शनिवार, 20 जनवरी 2018

हज सब्सिडी खत्म करने का औचित्य

 

अवधेश कुमार

सरकार द्वारा हज यात्रा पर वर्षों से दी जाने वाली सब्सिडी खत्म करने को लेकर देश में स्वाभाविक ही दो राय बन गए हैं। एक राय है कि यह कदम उचित है। किसी समुदाय के व्यक्तियों के धार्मिक कर्मकांड पर सरकार धन क्यों खर्च करे। इसके समानांतर दूसरा तर्क यह है कि जो संपन्न हैं वो तो आराम से हज यात्रा पर चले जाते है। उनका इससे कुछ नहीं बिगड़ेगा जो कुछ असर होगा वो गरीबों पर होगा जो सब्सिडी के कारण हज की अपनी चाहत को पूरी कर लेते थे। इस फैसले के बावजूद इस बाद सबसे ज्यादा करीब 1 लाख 75 हजार लोग हज यात्रा पर बिना सब्सिडी के जाएंगे। आजादी के बाद ऐसा पहली बार होगा। इस नाते यह कदम बहुत बड़ा है। हज के लिए सब्सिडी दिया जाना सही था या नहीं और इसे समाप्त करने के कदम को सही माना जाए या गलत इस पर विचार करने के पहले कुछ अन्य पहलुओं पर विचार करना जरुरी है।

वास्तव में हज सब्सिडी हटाना मोदी सरकार की समग्र हज नीति का एक अंग है। सरकार पिछले वर्ष से हज नीति में बदलाव और उसे व्यावहारिक एवं सबके लिए अनुकूल बनाने पर काम कर रही थी। इस बात का संकेत उसके विचार-विमर्श में ही मिल गया था कि सब्सिडी खत्म की जाएगी। अल्पसंकख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने हज नीति के लिए होने वाली बैठकों में इसका साफ संकेत दे दिया था। दरअसल, 2012 में ही उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने फैसला दिया था कि हज सब्सिदी को अगले दस वर्षों के अंदर खत्म कर दिया जाए। उसने यह भी कहा था कि हज के लिए सब्स्डिी देना वास्तव में मुसलमानों को लालच देने के समान है। इसलिए इसे जारी नहीं रखना चाहिए। तो उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार इसे खत्म होना ही था। पूर्व सरकार ने इस दिशा में कुछ नहीं किया। कहा जा सकता है कि 10 वर्ष पूरा होने में अभी चार वर्ष बाकी था। किंतु 10 वर्ष अंतिम समय सीमा थी। जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि इसे 10 वर्ष में खत्म करना था, सरकार ने चार वर्ष पहले ही खत्म कर दिया वो उच्चतम न्यायालय की पूरी टिप्पणी को ध्यान में नहीं ला रहे।

अक्टूबर 2017 मे केन्द्र सरकार ने जो नई हज नीति पेश की उसमें हज सब्सिडी खत्म करने तथा और 45 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को बिना मेहरम के हज पर जाने की इजाजत देने का प्रस्ताव साफ तौर पर उल्लिखित था। 45 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के बिना मेहरम के हज पर जाने की घोषणा हो चुकी है। मेहरम उसे कहते हैं जिससे महिला का निकाह नहीं हो सकता। मसलन, पिता, सगा भाई, बेटा और पौत्र-नवासा मेहरम हो सकते हैं। यह अकेली या अकेली जाने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के मार्ग की बड़ी बाधा थी जो खत्म हो गई है। भारत से करीब 1300 महिलाएं इस बार बिना मेहरम के हज यात्रा करेंगी। इसी में हवाई मार्ग के साथ समुद्री मार्ग से भी यात्रा के विकल्प पर काम करने की बात थी। 1995 से समुदी्र रास्ते का विकल्प बंद हो गया था। अब सऊदी अरब सरकार से समझौते के बाद यह फिर से आरंभ हो रहा है। हज नीति में कहा गया था कि पोत कंपनियों की रुचि और सेवा की थाह लेने के लिए विज्ञापन दिया जाएगा। समुद्री मार्ग से यात्रा वैसे भी कम खर्चीला होगा। पहले समुद्र के रास्ते हज यात्रा में 12 से 15 दिनों का समय लगता था, लेकिन अब तीन से चार दिन में यात्रा पूरी हो जाएगी। एक तरफ का रास्ता 23 सौ नाटिकल मील का है। 1995 में मुंबई के यलो गेट से सऊदी अरब के जेद्दाह तक जल मार्ग पर यात्रा होती थी। नई हज नीति में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए हज कोटे का प्रावधान उनके यहां की मुस्लिम आबादी के अनुपात में किए जाने का प्रावधान है जो उचित ही है। नई हज नीति में हज समिति और निजी टूर ऑपरेटरों के जरिये जाने वाले हज यात्रियों के अनुपात को भी स्पष्ट किया गया है। अब कुल कोटे के 70 प्रतिशत हज यात्री हज समिति के जरिये जाएंगे तो 30 प्रतिशत निजी टूर ऑपरेटरों के जरिये हज पर जाएंगे। नई हज नीति पर वक्तव्य देते हुए मुख्तार अब्बास नकवी ने इसे एक बेहतर नीति बताया है। उनके अनुसार यह पारदर्शी और जनता के अनुकूल नीति होगी। यह हज यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।

हालांकि भारतीय हज समिति ने नई हज नीति के मसौदे का विरोध किया था। उसने अपनी आपत्ति मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को भी सौंपी थी। सरकार का कहना है कि उन आपत्तियों पर भी विचार किया गया एवं जो सुझाव मान्य थे उन्हें स्वीकार किया गया। बावजूद इसके इस पर एक राय बनाना मुश्किल है। वास्तव में हज सब्सिडी खत्म करना ऐसा निर्णय है जिससे पूर्व की सभी सरकारें बचतीं रहीं हैं। जिस तरहे से इसका अब भी विरोध हो रहा है उसे देखते हुए इसके कारण को समझना आसान है। कोई मुसलमानों के एक वर्ग को नाराज नहीं करना चाहता था। यह बात अलग है कि इससे गरीब मुसलमानों को शायद ही कोई लाभ था। ऐसे गरीब कम ही होंगे जिन्होंने इस सब्सिडी का लाभ उठाते हुए जबसे समुद्री जहाज बंद हुआ था हज किया होगा। वैसे कुछ मुस्लिम संगठन खुद भी सब्सिडी का विरोध करते रहे हैं। उनका तर्क था कि किसी की मदद से हज करने का कोई प्रावधान शरीया में नहीं है। हालांकि यह मजहबी विषय है, इसलिए हम इसमें यहां नहीं पड़ना चाहते। ध्यान रखिए, सब्सिडी हज यात्रियों को सीधे नहीं मिलती थी। सऊदी अरब तक आने-जाने के लिए हवाई यात्रा खर्च 55 से 60 हजार रुपए आता है। इसमें से केवल 12 हजार रुपये हज जाने वाले को देने होते हैं शेष राशि सरकार सब्सिडी के रूप में भुगतान करती थी। सरकारी एयरलाइन कंपनी एयर इंडिया को इसका जिम्मा सौंपा जाता रहा है, लेकिन कई संगठनों ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि निजी एयरलाइन कंपनी यह काम 15 से 20 हजार रुपए में ही कर रही हैं। सरकार ने हाजियों की दो श्रेणी (ग्रीन और अजीजिया) निर्धारित कर रखी हैं। पिछली बार सरकार ने ग्रीन श्रेणी के लिए अधिकतम 2,39,600 रुपये तय किए, वहीं अजीजिया श्रेणी के लिए ये रकम 2,06,200 रुपये थी। खाने-पीने पर हाजियों को खुद ही खर्च करना पड़ता है।

विरोधियों का कहना है कि सरकार ने हज सब्सिडी खत्म करके मुसलमान विरोधी भावना का परिचय दिया है। वैसे भी भाजपा एवं संघ परिवार लंबे समय से हज सब्सिडी का विरोध करती रही है। यह बात अलग है कि जब 1998 में अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी तो इसके बारे में कोई फैसला नहीं किया गया। क्या यह वाकई मुस्लिम विरोधी कदम है? ऐसा होता तो उच्चतम न्यायालय इसके लिए आदेश नहीं देता। जो कुछ हुआ है उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुरुप। उच्चतम न्यायालय में इससे जुड़े सारे पहलुओं पर बहस हुई थी। न्यायालय यूं ही कोई फैसला नहीं देता। किसी मजहब विशेष के लोगों को उनकी धार्मिक यात्रा के लिए इतने व्यापक पैमाने पर सब्सिडी देना एक असाधारण स्थिति थी। ऐसा किसी सेक्यूलर देश में शायद ही कही हो। इसमें विपन्न और संपन्न के बीच कोई अंतर भी नहीं रखा गया था। विपन्न और अक्षम लोगों की धार्मिक भावना को पूरा करने के लिए सरकार छोटे स्तर पर कुछ सहयोग करती है तो उसमंें कोई हर्ज नहीं है। हालांकि सरकार इसके लिए भी निजी दानदाताओं को प्रोत्साहित करे तो यह ज्यादा बेहतर रास्ता होगा। नकवी ने कहा भी है कि गरीबों के लिए अलग से कुछ व्यवस्थाएं की जाएंगी। तो देखते हैं क्या होता है। किंतु इतने व्यापक पैमाने पर सब्सिडी को खत्म करना ही उचित था। करीब 700 करोड़ रुपया सरकार का इस पर खर्च होता था। हाजियों की संख्या बढ़ने एवं हवाई किराए में बढ़ोत्तरी के साथ इसमें और वृद्धि ही होनी थी। इस नाते यह एक उचित निर्णय है।

अब सवाल है कि सरकार इससे जो धन बचाएगी उसे कहां खर्च करना चाहिए? उच्चतम न्यायालय ने ही अपने फैसले में सुझाव दिया था कि इसे मुसलमानों की शिक्षा पर खर्च करना चाहिए।  अक्टूबर 2017 में हज नीति का जो मसौदा सामने आया था उसमें गया था कि सब्सिडी से बचने वाला पैसा मुस्लिमों की शिक्षा, सशक्तिकरण, कल्याण पर खर्च होगा। हज सब्सिडी खत्म करने की घोषणा करते समय मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा भी कि हमारी नीति अल्पसंख्यकों को सम्मान के साथ सशक्त करना है, ना कि तुष्टीकरण। अगर वाकई यही सोच है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। हज सब्सिडी फंड का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों की बच्चियों और महिलाओं की क्षिक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। अगर सरकार ऐसा करती है जिसकी पूरी संभावना है तो यह एक बेहतर शुरुआत होगी।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

शनिवार, 13 जनवरी 2018

मन्नान बशीर के आतंकवादी बनने पर आश्चर्य कैसा

 

अवधेश कुमार

इस खबर से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि एक प्रतिभावान कश्मीरी छात्र मन्नान बशीर वानी आतंकवादी संगठन हिज्बुल मुजाहीद्दीन में शामिल हो गया है। हालांकि यह चिंता करने वाला प्रसंग अवश्य है। वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पीएचडी का छात्र रहा है। बचपन से यहां तक वह मेधावी छात्र होने के कारण ही पहुंचा है। पीएचडी करने के पहले उसने एमफिल किया और उसमें भी उसके अच्छे अंक आए थे। उसका पूरा छात्र जीवन उज्जवल भविष्य की ओर ले जाने वाला है। उसके बारे में जानकारी यह भी है कि 2016 में भोपाल के आइसेक्ट विश्वविद्यालय में जल, पर्यावरण, उर्जा एवं समाज अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में उसे सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र का सम्मान मिल चुका है। ऐसा युवक यदि अपनी पढ़ाई के अंतिम पायदान में आतंकवादी बन जाए और खुशी-खुशी ए.के. 47 लिए अपनी तस्वीर वायरल कराए तो निश्चय ही एक-एक भारतीय को दुख पहुंचेगा। वही हुआ है। उसका परिवार भी देख लीजिए। उसके पिता जम्मू कश्मीर राज्य स्कूल शिक्षा विभाग में लेक्चरर हैं।  उसका एक भाई कनिष्ठ अभियंता है। यानी एक शिक्षित संभ्रांत परिवार से निकला हुआ नवजवान आज हाथों में हथियार थामे अपने ही लोगों का कत्ल करने और हिंसा फैलाने के लिए मैदान में कूद गया है।

अब वह मन्नान बशीर वानी न होकर हमजा भाई है। जब तक आतंकवादी के रुप में वह जीवित रहेगा हमजा भाई के नाम से ही जाना जाएगा। हालांकिकोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति आतंकवादी बनता है तो इसमें आश्चर्य करने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। दुनिया में जितने बड़े आतंकवादी हुए हैं सब एक से एक अच्छी डिग्री वाले। ओसामा बिना लादेन से अयमान अल जवाहिरी तक की डिग्री देख लीजिए। 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हमला करने की साजिश में जितने शामिल थे सब अलग-अलग क्षेत्रों के बेहतर डिग्रीधारी। भारत में आईएसआईएस के कई प्रच्छन्न एजेंट पकड़े गए सब उतने ही पढ़े-लिखे और प्रोफेशनल। अपने साथ ये कम पढ़े-लिखों की भी भर्ती आतंकवादी कार्रवाई के लिए करते हैं, लेकिन ज्यादातर नेतृत्व या कमान उच्च डिग्रीधारियों के हाथों ही रहा है। मुंबई हमले में जिंदा पकड़ा गया अजमल कसाब अवश्य गंवार था, लेकिन उसको प्रेरित करने वाले, प्रशिक्षण देने वालों की सूची देख लीजिए आपको पता चल जाएगा कि उनमंे ज्यादातर अच्छे पढ़े लिखे थे। यहां तक की फौज में मेजर से सेवानिवृत्त व्यक्ति भी थे। इसलिए इस विषय पर ज्यादा बहस की आवश्यकता नहीं कि इतना पढ़ा-लिखा होने के बावजूद मन्नान आतंकवादी क्यों बना? मूल प्रश्न यह हो सकता है कि आखिर जम्मू कश्मीर में ऐसे नवजवान आतंकवादी क्यों बन रहे हैं?

मन्नान या उसके जैसे युवाओं को आतंकवादी बनने के बाद अपने जीवन का हस्र पता है। एक समय था जब आतंकवादियों की उम्र कुछ वर्ष की होती थी। अब तो आतंकवादी बनने के बाद कुछ महीने से ज्यादा उनकी उम्र नहीं होती। कई तो कुछ सप्ताह के अंदर ही मार डाले गए। जबसे कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ ऑल आउट के नाम से बहुपक्षीय सैन्य अभियान चला है आतंकवादियों की उम्र घट गई है। मन्नान बशीर इसका अपवाद हो जाएगा कम से कम इस समय ऐसा कहना कठिन है। दूसरे, इस समय सुरक्षा बल जहां आतंकवादियों के सफाये के लिए अभियान चला रहे हैं वहीं वे उनके माता-पिता और रिश्तेदारों से अपील करवाकर उनको मुख्य धारा में वापसी के लिए भी काम कर रहे हैं। इसका असर भी हुआ है। पिछले कुछ महीनों में ऐसी अपीलों का असर हुआ है और करीब एक दर्जन आतंकवादी आतंकवाद का रास्ता छोड़कर समाज में वापस आए हैं। जम्मू कश्मीर पुलिस एवं प्रशासन की घोषणा है कि जो वापस आएंगे उनको मुख्यधारा में बने रहने मेें हरसंभव मदद की जाएगी। ऐसा हो भी रहा है। इसके साथ नए युवक आतंकवादी न बनें इसके लिए भी कई प्रकार के अभियान चल रहे हैं। इनसे काफी युवक जो आतंकवादियों के संपर्क में आ गए थे एवं आतंकवादी बनने के एकदम कगार थे उनको रोका जा सका है। ऐसी सफलताओं और ऐसे वातावरण के बीच किसी ऐसे व्यक्ति का आतंकवादी बनना निश्चय ही बार-बार यह सोचने के लिए जरुर मजबूर करता है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है?

यह तो साफ है कि आतंकवादी समूह कई तरीकों से युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। कौन कहां किस वेष में आतंकवादी बना रहा है यह पता करना मुश्किल है। मन्नान बशीर के बारे मेें अब जानकारी मिली है, लेकिन उसकी छानबीन में सामने आया है कि उसके ही कमरे में रहने वाले यानी रुम पार्टनर मुजम्मिल पिछले वर्ष जुलाई से ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कैम्पस नहीं आया है। ध्यान रखिए, वह भी पीएचडी का ही छात्र है और दोनों एक ही प्रोफेसर के अधीन शोध कर रहे थे। संयोग देखिए, दोनों कुपवाड़ा जिले के ही रहने वाले हैं। तो कहां गया वह? अगर वह पुलिस को नहीं मिलता तो यह मान लेना चाहिए कि आतंकवादी समूह मेें उसका प्रत्यक्ष प्रवेश पहले हो गया था और मन्नान बशीर उसके बाद गया है। छानबीन से ही पता चलेगा कि ये दोनों किसके संपर्क में थे। यह भी समाने आया था कि आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद मन्नान बशीर ने अभियान चलाया था। बुरहान वानी को शहीद बताते हुए पोस्टर आदि लगाए थे। उस समय भी पुलिस उसके नजदीक पहुंच रही थी, लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने उसे क्लीन चीट दे दी। कहा गया कि वह एक मेधावी छात्र है तथा आतंकवादी या अलगाववादी गतिविधियों से उसका कोई रिश्ता नहीं। यह कहना मुश्किल है कि उस समय आतंकवादी समूहों से किसी प्रकार का उसका रिश्ता बना था या नहीं। किंतु यह कहा जा सकता है कि अगर उस पर कड़ी नजर रखी जाती तो वह पकड़ में आ जाता।

इसे जम्मू कश्मीर का दुर्भाग्य कहिए कि जब भी वहां शांति और स्थिरता की स्थिति बनने की संभावना पैदा होती है उसके समानांतर ऐसी घटनाएं घटने लगतीं हैं कि पूरा माहौल उलट हो जाता है। पाकिस्तान ने पिछले चार सालों में पूरी कोशिश की है कि जम्मू कश्मीर में 1990 के दशक की स्थिति कायम की जाए। इसके लिए अपने यहां से आतंकवादियों को तो भेजो ही, घाटी के अंदर से आतंकवादी पैदा करो। इसमें उसे सफलता भी मिल रही है। 2017 में सुरक्षा बलोें का मानना है कि 120 के आसपास आतंकवादी घाटी से बने हैं। उसके पूर्व 2016 में भी करीब 90 आतंकवादी वहां से बने थे। इसके पूर्व कश्मीर से आतंकवादी बनने की घटनाएं कम हो रहीं थीं। किंतु वहां योजनाबद्ध तरीके से कश्मीर के अलगाववाद का अति इस्लामीकरण किया जा चुका है। अब आतंकवादी वहां केवल कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए संघर्ष नहीं करते। उनकी घोषणा है कि इसे इस्लामिक राज में बदलना है। यानी वहां के संघर्ष को इस्लाम का संघर्ष बना दिया गया है। आखिर जाकिर मूसा के जितने वक्तव्य हमारे सामने आए हैं उनमें यही कहा गया है कि कश्मीर को इस्लामी राज के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं। उसने तो यहां तक कहा है कि कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले अलगाववादी यदि इसका विरोध करते हैं तो उनका भी काम तमाम किया जाएगा। इस्लाम के जुड़ जाने से आतंकवाद को नई धार मिली है। अलगाववाद का सामान्य नारे का असर कमजोर पड़ने लगा था। आतंकवादी समूहों ने इसमें बदलाव करके इस्लाम की लड़ाई का नारा दिया और इसमें इतना आकर्षण है कि युवा खींच रहे हैं। पिछले ही दिनों हमने देखा कि एक मुठभेड़ में मारे गए तीन आतंकवादियों में से एक जम्मू कश्मीर पुलिस अधिकारी का 17 वर्षीय बेटा था जो तीन महीने पहले ही आतंकवादी बना था। जाहिर है, मन्नान बशीर जैसे के आतंकवादी बनने के पीछे मजहब मुख्य कारक होगा। मजहब के लिए मरने का विचार इतना भाव-विभोर कर देता है कि फिर उसके सामने आदमी को कुछ सूझता ही नहीं। अगर जीते तो इस्लाम की जीत और अगर मारे गए तो इस्लाम के लिए जिसमें जन्नत मिलनी है। तो अब विचार करने की आवश्यकता यह है कि आखिर इस मजहबी आकर्षण को वहां कैसे खत्म किया जाए। जब तक इस्लामीकरण का खतरनाक विचार कायम रहेगा ऐसे आतंकवादी बनते रहेंगे।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शनिवार, 6 जनवरी 2018

अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को आर्थिक सहायता रोकने का मतलब

 

अवधेश कुमार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली 25.5 करोड़ डॉलर यानी करीब 16 अरब 26 करोड़ रुपए की मदद रोकना निश्चय ही एक बड़ी घटना है। यह कोई साधारण राशि नहीं है। पाकिस्तान जिस आर्थिक दुर्दशा का शिकार है उसमें इतनी राशि का महत्व अपने-आप समझा जा सकता है। यह केवल इसी साल नहीं रोका गया है। ट्रपं ने साफ किया है कि अगर पाकिस्तान ने अपनी सीमा के अंदर आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की तो आगे से उसे कोई राशि नहीं मिलेगी। पाकिस्तान इसके जवाब में कुछ भी कहे सच यही है कि पाकिस्तान के लिए इसकी भरपाई संभव नहीं है। किंतु इसका महत्व केवल राशि रोकने तक ही नहीं है। यह अमेरिका द्वारा इस बात की स्वीकृति है कि पाकिस्तान अपनी सीमा में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता यानी उन्हें पालता है। भारत तो यह आरोप पाकिस्तान पर लगाता ही रहा है। अमेरिका द्वारा इसकी स्वीकृति के बाद पाकिस्तान के लिए कठिनाइयां बढ़ने वाली है। इस संबंध में ट्रंप ने वर्ष 2018 के पहले दिन अपने ट्विट में जो तेवर दिखाए वह आने वाले समय में अमेरिकी नीति का संकेत है। इसमें ट्रंप ने पाकिस्तान पर हमला बोलते हुए कहा कि अमेरिका ने मूर्खतापूर्ण तरीके से पाकिस्तान को गत 15 वर्षों में 33 अरब डालर यानी 2 लाख 14 हजार करोड़ रुपए से अधिक की सहायता दी और उन्होंने हमारे नेताओं को मूर्ख सोचते हुए हमें  झूठ और धोखे के अलावा कुछ भी नहीं दिया। वे आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह देते रहे और हम अफगानिस्तान में खाक छानते रहे। अब और नहीं।

यह कोई साधारण वक्तव्य नहीं है। अमेरिका का राष्ट्रपति यदि यह कहता है कि पाकिस्तान उनकी और दुनिया की आंखों में धुल झोंककर आतंकवादियों को सुरक्षित जगह मुहैया कराता रहा तो फिर पाकिस्तान इसे गलत कैसे करार दे सकता है। यही बात भारत कहता रहा है और उसे अमेरिका आपसी बातचीत में स्वीकारता भी था, लेकिन 2001 के बाद से किसी राष्ट्रपति ने इतना खुलकर और इतनी दृढ़ता से पाकिस्तान पर हमला नहीं किया था। तो हम कह सकते हैं कि यह भारत की कूटनीतिक सफलता भी है। आखिर हम भी अपनी कूटनीति में पाकिस्तान के संदर्भ में यही अभियान चला रहे थे कि उसे किसी तरह आतंकवादियों का पनाहगार देश दुनिया की बड़ी शक्तियां मान ले।

हालांकि ट्रंप ने भी अचानक ऐसा कदम नहीं उठाया है। उन्होंने और उनके दूसरे मंत्रियों ने बार-बार इसके बारे में संकेत दिया।  वास्तव में ट्रंप प्रशासन लगातार पाकिस्तान को आतंकवादियों और उनके संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कहता रहा, लेकिन पाकिस्तान इसे उसी तरह टालता रहा जिस तरह वह जॉर्ज बुश एवं बराक ओबामा के शासनकाल में टालता रहा था। वह आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई का प्रदर्शन अवश्य करता रहा लेकिन उन संगठनों को नष्ट करने के लिए कोई बड़ा कदम उसने उठाया हो इसके प्रमाण नहीं। जिन आतंकवादी समूहों ने उसके अंदर हमले करके जीना हराम किया है उनके खिलाफ तो वह कार्रवाई करता है, लेकिन जो सीमा पार हमले करते हैं उनके प्रति उसने कार्रवाई नहीं की यह सच है। ट्रपं प्रशासन ने न जाने एक साल के अंदर कितनी बार कहा कि अगर पाकिस्तान ने कार्रवाई नहीं की, तो वह अपने तरीके से उनसे निपटेगा। यह एक चेतावनी थी। इसका अर्थ था कि जिस तरह अमेरिका अफगानिस्तान में हमले कर  रहा है वैसे ही वह पाकिस्तान में भी करेगा। यदि उसे स्वयं कार्रवाई करनी है तो फिर पाकिस्तान को राशि देने का कोई तुक नहीं है। इस बात को पाकिस्तान को समझना चाहिए था, लेकिन उसे लगता रहा कि अमेरिका पहले की तरह ही बोलता रहेगा और सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।

वैसे ट्रंप प्रशासन ने यह तो जहां यह साफ कर दिया है कि अब अमेरिका की कोई योजना नहीं है कि वह पाक में सैन्य सहायता के नाम पर करोड़ों डॉलर की रकम निवेश करे। किंतु यह भी कहा गया है कि अमेरिका, पाकिस्तान से उम्मीद करता है कि वह अपनी सरजमीं पर मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करेगा। अमेरिकी प्रशासन ने यह भी साफ किया है कि दक्षिण एशिया रणनीति के लिए पाकिस्तान का समर्थन अमेरिका को मिलना चाहिए। इन दोनों पंक्तियों के अर्थ अत्यंत गंभीर हैं। ऐसा नहीं है कि धन बंद कर देने से आपको आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई न करने की खुली छूट मिल गई है। कार्रवाई आपको करनी होगी। साथ ही आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में पाकिस्तान की भूमि से लेकर जो समर्थन अमेरिका को मिलता रहा है वह भी जारी रहना चाहिए। यह सीधे-सीधे अमेरिका की पाकिस्तान को चेतावनी है कि अगर आपने इसमें आनकानी की तो फिर उसके परिणाम गंभीर होंगे। पाकिस्तान की प्रतिक्रिया अभी जैसे को तैसे वाला है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि अमेरिका अफगानिस्तान की लड़ाई के लिए पाकिस्तान के संसाधनों का इस्तेमाल करता है और उसी की कीमत चुकाता है। उन्होंने कहा कि ट्रंप के नो मोर का कोई महत्व नहीं है और पाकिस्तान इस तानाशाही को नहीं सहेगा। ख्वाजा आसिफ ने कहा, हमने अमेरिका को पहले ही कह दिया है कि अब हम उसके लिए और नहीं करेंगे। अरबों डॉलर देने के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यदि हमने यह लिया है तो इसमें पाकिस्तान द्वारा दी गई सेवाओं के बदले भुगतान भी शामिल है। ट्रंप अफगानिस्तान में हार से दुखी हैं और इसलिए वह पाकिस्तान पर दोष मढ़ रहे हैं। हमारी जमीन, रोड, रेल और दूसरी सेवाओं का इस्तेमाल किया गया और इसके बदले हमें भुगतान किया गया। इसका अंकेक्षण भी हुआ है। आसिफ ने यह भी कह दिया है कि अमेरिका फंड को रोके या नहीं, लेकिन पाकिस्तान को इसकी जरूरत नहीं है। हमारा हित उनसे अलग है और हम उनके सहयोगी नहीं बनेंगे। ध्यान रखिए, एक दिन पहले ख्वाजा आसिफ ने ट्रंप के ट्वीट के जवाब में कहा था कि हम राष्ट्रपति ट्रंप के ट्वीट पर जल्दी ही जवाब देंगे। इंशाल्लाह... चलो दुनिया को सच पता चल जाएगा। तथ्य और कल्पनाओं का अंतर लोगों को जानना चाहिए।

तो यह जवाब है पाकिस्तान का। प्रश्न उठता है कि आखिर पाकिस्तान इस ढंग से जवाब क्यों दे रहा है? उसने यह नहीं कहा है कि हम आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं और आगे भी करेंगे। इसके विपरीत वे कह रहे हैं कि हम ही नो मोर कह देते हैं। माना जाता है कि पाकिस्तान की आवाज के पीछे चीन हो सकता है। चीन जिस ढंग से पाकिस्तान में निवेश कर रहा है उससे शायद उसका हौंसला बढ़ा हुआ है। किंतु क्या चीन पाकिस्तान और वह भी आतंकवाद के मामले पर अमेरिका से सीधा टकराव लेने का जोखिम उठाएगा? सच यह है कि चीन पाकिस्तान में चीन पाक आर्थिक गलियारे के नाम पर निवेश अवश्य कर रहा है लेकिन उसने भी हाल में पाकिस्तान के सामने कई शर्तें रख दी हैं। दूसरे, वह उस तरह से सहायता राशि देने वाला देश नहीं है जैसा अमेरिका है। 11 सितंबर 2001 को आतंकवादी हमले के बाद जब अमेरिका ने अफगानिस्तान के खिलाफ कार्रवाई आरंभ की तो उसके निशाने पर पाकिस्तान भी था। उस समय जनरल परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति थे। उन्होंने अमेरिका की सभी शर्तें स्वीकार कर उसके एवज में भारी राशि लेना आरंभ किया। इससे पाकिस्तान बच भी गया तथा उससे लगातार राशि मिलती रही। 2009 में अमेरिका-पाकिस्तान के बीच केरी-लुगर-बर्मन एक्ट करार हुआ। इसके तहत 2010 से 2014 तक पाकिस्तान को अमेरिकी मदद तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ाकर 7.5 अरब डॉलर कर दी गई। स्वयं अमेरिका का मानना है कि ज्यादातर मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ सैन्य ताकत बढ़ाने और सरकारी खर्चे निकालने में किया गया। 2014 में इसका उदाहरण सामने आया था जब पाकिस्तान ने अमेरिका से मिले 50 करोड़ रुपए सरकारी बिलों के भुगतान और विदेशी मेहमानों को तोहफे देने में खर्च कर दिए। आरोप यह भी है और सच लगता भी है कि अमेरिका से मिले पैसे का इस्तेमाल पाकिस्तान कश्मीर में आतंक को बढ़ावा देने में भी करता है।  ख्वाजा जो कह रहे हैं उसमें इतना सच है कि उनके संसाधनों और जमीन का इस्तेमाल अमेरिका इस लड़ाई में करता है। किंतु वे भूल रहे हैं कि उस समझौते में आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की बात भी शामिल थी। यह काम आपने नहीं किया है। तो इसका परिणाम आपको भुगतना पड़ेगा। अभी तो अमेरिका ने एक कदम उठाया है। देखते हैं आगे वह क्या करता है। उम्मीद करनी चाहिए कि अमेरिका का तेवर ऐसा ही बना रहेगा तथा पाकिस्तान से सीमा पार हमला करने वाले आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई होगी।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः9811027208, 01122483408

 

 

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

लालू की सजा को राजनीकि रंग देना दुर्भाग्यपूर्ण

 

अवधेश कुमार

लालू प्रसाद यादव को कुख्यात चारा घोटाले मामले में दोषी माना जाना कोई सामान्य फैसला नहीं है। हमारे देश में प्रभावी राजनेताओं पर मुकदमे अगर होते भी थे तो उनको सजा नहीं मिलती थी। अभी कुछ ही दिनों पहले झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को सजा हुई है। हालांकि पहले के एक मामले में 3 अक्टूबर 2013 को लालू यादव को छः वर्ष की सजा सुनाई जा चुकी है। चाइबासा कोषागार से फर्जी तरीके से 37.70 करोड़ निष्काषन के मामले में सजा हुई थी। वर्तमान मामला देवघर कोषागार से 1992 से 1994 के बीच फर्जी आवंटन पत्र और चालान पर 89 लाख 27 हजार निकाले जाने से संबंधित है। उनको दोषी ठहराए जाने के साथ ही जिस तरह उनकी पार्टी की ओर से बयान आ रहे हैं वे चिंतित करने वाले हैं। सारे बयान न्यायालय को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। राजद नेताओं के बयानों से ऐसा लगता है जैसे न्यायालय ने जानबूझकर लालू यादव के साथ अन्याय किया है। कुछ नेता तो यह भी कह रहे हैं कि भाजपा ने उनके राजनीतिक जीवन को बरबाद करने के लिए सजा दिलवाई है। कोई कह रहा है कि वे पिछड़ी जाति से हैं इसलिए उन्हें सजा मिली है। तोे न्यायालय की निष्पक्षता एवं स्वतंत्रता को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। इस तरह के बयान देने वालों में ऐसे नेता भी शामिल हैं जो केन्द्र में मंत्री तक रह चुके हैं।

निस्संदेह, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। राजद के नेताओं और लालू यादव के समर्थकों को आघात लगना स्वाभाविक है। राजद के जन्म से लेकर आज तक उसका पूरा अस्तित्व लालू यादव पर निर्भर रहा है। जाहिर है, यदि लालू यादव को उपरी न्यायालयों से भी राहत नहीं मिली तो फिर राजद के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाएगा। पिछली सजा के बाद उच्च न्यायालय से उनको जमानत मिल गई एवं वे चुनाव लड़ने से वंचित होकर भी सक्रिय रहे हैं। हालांकि उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में अपने दोनों बेटों को विधायक के रुप में निर्वाचित कराया तथा उन्हें मंत्री भी बनवा दिया। इनमें तेजस्वी यादव का नेतृत्व लगभग पार्टी स्वीकार भी कर चुकी है। किंतु यह तब की स्थिति है जब लालू यादव सामने हैं। यदि उनको वाकई जेल काटनी पड़ती है तब भी यही स्थिति रहेगी ऐसा मानना कठिन है। तो लालू यादव की सजा के साथ राजद के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है। इस समय तो पार्टी में टूट नहीं होगी, किंतु अगले चुनाव तक यदि लालू यादव बाहर नहीं रहे तो बहुत सारे नेता बाहर का रास्ता देख सकते हैं। यह खतरा राजद पर आसन्न है।

किंतु इसका यह अर्थ नहीं कि हम अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता में न्यायालय को ही निशाना बनाएं। यह किसी के हित मेें नहीं है। आखिर लालू यादव भी अंततः सीबीआई के विशेष न्यायालय के फैसले के खिलाफ फिर से अपील करने कहां जाएंगे? उच्च न्यायालय में ही न। कल यदि वही न्यायालय उनको राहत दे दे तो वे क्या कहंेगे? हमारे देश में न्यायलयों की निष्पक्षता एवं स्वतंत्रता अभी तक प्रश्नों से बाहर है। न्यायालय तथ्यों एवं सबूतों के आधार पर फैसले देती है। यदि उसमें कहीं कोई त्रुटि है तो सुधार के लिए उपर के न्यायालयों का दरवाजा खुला हुआ है। उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय ने कई बार अपने ही फैसले की समीक्षा कर दूसरे फैसले दिए हैं। न्यायालय को जातिवाद की दुर्गंध में खींचने वाले नेता यह न भूलें कि अभी-अभी 2 जी मामले में ऐसे ही एक न्यायालय ने दलित ए राजा को बरी किया है। इस मामले में भी जिन छः लोगों को बरी किया गया उनमंे भी पिछड़ी जाति के लोग शामिल है। इसलिए बेहतर हो राजद नेता न्यायालय को आरोपित करना बंद करें। कानून की लड़ाई कानून के अनुसार लड़े और वहीं तक सीमित रहें। जब 2013 में लालू यादव को पहली सजा हुई थी तब भी ऐसा ही वातावरण बनाया गया था। उम्मीद थी कि इससे लालू को जनता की सहानुभूति प्राप्त होगी जिसका राजनीतिक लाभ पार्टी को मिलेगा। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बुरी तरह पराजित हो गई।

जाहिर है, राजद के नेताओं को उससे सबक लेना चाहिए। ये न भूलें कि अभी लालू यादव पर चार मामले और है। उन पर कुछ छः मामले हैं जिनमें पांच झारखंड तथा एक बिहार में हैं। इनमें दो का फैसला आ गया। हो सकता है आगे के मामले में भी उनको सजा हो जाए या हो सकता है सजा नहीं भी हो। जिस मामले में सजा हुई है उसमें लालू यादव पर आरोप है कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग कर जांच की फाइल को 5 जुलाई 1994 से 1 फरबरी 1996 तक रोके रखा। न्यायालय ने साफ कहा है कि लालू को भ्रष्टाचार का पता था लेकिन उन्होंने इसे रोका नहीं। क्यों नहीं रोका? जाहिर है, कुछ अपना स्वार्थ भी इसके पीछे रहा होगा। वैसे भी इस मामले में आरंभ में 38 आरोपी थे जिनमें 11 मर चुके हैं, 3 सीबीआई के गवाह बन गए एवं 2 ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। इन दोनों को 11 वर्ष पूर्व ही सजा हो चुकी है। यानी वाकई गबन किया गया यह पहले से प्रमाणित है। बिहार का चारा और पशुपालन घोटाला ऐसा जघन्य कांड था जिसके दोषियों को जितनी सजा दी जाए कम है। पशुओं और गरीबों का हक मारकर खजाने से धन लूटा गया। ज्यादातर मामले 1990 से 1994 तक के हैं। करीब 950 करोड़ रुपया का यह पूरा घोटाला बना। इसका लंबा इतिहास है जिसकी विस्तृत चर्चा यहां संभव नहीं। सोचिए न पशुपालक कौन लोग होते हैं? साधारण आदमी। लालू यादव सामाजिक न्याय के पुरोधा कहलाते थे और उनके शासनकाल मंे साधारण लोगों के हक का धन इस तरह लूटा गया। इस मामले में कुल 54 मुकदमे दर्ज हुए जिनमें से 47 का फैसला सुनाया जा चुका है। इसमें 1404 लोग दोषी करार दिए जा चुके हैं जिनमें पशुपालन विभाग के अधिकारी, वरिष्ठ नौकरशाह, आपूर्तिकर्ता, नेता सब शामिल हैं।

कहने का तात्पर्य यह कि चारा घोटाला हुआ इसे अब नए सिरे से प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं। इतने लोगों को सजा मिलना ही यह बताता है कि किस ढंग से अंधेर नगरी और चौपट राजा की तरह लूट मची थी। लालू यादव और जगन्नाथ मिश्र जैसे नेताओं का मामला इसलिए लंबा खींचा, क्योंकि इनके पास मुकदमा लड़ने के हर साधन मौजूद हैं, अन्यथा इनका फैसला भी पहले हो चुका होता। इस मामले में किसी तरह की राजनीतिक साजिश की बात तथ्यों से मेल नहीं खाती। जब जनवरी 1996 में प्राथमिकी दर्ज हुई तो केन्द्र मंें कांग्रेस की सरकार थी एवं प्रदेश में स्वयं लालू यादव मुख्यमंत्री थे। जब मार्च 1996 में सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज की तब भी केन्द्र मंें कांग्रेस की सरकार थी। जब अक्टूबर 1997 में सीबीआई ने अंतरिम आरोप पत्र दायर किया उस समय केन्द्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार थी जिसके प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल लालू यादव की उस समय की पार्टी जनता दल से ही आते थे। उनकी गिरफ्तारी हुई तब भी केन्द्र एवं प्रदेश में उनकी ही सरकार थी। ध्यान रखिए राजद की पैदाइश की चारा घोटाले के गर्भ से हुआ। जब लालू गिरफ्तार हुए तो मांग की गई कि वो पद छोड़ें। उन्होंने ऐसा करने की जगह पार्टी तोड़कर राजद बना लिया एवं अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया। फिर जब इसके कई वर्ष बाद मई 2005 में आरोप गठन हुआ तो केन्द्र की सरकार में लालू यादव स्वयं मंत्री थे। तो इसमें राजनीतिक साजिश कहां से आ गई? इसलिए ऐसे आरोपों का कोई अर्थ नहीं है।

वास्तव में न्यायालय ने यह साबित कर दिया कि लालू यादव भ्रष्टाचार में संलिप्त थे। यह भारतीय राजनीति के लिए सामान्य त्रासदी नहीं है। एक व्यक्ति जोे जयप्रकाश आंदोलन से उभरा हो, जिसका मुख्य नारा ही भ्रष्टाचार, अधिकनायकवाद एवं वंशवाद से राजनीति की मुक्ति हो, वह स्वयं भ्रष्टाचार के कीचड़ मंें धंस जाए तो इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है। जो व्यक्ति सामाजिक न्याय का मसीहा कहलता हो वह उन्हीं के हक का धन लूटने में संलिप्त हो जाए जिसके कल्याण का दायित्व उसने अपने सिर लिया है इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है। जब तक लालू यादव को उपर का न्यायालय बरी नहीं करता तब तक उनको भ्रष्टाचारी माना ही जाएगा। हालांकि कल वे मुक्त हो जाएं तभी यह नहीं माना जाएगा कि पशुपालन घोटाला हुआ ही नहीं था। घोटाला तो साबित हो चुका है और यह लालू यादव के कार्यकाल मेें ही हुआ।

अवधेश कुमार, ई.ः30,गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

 

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

बहुत कुछ कहते हैं गुजरात परिणाम के आंकड़े

 

अवधेश कुमार

भाजपा छठी बार गुजरात में सत्तासीन हुई है और यह सामान्य बात नहीं है। वह जीत का जश्न मना रही है। लेकिन कांग्रेस भी नाखुश नहीं है। वह कह रही है कि हमने संतोषजनक प्रदर्शन किया है और यह नैतिक विजय है। चुनाव परिणाम में नैतिक विजय पहली बार सुना जा रहा है। परिणाम में हार या जीत होती है। नैतिक या अनैतिक जीत हार नहीं होती। किंतु यह कांग्रेस का विश्लेषण है और इसे उसके सममर्थक स्वीकार कर रहे हैं। क्या जिन मतदाताओं ने भाजपा को मत दिया क्या वे अनैतिक थे और उसकी विजय अनैतिक हो गई? कांग्रेस दोनों प्रदेश हारी है यह एक तथ्य है और इसे अस्वीकार करना मूर्खों के स्वर्ग में रहने जैसा होगा। हालांकि इससे जुड़े आंकड़ों के जो तथ्य हैं उन्हें तो स्वीकार करना ही होगा। ये आंकड़े भी बहुत कुछ कहते हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को 2012 के मुकाबले 16 सीटों का नुकसान हुआ, उसे 99 सीटें मिलीं। इसके विपरीत कांग्रेस की सीटें 61 से बढ़कर 77 हो गईं तथा उसके सहयोगियों ने तीन सीटें पाईं। कांग्रेस इससे प्रसन्न है कि उसने भाजपा को 99 तक सीमित रहने के लिए मजबूर कर दिया और उसकी सीटें और मत प्रतिशत दोनों बढ़ी। इसको किस तरह से लिया जाए यह हमारी आपकी दृष्टि पर निर्भर करता है।  इस चुनाव परिणाम को समझने के लिए चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों का थोड़ा गहराई से विश्लेषण करने होंगे।

आंकड़ें केवल शुष्क अंकगणित नहीं होते, यह बहुत कुछ कहते हैं। उदाहरण के लिए भाजपा को 49.1 प्रतिशत मत मिला जो पिछली बार की तुलना में 1.25 प्रतिशत अधिक है। इसके समानांतर कांग्रेस को 41.4 प्रतिशत मत मिला जो पिछली बार से 2 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा है। कांग्रेस इससे भी संतुष्ट है कि लंबे समय से भाजपा और उसके मतों में 9 प्रतिशत से ज्यादा का अंतर रहता था जबकि इस बार 7.7 प्रतिशत तक अंतर को सिमटा दिया। कांग्रेस अपने अनुसार इसका विश्लेषण करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन यह विचार करने वाली बात है कि आखिर 1.25 प्रतिशत अधिक मत पाकर भी भाजपा की सीटें क्यों घट गईं एवं 2 प्रतिशत अधिक मत पाकर कांग्रेस की सीटें क्यों बढ़ गईं? आखिर उनका वोट प्रतिशत बढ़ा तो कुछ सीटें भी बढ़नी चांहिए थी ऐसा नहीं हुआ। ऐसे ही अनेक तथ्य हैं जिनका विश्लेषण किया जाना आवश्यक है। जिस राज्य में मुख्यतः 2 पार्टियों के बीच चुनावी मुकबला हो, वहां 2-3 प्रतिशत मतों के अंतर से परिणाम प्रभावित हो जाते हैं। किंतु गुजरात में ऐसा नहीं हुआ है। आप यदि सभी सीटों में जीत हार का अंतर देखें तो इसका कारण समझ में आ जाएगा। दरअसल, भाजपा के विजयी उम्मीदवारों में से 35 की जीत का अंतर 40 हजार से मतों से ज्यादा रहा है। भाजपा के दो उम्मीदवार तो एक लाख से भी ज्यादा वोटों के अंतर से जीते हैं। कांग्रेस का सिर्फ एक उम्मीदवार ही 40 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल कर सका। हां, उसके सहयोगी छोटूभाई बसावा जरुर 48 हजार 948 मतों से जीते हैं। 99 विधानसभाओं में भाजपा की जीत का औरसत अंतर 29,968 वोट है। 2012 में भाजपा की जीत का अंतर 26,236 वोट था। इसके समानांतर कांग्रेस की जीत का अंतर औसत 13,331 वोट है। यह 2012 में औसत 13,577 वोट के लगभग समान है। इस तरह भाजपा के उम्मीदवारों के पड़े मत के कारण उसके मत प्रतिशत तो बढ़ गए लेकिन उसकी सीटें घट गईं।

 इस आंकड़े का दूसरा अर्थ भी स्पष्ट है। वह यह कि कांग्रेस जितना प्रसन्न हो रही है उसे वोट उसके अनुसार नहीं मिले हैं। ऐसा होता तो उसके भी अनेक उम्मीदवार भारी मतों से जीतते। ऐसा नहीं हुआ है। इसका मतलब है कि कांग्रेस ने भाजपा के मतों में संेंध लगाने की कोशिश अवश्य की है, पर उसको जबरदस्त टक्कर मिली है। यानी भाजपा का अभी भी गुजरात में पर्याप्त जनाधार है। अगर भाजपा के 35 भारी मतों से विजयी उम्मीदवारांे से तुलना की जाए तो कांग्रेस को कहीं भी एकपक्षीय जीत नहीं मिली है। यह कांग्रेस के उत्साही समर्थकों को समझना चाहिए। सच तो यह भी है कि कांग्रेस को सभी क्षेत्रों में सफलता नहीं मिली है। पाटिदार अमानत आंदोलन समिति से प्रभावित करीब 73 स्थान माने जाते हैं। इनमें 2012 के चुनाव में भाजपा ने 59 सीटें जीतीं थी। इस बार वह सिर्फ 45 सीटें जीत पाई है। कांग्रेस यहां से केवल 12 सीटें जीत पाई थी। इस बार उसे 28 सीटांें पर विजय मिली है। जाहिर है, जो 16 सीटें बढ़ीं वे यहीं से हैं। केवल सौराष्ट्र और कच्छ की बातें करंें तो यहां 54 सीटे हैं इनमें से भाजपा ने पिछली बार 35 सीटें जीती थीं। इस बार वह केवल 23 सीटें जीत पाई है। इसके विपरीत कांग्रेस को 30 सीटें मिली है जबकि पिछली बार उसे केवल 16 सीटें मिलीं थीं। इसका अर्थ बहुत साफ है। यह कांग्रेस का वोट नहीं है। यह हार्दिक पटेल के कारण और पटेलों के आरक्षण की मांग के पक्ष का वोट है। यहां भी कांग्रेस के जीत का अंतर ऐसा नहीं है जिससे यह कहा जाए कि सारे पटेल भाजपा के खिलाफ थे। वास्तव में कांग्रेस कोई मुगालता न पाले। पटेलांे में दो वर्ग थे। जो उम्रदराज हैं वो भाजपा के साथ थे, लेकिन आरक्षण की मांग के कारण युवाओं का बड़ा वर्ग हार्दिक के कारण कांग्रेस के पक्ष में गया। ऐसा हमेशा नहीं हो सकता है।

इस चुनाव का एक आंकड़ा यह कहता है कि भाजपा को शहरी इलाकों में अच्छे मत मिले। चार शहरों का उदाहरण लिजिए। राजकोट की कुल आठ सीटों में से भाजपा को 6 तथा कांग्रेस को 2 मिला। इस तरह अहमदाबाद के 21 में से भाजपा को 15 एवं कांग्रेस को 6, सूरत के 16 में से भाजपा को 15 तथा कांग्रेस को 1 तथा वडोदरा के 10 में से भाजपा को 8 एवं कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं। इसक क्या अर्थ है। कुल शहरी 58 सीटों के अनुसार देखें जहां शहरी आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है तो भाजपा ने 48 जीत हासिल की है। 2012 में भाजपा ने 52 शहरी सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस ने केवल छह शहरी सीटों पर कब्जा किया था। 124 ग्रामीण सीटों में भाजपा ने 51 (पिछली बार 63) और कांग्रेस ने 70 सीटें जीती हैं। 2012 में कांग्रेस ने 55 सीटें जीती थीं। इसके कई अर्थ हैं। यह माना जा रहा था कि जीएसटी एवं नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर शहरी इलाकों में दिखेगा और व्यापारी वर्ग भाजपा के खिलाफ जाएगा। कांग्रेस की सरकार बनाने की उम्मीद इस पर भी टिकी थी। कपड़े पर 5 प्रतिशत जीएसटी लगाने के विरोध में सूरत में कपड़ा कारोबारियों ने हड़ताल की थी। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उनकी मांगें जीएसटी परिषद में रखने का आश्वासन दिया। इसके बाद हड़ताल समाप्त कर दी गई। सरकार को जीएसटी दर में कटौती करनी पड़ी। जो भी हो, शहरी क्षेत्रों में भाजपा की बढ़त बनी रहने का मतलब है कि व्यापारी वर्ग में यदि नाराजगी थी भी तो वह उस सीमा तक नहीं थी कि वे भाजपा और नरेन्द्र मोदी के खिलाफ प्रतिशोध की भावना से मतदान करें। यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। जिस जीएसटी और नोटबंदी को आरंभ से अंत तक कांग्रेस ने बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया उसका भाजपा के प्रतिकूल असर हुआ ही नहीं। ग्रामीण इलाकों में भाजपा का कमजोर होने के भी कई अर्थ है। हार्दिक का पटेलों की नई पीढ़ी पर असर इसका एक कारण हो सकता है। किंतु इसे इस रुप में भी लेना चाहिए कि किसानों में तथा कृषक मजदूरों के अंदर सरकार की नीतियों से असंतोष है। यानी उन तक कल्याणकारी कार्यक्रमों को जिस सीमा तक पहुंचना चाहिए, किसानों को जितनी राहत और सुविधाएं मिलनी चाहिए उनमें कमी रह गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित पूरी केन्द्र सरकार को इस बारे में विचार करना पड़ेगा कि जिन कारणों से ऐसा हुआ उसे कैसे दूर किया जाए। आने वाले राज्यों के चुनावों के लिए यह एक सबक होना चाहिए।

ऐसे कई आंकड़े हैं जिनके अर्थ महत्वपूर्ण हैं। एक आंकड़ा नोटा का है। नोटा में 5 लाख 51 हजार 615 यानी कुल मतों का 1.8 प्रतिशत मत पड़ना निश्चय ही दोनों पार्टियों के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। आखिर इतने लोगों ने नोटा का विकल्प क्यों चुना? वे सरकार एवं विपक्ष दोनों से क्यों इतने निराश थे। इस पर भी विचार होना चाहिए। वैसे यह मत यूं ही बिना किसी परिणाम के नहीं गया है। एक रोचक और खतरनाक तथ्य यह है कि 22 विधानसभा क्षेत्रों में उम्मीदवारों की जीत हार का निर्णय नोटा ने कर दिया। इन क्षेत्रों में जितने मतों से जीत हार हुई उससे ज्यादा मत नोटा को पड़े। यह किसी स्वस्थ लोकतंत्र का प्रमाण नहीं हो सकता है। हमें यह सोचना पड़ेगा कि नोटा अब जीत हार में भूमिका क्यों निभाने लगा है। यह प्रवृत्ति कैसे रुके चुनाव प्रणाली एवं राजनीतिक प्रणाली में लोगों की पूर्ण आस्था कैसे स्थापित हो यह विचारणीय प्रश्न है। गुजरात में आम आदमी पार्टी ने कुल 29 सीटों पर ही प्रत्याशियों को उतारा था, जहां पार्टी को केवल 29 हजार 517 वोट हासिल हुए। वहीं इन 29 सीटों पर 75 हजार 880 लोगों ने नोटा का लिकल्प चुना।

इसी तरह मतदान प्रतिशत का पिछली बार के 72.02 प्रतिशत से गिरकर 67.75 प्रतिशत होने का भी कुछ अर्थ है। यह बताता है कि एक बड़े वर्ग में मतदान को लेकर कोई उत्साह ही नहीं था। संभव है इसमें ज्यादातर मतदाता भाजपा के हों जो उनसे नाराज तो थे लेकिन उनके खिलाफ नहीं जाना चाहते थे, इसलिए वो मतदान करने नहीं गए। भाजपा अगर इससे सबक नहीं लेती तो दूसरे राज्यों में भी उसके लिए समस्याएं आएंगी।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष- 01122483408, 9811027208

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/