शनिवार, 21 जुलाई 2018

शशि थरुर का बयान बिल्कुल अस्वीकार्य

 

अवधेश कुमार

शशि थरुर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में हैं। जाहिर है, वे जो कुछ बोलते हैं उनसे पार्टी केवल यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती कि वह उनका निजी बयान है। हालांकि पार्टी ने उनकी बात का खंडन कर दिया है। यह भी नसीहत दी है कि नेतागण बोलने में शब्दों को सोच-समझकर प्रयोग करें। पार्टी को पता है कि ऐसे बयान के उल्टे राजनीतिक परिणाम होते हैं जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता है। वे कह रहे हैं कि अगर भाजपा 2019 में फिर से बहुमत पाकर जीती तो भारत हिन्दू पाकिस्तान बन जाएगा। उनके अनुसार वह संविधान में परिवर्तन कर इसे सेक्यूलर की जगह हिन्दू राष्ट्र बना देगी जहां अल्पसंख्यकों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं होगा। इसकी वो विस्तृत व्याख्या करते हैं। हालांकि जब वो यह बोल रहे थे तो भले इसमें हिन्दुत्व, हिन्दू धर्म तथा भारत राष्ट्र के चरित्र के बारे में इनकी अज्ञानता झलक रही थी, पर इसके खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं होंगी इसका अहसास उन्हें अवश्य रहा होगा। वे कोई नवसिखुआ व्यक्ति नहीं हैं कि अपने बयानों के असर का अनुमान नहीं हो। इसलिए यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्होेंने अनायास ऐसा बोल दिया है। उन्होंने जानबूझकर ऐसा बोला। बाद में जब उन्हें अपने बयान पर खेद प्रकट करने के लिए कहा गया तो उन्होंने उल्टे प्रतिप्रश्न किया कि मुझे समझ में नहीं आता कि किस बात पर खेद प्रकट करुं। इसका अर्थ हुआ कि कांग्रेस पार्टी जो भी कहे शशि थरुर अपने बयान पर कायम है। उन्होेंने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि मैंने पहले भी ऐसा कहा है और आगे भी कहूंगा।

भाजपा ने इस पर जैसी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे हिन्दुओं एवं हिन्दुस्तान का अपमान बताया उससे साफ है कि अगले चुनाव तक शशि थरुर की ये पंक्तियां उसी तरह गूंजती रहेगी जैसे पिछले चुनाव में कांग्रेस एवं यूपीए सरकार द्वारा प्रयुक्त हिन्दू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद। ऐसी बातों का भारत के बहुसंख्य वर्ग पर सीधा असर होता है और वे इसके विरुद्ध प्रतिक्रिया देते है। वैसे भी थरुर ने जो कहा सबसे पहले तो उसका कोई ठोस आधार नहीं है। इसके पहले केन्द्र में अटलबिहारी वाजपेयी की छः वर्षों तक सरकार रही। संविधान मंे ऐसे किसी परिवर्तन की चेष्टा नहीं की गई। उस दौरान संविधान समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति वेंकटचेल्लैया की अध्यक्षता में एक समिति अवश्य बनी जिसने अपनी रिपोर्ट भी थी। वह एक स्वाभाविक कदम था। एक अंतराल के बाद हमें अपने संविधान की समीक्षा करते रहना चाहिए। इससे उनमें कोई कमी है तो उसका पता चलता है तथा उसके अनुसार ंसंशोधन कर दुरुस्त किया जा सकता है। उस रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं था जिससे संविधान में आमूल परिवर्तन की आशंका पैदा हो। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भी चार वर्ष से ज्यादा सरकार के हो गए। अभी तक इसे एक भी कदम ऐसा नहीं उठाया है जिससे यह माना जाए कि उसका इरादा वाकई संविधान के सेक्यूलर चरित्र को बदल डालने का है। इसके विपरीत प्रधानमंत्री ने स्वयं संविधान दिवस मनाने की शुरुआत कराई है। मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में पिछले करीब 15 वर्षों से भाजपा की सरकारें हैं वहां भी कोई एक कदम नहीं बताया जा सकता जिससे यह साबित हो सके कि अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश हुई।

इस तरह थरुर की ऐसा आशंका भाजपा सरकारों के अभी तक अनुभवों के आधार पर निर्मूल साबित होती है। दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो यह तुलना वाकई हिन्दुओं और भारत का अपमान है। एक आम हिन्दू का चरित्र कभी भी मजहबी कट्टरता, धर्मांधता और धर्म के नाम पर हथियार उठा लेने का नहीं रहा है। कभी-कभी एकाध सिरफिरे खड़े भी हो गए तो उसे समाज में समर्थन नहीं मिला। थरुर की समस्या यह है कि वो पश्चिमी सोच में ढले व्यक्ति हैं जहां धर्म और सेक्यूलरवाद की परिभाषा बिल्कुल अलग है। वहां के लिए धर्म एक विशेष उपासना पद्धति है जिसके एक संस्थापक हैं तथा जिनको मानने वाले अपने एक धर्मग्रंथ से समस्त प्रेरणा लेते हैं। उसका एक संगठित ढांचा भी है। हिन्दू धर्म का मर्म थरुर की समझ से बाहर है। वो उसी तरह के मजहबांे की तरह हिन्दुत्व को भी समझते हैं। हालांकि विवाद होने पर उन्होंने बयान देने के लिए जो जगह चुनाव वहां उनकी कुर्सी के पीछे अलग-अलग देवताओं की प्रतिमाएं थीं। यानी वो यह संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि मैं स्वयं एक धार्मिक व्यक्ति हंूं। पता नहीं कितने धार्मिक हैं वे। देवताओं की प्रतिमा रखने या कर्मकांड के अनुसार पूजा करने से भी आप हिन्दू धर्म को नहीं समझ सकते। यहां न कोई एक उपासना पद्धति है, न कोई एक धर्मग्रंथ और न इस धर्म का कोई संस्थापक। साथ ही इसका कोई संगठित ढांचा भी नहीं है।

ऐसा हो भी नहीं सकता। हिन्दू धर्म से ज्यादा व्यापक सोच और सहिष्णुता किसी अन्य धर्म में आपको मिल ही नहीं सकती। थरुर और उनके जैसे लोग गांधी जी को बार-बार उद्धृत करते हैं। किंतु हिन्दू धर्म के संबंध मे ंउनके विचार शायद वे समझ नहीं पाते। गांधी जी यदि बार-बार कहते हैं कि मैं एक सनातनी हन्दू हूं और मुझे इस पर गर्व है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वो अन्य धर्मों को हेय मानते हैं। वो कहते हैं कि जितना मैंने हिन्दू धर्म को समझा है इससे सहिष्णु दूसरा धर्म नहीं मिला। यह किसी भी धर्म को अपना स्वीकार कर सकता है। यही इसकी विशेषता है। यह सेमेटिक विचार कभी अपना ही नहीं सकता। एक हिन्दू धर्म के अंदर इतने पंथ, मत-मतांतर हैं, इतनी धर्मपुस्तके हैं, धर्म और अध्यात्म से संबंधित इतने दर्शन हैं कि इनमें एकरुपता भी नहीं आ सकती। कोई राम को अपना आराध्य मानता है तो कोई उनका विरोध करता है। कोई ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारता है तो कोई उसे बिल्कुल नकारता है। हमारे यहां किसी कर्मकांड के पालन की कोई अनिवार्यता नहीं। जो चार्वाक वेदों को खुलेआम नकारता था, उसे भी हिन्दू धर्म ने एक दर्शन के रुप में स्वीकार कर लिया। थरुर हिन्दू धर्म और हिन्दुओं के इस सनातन चरित्र को समझ ही नहीं सकते। कोई भी सरकार आ जाए, हिन्दू को उस रुप में कट्टर और दूसरे धर्म से घृणा करने वाला बना ही नहीं सकता। हिन्दू के लिए सभी धर्मों का मूल तत्व एक ही है। जब ऐसा हो ही नहीं सकता उसकी आशंका क्यों?

साफ है कि इसके पीछे नासमझी और राजनीति है। भाजपा एवं संघ परिवार को लेकर राजनीति आरंभ से यही प्रचार करती रही है कि उसका विचार अल्पसंख्यक विरोधी हैं, वे भारत का पूरा चरित्र बदल देंगे, राज्य का एक धर्म हो जाएगा और दूसरे धर्मों के लिए इसमें कोई जगह नहीं होगी। दुनिया में ऐसे इस्लामिक देश हैं जहां दूसरे धर्मावलंबियों को कोई अधिकार नही। इस तरह का थियोक्रेटिक स्टेट यानी मजहबी राज्य भारत कभी हो ही नहीं सकता। वैस थरुर और उनके समर्थकों को यह जानकारी होनी चाहिए कि आधुनिक काल में हिन्दू राष्ट्र शब्द का सबसे पहला प्रयोग महर्षि अरंविन्द ने अपने प्रसिद्ध उत्तरपारा भाषण मंे किया। क्या वो दूसरे धर्मांे के विरोधी और सांप्रदायिक थे? उस समय तक तो संघ पैदा भी नहीं हुआ था। स्वामी विवेकानंद भी भारत के बारे में यही धारणा रखते थे। क्या आप उनको धर्मांध कह सकते हैं? स्वयं गांधी जी धर्म को राज्य की आत्मा कहते थे। उनका कहना था कि बिना धर्म के राज्य आत्माविहीन शरीर के समान हो जाएगा। आज जो भी ऐसा बोलेगा उसे सेक्यूलर विरोधी और संाप्रदायिक करार दे दिया जाएगा। किंतु धर्म से अर्थ यहां कर्तव्यों से है। हमारे हिन्दू धर्म में धर्म का अर्थ ही है जो धारण किया जा सके। यानी जो आपका कर्तव्य है वही धर्म है।

यह सामान्य चिंता की बात नहीं है कि शशि थरुर जैसे व्यक्ति को भारत के हिन्दू पाकिस्तान जैसा दुनिया की नजरों से गिरा हुआ, धर्मांता की हिंसा में फंसा देश बन जाने का खतरा नजर आता है। पाकिस्तान के चुनाव में आतंकवादियों ने अवामी नेशनल पार्टी के नेताओं को खूब निशाना बनाया है। वे कह रहे हैं कि यह पार्टी इस्लाम में विश्वास नहीं करती। क्या भारत में इसकी हम कल्पना तक कर सकते हैं? पाकिस्तान में आजादी के वक्त करीब 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक थे, जबकि आज इनकी संख्या दो प्रतिशत से भी कम है। इसके उलट भारत में आजादी के समय मुसलमानों की संख्या 9 प्रतिशत थी जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार उनकी आबादी 14 प्रतिशत से ज्यादा है। यह दोनों देशों और उनके लोगों के संस्कारों में अंतर का ही सबूत है। किंतु ऐसा कहने वाले थरुर अकेले नहीं है। उनकी सोच के लोगों की एक बड़ी संख्या इस देश में है। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारे देश में ऐसे लोग हर राजनीतिक एवं बौद्धिक क्षेत्र में बड़ी हस्ती माने जाते हैं जिनको अपने देश, धर्म आदि के विषय में सही जानकारी तक नहीं। हालांकि उन्होंने जो कहा है उसके खिलाफ देश में वाकई तीव्र प्रतिक्रिया है और इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208 

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

नीतीश के बयान भविष्य की कठिनाइयों का संकेत

 

अवधेश कुमार

जो लोग जनता दल-यू की कार्यकारिणी से भाजपा एवं राजग के बारे में कुछ प्रतिकूल ध्वनि निकलने की कल्पना कर रहे थे उन्हें निश्चय ही निराशा हाथ लगी होगी। पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें उड़ रहीं थी कि जद यू ने बिहार के 40 में से 25 सीटों की मांग रखी है तथा यह साफ कह दिया है कि अगर पूरा सम्मान नहीं मिला तो गठबंधन से बाहर जाने पर भी विचार हो सकता है। इस खबर के बाद ही तेजस्वी यादव ने यह बयान दे दिया कि मेरे चाचा के लिए अब दरवाजा बंद हो गया है। किंतु कार्यकारिणी मेें ऐसा कुछ नहीं हुआ। जद-यू ने न केवल प्रदेश में भाजपा के साथ बने रहने बल्कि राजग के एक घटक के रुप में ही राजनीतिक भूमिका निभाने की स्पष्ट घोषणा कर दी। 2019 के लोकसभा चुनाव की दृष्टि से यह माना जा रहा था कि जद-यू ऐसा कोई प्रस्ताव पारित कर सकता है जिनसे भाजपा पर दबाव बने एवं उनकी बात न माने जाने पर साथ छोड़ने का संदेश भी निकले। नीतीश कुमार के चरित्र को देखते हुए यह उम्मीद अस्वाभाविक नहीं थी। किंतु पत्रकार वार्ता में जद यू के महासचिव के सी. त्यागी ने साफ कर दिया है कि लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर कार्यकारिणी में कोई चर्चा ही नहीं हुई।

जद यू के लिए यही स्थिति यथेष्ठ है। हालांकि जद यू के नेताओं को पता है कि भाजपा विरोधी गठबंधन बनाने का प्रयास करने वाले अभी भी चाहते हैं कि किसी तरह नीतीश बाहर आ जाएं। हां, राजद उनको साथ लेने के मूड में नहीं, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति को ध्यान मे ंरखते हुए अन्य नेताओं को उम्मीद है कि अंततः तेजस्वी एवं लालू यादव को मना लिया जाएगा। किंतु नीतीश ने इसका तत्काल खंडन कर दिया। उनका यह कहना कि कांग्रेस जब तक भ्रष्टाचार के बारे में अपना मत स्पष्ट नहीं करती, बिहार मेें उसको साथ लेने पर विचार करने का प्रश्न ही नहीं है। भ्रष्टाचार से उनका सीधा इशारा लालू प्रसाद के परिवार से है। यह बयान उन्होंने निश्चय ही काफी सोच-समझकर दिया है। कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों के लिए साफ संदेश है कि राजद से उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नाता तोड़ा और उस पर वे कायम हैं। यानी वे किसी भी स्थिति में राजद के साथ नहीं जा सकते। वर्तमान राजनीति को देखते हुए यह अत्यंत महत्वपूर्ण वक्तव्य है। तत्काल इसका निष्कर्ष यही है कि बिहार मेें भाजपा के विरुद्ध किसी बड़े गठबंधन की संभावना निःशेष है। भले राष्ट्रीय स्तर पर जो भी चर्चा चले लेकिन लालू परिवार के एक-एक सदस्य पर जिस तरह से अवैध तरीके से संपत्ति बनाने के आरोप लग रहे थे तथा कुछ के प्रमाण सामने आ रहे थे उनमें नीतीश के लिए राजद के साथ बने रहना मुश्किल था। स्वयं तेजस्वी एवं तेजप्रताप यादव तक पर अवैध तरीके से संपत्ति बढ़ाने का आरोप है। ऐसा नहीं होता तो नीतीश नरेन्द्र मोदी विरोध के नाम पर जिस सीमा तक जा चुके थे उसमें सामान्य स्थिति मंें वे स्वयं भाजपा के साथ वापस जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। भाजपा भी मान चुकी थी कि अब बिहार मेें उसकी राजनीति नीतीश विरोध की ही रहेगी।

अंदरखाने कुछ घंटों के अंदर नीतीश ने अरुण जेटली से बात कर जिस तरह फिर से पुरानी स्थिति में लौटने का राजनीतिक कारनामा कर दिया उसमें अब विस्तार से जाने की कोई आवश्यकता नहीं। किंतु उनके सामने स्वयं अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता को बचाने का प्रश्न है। इस समय भाजपा के लिए कोई भी प्रतिकूल बयान उनको राजनीति में हास्य का पात्र बना सकता है। उन्हें इसका भान है। वैसे भले भाजपा के साथ आने की पहल उनकी थी, लेकिन प्रदेश भाजपा के नेताओं ने उनके साथ छोटे भाई की भूमिका अपना ली है। नोटबंदी के बारे में उनके बयान पर किसी भाजपा नेता ने प्रतिक्रिया नहीं दी। नीतीश जैसा चाहते हैं बिहार गठबंधन में इस समय वही होता है। आज की स्थिति मेें भाजपा गठबंधन में उनकी अनुसरण करने वाली पार्टी है। ऐसी स्थिति राजद के साथ नहीं थी। लालू प्रसाद यादव उसमें एक दूसरे सत्ता केन्द्र बन चुके थे। अधिकारियों से लेकर नेता तक उनसे सलाह लेने जाते थे तथा वे स्वयं भी लगातार इनके कामों में हस्तक्षेप करते थे। तो गठबंधन के अंदर नीतीश के लिए भाजपा ज्यादा अनुकूल है।

 अभी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से नीतीश कुमार की मुलाकात होनी है। अमित शाह गठबंधन के सभी प्रमुख दलो के नेताओं से मिल रहे हैं। उनकी उद्धव ठाकरे तथा प्रकाश सिंह बादल से मुलाकात हो चुकी है। उस बातचीत में क्या निकलता है यह देखने वाली बात होगी। हालांकि उसमें भी सीटों के बंटवारे पर कोई विमर्श होगा ऐसा लगता नहीं। प्रदेश भाजपा ने इस मामले पर अत्यंत ही संयमित रुख अपनाया है। प्रदेश के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इस संबंध में पूछे जाने पर कहा कि नीतीश कुमार बड़े भाई हैं, जब दिल मिल गया तो सीटों में भी कोई समस्या नहीं होगी। किंतु इन सबका अर्थ यह नहीं है कि 2019 के लिए बिहार में सीटों का बंटवारा वाकई आसानी से हो जाएगा। इस समय भाजपा के पास लोकसभा की 22 सीटें हैं। उसके सहयोगी लोजपा के छः तथा रालोसपा के दोनों गुटों के तीन। तो 40 में से 31 सीटें इनके पास पहले से है। क्या इनमें से कोई भी पार्टी अपनी जीती हुई सीटें जद-यू के लिए छोड़ने को तैयार होगी? यह आसानी से संभव नहीं है। अगर ये छोड़ेंगे नहंीं तो जद यू के लिए केवल नौ सीटेें बचतीं हैं। इतने में वह मान जाएगी?

यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर तलाशने के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं है। ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार एवं जद यू के अन्य नेताओं को इस स्थिति का आभास नहीं है। आपस में उनके बीच इसकी चर्चा होती रहती है। ध्यान रखिए कार्यकारिणी में नीतीश ने इस विषय को परोक्ष रुप से उठाया भी। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी हमें 17 प्रतिशत वोट मिले थे। हमें कमजोर न माना जाए जो हमें नजरअंदाज करेगा वो खुद राजनीति में नजरअंदाज हो जाएगा। उनका कहना था कि हमें जो भी मिलेगा उससे संतुष्ट हुए तो ठीक नही ंतो देखा जाएगा। आप मत घबराइए जद यू को कोई एलिमिनेट नहीं कर सकता है। तो यह भाजपा सहित राजग के वर्तमान साथियों के लिए एक संदेश है जिसे सबको समझना होगा। इस समय इतने वक्तव्य तक सीमित रहने मंे ही बुद्धिमानी थी। जब अभी सीटों पर बात आरंभ ही नहीं हुई है इससे ज्यादा वक्तव्य देने का कोई अर्थ भी नहीं था। यह वक्तव्य साबित करता है कि बिहार में घटक दलों के बीव सीटों का बंटवारा आसान नहीं है। जद यू कितने से संतुष्ट होगी यह नीतीश ने नहीं बताया है। वह नौ सीटों पर मान जाएगी इसकी कल्पना तक बेमानी है। रास्ता यही होगा कि अन्य पार्टियां अपने खातेें से कुछ सीटें कम करें या फिर बिहार में राजग एक होकर चुनाव नहीं लड़ पाएगा। क्या भाजपा नीतीश को प्रसन्न करने के लिए अभी के साथियों में से कुछ का परित्याग करेगी? या नीतीश राजग में रहते हुए कुछ सीटों पर दोस्ताना संघर्ष के लिए अपने उम्मीदवार खड़ा करेंगे? ये सारे प्रश्न तब तक प्रासंगिक हैं जब तक कि कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा इसकी घोषणा नहीं हो जाती। कार्यकारिणी में कड़ा तेवर न दिखाने का यह अर्थ कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि बिहार में लोकसभा चुनाव के पूर्व सीटों को लेकर नीतीश कुमार या जद यू कड़े तेवर नहीं अपनाएगी। ऐसे में यह भी संभव है कि प्रदेश में राजग टूट जाए। यानी वर्तमान साथी बाहर जाएं एवं पहले की तरह भाजपा जद यू साथ लड़े। राजद अपना दरवाजा नीतीश को छोड़कर अन्यों के लिए खोलकर तैयार बैठी है। इस तरह सभी प्रकार की संभावना अभी बिहार में बनी हुई है। तो देखते हैं क्या होता है। हां, 2019 चुनाव पूर्व सीट बंटवारे तक बिहार की राजनीति काफी रोचक हो गई है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीतिक निशाना उचित नहीं

 

अवधेश कुमार

यह मानने में किसी को हर्ज नहीं होगा कि सर्जिकल स्ट्राइक अगले आम चुनाव का एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनेगा। वास्तव में कांग्रेस तथा भाजपा के बीच सर्जिकल स्ट्राइक के ठीक 21 महीने बाद आए वीडियो पर जो वाकयुद्ध चल रहा है उसका अंत संभव नहीं है। सेना के पराक्रम पर राजनीति अपने आपमें बुरी नहीं है। उद्देश्य यदि स्वयं सेना के अंदर उत्साह पैदा करना तथा देशवासियों का मनोबल बनाए रखना हो तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। क्या वर्तमान राजनीति इस श्रेणी में आएगी? कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरेजवाला ने आरोप लगाया है कि भाजपा सेना के पराक्रम का राजनीतिक दुरुपयोग कर रही है। श्रेय सेना को देने की बजाय मोदी को दिया जा रहा है। उनके अनुसार सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो जारी करने की आवश्यकता नहीं थी। भाजपा का प्रति हमला यह है कि कांग्रेस हमेशा सेना का मनोबल तोड़ने का काम करती है और उसके पराक्रम पर प्रश्न उठाती है।

सच यह है कि संसदीय लोकतंत्र में सैन्य सफलताओं का श्रेय सत्तासीन पार्टियां प्रत्यक्ष-परोक्ष दुनिया भर में उठाती हैं। आखिर सैन्य विफलताओं का ठीकरा भी तो उसी के सिर फूटता है। जरा सोचिए, 28-29 सितंबर 2016 की आधी रात से सुबह 6.15 बजे तक चले उस अभियान में हमारे कुछ सैनिक सीमा पार शहीद हो गए होते तो क्या होता? विपक्ष और हम पत्रकारों ने किस तरह सरकार को कठघरे में खड़ा किया होता इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। इस कार्रवाई के अगले दिन सेना के तत्कालीन डीजीएमओ यानी सैन्य ऑपरेशनों के महानिदेशक रणबीर सिंह और विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता विकास स्वरूप ने पत्रकार वार्ता में इसकी जानकारी दी थी। कायदे से चारों ओर उसका स्वागत होना चाहिए था। उस समय के कुछ नेताओं के बयान याद करिए। कांग्रेस ने पार्टी के स्तर पर नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन संजय निरुपम ने इसे फर्जीकल स्ट्राइक कहा था। ये अकेले ऐसा कहने वाले नहीं थे। आप उस समय समाचार चैनलों पर चलने वाले बहसों तथा समाचार पत्रों में आई खबरों को याद करिए तो कांग्रेस सहित विरोधी पार्टियों के अनेक नेता यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि सीमा पार करके स्ट्राइक किया गया है। सुबूत मांगने वाले भी थे। गाहे-बगाहे ऐसे बयान अभी तक आ रहे थे। निरुपम ने तो वीडियो आने के बाद भी कहा कि पूरी मोदी सरकार ही फर्जी है। तब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा था कि पाकिस्तान बस में भरकर विदेशी पत्रकारों को उस जगह पर ले गया और दिखा दिया कि कुछ हुआ ही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर इसके सबूत मांगे। ध्यान रखिए, सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी देश को सेना की ओर से दिया गया था। इसलिए आप अविश्वास कर रहे थे तो अपनी सेना पर। केजरीवाल ने पाकिस्तान के खंडन पर तो विश्वास किया, अपनी सेना के बयान पर नहीं। पी. चिदम्बरम ने भी बाद में अपने स्तंभ में फर्जिकल स्ट्राइक शब्द ही प्रयोग किया। ये सारे बयान राजनीति के मद्दे नजर दिए जा रहे थे। सबको लग रहा था कि भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ मिल जाएगा।  

हालांकि डीजीएमओ की पत्रकार वार्ता के बाद देश भर में रोमांच महसूस किया जा रहा था। किंतु ऐसे बयानों से संदेह भी पैदा हो रहा था। पाकिस्तान ने इससे इन्कार कर दिया था। इसलिए वीडियो जारी करना आवश्यक था। आठ मिनट के वीडियो में देखा जा सकता है कि किस तरह लक्ष्यो को भेदा जा रहा है। कम से कम अब कोई संदेह नहीं रहेगा। दुनिया में भी यह संदेश चला गया कि भारत के पास ऐसा स्ट्राइक करने की क्षमता है जिन पर कुछ प्रमुख देशों को ही विशेषज्ञता प्राप्त थी। वास्तव में वीडियो जारी होने के बाद इस पर खड़े संदेह के बादल छंट गए हैं। पूरा मनोविज्ञान फिर रोमांच का निर्मित हो चुका है। सामान्यतः सर्जिकल स्ट्राइक जहां भी हुए उनके वीडियो काफी समय बाद जारी किए गए। तुरत जारी करना इसलिए भी संभव नहीं था, क्योंकि रात के अंधेरे में ड्रोन और अनमैन्ड एरियल वीइकल (यूएवी) से शूट किए गए तथा ऑपरेशन को मॉनिटर करने वाले सेना के थर्मल इमेजिंग कैमरा में कैप्चर वीडियो को एक साथ मिलाने और आवश्यक अंश छांटने में समय लगता है। वीडियो में इस बात का ध्यान रखा गया है कि हमारे जवानों के पाक अधिकृत कश्मीर में प्रवेश करने और वापस आने के रास्ते न दिखें। इनसे भविष्य में सुरक्षा को खतरा पहुंच सकता था। इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि इससे जवानों की जान को जोखिम में डाल दिया गया है।

जैसा हम जानते हैं 18 सितंबर 2016 की सुबह बारामुला के उड़ी सैन्य शिविर पर आतंकवादियों ने अचानक हमला कर दिया और वहां ज्वलनशील पदार्थों में लगी आग में 17 जवान शहीद हो गए तथा 3 घायल सैनिक अस्पताल में वीरगति को प्राप्त हुए। हमले के बाद पूरे देश में आक्रोश का माहौल था और बदले की मांग हो रही थी। सर्जिकल स्ट्राइक ठीक इसके दस दिन बाद हो गया। इसका मतलब हुआ कि हमले के तुरत बाद ही सरकार से हरि झंडी मिल गई थी एवं तैयारी की जा रही थी। वीडियो के साथ बहुत सारे तथ्य भी सामने आ गए हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के प्रभारी तत्कालीन नॉर्दर्न कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) डी.एस.हुड्डा ने वीडियो जारी होने के बाद कई बातें कहीं हैं। उन्होंने कहा है कि फैसला प्रधानमंत्री के स्तर पर लिया गया था जिसे सेना ने स्वीकार किया था। हुडा के अनुसार ऑपरेशन को उधमपुर स्थित नॉर्दन कमांड के मुख्यालय के कंट्रोल रूम से मॉनिटर किया जा रहा था। सीमा पार जाने वाली टीम की एक मुख्य चुनौती यह भी थी कि आतंकवदियों के लौचिंग पैड पाकिस्तानी सैन्य पोस्ट के करीब थे। यानी हमारे स्पेशल फोर्सेंज के जवानों को कार्रवाई इस तरह करनी थी कि दूसरी तरफ से जवाबी कार्रवाई का मौका न मिले। उपग्रहों के माध्यम से सेना को आतंकवादियों के लॉन्च पैड्स की जगहें बिल्कुल सुनिश्चित कर दीं गईं। यह भी साफ हो गया है कि दस दिनों में नरेंद्र मोदी, तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल और डीजीएमओ रणबीर सिंह ने लगातार बैठकें और ऑपरेशन की मॉनिटरिंग की थी।

बेशक, इसके पहले भी सेना ने सीमा पार कर कार्रवाई की है। जो तिथियां कार्रवाइयों की बताई जा रहीं हैं वे वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकार के कार्यकाल की हैं। किंतु इतने विस्तृत क्षेत्र में सर्जिकल स्ट्राइक पहली बार हुआ है। सात अलग-अलग स्थानों पर स्थित आतंकवादियों और सेना की उपस्थिति में लौचिंग पैडों को ध्वस्त करना किसी सामान्य कार्रवाई में संभव नहीं था। इसका मतलब है कि अलग-अलग टोलियों में जवानों को जाना पड़ा होगा। कहा जा सकता है कि उसके बाद भी न सीमा पर युद्ध विराम का उल्लंघन कम हुआ न ही आतंकवादी हमले। पर इसके दूसरे पहलू भी हैं। पाकिस्तान भारत पर ज्यादा युद्धविराम उल्लंघन का आरोप लगाता है। हमारे उच्चायक्त को बार-बार बुलाकर वहां का विदेश मंत्रालय शिकायत करता रहता है। दूसरे, पिछले दो सालों में रिकॉर्ड संख्या में आतंकवादी मारे गए हैं। यह तब हुआ है जब जम्मू कश्मीर में सैन्य कार्रवाई की विरोधी पीडीपी के साथ भाजपा की सरकार थी। आतंकवादी हमले के दस दिनों के अंदर इतनी बड़ी कार्रवाई इसे विशिष्ट बनाता है। बहरहाल, अब जब वीडियो आ गया है, कार्रवाई के तत्कालीन प्रभारी ने भी वक्तव्यों से उसकी पुष्टि कर दी है इस पर नकारात्मक टिप्पणियां बंद होनी चाहिए। कांग्रेस और दूसरे विरोधी दल न भूलें कि ऐसे मामले पर मोदी सरकार को घेरने की उनकी रणनीति के उल्टे राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं। 1999 में करगिल युद्ध के दौरान भी कांग्रेस ने वाजपेयी सरकार पर लगातार हमला किया था। उसके बाद हुए चुनाव में राजग विजयी हुआ और कांग्रेस उस समय तक सबसे कम सीटों पर सिमट गई। आप नकारात्मक टिप्पणिंयां नहीं करेंगे तो भाजपा को आपको सेना विरोधी कहने का अवसर भी नहीं मिलेगा। वैसे भी सरकार पर राजनीतिक हमला करने के लिए रक्षा और विदेश नीति को निशाने पर लाना उचित नहीं है। इससे कई बार सरकार के विरोध की जगह देश का विरोध हो जाता है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

शुक्रवार, 29 जून 2018

आजाद और सोज के बयान निंदनीय

 

अवधेश कुमार

जम्मू कश्मीर को लेकर कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं गुलाम नबी आजाद एवं सैफुद्दीन सोज के बयानों पर देश जिस तरह से उद्वेलित हुआ है वह बिल्कुल स्वाभाविक है। ऐसे देश विरोधी बयानों पर भी यदि देश नहीं उबले तो फिर हमारे शरीर में रक्त नहीं पानी बह रहा है। यह सामान्य बात नहीं है कि एक ऐसा नेता जो नौ बार सांसद रहा हो, केन्द्र में मंत्री रहा हो वह कश्मीर की आजादी की बात और उतने सहज ढंग से करे। इसी तरह ऐसा नेता, जो जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री रहा हो, केन्द्र में कई बार मंत्री रहा हो, राज्यसभा में विपक्ष का नेता हो, कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के मुख्य रणनीतिकारों में हो वह सेना की कार्रवाई को नरसंहार कहे तो देश को यह विचार करना पड़ता है कि आखिर ये जो दिखते हैं और जो हैं उनमें वाकई अंतर है क्या?  कांग्रेस ने भी सोज के बयानों की तो निंदा कर दी लेकिन सारे नेता और प्रवक्ता आजाद के बयान को सही ठहराने में लगे रहे। इसका कारण एक ही हो सकता है कि आजाद राहुल गांधी और सोनिया गांधी के करीबी हैं, अन्यथा आम कांग्रेसी भी उनके बयान के खिलाफ है।

तो आइए पहले बयानों को देखें। सैफुद्दीन सोज कहते हैं कि मुशर्रफ कहते थे कि कश्मीरियों की पहली पसंद तो आजादी है। मुशर्रफ का बयान तब भी सही था, आज भी सही है। सोज ने अपनी किताब कश्मीरः ग्लिम्प्सेस ऑफ हिस्ट्री एंड द स्टोरी ऑफ स्ट्रगल में मुशर्रफ को उद्धृत करते हुए कहा कि अगर कश्मीरियों को अपनी राह चुनने का मौका दिया जाए तो वे आजादी को तरजीह देंगे। अगर भारत की मुख्यधारा का कोई नेता पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की कश्मीर संबंधी बातों से इस तरह सहमत होता है तो उसे क्या नाम दिया जाए इसके लिए शब्द तलाशना मुश्किल है। यहीं आजाद के बयान पर एक नजर डाल लिया जाए। कई टीवी चैनलों पर जो उनके बयान दिखाए गए वो बाद कें हैं जिसमें वे केवल अपने पूर्व बयान की सफाई दे रहे हैं। सरकार केवल आतंकवादियों के मरने की संख्या दे रही है आम नागरिकों एवं जवानों की नहीं। दरअसल, उन्होंने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा था कि सरकार चार आतंकवादियों को मारती है तो उसके साथ 20 नागरिकों को भी मार देती है। सरकार की कार्रवाई आतंकवादियों से ज्यादा सिविलियंस यानी नागरिकों के खिलाफ रहती है। पुलवामा में सिर्फ एक आतंकी मारे गए और 13 आम लोग मार डाले गए। ऑलआउट ऑपरेशन शुरू करने के ये मायने हैं कि वे नरसंहार करना चाह रहे हैं।

लश्कर-ए-तैयबा के प्रवक्ता अब्दुल्ला गजनवी ने कश्मीर के मीडिया को भेजे बयान में कहा कि गुलाम नबी आजाद जो कहते हैं, हमारा भी शुरुआत से यही मानना है। लश्कर को उद्धृत करने का उद्देश्य यह बताना है कि आजाद की भाषा किस तरह सीमा पार बैठे आतंकवादी संगठन की सोच से मिलती है। हाफिज सईद ने भी कह दिया कि कश्मीर में भी कुछ अच्छे लोग हैं। क्या आजाद सईद का यह प्रमाण पत्र स्वीकार करेंगे? इन दोनों नेताओं के बयानों को पाकिस्तान मीडिया में पूरी जगह मिली है। वास्तव में इनकी भाषा में और आतंकवादियों तथा पाकिस्तानी पिट्ठू अलगाववादियों की भाषा में कोई अंतर नहीं है। हालांकि सोज का पाखंड तो कई बार उजागर हो चुका है। जब वे नेशनल कॉन्फ्रेंस में थे तो इस विचार से उनको घाटी में वोट मिलता था। इस पार्टी की नीति एक साथ कई भाषा बोलने की रही है। किंतु कांग्रेस में आने के बाद उनको सहन किया गया यह चिंता का विषय है। एक उदाहरण तो पिछले वर्ष का ही है। 12 अप्रैल 2017 को राजधानी स्थिति इंडिया इंटरनेशल सेंटर में इंप्रूविंग इंडो-पाक रिलेशन नाम से एक कार्यक्रम में जिसमें पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी भी शामिल थे सोज ने साफ कहा कि कश्मीर की हालिया समस्या के लिए केवल भारत दोषी है पाकिस्तान नहीं। उनके भाषण पर हंगामा हुआ। कई दिनों तक चर्चा हुई। कांग्रेस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इस प्रकार का दोहरा चरित्र वहां के नेताओं में आम है। फारुक अब्दुल्ला स्वयं ऐसे बयान देते रहते हैं। उन्होंने कभी कहा कि पाक अधिकृत कश्मीर आपके बाप का है तो कभी कश्मीरी भाषा में घाटी में भाषण देते हुए कहा कि हुर्रियत, आप हमको अपने से अलग न समझो, इससे आगे बढ़कर उन्होंने पत्थरबाजों को अपने मुल्क के लिए संघर्ष करने वाला बता दिया। आखिर ये भी तो केन्द्रीय मंत्री रहे हैं।

ये भारतीय संविधान के तहत शपथ लेते हैं और अंदर भारत के प्रति इनकी वितृष्णा भी रहती है। तभी तो नेहरु जी ने उनके पिता शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया था। अब आजाद की और लौटें। कई लोग आंकड़ों से यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि आजाद की बातें गलत हैं। यह बिल्कुल सच है कि आतंकवादी ज्यादा मारे गए हैं और उनकी तुलना में आम नागरिक बिल्कुल कम। लेकिन जिस तरह घाटी के पांच जिलों में ये तथाकथित आम लोग सुरक्षा बलों के साथ व्यवहार करते हैं उसमें यदि इनकी संख्या बढ़ भी जाए तो इसमें क्या समस्या है। ये पाकिस्तान के साथ लश्कर, आईएस और न जाने किन संगठनों का झंडा लेकर मजहबी, भारत मुर्दाबाद तथा आजादी के नारे लगाते हैं, पत्थरों से सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं, उनसे जूझते हैं....आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में ढाल बनकर आ जाते हैं उनमें यदि सुरक्षा बल संयम से काम न लें, पत्थरों के जख्मों को झेलते हुए शांत न रहें तो कुछ भी हो सकता है। याद दिलाने की आवश्यकता है कि यह स्थिति आजाद के मुख्यमंत्रीत्व काल में ही पैदा हुई जो धीरे-धीरे कांग्रेस नेशनल कान्फ्रेंस सरकार में बढ़ते-बढ़ते यहां तक पहुंची है। आजाद की सरकार ने जून 2008 में 39.88 एकड़ बंजर भूमि श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को यात्रियों की सुख-सुविधा के लिए अस्थायी निर्माण के लिए आवंटित किया था। उसके खिलाफ अलगाववादियों ने आंदोलन आरंभ कर दिया, पीडीपी एवं नेशनल कॉन्फ्रेंस में विरोध करने की होड़ लग गई। लंबे समय से जो घाटी शांत दिख रही थी उसमें आग लग गई। अंत में यह निर्णय वापस लिया गया तो उसके विरोध में जम्मू में पहली बार लोग आक्रामक होकर सड़कों पर उतरे। कश्मीर में आजादी का नारा बीते दिनों की बात हो गई थी। हुर्रियत नेताओं को कोई पूछ नहीं रहा था। अचानक इस्लाम के साथ पाकिस्तानी झंडे लहारने लगे। उस समय जो नारे लगे उनको देखिए- भारत की मौत आई, लश्कर आई लश्कर आई,’ ‘जियो-जियो पाकिस्तान हमारी मंडी, हमारी मंडी, रावलपिंडी, रावलपिंडी, ‘ हमें क्या चाहिए आजादी, ‘ छीन के लेंगे आजादीहम हिंद से कश्मीर को आजाद कराके रहेंगे, हम कॉम के नवजवान हैं जेहाद करेंगे,...आदि आदि। एक महीने में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। आजाद ने इनको नियंत्रित करने का प्रयास ही नहीं किया। हालांकि उनकी सरकार भी चली गई। 18 अगस्त 2008 को एक लाख लोगों का उग्र जुलूस भारत विरोधी नारा लगाते हुए श्रीनगर पहुंचा और वह मानमानी करता रहा, उसे रोकने वाला कोई न था। सुरक्षा बलों के हाथ बांध दिए गए थे। ऐसा डरावना दृश्य कश्मीर में इसके पहले कभी नहीं देखा गया था। 2010 आते-आते पत्थरबाजी आरंभ हो चुकी थी।

कहने का तात्पर्य यह कि देन तो आपकी ही है। केन्द्र की यूपीए सरकार को भी जितना सख्त होना चाहिए था नहीं हुई और नौबत आज यहां तक पहुंच गई है। वास्तव में आजाद ने जो कहा वह केवल तथ्यों से परे व अव्यावहारिक ही नहीं, आपत्तिजनक और देश विरोधी भी है। यह भारत को बदनाम करने वाला, सुरक्षा बलों को बदनाम करने वाला, उनका मनोबल तोड़ने वाला तथा आतंकवादियों एवं अलगाववादियों के साथ पाकिस्तान का पक्ष मजबूत करने वाला है। गलत तथ्य देने तथा सुरक्षा बलों पर गलत आरोप लगाने के कारण उन पर मुकदमा होना चाहिए। किंतु सरकार इस सीमा तक जाएगी नहीं। इसलिए आम जनता की हैसियत से हम आप इसका जितना पुरजोर विरोध और निंदा हो करें ताकि दूसरे नेता देश की निंदा करने से बचें।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 981102708 

 

 

शुक्रवार, 22 जून 2018

इस गठबंधन की यही नियति थी

 

अवधेश कुमार

जब 19 जून की सुबह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भाजपा अध्यक्ष अतिम शाह से मिलने आए और उसके बाद उनकी जम्मू-कश्मीर के भाजपा नेताओं के साथ बैठक हुई तो यह आभास हो गया कि कुछ होने वाला है। हां, ये प्रदेश सरकार से बाहर आने का ऐलान करेंगे यहां तक शायद ही किसी की सोच गई हो। हालांकि भाजपा पीडीपी सरकार कार्यकाल पूरा करती तो यह आश्चर्य का विषय होता। जम्मू कश्मीर के संदर्भ में दोनों की विचारधारा में दो ध्रुवों को अंतर है। उसमें यह गठबंधन करीब सवा तीन वर्ष चल गया यही सामान्य बात नहीं है। 8-9 जून को गृहमंत्री राजनाथ सिंह जम्मू कश्मीर की यात्रा पर थे जिसमंे मेहबूबा मुफ्ती के साथ जब भी वे सामने आए ऐसा आभास हुआ ही नहीं कि वाकई गठबंधन को लेकर कोई तनाव है। प्रदेश सरकार द्वारा भारी संख्या में पत्थरबाजों की रिहाई पर उनसे प्रश्न किया गया तो उन्होंने का कि बच्चे थे माफ कर दिया। इसका संदेश यही गया कि मेहबूबा की इस नीति को केन्द्र सरकार का समर्थन है। गृहमंत्री के पूर्व 19 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां गए थे। उन्होंने अपनी यात्रा में करीब 32 हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं की नींव रखी या शिलान्यास किया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि सभी समस्याओं का हल विकास है। हम दीपावली मनाने भी आपके बीच आए थे और इस बार रमजान में आए हैं। इन सबका संदेश यही था कि केन्द्र सरकार भी मेहबूबा मुफ्ती और उनके मरहूम पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद की तरह लोगों का विश्वास जीतने की नीति पर चल रही है। तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि भाजपा ने प्रधानमंत्री की यात्रा के एक महीने तथा गृहमंत्री की यात्रा के दस दिनों बाद ही सरकार से अलग होने का फैसला कर लिया?

सरकार से अलग होने की घोषणा करते हुए भाजपा के महासचिव राम माधव ने कहा कि घाटी में आतंकवाद, कट्टरपंथ और हिंसा बढ़ रही है। लोगों के जीने का अधिकार और बोलने की आजादी भी खतरे में है। पत्रकार शुजात बुखारी की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई किंतु सरकार कुछ नहीं कर सकी। रमजान के दौरान हमने ऑपरेशन रोके, ताकि लोगों को सहूलियत मिले। हमें लगा कि अलगाववादी ताकतें और आतंकवादी भी हमारे इस कदम पर अच्छी प्रतिक्रिया देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। महबूबा मुफ्ती हालात संभालने में नाकाम साबित हुईं। राज्य के तीनों क्षेत्र जम्मू, लद्दाख और कश्मीर के समान विकास के लिए केंद्र ने पूरा सहयोग दिया पर राज्य सरकार द्वारा जम्मू क्षेत्र के साथ भेदभाव किया गया। अगर यहीं कारण हैं तो ये एक दो दिनों में पैदा नहीं हो गए। फिर इसी समय क्यों?

वस्तुतः केन्द्र सरकार ने मेहबूबा का आग्रह मानकर रमजान के दौरान सैन्य कार्रवाई स्थगित कर दिया, जिसका परिणाम अच्छा नहीं आया। एक महीने की समीक्षा के बाद इसे बनाए रखने का कोई आधार नहीं था। सरकार ने अपनी गलती सुधारी और सेना को ऑपरेशन ऑल आउट फिर से चलाने का आदेश मिल गया। मेहबूबा किसी सूरत में इसके पक्ष में नहीं थीं। वो सैन्य कार्रवाई स्थायी रुप से रोकना चाहतीं थीं। मेहबूबा का यही बयान है कि जम्मू-कश्मीर में सख्ती की नीति नहीं चल सकती है। इससे कौन राष्ट्रीय पार्टी सहमत हो सकती है। यह मतभेद ऐसा था जिसमें बीच का रास्ता नहीं बचा था। संभव था मेहबूबा इसे एक बड़ा मुद्दा बनाती, इसके साथ कुछ और मुद्दे जोड़ती और इस्तीफा देती। भाजपा उनको ऐसा मौका नहीं देना चाहती थी इसलिए उसने पहले ही फैसला कर लिया। वैसे अनेक विषय थे जिनमें दोनों के बीच एक राय नहीं हो सकती। भाजपा के फैसले के बाद मेहबूबा ने पत्रकार वार्ता करके यह बताने की कोशिश की कि उन्होंने खंडित जनादेश को देखते हुए केन्द्र सरकार की पार्टी के साथ इसलिए गठबंधन करके सरकार बनाया ताकि कश्मीर समस्या का हल किया जा सके। उन्होंने अपनी उपलब्धियां क्या गिनाईं? रमजान के दौरान संघर्ष विराम, करीब 11 हजार पत्थरबाजों से मुकदमा हटाना, अनेक नेताओं पर से मुकदमा खत्म करना, भाजपा के साथ रहते हुए अनुच्छेद 370 को बचाना, भारत पाकिस्तान के बीच बातचीत करवाना.... आदि। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दिसंबर 2015 में लाहौर जाने का श्रेय भी स्वयं ले लिया।

हम जानते हैं कि न प्रधानमंत्री के लाहौर जाने में उनकी कोई भूमिका थी और न अनुच्छेद 370 बचाने में। भाजपा अनुच्छेद 370 हटाने की दिशा में कोई काम कर ही नहीं रही है। यह सही है कि भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार चलाने के लिए सीमा से ज्यादा समझौता किया। मुफ्ती मोहम्मद सईद ने ही मशर्रत आलम जैसे कई अलगावादी नेताओं के मुकदमे वापस लिए। आसिया अंद्राबी द्वारा पाकिस्तानी झंडा फहराने एवं भारत के विरुद्ध देशविरोधी भाषण के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई। यह सब भाजपा की नीति के विरुद्ध था।  कहने का तात्पर्य यह कि पीडीपी जितना संभव था अपने एजेंडे को पूरा करने में लगी रही। मुफ्ती सईद के इंतकाल के बाद मेहबूबा भी उसी रास्ते चलीं। इससे गठबंधन के अंदर तनाव बढ़ता रहा। पत्थरबाजों की रिहाई के बारे में गृहमंत्री चाहे जो कहें स्थानीय पार्टी ईकाई तथा सरकार के भाजपा में मंत्रियों के लिए अपने मतदाताओं को जवाब देना कठिन था। उसके बाद कठुआ में नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म एवं हत्या की घटना में मेहबूबा ने कश्मीर की अपराध शाखा से जांच कराई। पूरे जम्मू में यह वातावरण बना कि निरपराध हिन्दुओं को फंसाया जा रहा है, भाजपा के दो मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया, पूरा आंदोलन चला लेकिन हुआ कुछ नहीं। फिर सरकारी भूमि से गुज्जर, बक्करवालों को न हटाने जैसे फैसले कर मेहबूबा ने भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा की। मजहबी संगठन अहले हदीस को सरकारी भूमि देने के मामले में भी मेहबूबा ने भाजपा की नहीं सुनी। एक ओर वो अपने अनुसार फैसले ले रहीं थी लेकिन श्री बाबा अमरनाथ भूमि आंदोलन में हिस्सा लेने वाले युवाओं के खिलाफ मामले वापस लेने के लिए राजी नहीं हुई। भाजपा के सामने साफ हो गया कि जिस जम्मू ने उसे 25 सीटें दीं वहां से उसका जनाधार खिसक रहा है।

मेहबूबा आतंकवादियों के केवल सैन्य कार्रवाइयों के ही खिलाफ नहीं थीं, वो बार-बार पाकिस्तान के साथ बातचीत करने का अनुरोध कर रहीं थीं। पाकिस्तान से बातचीत राष्ट्र की विदेश नीति का विषय है। मेहबूबा चाहती थी कि केंद्र सरकार हुर्रियत समेत सभी अलगाववादियों से भी बातचीत करे। हालांकि उसके लगातार आग्रह पर केन्द्र सरकार ने दिनेश्वर सिंह को वार्ताकार नियुक्त किया लेकिन यह साफ नहीं किया कि उनको किससे बात करनी है और उसका आधार क्या होगा। हुर्रियत के बारे में मोदी सरकार का कड़ा रुख रहा है। मेहबूबा के कारण कुछ नरमी आई लेकिन एक सीमा से आगे जाना उसके लिए राजनीतिक मौत होता और इससे कश्मीर समस्या के समाधान की भी कोई संभावना नहीं बनती। इसके पहले भी हुर्रियत के साथ बातें हुईं हैं उनका जब कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला तो आगे निकलेगा यह मानने का कोई कारण ही नहीं था।

सच यह है कि भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार के लिए एजेंडा नामक एक साझा कार्यक्रम बनाकर गठबंधन अवश्य किया लेकिन साफ था कि इसमें भाजपा ने अपने लगभग सारे मुद्दों का परित्याग किया। पीडीपी को यदि 28 सीटें मिलीं थीं तो भाजपा को 25। तब भाजपा को दो निर्दलीयों का भी समर्थन मिल गया था। ंिकंतु उसे कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय नहीं मिला। उसके मंत्री सरकार में दोयम दर्जे की मानसिकता में काम कर रहे थे। ऐसे गठबंधन को तो खत्म होना ही था। हालांकि यह मानना भी गलत होगा कि भाजपा ने बिल्कुल हथियार डाल दिया। एनआईए ने आतंकवाद के वित्त पोषण की जांच करते हुए अलगाववादी नेताओं को जेल में डाला है। यह मेहबूबा को नागवार गुजर रहा था। एनआईए की छानबीन से साफ हो रहा था कि कुछ और नेता अंदर जा सकते हैं। वैसे पीडीपी के साथ 2002 में कांग्रेस ने भी गठबंधन किया था। मुफ्ती सईद तीन वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे एवं कांग्रेस के लिए परेशानियां पैदा करते रहे। समझौते के अनुसार जब गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री हुए उन्होंने अपना रंग दिखाना शुरु कर दिया। आजाद के लिए काम करना मुश्किल हो गया और एक समय आया जब उन्होंने इस्तीफा दे दिया। जब कांग्रेस के साथ पीडीपी की पटरी नहीं बैठी तो भाजपा के साथ कैसे निबह सकती थी। भाजपा ने इस गठबंधन से काफी कुछ खोया है। अब उसके पास अवसर है कश्मीर में आतंकवादियों का सफाया कर और अलगाववादियों की कमर तोड़कर इसकी भरपाई करे। हां, वहां ज्यादा दिनों तक राज्यपाल शासन लगाए रखना भी उचित नहीं होगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

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