शनिवार, 11 नवंबर 2017

जंतर-मंतर से धरना प्रदर्शनों का हटाया जाना कई प्रश्न खड़े करता है

 

अवधेश कुमार

जंतर-मंतर का पूरा नजारा बदल गया है। वर्षों से जहां चारो ओर आंदोलनकारियों के बैनरों-पोस्टरों तथा तरह-तरह के तंबुओं की भरमार होती थी वहां अब करीने से सजाए गए फूल भरे गमले दिख रहे हैं। हर दिन की चहल-पहल और जन समूह गायब है। दिल्ली पुलिस के पास राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के आदेश को अमल करने की जिम्मेवारी थी और उसने वही किया। अपनी-अपनी मांगों और शिकायतों को लेकर वहां बैठे लोग अपने-आप तो हटने वाले नहीं थे, इसलिए पुलिस ने अपने स्वभाव के अनुरुप जितना संभव था बल प्रयोग किया। सबसे ज्यादा समस्या पूर्व सैनिकों के साथ पैदा हुआ। वे वन रैंक वन पेंशन में अपनी बची हुई मांगों को लेकर वहां लंबे समय से धरने पर बैठे थे। पुलिस ने जिस तरह का बल प्रयोग किया उससे फिर यह साबित हो गया कि हमारी पुलिस को अभी भी संवेदनशील मामलों से निपटने के तौर-तरीके सीखने की जरुरत है। बिना बल प्रयोग किए भी मामले से निपटा जा सकता है। कोई व्यक्ति या व्यक्ति समूह इस भावना से जंतर-मंतर पर आया है कि उनके साथ जो अन्याय हुआ है उसे यहां से सरकार तक पहुंचाया जा सकता है और उसे वहां से हटने के लिए कहा जाए तो उस पर क्या गुजरेगी इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

वैसे तो जब 5 अक्टूबर को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने जंतर-मंतर से धरना-प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया उसी दिन यह तय हो गया था कि करीब ढाई दशकों से देश भर के आंदोलनकारियों या सरकारों के किसी निर्णय से असंतुष्ट या अन्याय के शिकार लोगों को अपनी आवाज उठाने का गवाह बना जंतर मंतर इन मामलों में इतिहास बन सकता है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में कुछ लोग मामला लेकर गए थे कि वहां होने वाली आवाज से प्रदूषण फैलता है तथा उनके शांति से रहने एवं सोने के अधिकार का हनन होता है। प्राधिकरण ने  इस याचिका पर फैसला देते हुए एक साथ दिल्ली सरकार, एनडीएमसी और दिल्ली पुलिस को आदेश दिया कि धरना-प्रदर्शन के लिए लगाए गए लाउड स्पीकर्स को फौरन जंतर-मंतर मार्ग से हटाए। साथ ही सभी तरह के धरना, प्रदर्शन, आंदोलन, सभा, जनसभा और रैली पर रोक लगाए। जंतर-मंतर रोड पर धरने पर बैठे सभी प्रदर्शनकारियों को तत्काल हटाकर रामलीला मैदान में शिफ्ट किया जाए। इसके अनुसार इस इलाके में लगातार प्रदर्शनों और इनमें इस्तेमाल हो रहे लाउड स्पीकर्स से ध्वनि प्रदूषण फैल रहा है। इस इलाके के लोगों को भी शांति से जीने का हक है। वो भी चाहते हैं कि उनका घर ऐसी जगह हो, जहां वातावरण प्रदूषण मुक्त हो।

इन्हें पांच सप्ताह का वक्त दिया गया था। इस बीच न किसी ने पुनर्विचार याचिका दायर की और न ही इस आदेश के विरुद्ध कोई न्यायालय गया। इसमें आदेश पालन होना ही था। किंतु इसने एक साथ कई प्रश्न हमारे सामने उपस्थित किए हैं। लोकतंत्र में अपनी मांगों को लेकर अहिंसक तरीके से कानून के दायरे में धरना-प्रदर्शन हमारा अधिकार है। अगर यह अधिकार है तो इसका पालन हो एवं इसकी रक्षा हो इसका दायित्व भी सरकारी एजेंसियों को है। यानी यह उनकी जिम्मेवारी है कि अपने इस अधिकार का प्रयोग लोग कर सकें इसके लिए उन्हें समुचित जगह और अवसर उपलब्ध कराए। दुनिया के हर लोकतांत्रिक देश में इसके लिए सरकारें व्यवस्था करती है। देश का केन्द्र दिल्ली है तो लोग अपनी मांगें और शिकायतें लेकर ज्यादा संख्या में यहां पहुंचेंगे। एक समय था जब दिल्ली के वोट क्लब पर ऐसे सारे आंदोलन होेते थे। वहां से केन्द्र सरकार के कार्यालय एवं संसद भवन दोनों पास थे। सत्ताधारी नेतागण और सरकारी अधिकारियों को यहां की गतिविधियां सीधे दिखाई पड़तीं थीं। उनकी आवाजें भी कई बार उनकी कानांे तक यूं ही पहुंच जाती थी। अचानक 1993 मंें उस स्थान को धरना-प्रदर्शन के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया। उसकी जगह जंतर-मंतर से लगे सड़क के फुटपाथ को इसके लिए अधिकृत किया गया।

उस निर्णय का भी काफी विरोध हुआ, लोगांें ने जबरन वहां धरने देने की कोशिश की और गिरफ्तारियां दीं लेकिन उनकी शक्ति इतनी नहीं थी कि उस निर्णय को बदलवाया जा सके। जंतर-मंतर के मामले में तो ऐसा भी नहीं हो रहा है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के आदेश को उद्धृत करते हुए दिल्ली सरकार या केन्द्र सरकार कह सकती है कि उसके पास कोई चारा ही नहीं है। किंतु इसके साथ यह भी सच है कि सरकारों ने जंतर-मंतर को धरनास्थल बनाए रखने के लिए प्राधिकरण में ठीक से कानूनी लड़ाई भी नहीं लड़ी। दिल्ली सरकार तो जंतर-मंतर के आंदोलन की पैदाइश है। उसका तो ज्यादा भावनात्मक लगाव उस जगह से होना चाहिए था। उसे न केवल प्राधिकरण में जोरदार ढंग से लोगों के आंदोलन करने के अधिकारों का पक्ष रखना चाहिए था, बल्कि फैसले के विरुद्ध उपरी अदालत में जाना चाहिए था। ऐसा उसने नहीं किया तो इसे क्या कहा जाए? वस्तुतः सत्ता का चरित्र ऐसा ही होता है। कोई पार्टी नहीं होगी जिसने कभी न कभी जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन नहीं किया होगा, किंतु किसी ने एक शब्द इस आदेश पर नहीं बोला तो इसका क्या कारण हो सकता है?

इसका कारण सत्ता के चरित्र में निहित है। हमने बड़े से बड़े क्रांतिकारी व्यक्ति को सत्ता में जाने के साथ सत्तावादी होते देखा है। सत्ता की मानसिकता सामान्यतः आंदोलनों, धरना-प्रदर्शनों को अपने शासन में बाधा मानने की होती है। चंूकि आप कानूनन सामान्यतः उसे प्रतिबंधित नहीं कर सकते, इसलिए आप कोई एक जगह उसके लिए आवंटित कर देेते हैं तथा एक मशीनरी बन जाती है। आपको पुलिस वाले संबंधित विभाग ले जाएंगे जहां आपका मांग पत्र ले लिया जाएगा। यह बड़ा अजीबोगरीब है कि ज्यादातर आंदोलन सरकारों के खिलाफ होता है और वही यह तय करती है कि आप कहां, कैसे और कितनी देर तक आंदोलन करें तथा कहां अपनी मांग पत्र दें। यही व्यवस्था है और इसी के साथ हमें आपको काम करना है। लेकिन इस व्यवस्था को भी स्थिर और सम्माजनक ढंग से संचालित करना मुश्किल हो रहा है। सत्ता के अलावा भी देश में एक ऐसा सुखी संपन्न वर्ग है जो आंदोलन की गतिविधियों को हेय दृष्टि से देखता है, उसके प्रति वितृष्णा रखता है। आखिर जो लोग याचिका लेकर हरित प्राधिकरण गए उनके साथ भी तो कभी अन्याय हुआ होगा या कई ऐसी मांगों के लिए जंतर-मंतर पर आंदोलन हुए होंगे जो उनकी जिन्दगी से जुड़ते होंगे। किंतु यही आंदोलन उनकी नजर में खलनायक बन गया।

तो तत्काल जंतर-मंतर के आंदोलन स्थल को इतिहास बना दिया गया है। लेकिन आंदोलन जहां होंगे, धरना-प्रदर्शन जहां होगा वहां लाउडस्पीकर होंगे और उससे निकलने वाली आवाज से ध्वनि प्रदूषण होगा। यह तो नहीं हो सकता कि ध्वनि प्रदूषण जंतर-मंतर पर होगा और रामलीला मैदान में नहीं होगा। वहां के लोगों को भी शांति के साथ जीने और नींद लेने का अधिकार है। कोई कल इसी तर्क के साथ उस जगह का विरोध करते हुए हरित प्राधिकरण चला जाएगा तो क्या होगा? साफ है कि इस फैसले के विरुद्ध सशक्त कानूनी संघर्ष की आवश्यकता है। हरित प्राधिकरण में भी फिर से अपील की जा सकती है। यदि वहां से राहत नहीं मिलती है तो फिर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। सच्चे लोकतंत्र में तो असंतोष अभिव्यक्त करने या अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए ऐसे महत्वपूर्ण जगह का आवंटन होना चाहिए जहां से सत्ता तक उनकी गूंज आसानी से पहुंच सके। इससे सत्ता को भी अपनी गलतियों को सुधारने तथा लोगांे के असंतोष कम करने का मौका मिलता है। दुर्भाग्य से इस दिशा में सरकारों की सोच जाती ही नहीं। इसे सम्पूर्ण व्यवस्था में विजातीय द्रव्य की तरह मान लिया गया और उसी अनुसार व्यवहार भी होता है। इस सोच में भी बदलाव की आवश्यकता है। अगर आप शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्श्रन के लिए उचित जगह और माहौल मुहैया नहीं कराएंगे तो फिर असंतुष्ट लोग हिंसा का वरण करेंगे, जैसा हमने हाल के वर्षों में भी देखा है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

क्या अल्पेश, जिग्नेश एवं हार्दिक के सहारे कांग्रेस भाजपा राज खत्म कर देगी

 

अवधेश कुमार

विधानसभा चुनाव से पहले गुजरात की राजनीति काफी रोचक हो रही है। सतह पर ऐसा लग रहा है जैसे कांग्रेस में नई जान आ गई हो। एक साथ ओबीसी एकता मंच के नेता अल्पेश ठाकोर के कांग्रेस में शामिल होने, दलितों के नेता माने जाने वाले जिग्नेश मेवानी तथा पाटीदार आंदोलन अनामत समिति के संयोजक हार्दिक पटेल द्वारा कांग्रेस को समर्थन देने एवं चुनाव में भाजपा को पराजित करने के लिए काम करने की घोषणा को गुजरात की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ के रुप मंें देखा जा रहा है। यह बात ठीक है कि हार्दिक पटेल ने कांगेस द्वारा चुनाव लड़ने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है, लेकिन वे भाजपा के विरुद्ध प्रचार कर रहे हैं और करेंगे। गुजरात में भाजपा के विरुद्ध प्रचार का मतलब है, कांग्रेस का समर्थन। एक सामान्य निष्कर्ष यह निकाला जा रहा है कि अगर पिछड़ों, दलितों तथा पाटिदारों यानी पटेलों का एक बड़ा वर्ग इनके प्रयासों से कांग्रेस के साथ आ गया तो फिर भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है। तीनों के साथ थोड़ा-बहुत जन समूह तो होगा ही। कांग्रेस उनको भी अपने साथ आने की आशा कर रही है। लेकिन क्या यह इतना ही आसान है जितना बताया या समझा जा रहा है?

इसमें दो राय नहीं कि इन तीनों युवा नेताओं का कांग्रेस के साथ खड़ा होना निराश कांग्रेस में उम्मीद लेकर आई है। कुछ महीने पहले तक जिस कांग्रेस को तलाक देने वालोें का जिले-जिले में तांता लग गया था उस कांग्रेस की ओर ऐसे लोगों के आने का संदेश यह निकलता है कि शायद जनता का झुकाव धीरे-धीरे उसकी ओर हो रहा है। आम आदमी पार्टी के अनेक नेता-कार्यकर्ता भी कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। चुनावों में पार्टियों के निश्चित मतदाताओं को छोड़ दे ंतो शेष के लिए ऐसे संदेशों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। इन तीनों युवाओं ने पिछड़ों, दलितों और पाटीदारों के एक वर्ग को प्रभावित किया भी है। गुजरात की आबादी में ओबीसी की 146 जातियों का हिस्सा 51 प्रतिशत के करीब है। यह बहुत बड़ी आबादी है। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 182 में से 110 सीटों तक इतना प्रभाव विस्तार है। 60 सीटों पर इनकी भूमिका निर्णायक है यह सही है। गुजरात में पाटीदार और दलित समुदाय की आबादी 25 प्रतिशत है। कांग्रेस मानती है कि आदिवासी समुदाय के बीच उसका जनाधार पहले से है। गुजरात आम तौर पर व्यापार बहुल राज्य माना जाता रहा है। गुजरात मंें छोटे यानी मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग व्यापारियों की संख्या काफी ज्यादा है। ये सब मोटे तौर पर लंबे समय से भाजपा को वोट करते आ रहे थे। पहले नोटबंदी और उसके परिणामों से पूरी तरह निकले बगैर जीएसटी लागू करने से उनके अंदर असंतोष है जो साफ दिख रहा है। कांग्रेस इसका भी लाभ उठाना चाहती है तथा वह नोटबंदी एवं जीएसटी को जमकर कोस रही है। राहुल गांधी अपने हर भाषण में इसका विस्तार से जिक्र करते हैं। इसी तरह पटेल समुदाय भी भाजपा का बड़ा वोट बैंक रहा है। अगर आरक्षण की मांग के प्रति उनके एक वर्ग मंें भी आक्रोश है तो फिर कांग्रेस इसका लाभ पाने की सोच सकती है। हार्दिक के माध्यम से कांग्रेस उसमें सेंध लगाने का हर संभव प्रयास कर भी रही है।

इस तरह ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने जातिगत समीकरणों से भाजपा को घेरने की पूरी बिसात बिछा दी है। किंतु इसका दूसरा पक्ष भी है। ऐसा नहीं है कि भाजपा को इस स्थिति का आभास नहीं था। वास्तव में इन तीनों का कांग्रेस की ओर झुकाव और भाजपा विरोधी तेवर लंबे समय से है। ये तीनों भाजपा सरकार के खिलाफ अभियान पहले से चला रहे हैं। हार्दिक के बारे में पूरा देश जानता है। अल्पेश ठाकोर ने भी पिछले साल जनवरी में सरकार के विरुद्ध गांधीनगर में एक बड़ी रैली की थी। अल्पेश ठाकोर की पृष्ठभूमि कांग्रेस की है। उनके पिताजी कांग्रेस में हैं। इसलिए राजनीति में उनका स्वाभाविक ठिकाना कांग्रेस ही होना था। भाजपा के अंदर इस बात की चर्चा पहले से थी कि ये चुनाव में उसके खिलाफ जाएंगे। इसलिए वह इनके खिलाफ रणनीति पर पहले से काम कर रही थी। आखिर जिस दिन गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी ने हार्दिक पटेल को चुनाव लड़ने का निमंत्रण दिया उसी दिन पाटीदार आरक्षण आंदोलन समिति यानी पास के प्रवक्ता वरुण पटेल तथा प्रमुख महिला नेता रेशमा पटेल अपने 40 समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। दोनों ने पत्रकारों से बातचीत में कांग्रेस पर चुनावी राजनीति के लिए पाटीदार आंदोलन का बेजा इस्तेमाल करने और पाटीदारों को वोट बैंक बनाने का प्रयास करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा की ओर से उठाए गए कदमों से उन्हें विश्वास हो गया है कि यह पाटीदार समाज की समस्याओं को ईमानदारी से दूर करने का प्रयास कर रही है। रेशमा ने हार्दिक को कांग्रेस का एजेंट तक करार दिया और कहा कि पाटीदार आंदोलन हार्दिक का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। दोनों ने पाटीदार समुदाय से कांग्रेस के बहकावे में नहीं आने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि पाटीदार आंदोलन भाजपा को सत्ता से उखाड़ने और कांग्रेस जैसी पूर्व में कुशासन देने वाली पार्टी की सरकार बनाने के लिए नहीं है।

भाजपा ने इसकी तैयारी उसी दिन से कर रखी थी जिस दिन हार्दिक ने राहुल गांधी के गुजरात आगमन का स्वागत किया। इसके बाद पूरे प्रदेश में हार्दिक पटेल के संगठन से लोगों को भाजपा में शामिल करने का अभियान आरंभ हो गया है। हार्दिक एक ओर भाजपा के खिलाफ प्रचार करेंगे तो ये लोग उनके खिलाफ। दूसरे, अल्पेश ठाकोर एवं जिग्नेश अभी इतने बड़े नेता नहीं हैं कि उनके कांग्रेस के समर्थन करने से पिछड़ी जातियों और दलितों का वोट भारी संख्या में आसानी से शिफ्ट हो जाएगा। तीसरे, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि चाहे अल्पेश ठाकोर हों या जिग्नेश मेवानी दोनों पाटीदार आरक्षण आंदोलन के विरुद्ध रहे हैं। अल्पेश का तो अभियान ही इसी पर टिका था कि पाटीदारों को आरक्षण देने से पिछड़ों और दलितों का हक मारा जाएगा। इसके लिए ही उन्होंने अनेक रैलियां कीं। कांग्रेस के लिए इस अंतर्विरोध को साधना आसान नहीं होगा। क्या जो व्यक्ति पटेलों के आरक्षण का विरोधी है वह कांग्रेस में है और पटेल कांग्रेस को ही वोट देंगे? चौथे, पिछले विधानसभा चुनाव में पटेलों के बड़े नेता केशूभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा था। उन्होंने 163 उम्मीदवार खड़े किए थे जिसमें केवल 3 जीते एवं उन्हें वोट आया केवल 3.63 प्रतिशत। कांग्रेस केशूभाई पटेल के विद्रोह का भी लाभ नहीं उठा सकी। एक सर्वेक्षण कहता है कि 80 प्रतिशत पटेल मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया। इस समय भाजपा में पटेलों के 44 विधायक हैं।

कह सकते हैं कि तब धूरी में नरेन्द्र मोदी थे जिनका संगठन कौशल, प्रचार रणनीति और कार्यकर्ताओं तथा सभी वर्ग के प्रमुख लोगों से निजी संपर्क था। मोदी ने गुजरात अस्मिता का स्वयं को प्रतीक बना दिया था। अब मोदी मुख्यमंत्री नहीं है। इसका असर हो सकता है। लेकिन मोदी परिदृश्य से गायब तो हुए नहीं हैं। उन्होंने लगातार गुजरात की यात्राएं की हैं। एक वर्ष मेें 15 एवं 35 दिनों में चार। गुजरात महागौरव कार्यकर्ता सम्मेलन में उन्होंने यह कहकर कि कांग्रेस ने उनको जेल भेजने की पूरी कोशिश की स्वयं के प्रति सहानुभूति कायम करने की कोशिश की है। साथ ही सरदार पटेल एवं उनकी पुत्री के साथ कांग्रेस ने कैसा व्यवहार किया यह कहकर पटेलों को कांग्रेस के विरुद्ध उभारने की रणनीति अपनाई है। ऐसा वे आगे भी करेंगे। क्या कांग्रेस इनकी काट तलाश सकती है?  जीएसटी में आवश्यक संशोधन कर व्यापारियों के असंतोष को कम करने का कदम उठाया है और स्वयं प्रधानमंत्री ने कहा है कि अभी भी जो कठिनाई है उसे कम किया जाएगा। सरकार आगे और कदम उठा सकती है। ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि इन तीनों नेताओं के कांग्रेस के साथ आने तथा व्यापारियो में असंतोष से भाजपा का 22 सालों का शासन खत्म हो जाएगा एवं कांग्रेस की वापसी होगी।  

अवधेश कुमार, ई.ः30 गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

गौ दर्शन सबसे सर्वोत्तम : परमहंस दाती जी महाराज

संवाददाता

नई दिल्‍ली। श्री शनिधाम दिल्ली में आज गोपाष्ठ्मी का पर्व श्री श्री १००८ महामंडलेश्वर परमहंस दाती जी महाराज के सानिध्य में बड़े धूमधाम से मनाया गया गोपाष्ठ्मी के अवसर पर श्री शनिधाम में आज गौ माता को तिलक चन्दन अक्सत पंचौप्चार मंत्रोच्चार से पूजा-अर्चना की गई लापसी का भोग भी लगवाया गया और माँ को चुनरी भी अर्पण की गई इस अवसर पर परमहंस दाती जी महाराज ने कहा की गाय माता की महिमा को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। मनुष्य अगर गौमाता को महत्व देना सीख ले तो गौ माता उनके दुख दूर कर देती है। गाय हमारे जीवन से जु़ड़ी है। उसके दूध से लेकर मूत्र तक का उपयोग किया जा रहा है। गौमूत्र से बनने वाली दवाएँ बीमारियों को दूर करने के लिए रामबाण मानी जाती है। रोज सुबह गौ दर्शन हो जाए तो समझ लें कि दिन सुधर गया, क्योंकि गौ-दर्शन के बाद और किसी के दर्शन की आवश्यकता नहीं रह जाती। लोग अपने लिए आलीशान इमारतें बना रहे हैं यदि इतना धन कमाने वाले अपनी कमाई का एक हिस्सा भी गौ सेवा और उसकी रक्षा के लिए खर्च करें तो गौमाता उनकी रक्षा करेगी। इसलिए गौ दर्शन सबसे सर्वोत्तम माना जाता है। गाय और ब्राह्मण कभी साथ नहीं छोड़ते हैं लेकिन आज के लोगों ने दोनों का ही साथ छोड़ दिया है। जब पांडव वन जा रहे थे तो उन्होंने भी गाय और ब्राह्मण का साथ माँगा था। समय के बदलते दौर में राम, कृष्ण और परशुराम आते रहे और उन्होंने भी गायों और संतों के उद्धार का काम किया। इसकी बड़ी महिमा सूरदास और तुलसीदास ने गौ कथा का वर्णन किया है। इस पावन अवसर पर गजेन्द्र चोहान (युधिष्ठिर) ने भी सभा को संबोधित करते हुए कहा की महाराज जी का लगाव गौ माता के प्रति बहुत हे महाराज श्री ने भी हजारो गायो को रख रखा हे आज मेरा भी ये सोभाग्य हे की इस पुनीत कार्य में समिलित हुआ महाराज जी का आभार इस अवसर पर श्री शनिधाम ट्रस्ट और तमाम पदाधिकारियों के अलावा बड़ी संख्या में समाजसेवक और श्रीमहन्त श्रद्धापुरी जी महाराज, दीदी शिवानी, अशोक भोलेचा,भूपेश कुमार सिंह, अर्जुन पंडित जी, उमेश बसोया, लक्ष्मीसिंह, श्रीकृष्ण, अशोक सिंह, सुबोध मेहरा, शक्ति, रमेश राजपूत, सहित गणमान्य लोग मौजूद रहे।



शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

ऐसे बयानों से बचें नेता

 

अवधेश कुमार

ताजमहल और मुगलकाल इस समय भारी हंगामे एवं विवाद का विषय बना हुआ है। वास्तव में उत्तर प्रदेश के सरधाना से भाजपा विधायक संगीत सोम ने ताजमहल और मुगलों के बारे में जो बयान दिया उस पर विवाद और हंगामा स्वाभाविक था। उनके बयान से ध्वनि यह निकल रही थी कि मुगल काल को न सिर्फ इतिहास से बाहर किया जाएगा बल्कि उस काल में निर्मित होने की मान्यता वाले स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने ताजमहल जैसे स्थलों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाएगा। बयान देते समय भी उन्हें इस बात का आभास रहा होगा कि इससे विवाद पैदा होगा। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने जानबूझकर यह बयान दिया। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि संगीत सोम लंबे समय से सुर्खियों से गायब थे। उत्तर प्रदेश सरकार में उन्हें मंत्री भी नहीं बनाया गया। ऐसे में यदि खबरों में बने रहना है तो फिर ऐसे लोगों के पास रास्ता एक ही बचता है, किसी तरह विवादित बयान दो। उन्होंने यही किया है। इसे आप उनकी सोच का प्रकटीकरण भी कह सकते हैं। वैसे इस तरह की सोच रखने वाले संगीत सोम अकेले व्यक्ति नहीं हो सकते। आखिर जब वे भाषण दे रहे थे जो लोग तालियां बजा रहे थे। जाहिर है, इस तरह का विचार रखने वालों की संख्या है।

किंतु किसी विचार को संख्याबल के आधार पर उचित और अनुचित करार नहीं दिया जा सकता है। मूल बात है कि ऐसे बयानों का असर क्या होता है। हम भी मानते हैं कि मंुुगल बाहर से आए थे, लेकिन शासन करते हुए वे यहीं बस गए। अब यह कहना कि पूरे मुगल काल को हम इतिहास से निकाल देंगे नासमझी के सिवा कुछ नहीं है। ऐसा संभव ही नहीं है। जब हम ब्रिटिश काल को इतिहास के पन्नों से नहीं हटा सकते तो फिर मुगल काल को कैसे हटा सकते हैं। मुगल काल में अलग-अलग बादशाहों के कार्यकाल को लेकर दो मत तो रहेंगे और हैं भी। इतिहास की किताबों में ही आपको हर बादशाह को लेकर कई मत मिलते हैं और उनके आधार पर हम अपना निष्कर्ष निकालते हैं। यही इतिहास पढ़ने और समझने का तरीका है। लेकिन 1526 से 1857 तक के कालखंड तक मुगल किसी न किसी तरह बने रहे। इतने लंबे कालखंड को आप इतिहास से कैसे बाहर कर सकते हैं? तो मुगल काल हो या उसके पहले का सल्तनत काल कोई इतिहास के पन्नों से उसे बाहर नहीं निकाल सकता और निकाला जाना भी नहीं चाहिए। उस कार्यकाल को लेकर मतांतर होंगे और होना भी चाहिए। इसमें किसी प्रकार का संदेह करने की आवश्यकता नहीं है।

हम मानते हैं कि इतिहास लेखन ही हमारे देश में विवाद और बहस का विषय रहा है। आधुनिक इतिहास की एक धारा अंग्रेजों के समय थी जिनने अपने तरीके से इतिहास लिखे। उसका आजादी के संघर्ष के दौरान भी विरोध होता था और आज भी होता है। किंतु उन्होंने अपनी दृष्टि और तरीके से हमारे देश के इतिहास पर काफी काम किया इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह बात अलग है कि उनमें से ज्यादातर के पीछे औपनिवेशिक नजरिया था।  उसे हम हूबहू स्वीकार नहीं कर सकते। उसकी प्रतिक्रिया में भारतीयों की दो धाराओं ने इतिहास रचना की। एक धारा वामपंथियों की थीं। इनने भी इतिहास को निष्पक्ष नजरिए से देखने की जगह मार्क्सवादी नजरिया अपनाया। इनने शोध भी खूब किए, मेहनत भी किए, ऐसे अनेक तथ्य हमारे सामने लाए जो कि उनके बगैर शायद सामने नहीं आता। इस तरह उनका इतिहास लेखन में योगदान तो है लेकिन वह भी पूरी तरह से सच्चाई के निकट न होकर विचारधारा के निकट है। एक धारा राष्ट्रवादियों की रही है जिन्होंने इन दोनों से परे भारतीय राष्ट्रवाद को ध्यान में रखकर इतिहास लिखे। कुछ लोग इन्हें स्वीकार करते हैं, लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इसमेे राष्ट्रवाद की छौंक कुछ ज्यादा है इसलिए यह एकदम शुद्ध इतिहास नहीं हो सकता। इन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इतिहास पुनर्लेखन समिति जैसे संगठन की रचना कर इतिहास को नए सिरे से लिखवाने का काम कर रहा है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस पर भी विवाद है और रहेगा।

किसी भी पढ़े-लिखे समाज में विवाद और बहस स्वाभाविक है। विषयों पर मतभेद भी स्वाभाविक है। यह होना ही चाहिए। हम यह भी मानते हैं कि जिस तरह से दूसरों को अपना विचार रखने का अधिकार है उसी तरह संगीत सोम को भी है। किंतु किसी स्थिति में ऐसा बयान नहीं दिया जाना चाहिए जिससे सांप्रदायिक विद्वेष की भावना पैदा हो। संगीत सोम ने जिस तरह से कहा उससे ऐसा ही होता है। इसीलिए ऐसे बयान अस्वीकार्य है। खासकर ऐसे नेता को तो एक-एक शब्द सोच-समझकर इस्तेमाल करना चाहिए जिसकी केन्द्र और प्रदेश दोनों जगह सरकारें हों। सरकारी पार्टी की ओर से संयमित बयान की ही अपेक्ष की जाती है। आपको देश और प्रदेश चलाना है तो फिर संतुलन आपको बनाना ही पड़ेगा। बेशक, ताजमहल को लेकर अनेक इतिहासकारों ने अलग-अलग मत प्रकट किया है। यह भी रहेगा। लेकिन वह स्थापत्य का ऐसा नमूना है जिसे दुनिया के आश्चर्यों में शामिल किया गया है। कोई उसे ध्वस्त करने का विचार करे तो उसे मानसिक रुप से असंतुलित ही कहना होगा। वैसे ऐसा शायद ही किसी देश में हुआ हो जहां आजादी के साथ गुलामी काल में बनाए गए सारे इमारतों को ध्वस्त कर दिया जाए। यह न उचित है न व्यावहारिक ही। दुनिया में ऐसे बहुत कम देश हैं जिनको किसी न किसी समय गुलामी न झेलनी पड़ी हो। विश्व के इतिहास का एक पूरा कालखंड ही औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी काल के नाम से जाना जाता है। अगर ऐसे सारे देश अपनी गुलामी के समय के अवशेषों को खत्म करने लगें तो फिर दुनिया का चरित्र बदल जाएगा। हमारे देश की जो संसद है वही ब्रिटिशों द्वारा निर्मित है। तो क्या उसे कलंक मानकर नष्ट कर दें? हम तो उसी में आजादी के बाद से अपने देश का की नियति संवार रहे हैं।

वैसे संगीत सोम भाजपा में ऐसे स्तर के नेता नहीं हैं जो निर्णय कर सकें। यह अच्छा हुआ कि पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा उसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बयान को नकार दिया। इस बयान से कायम संदेहों को दूर करने के लिए आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार 26 अक्टूबर को आगरा जा रहे हैं जहां वे ताजमहल सहित कई पर्यटक स्थलों का दौरा करेंगे तथा कुछ घोषणाएं भी करेंगे। यह अच्छा कदम है। इससे ताजमहल को लेकर पहले से भी जो संशय कायम है वह दूर हो जाना चाहिए। उन्होेंने यह साफ किया है कि कौन क्या कहता है यह मायने नहीं रखता, जरुरी यह है कि भारतीयों के खून पसीने से बने हर स्मारक का संरक्षण किया जाए और पर्यटन की दृष्टि से भी इनका संरक्षण किया जाना जरुरी है। यह देश को दिया हुआ बचन है। इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी द्वारा यह साफ कर दिया गया है कि हमें ऐतिहासिक विरासत पर गर्व करने की आवश्यकता है। हमारा मानना है कि योगी एवं मोदी के स्पष्टीकरण के बाद ताजमहल या मुस्लिम शासनकाल में बने अन्य इमारतों के भविष्य को लेकर कायम आशंकाएं समाप्त हो जानी चाहिए। इस पर विवाद का भी अंत हो जाए तो देश के लिए अच्छा हो। आखिर प्रधानमंत्री के बाद किसको इस बारे में स्पष्टीकरण देने या कुछ बोलने की आवश्यकता रह जाती है? किंतु हमारे देश की राजनीति है कि भले संगीत सोम के बयानों से भाजपा एवं सरकार ने अपने को अलग कर लिया, उनके संरक्षण का वायदा भी किया गया, लेकिन विवाद आसानी से नहीं थमता। इसीलिए आजम खान और असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं का मुंह बंद हो जाएगा ऐसा नहीं मानना चाहिए। किंतु हमें आपको ऐसे बयानों को महत्व देने की आवश्यकता नहीं है जिससे अनावश्यक सांप्रदायिक विद्वेष की भावना पैदा होती हो।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः0112483408, 9811027208

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

भाजपा बनाम राहुल गांधी

 

अवधेश कुमार

इन दिनों राजनीति के क्षितिज पर सतही नजर भी दौड़ा लीजिए तो आपको धीरे-धीरे राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी की एक तस्वीर निर्मित होती दिख रही है। यह अपने आप नहीं हुई। कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति में राहुल गांधी द्वारा मोदी पर हमले को प्राथमिकता दिया है। राहुल गांधी लगातार गुजरात से लेकर हिमाचल प्रदेश और इसके अलावा जहां जा रहे हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही कठघरे में खड़ा करते हैं। यहां तक कि एक वेबसाइट द्वारा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पुत्र जय शाह के व्यवसाय और धन से संबंधी खबर के मामले में भी वे मोदी को ही निशाने पर ले रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि भाजपा पर यदि हमला करना है, जनता की नजर में उसकी छवि गिरानी है तो नरेन्द्र मोदी की छवि को ही कमजोर करना होगा। इस समय भाजपा और नरेन्द्र मोदी एक दूसरे के पर्याय हैं। भाजपा को जो भी जनसमर्थन मिल रहा है उसका मूल नरेन्द्र मोदी में ही निहित है। तो राहुल गांधी और कांग्रेस की इस रणनीति को एकबारगी गलत नहीं कहा जा सकता है। यह बात अलग है कि इस रणनीति से कांग्रेस को तत्काल या निकट भविष्य में कोई चुनावी फायदा होगा ऐसा मानना जरा कठिन है। वस्तुतः भारत की राजनीति इतनी जटिल है और इसमंे 2014 में राष्ट्रीय परिदृश्य पर नरेन्द्र मोदी के आविर्भाव के बाद से इस तरह का परिवर्तन आ गया है कि बड़े-बड़े विश्लेषकों के लिए चुनाव पूर्व वास्तविक आकलन कठिन हो रहा है। जिस तरह 2014 में किसी ने नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा की इतनी बड़ी विजय की कल्पना नहीं की थी उसी तरह 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी।

इसलिए जो लोग राहुल गांधी के नरेन्द्र मोदी पर हमला करने तथा लगातार प्रचार से उत्साहित हैं उनको अपने उत्साह पर थोड़ा संयम बरतने की आवश्यकता है। भाजपा का मनोविज्ञान इस समय कुछ अलग है। भाजपा के आम नेता भी यह मानते हैं कि राहुल गांधी उनके लिए कभी चुनौती नहीं हो सकते। वो कहते भी हैं कि राहुल गांधी को उनकी पार्टी कभी गंभीरता से नहीं लेती। यह बात अलग है कि भाजपा के नेता सबसे ज्यादा हमला भी राहुल गांधी पर ही करते हैं। कांग्रेसी कहते है कि भाजपा नेताआंे का राहुल गांधी पर हमला करना बताता है कि वे उन्हें गंभीरता से लेते हैं। आखिर नरेन्द्र मोदी तक भी यदा-कदा बिना नाम लिए उनके बारे में व्यंग्यात्मक टिप्पणियां करते ही हैं। अमित शाह के भाषणों में राहुल गांधी हमेशा छाए रहते हैं। यह बात अलग है कि वे उनके लिए शहजादे और राहुल बाबा जैसे शब्द प्रयोग करते हैं। इसके द्वारा जनता को यह संदेश देने की कोशिश होती है कि राहुल गांधी अभी तक इतने वयस्क और परिपक्व नहीं हुए हैं कि उनके कंधों पर देश की जनता कोई महत्वपूर्ण जिम्मेवारी दे। यह सवाल हम सबके मन में स्वाभाविक रुप से उठता है कि जब आप राहुल गांधी को गंभीरता से लेते ही नहीं, उन्हें परिपक्व भी नहीं मानते हैं, इस बात को लेकर आप निश्चिंत हैं कि जब तक राष्ट्रीय फलक पर राहुल गांधी हैं भाजपा के लिए मैदान साफ है तो फिर उन पर हमला या उनकी इतनी चर्चा क्यों?

हमने राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी में एक साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी को मंच पर राहुल गांधी एवं उनके पूरे खानदान पर आक्रामक होते हुए देखा है। स्मृति ईरानी तो पराजित होने के बावजूद अमेठी जाती रहतीं हैं। उसमें उनका एक ही एजेंडा होता है, राहुल गांधी को एक विफल सांसद साबित करना। यही काम इन तीनों नेताओं ने एक साथ किया। राहुल गांधी गुजरात में भाजपा पर हमला कर रहे थे, 23 वर्ष की भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे थे, नरेन्द्र मोदी को सपना बेचने वाला साबित कर रहे थे तो उनके खिलाफ एक साथ तीन नेता उनके संसदीय क्षेत्र में हुंकार भर रहे थे। यह अकारण तो नहीं हो सकता। यदि आप किसी को गंभीरता से नहीं लेते हैं तो उसकी बातों का जवाब नहीं देते। यदि आप किसी को वजनदार नहीं मानते तो उस पर इतना तगड़ा हमला नहीं करते। यहां स्थिति उलट है। भाजपा गंभीरता से न लेने तथा राहुल गांधी को अवयस्क साबित करते हुए भी उनको निशाना बना रही है। तो इसके कुछ कारण अवश्य होने चाहिए। राजनीति में जो कुछ दिखता है उसके पीछे के कारकों की जरा ठीक प्रकार से तलाश करनी पड़ती है।

वस्तुतः इसके पीछे भाजपा की अपनी सोची-समझी रणनीति है। राहुल गांधी यदि नरेन्द्र मोदी पर हमला करते हैं तो वह इसे अपने लिए अनुकूल मान रही है। उसकी कोशिश है कि राहुल पर प्रतिहमला करो ताकि वह मोदी पर और हमला करें और इस समय से लेकर सारे विधानसभा चुनावों एवं फिर 2019 के लोकसभा चुनाव तक पूरी राजनीति नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी का बना रहे। इसमें भाजपा को लाभ नजर आता है। उसे साफ लगता है कि लोग यदि मोदी एवं राहुल में तुलना करेंगे तो मोदी का पलड़ा अपने-आप भारी हो जाएगा। लोगों को मोदी एवं राहुल मंे से चुनने का विकल्प होगा तो ज्यादातर मोदी का ही चयन करेंगे। इस वातावरण को बनाए रखने के लिए जरुरी है कि राहुल गांधी को पूरी तरह चर्चा में बनाए रखा जाए। इसलिए आने वाले समय में भी भाजपा राहुल गांधी और उनके खानदान को निशाना बनाती रहेगी। यह उसकी वर्तमान एवं भविष्य की राजनीतिक रणनीति का इस समय सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

उसकी दूसरी रणनीति है, राहुल की उनके घर यानी संसदीय क्षेत्र में ऐसी घेरेबंदी करना कि वो किसी तरह अगला लोकसभा चुनाव हार जाएं। राहुल गांधी किसी समय कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं। कांग्रेस के नेताओं-कार्यकर्ताओं के लिए भविष्य की उम्मीद अभी भी वहीं हैं। यदि उनको ही पराजित कर दिया गया तो फिर वर्तमान कांग्रेस को खत्म करने का जो राजनीतिक लक्ष्य नरेन्द्र मोदी ने घोषित किया है उसे पाना आसान हो जाएगा। कल्पना करिए यदि राहुल गांधी अमेठी से हार जाते हैं तो फिर कांग्रेस में कैसा हाहाकार मचेगा। सोनिया गांधी का स्वास्थ्य अब बड़ी और सतत सक्रिय भूमिका की इजाजत नहीं दे रहा। प्रियंका बाड्रा का राजनीति में आना अभी अनिश्चित है। उसमें सारा दारोमदार राहुल गांधी पर ही है। जाहिर है, उनकी पराजय का कांग्रेस के लिए संघातक परिणाम होगा। बड़े नेता भले इसे चुनाव में सामान्य जीत-हार का मामला बताएंगे, पर आम नेता एवं कार्यकर्ताओं में और हताशा पैदा होगी तथा कांग्रेस का जगह-जगह विखंडन हो सकता है। तो यही सोच है जिसके तहत भाजपा अमेठी को केन्द्र मे रखकर राजनीति कर रही है। अपनी रणनीति की सफलता के लिए अमेठी की घेरेबंदी में जितनी शक्ति, संसाधन की आवश्यकता है भाजपा लगाएगी। वहां के लिए जैसी रणनीति की जरुरत होगी भाजपा उसे भी अपनाएगी। बस, अमेठी का किला ध्वस्त हो जाए। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा के उम्मीदवार के न रहने के बावजूद केवल एक लाख सात हजार मतों से उनकी विजय को भाजपा अपनी भावी विजय की उम्मीद के तौर पर देख रही है। विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस अमेठी की सभी विधानसभा सीट हार गई।

जाहिर है, कांग्रेस के रणनीतिकारों को भाजपा की इस सोच एवं रणनीति को समझना होगा। यदि उनको भाजपा से मुकाबला करना है तथा अमेठी का गढ़ बचाना है तो वर्तमान रवैये से यह संभव नहीं है। कांग्रेस के नेताओं को विचार-विमर्श की थोड़ी लंबी कवायद करनी होगी। अगर वे नहीं करते तथा वर्तमान रणनीति पर चलते रहे तो फिर भाजपा की रणनीति को सफल बनाने की भूमिका निभाएंगे। अभी तक कांग्रेस इसे समझने के लिए तैयार नहीं है। वह मानकर चल रही है कि गुजरात की सरकार आलोकप्रिय हो रही है जिसका लाभ उसे मिल सकता है। वह यह भी मान रही है कि आने वाले समय में नरेन्द्र मोदी सरकार भी अलोकप्रिय होगी और उसे इसका लाभ मिल जाएगा। यह तत्काल संभव नहीं दिखता।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

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