शनिवार, 13 मई 2017

आदर्श राजनीति के सपनों की मृत्यु गाथा

 

अवधेश कुमार

दिल्ली सरकार के पूर्व जलमंत्री कपिल मिश्रा ने मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर अपने एक मंत्री सत्येन्द्र जैन से दो करोड़ रुपए लेने का जो आरोप लगाया है उससे तूफान मच गया है। लोगों के लिए सहसा यह विश्वास करना कठिन है कि जो अरविन्द केजरीवाल कल तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाते थे, दूसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते थे आज वे खुद अपने ही साथी के आरोप से कठघरे में खड़े हो गए हैं। हालांकि इस मामले पर केजरीवाल के दाहिने हाथ और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया कह रहे हैं कि जिस तरह से उन्होंने बेबुनियाद आरोप लगाए, वो तो जवाब देने के लायक भी नहीं हैं। कपिल मिश्रा कुमार विश्वास के करीबी माने जाते थे लेकिन उन्होंने भी यह बयान दिया कि केजरीवाल कभी घूस लेंगे यह मैं सोच भी नहीं सकता। अरविन्द केजरीवाल के धूर विरोधी योगेन्द्र यादव ने भी कहा कि ऐसे आरोपों के लिए प्रमाण चाहिए। इस तरह देखा जाए तो अरविन्द केजरीवाल के साथ इस मामले पर काफी लोग हैं। यह भी कहा जा सकता है कि कपिल मिश्रा को चूंकि मंत्री पद से हटा दिया गया इसलिए खीझ में वे ऐसा आरोप लगा रहे हैं। किंतु खीझ मंे दूसरा आरोप भी तो लगा सकते थे। सत्येन्द्र जैन से ही धन लेने का आरोप क्यों लगाया? उन्होंने यह कहा कि जब मैंने केजरीवाल से पूछा कि आप पैसा क्यों ले रहे हैं तो उन्होंने कहा कि राजनीति में बहुत बात उसी समय नहीं बताई जाती बाद में बताई जाती है। कपिल मिश्रा केवल आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि बाजाब्ता वे पहले उप राज्यपाल अनिल बैजल से मिले और उन्हें सब बातों से अवगत कराया, उन्होंने एंटी करप्शन ब्यूरो यानी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को जाकर तथ्य दिए, वे सीबीआई तक भी गए और अनशन पर बैठ गए।

इस सीमा तक जो व्यक्ति तैयार हो वह केवल हवा में बात करने वाला नहीं कहा जा सकता है। उसे पता है कि अगर उसने झूठी गवाही दी तो उसके खिलाफ मामला बन सकता है। अपने को सच साबित करने के लिए ही लगता है कपिल पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर अपनी पत्नी के साथ गए। निस्संदेह, मामला न्यायालय में जाने पर अनेक सवाल उठेंगे और कपिल को उन सबका उत्तर देना होगा। यह सवाल तो उठेगा ही कि केजरीवाल ने धन लेने के लिए वही समय क्यों चुना जब कपिल मिश्रा उनके पास हों या आने वाले हों? उनको धन लेना ही था तो वे कोई दूसरा समय इसके लिए चुन सकते थे। सवाल वाजिब है और इसका जवाब देना आसान नहीं है। किंतु कपिल का कहना है कि अरविन्द केजरीवाल को विश्वास था कि यह तो हमें भगवान की तरह मानता है, इसलिए संदेह नहीं करेगा। कुछ समय के लिए कपिल मिश्रा के आरोप को यही छोड़ दें। एक प्रश्न अपने आपसे करिए कि क्या हमको आपको यह विश्वास है कि अरविन्द केजरीवाल जिस ईमानदारी, सच्चाई, सदाचार और आदर्श की राजनीति का वायदा कर सत्ता मंे आए थे वाकई उनकी सरकार उस पर खरी उतर रही है? अगर आप निष्पक्षता से इसका उत्तर तलाशेंगे तो कम से कम आप हां तो नहीं कह सकते। ध्यान रखिए सत्येन्द्र जैन पर हवाला से लेकर भूमि सौदे एवं अपनी बेटी को गलत तरीके से नियुक्त करने का मामला चल रहा है और पहले एंटी करप्शन ब्यूरो था, अब सीबीआई उनसे जुड़े स्थलों पर छापा मार चुकी है। हम नहीं कहते कि किसी के घर छापा पड़ने या उस पर मुकदमा हो जाने मात्र से ही वह दोषी हो जाता है, लेकिन आप आम आदमी पार्टी के ही कुछ नेताओं और विधायकों से सत्येन्द्र जैन के बारे में अकेले में बात करिए वह स्वयं वो सारी बातें बोल देगा जिसका आरोप उन पर लग रहा है।

कपिल मिश्रा ने यह कहा है कि सत्येन्द्र जैन ने कहा कि उन्होने केजरीवाल के रिश्तेदार के जमीन का सौदा कराया है। अगर यह सच है तो इसका मतलब इतना तो है कि मंत्री बनने के बावजूद सत्येन्द्र जैन प्रोपर्टी दलाली का काम कर रहे थे। इसको भी कुछ समय के लिए यहीं रहने दीजिए। अरविन्द केजरीवाल सरकार के पांच मंत्रियों की दो साल में ही छुट्टी हो चुकी है। आखिर क्यों? केवल कपिल मिश्रा के बारे में कहा गया है कि वो जल विभाग को ठीक से संभाल नहीं पा रहे थे और विधायकों की इस बारे में शिकायतें थीं, लेकिन इसके अलावा जो मत्री हटाए गए उनमें से किसी को उनके प्रदर्शन के आधार पर नहीं हटाया गया। कोई फर्जी डिग्री मामले में फंसा और जेल गया,  कोई सेक्स सीडी कांड में फंसा, कोई घूस मांगने के आरोप में फंसा। तो ऐसा मंत्रिमंडल केजरीवाल ने बनाया था। ध्यान रखिए, मंत्री बनाते समय केजरीवाल को 67 में से उन्हीं लोगों को चुनना चाहिए था जिनकी विश्वसनीयता और योग्यता उनकी नजर में असंदिग्ध रही होगी। क्या केजरीवाल ने कोई दूसरी कसौटी बनाई थी? ऐसा तो होना नहीं चाहिए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करके सत्ता तक पहुंचने वाला व्यक्ति कम से कम ऐसे लोगों को मंत्री तो नहीं बनाएगा जिसकी ईमानदारी और सच्चाई पर उसको विश्वास नहीं होगा। जाहिर है, अरविन्द केजरीवाल से या तो भूलें हुईं या वो सत्ता में आने के साथ इस मामले में भी राजनीति में व्यावहारिकता अपनानी पड़ती है के सिद्धांत का वरण करने लगे। कपिल मिश्रा को कुछ भी कह दीजिए, लेकिन आज वह यह दावा करने की स्थिति में है कि केजरीवाल के मंत्रिमंडल में एकमात्र वहीं मंत्री रहे जिन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा या जिन पर कोई मामला किसी तरह का नहीं चल रहा है। शेष सारे पूर्व एवं वर्तमान मंत्रियों पर कोई न कोई आरोप है और उन पर मामले चल रहे हैं। बिना आग के कहीं धुंआ नहीं उठता है।

अरविन्द और उनके सहयोगी अनके मामलों के लिए केन्द्र सरकार एवं विरोधियों को दोषी ठहराते हैं कि उनके खिलाफ जानबूझकर ऐसा किया जा रहा है। लेकिन शुंगलू समिति की रिपोर्ट पर क्या कहंेंगे?  इस समिति ने साफ कहा है कि केजरीवाल सरकार द्वारा प्रशासनिक फैसलों में संविधान और प्रक्रिया संबंधी नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया गया। भ्रष्ट व्यवहार की बात शुंगलू समिति ने अपनी रिपोर्ट में उजागर की है। शुंगलू समिति ने सरकार के कुल 440 फैसलों से जुड़ी फाइलों को खंगालकर यह निष्कर्ष निकाला। पूर्व उप राज्यपाल नजीब जंग द्वारा गठित इस समिति में पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक वीके शुंगलू के अलावा पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी और पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रदीप कुमार शामिल थे। इन तीनों व्यक्तियों से आप राजनीतिक पूर्वाग्रह की उम्मीद तो नहीं कर सकते। यहां इस रिपोर्ट का विस्तार से वर्णन नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसने केजरीवाल सरकार के काम करने में बरती गई अनियमितताओं का जैसा तथ्यवार विवरण सामने रखा है उससे दिल दहल जाता है। रिपोर्ट में केजरीवाल सरकार द्वारा शासकीय अधिकारों के दुरुपयोग के मामलों में अधिकारियों के तबादले, तैनाती और अपने करीबियों की पदों पर नियुक्ति करने में कानूनों और प्रक्रियाआंे के पालन न करने का साफ जिक्र किया है। आम आदमी पार्टी के कार्यालय को लेकर केजरीवाल एवं उनके साथियों ने बहुत शोर मचाया कि उनसे उनका कार्यालय तक छीना जा रहा है। जरा शुंगलू रिपोर्ट को देखिए। इसमें कहा गया है कि केजरीवाल सरकार ने आम आदमी पार्टी को दफ्तर देने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई वही अवैध है। शुंगलू समिति के अनुसार दिल्ली सरकार ने इसके लिए पार्टियों को दफ्तर के लिए जमीन देने की बाकायदा नई नीति बनाई जिसमें ये भी कहा गया कि जमीन पाने योग्य पार्टियों को 5 साल तक कोई इमारत या बंगला दिया जा सकता है क्योंकि इतने समय में वह अपनी आवंटित ज़मीन पर दफ़्तर बना सकते हैं। इसके अनुसार यह साफ है कि राजनीतिक पार्टी को जमीन देने का फैसला इसलिए लिया गया ताकि आम आदमी पार्टी को सरकारी आवास मिल सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि 25 जनवरी 2016 को आम आदमी पार्टी को यह घर मिल गया वह भी फुली फर्निस्ड जैसे किसी मंत्री को मिलता है। कैबिनेट फैसले में फर्निस्ट एकमोडेशन का जिक्र नहीं है तथा फाइल में किराए का भी कोई उल्लेख नहीं है। ऐसी तमाम बातें हैं जिनसे केजरीवाल का सदाचार, ईमानदार और आदर्श राजनीति की धज्जियां उड़ जाती हैं।

एक ऐसा व्यक्ति जिसने देश के एक बड़े वर्ग को नई राजनीति का सपना दिखाया, जिसने दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश बनाकर एक मॉडल के रुप में पेश करने का वायदा उसकी सरकार का ऐसा हस्र भारतीय राजनीति के लिए कोई सामान्य त्रासदी नहीं है। हालांकि अरविन्द केजरीवाल पर अण्णा अनशन अभियान के समय से नजर रखने वालों के लिए इसमें आश्चर्य का कोई तत्व नहीं है। आज आप नजर उठाकर देख लीजिए अण्णा अभियान के समय जो चेहरे अरविन्द और मनीष के साथ दिखते थे उनमें से कितने साथ हैं तो आपको इनकी कार्यशैली और इनके चरित्र का बहुत हद तक प्रमाण मिल जाएगा। दरअसल, पार्टी पर पूरी तरह अपनी पकड़ बनाए रखने की एकाधिकारवादी नीति के तहत केजरीवाल ने उन्हीं लोगों को महत्व दिया और चुनाव में टिकट भी जो उनकी हां में हां मिला सके। उनमें कौन ईमानदार है, जिस राजनीति की वो बात कर रहे हैं उन पर कौन खरा उतर सकता है, किसके पास भविष्य की बेहतर सोच है तथा सत्ता की मादकता में भी कौन बचा रह सकता है इन सबका विचार करने कोई आवश्यकता ही महसूस नहीं की। आदर्श और ईमानदारी की बात करते हुए केजरीवाल ने वो सब किया जो एक व्यक्ति पर आधारित दूसरे क्षेत्रीय दल करते हैं। ऐसे सारे लोग पार्टी से बाहर हो गए या कर दिए गए जो कोई प्रश्न उठा सकते थे। तो इसका हस्र हम आज देख रहे हैं। वास्तव में कपिल मिश्रा प्रकरण नहीं होता तब भी एक आदर्श सपने की राजनीति की मृत्युगाथा हमें लिखनी ही पड़ती।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शनिवार, 6 मई 2017

पाकिस्तान को उसकी भाषा में माकूल जवाब देना अपरिहार्य

 

अवधेश कुमार

पहले यह खबर आई थी कि दो भारतीय जवानों को शहीद कर उनके शव को क्षत-विक्षत करने का प्रतिशोध भारतीय जवानों ने ले लिया है। इसके अनुसार हमारी सेना ने कृष्णा घाटी सेक्टर की कृपाण पोस्ट के उस पार पाकिस्तानी सेना की पिंपल पोस्ट को पूरी तरह से तबाह कर डाला। इस कार्रवाई में 647 मुजाहिद यूनिट के 10 से ज्यादा जवानों के मारे की सूचना थी। ध्यान रखिए 1 मई को पाक सेना ने इसी पिंपल पोस्ट से गोलाबारी की थी और इसी दौरान पाक की बार्डर एक्शन टीम (बैट) ने भारतीय क्षेत्र में घुसकर शहीद जवानों के शवों के साथ बर्बरता की थी। हालांकि इस खबर की पुष्टि कहीं से नहीं हुई। भारत के कुछ समाचार पत्रों तथा वेबसाइटों के अलावा यह खबर कहीं नहीं थी। न सेना ने इसे स्वीकार किया और न सरकार ने ही। पाकिस्तान की मीडिया में भी इसकी कोई चर्चा नहीं है। इसलिए हम नहीं कह सकते कि यह खबर कितना सच है। लेकिन अगर यह सच भी हो तो क्या इसे पाकिस्तान को दिया गया माकूल जवाब मान लिया जाए? भारतीय जवानों के शवों के साथ बर्बरता के बाद पूरे देश में आक्रोश की लहर है तथा सरकार पर कुछ न कुछ करने का दबाव है। रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि इसकी जो प्रतिक्रिया करनी पड़ेगी वे करेंगे। हमारे दो सैनिकों का जो बलिदान है, वह व्यर्थ नहीं जाएगा। वास्तव में जिस तरह से पाकिस्तान हर कुछ अंतराल पर ऐसी हरकतें कर रहा है उसके बारे में गंभीरता से विचार करने तथा उसका माकूल जवाब दिए जाने की आवश्यकता है।

आखिर जिस तरह की घटना को पाकिस्तान ने अंजाम दिया वैसा युद्ध काल में भी नहीं होता और यहां तो युद्ध विराम का काल है। पाकिस्तान की एफडीएल पोस्ट पिंपल से 647 मुजाहिद बटालियन ने नियंत्रण रेखा से सटी सीमा सुरक्षा बल या बीएसएफ की अग्रिम पोस्ट पर गोलीबारी कर तड़के संघर्षविराम का उल्लंघन किया था। बीएसएफ पोस्टों पर राकेट भी दागे गए। उस समय भारतीय सेना व सीमा सुरक्षा बल के जवान खुफिया जानकारी के आधार पर वहां बारूदी सुरंग खोज रहे थे। अचानक हुए हमले में बीएसएफ की 200 बटालियन के हेड कांस्टेबल प्रेम सागर व सेना की 22 सिख यूनिट के नायब सूबेदार परमजीत शहीद हो गए तथा बीएसएफ का कांस्टेबल राजेंद्र कुमार घायल हो गया। इसी दौरान पाकिस्तान की बार्डर एक्शन टीम (बैट) भारतीय सीमा में लगभग एक किलोमीटर तक दाखिल हो गई एवं दोनों भारतीय जवानों के शवों को क्षत-विक्षत करने के बाद उनके अंग भी काटकर अपने साथ ले गई। बैट टीम ने सबसे अधिक बर्बरता नायब सूबेदार परमजीत सिंह के पार्थिव शरीर के साथ किया। पाकिस्तान की बैट सेना और आतंकवादी दोनों का सम्मिलित टीम माना जाता है। ध्यान रखिए बैट की टीम ने हमारी सीमा में घुसकर ऐसा किया। यह सामान्य बात नहीं है।

किंतु ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। 1999 में करगिल युद्ध के दौरान कैप्टन सौरभ कालिया से लेकर वर्तमान घटना तक पाकिस्तान की बर्बरता और पाशविकता का लंबा इतिहास है। 22 नवंबर 2016 को माछिल सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पास पाकिस्तान के साथ मुठभेड़ में 3 जवान शहीद हुए थे। इनमें राइफलमैन प्रभु सिंह का सिर पाक सैनिकों ने काटा और उनके शरीर को क्षत-विक्षत कर दिया। यह हरकत भी बॉर्डर ऐक्शन टीम की ही थी। पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने 28 अक्टूबर 2016 को भारतीय सेना के शहीद जवान मंदीप सिंह के शव को क्षत-विक्षत कर दिया। नियंत्रण रेखा के पास कुपवाड़ा के माछिल सेक्टर में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान मंदीप सिंह शहीद हो गए थे। मुठभेड़ के दौरान पाकिस्तानी सेना गोलीबारी करके आतंकवादियों को कवर देती रही, और इस दौरान एक आतंकवादी ने शव को क्षत-विक्षत कर दिया। इस बर्बरता के पीछे भी बॉर्डर ऐक्शन टीम का हाथ माना गया। बैट दस्ते ने ही 8 जनवरी 2013 को हमारे जवान हेमराज सिंह व सुधाकर सिंह की हत्या की थी। हेमराज का सिर काट ले गए थे और सुधाकर के शव के अंग भंग किए गए थे। पिछले साल जनवरी में यूट्यूब पर एक विडियो भी अपलोड किया गया था, जिसमें कुछ आतंकवादी शहीद हेमराज के कटे सिर के साथ जश्न मनाते हुए दिख रहे थे। इसके बाद जुलाई में सेना ने जम्मू-कश्मीर में हुई एक मुठभेड़ में जवान हेमराज का सिर कलम करने वाले आतंकवादियों में शामिल मोहम्मद अनवर को मार गिराया था। 30 जुलाई 2011 को पाकिस्तान की ओर से कुपवाड़ा के गुगालदार चोटी पर किए गए हमले में राजपूत और कुमाऊं रेजिमेंट के 6 जवान शहीद हुए थे। पाक सौनिक 20 कुमाऊं के हवलदार जयपाल सिंह अधिकारी और लांस नायक देवेंदर सिंह का सिर अपने साथ ले गया था। इसका बदला लेने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन जिंजर को अंजाम दिया। इस हमले में कुल 8 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे। जून 2008 में 2/8 गोरखा राइफल का एक जवान अपना रास्ता भूल गया था। इस जवान को पाकिस्तानी बॉर्डर ऐक्शन टीम ने केल सेक्टर में पकड़ लिया था। कुछ दिन बाद शहीद जवान का शरीर बिना सिर के मिला था। इसके बाद एक जवाबी हमले पाकिस्तान के कुल 8 जवान मारे गए। करगिल में घुसपैठ के दौरान 5 मई 1999 को कैप्टन सौरभ कालिया और उनके 5 साथियों को पाकिस्तानी फौजियों ने बंदी बना लिया था। जब 20 दिन बाद इन जवानों के शव सीमा पार से वापस आए तब पाकिस्तानी फौजियों की बर्बरता की कहानी सामने आई। इन जवानों के साथ क्रूरता की सारी हदें पार की गई थीं। उनके कानों में लोहे की सुलगती छड़ें तक घुसेड़ी गई थीं।

तो पाकिस्तान ऐसी घृणित हरकत करता रहता है। हालांकि हमने यह भी देखा कि हमारी सेना ने ज्यादा घटनाओं का बदला भी लिया है। किंतु इससे आगे क्या? क्या भारत की भूमिका जवाबी कार्रवाई तक सीमित रहेगी? क्रूरता और बर्बरता का यह दुस्साहसी सिलसिला अंतहीन चलता रहेगा? पाकिस्तान जो हरकतें करता है ऐसी हरकतों को सेना की दुनिया में गंदी नजर से देखा जाता है। मजे की बात कि हर बार वह इससे इन्कार भी करता है। इस बार भी उसने इन्कार किया है। भारत के आरोप को उसने झूठा करार दिया है। पाकिस्तान हर अपने कुकर्म को नकारने वाला देश है। जब भी उसकी ओर से आतंकवादी हरकत होती है, उसकी सेना युद्ध विराम का उल्लंघन करती है, या उसका आतंकवादी पकड़ा जाता है वह सीधे नकारता है। यह बात अलग है कि बाद में सब सच साबित होता है। इसलिए उसके नकारने से हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सवाल है कि ऐसा क्या किया जाए जिससे पाकिस्तान भविष्य में ऐसी हरकत करने का दुस्साहस न करे? ऐसा माना जाता है कि इस समय भारत का दबाव कई कारणों से पाकिस्तान पर बढ़़ा है और इसलिए वह ज्यादा आक्रामकता दिखा रहा है। यह भी संभव है कि वहां की नागरिक सरकार का सेना पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं रह गया हो। हाल के दिनों में जिस तरह उसने युद्ध विराम का उल्लंघन किया है उसका अर्थ क्या हो सकता है? क्या वह एक पूर्ण युद्ध भारत से चाहता है?

यह भी ध्यान रखने की बात है कि घटना के एक दिन पहले ही पाक सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा ने सीमा क्षेत्र का दौरा किया था। उन्होंने कश्मीरियों के संघर्ष से समर्थन तो जताया ही था यह भी कहा था कि भारत लगातार युद्ध विराम का उल्लंघन कर रहा है तथा आपको उसे मुंहतोड़ जवाब देना है। उसके बाद यह कार्रर्वाई हो गई। वैसे तो हमारे पास कार्रवाई के कई विकल्प हैं। जवाबी हमला करके उनको क्षति पहुंचा दी। ऐसा जारी रखा जा सकता है। नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान जहां कमजोर है वहा ंउसे ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाया जाए। तोपांे से गोलाबारी लगातार की जाए। आप देखेंगे कि इसका असर होगा। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में निश्चित लक्ष्य पर सीमित हवाई कार्रवाई का विकल्प भी हमारे सामने है। फिर से सर्जिकल स्ट्राइक किया जाए और उसका सबूत भी सामने रख दिया जाए। इस तरह कई विकल्प हमारे पास हैं। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह कि निश्चित रुप से अब वह समय आ गया है जब भारत पाकिस्तान की सेना को उस भाषा में जवाब दे जो भाषा वह समझता है। उससे जो क्षति हो उसे उठाने और सहने के लिए देश तैयार है। इसमें दुनिया क्या कहती है और करती है उससे हमें प्रभावित नहीं होना है। यह हमारे देश की रक्षा तथा एकता अखंडता को बचाने का प्रश्न है। लक्ष्य एक ही हो कि पाकिस्तान फिर आगे ऐसी हरकत कभी न कर सके।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः 110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

इनकी शहादत व्यर्थ न जाए

 

अवधेश कुमार

बस्तर के सुकमा जिले के बुरकापाल गांव के पास सड़क की सुरक्षा में लगे केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों पर घात लगाकर माओवादियों द्वारा किए गए खूनी हमले से पूरे देश में गम और क्षोभ का माहौल है। एक साथ दो दर्जन से ज्यादा सीआरपीएफ जवानों के शहीद होने की खबर पर भी अगर देश में क्षोभ पैदा न हो तो फिर माना जाएगा कि हम मृत समाज हैं। वैसे शहीद जवानों की संख्या बढ़ सकती है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित अनेक नेताओं ने जवानों को श्रद्वांजलि दे दी, उनके चले जाने पर शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनको जवानों की बहादूरी पर गर्व है और उनकी मौत व्यर्थ नहीं जाएगी। गर्व पूरे देश को है और देश भी चाहेगा कि उनका बलिदान व्यर्थ नहंीं जाए। आखिर हमारे जवान हमारे लिए ही अपना बलिदान दे रहे है। ऐसे में पूरा देश उनका प्रति कृतज्ञ रहेगा। किंतु सवाल है कि केवल कृतज्ञता ज्ञापन तक ही हमारी प्रतिक्रियाएं सीमित रहेंगी या इसके आगे भी कुछ होगा? आखिर हमारे जवान कब तक माओवादियों के हाथों शहीद होते रहेंगे? यह सवाल आज हर भारतीय के अंदर कौंध रहा है। इसमें दो राय नहीं कि हाल के वर्षों में माओवादियांे की हिंसक गतिविधियों में काफी कमी आई है। इससे पता चलता है कि उनके खिलाफ चल रहे ऑपरेशन में सुरक्षाबलांे को सफलता मिली है। किंतु अगर कुछ अंतराल पर वे ऐसे हमले करने तथा हमारे जवानों की जानें लेने में सफल होते रहेंगे तो फिर यह मानना मुश्किल होगा कि उनकी कमर टूट गई है। इससे माओवादियों तथा उनके समर्थकों का हौंसला बढ़ता है, उनको पुनर्संगठित होने की ताकत मिलती है तथा वे हमले की तैयारी में लग जाते हैं।

देश चाहता है कि इस खूनी सिलसिले का अंत हो। ऐसी स्थिति में जब गम और क्षोभ का माहौल हो कटु सच बोलना जरा कठिन होता है, लेकिन यदि माओवादियों का अंत करना है तो हमें अपनी कमजोरियों पर बात करनी ही होगी। हम मानते हैं कि जिन परिस्थितियों में जवानों पर माओवादियों ने हमला किया उसमें उन पर विजय पाना जरा कठिन था। सीआरपीएफ की 74 वीं बटालियन सड़क ओपनिंग के लिए निकली थी। दोरनापाल से जगरगुंडा के बीच 56 किमी सड़क का निर्माण कार्य चल रहा है। बुरकापाल कैंप में तैनात सीआरपीएफ की 74 वीं बटालियन के करीब 150 जवानों की तैनाती रोड ओपनिंग के लिए की गई थी। जवान सुबह 6 बजे से पैदल गश्त पर निकले थे। दोपहर करीब 12.55 बजे सड़क से कुछ मीटर अंदर जंगल में जवानों ने भोजन करना आरंभ किया। माओवादियों को इनकी प्रत्येक गतिविधि की जानकारी थी। ये कितने बजे और कहां दोपहर का भोजन करेंगे इसकी पूरी जानकारी नहीं होती तो वे उनपर उसी समय हमला नहीं करते। बगल की काली पहाड़ी से माओवादियों ने फायरिंग शुरू कर दी। इनने ग्रेनेड के अलवा रॉकेट लॉन्चर भी दागे। जब तक जवान संभल पाते, उनमें से कई को गोली लग चुकी थी। माओवादी ऊंचाई पर थे, जबकि जवानों का दल नीचे थे। उपर से माओवादियों के लिए इनकी गतिविधियों को देखना आसान था, इसलिए उनकी स्थिति मजबूत थी। हालांकि भोजन करने के बारे में नियम है कि एक साथ सभी भोजन नहीं करते। कूुछ जवान करीब आधे पहरा देते हैं और शेष भोजन करते हैं। बताया जा रहा है कि ऐसा ही वंहां भी था। बावजूद इतने जवान शहीद हो गए तो साफ है कि ये कमजोर पड़ गए थे। क्यों?

एक कारण तो उनका उंचाई पर होना मान लिया जाएगा। दूसरे, उनकी संख्या जवानों से काफी ज्यादा थी। तीसरे, उनके पास अत्याधुनिक हथियार थे। किंतु इससे भी चिंताजनक बात जो घायल जवानों ने बताया है वह यह कि इस बार कुछ गांवों के लोग उनको जवानों के लोकेशन के बारे में बता रहे थे। माओवादियों ने गांवों की महिलाओं और बच्चों की आड़ लेकर भी हमला किया। इसमें जवानों के लिए कठिनाई थी, क्योंकि ये बच्चों और निर्दोष महिलाओं को नहीं मारना चाहते थे। इस तरह यहां यह कहा जा सकता है कि माओवादियों ने कायरों की तरह हमला किया जिसके लिए उनको शर्म आनी चाहिए। लेकिन क्या ऐसा उन्होंने पहली बार किया है? उनके लिए केवल अधिक से अधिक जवानों का खूना बहाना लक्ष्य है उसके लिए जो भी करना पड़े करंेगे। वे कोई सैद्वांतिक और नैतिक युद्ध नहीं लड़ रहे हैं। कहने के लिए वे माओवादी हैं किंतु माओ के सिद्धांत से भी उनका लेना-देना नहीं। माओ के विचार में हिंसा का प्रमुख स्थान है और इसलिए वह पूरी तरह अस्वीकार्य एवं निदंनीय है। किंतु माओ ने चीन में लाल मार्च किया तो उसमें कुछ भी छिपा नहीं था। सब कुछ खुला हुआ था। उसने गुरिल्ला युद्ध भी किए। हमारे यहां तथाकथित माओवादियों की तरह अकारण हिंसा उसने नहीं किया। इसलिए इनको माओवादी या नकस्लवादी दोनों कहना गलत है। ये केवल आतंकवादी हैं, हत्यारे हैं और इनसे इस तरह निपटा जाना चाहिए।

किंतु जरा यहां अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर भी आत्मविश्लेषण जरुरी है। ऐसा तो है नहीं कि जवानों पर यहां पहली बार हमला हुआ जिसके लिए पूर्व तैयारी नहीं थी। सुकमा में 11 मार्च को भी भेज्जी में पुल निर्माण को सुरक्षा दे रहे सीआरपीएफ जवानों पर माओवादियों ने हमला किया था जिसमें 12 जवान शहीद हो गए थे। माओवादी जवानों के हथियार भी लूट ले गए। माओवादियों ने सुबह 9 बजकर 15 मिनट पर तब हमला बोला, जब सीआरपीएफ के 219 जी बटालियन के जवान रोड ओपनिंग टास्क के लिए जा रहे थे। इसके पूर्व 30 जनवरी को दंतेवाड़ा के निकट राशन वाली जवानों की गाड़ी विस्फोट से उड़ा दी गई थी, जिसमें 7 जवान शहीद हुए थे। इस साल माओवादी वारदातों में अर्धसैन्य बलों के 49 जवान शहीद हो चुके हैं। यह तो इस साल की बात है। ये दो घटनाएं ही हर दृष्टि से सम्पूर्ण पूर्व तैयारी का कारण होना चाहिए था। हम यहां सारी घटनाओं का विवरण नहीं दे सकते। लेकिन दो घटनाओं को याद करना जरुरी है। इसी सुकमा जिले की दर्भा घाटी में नक्सलियों ने 25 मई 2013 को बड़ा हमला किया था। इस हमले में कांग्रेस के सारे वरिष्ठ नेता मार डाले गए थे। कुल मरने वालांे की संख्या 27 थी। उसके बाद कहा गया कि सुरक्षा की पूरी समीक्षा की गई है। तो क्या हुआ उसका? यही वह क्षेत्र है जहां माओवादियों ने 6 अप्रैल 2010 को सीआरपीएु के काफिले पर हमला किया था। इसमें 2 पुलिसकर्मियों सहित 76 जवानों की जान गई थी। क्या उस घटना के बाद सुरक्षा की समीक्षा नहीं हुई थी? तो फिर ऐसी घटनाआंें की पुनरावृत्ति क्यों हो रही है?

ध्यान रखिए जवानों और माओवादियों के बीच करीब सवा तीन बजे तक मुठभेड़ हुआ लेकिन तब तक वहां बैकअप पार्टी नही पहुंच पाई। जहां वारदात हुई, वहां से दोनों ओर चिंतागफा और बुरकापाल कैंप हैं, लेकिन घटना की सूचना काफी देर बाद अधिकारियों को मिली। जब तक मदद पहुंचती माओवादी भाग चुके थे। बुरकापाल से चिंतागुफा थाने की दूरी 5 किमी है, जबकि बुरकापाल से घटनास्थल की दूरी केवल 2 किमी है। 3 बजकर 10 मिनट के आसपास चिंतलनार व चिंतागुफा थाने से बैकअप पार्टी पैदल रवाना हुई। बैकअप पार्टी 4 बजकर 25 मिनट पर घटनास्थल पहुंची। इसे क्या कहेंगे? सुकमा हमले की खबर वायुसेना की एंटी नक्सल टास्कफोर्स को करीब 3 बजे मिली। उसके बाद जगदलपुर से दो हेलिकॉप्टर घायलों को लाने के लिए रवाना किए गए। 7 घायलों को रायपुर के हॉस्पिटल में पहुंचाया गया। इस दौरान रास्ते में एक घायल जवान की मौत हो गई। हो सकता है समय पर उसे अस्पताल पहुंचाया जाता तो उसकी जान बच जाती। अगर सूचना तंत्र मजबूत होता, समय पर सूचना पहुंचती और बैकअप पार्टी के वहां त्वरित पहुंचने की तैयारी होती तो तसवीर कुछ अलग होती। यह भी ध्यान रखिए कि इस सड़क पर हर 5 किमी पर सीआरपीएफ के कैंप हैं। दोरनापाल से आगे पोलमपल्ली, कांकेरलंका, तिमिलवाड़ा, चिंतागुफा, बुरकापाल और चिंतलानार में कैंप हैं। इन कैंपों तक सूचना क्यों नहीं पहुंची? ये सक्रिय क्यों नहीं हुए? ये ऐसे सवाल है जिनका जवाब देश चाहेगा। विस्फोट के लिए बदनाम रही सड़क का निर्माण पुलिस हाउसिंग बोर्ड कर रहा है। अब यहां एक मीटर मोटी सीसी सड़क बनाई जा रही है। यह पता है कि माओवादियों के लिए इस तरह की सड़के मौत का वारंट होती हैं। अगर आने जाने का रास्ता बन गया तो उनके लिए हिंसक औपरेशन चलाना कठिन हो जाएगा। इसलिए सड़कों या ऐसे किसी भी विकास कार्यों का वो हर संभव विरोध करते हैं। जाहिर है, इसके लिए हमारी पूर्व तैयारी होनी चाहिए थी। पूरे दुख के साथ यह स्वीकारना पड़ता है कि हमारी तैयारी खतरे के अनुरुप नहीं थी। चुनौती सामने होते हुए भी उसका पूरा आकलन हमारे सुरक्षा मकहमे ने नहीं किया था। इसका परिणाम हमें भुगतना पड़ा है। क्या इसके बाद गारंटी मिलेगी कि ऐसा दोबारा नहीं होगा? इसका उत्तर हां में देना कठिन है।

टवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

 

रविवार, 16 अप्रैल 2017

आप के कार्यकर्ता एआईएमआईएम में शामिल

 



  • कई समाज के लोगो ने दिया ए आई एम आई एम को समर्थन


नई दिल्ली । दिल्ली में एआईएमआईएम का जनाधार लगातार बढ़ रहा है। कांग्रेस आप, सपा, भाजपा के सभी दलों के लोग एआईएमआईएम में लगातार शामिल हो रहे है।
इसी सिलसिले ने आप के एक ग्रुप ने एक सभा के मंच पर आकर एआईएमआईएम का दामन थाम लिया।आप के लोगो के पार्टी में जुड़ने से हाजी अब्दुल हन्नान की जीत पक्की मानी जा रही है।
लोगो को ख़िताब करते हुए हाजी अब्दुल हन्नान ने कहा कि दूसरे दलों के आकर पार्टी में जुड़ना, इस बात का साबुत है कि पार्टी की जीत पक्की है उत्तर पूर्वी लोकसभा के संयोजक आस मोहम्मद कुरैशी ने कहा कि शास्त्री पार्क वार्ड में एआईएमआईएम की आंधी चल रही है। हमारा मुकाबला सीधा भाजपा से है।
इस मौके पर आप के डॉ ज़ाहिद अहसास, हाजी मोहम्मद अली शेरवानी वाले, नदीम कुरैशी, बाबु भाई, मो सलीम, मो साजिद अंसारी जीन्स वाले, इमरान अंसारी ने पार्टी छोड़ ए आई एम आई एम का दामन थाम लिया।इस सभा को कामयाब बनाने में मेहरुद्दीन उस्मानी ने अहम रोल अदा किया।
 

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

कुलभूषण की सजा भारत को दी गई सीधी चुनौती है

 

अवधेश कुमार

भारत ने जिस तरह की कड़ी प्रतिक्रिया पाकिस्तान को दी है वही देश से अपेक्षित था। विेदेश सचिव एस जयशंकर ने पाकिस्तान के उच्चायोग अब्दुल बासित को बुलाकर साफ कर दिया है कि अगर हमारे नागरिक कुलभूषण जाधव को फांसी दी जाती है तो भारत इसे सुनियोजित ंिहंसा मानेगा। यानी भारत यह मानेगा कि पाकिस्तान ने हमारे एक निर्दोष नागरिक का अपहरण कर उसकी हत्या कर दी। यह सीधे-सीधे पाकिस्तान को चेतावनी है। अगर कोई हमारे देश के नागरिक की सरेआम हत्या करेगा तो फिर उसका जवाब किस तरह दिया जाएगा इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। जाहिर है, अब पाकिस्तान को तय करना है कि वह क्या करता है। लेकिन क्या वहां की नागरिक सरकार की इतनी हैसियत है कि वह सेना के खिलाफ जा सके? कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान सैन्य न्यायालय ने मृत्युदंड दिया है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर अहमद बाजवा ने उस सजा पर हस्ताक्षर कर दिया है। सैन्य न्यायालय के खिलाफ अगर पाकिस्तान में अपील का कोई प्रावधान नहीं है तो फिर एक ही रास्ता बचता है कि कुलभूषण जाधव वहां के राष्ट्रपति के यहां दया याचिका लगाए। यह तो प्रक्रिया की बात हुई। पूरा भारत कुलभूषण जाधव की दशा से सकते में है। उसके साथ क्या किया जा रहा था किसी को पता नहीं। पाकिस्तानी मीडिया में भी कोई खबर नहीं थी। जाहिर है, यह कंगारु कोर्ट का न्याय था जिसमें न कोई गवाह, न बचाव के लिए वकील न मौका.... सब कुछ पूर्व निर्धारित कि इस आदमी को मौत की सजा देनी है।

पिछले वर्ष मार्च में जब भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव की पाकिस्तान द्वारा गिरफ्तारी की सूचना आई पूरा भारत हतप्रभ रह गया। दो देशों के बीच जासूसी कोई नई बात नहीं। लेकिन भारत कभी भी ऐसे जासूस किसी देश में नहीं भेजता जो किसी तरह की हिंसा को बढ़ावा देने की भूमिका निभाए। पाकिस्तान का आरोप था कि कुलभूषण जाधव रॉ का एजेंट है जो बलूचिस्तान की सीमा के पास से पकड़ा गया। वह बलूचिस्तान और कराची में हिंसा, विध्वंस और जातीय संघर्ष बढ़ाने तथा चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे  को तोड़ने के लिए काम कर रहा था। हालांकि सैन्य न्यायालय में उस पर विस्तार से क्या-क्या आरोप लगाए गए यह किसी को पता नहीं। ंिकंतु उस समय पकड़े जाने के बाद 30 मार्च 2016 को पाकिस्तान की ओर से जाधव के कथित कबूलनामे का एक वीडियो जारी करने के साथ पाकिस्तानी सेना के इंटर सर्विसेस पब्लिक रिलेशन्स विभाग के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम बाजवा और सूचना मंत्री परवेज रशीद ने पत्रकार वार्ता में उस पर यही आरोप लगाए थे।। उस वीडियो में कुलभूषण जाधव ने कबूल किया है कि वह रॉ के लिए बलूचिस्तान में काम कर रहा था। इन दोनों ने पत्रकार वार्ता में कहा कि जाधव भारतीय नौसेना का सर्विंग अफसर है जो 2022 में सेवानिवृत्त होने वाला है।  उसे सीधे रॉ प्रमुख हैंडल करते हैं। वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के संपर्क में भी है। इन दोनों ने भारत को संबोधित करते हुए कहा कि आपका मंकी (जासूस) हमारे पास है। उसने वो कोड भी बताया है, जिससे वह रॉ से संपर्क करता था।

जाधव का नाम आते ही भारत सरकार ने छानबीन की और यह स्पष्ट किया कि हां, वह भारतीय नागरिक है। हां, वह भारतीय नौसेना का अधिकारी रहा है लेकिन उसने समय से पूर्व सेवानिवृत्ति ले लिया और अपना व्यापार करता है। यानी उसके कथित कबूलनामे में जो कुछ भी कहा गया वो सब झूठ था। भारत ने यह भी सार्वजनिक किया कि जाधव का एक पासपोर्ट 2014 में मुंबई के ठाणे से जारी हुआ था जिसका नंबर 9630722 है। इस पर जसदनवाला कॉम्पलेक्स ओल्ड मुंबई-पुणे रोड का पता दर्ज है। यह एक सभ्य तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानने वाले देश का आचरण था। यह पाकिस्तान के रवैये के विपरीत आचरण था। वह कभी भी अपने देश के आतंकवाद में पकड़े गए लोगों को अपना मानता ही नहीं। मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब को भी उसने आरंभ में अपना नागरिक मानने से इन्कार किया था। वहीं की मीडिया ने उसके गांव तक का पता बता दिया। करगिल युद्ध में अपने सैनिकों के होने से भी उसने इन्कार किया था और उनके शव भारत ने सम्मानपूर्वक मजहबी रीति से दफना दिए। भारत पाकिस्तान की तरह नकारने वाला देश नहीं है। हमने कहा कि वह भारतीय नागरिक है और आपने पकड़ा है तो हमारे उच्चायोग को उसके पास तक जाने दिया जाए। यही अंतरराष्ट्रीय कानून है। आप किसी देश के नागरिक को पकड़ते हैं और मुकदमा चलाते हैं तो उस देश के उच्चायोग या दूतावास के प्रतिनिधियों से उसे मिलने दिया जाता है ताकि वह अपनी बात कह सके एवं उसे कानूनी मदद पहुंचाई जा सके। भारत ने 25 मार्च 2016 से 31 मार्च 2017 तक पाकिस्तान से 13 बार इसके लिए लिखा लेकिन जाधव को उच्चायोग के अधिकारियों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई। आखिर क्यों? पाकिस्तान को इसका जवाब देना पड़ेगा। दुनिया भी जानना चाहेगी आखिर उच्चायोग की पहुंच जाधव तक क्यों नहीं होने दिया गया? 

यह तो कहीं का न्याय नहीं हुआ। भारत ने इस सजा को न्याय और इंसाफ की धज्जी उड़ाने जैसा माना है। जरा पाकिस्तान के आरोपों का पोस्टमार्टम करिए। उसे बलूचिस्तान के चमन इलाके से पकड़ने की बात की जा रही है। वह पूरा अशांत इलाका है। वैसे वह किस रास्ते घुसा इस पर भी कोई स्पष्ट सूचना नहीं है। किंतु उस पर 12 बार बलूचिस्तान आने का आरोप है। पाकिस्तान अफगानिस्तान के बीच डुरंड रेखा 2640 कि. मी. का है। उस पर इतना कड़ा पहरा है कि आसानी से कोई प्रवेश नहीं कर सकता। कोई व्यक्ति 12 बार आया गया और पकड़ा नहीं गया? वैसे भी 12 बार उतनी लंबी सीमा को पार करना किसी आम मानव के बस की बात नहीं है। ऐसा कोई महामानव ही कर सकता है जो अभी धरती पर पैदा नहीं हुआ। कोई एक व्यक्ति कितनी शक्ति रखेगा जो कि एक साथ बलूचिस्तान में आग भड़का दे, ग्वादर बंदरागह और चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को ध्वस्त करने का षडयंत्र रच दे तथा कराची में भी दंगा भड़का दे? पाकिस्तान की ओर से यह खबर आई कि उसने एजेंटों का एक तंत्र बना लिया था। तो कहां है वह तंत्र? क्या उसके अलावा किसी एक को भी पाकिस्तान ने पकड़ा है? पकड़ा है तो उसे सामने लाए? जाहिर है, पाकिस्तान ने केवल झूठ का पुलिंदा बनाया यह साबित करने के लिए भारत उसके देश में आतंकवाद को प्रायोजित करता है। चंूकि भारत मे आतंकवाद के उसके प्रायोजन प्रमाणित हो चुके हैं इसलिए भारत को भी वह अपने जैसा साबित करना चाहता है। किंतु उसके दावे पर कोई विश्वास नहीं कर सकता और उसने जिस तरह सजा दी है उसके बाद तो उसकी रही सही विश्वसनीयता भी धूल धुसरित हो जाएगी।

सबसे पहले कबूलनामा वाला वीडियो 358 सेकेण्ड का है जिसमें विशेषज्ञों ने 102 कट पकड़े हैं। अलग-अलग एंगल से कैमरे लगाकर उसे सूट किया गया है। उसमें जाधव कई बार टेलिप्रॉम्प्टर से पढ़ते हुए दिखते हैं। वह वीडियो पूरे बचकाने ढंग का है जो पाकिस्तान के झूठ का पर्दाफाश कर देता है। दूसरे, कोई देश यदि कहीं अपना जासूस भेजता है तो उसे राजनयिक कवर देता है। इस तरह किसी को नहीं भेजता। तीसरे, वीडियो में उसका ईरानी वीजा दिखाया गया है जिसमें चाबाहार मुक्त व्यापार क्षेत्र में उसके काम करने की बात अंकित है। ईरान के राष्ट्रपति जब पाकिस्तान दौरे पर आए थे उनके सामने ये बातें रखीं गईं और उन्होंने इसे नकार दिया। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पाकिस्तान को उन्होंने इसके लिए झिड़की तक दे दी। सवाल मुकदमे का भी है। पूरी दुनिया यह जानना चाहेगी कि आखिर किस कानून के तहत किसी देश का सैन्य न्यायालय किसी विदेशी पर मुकदमा चला सकता है? किसी लोकतंत्र में सैन्य न्यायालय प्रायः अपने आंतरिक मामलों के लिए होते हैं। कोर्ट मार्शल किसी सैन्य अधिकारी का हो सकता है। पाकिस्तान कैसा देश है जहां आम न्यायालय का मामला सैन्य न्यायालय में चलता है जिसमें किसी का प्रवेश ही नहीं। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान किस दशा में पहुंच गया है। यानी वहां का राजनीतिक शासन और नागरिक न्यायालय केवल नाम के लिए है पूरी व्यवस्था का सूत्र सेना के हवाले है। सेना मनमाने तरीके से फैसले करती है और उसका प्रतिकार करने की हिम्मत किसी में भी नहीं। चौथे, अगर कोई जासूस हो भी तो उसे मौत की सजा देने का प्रावधान कहां है?

बहरहाल, हमारे सामने निर्णय लेने की घड़ी आ गई है। अगर कुलभूषण जाधव को फांसी दी जाती है तो यह भारत को सीधी चुनौती होगी। भारत ने यह स्पष्ट भी कर दिया है कि इस चुनौती का जवाब हर हाल में दिया जाएगा। कैसे दिया जाएगा यह तय करना होगा। किंतु उसकी सजा की प्रतिक्रिया में तो कुछ कठोर कदम तत्काल उठाए ही जाने चाहिए। भारत ऐसा देश नहीं है जो अपने एक निर्दोष नागरिक की हत्या के प्रयास को चुपचाप देखता रह जाए।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

 

 

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