शुक्रवार, 11 मई 2018

पर्यटक की मौत पर आंसू बहाना पर्याप्त नहीं

 

अवधेश कुमार

कश्मीर में पत्थरबाजी आतंक से निपटना सुरक्षा बलांे के लिए गंभीर चुनौती रही है। यह एक आम स्थिति हो गई है कि सुरक्षा बल जहां भी आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन करते हैं पत्थरबाज वहां पहंचकर पत्थरबाजी शुरु करते हैं। उसमें सुरक्षा बल भी घायल होते हैं, शहीद होते हैं और पत्थरबाज भी सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई का निशाना बनते हैं। पत्थर आतंक से हुई दर्दनाक घटनाओं की एक लंबी सूची है। ंिकंतु इस समय पत्थरबाजों का शिकार हुए चेन्नई के 22 वर्षीय पर्यटक आर थिरुमनी की दर्दनाक मौत ने इसे एक नया मोड़ दे दिया है। आप देख लीजिए मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती एवं फारुख अब्दुल्ला दोनांे ने तो एक स्वर से इसकी निंदा की ही है, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने भी इसकी आलोचना की है। मेहबूबा मुफ्ती ने कहा कि इससे मेरा सिर शर्म से झुक गया है। यह अत्यंत दुखद और पीड़ादायक है। उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट कर लिखा कि हमने एक पर्यटक की जान उसके वाहन पर पथराव करके ली है। यह एक कठोर सच्चाई है कि हमने एक मेहमान की जान ली है और वह भी इन पत्थरबाजों के तरीकों को सही ठहराते हुए। हमें इस पर सोचना चाहिए। कृपया इस तथ्य पर गौर करें कि हमने एक पर्यटक, एक अतिथि पर पत्थर मारे जिससे उसकी मौत हो गई। ऐसा तब है जब हम इन पत्थरबाजों और उनके तरीकों का महिमामंडन करते हैं। इस युवा पर्यटक की मेरे चुनावी क्षेत्र में मौत हो गई। जबकि मैं इन गुंडों, उनके तरीकों और उनकी विचारधारा का समर्थन नहीं करता।

वास्तव में यह ऐसी घटना है जिसका खुलकर समर्थन करना किसी के लिए संभव नहीं। सभी राजनीतिक दलों ने एक स्वर से इस घटना की निंदा की है तथा पीडीपी भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। उमर अब्दुल्ला पूछ रहे हैं कि आखिर राज्य सरकार हत्यारों को बचाने का प्रयास क्यों कर रही है। हमेशा अलगावादी भाषा बोलने वाले निर्दलीय विधायक इंजीनियर रशीद ने भी सरकार पर पर्यटक को बचाने में नाकाम रहने का आरोप लगा दिया है। नैशनल पैंथर्स पार्टी के प्रमुख भीम सिंह  सरकार को पूरी तरह से विफल बता रहे हैं। उनका कहना है कि जिस दिन जनता सरकार को बदल देगी, सूबे में पत्थर बरसने बंद हो जाएंगे। यहां तक कि शोपियां में हुई मौत के खिलाफ बंद और प्रदर्शन का अह्वान करने वाले अलगावावादी नेता मीरवाइज उमर फारूक ने इस घटना को गुंडागर्दी करार दे दिया। अन्य नेताओं के भी ऐसे ही बयान हैं।

इससे ऐसा लग सकता है कि कश्मीर में सारी पार्टियां और नेता पत्थरबाजों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। इंजिनियिर राशिद का बयान है कि यदि घाटी में पत्थरबाजी का लोग निशाना बनेंगे तो फिर कोई यहां क्यों आएगा। किंतु इससे किसी प्रकार की गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए। पर्यटन कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। वहां की बहुसंख्य जनता के लिए यह जीविकोपार्जन का मुख्य साधन है। यदि पर्यटक वहां इस तरह हमले का शिकार होंगे तो फिर कश्मीर में कौन पांव रखना चाहेगा। चंूंकि पर्यटक के मारे जाने तथा कुछ के घायल होने के कारण वहां का वातावरण अभी प्रतिकूल है इसलिए ऐसे बयान आ रहे हैं। उदाहरण के लिए उमर अब्दुल्ला का ही बयान ले लीजिए। वे कह रहे हैं कि हम अपनी मेहमाननवाजी के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं और हमने अपने मेहमानों के साथ जैसा सलूक किया और चेन्नै से एक मेहमान इसमें मारे गए, इससे ज्यादा शर्म की बात नहीं हो सकती। एक आंकड़ा हमारे सामने आया है। 8 जुलाई 2016 को आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद जबसे पत्थरबाजी तेज हुई है कश्मीर आने वाले पर्यटकांे की संख्या में गिरावट आई इै।  2016 के पहले चार महीने में 3,91,902 पर्यटक आए थे। अगले साल इन्हीं महीने में इनकी संख्या 1,69,727 तथा इस वर्ष इसी अवधि में 1,54,062 पर्यटक आए हैं। यह सरकार के साथ सभी पार्टियों के लिए चिंता का विषय है। कारण, पर्यटन नही ंतो फिर कश्मीरी जिएंगे कैसे?  सवाल है कि अगर पर्यटक नहीं मारे गए होते तो क्या इनका स्वर ऐसा ही निकलता? यही मूल प्रश्न है जिसका उत्तर हमेे तलाशना है।

शोपियां में 6 मई को एक बड़े आतंकरोधी अभियान में पांच आतंकवादी मारे गए। इस अभियान से बुरहान वानी गैंग का सफाया हो गया। यह सुरक्षा एजेंसियों की बहुत बड़ी सफलता थी। ंिकंतु इन आतंकवादियों को बचाने आए पत्थरबाजों मंे से भी पांच की मौत हो गई। इसके बाद हुर्रियत एवं अन्य समर्थकों ने बंद तथा प्रदर्शन की घोषणा कर दी। इस कारण पथराव का विस्तार अन्य क्षेत्रांे में भी हुआ। पत्थरबाज जहां वाहन देखते उसी पर हमला करने लगते। 7 मई शाम को गुलमर्ग से पर्यटकों का एक दल श्रीनगर लौट रहा था। रास्ते में श्रीनगर-बारामुला हाईवे पर स्थित नारबल के पास भड़काऊ नारेबाजी कर रहे तत्वों ने उनके वाहनों पर पथराव शुरू कर दिया। इन वाहनों में सवार पर्यटकों को चोटें आई और दो गंभीर रूप से घायल हो गए। पुलिस ने घायल पर्यटकों को तुरंत शेरे कश्मीर आयुर्विज्ञान अस्पताल सौरा पहुंचाया, जहां चेन्नई के पर्यटक की मौत हो गई। उसके सिर पर गंभीर चोटें आई थीं। उनके साथ घायल होने वाली हंदवाड़ा की सबरीना की हालत भी गंभीर बनी हुई है। हालांकि दिवंगत पर्यटक का शव जहां पोस्टमार्टम के लिए पुलिस अस्पताल ले जाया गया था वहां मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और स्वास्थ्य राज्यमंत्री आसिया नक्काश भी पहुंचीं। मुख्यमंत्री ने पीडित पर्यटक परिवार के साथ अपनी संवेदना जताई। यह एक सही कदम था। किंतु कल्पना करिए यदि पत्थरबाजों द्वारा कोई सुरक्षा बल शहीद किया गया होता तो भी मेहबूबा इसी तरह संवेदना व्यक्त करने पहुंचतीं और नेताओं के बयान इसी तरह आते?

अभी तक के इनके रवैये को देखते हुए तो इसका उत्तर है, नहीं। इंजिनियर राशिद को ही देखिए। एक तरफ तो वे पर्यटक के मारे जाने पर अफसोस प्रकट करते हैं दूसरी ओर कहते हैं कि शोपियां में सिर्फ 1 दिन में 11 कश्मीरियों ने अपनी जवान गईं। आतंकवादी और उनके समर्थकांे के प्रति ऐसी हमदर्दी इन नेताओं में लगातार देखी जा रही है। यह इन्हीं का रवैया है जिससे पत्थरबाजी अब वहां आतंकवादियों के लिए रक्षा कवच तथा सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। ऐसी दुखद घटनाओं की लंबी सूची यहां प्रस्तुत की जा सकती है जिसमंे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पहुंचे सुरक्षा बलांे सामने पत्थरबाज आ धमके और उनकी आड़ में हमारे जवान शहीद हुए और घायल हुए। अगर उसमें कुछ पत्थरबाज मारे गए तो नेताओं का बयान उनके पक्ष में ही जाता था। उमर अब्दुल्ला ने ही कई बार बयान दिया कि सुरक्षा बलों ने संयम से काम लिया होता तो नागरिक नहीं मारे जाते। उसके साथ अलगाववादी ताकतें बंद आयोजित कर देतीं हैं जिसमें प्रदर्शन होता है, पत्थर चलते हैं और उनकी चपेट में कोई भी आ सकता है। वैसे इन्हीं पत्थरबाजों ने कुछ समय पहले बच्चों की स्कूल बस पर हमला कर दिया था। क्यों? आखिर इन बच्चों ने इनका क्या बिगाड़ा था? पर्यटकों पर भी इनके हमले बढ़े हैं। पिछले महीने ही  श्रीनगर और उससे सटे इलाकों में इनके हमले में कई पर्यटक जख्मी हो गए थे। उनमें दो महिला पर्यटकों को गंभीर चोटें आई थीं। पहलगाम के पास केरल के पर्यटकों पर पथराव हुआ और उसमें सात पर्यटक जख्मी हुए थे। यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह केवल संयोग है कि इन पूर्व के हमले में कोई पर्यटक मारा नहीं गया। वस्तुतः इस तरह के हमले हो रहे हैं और इनको इन्हीं नेताआंे की शह मिलती है जो इस समय छाती पीटकर स्यापा कर रहे हैं।

इस दोहरे चरित्र से हिंसा का समाधान नहीं हो सकता। अलगाववादी तो पत्थरबाजों का बाजाब्ता उपयोग करते हैं। कभी लाउडस्पीकरांें से घोषणा होती है कि अमुक जगह हमारे मुजाहिद्दीन फंस गए हैं उनके पक्ष में आएं तो कभी सोशल मीडिया पर अपील वायरल की जाती है। मेहबूबा की नीति थी कि अगर इन नवजवानों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाएगा तो ये सुधर जाएंगे। केन्द्र सरकार की ओर से नियुक्त वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा ने भी कश्मीर से लौटकर सरकार को कुछ रिपोर्टें दीं। उसके बाद काफी संख्या में पत्थरबाजों पर से मुकदमा वापस लेकर उनको जेल से रिहा किया गया। किंतु इसका अपेक्षित असर नहीं हुआ है। खैर, ऑपरेशन ऑल आउट के तहत सुरक्षा बलों ने अब पत्थरबाजों के आगे घुटने टेकने या वापस आने की नीति का परित्याग कर दिया है। वे हर हालत मंे ऑपरेशन पूरा करके ही वहां से हटते हैं। किंतु इसकी प्रतिक्रिया में यदि पत्थरबाज आम हिंसा पर उतारु हो गए, पर्यटक हमलों का शिकार होने लगे, स्कूली बच्चे होने लगे तो फिर इनसे निपटने के अन्य रास्ते भी तलाशने होंगे बिना इस बात की चिंता किए कि सरकार इससे लोकप्रिय हो रही है या अलोकप्रिय।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408ष् 9811027208

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 4 मई 2018

आखिर न्यायपालिका क्यों हो रही है राजनीति का शिकार

 

अवधेश कुमार

देश का वर्तमान माहौल हर विवेकशील भारतीय को चिंतित कर रहा है। राजनीतिक दलों के बीच सत्ता की होड़ में अप्रिय संघर्ष और तू-तू-मैं-मैं के असभ्य आचरण को देश न चाहते हुए भी स्वीकार कर रहा है। किंतु यह संघर्ष जिस तरह से धीरे-धीरे हमारी संवैधानिक संस्थाओं को अपनी जकड़ में ले रहा है उसे स्वीकार करना संभव नहीं। पिछले कुछ समय से न्यायपालिका की भूमिका पर जो गंदी राजनीति हो रही वह भयभीत करने वाला है। न्यायपालिका हमारे देश में अभी भी लोगों के लिए न्याय की अंतिम उम्मीद के रुप में खड़ा है। अनेक कमजोरियों के बावजूद उसकी साख और विश्वसनीयता कायम है। जिस तरह से न्यायपालिका को निशाना बनाया जा रहा है उससे उसकी साख और विश्वसनीयता पर सीधा चोट हो रहा है। विडम्बना देखिए कि देश पर सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली पार्टी कांग्रेस इसकी अगुवा बनी हुई है....कभी प्रच्छन्न रुप में तो कभी सीधे सामने। अभी हाल में मुंबई सीबीआई विशेष न्यायालय के न्यायाधीश बीएच लोया की मौत पर उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने एक फैसला दिया। उसने सभी याचिकाकर्ताओं की एक-एक बात सुनी, 10 दिनों तक सुनवाई की, संबंधित कागजात देखे, न्यायाधीश लोया के साथ नागपुर गए चार अन्य साथी न्यायाधीशों के बयानों को देखा, लोया की मौत की प्रदेश पुलिस की जांच रिकॉर्ड को देखा.....उसके बाद उसने फैसला दिया कि वह एक स्वाभाविक मौत थी, इसलिए अलग से इसकी जांच की आवश्यकता नहीं।

उच्चतम न्यायालय का यह फैसला आया और इसके विरुद्ध कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला उस तरह के वक्तव्य से सामने आए जिस तरह सरकार के किसी निर्णय का विरोध करने आते हैं। यह हक्का-बक्का करने वाली स्थिति थी। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि न्यायाधीश लोया की मौत संदिग्ध थी जिसमें हत्या की गंध आती है, इसलिए उसकी जांच होनी चाहिए। यह उच्चतम न्यायालय के फैसले पर सीधे-सीधे प्रश्न उठाना था। उनके पूरे बयान को देखिए तो ऐसा लगेगा जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को बचाने के इरादे से यह फैसला दिया है। न्यायाधीश लोया सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति मुठभेड़ मामले को सुन रहे थे जिसमें अमित शाह भी एक आरोपी थे जो बाद में आए न्यायाधीश द्वारा बरी कर दिए गए। तो यह सीधे-सीधे एक राजनीतिक लड़ाई थी जिसमंे न्यायपालिका को घसीटा गया था। कांग्रेस कहती है कि वह इसमंे याचिकाकर्ता नहीं थी। अगर नहीं थी तो उसने इस तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों बुलाया? क्यों इस तरह का विस्तृत आक्रामक बयान दिया? एक याचिका इसमें ऐसे व्यक्ति द्वारा डाली गई थी जो कांग्रेस का प्रवक्ता न होते हुए भी प्रवक्ता की तरह टीवी स्टुडियो मंे उपस्थित रहते हैं। वैसे भी इस समय कुछ दलों, एनजीओ, सक्रियतावादियों, अधिवक्ताओं, बुद्धिजीवियों के बीच भाजपा एवं मोदी सरकार के विरुद्ध हर अभियान में एक घोषित-अघोषित तालमेल है। इसमंे समस्या नहीं है। आपको भाजपा एवं मोदी सरकार की मुखालफत करने, उसके विरुद्ध एकजुट होने का पूरा अधिकार है, लेकिन आप सीधी लड़ाई लड़िए न, न्यायपालिका को इसमें क्यांे घसीटते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में साफ टिप्पणी की थी कि न्यायालय को राजनीतिक दुश्मनी का हथियार बनाने की कोशिश की गई है। इन याचिकाओ का स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य है। इसी टिप्पणी ने इनको तिलमिला दिया। इससे इनकी कलई खुल गई। बावजूद इसके ये मानने को तैयार नहीं हैं। कांग्रेस ने अन्य सात दलों के साथ मिलकर मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ राज्यसभा के सभापति के रुप में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू कों महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस थमा दिया। यह असाधारण स्थिति थी। भारत में इसके पूर्व कभी मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस नहीं आया था। केवल नोटिस तक ही ये सीमित नहीं रहे। उपराष्ट्रपति के यहां से बाहर आते ही बाजाब्ता प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर पूरे विस्तार से यह साबित किया कि मुख्य न्यायाधीश का जो आचरण है उसमें महाभियोग ही एकमात्र रास्ता है। इस अभियान का नेतृत्व कपिल सिब्बल कर रहे हैं। वे जिस तरह का बयान दे रहे हैं वो है तो मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ लेकिन उससे पूरा शीर्ष न्यायालय कठघरे में खड़ा हो रहा है। हालांकि महाभियोग के लिए जो पांच आधार इनकी ओर से दिए गए उनमें से एक भी ऐसा नहीं था जिसे निश्चयात्मक कहा जाए। इन आधारों पर महाभियोग लाया ही नहीं जा सकता। महाभियोग के लिए ठोस आरोप चाहिए जिसमंे भ्रष्टाचार, दुर्व्यवहार और अक्षमता साबित होता हो। उपराष्ट्रपति ने इस पर देश के जाने-माने संविधानविदों, लोेकसभा एवं राज्य सभा के पूर्व महासचिवों, पूर्व महाधिवक्ताओं की राय ली, सारे आरोपों एवं उसके साथ लगे दस्तावेजों का अध्ययन किया और उसके बाद नोटिस को खारिज कर दिया।

जाहिर है, यदि इरादा नेक होता तो इसे यहीं पूर्ण विराम दे दिया जाता। उपराष्ट्रपति ने अपनी टिप्पणी में कहा कि राजनीतिक दलों को इस तरह के आरोप लगाने तथा ऐसा आचरण करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे जनता की नजर में न्यायपालिका की साख घटती है। कपिल सिब्बल ने उपराष्ट्रपति के फैसले की खुलकर आलोचना की एवं यहां तक कह दिया कि उनको तो नोटिस को खारिज करने का अधिकार ही नहीं है। उपराष्ट्रपति भी एक संवैधानिक पद है, इसलिए कपिल सिब्बल की आलोचना संवैधानिक पद की गरिमा को चोट पहुंचाने वाला है। किंतु हम यहां इस पर विचार करने नहीं जा रहे। सिब्बल की घोषणा है कि उप राष्ट्रपति के फैसले का विरुद्ध हम उच्चतम न्यायालय जाएंगे और उम्मीद करेंगे जो पीठ इसकी सुनवाई करे उसमें मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा नहीं हों। इस तरह का रवैया आजादी के बाद से आज तक किसी राजनीतिक दल का नहीं देखा गया। अब नया मामला कांग्रेस ने उच्चतम न्यायालय मंें न्यायाधीशों की नियुक्ति का ला दिया है। उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम की ओर से वरिष्ठ वकील इन्दु मल्होत्रा तथा उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ को न्यायाधीश के रुप मंें नियुक्त करने की अनुशंसा की गई थी। सरकार ने इन्दु मल्होत्रा को तो नियुक्त कर दिया, लेकिन जोसेफ की अनुशंसा वापस कर दी। सरकार का तर्क है कि वरिष्ठता क्रम में देश में उनका स्थान 42 वां है तथा वे केरल से हैं जिनका प्रतिनिधित्व पहले से है। कई राज्यों का उच्चतम न्यायालय मंे प्रतिनिधित्व नहीं है एव ंके जी बालाकृष्णन के बाद अनुसूचित जाति का भी कोई न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय में नहीं आया है। देखना होगा कोलेजियम किसी नए नाम की अनुशंसा करता है या इसी नाम को वापस करता है। उच्चतम न्यायालय ने भी माना है कि संविधान के अनुसार सरकार को कोई नाम पुनर्विचार के लिए वापस करने का अधिकार है। किंतु कांग्रेस और उसके साथ कई पार्टियां, एक्टिविस्ट आदि इसे बड़ा मामला बना रहे हैं।

यहां मैं अतीत मंें नहीं जाना चाहता कि कांग्रेस की पूर्व सरकारों ने न्यायपालिका के साथ क्या व्यवहार किया। लेकिन यह तो विचार करना पड़ता है कि आखिर कांग्रेस और उसके साथी इस तरह न्यायपालिका को अपनी संकुचित राजनीति में क्यों घसीट रहे हैं? इसका कोई सकारात्मक तार्किक उत्तर तलाशना मुश्किल है। कांग्रेस के अंदर भी इस पर मतभेद है। किंतु नेतृत्व ने इसकी हरि झंडी दी है तभी तो कपिल सिब्बल इतना आगे आ रहे हैं। इनकी कोशिश यह साबित करने की है कि मोदी सरकार सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपना आज्ञाकारी बनाने की ओर अग्रसर है और वो इसे बचाना चाहते हैं। इसलिए वे आगे किसी सीमा तक जा सकते हैं। हो सकता है कुछ छद्म बैनरों से मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लोगों को सड़कांें पर उतारा जाए। हालांकि कांग्रेस अगर अपने इस रवैये पर देश की प्रतिक्रिया को समझ जाए तो  इससे सीधे पीछे हट जाए। न्यायपालिका को निशाना बनाने के उसके व्यवहार के खिलाफ देशव्यापी वातावरण बन रहा है। यानी राजनीतिक रुप से भी यह उसके लिए अलाभकर साबित होनेवाला है। प्रश्न यहां राजनीतिक लाभ हानि का नहीं है। प्रश्न एक संवैधानिक संस्था के रुप में तथा लोकतंत्र के एक स्तंभ के तौर पर न्यायापालिका की गरिमा, उसकी साख एवं विश्वसनीयता को बचाने का है। कांग्रेस और उसके साथी इसे तार-तार करने पर तुले हैं जिसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। वास्तव में जब कोई राजनीतिक दल अपने मूल्यों और आदर्शों से पूरी तरह च्युत हो जाता है, उसके पास दूरदर्शी नेतृत्व का अकाल पड़ जाता है तो इस तरह का व्यवहार करता है। कांग्रेस अभी ऐसी ही पार्टी हो गई है। किंतु भय इस बात की है कि अपनी अदूरदर्शिता में वह न्यायपालिका की गरिमा को इतनी क्षति न पहुंचा दे कि उसे पुनर्स्थापित करना मुश्किल हो जाए। इसलिए हर हाल मेें इस अभियान को पराजित करना होगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208    

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

आफस्पा हटाया जाना स्वागतयोग्य

 

अवधेश कुमार

केन्द्र सरकार द्वारा मेघालय से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (आफ्स्पा) यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून 1958 को पूरी तरह हटा लेना एवं अरुणाचल प्रदेश में भी इसे सिर्फ 3 जिलों के 8 पुलिस थानांे तक सीमित करना बहुत बड़ी घटना है। देश में आफस्पा को खत्म करने के लिए लंबे समय से कई स्तरों पर आंदोलन चलता रहा है। मणिपुर से इसे खत्म करने के लिए तो इरोम शर्मीला ने सबसे लंबा अनशन का रिकॉर्ड बना दिया। हालांकि जिस नरेन्द्र मोदी सरकार के बारे में धारणा है कि यह कड़े कानूनों तथा सुरक्षा बलों को संरक्षित कानूनों के तहत कार्रवाई में पूरी स्वतंत्रता देने का समर्थक है उसके काल में ऐसा निर्णय किया जाना कुछ लोगों को अचंभित कर रहा है। वैसे मोदी सरकार ने 2015 में ही त्रिपुरा से आफस्पा को हटा दिया था। उस समय भी कई हलकों में आश्चर्य प्रकट किया गया था। किंतु उसके बाद से त्रिपुरा में अनवरत उग्रवादी घटनाएं नहीं घटीं जिनसे कहा जाए कि उसने गलत समय कदम उठाया। उसके बाद से केन्द्रीय गृहमंत्रालय लगातार पूर्वोत्तर के सारे राज्यों की कानून व्यवस्था की समीक्षा करता रहा है एवं उसके आधार पर आफस्पा पर भी निर्णय होता रहा है। लगातार आफस्पा की समीक्षा हो रही है एवं उसके क्षेत्र में कमी की जाती रही है। सितंबर 2017 आते-आते मेघालय में आफस्पा 40 प्रतिशत क्षेत्र तक सिमट गया था। इसी तरह अरुणाचल प्रदेश में भी 2017 में केवल 16 थानों में ही यह प्रभावी था। पिछले 3 अप्रैल को केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश के दो पुलिस थानों पश्चिमी सियांग जिले की लिकाबाली तथा पूरबी सियांग जिले के रस्किन पुलिस थाना से आंशिक तौर पर आफस्पा हटा लिया था। अब आफस्पा नगालैंड, असम, मणिपुर (7 विधानसभाओं को छोड़कर) तथा जम्मू कश्मीर में प्रभावी है। मोदी सरकार ने एक बड़ा परिवर्तन यह कर दिया है कि असम और मणिपुर राज्य की सरकारों के पास अब यह अधिकार है कि वे अपनी इच्छानुसार कानून को रखें या हटा दें।

यह सामान्य स्थिति नहीं है। इरोम शर्मीला का अनशन मणिपुर के लिए ही था। आज मणिपुर सरकार जिस दिन चाहे इसे हटा सकती है या जितना चाहे इसका क्षेत्र कम कर सकती है। वास्तव में एक समय जहां पूरे पूर्वोत्तर में आफस्पा लागू था वहीं पिछले एक वर्ष से यह कुछ ही क्षेत्रों में रह गया था। इनमें मेघालय का असम से लगने वाले 20 किलोमीटर का इलाका शामिल था। यद्यपि मिजोरम में हटाया नहीं गया लेकिन वहां व्यवहार में यह अमल में भी नहीं था। गृह मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिस तरह से उग्रवादी घटनाओं में कमी आई है उसमें इसे लागू रखना उचित नहीं था। असम में दिसंबर 2014 से मार्च 2018 के बीच नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड या एनडीएफब के 63 सदस्य मारे गए तथा 1052 पकड़े गए। 2016 की तुलना में पूरे पूर्वोत्तर में उग्रवादी घटनाओं में 37 प्रतिशत गिरावट आई है। सुरक्षा बलों के शहीद होने की घटना में 30 प्रतिशत तथा आम नागरिकों में 23 प्रतिशत गिरावट आई है। मोदी सरकार के कार्यकाल में 2014 से 2018 के बीच उग्रवादी घटनाओं में 63 प्रतिशत , नागरिकों की मौत में 83 प्रतिशत तथा सुरक्षा बलों के शहीद होने में 40 प्रतिशत की गिरावट आई है। 1997 में जब उग्रवाद चरम पर था तबसे 2017 के बीच उत्तर पूर्व क्षेत्र में उग्रवादी घटनाओं में 85 प्रतिशत और नागरिकों तथा सुरक्षा बलों की मौत की घटनाओं में 96 प्रतिशत की गिरावट आई है। जहां 1997 में विद्रोहियों और सुरक्षाबलों के बीच झड़प में 289 सैनिकों की मौत हुई थी वहीं 2017 में ये सिर्फ 12 रह गई। इस दौरान घुसपैठ की संख्या में भी 85 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। ऐसी हालत में इस पर पुनर्विचार होना ही था।

जैसा हम जानते हैं कि पूर्वोत्तर हो या जम्मू कश्मीर उग्रवादी-आतंकवादी घटनाओं में वृद्धि के कारण जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई तो इन्हें अशांत क्षेत्र घोषित करके आफस्पा लागू किया गया। पूर्वोत्तर में एनएससीएन, उल्फा एवं एनडीएफबी के अलावा कम से एक दर्जन अन्य संगठन सक्रिय रहे हैं। इनमें समय के अनुसार कमी आई। कई संगठन टूटे। मसलन, एनएससीएन के ही दो समूह हो गए जिसमंें खापलांग समूह उग्रवादी गतिविधियों में लगा रहा। युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) में टूट हुई, इसके अनेक नेता गिरफ्तार हो चुके हैं, पर परेश बरुआ ने उल्फा (इंडिपेंडेंट) संगठन बना लिया। इस कारण अभी कुछ समस्या है। किंतु त्रिपुरा और मिजोरम से उग्रवाद का सफाया हो चुका है, मेघालय एवं अरुणाचल में स्थिति काफी नियंत्रण में है, नगालैंड, असम और मणिपुर में सुरक्षा हालात में सुधार हुआ है। वास्तव में आफस्पा एक विशेष कानून है जो अतिविशेष परिस्थितियों में ही लागू किया जाना चाहिए। कानून और व्यवस्था की जिम्मेवारी स्थानीय पुलिस की है। यदि यह जिम्मेवारी लंबे समय तक सेना एवं अर्धसैनिक बलों को ढोनी पड़े तो यह निश्चय ही खतरनाक स्थिति मानी जाएगी। आफस्पा की धारा 4 सुरक्षा बलों को किसी भी परिसर की तलाशी लेने और बिना वॉरंट किसी को गिरफ्तार करने का अधिकार देता है। इसके तहत विवादित इलाकों में सुरक्षा बल किसी भी स्तर तक शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं। संदेह होने की स्थिति में उन्हें किसी गाड़ी को रोकने, तलाशी लेने और उसे जब्त करने का अधिकार होता है। तलाशी या गिरफ्तारी के लिए किसी वारंट की आवश्यकता नहीं होती। वे कहीं भी छापा मार सकते हैं, संदेह होेने पर मोर्चाबंदी कर सकते हैं। यह भी सच है इस कानून के कारण भयावह स्थितियों में उग्रवादियों-आतंकवादियों या ऐसे दूसरे खतरों से जूझ रहे जवानों को कार्रवाई में सहयोग मिलने के साथ-साथ सुरक्षा भी मिलती है। वे निर्भय होकर कार्रवाई करते हैं। किंतु 1990 के बाद से जब से यह ज्यादा प्रभावी एवं विस्तारित हुआ है इसका विरोध भी हुआ है। अगर किसी को सेना की कोई कार्रवाई गलत लगती है तो वह उसके खिलाफ तब तक मुकदमा नहीं कर सकता, जब तक कि केन्द्र इसकी अनुमति न दे। यही विशेष प्रतिरक्षा सेना को मिली हुई है। सेना को मिले इसी रक्षा कवच को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जाता है। विरोधी आरोप लगाते हैं कि कानूनी संरक्षण का लाभ उठाकर सेना आम नागरिकों के साथ भी अन्याय करती है। सुरक्षा बलों पर मानवाधिकार के दमन का आरोप लगा है तथा इसके विरुद्ध छोटे-बड़े अभियान चलते रहे है। हालांकि इसके समानांतर सुरक्षा बलों के समर्थन में भी लोग खड़े हुए हैं। खैर, पूर्वोत्तर में इसके अंत की शुरुआत हो गई है। सरकार का वर्तमान कदम बताता है कि यदि राज्यों की सुरक्षा स्थिति संभल गई तो यह आफस्पा हटाने पर खुले मन से विचार करेगा।

यह कानून 1958 में बना और 1972 में इसे संशोधित किया गया। 1972 का संशोधित रुप ही पूर्वोत्तर के राज्यों में लागू हुआ। जम्मू कश्मीर विशेष कानून 1990 में बना। हालांकि इस कानून के तहत भी सेना को बिल्कुल खुला हाथ मिल गया है ऐसा नहीं है। मामले की छानबीन का अधिकार पुलिस का ही है। सेना किसी को गिरफ्तार करती है तो उसे  निकट के पुलिस थाने को सुपूर्द करना पड़ता है। जब्त सामान भी पुलिस के हाथों ही करना है। इस तरह कहा जा सकता है कि आवश्यक विशेष अधिकार देते हुए भी सेना की भूमिका को इतना विस्तारित नहीं किया गया है कि पूरी कानून व्यवस्था का निर्धारक वही बन जाए। नागरिक एवं पुलिस प्रशासन की भूमिका को कायम रखा गया है। किंतु कई बार व्यवहार में तत्काल ऐसा करना संभव नहीं होता। उदाहरण के लिए सेना या अर्धसैनिक बल किसी आतंकवादी या संदिग्घ को पकड़ते हैं तो उसकी साजिशों, उसके साथियों आदि के बारे में उसी समय पूछताछ आवश्यक होता है ताकि उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाए। यह सामान्य समझ की बात है कि अगर सेना उसे पकड़कर पहले पुलिस के हवाले करे और उसके बाद पूछताछ के आधार पर कार्रवाई करे तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। आतंकवादियों-उग्रवादयों के खिलाफ ऑपरेशन के दौरान की स्थितियों की हम कल्पना कर सकते हैं। उस समय उनको किसी तरह पराजित करने का ही एकमात्र लक्ष्य होता है। या तो उन्हें मारना है या पकड़ना है और कोई पकड़ में आ गया तो फिर उससे अन्य साथियों, उसकी योजनाओं आदि की जानकारी प्राप्त कर कार्रवाई करना है। हालांकि समय के अनुसार इसमें सुधार हुआ है। जम्मू कश्मीर में पिछले काफी समय से पुलिस, सेना एवं अर्धसैनिक बलों के बीच बेहतर तालमेल और समन्वय से कार्रवाई हो रही है। अनेक कार्रवाई साथ होतीं हैं, इसलिए प्रक्र्रियाओं में समस्याएं नहीं आ रहीं। इसका लाभ भी मिला है। आगे और भी सुधार हो सकता है।

किंतु किसी भी स्थिति में आफस्पा को लंबे समय तक जारी नहीं रखा जाना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह आपत स्थिति का कानून है। इसलिए पूर्वोत्तर में सुरक्षा स्थिति में ठोस सुधार के साथ इसे धीरे-धीरे समाप्त करना लोकतंत्र में स्वाभाविक नागरिक शासन की महत्ता को स्वीकार करना है। इसलिए इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए। वैसे 1958 मंे जब यह कानून बना तो राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित कर आफस्पा लागू करने की जिम्मेवारी राज्य की ही थी। 1972 में संशोधन कर यह अधिकार केन्द्र को दे दिया गया। हम उन परिस्थितियों में नहीं जाना चाहते। आज असम और मणिपुर को अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्रता देना 1972 पूर्व की स्थिति में ले जाने का ही कदम माना जाएगा। उम्मीद है दोनों राज्य भी अपनी परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेंगे। किंतु जम्मू कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद के कारण ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई है कि वहां आफस्पा को लेकर पुनर्विचार किया जाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है पर इसके अलावा कोई चारा नहीं है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

कठुआ बर्बर दुष्कर्म मामला सीबीआई को सौंपा जाना चाहिए

अवधेश कुमार

इस समय पूरे देश में उबाल है। वास्तव में जम्मू के कठुआ में एक आठ साल की बच्ची आसिफा के साथ बर्बरता की जो घटना सामने आई है वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अंदर से हिला देने वाली है। अभी तक जो कुछ सामने आया है उसे सच मान लें तो इसकी तुलना यदि किसी घटना से की जा सकती है तो दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुई निर्भया कांड से। सामान्यतः जब भी ऐसी वीभत्स घटना कहीं घटती है तो पूरे देश में गुस्सा पैदा होता है और एक ही आवाज उठती है कि दोषियांे को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। ऐसी प्रतिक्रिया बिल्कुल स्वाभाविक है। कठुआ मामले में पुलिस ने जो आरोप पत्र दाखिल किया है उससे गुस्सा और बढ़ा है। इसमें बच्ची को पकड़कर बंधक बनाए रखने, नशीली दवाएं खिलाने, लगातार बलात्कार करने और फिर मार दिए जाने का जो विवरण है वह एकदम जमे हुए खून मंे भी उबाल पैदा कर देता है। आरोप पत्र में एसपीओ के बारे में कहा गया है कि जब सब उसकी हत्या करने जा रहे थे तो उसने कहा कि थोड़ा रुक जाओ एक बार और बलात्कार कर लूं और उसने किया। यही नहीं उन लोगों ने उसकी हत्या करने के बाद पत्थरों से कुचला। एक आठ साल की लड़की साथ ऐसा होने की कथा हमारे सामने आएगा तो प्रतिक्रिया क्या और कैसी होगी? किंतु सम्पूर्ण जम्मू और कठुआ का माहौल देखिए तो अलग ही तस्वीर है। वहां जांच करने वाली पुलिस टीम के खिलाफ भी चारों ओर आक्रोश है। पूरा जम्मू शत-प्रतिशत बंद रहा है। जम्मू बार एसोसिएशन खुलकर आरोपियों के पक्ष में आ गया है। धरना-प्रदर्शन हो रहा है। लोग सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं।

इस तरह दो तस्वीर है। पुलिस के आरोप पत्र को स्वीकार कर लें तो ऐसा लगेगा कि जम्मू के लोग और पूरा बार एसोसिएशन बलात्कारियों के पक्ष में खड़ा है जो शर्मनाक है। जिस तरह वकीलों ने न्यायालय में आरोप पत्र पेश करने से रोकने की कोशिश की उससे भी पहली नजर में क्षोभ पैदा होता है। किंतु विचार करने वाली बात है कि आखिर इतने लोग आरोपियों के पक्ष मेें क्यों खड़े हैं? क्या उनके अंदर की मनुष्यता मर गई है कि उस आठ वर्ष की मासूम के साथ हुई बर्बरता को महसूस नहीं कर रहे? क्या इतनी संख्या में लोग बलात्कारियों और हत्यारों का समर्थन कर सकते हैं? दुनिया मंे ऐसा नहीं होता कि एक साथ इतनी बड़ी संख्या जिसमें वकील समुदाय भी शामिल है और सभी पार्टियों के नेता भी, बलात्कारी और हत्यारे का खुलेआम साथ देते दिखें। जो प्रदर्शन हो रहे हैं उसमें लगभग सभी पार्टियों के नेता शामिल होते है। भाजपा के दो मंत्रियों ने क्या इसलिए इस्तीफा दे दिया कि मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने बलात्कारियों एवं हत्यारों को बचाने की इनकी मांग नहीं मानी? अगर कोई ऐसा मानता है तो उसके बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। सामान्य सोच में यह तर्क गले नहीं उतरता कि ये दो मंत्री या अन्य पार्टियों के नेता अपराधियों को बचाना चाह रहे हैं। कोई यदि किसी अपराधी या अपराधियों के साथ हो तो भी सार्वजनिक रुप से इतना आक्रोश प्रकट हुए सामने नहीं आता। जाहिर है, इस पूरे कांड पर जो कुछ हमारे सामने लाया गया है उससे जरा अलग नजरिए से भी विचार करने की आवश्यकता है।

मृत बच्ची का कुचला हुआ शरीर यदि बरामद हुआ है तो उसके अपराधी कोई या कुछ लोग तो हैं। जो हैं उन्हें कानून के कठघरे में खड़ा किया ही जाना चाहिए। इसे यदि कोई सांप्रदायिक रंग देता है तो वह निश्चय ही मनुष्य कहे जाने लायक नहीं है। किंतु, सजा तो वाकई उन्हीं को मिलनी चाहिए तो असली अपराधी हैं। पुलिस के आरोप पत्र को यदि थोड़ी भी गहराई से देखें तो उसमें कई प्रश्न ऐसे पैदा होते हैं जिनका उत्तर नहीं मिलता। इसी तरह उसमें कुछ ऐसी बातें भी हैं जो सामान्य तौर पर गले नहीं उतर सकती। जिस व्यक्ति सांझीराम को मुख्य आरोपी बनाया गया है वह सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी है। उसके बारे में कहा गया है वह अपने आसपास बकरवाल समुदाय को बसते देखना नहीं चाहता था इसलिए उसने ऐसी योजना बनाई ताकि इसके डर से वो वहां से भाग जाएं। यानी एक बच्ची के साथ बलात्कार करके हत्या कर दी जाए तो बकरवाल समुदाय के लोग वहां से चले जाएंगे। पुलिस ने पूरे अपराध का आधार इसी को बनाया है। क्या आपको लगता है कि वाकई ऐसा हो सकता है? किसी समुदाय के एक मासूम लड़की के साथ बर्बरता हो जाए और वह पूरा समुदाय वहां से चला जाए ऐसी कल्पना तो कोई मूर्ख ही कर सकता है। वहां अगर तनाव है तो रोहिंग्याओं और बंगलादेशियोें को लेकर। बकरवालों के वहां बसने का भी विरोध हुआ है किंतु उसे इस अपराध का आधार बना देना आसानी से पचता नहीं। इसलिए इस पूरी पुलिस कथा का आधार ही प्रश्नों के घेरे में है। इसको साबित करना भी कठिन होगा।

आगे की कथा देखिए। सांझीराम पहले अपने नबालिग भांजे को घोड़ा चराने वाली उस आठ वर्षीय लड़की का अपहरण और बलात्कार करने के लिए तैयार करता है। वह एक दोस्त को इसमें मिलाता है और दोनों मिलकर ऐसा कर भी देते हैं। दोनों उसे बेहोश कर मंदिर में बंधक बना लाते हैं। उस मंदिर की जो तस्वीर आई है उसमें कोई अलग से कमरा नहीं है। उसकी खिड़कियों में केवल ग्रील है कोई दरवाजा नहीं। उस मंदिर में कहां और कैसे लड़की को रखा गया होगा इसका उत्तर नहीं मिलता। आरोप पत्र में एक टेबुल की चर्चा है जिसके नीचे लंबे समय तक किसी को रखना संभव ही नहीं। उस मंदिर में लगातार लोग पूजा के लिए आते हैं और किसी को लड़की के वहां होने का पता नहीं चलता। 17 जनवरी को लड़की लाश मिलती है और 15 जनवरी को वहां भंडारा हुआ था। उसमें कितने लोग आए होंगे। किसी की नजर बंधक लड़की पर नहीं गई! इसी तरह सांझीराम का भांजा मुजफ्फरनगर में उनके बेटे को फोन करता है कि तुम भी आ जाओ यदि लड़की के साथ बलात्कार करना है। वह मुजफ्फरनगर से सीधे वहां पहंुच भी जाता है और बार-बार बलात्कार करता है। सांझीराम भी उससे बलात्कार करता है। यानी एक व्यक्ति अपने बेटे से बलात्कार करवाता है, अपने भांजे से बलात्कार करवाता है और स्वयं भी करता है। आप सोचिए, इस कथा पर आप यकीन कर सकते हैं? कोई बाप ऐसा होगा जो स्वयं अपने बेटे से बलात्कार करवाए? सांझीराम का बेटा विशाल मुजफ्फरनगर में जहां पढ़ता है वहां का रिकॉर्ड बता रहा है कि जिस दिन यानी 12 जनवरी को उसके कठुआ में होने की बात आरोप पत्र में है उस दिन उसकी परीक्षा थी जिसमंे वह उपस्थित था। अब कुछ लोग कह रहे हैं कि उसकी जगह कोई और परीक्षा दे रहा था। यानी उसका प्रभाव इतना व्यापक था कि उसे पास बालात्कार करने के लिए फोन आया और उसने मिनटों में अपनी जगह दूसरे को परीक्षा में बिठाने का इंताजम करके स्वयं फुर्र हो गया! अगर सांझीराम ने लड़की हत्या की या करवाई तो मंदिर से अपने घर के रास्ते पर वह भी घर से करीब 60 मीटर की दूरी पर ही क्यों फेंका? वह उसे जंगल में पीछे फंेक सकता था।

आरोप पत्र मंे ऐसी और भी बातें हैं जो तर्कों, तथ्यों और व्यावहारिकताओं की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। वैसे भी उतनी संख्या में लोग यदि सही न्याय की मांग कर रहे हैं तो केवल पुलिस टीम के आरोप पत्र के आधार पर उनकी अनसुनी कर देना किसी दृष्टि से उचित नहीं है। यह भी तो संभव है कि जम्मू कश्मीर में संाप्रदायिक आग भड़काने के लिए कुछ लोगों ने साजिशन बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर मंदिर से कुछ गज की दूरी पर शव फेंक दिया हो। ऐसा करने वाले यह सोच सकते हैं कि यदि एक मुसलमान लड़की साथ हिन्दुओं और उसमें भी मंदिर के अंदर अंजाम देने की खबर के बाद पूरे प्रदेश में आग लग सकती है। हम इस संभावना को खारिज नहीं कर सकते हैं। इसलिए लोग यदि सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं तो उसे स्वीकारा जाना चाहिए। किंतु मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती उसी आरोप पत्र के आधार पर फास्ट ट्रैक न्यायालय में मामला चलवाने पर अड़ी हुईं हैं। कुछ लोग इसे सांप्रदायिक रंग देकर आग भड़काने में भी लगे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कह दिया है कि दोषी बख्से नहीं जाएंगे। दोषी किसी सूरत में बख्से नहीं जाने चाहिएं। किंतु इतने व्यापक स्थानीय जन समुदाय की भावनाओं को नजरअंदाज करना तो न्याय का तकाजा नहीं है। जम्मू के लोग भी तो यही कह रहे हैं कि मृतका बच्ची के साथ सही न्याय हो एवं दोषियों को सजा मिले। अगर लोगों को पुलिस जांच पर विश्वास नहीं है तो मामले को तत्क्षण सीबआई को सौंपा जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश के उन्नाव का मामला सीबीआई को सौंपा जा सकता है तो फिर कठुआ का क्यों नहीं। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208 

 

 

 

 

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले की गलत व्याख्या न करे आप

 

अवधेश कुमार

दिल्ली उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग द्वारा सदस्यता रद्द किए गए विधायकों के बारे में जो फैसला दिया है वह यकीनन आम आदमी पार्टी के लिए राहत लेकर आया है। किंतु यह ऐसा फैसला नही ंहै जिससे यह मान लिया जाए कि इन विधायकों की सदस्यता पर लटकती तलवार खत्म हो गई है। फैसले में न्यायालय ने इस विषय पर विचार किया ही नहीं कि विधायक होते हुए संसदीय सचिव के रुप में ये लाभ के पद पर थे या नहीं। उसने केवल चुनाव आयोग के फैसले में प्रक्रियागत खामियां स्वीकार की है। इसी अधार पर न्यायालय ने चुनाव आयोग से सभी विधायकों को फिर से सुनने तथा उसके बाद राष्ट्रपति के पास अपनी अनुशंसा भेजने को कहा है। उच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग को विस्तार से सुनवाई करनी चाहिए थी, लेकिन अभी यह नहीं माना जा सकता कि जिस तरह मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने 21 विधायकों की संसदीय सचिव के रुप में नियुक्त किया था वह सही था एवं उसे लाभ के दोहरे पद के दायरे में नहीं लाया जा सकता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने ही 8 सितंबर 2016 को 21 विधायकों के संसदीय सचिव की नियुक्ति को रद्द कर दिया था। उच्च न्यायालय की जो टिप्पणियां थीं वहीं साबित करता था कि यह नियुक्ति संवैधानिक तरीकों से नहीं गई थी। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि नियमों को ताक पर रख कर ये नियुक्तियां की गईं थीं। तो यह बात साफ है कि वो नियुक्तियां गलत थी। अब प्रश्न यह रह जाता है कि क्या उसके आधार पर इनकी सदस्यता जानी चाहिए या नहीं?

संविधान का अनुच्छेद 102 (1) (ए) स्पष्ट करता है कि सांसद या विधायक ऐसा कोई दूसरा पद धारण नहीं कर सकता जिसमें अलग से वेतन, भत्ता या अन्य कोई लाभ मिलते हों। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 191 (1)(ए) और जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 9 (ए) के अनुसार भी लाभ के पद में सांसदों-विधायकों को अन्य पद लेने का निषेध है। इन सब प्रावधानों का मूल स्वर एक ही है, आप यदि सांसद या विधायक हैं तो किसी दूसरे लाभ के पद पर नहीं रह सकते या यदि आप किसी लाभ के पद पर हैं तो सांसद या विधायक नहीं हो सकते। आम आदमी पार्टी तर्क दे रही है कि जिन विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया उनको न कोई बंगला मिला, न गाड़ी, न अन्य सुविधाएं। यानी जब उन्होंने कोई लाभ लिया ही नहीं तो फिर उनको दोहरे लाभ के पद के तहत सजा कैसे दी जा सकती है? यह तर्क पहली नजर में सही भी लगता है। किंतु यह मामले का एक पहलू है।

संसदीय सचिवों ने वाकई कोई लाभ या सुविधा लिया या नहीं इसमें जाने की आवश्यकता थी नहीं। मुख्य बात है कि संसदीय सचिवों का पद लाभ के पद के दायरे में आता है या नहीं। ऐसे कई राज्य हैं जहां संसदीय सचिव का पद लाभ के पद के दायरे के अंदर है तो कुछ राज्य ऐसे हैं जहां यह बाहर है। दिल्ली में इन्हें लाभ के पद के दायरे में रखा गया है। दिल्ली में 1997 में सिर्फ दो पद (महिला आयोग और खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष) ही लाभ के पद से बाहर थे। 2006 में नौ पद इस श्रेणी में रखे गए। पहली बार मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव पद को भी शामिल किया गया था। इसके अनुसार भी दिल्ली में मुख्यमंत्री केवल एक संसदीय सचिव रख सकते हैं। केजरीवाल ने 21 विधायकों की नियुक्ति करते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा।  मई, 2012 में पश्चिम बंगाल सरकार ने भी संसदीय सचिव की नियुक्ति को लेकर विधेयक पास किया था। इसके बाद ममता बनर्जी ने 20 से ज्यादा विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया। बावजूद इसके कोलकता उच्च न्यायालय ने सरकार के विधेयक को असंवैधानिक ठहरा दिया। 13 मार्च 2015 को केजरीवाल सरकार ने अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया था। इसके खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा की ओर से वकील रविन्द्र कुमार ने याचिका दायर की थी। इसके समानांतर दिल्ली के एक वकील प्रशांत पटेल ने 19 जून 2015 को राष्ट्रपति के पास याचिका दायर की थी। इसमें संसदीय सचिव को लाभ का पद का मामला बताया था। जब विवाद बढ़ा तो दिल्ली सरकार 23 जून, 2015 को विधानसभा में लाभ का पद संशोधन विधेयक लाई। इसमें रिमूवल ऑफ डिस्क्वॉलिफिकेशन कानून-1997 में संशोधन किया गया था। इस विधेयक का मकसद संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद से बाहर रखना था। विधेयक पास करा कर 24 जून 2015 को इसे तत्कालीन उप राज्यपाल नजीब जंग के पास भेज दिया गया। उप राज्यपाल ने इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग से सलाह मांगी। चुनाव आयोग ने याचिका दायर करने वाले से जवाब मांगा। प्रशांत पटेल ने 100 पृष्ठ का जवाब दिया और बताया कि मेरे याचिका लगाए जाने के बाद असंवैधानिक तरीके से विधेयक लाया गया। चुनाव आयोग इस जवाब से संतुष्ट हुआ और उसके अनुसार राष्ट्रपति को सलाह दिया। राष्ट्रपति ने विधेयक वापस कर दिया।

उस समय प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति थे। आज आम आदमी पार्टी इसमें वर्तमान राष्ट्रपति को भी घसीट रही है। राष्ट्रपति की भूमिका हमारे यहां सलाह पर काम करने की है। अगर चुनाव आयोग विधायकों की सदस्यता जाने की अनुशंसा करता है तो राष्ट्रपति इस परहस्ताक्षर करेंगे ही। ध्यान रखिए कि दिल्ली विधानसभा में कोई विधेयक पेश करने के पूर्व उप राज्यपाल से अनुमति का प्रावधान है। केजरीवाल सरकार ने संसदीय सचिवों को लाभ के पद के दायरे से बाहर करने के लिए विधेयक पेश करने के पहले इसकी अनुमति तक नहीं ली। वैसे भी केजरीवाल सरकार अगर संसदीय सचिव के पद को लाभ का पद मानती ही नहीं थी तो फिर यह विधेयक लाने की आवश्यकता क्यों महसूस की गई? उनको पता था कि गलती हो चुकी है इसलिए सुधार के लिए विधेयक पारित कर दो ताकि संसदीय सचिव का पद लाभ के पद के दायरे से बाहर हो जाए। आम आदमी पार्टी का यह भी तर्क है कि जब उच्च न्यायालय ने संसदीय सचिव के रुप में उनकी नियुक्ति को रद्द कर दिया तो फिर उनकी सदस्यता को खत्म करने का औचित्य नहीं है। वे चुनाव आयोग पर राजनीतिक दृष्टिकोण से यानी केन्द्र सरकार के इशारे पर ऐसा करने का आरोप लगा रहे हैं। यह आरोप दुर्भाग्यपूर्ण है चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और सभी पार्टियों की जिम्मेवारी है कि उसे अपनी राजनीति में न घसीटे। आज एक पार्टी का शासन है कल दूसरे का आएगा लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की साख बची रहनी चाहिए। कई बार न्यायालय तक के फैसले बदल जाते हैं। इसीलिए तो पुनर्विचार याचिका का प्रावधान है। उसने एक फैसला दिया और न्यायालय ने माना कि उसमें सुनवाई की जितनी और जिस तरह की प्रक्रिया का पालन होना चाहिए नहीं हुआ। तो उसका पालन होना चाहिए।

लेकिन आम आदमी पार्टी का यह तर्क वाजिब नहीं है कि जब वे संसदीय सचिव हैं ही नही ंतो फिर उनकी सदस्यता जाने का औचित्य क्या है? आज वे संसदीय सचिव नहीं है लेकिन इनके पास 13 मार्च 2015 से 8 सितंबर 2016 के बीच संसदीय सचिव का पद था। तो फैसला इस पर होगा कि जितने दिन वे संसदीय सचिव रहे उतने दिनों तक वे लाभ के दोहरे पद पर रहे या नहीं। 2006 में जया बच्चन मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि किसी पद से लाभ अर्जित नहीं करना, उस पद को लाभ के पद के दायरे से बाहर नहीं करता है। वे तब उत्तर प्रदेश फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष थीं। वो भी वहां से कोई वेतन-भत्ता नहीं लेतीं थी। बावजूद इसके उन्हें सांसदी गंवानी पड़ी। इस फैसले का मतलब यही था कि यदि आपने लाभ का पद लिया है तो आपको सांसदी या विधायकी से हटना होगा भले आपने वेतन या भत्ता न लिया हो।

हालांकि हमें चुनाव आयोग के नए फैसले की प्रतीक्षा करनी होगी। हो सकता है वो फिर सुनवाई करे या उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाए। इस समय इतना कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी उच्च न्यायालय के फैसले की अतिवादी व्याख्या कर रही है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

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