनने का अभियान चलाया। वह भी आरंभ में सफल नहीं हुआ। 1967 से 1982 तक उसने ऐसे अनेक सफल परीक्षणें किए। इस बीच अमेरिका ने भी सफलतायें हासिल कीं। खासकर रोनाल्ड रेगन के के काल में तो लगातार परीक्षण हुए। अमेरिका द्वारा अंतिम बार 13 सितंबर 1985 को उपग्रह विरोधी परीक्षण किया गया था। तत्कालीन दोनों महाशक्तियों की भूमिका से ऐसा लगने लगा मानो अंतरिक्ष युद्ध आरंभ हो जाएगा। आज अंतरिक्ष में उस तह शस्त्र की होड़ नहीं है तो उसका कारण इन देशों का संतृप्त अवस्था में पहुंच जाता है। अंतरिक्ष का इतना विकास हो चुका है कि दुनिया के अतीत और वर्तमान चरित्र को देखते हुए हम यह मानकर नहीं चल सकते कि कभी वहां जोर आजमाइश नहीं होगी। इसलिए हमें हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092,दूरभाषः0112483408, 9811027208

 

 

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