शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

गति पकड़ चुकी है अर्थव्यवस्था

अवधेश कुमार

जिस तरह का राजनीतिक विमर्श में देश में चल रहा है उसे स्वीकार कर लिया जाए तो आम जनता के मानस पटल पर यही अंकित होगा कि भारत हर मामले में अंधकार की गर्त में जा रहा है। वास्तव में देश की असली तस्वीर राजनीतिक वाद-प्रतिवाद से परे है। अगर दुनिया के प्रमुख संस्थानों के आकलनों को आधार बनाएं तो भारत का आर्थिक आधार इतना मजबूत हो रहा है कि वह कुछ दशकों में महाशक्ति की कतार मेें आ सकता है। हालांकि हम वर्तमान अंतर्राष्टीय आर्थिक और वित्तीय ढांचे को अंतिम रुप में विश्व के लिए कल्याणकारी नहीं मानते। भारत ने उसी ढांचे के साथ समायोजन करने की दिशा में जुलाई 1991 से कदम बढ़ाया और यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसलिए हमें मूल्यांकन इसी ढांचे के अंतर्गत करना होगा। जो राजनीतिक दल यह माहौल बना रहे हैं कि भारत तो विकास में पिछड़ गया, हर ओर हाहाकार है, अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गया.....वे शत-प्रतिशत निराधार है। ध्यान रखिए, वो सब इस ढांचे से बाहर की बात नहीं कर रहे हैं। आज कोई भी राजनीतिक दल बाजार आधारित वैश्विक अर्थव्यस्था से अलग सोच रखती ही नहीं। हम यह तो कह सकते हैं कि जहां हमें होना चाहिए वहां हम नहीं हैं, किंतु सच यह है कि अर्थव्यवस्था के किसी मानक पर इस समय भारत की स्थिति निराशाजनक नही है। 

 इस समय वर्तमान वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) का जो आर्थिक आंकड़ा है वह हर किसी की अपेक्षा से ज्यादा बेहतर है। सरकार भी शायद यह उम्मीद नहीं कर रही थी कि देश का सकल घरेलू उत्पाद 8.2 प्रतिशत की दर से बढ़ सकता है। रॉयटर्स के अर्थशास्त्रियों ने इस तिमाही 7.6 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद का अनुमान व्यक्त किया था। यह पिछले 2 साल में सबसे ऊंची विकास दर है। इससे पहले 2015-16 की जनवरी-मार्च तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में सर्वाधिक तेज वृद्धि हुई थी। उस दौरान विकास दर 9.3 प्रतिशत रही थी। पिछले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही मंे तो विकास दर 5.59 प्रतिशत तक गिर गई थी। यह भी ध्यान रखिए कि विकास दर लगातार चौथी तिमाही में बढ़ी है। पिछली तिमाही यानी जनवरी से मार्च में विकास 7.7 प्रतिशत रही थी। अक्टूबर से दिसंबर 2017   में 7 प्रतिशत, जुलाईसे सितंबर 2017 में   6.3 प्रतिशत थी। इससे तुलना करिए कि और फिर निष्कर्ष निकालिए हम आगे बढ़ रहे हैं या पीछे खिसक रहे हैं।

इस विकास दर का महत्व यह है कि दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था का भारत का जो पद हासिल था वह बिल्कुल सुरक्षित हो गया है। भारत के बाद चीन का स्थान है। चीन ने दूसरी तिमाही में 6.7 प्रतिशत की विकास दर हासिल की है। चीन और भारत मेें अंतर यह है कि वहां जनवरी से दिसंबर का वित्तीय कैलेंडर लागू है, जबकि भारत में अप्रैल से मार्च का वित्तीय कैलेंडर चलता है। अभी भी चीन की अर्थव्यवस्था का आकार हमसे बहुत ज्यादा है जहां तक पहुंचने में हमें काफी पसीना बहाना होगा। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि अर्थशास्त्रियांे के सुझाव पर मोदी सरकार ने 2015 में सकल घरेलू उत्पाद की गणना के लिए आधार वर्ष 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया था। तो आलोचक कहेंगे कि उस आधार वर्ष से विकास दर इतना हुआ नहीं। किंतु दुनिया इस बदलाव को स्वीकार कर चुकी है। हर देश में ऐसा होता है जब अर्थव्यवस्था के मापन का आधार वर्ष कुछ अंतराल पर बदला जाता है। हमारी अर्थव्यस्था का आकार 2011-12 की स्थिर कीमतों के आधार पर 2018-19 की पहली तिमाही में करीब 33.74 लाख करोड़ रुपये है। यह पिछले साल की पहली तिमाही में 31.18 लाख करोड़ रुपये थी। यही 8.2 प्रतिशत की विकास दर दर्ज होने का कारण है। वर्तमान वित्त वर्ष की पहली तिमाही में ग्रॉस वेल्यू एडेड (जीवीए) यानी सकल मूल्य सवंर्धित विकास दर 8 प्रतिशत रही है। सकल घरेलू उत्पाद के माध्यम से उपभोक्ताओं और मांग के दृष्टिकोण से किसी देश की आर्थिक गतिविधियों की तस्वीर बनती है जबकि इसके उलट जीवीए के जरिए निर्माताओं या आपूर्ति के लिहाज से आर्थिक गतिविधियों की तस्वीर।

 अब यह समझें कि इस विकास दर के पीछे किन-किन क्षेत्रों का योगदान है। यह जानना इसलिए जरुरी है कि विकास दर अर्थव्यस्था की समस्त गतिविधियों को समेटे होता है। वर्तमान वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7 प्रतिशत से ज्यादा की विकास दर देने वालों में विनिर्माण, निर्माण, बिजली, गैस, जल आपूर्ति, रक्षा, अन्य उपयोगी सेवाएं आदि क्षेत्र शामिल हैं। विनिर्माण में सबसे ज्यादा 13.5 प्रतिशत की विकास दर रही। निर्माण में 8.7 प्रतिशत की विकास रही। ये दोनों आंकड़े पिछले सारे अनुमानों से बहुत ज्यादा हैं। विनिर्माण की विकास दर पिछले साल 1.8 प्रतिशत रही। हां, खनन क्षेत्र में 0.1 प्रतिशत की ही बढ़ोत्तरी हुई। किंतु भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा लोगों का पालन करने वाली कृषि में 5.3 प्रतिशत विकास दर्ज की गई। यह बहुत बड़ी बात है। पिछले साल इस अवधि में कृषि विकास दर 03 प्रतिशत तक सिमटी थी। वित्तीय क्षेत्र 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ा। विनिर्माण क्षेत्र का मतलब अर्थशास्त्री वेहतर समझते हैं। इसक मतलब अर्थव्यवस्था के वर्तमान ढांचे के कई महत्वपूर्ण अंगों का आगे बढ़ने की दिशा में गतिशील होना है। बुनियादी उद्योगों का का विकास दर 6. 6 प्रतिशत रहा है। इसमें कोयला, सीमेंट, रिफायनरी उत्पाद और उर्वरकों का योगदान है। पिछले साल जुलाई में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर 2.9 प्रतिशत थी।

अर्थव्यवस्था के इतने महत्वपूर्ण क्षेत्र यदि गतिशील हैंं तो इसका अर्थ यह है कि देश में व्यापक पैमाने पर रोजगार सृजन भी हुआ है। विनिर्माण और निर्माण दोनों मिलाकर संगठित क्षेत्र में सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं। बिना व्यक्तियों के काम किए तो इसकी वृद्धि हुई नहीं होगी। इसके साथ देश की कर आय भी जुड़ी है। कृषि का तो रोजगार से सीधा लेना-देना है। बुनियादी क्षेत्र तभी गतिशील होता है जब उसकी मांग बढ़ती है। और मांग का मतलब है अन्य क्षेत्रों का तेज विकास। कहने का अर्थ यह अर्थव्यवस्था की तस्वीर हाहाकार और छाती पीट से बिल्कुल अलग है।

ऐसा नहीं है कि दुनिया हमें स्वीकार नहीं रही। दो उदाहरण देखिए। पिछले 11 जुलाई को विश्व बैंक ने यह रिपोर्ट दिया कि भारत फ्रांस को पीछे छोड़कर दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। फ्रांस की अर्थव्यवस्था 2017 में 2.58 खरब डॉलर (177 लाख करोड़ रुपए) थी। भारत की अर्थव्यवस्था इससे ज्यादा 2.59 खरब डॉलर (178 लाख करोड़ रुपए) रही। यह पिछले साल की बात है जब नोटबंदी और जीएसटी के आरंभिक चोट से देश धीरे-धीरे उबर रहा था। वर्ल्ड बैंक ग्लोबल इकोनॉमिक्स प्रॉस्पेक्टस रिपोर्ट यानी विश्व बैंक वैश्विक आर्थिक संभावनाएं रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी और फिर जीएसटी के बाद आई मंदी से भारत की अर्थव्यवस्था उबर रही है। जाहिर है, इस वर्ष के अंत तक हमारी अर्थव्यवस्था का आकार और बढ़ेगा। हालांकि भारत की आबादी 134 करोड़ और फ्रांस की 6.7 करोड़ है। विश्व बैंक ने कहा है कि आबादी के कारण भारत के मुकाबले फ्रांस में प्रति व्यक्ति आमदनी 20 गुना ज्यादा है। विश्व बैंक ने यह भी कहा है कि भारत 2032 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। रिपोर्ट तैयार करने वाले विश्व बैंक के निदेशक अहयान कोसे के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है और इसमें टिकाऊ विकास देने की क्षमता है। अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी और निवेश बढ़ने से भारत का सकल घरेलू उत्पाद मजबूत हुआ है। एक अन्य रिपोर्ट वर्ल्ड पावर्टी क्लॉक औफ ब्रुकिंग्स की आई है। इसमें विश्व भर की गरीबी का आकलन है। इसमें कहा गया है कि अब भारत दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब जनसंख्या वाला देश नहीं है। भारत में जहां 7 करोड़ आबादी बेहद गरीब में है, वहीं नाईजीरिया में 8.7 करोड़ लोग बेहद गरीब हैं। नाईजीरिया में जहां हर एक मिनट में छह लोग गरीबी में धकेले जा रहे हैं, वहीं भारत में हर मिनट में 44 लोग गरीबी से बाहर आ रहे हैं। ऐसी और भी कई रिपोर्टें हम यहां उद्वृत कर सकते हैं।

तो यह है मान्य वैश्विक रिपोर्टो में भारत की अर्थव्यवस्था एवं इसकी क्षमता की वर्तमान एवं भविष्य का आकलन जो बताता है कि हम सतत सोपानों को लांघते हुए आगे बढ़ रहे हैं। निस्संदेह, कई क्षेत्रों पर फोकस करके काम करने की आवश्यकता है। यूपीए के अंतिम पांच सालांे में जर्जर हो चुकी बैंकिंग व्यवस्था को संभालना है, जीएसटी व्यवस्था को और स्थायित्व देना है। रुपया जैसे दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण करेंसियों के मुकाबले मजबूत है उसी तरह अमेरिकी डॉलर के साथ भी उसे मजबूती से सामना करने योग्य बनाना है। किंतु सारे तथ्यों का तटस्थ अवलोकन यही निष्कर्ष देता है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत आधार बनाती हुई आगे दौड़ने की पटरी पर आकर गति पकड़ चुकी है। कामना करिए कि रास्ते में कोई बड़ा अवराध न आए, कोई दुर्घटना न हो।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पलेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

देश की छवि बट्टा लगाने की भूमिका

 

अवधेश कुमार

इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है कि सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली तथा इस समय भी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के बाद दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष विदेश की धरती पर जाकर लगातार ऐसे बयान दें जिनसे न केवल देश की छवि को बट्टा लगे बल्कि वे स्वयं हास्य के पात्र बन जाएं। वास्तव में अत्यंत दुख के साथ हर विवेकशील भारतीय को यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि राहुल गांधी ने जर्मनी के हैम्बर्ग से लेकर लंदन तक के अपने बयानों में भारत को वाकई नीचा दिखाने की भूमिका अदा की है। हालांकि कांग्रेस पार्टी के पास अपने अध्यक्ष के वक्तव्यों की रक्षा करने तथा उसके पक्ष में तर्क देने के अलावा कोई चारा नहीं है, लेकिन पार्टी के अंदर भी आम सोच यही होगी कि राहुल जी को इस तरह नहीं बोलना चाहिए। वैसे भी वो देश की स्थिति का जैसा डरावाना दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं वह सच नहीं है। आम भारतीय यह समझ रहा है कि राहुल गांधी विदेश में भी एक विपक्षी नेता की तरह ऐसे आरोप सरकार पर लगा रहे हैं जिनसे मोदी विरोध की जगह देश का विरोध हो रहा है। पता नहीं यह समझ राहुल गांधी और उनके सलाहकारों-रणनीतिकारों के अंदर क्यों नहीं पैदा हो रही?

हैम्बर्ग के बुसेरियस समर स्कूल में हुए कार्यक्रम में राहुल ने कहा कि दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों को अब सरकार से कोई फायदा नहीं मिलता। उनको फायदा देने वाली सारी योजनाओं का पैसा चंद बड़े कॉर्पाेरेट के पास जा रहा है। क्या इसे स्वीकार किया जा सकता है? आप देखेंगे इनके कल्याण की योजनाओं की राशि हर बजट में बढ़ती गई है तथा अनेक नई योजनाएं चलाईं गई हैं। इसी तरह यह भी सच नहीं है कि रोजगार गारंटी योजना, भोजन का अधिकार, सूचना का अधिकार, बैंकों का राष्ट्रीयकरण ये सारे विचार ही काफी हद तक नष्ट हो गए हैं।  किंतु ये सच है या झूठ इससे ज्यादा महत्व की बात है कि आप कहां यह सब बोल रहे हैं। जहां वे बोल रहे थे वहां 23 देशों के प्रतिनिधि थे। आप अपने देश में सरकार पर जितना आरोप लगाना है लगाइए। विदेश में जब आप ऐसा बोलते हैं तो देश की छवि यह बनती है कि इससमय भारत में अल्पसंख्यों, दलितों, आदिवासियों के लिए कयामत के दिन आ गए हैं, नागरिकों के सारे अधिकार छीने जा रहे हैं और बैंकों को बेच दिया जा रहा है। एक ओर दुनिया में भारत की छवि उभरती हुई महाशक्ति की बन रही है, हर मंच पर हमारे प्रधानमंत्री या किसी मंत्री की बात को गौर से सुना जाता है, उसको महत्व मिलता है और दूसरी ओर हमारे विपक्षी दल के नेता देश की एक अराजक तस्वीर पेश करते हैं।

उन्होंने भीड़ द्वारा हिंसा का मुद्दा उठा दिया और कहा इसका कारण बेरोजगाारी है। उनकी बात सुनिए, ‘कुछ साल पहले प्रधानमंत्री जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में नोटबंदी का फैसला किया उसके बा और एमएसएमई के नकद प्रवाह को बर्बाद कर दिया, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोग बेरोजगार हो गए। बड़ी संख्या में छोटे व्यवसायों में काम करने वाले लोगों को वापस अपने गांव लौटने को मजबूर होना पड़ा। जीएसटी को गलत तरीके से लागू किया उससे कारोबार खत्म हो रहा है। इससे लोग काफी नाराज हैं। लिंचिंग के बारे में जो कुछ भी हम सुनते हैं, वो इसी का परिणाम है। उन्होंने कहा कि भारत में लंबे-लंबे भाषण देकर नफरत फैलाई जा रही है। किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। नौजवान अपना सुरक्षित भविष्य नहीं देख पा रहा। जरा सोचिए, इससे भारत की कैसी छवि बनेगी? यह व्याख्या भी विचित्र है। उनके कहने से तो यही ध्वनि निकलती है कि नोटबंदी के कारण बंद कारखानों से व्यवसायों से वापस लौटे कामगार गांवों में समूह बनाकर हत्याएं कर रहे हैं। एक दूसरे समुदायों के विरुद्ध नफरत फैलाया जा रहा है। जिसे भारत के बारे में सच नहीं पता वह तो यही सोचेगा कि यहां तो बिल्कुल कानून का राज खत्म हो गया है और सरकार की नीतियों से बेरोजगार हुए लोग भारी संख्या में हिंसा कर रहे हैं और उसे रोक पाना नामुमकिन हो रहा है। देश के बेरोजगारों का समूह केवल हिंसा कर रहा है। विदेशियों के बीच ऐसा बोलना शर्म का विषय है। उच्चतम न्यायालय ने 17 जुलाई को भीड़ द्वारा हिंसा पर फैसला देते हुए कहा था कि पिछले 10 सालोें में 86 घटनाएं हुईं जिनमें 33 लोग मारे गए।

राहुल ने खूंखार आतंकवादी संगठन आईएसआईएस की पैदाइश और भारत में इसके पनपने की जो व्याख्या की वह तो अद्भुत है। उन्होंने कहा कि 2006 में अमेरिका-इराक युद्ध के बाद कबाइली लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया। इन लोगों ने धीरे-धीरे नेटवर्क फैलाया और आईएसआईएस बनाया। यही नहीं उन्होंने यह भी कह दिया कि भारत में भी बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रधानमंत्री के पास कोई विजन नहीं है। अगर हम कोई विजन नहीं देंगे तो वहां भी आईएसआईएस पैदा हो जाएगा। यह केवल भारत और यहां की सरकार की आलोचना नहीं है, अपने का हास्यास्पद बनाना भी है। यूरोप और अमेरिका के लोगों को आईएसआईएस, अल कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के पैदा होने का कारण बेहतर पता है। वे जानते हैं कि उसके पीछे बेरोजगारी की कोई भूमिका है ही नहीं। ये दुनिया मंें इस्लामिक साम्राज्य स्थापित करने की उन्मादी मंसूबे से खड़े संगठन हैं। ये सम्पूर्ण आधुनिक सभ्यता जिसमें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और रोजगार के ढांचे हैं उनको ही नष्ट करने का लक्ष्य रखते हैं। राहुल के भाषण सुनने वाले या मीडया में उसे पढ़ने-देखने वाले यही सोच रहे होंगे कि भारत इतने अज्ञानियों का देश है जहां दूसरे सबसे बड़े दल के नेता को आतंकवादी संगठनों की पृष्ठभूमि और मंसूबों तक का नहीं पता। यह हमारे लिए भी चिंता का विषय है कि हमारे देश के इतने बड़े नेता की ऐसे अज्ञानी की छवि बनी है।

कांग्रेस ने पिछले दो वर्षों से यह रणनीति बनाई है कि राहुल गांधी को विदेश दौरा कराकर ऐसे कार्यक्रम किए जाएं जिनसे उनकी छवि में निखार आए। राहुल के रणनीतिकार मानते हैं कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विदेशी दौरों में दिए गए भाषणों से प्रवासी भारतीयों, विदेशी नेताओं के साथ देश के अंदर भी लोकप्रियता मिली है उसका मुकाबला करने के लिए ऐसा किया जाना जरुरी है। आज कांग्रेस कह रही है कि मोदी स्वयं विदेशों मेें इसी तरह आलोचना करते रहते हैं तो हम क्यों नहीं करे? मोदी ने प्रवासी भारतीयों की सभाओं में पूर्व सरकार की आलोचना कई जगह अवश्य की, लेकिन उसमें उन्होंने देश को निचा दिखाने की जगह एक उभरती हुई शक्ति और आत्मविश्वास से लबरेज समाज की छवि प्रस्तुत की। उससे बाहर रहने वाले भारतवंशियों के अंदर ही नहीं देश के अंदर भी भारत के सुखद भविष्य के प्रति नए आत्मविश्वास का संचार हुआ है। मोदी ने विदेशियों के बीच बोलते हुए कभी पूर्व सरकारों या विपक्ष की चर्चा नहीं की है, केवल भारत का पक्ष मजबूती से रखा है। आपके भाषण उसके विपरीत हैं। आपने भाजपा, संघ एवं मोदी की आलोचना में देश की छवि को ही दांव पर लगा दिया। विकास के मुद्दे पर लड़खड़ता हुआ, बेरोजगारों के गुस्से से हिंसा में जलता, समुदायों में घृणा वाले ....यानी हर स्तर पर डरावनी स्थिति का सामना करने वाला देश बना दिया है। आप कह रहे हैं कि संघ सत्ता में आने के बाद हर संस्था पर कब्जा करता है। उसमें आपने उच्चतम न्यायालय तक का नाम ले लिया। महिलाओं की स्थिति पर बोलते-बोलते कह दिया कि अंततः यह संस्कृति का प्रश्न है। यानी भारत की संस्कृति में ही पुरुषों का स्त्रियांें पर दबदबा रहा है या पुरुष स्त्री को दोयम दर्जे का मानते रहे हैं। केवल वर्तमान ही नहीं भारत के अतीत की भी आपने छीछालेदर कर दी। विदेश की सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाआंे के पास भारत को जानने के अपने स्रोत हैं, अन्यथा इसे वे स्वीकार लें तो न यहां कोई निवेश आएगा, न पर्यटक आएंगे, न रेटिंग एजेंसियां भारत की अच्छी रेटिंग करेंगी। यही नहीं राहुल की बातों को स्वीकार लें तो लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन के नाम पर भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। आप विदेश में विदेशियों के समक्ष अपने देश की इस तरह मिट्टी पलीद करेंगे और फिर यह उम्मीद करेंगे कि भारतीय आपके नेतृत्व में कांग्रेस को चुनावों में वोट दें। यह नहीं हो सकता। किंतु यह चुनावी लाभ हानि से ज्यादा हमारे देश की छवि का प्रश्न है जिसको बट्टा लगाने वाले का हरसंभव विरोध करना होगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208 

 

 

 

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

11 साल से चल रहे मुकदमें पर दो मिनट में आया फैसला, उधेड़ दीं न्याय की धज्जियां

-सरकारी वकील की लिखित बहस और नजीरें आने की तरीख पर जज ने सुनाया फैसला

संवाददाता

लखनऊ। कभी एक फिल्म आई थी रुका हुआ फैसला लेकिन आज जो मेरे सामने गुजरा- बहस की तारीख पर आया एक लिखा हुआ फैसला। आतंकवाद के मामलों में मुकदमें लड़ने वाले अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब ने अचरज के साथ यह बात कही। वे कहते हैं कि 16 अगस्त 2018 को जेल कोर्ट लखनऊ में तारिक कासमी और मोहम्मद अख्तर का मुकदमा सुनवाई के लिए लगा था। अपनी बहस जारी रखते हुए अभियोजन पक्ष ने लिखित बहस और नजीर पेश करने के लिए समय मांगा था। न्यायालय ने 23 अगस्त 2018 की तारीख नियत की थी। हर तारीख पर पीठासीन अधिकारी 11 से साढ़े 11 बजे तक अदालत में आ जाती थीं, लेकिन आज 23 अगस्त को वह लगभग 3 बजकर 35 मिनट पर जेल में स्थित अपने चेंबर में आईं। जबकि अभियोजन पक्ष, दोनों अभियुक्त और मैं पूरे दिन जेल कोर्ट में उनका इंतजार करते रहे। लगभग 4 बजे वो अपने विश्राम कक्ष से बाहर आईं और दो मिनट में फैसला सुनाकर विश्राम कक्ष में वापस चली गईं। फैसले में अभियुक्तों के विरुद्ध दोष सिद्ध मानते हुए सजा पर बहस के लिए 27 अगस्त की तिथि नियत कर दी। पता रहे कि इस मुकदमें में लखनऊ जेल कोर्ट में गुरुवार के अतिरिक्त किसी और दिन की तिथि नहीं लगाई जाती थी। पीठासीन अधिकारी ने यह भी नहीं बताया कि वह बहस जेल कोर्ट में सुनेंगी या जिला न्यायालय परिसर में। हैरानी इस बात की है जो जज बहस पूरी होने से पहले मुल्जिमान को दोष सिद्ध मान सकता है वो सजा भी मनमाने तरीके से देगा। जो मुकदमा लगभग 11 साल से चल रहा है उस पर दो मिनट में सुनाए गए इस फैसले ने न्याय की धज्जियां उधेड़ दीं। 

मुहम्मद शुऐब कहते हैं कि उनके जैसा न्यायप्रिय व्यक्ति इस नतीजे पर पहुंच है कि बहस कुछ भी की जाए लेकिन फैसला जज में मन मुताबिक ही आना है। अंधे के आगे रोकर अपना दीदा खोने से कोइ फायदा नहीं है। वहीं इस मामले में अपै्रल 2018 में बहस पूरी हो जाने के बाद तत्कालीन न्यायाधीश का स्थानांतरण कर दिया गया था। मुकदमें के स्थानांतरण के कारण अभियुक्तगण की ओर से सेशन जज लखनऊ के समक्ष प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करके निर्णय हेतु मुकदमें का स्थाानांतरण बहस सुन चुके जज के सामने करने का प्रार्थना पत्र दिया गया था। जिस पर सेशन जज ने पूरे एक महीने की तारीख लगा दी और फिर अगली तारीख पर बगैर कुछ सुने दोबारा एक महीने के लिए बढ़ा दिया। जिसकी सुनवाई 10 अगस्त 2018 को होनी थी। इसी दौरान मीडिया में खबरें आईं की नाभा जेल जैसी कोई बड़ी वारदात ये करना चाहते थे और इसलिए इनके जेलों का स्थानांतरण किया जाएगा। जबकि अभियुक्तगण लगातार जेल में हो रहे उत्पीड़न की शिकायत कर रहे थे। 

गौरतलब है कि 23 नवंबर 2007 को लखनऊ कचहरी में हुई वारदात के बाद तारिक कासमी, खालिद मुजाहिद, सज्जादुर्ररहमान, अख्तर वानी, आफताब आलम अंसारी की गिरफ्तारी हुई थी। जिसमें आफताब आलम अंसारी के खिलाफ साक्ष्य न मिलने पर विवेचना अधिकारी ने उन्हें 22 दिन में क्लीनचिट दे दिया था। वहीं सज्जादुर्ररहमान को जेल कोर्ट ने 14 अपै्रल 2011 को बरी कर दिया था। तारिक और खालिद की गिरफ्तारी पर आरडी निमेष आयोग ने 2012 में अपनी रिपोर्ट में यूपी एसटीएफ द्वारा की गई गिरफ्तारी को संदिग्ध कहते हुए दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई की सिफारिश की थी। जिसके बाद खालिद की हिरासत में हत्या कर दी गई थी। तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह, एडीजी लाॅ एण्ड आर्डर बृजलाल जैसे बड़े अधिकारियों समेत आईबी पर हत्या का मुकदमा पंजीकृत हुआ था। 

पुरस्कार वापसी राजनीतिक एजेंडा का छद्म अभियान था

 

अवधेश कुमार

यह अच्छा हुआ कि तीन वर्ष पहले पुरस्कार वापसी के घृणात्मक अभियान की पोल एक साहित्यकार ने सप्रमाण खोली है। हालांकि साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इस पर नहीं लिखते तो भी तटस्थ और निष्पक्ष पत्रकारों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसके पीछे एक व्यक्ति के खिलाफ माहौल बनाने की योजना का पता था। साफ दिखाई दे रहा था कि पूरा अभियान कहीं न कहीं से संचालित हो रहा है। इसके पीछे कोई स्वतःस्फूर्त प्रेरणा हो भी नहीं सकती थी। देश में ऐसा वातावरण था ही नहीं जिसमें किसी लेखक को कुछ लिखने या बोलने पर किसी तरह की बंदिश हो। विश्वनाथ तिवारी ने यही कहा है कि सारे लेखक, कवि जहां चाहते अपनी बात पूरी स्वतंत्रता से रख रहे थे लेकिन झूठ यह फैला रहे थे कि अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में आ गई है।

वास्तव में पूरा अभियान राजनीतिक था, जिसका एक ही लक्ष्य था प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ माहौल बनाना। नरेन्द्र मोदी या उनकी सरकार की मुखालफत करने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन यह खुलकर होना चाहिए। इन रचनाकारों में इतना नैतिक बल नहीं था कि ऐसा कर सकें तो छद्म रुप से पुरस्कार वापसी के जरिए यह कुप्रचार करने की कोशिश करने लगे कि देश में सहिष्णुता खत्म हो रही है, बोलने और लिखने पर पाबंदी लग चुकी है। केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने पिछले वर्ष फरवरी में लोकसभा में बताया कि इन लेखकों ने यह कहते हुए अपने पुरस्कार लौटाए थे कि उनकी अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला किया जा रहा है और अकादमी इस मुद्दे पर चुप है। पिछले तीन सालों में 39 लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए हैं। इन लेखकों ने कन्नड़ लेखक और साहित्य अकादमी बोर्ड के सदस्य एमएम कलबुर्गी की हत्या और दादरी कांड में एक मुस्लिम अखलाक की हत्या पर विरोध जताते हुए कहा था कि अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है और अगर अब नहीं बोले तो खतरे और बढ़ जाएंगे। 30 अगस्त, 2015 को कलबुर्गी की गोली मार कर हत्या कर दी गई। इसी समय दादरी के बिसहारा गांव में गोहत्या करने और गोमांस खाने का आरोप लगाते हुए लोगों ने अखलाक नामक व्यक्ति को इतना मारा की उसकी मृत्यु हो गई। कलबुर्गी की हत्या के बाद लेखक उदय प्रकाश ने 5 सितबर 2015 को साहित्य सम्मान लौटाकर सबसे पहले विरोध की शुरुआत की। पुरस्कार वापसी के बाद अकादमी ने 23 अक्टूबर 2015 तथा इसके बाद 17 दिसम्बर को बैठक बुलाकर प्रस्ताव द्वारा पुरस्कार लौटा चुके लेखकों से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया था। इसमें हत्या की कड़े शब्दों में निंदा भी की गई थी। इस अनुरोध को केवल एक लेखक राजस्थान के नन्द भारद्वाज ने स्वीकार कर पुरस्कार लौटाने का अपना निर्णय वापस लिया था। 

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को लेखकों की ओर से एक पत्रक देकर मांग की गई कि ब्रिटेन यात्रा के दौरान वे मोदी से भारत में बढ़ रहीं असहिष्णुता पर बात करें। यह वैसा ही प्रयास था जैसे मोदी के सत्ता में आने के पूर्व कुछ सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र अमेरिकी राष्ट्रपति को भेजा गया था। इसे आप राजनीतिक एजेंडा नहीं तो और क्या कहेंगे? इनने विदेश में देश की छवि तक की चिंता नहीं की। सच यह था कि कलबुर्गी और अखलाक की हत्या नहीं होती तो ये कुछ दूसरा मुद्दा तलाश कर लेते। 2014 के चुनाव में जब यह स्पष्ट होने लगा कि मोदी के नाम पर भाजपा सत्ता में आ रही है तो कन्नड़ लेखक यूआर अनंतमूर्ति ने बयान दिया कि यदि मोदी प्रधानमंत्री होंगे तो मैं देश छोड़ कर चला जाऊंगा। क्या यह किसी उदार चरित्र वाले वह भी रचनाकार का बयान हो सकता है? इतनी घृणा इनके अंदर एक व्यक्ति को लेकर थी। सब जानते हैं कि अशोक वाजपेयी अनंतमूर्ति के मित्र हैं। उन्हें अकादेमी पुरस्कार अनंतमूर्ति के साहित्य अकादेमी अध्यक्ष काल में मिला था। वाजपेयी मोदी विरोधी उस अभियान के भी अगुवा थे जो आम चुनाव के ठीक पहले से कुछ लेखकों द्वारा चलाया जा रहा था। उस समय जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की कृपा से इन्हें एक मंच भी मिला हुआ था। 9 अप्रैल, 2014 के जनसत्ता में 40 लेखकों ने बाजाब्ता मतदाताओं से भाजपा को वोट न देने की अपील की। इनमें वे नाम शामिल हैं जिन्होंने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाए। अशोक वाजपेयी के नेतृत्व में ही पांच लोग पुरस्कार अभियान के अगुवा थे तथा इनके मख्य मित्रों की संख्या दो दर्जन के आसपास थी जो इसमें शमिल हुए। बाकी या तो दबाव या फिर प्रचार पाने की लालसा से इनसे जुड़े। सच यह है कि इनने चाहे जैसे माहौल बनाए लेकिन इनका दिली समर्थन बहुत कम था। तिवारी ने यही कहा है कि बहुत से लेखकों, मित्रों और परिचित-अपरिचित बुद्धिजीवियों के ई-मेल फोन, पत्र आदि लगातार मिलते रहे, जिनमें अधिकांश या कहूं लगभग सभी पुरस्कार वापस करने वालों के विरुद्ध थे।

वास्तव में ये पांच सूत्रधार अपने निकट के लेखकों द्वारा उनके परिचित लेखकों को बार-बार फोन कराकर पूछते रहते थे कि आप कब लौटा रहे हैं? या क्या आप नहीं लौटा रहे हैं? तथाकथित असहिष्णुता विरोधी आंदोलन के लिए इन लेखकों ने देशव्यापी नेटवर्किंग और अभियान चलाया था। कैसे लेखकों पर दबाव बनाया जा रहा था इसके दो उदाहरण देखिए। विश्वनाथ तिवारी को लेखक रमाशंकर द्विवेदी ने 30 अक्टूबर 2015 को फोन पर बताया कि उन्हें साहित्य अकादेमी के एक अवकाश प्राप्त लेखक ने फोन पर पुरस्कार लौटाने के विषय में पूछा। 12 अक्टूबर को अंग्रेजी के वरिष्ठतम लेखक (93 वर्षीय) शिव के. कुमार ने तिवारी को ई-मेल किया। इसमें उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने मुझे भी पुरस्कार और पद्मभूषण लौटाने को कहा है लेकिन मैं ऐसा नहीं कर रहा हूं। यह एक राजनीतिक पाखंड के सिवा कुछ नही है। किसी तरह की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई अंकुश नहीं है। मुझे उम्मीद है आप इन सबसे विचलित नहीं होंगे।

अगर इनका उद्देश्य राजनीतिक नहीं होता तो जिन राज्यों में हत्या की घटनाएं (कर्नाटक, उत्तर प्रदेश) हुई उनसे प्राप्त पुरस्कार वापस किए जाते। कानून-व्यवस्था तो राज्य सरकारों का विषय है। जब काशीनाथ सिंह से पूछा गया कि आपने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पुरस्कार क्यों नहीं लौटाया जबकि अखलाक की हत्या उत्तर प्रदेश में ही हुई है उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में अभिव्यक्ति की आजादी है, यहां सहिष्णुता को समस्या नहीं। घटना उत्तर प्रदेश में हुइ वहां आजादी है पर भारत में नहीं। जैसा विश्वनाथ तिवारी ने लिखा है, काशीनाथ सिंह ने स्वयं फोन पर उनसे कहा था कि वे पुरस्कार नहीं लौटाएंगे। इसके तीन दिन बाद ही उन्होंने मीडिया के सामने पुरस्कार वापसी की घोषणा कर दी। क्यों किया ऐसा? ध्यान रखिए, काशीनाथ सिंह ने भी चुनाव में मोदी का खुलकर विरोध किया था। तसलीमा नसरीन ने उस समय साफ कहा था कि लेखकों का यह विरोध मोदी सरकार से है।

ये किस कदर झूठ फैला रहे थे इसका भी उदाहरण देखिए। तथाकथित असहिष्णुता का यह अभियान जब समाप्त हो रहा था उस समय 22 नवंबर, 2015 को अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता में लिखा कि - एक लेखक की दिन दहाड़े हत्या के बाद साहित्य अकादेमी ने शोकसभा तक नहीं की। सच यह है कि इसके एक महीने पहले यानी 23 अक्टूबर, 2015 का अकादेमी की कार्यकारिणी का वह प्रस्ताव उन्हें मिल चुका था जिसमें शोकसभा का पूरा ब्यौरा है तथा अखबारों में और अकादेमी के वेबसाइट पर भी सूचना उपलब्ध थी कि अकादेमी ने बेंगलुरु में बाकायदा निमंत्रण-पत्र छापकर बड़ी शोकसभा आयोजित की थी। क्या इसके बाद कहने की आवश्यकता है कि उस पूरे अभियान का सहिष्णुता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से कोई लेना देना नहीं था? इसका एक ही एजेंडा था- मोदी विरोध। इनके न चाहते हुए भी मोदी प्रधानमंत्री बन चुके थे। यह इनसे सहन नहीं हो रहा था। इसलिए कलबुर्गी और अखलाक की दुखद हत्या का उन्होंने उपयोग करके प्रच्छन्न एजेडा चलाया। इससे पता चलता है कि जिन रचनाकारों को देश ने इतना सम्मान दिया, उन्हें अपना आइकॉन माना वे वाकई इतने तुच्छ और छोटे व्यक्तित्व वाले हैं कि लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए किसी व्यक्ति को स्वीकार नहीं कर सकते, जिसे ये अपना वैचारिक विरोधी मानते हैं। अब सारा सच एक बार फिर सामने आने के बाद देश को यह तय करना चाहिए कि इनके साथ कैसा व्यवहार किया जाए। ये आगे भी ऐसा कुछ कर सकते हैं। आम चुनाव आने वाला है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

वाजपेयी ऐसे राजनेता जिसे हम भूल नहीं सकते

 

अवधेश कुमार

अटलबिहारी वाजपेयी की पूरी जीवन यात्रा के मूल्यांकन के लिए कुछ आधार बनाना होगा। उनको भारतीय राजनीति को शलाका पुरुष मानने वाले बिल्कुल सही है। राजनीति में इतना लंबा दौर गुजारने के बावजूद वैचारिक प्रतिबद्धता रखते हुए, घोर विरोधियों के प्रति भी बिल्कुल उदार आचरण एवं उसे जीवन भर कायम रखना तथा किसी से निजी कटुता न होना सामान्य बात नहीं है। वस्तुतः आजादी के दौर के राजनेताओं में राष्ट्रीय राजनीति में वे अंतिम व्यक्ति बच गए थे। इसका असर उनकी सोच एव व्यवहार पर था। हालांकि वो एक विशेष विचारधारा के प्रतिनिधि थे, लेकिन राजनीति को देखने का उनका दृष्टिकोण आजादी के दौरान भारत के बारे में देखे गए सपने से निर्धारित था। आजादी के बाद जिन महापुरुषों के साथ उनको काम करने का अवसर मिला उन सबका भी असर उन पर था। 1947 से लेकर लंबे समय तक देश में जो घटनाएं घटीं, भारत के सामने जो संकट और चुनौतियां आईं, उनसे निपटने के लिए तब के हमारे नेतृत्व ने जो कुछ किया उन सबका गहरा असर अटल जी के मनोमस्तिष्क पर पड़ा। जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की जम्मू कश्मीर यात्रा के समय वो उनके साथ थे। वाजपेयी जी ने कई बार कहा कि मुखर्जी ने उनको कहा कि जाओ और देशवासियों को बताओ कि मैं बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश कर गया हूं। जैसा हम जानते हैं डॉ. मुखर्जी वहां से वापस नहीं लौटे। उनको गिरफृतार कर लिया गया और संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई। उनके पिता जी एक कवि एवं रचनाकार थे जिन्होंने पुत्र के रुप में इनको उसी रुप में विकसित करने की कोशिश की। संघ का प्रचारक बनने के बाद उन्होंने राष्ट्रधर्म पत्रिका से लेकर पांचजन्य, स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्रों का संपादन करने का दायित्व मिला।

इन घटनाओं के जिक्र करने का उद्देश्य यह बताना है कि अटल जी के राजनीतिक व्यक्तित्व निर्माण में सबकी सम्मिलित भूमिका थी। चाहे विपक्ष के नेता के रुप में हों, विदेश मंत्री के तौर पर या फिर प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सम्पूर्ण भूमिका में आपको यह सब परिलक्षित होता है। 1957 में पहली बार लोकसभा पहुंचने के बाद उनके भाषणों को देख लीजिए, उसमें जनसंघ की विचारधारा के अनुसार घटनाओं पर टिप्पणियां हैं, संघ के गीतों और उनकी कविताओं की पंक्तियां हैं, किंतु कहीं भी प. जवाहरलाल नेहरु या उनके साथियों के प्रति एक शब्द भी ऐसा नहीं है जिसे आप सम्मान को कम करने वाला कह सकते हैं। उस समय कश्मीर से लेकर पाकिस्तान, तिब्बत, केरल में राष्ट्रपति शासन... आदि ऐसे अनेक मुद्दे थे जिन पर जनसंघ और कांग्रेस के बीच सहमति नहीं हो सकती। किंतु संसदीय लोकतांत्रिक राजनीति की मर्यादाओं का उन्होंने पूरा पालन किया। 1962 के युद्ध के समय जनसंघ के सारे प्रमुख नेताओं के साथ मिलकर वाजपेयी जी ने सरकार का साथ देने तथा कार्यकर्ताओं को देश भर में जितनी शक्ति हो उसके अनुसार सरकारी मशीनरी का सहयोग करने का निर्णय किया। इसी का परिणाम था कि संघ के स्वयंसेवक ने दिल्ली सहित कई शहरों की यातायात में सहयोग किया।

नेहरु जी अटल जी को बहुत प्यार करते थे। बकौल अटल जी एक बार उन्होंने लोकसभा में कांग्रेस और नेहरु सरकार की नीतियों पर तीखा हमला किया। शाम को एक कार्यक्रम मंें नेहरु जी ने उनको देखा और कहा कि आज तो बहुत अच्छा भाषण मारे। यह जो उदार व्यवहार था नेहरु जी का उनका असर न हो ऐसा कैसे हो सकता है। 1971 में बंाग्लादेश मुक्ति युद्ध के समय अटल जी पूरी तरह सरकार के साथ खड़े थे। यहां तक कि आपातकाल में उन्हें जेल जाना पड़ा। उस दौरान भी उन्होंने जो कविताएं लिखीं उनमें शासन की आलोचना तो है पर इन्दिरा जी पर कोई सीधी निजी तीखी टिप्पणी नहीं। वाजपेयी जी के राजनीति काल में वह समय आया जब 1977 में उन्हें फैसला करना था कि जनसंघ अलग होकर चुनाव लड़ेगा, गठबंधन में या फिर पार्टी का विलय कर दिया जाए। उस समय लालकृष्ण आडवाणी जनसंघ के अध्यक्ष थे। किंतु वाजपेयी जी के प्रभाव से ही यह संभव हुआ कि जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया। संघ के नेता भी वाजपेयी जी के कारण ही इसके लिए तैयार हुए। जनता सरकार के दौरान विदेश मंत्री के रुप में चीन और पाकिस्तान से संबंध सुधारने की उनकी कोशिश पर लोगों को आश्चर्य हुआ, क्योंकि आम धारणा यही थी कि ये तो पाकिस्तान और चीन के घोर विरोधी हैं। उस दौरान संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा में हिन्दी में भाषण देकर वाजपेयी जी ने इतिहास बनाया। मातृभाषा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है।

एक पत्रकार, कवि और दूसरी पार्टियों के नेताओं के साथ संबंध और संवाद का ही प्रभाव था कि जब उनकी पार्टी के सामने 1998 में सरकार बनाने का अवसर आया तो उन्होंने एक साथ कई पार्टियों को साथ लेकर सरकार के लिए एजेंडा बनाकर अपने तीन प्रमुख मुद्दों को बाहर किया। यही वह काल था जब उन्हांेने सरकार बनने के ढाई महीने के अंदर ही पोकरण में 11 और 13 मई 1998 को दो नाभिकीय परीक्षण कराया। पूरी दुनिया इससे भौचक्क रह गई। अमेरिका हक्का-बक्का था कि उसके उपग्रहों की नजर से इसकी तैयारी बच कैसे गई। जाहिर है, उसकी तैयारी में वाजपेयी उनके रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस तथा वैज्ञानिक सलाहकार डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने मिलकर इतनी गोपनीयता बरती कि यह मिशन सफल हो सका। वाजपेयी जी को मालूम था कि इसकी प्रतिक्रिया दुनिया भर मंे भारत के विरुद्ध होगी। अमेरिका से लेकर जापान, ऑस्ट्रेलिया सबने भारत पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया। वही समय एक नेतृत्व की परीक्षा का था। वाजपेयी अपने कदम को पीछे हटाने को तैयार नहीं हुए और विदेश मंत्री जसवंत सिंह के माध्यम से इतना सघन कूटनीतिक अभियान चलाया कि धीरे-धीरे अमेरिका भारत से सहमत हुआ और अन्य देशों के रवैये में बदलाव आया। बाद में युपीए सरकार के समय अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश एवं हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ जो नाभिकीय सहयोग समझौता हुआ उसकी नींव अटल जी ने ही डाल दिया था।

वाजपेयी के काल का सबसे बड़ा प्रयास जम्मू कश्मीर को सामान्य स्थिति मंें लाना तथा पाकिस्तान से हर हाल में संबंध सुधारने की कोशिश के रुप में सामने आया। स्वयं बस लेकर लाहौर जाने का ऐतिहासिक कदम उठाया और मिनारे-ए-पाकिस्तान जाकर यह संदेश दिया कि देश के रुप में भारत पाकिस्तान को स्वीकार करता है। हालांकि वहां से वापसी के कुछ समय बाद ही करगिल युद्ध आरंभ हो गया। बिना सीमा पार किए पाकिस्तान को युद्ध में पूरी तरह परास्त करना तथा इस दौरान दुनिया भर का समर्थन जुटाने का कौशल हमारे सामने है। संसद पर हमले के बाद सीमा पर सेना को हमला करने की अवस्था खड़ा कर पाकिस्तान को कुछ घोषणाएं करने को विवश किया। इसके बावजूद जनरल परवेज मुशर्रफ को पहले आगरा बुलाया और बैठक असफल होने के बावजूद प्रयास नहीं छोड़ा। अंततः जनवरी 2004 में वे दोबारा पाकिस्तान गए और मुशर्रफ ने समझौता में स्वीकार किया कि आतंकवाद के लिए अपनी भूमि का उपयोग नहीं करेंगे। पाकिस्तान के साथ समग्र वार्ता की शुरुआत हुई। आर्थिक नीतियों में उदारवाद के वे समर्थक थे तथा संघ एवं उससे जुड़े अनेक संगठनों के तीखे विरोध के बावजूद वे उस पर कायम रहे। अपने पूरे कार्यकाल में उन्होंने विरोधी नेताओं के तीखे विरोध को झेलते हुए व्यवहार में कभी तीखापन नहीं लाया। इसलिए उनके प्रति सभी दलो के नेताओं का सम्मान बना रहा।

आज अगर सभी दलांें एवं विचारधारा के नेताओं, लोग अटल जी को लेकर द्रवित हैं तो इसमें उनके पूरे जीवन के आचरण का ही योगदान है। अटल जी जैसे राजनेता का व्यक्तित्व वास्तव में अतुलनीय है। इतनी बहुमुखी प्रतिभा और क्षमता तथा उन सबके होते हुए अहं से परे रहककर अपने कर्तव्यों के निर्वहन के प्रति इतना समर्पित रहना सामान्य बात नहीं है। ऐसे व्यक्ति को यह देश कभी भूल नहीं सकता। इतिहास में उनका नाम हमेशा सम्मान से लिया जाएगा। आज के नेताओं के लिए वे विचार और आचरण में प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः0112483408, 9811027208 

 

 

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