शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

बुलंद मस्जिद कालोनी के सैंकड़ों मुसलमनों ने थामा भाजपा का दामन

  • शास्त्री पार्क वार्ड के बुलंद मस्जिद कालोनी में मुस्लिमों की 95 प्रतिशत आबादी
  • पिछले चुनाव में यहां से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार बने थे विधायक
  • भाजपा के उम्मीदवार को तौला लड्डूओं में
  • कार्यालय का भी उद्घाटन हुआ
  • सैंकड़ों मुसलमनों के भाजपा में शामिल होने के बाद आप और कांग्रेस को हो सकता है बड़ा नुकसान
संवाददाता
नई दिल्ली। दिल्ली में नगर निगम चुनावी की सरगर्मी सातवें आसमान पर है इसी के चलते आज दिल्ली के शास्त्री पार्क वार्ड 25-ई में बुलंद मस्जिद कालोनी के सैंकड़ों मुसलमानों ने आज भाजपा का दामन धाम लिया। भाजपा में अधिकतर लोग आम आदमी पार्टी और कांग्रेस छोड़कर शामिल हुए। भाजपा में शामिल होने वाले लोग ऐसा लग रहे थे जैसे यहां कोई मुस्लिम जलसा हो रहा हो मगर हकीकत यह थी कि लोगों का आप और कांग्रेस से मोहभंग हो गया है।

बुलंद मस्जिद वह कालोनी है जहां भाजपा को 180 से 250 के बीच ही वोट पड़ते थे और यह मुस्लिम बहुल इलाका है जहां पहले कांग्रेस को और पिछले 3 चुनाव से आप को वोट पड़ रहे हैं मगर आज के दृश्य को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि यह वही मुस्लिम इलाका है जिसे कांग्रेस या आप का गड़ कहा जाता है। इस इलाके की सबसे बड़ी खासियत यह है जिसको भी यहां के लोगों ने गले लगाया है वह विजय होकर ही गया है। यह पहला मौका है जब यहां के लोग भाजपा में इतनी बड़ी तादाद में शामिल हुए।

भाजपा के उम्मीदवार रोमेश चन्द्र गुप्ता ने कहा कि आज इस इलाके से इतनी बड़ी तादाद में मुस्लिम समाज मेरे साथ व भाजपा के साथ जुड़ा है यह जीत की निशानी है। आज बुलंद मस्जिद के लोगों ने मेरा जो स्वागत किया मैं उसको कभी नहीं भूल सकता यहां के लोगों ने फूल-मालाओं से स्वागत तो किया ही मुझे मेरे वजन के बराबर लड्डू से भी तोला। हमारे एक कार्यालय का भी उद्घाटन हो गया है। इस पर भाजपा के उम्मीदवार ने अपनी जीत का दावा करते हुए कहा की जीतने के बाद वह इस इलाके की सड़कें को पक्का करना और इलाके में जो कब्रिस्तान है उसका बड़ा कर सुन्दर बनाना है।

आज के प्रोग्राम की सरपरस्ती हाजी मुस्तकीम ने की और उन्होंने बताया की आज तक कांग्रेस के लोग मुसलमानों को भाजपा का डर दिखाकर अपना उल्लू सीधा करते थे मगर काम नहीं करते थे। काम के नाम पर अनाधिकृत कालोनी का राग अलाप दिया जाता था। यहां लगभग 11000 वोट है और सबसे ज्यादा वोट पड़ता है। इसके साथ ही यहां के वोट से ही जीत सुनिश्चित होती है जिस कारण कांग्रेस और आप वाले लोगों को फिर भाजपा का डर दिखा रहे हैं मगर अब मुस्लिम समाज इनके बहकावे में नहीं आने वाला।

हाजी मुस्तकीम ने आगे बताया है इस इलाके में पिछले निगम पार्षद ने कुछ काम नहीं किया है जिससे इलाके में कोई काम नहीं हुआ पाया है। इस इलाके को हमेशा से ही विकास कार्य से अछुता रखा गया है।
 


 

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

रूस में आतंकवादी हमला गंभीर और चिंताजनक

 

अवधेश कुमार

मास्को के बाद रूस के दूसरे सबसे बड़े शहर सेंट पीटर्सबर्ग में भूमिगत मेट्रो में हुए धमाके ने फिर से दुनिया का ध्यान खींचा है। हालांकि इसमें 10 लोगों के मरने तथा 50 के घायल होने की ही खबर है। इस आधार पर इसे छोटी घटना करार दिया जा सकता है। हालांकि सेन्नया प्लोशद और टेक्नोलॉजीचेस्की इंस्टीट्यूट स्टेशनों के बीच दोपहर बाद 2.40 बजे भूमिगत मेट्रो में धमका करने का मतलब है वो ज्यादा से ज्यादा क्षति पहुंचाना चाहते थे। वह समय काफी भीड़ का होता हैं। कम लोगों का हताहत होना केवल संयोग है। वैसे भी रुसी आतंकवादी विरोधी समिति नेे कहा है कि उसने सेंट पीटर्सबर्ग के एक अन्य भूमिगत स्टेशन से जीवित बम बरामद किया और उसे निष्फल किया। अगर वह फट जाता तो और क्षति होती। हमल छोटा था या बड़ा था, इसमंे कम लोग मारे गए या ज्यादा मारे गए यह अब मायने नहीं रखता। आतंकवादी या आतंकवादियों को हमला करने में सफलता मिली यह महत्वपूर्ण है और दुनिया के लिए यही चिंता की बात है। अभी पिछले 22 मार्च को लंदन के वेस्टमिंस्टर पुल पर एक कार हमले में 5 लोग मारे गए एवं 13 घायल हुए। वहां तो हताहतों की संख्या और कम थी। तो क्या इससे उस हमले को नजरअंदाज कर दिया जाएगा? पिछले 26 मार्च को बंगलादेश के सिलहट में दो विस्फोटांें में 6 लोग मारे गए एवं 40 घायल हुए। इसका निष्कर्ष यह है कि आतंकवादी अब इस तरह उतर आए हैंं कि जैसे भी हो हमला करो... यह न सोचो कि छोटा है या बड़ा और उसमें कितने लोग मरे। इसमें उनको अपनी जान की परवाह नहीं। यह साफ हो गया है कि सेंट पीटर्सबर्ग का हमला भी आत्मघाती था। यह आतंकवाद की नई प्रवृत्ति है और इसमें हमले का स्रोत ज्यादातर स्थानीय होता है। यह संगठित और बड़े वारदात से ज्यादा खतरनाक है। दुनिया में इससे दहशत तो फैलती है। रुसी मेट्रो पर हमले ने दुनिया को फिर नए सिरे सतर्क होने और सुरक्षा व्यवस्था को सख्त करने पर विवश किया है। दुनिया भर में मेट्रो एवं रेलों की सुरक्षा बढ़ाई जा रही है।

संयोग देखिए, जिस समय हमला हुआ उस समय रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शहर में ही थे। वह बेलारूस के नेता एलेक्जेंडर लुकाशेंको से मुलाकात के लिए यहां आए हैं। पुतिन ने हमले के बारे में तत्काल कुछ नहीं कहा लेकिन उन्होंने इसे आतंकवादी हमला मानने से इन्कार नहीं किया। सुरक्षा एजेंसियों ने तो इसे आतंकवादी घटना मान ही लिया है। विस्फोटक से किसी रेल के डिब्बे को उड़ाना आतंकवाद का ही कारनामा तो है। विस्फोट इतना तगड़ा था कि मेट्रो के कोच के परखच्चे उड़ गए।रूस के स्थानीय न्यूज चैनलों के फुटेज में खून से लथपथ घायल लोग प्लेटफॉर्म पर जहां-तहां पड़े दिखाई दिए।एक प्लेटफॉर्म के पास धमाके से एक बड़ा गड्ढा बन गया। यह भी साफ हो गया है कि मेट्रो में धमाका कील बम (नेल बम) से किया गया। ज्यादा लोगों को घायल करने के लिए कीलों का प्रयोग किया जाता है। कीलें छर्रे के रूप में काम करती हैं, जिससे छोटे क्षेत्र में अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाया जाता है। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि उन्होंने हमलावर को अपनी पीठ पर लटका बैग ट्रेन के भीतर फेंकते देखा। इसके बाद धमाका हुआ। माना जा रहा है कि कीलों से भरा विस्फोटक किसी ब्रिफकेस में रेल के भीतर रखा गया था। विस्तृत जानकारियां तो छानबीन के बाद ही आएंगी, लेकिन दुनिया भर में आतंकवाद की वर्तमान स्थिति तथा उसमें रुस की भूमिका को देखते हुए कुछ अनुमान तो लगाया ही जा सकता है।

 वर्तमान वैश्विक आतंकवाद की जब चर्चा होती है तो प्रायः उसमें रुस का नाम नंहीं लिया जाता, जबकि सच यह है कि रुस लंबे समय से आतंकवादी हमले का शिकार रहा है और वहां बड़े-बड़े आतंकवादी हमले हुए हैं। यह उन सबको एक बार उद्धृत करना आवश्यक है। 31 अक्टूबर 2015 को इस्लामिक स्टेट ने एक रुसी विमान को मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप के उपर उड़ा दिया जिसमें 224 लोग मारे गए थे। आईएस द्वारा विमान को उड़ने की यह पहली घटना थी। आईएस ने केवल एक ही हमला करने का तय किया होगा ऐसा तो है नहीं। इसके पूर्व 29-30 दिसंबर 2013 को दो आत्मघाती आतंकवादियों ने वोल्गोग्राद शहार के एक रेलवे स्टेशत तथा एक ट्रौली बस में विस्फोट कर 34 लोगों की जान ले ली। यह हमला सोचि में 2014 के विंटर ओलिम्पिक आरंभ होने के केवल दो महीने पहले हुआ था। 24 जनवरी 2011 को मॉस्को के दोमोदेदोवो हवाई अड्डे पर आत्मघाती हमले में 30 लोग मारे गए। 29 मार्च 2010 को मॉस्को के दो मेट्रो स्टेशनों पर दो महिला आत्मघाती हमले में 40 लोग मारे गए थे और 100 से ज्यादा घायल हुए थे। हमले की जिम्मेदारी चेचेन विद्रोहियों ने ली थी। 27 नवंबर 2009 को मास्को एवं सेंट पीटर्सबर्ग के बीच एक रेल में विस्फोट किया गया जिसमें 26 लोग मारे गए तथा 100 घायल हुए। इसकी जिम्मेवारी भी चेचेन विद्रोहियों ने ली थी। 21 अगस्त 2006 को मास्को के एक उपनगरीय बाजार में विस्फोट से 10 लोग मरे तथा 50 घायल हुए। 1 सितंबर 2004 को आतंकवादियों ने बेसलान के एक स्कूल को कब्जे में ले लिया। दो दिनों तक सुरक्षा बल उनको घेरे रहे। जब वे चेतावनी से नहीं निकले तो 3सिंतबर को सुरक्षा बलों ने कार्रवाई की और 330 लोग मारे गए। यह भी चेचेन उग्रवादियों की ही कार्रवाई थी। 24 अगस्त 2004 को दो रुसी यात्री विमानों को उड़ा दिया गया जिसमें 90 लोग मारे गए। एक विमान वोल्वोग्राड जा रहा था जो मास्को के दक्षिण में गिरा और कुछ ही क्षणों में दूसरा विमान रोस्तोव ऑन दोन में ध्वस्त हुआ। 6 फरबरी 2004 को मास्को के भूमिगत रेलवे में आत्मघाती विस्फोट में 39 लोग मारे गए तथा 100 घायल हुए। यह भी चेचेन विद्रोहियों की कार्रवाई मानी गई। 5 दिसंबर 2003 को दक्षिण रुस के येस्सेन्तुकी स्टेशन के निकट एक रेल में विस्फोट से 46 मारे गए एवं 160 घायल हुए। 23 अक्टूबर को चेचेन विद्रोहियों ने मास्को के एक थिएटर को कब्जे में ले लिया। यह तीन दिनों तक चला। अंत में पुतिन ने थिएटर में गैस छोड़ने का आदेश दिया और 129 बंधकों तथा 41 चेचेन गुरिल्लाओं की मौत हो गई। मास्को के एक अंडरपास में 8 अगस्त 2000 को हुए विस्फोट में 13 लोग मारे गए एवं 90 घायल हुए। सितंबर 1999 में मास्को में दो अपार्टमेंट बम विस्फोट से नष्ट हुए जिसमें 200 लोग मारे गए।

अपने-आपसे प्रश्न करिए कि इतने अधिक हमले आखिर किस पश्चिमी देश में हुए हैं? हाल के वर्षों में फ्रांस कई हमलों का शिकार हुआ है। किंतु वह भी रुस से काफी पीछे है। संेट पीटर्सबर्ग का हमला इसी कड़ी की अगली घटना है। चेचेन विद्रोही करें, आईएस करे या और कोई हमारे लिए तो यह भयावह आतंकवाद का विस्तार ही है। यह हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आतंकवादियों के रडार पर होने के कारण रुस के प्रमुख शहरों और स्थानों पर विशेष सुरक्षा व्यवस्था की गई है। सेंट पीटर्सबर्ग उनमें शामिल है। वास्तव में रुस जिस अलगाववादी चेचेन उग्रवादियों के द्वारा लक्षित हमलांे का शिकार हो रहा है तथा आईएस ने भी उसे लक्ष्य बनाया है उसें सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करना अपरिहार्य था। ध्यान रखने की बात है कि इस्लामिक स्टेट यानी आईएसआईएस ने भी चेचेन विद्रोहियों को अपने संगठन में शामिल किया है। जाहिर है, चेचेन विद्रोही उस संगठन में शामिल हुए तो रुस को दहलाने के लिए ही। वैसे भी सीरिया में रुस के सैनिक हस्तक्षेप के विरुद्ध इस्लामिक स्टेट ने हमले की धमकी दिया हुआ है। रुसी सेना और विशेष बल राष्ट्रपति बशर अल असद को विद्रोही समूहों तथा इस्लामिक स्टेट से लड़ने में मदद कर रहा है। इससे आईएस रुस से नाराज है। रुस इस धमकी को लेकर सतर्क है भी। वह सीरिया से लौटने वाले चेचेन विद्रोहियों द्वारा हमले की आशंका को लेकर पहले से तैयार है। पुतिन वैसे भी आतंकवाद को लेकर दुनिया के सख्त प्रशासकों में माने जाते हैं। विमान उड़ाए जाने की घटना के बाद पुतिन ने पूरी सुरक्षा की नए सिरे से समीक्षा की और आवश्यक बदलाव किए गए। बावजूद इसके यदि आतंकवादी हमला करने में सफल हुए तो इसे हर दृष्टि से गंभीर और चिंताजनक घटना मानना होगा। इससे पूरी दुनिया को सबक लेना होगा।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

दलाई लामा की पूर्वोत्तर यात्रा एवं चीन का रुख

 

अवधेश कुमार

दलाई लामा को लेकर चीन की खीझ एवं उनके बारे में की गई टिप्पणियां दुनिया के लिए नई नहीं हैं। चीन की ओर से उनको मनुष्य की खाल में राक्षस और भेड़िया तक कहा जा चुका है। इस समय अगले 1 अप्रैल से वे असम की यात्रा पर हैं जहां राजधानी गुवाहाटी में पांच दिवसीय नमामी ब्रह्मपुत्र उत्सव में भाग लेंगे। उसके बाद वे 4 अप्रैल से आठ दिन की अरुणाचल यात्रा पर जाने वाले हैं। कुल मिलाकर पूर्वोत्तर की उनकी यात्रा 13 दिनों की हो जाती है। स्वाभाविक ही दलाई लामा का अरुणाचल में तवांग मठ भी जाने का कार्यक्रम है। तवांग के बारे में हम जानते हैं कि चीन उसे किस रुप में लेता है। वैसे तो पूरे अरुणाचल पर ही वह दावा करता है किंतु तवांग को वह अपना इसलिए मानता है कि क्योंकि इसकी स्थापना पूर्व दलाई लामा ने किया था। तिब्बत में चीन के जबरन कब्जे के विरुद्व छः दशक पूर्व जो विद्रोह हुआ था उसका भारत में एक बड़ा केन्द्र तवांग मठ हो गया था। तिब्बत से भागने वाले बौद्ध भिक्षु भी आरंभ में वहीं पहुंचे। चीन दलाई लामा और तवांग दोनों से सशंकित रहता है। उसे पता है कि बौद्ध धर्मावलंबियों के बीच दोनों का महत्व कितना है। शायद उसे यह अशंका बनी रहती है कि फिर कहीं तवांग को केन्द्र बनाकर दलाई लामा उसके खिलाफ विद्रोह न करा दे।

हालांकि इस बात की तत्काल कोई संभावना नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि भारत ने दलाई लामा सहित उनके साथ आए तिब्बतियों को शरण अवश्य दिया है, उन्हें यहां धर्मशाला में निर्वासित सरकार चलाने तथा उनके लिए जन प्रतिनिधियों के निर्वाचन की भी छूट दिया हुआ है, तिब्बतियों को आम शरणार्थियों से ज्यादा अधिकार भारत में हासिल है, किंतु उन्हें किसी तरह की चीन विरोधी गतिविधियां चलाने की इजाजत नहीं है। जब भी चीनी नेताओं की यात्राएं होतीं हैं और तिब्बती विरोध प्रदर्शन की कोशिश करते हैं उनको रोका जाता है। भारत की नीति अभी तक अपनी भूमि से तिब्बतियों को चीन के खिलाफ विद्रोह करने या तिब्बत के अंदर भी विद्रोह भड़काने की किसी भी गतिविधि को न चलने देने का है। स्वयं चीन ने भी पूर्व तिब्बत के भूगोल, राजनीति और मानवीकी को जिस सीमा तक परिवर्तन कर दिया है उसमें उसकी आजादी के लिए विद्रोह वैसे भी कठिन हो गया है। उसके भाग को कई अलग-अलग प्रांतों में मिलाया जा चुका है तथा मूल चीनी हान जाति के लोग वहां भारी संख्या में बसे हैं। चीन ने वहां अपना सैनिक सुदृढ़िकरण भी कर दिया है। अब तो पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जाने और सिल्क रुट को फिर से आरंभ करने वाली उसकी रणनीति में तिब्बत का प्रमुख स्थान हो गया है। कहने का तात्पर्य यह कि तिब्बत पर राजनीतिक एवं सैनिक पकड़ इतनी सशक्त हो चुकी है कि छोटी संख्या वाले तिब्बतियों के लिए वहां विद्रोह करना काफी कठिन है। वैसे भी दलाई लामा ने साफ किया है कि वो तिब्बत की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग नहीं कर रहे, बल्कि चीन के अंदर एक ऐसे स्वायत्त राज्य के रुप में उसे चाहते हैं जो अहिंसक क्षेत्र के रुप में खड़ा हो।

बावजूद चीन सशंकित रहता है तो क्यों? आखिर दलाई लामा अरुणाचल जाएंगे या नमामी ब्रह्मपुत्र उत्सव में भाग लेंगे उससे उसका क्या बिगड़ जाएगा? दलाई लामा के अरुणाचल दौरे पर उसने भारत को जिस तरह संबंधों पर प्रतिकूल असर की चेतावनी दी है उसे क्या कहा जाए इसके लिए शब्द तलाशना होगा। आखिर एक बुढ़ा संन्यासी, जिसके पास न कोई फौज है, न कोई बड़ी संगठित शक्ति और न ही अपने मूल तिब्बत के लोगों से 1959 के बाद कोई प्रत्यक्ष संपर्क है वह चीन जैसे आर्थिक एवं सैनिक महाशक्ति का क्या बिगाड़ लेगा? दलाई लामा वैसे भी अहिंसा के पथ पर चलने वाल संत है तो फिर उनसे डर किस बात का? इन प्रश्नों का उत्तर तलाशाने से ऐसा लगता है कि चीन दलाई लामा को लेकर कुछ अतिवादी मानसिकता मंे आ जाता है। किंतु यह उसकी रणनीति भी है ताकि कोई देश दलाई लामा एवं उनके साथियों को विशेष महत्व न दे या उनका साथ न दे। वह जानता है कि तिब्बत पर उसका कब्जा अवैध एवं अनैतिक है। वह भारत के प्रति भी इसलिए सशंकित रहता है, क्योंकि इतिहास बताता है कि हमारा पड़ोसी चीन कभी था नहीं तिब्बत था। तिब्बत एक समय चीन के बीच हमारे लिए बफर राज्य की भूमिका निभाता था। तो भारत सरकार की जो भी नीति हो, भारतीयों के अंदर यह मंशा स्वाभाविक है कि तिब्बत फिर से आजाद हो एवं हमारे लिए अपनी स्वाभाविक भूमिका में आए। चीन जैसे देश के नेताओं को आम भारतीयों की इस मानसिकता का अंदाजा होगा। यह बात अलग है कि भारत की नीति में तिब्बत की आजादी शामिल नहीं है। लेकिन यह नीति स्थायी होगी ऐसा मानने का भी कोई कारण नहीं है। यदि चीन पाकिस्तान को हमारे विरुद्ध शह देता रहा, जिस तरह वह पाक अधिकृत कश्मीर से लेकर ग्वादर तक चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बनाकर अपनी आर्थिक एवं सैनिक उपस्थिति को सुदृढ़ कर रहा है, कश्मीर पर उसकी दोहरी नीति है उसमें भारत की नीति कभी भी बदल सकती है।

उसके आशंकित होने का एक कारण यह भी लगता है कि उसके भावी आर्थिक एवं सामरिक व्यवहार में तिब्बत का महत्व ज्यादा बढ़ गया है। चाहे वह ग्वादर बंदरगाह तक की गतिविधियां हों या फिर नेपाल के साथ व्यवहार सब कुछ तिब्बत से ही जुड़ा है। उसके तेल गैस का पाइपलाइन भी इसी क्षेत्र से गुजर रहा है। चेंगडू जैसे बड़े सैनिक अड्डे तक पहुंचने के लिए रेल रास्ता हो या सड़क मार्ग सबको तिब्बत से ही जाना है। इस तरह उसे भविष्य की चिंता भी है। यानी कहीं कोई बड़ा विद्रोह हो गया तो फिर इन सबकी सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। इसके लिए हर कदम पर सुरक्षा जाल बिछाना संभव नहीं है। तो वह पहले से अपनी आखंेे तरेड़ता है ताकि भविष्य सुरक्षित रहे। उसकी चिंता अगले दलाई लामा की भी है। पता नहीं वर्तमान दलाई लामा के गुजरने के बाद उनके पुनर्जन्म को तिब्बती कहां और किसे मान लें। उसने जबरन एक व्यक्ति को पंचेन लामा घोषित कर एक बड़े धर्मगुरु के पुनर्जन्म का रास्ता निकालने की कोशिश की वह भी पूरी तरह सफल नहीं हुई। अगर यह सब कारण नहीं हो तो दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा या फिर नमामी ब्रह्पुत्र उत्सव में भागीदारी से उसे कोई परेशानी नहीं होती।

वैसे ब्रह्मपुत्र के साथ भी चीन की समस्या जुड़ी हुई है। यार्लुंग त्सांगपो यानी ब्रह्मपुत्र पर तिब्बत की राजधानी ल्हासा के दक्षिण पूर्व मे ंउसने झांगमू बांध बनाया है तथा चार और बांध बनाए जा रहे हैं। हालांकि चीन ने भारत एवं बंगलादेश दोनों को यह वचन दिया है कि इन बांधों से उसके बहाव पर कोई असर नहीं होगा। किंतु पर्यावरणविदों की राय अलग है। त्सांगपो, जो तिब्बत के मुख्य क्षेत्रों में पश्चिम से पूरब की ओर बहती है भारत में ब्रह्मपुत्र एवं बंगलादेश में जमुना कहलाती है। ब्रह्मपुत्र पर उसके वचन पर भारत सरकार ने विश्वास किया है, लेकिन आम लोगों की सोच पर तो उसका वश नहीं। तिब्बती वैसे भी बांध को एक बड़ा मुद्दा बताते हैं। वे तिब्बत में पर्यावरण की क्षति के एक कारण में इसे भी लेते हैं। हो सकता है दलाई लामा इसे वहां उठाएं। इसलिए चीन इस पर कुछ न कुछ प्रतिक्रिया अवश्य व्यक्त करेगा। भारत नमामी ब्रह्मपुत्र उत्सव का व्यापक पैमाने पर आयोजन कर रहा है वह भी चीन को नागवार गुजर रहा होगा। हालांकि इसमें दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को निमंत्रण दिया गया है और चीन भी उसमें शामिल है। चीन ने अपने आने की पुष्टि नहीं की है। शेष देश के प्रतिनिधि आएंगे। लगता नहीं कि दलाई लामा की उपस्थिति वाले किसी समारोह में चीनी प्रतिनिधि भाग लेंगे। तो हमें चीन की प्रतिक्रिया देखनी होगी। ध्यान रखिए, दलाई लामा का असम दौरा अब केवल नमामी ब्रह्मपुत्र उत्सव तक सीमित नहीं है। 1 अप्रैल से ही उनके कई कार्यक्रम निर्धारित हैं जिसमें वे गुवाहाटी में आम लोगों को संबोधित करेंगे, फिर 4 अप्रैल को डिब्रुगढ़ विश्वविद्यालय में उनका संबोधन है। यह इस बात का सबूत है कि दलाई लामा की अहिंसक एवं विश्व कल्याणकारी सोच और उनके व्यवहार को देखते हुए भारत में उनको पूरा सम्मान और महत्व मिलता है। यही बात चीन को खटकती होगी। किंतु चीन के खटकने से भारत का व्यवहार नहीं बदल सकता। 

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208 

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

योगी के आने से ‘सेकुलरिये’ सकते में

श्याम कुमार

आजादी के बाद अब तक एक ओर भ्रष्टाचारियों एवं घोटालेबाजों की चांदी रही है तो दूसरी ओर कट्टरपंथी मुसलमानों एवं फर्जी सेकुलरवादियों की। देश में अब तक इन्हीं लोगों का तुश्टीकरण एवं संरक्षण होता रहा है। यह तुष्टीकरण एवं संरक्षण भी भ्रश्टाचार ही था। मजहब के आधार पर नागरिकों में भेदभाव करना व हक मारना अन्याय है तथा यह अन्याय भ्रश्टाचार का दूसरा रूप है। योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने से कट्टरपंथी मुसलमान एवं फर्जी सेकुलरिए सकते में हैं। उनमें खलबली मची हुई कि यह क्या हो गया? नेहरू वंश के नेतृत्व में कांग्रेसी षासन हिन्दुओं के लिए काला अध्याय रहा है। उस दौर में हिन्दुओं को दूसरे दर्ज का नागरिक बना दिया गया था। अब तक कट्टरपंथी मुसलमान एवं फर्जी सेकुलरिए ही हावी रहे हैं तथा वे प्रथम श्रेणी के नागरिक बने हुए थे। वे दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं, क्योंकि दोनों की भाशा एवं नीयत एक है-हिन्दुत्व एवं भारतीय संस्कृति का विरोध। फर्जी सेकुलरियों में नकली वामपंथियों, नकली समाजवादियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों आदि की जमातें षामिल हैं। 

हाल में ‘आप की अदालत’ में रजत शर्मा ने योगी आदित्यनाथ पर ‘मुकदमा’ चलाया था, जिसमें योगी से बड़े तीखे सवाल पूछे गए थे। रजत शर्मा ने पूछा था कि गोरखपुर में कतिपय मुहल्लों के मुसलिम नामों को क्यों बदल दिया गया है, जैसे अलीनगर का नाम आर्यनगर, मियां बाजार का नाम माया बाजार आदि। योगी ने उत्तर में कहा था कि ये जो बदले हुए नाम हैं, वे वस्तुतः उन मुहल्लों के मूल एवं असली नाम थे, जिन्हें मुसलिम षासनकाल में बदल दिया गया था। अतः जब उस समय नाम बदले जाने पर आपत्ति नहीं की गई तो अब भी आपत्ति नहीं की जानी चाहिए। इसी प्रकार एक अन्य प्रश्न के उत्तर में योगी आदित्यनाथ ने आंकड़े देकर बताया था कि जो हिन्दू बहुल इलाके हैं, वहां हिन्दुओं से मुसलमानों को किसी प्रकार का कश्ट नहीं मिलता है। लेकिन जिन क्षेत्रों में मुसलमानों का प्रतिशत अधिक होता है, वहां फसाद होते हैं तथा हिन्दुओं का चैन से रहना मुश्किल होता है। जहां मुसलमानों की संख्या बहुत अधिक होती है, वहां दंगे होते हैं तथा हिन्दुओं को उत्पीडि़त कर वह इलाका छोड़ने को विवश किया जाता है। योगी आदित्यनाथ की बात बिलकुल सही है तथा उत्तर प्रदेश के अनेक हिस्सों में हिन्दू आबादी वाले मुहल्ले धीरे-धीरे मुसलिम आबादी वाले मुहल्ले हो गए हैं। 

हिन्दू को विश्वास नहीं हो रहा है कि अब उसे आजादी मिल गई है। पिछले आठ सौ साल से गुलामी झेलते-झेलते उसकी गुलाम बने रहने की आदत पड़ गई थी। पहले मुसलिम हमलावरों ने गुलाम बनाया। चूंकि हिन्दू स्वभाव से अतिउदार एवं अतिसहिश्णु होता है, इसलिए बार-बार धोखा खाकर भी क्षमा करना उसकी प्रवृत्ति होती है। इसी से क्षमा करने के सिद्धांत के पुरोधा महात्मा गांधी ने भी झुंझलाकर कह दिया था कि हिन्दू कायर कौम है। न्यायमूर्ति अब्दुल करीब छागला हिन्दू को चरित्र से सेकुलर एवं न्यायप्रिय मानते थे। वास्तविकता यही है कि हिन्दू धर्म वास्तविक रूप में सेकुलरवादी, अर्थात पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत का अनुयायी है। सम्पूर्ण हिन्दू दर्शन में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का सिद्धांत निहित है। यह दर्शन ‘न्याय सबके साथ, अन्याय किसी के साथ नहीं’ सिद्धांत का प्रतिपादक है। भारतीय जनता पार्टी ने इसी आदर्श को ग्रहण कर अपना सिद्धांत बनाया है-‘सबका साथ, सबका विकास’। नरेंद्र मोदी षुरू से कह रहे हैं कि उनका लक्ष्य समस्त सवा सौ करोड़ देशवासियों का कल्याण एवं विकास करना है। इन सवा सौ करोड़ में हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई आदि सभी धर्मावावलम्बी शामिल हैं। देश के सभी लोगों का कल्याण एवं समस्त क्षेत्रों का विकास नरेंद्र मोदी का ऐसा लक्ष्य है, जो देश को पुराना गौरव वापस दिलाएगा तथा हमारा देश पुनः ‘सोने की चिडि़या’ बन सकेगा।

अपने उदार स्वभाव के कारण ही हिन्दू भारत ने तमाम विदेशियों को अपने यहां शरण दी और उनका अस्तित्व समाप्त होने से बचाया। यहूदी इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। आज विश्व में यहूदियों का जो अस्तित्व बचा हुआ है, वह सिर्फ हिन्दू भारत के कारण है। भारत ने ही उन्हें षरण देकर नश्ट होने से बचाया था। पारसियों के बारे में भी यही बात लागू होती है। षकों व हूणों को भारतीय समाज ने ऐसा आत्मसात किया कि वे अलग नहीं रह गए। लेकिन मुसलिम हमलावरों एवं अंग्रेजों के मामले में भारतीयों की उदारता आत्मघाती सिद्ध हुई। दोनों ने हमारी उदारता एवं सदाशयता का फायदा उठाकर हमें अपना गुलाम बना लिया और लगभग आठ सौ साल तक हमें उनकी गुलामी झेलनी पड़ी। विदेशी मुसलिम हमलावरों के बाद अंग्रेजों की गुलामी झेली और जब उनसे मुक्ति मिली तो हिन्दू नेहरू वंश के नेतृत्व वाले कांग्रेसी राज में कट्टरपंथी मुसलमानों एवं फर्जी सेकुलरियों की गुलामी के चंगुल में फंस गया। इन लोगों की जिद एवं कलह के कारण ही देश का वातावरण स्थायी रूप से अशांत बना हुआ है। ये लोग ‘न्याय सबके साथ, अन्याय किसी के साथ नहीं’ सिद्धांत के बजाय ‘हिन्दू के साथ अन्याय, मुसलमान के साथ पक्षपात’ सिद्धांत चाहते हैं। अयोध्या का ‘रामजन्मभूमि प्रकरण’ इसका ज्वलंत उदाहरण है। 

हिन्दुओं की मान्यता है कि अयोध्या भगवान राम की अवतार-स्थली है। इलाहाबाद उच्चन्यायालय द्वारा कराई गई जांच से सिद्ध हो गया कि अयोध्या में विवादित स्थल पर विशाल मंदिर था, जिसे तोड़कर उस पर मस्जिद बना दी गई। किन्तु कट्टरपंथी मुसलमान एवं फर्जी सेकुलरिए वहां जबरदस्ती विवाद खड़ा किए हुए हैं। यदि सामान्य मंदिर की बात होती तो उसे वहां से अन्यत्र हटाया जा सकता था। लेकिन उस स्थल का रामजन्मभूमि होने का महत्व है। इसी प्रकार चूंकि वहां मुसलमानों के लिए मस्जिद का कोई विशिष्ट महत्व नहीं है, इसलिए उसे वहां के बजाय अन्यत्र बनाया जा सकता है। लेकिन कट्टरपंथी मुसलमानों एवं सेकुलरियों ने जानबूझकर ‘बाबरी मसजिद विवाद’ खड़ा कर दिया और देश की शांति नष्ट कर दी। यदि वहां रामजन्मभूमि मंदिर का निर्माण हो जाने दिया जाता तो उससे हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच स्थायी रूप से सौहार्द एवं प्रेमभाव स्थापित किया जा सकता था।         


मेरी पत्रकारिता के छप्पन वर्ष

श्याम कुमार

गत 2 नवम्बर, 2016 को मेरी पत्रकारिता का 57वां वर्ष आरम्भ हो गया। अर्थात आधी षताब्दी से भी अधिक समय हो गया है। इसी प्रकार 10 नवम्बर, 2016 से मेरी उम्र का 76वां साल षुरू हुआ है। मैं बीस वर्ष का था, जब पत्रकारिता में आया था। आज भी मुझे वह दिन याद है, जब 2 नवम्बर, 1961 को मैंने इलाहाबाद के लीडर प्रेस परिसर में पहली बार कदम रखा था। वहां से देश के दो सुविख्यात राष्ट्रªीय समाचारपत्र ‘भारत’ व ‘लीडर’ प्रकाशित होते थे। ‘भारत’ के नित्य कई संस्करण प्रकाशित होते थे तथा अनेक राज्यों में अखबार का व्यापक प्रसार था। लीडर प्रेस परिसर में ‘भारती भंडार’ नामक प्रसिद्ध प्रकाशन-केंद्र भी था, जहां से प्रायः सभी महान साहित्यकारों की पुस्तकें प्रकाशित होती थीं। उस समय इलाहाबाद पूरे देश का केंद्र-विंदु था तथा शिक्षा, विधि, पत्रकारिता, सांस्कृतिक कार्यकलापों, राजनीति आदि का देश का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता था। जिस दिन मैंने पत्रकारिता में कदम रखा, उस दिन से मेरा जीवन अपना नहीं रहा तथा पूरी तरह पत्रकारिता को समर्पित हो गया। मुझे केवल सोने का समय मिल पाता था, शेष कोई भी समय अपना नहीं था। पारिवारिक परम्परा के अनुसार समाजसेवा के कार्याें में भी बहुत रुचि थी। 1961 में ही जनवरी में अखिल भारतीय सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं समाजसेवी संस्था ‘रंगभारती’ की स्थापना की, जिसके कार्यकलापों की लम्बी श्रृंखला बन गई। ‘रंगभारती’ ने 1961 में इलाहाबाद के परीभवन में देश का पहला हास्य कवि सम्मेलन आयोजित किया तथा अन्य अनेकानेक कार्यक्रमों की पहली बार नींव डाली। 

दैनिक ‘भारत’ के प्रधान सम्पादक शंकर दयालु श्रीवास्तव मेरे पिता जी के मित्र थे तथा मेरे यहां उनका आना होता था। लेकिन मेरी उनसे कभी भेंट नहीं हुई थी। मैं जब हाईस्कूल में था, तभी से मेरी भाशा पूर्णरूपेण मंज चुकी थी तथा अर्धविराम तक की त्रुटि नहीं होती थी। मैं दैनिक ‘भारत’ में ‘पाठकों के पत्र’ स्तम्भ में पत्र लिखा करता था, जिससे प्रधान सम्पादक शंकर दयालु श्रीवास्तव प्रभावित थे। अचानक पिताजी का देहावसान होने के बाद उन्होंने मुझे ‘भारत’ में बुला लिया। उसी वर्ष मैंने एमए किया था। ‘भारत’ में मुझे अपने वरिश्ठों से पत्रकारिता का अत्यंत कठोर प्रशिक्षण मिला। मैंने अपने जीवन में डाॅ. धर्मवीर भारती एवं हेरम्ब मिश्र से अधिक योग्य पत्रकार आजतक नहीं देखे। हेरम्ब मिश्र मेरे वरिष्ठ थे। अवकाशप्राप्त आईएएस अधिकारी अरविंद नारायण मिश्र के बाबा बाबूराम मिश्र भी मेरे वरिश्ठ सहयोगी थे। शंकर दयालु श्रीवास्तव उच्चकोटि के सम्पादक थे तथा उनका बड़ा नाम था। दैनिक ‘भारत’ में वरिश्ठों ने मुझे सीख दी कि पत्रकार के लिए देशहित सबसे बड़ा होना चाहिए। पत्रकारिता भाव, भाशा एवं अभिव्यक्ति का मिश्रण है, यह मेरा सिद्धांत बन गया। मेरे परिवार के अन्य लोग भी पत्रकार हैं तथा हम सबने हमेशा ईमानदारी, आदर्श एवं उच्चकोटि की पत्रकारिता की।

मैं बहुत सम्पन्न घर का था तथा मैंने अपने माता-पिता को हमेशा देते देखा, कभी लेते नहीं देखा। हमारे घर में अनेक रिश्तेदारों के लड़कों को षरण मिली, जिनका अच्छा भविष्य मेरे माता-पिता ने बनाया। उन्हें पढ़ाया और नौकरी लगवाई। दर्जनों गरीब कन्याओं का विवाह कराया। धीरे-धीरे हमारे घर की सम्पन्नता परोपकार की वेदी पर बलि चढ़ती गई। गांव में करोड़ों की जायदाद थी, जिसकी जानकारी पिताजी को ही थी तथा वही देखभाल के लिए वहां जाया करते थे। चकबंदी नहीं हुई थी, अतः उनका अचानक देहांत हो जाने से उस सम्पत्ति का पता ही नहीं लग पाया। माता-पिता से परोपकार एवं समाजसेवा के संस्कार मुझे भी मिले, जो नशे की तरह मुझमें समा गए तथा ‘घर फूंक तमाशा देख’ सिद्ध हुए। मेरी सारी कमाई उनमें खर्च होती गई। सरकार से मुझे कभी मदद नहीं मिली। मैंने तमाम लड़कों की नष्ट हो रही जिंदगी बचाकर उन्हें अच्छी जिंदगी दी और उज्ज्वल भविष्य बनाया। किन्तु किसी ने एहसान नहीं माना और कुछ ने तो न केवल बहुत क्षति पहुंचाई, बल्कि प्राणलेवा वेदनाएं दीं। केवल एक व्यक्ति ऐसा है, जिसने एहसान माना। वह व्यक्ति एक भिक्षा मांगने वाले का पुत्र था, जो मेरी मदद पाकर डाॅक्टर बन गया और अब अत्यंत वरिश्ठ डाॅक्टर है। 

लीडर प्रेस सुविख्यात उद्योगपति घनश्याम दास बिरला का था तथा उतना विशाल परिसर देश के किसी समाचारपत्र के पास नहीं था। उसमें पत्रकारों के लिए आवासीय बंगले भी बने हुए थे। उस समय मेरा दिल्ली, मुम्बई व अन्य महत्वपूर्ण नगरों में प्रायः जाना होता था तथा सभी जगह अखबारों में पत्रकारों व सम्पादकों से मेरी घनिष्ठता थी। जितने अधिक योग्य पत्रकार ‘भारत’ में थे, उतने कहीं भी नहीं थे। हेरम्ब मिश्र, कुसुम कुलश्रेष्ठ, कृष्ण बिहारी श्रीवास्तव पत्रकारिता के बेजोड़ रत्न थे। वहां विश्वम्भर नाथ जिज्जा थे, जो पत्रकारिता ही नहीं, पुरानी राजनीतिक गतिविधियों के भी जीवंत इतिहास थे। हिन्दी की पहली कहानी उन्होंने लिखी थी। जब मैं ‘भारत’ परिवार में षामिल हुआ, जिज्जा जी 75 वर्ष के थे तथा स्वभाव के बड़े कड़क थे। मजाल नहीं था कि कोई नया पत्रकार टेलीप्रिंटर छू ले। लेकिन ‘भारत’ में अधिकांश पत्रकार घोर अर्थाभाव में थे। मैं सम्पन्न परिवार का था, इसलिए उस गरीबी को देखकर दहल गया था। उस समय अधिकांश समाचार ‘पीटीआई’ व ‘यूएनआई’ से टेलीप्रिंटर पर अंग्रेजी में आते थे। ‘हिन्दुस्थान समाचार’ व ‘नाफेन’ आदि समाचार हिन्दी में भेजते थे, किन्तु उनकी मात्रा नगण्य थी। सम्पादकीय मेज पर हर पत्रकार को नित्य अंग्रेजी से हिन्दी में चार काॅलम समाचार अनुवाद करना होता था। 

‘भारत’ में अधिकांश सहयोगी कठोर परिश्रमी थे। सामान्य ड्यूटी में कठिन परिश्रम करने के बाद आर्थिक लाभ के लिए वे ‘डबल ड्यूटी’ किया करते थे। जब मैं वहां नया था तो एक दिन मेरे वरिष्ठ सहयोगी गणेश भारती मुझे अनुवाद के लिए थोक में समाचार देते जा रहे थे। मैं बोल पड़ा कि इतनी मेहनत करने पर मर जाऊंगा तो भारती जी ने उत्तर दिया-‘मेहनत करने से कोई नहीं मरता’। उनका वह वाक्य मैंने आत्मसात कर लिया और अस्वस्थता में भी जब तक बिलकुल मजबूर न हो जाऊं, मैं सारे कार्य पूर्ववत करता रहता हूं। पत्रकारिता में मेरी लगन, परिश्रम एवं समर्पण का ही फल है कि मुझे निकट से जानने वाले जो थोड़े लोग बचे हैं, वे आज भी मेरे योगदान को अद्भुत मानते हैं और भूरि-भूरि सराहना करते हैं। मैं हमेशा जनजीवन से निकट रूप में जुड़ा रहा, इसीलिए आम जनता में मुझे सदैव भरपूर सराहना मिली तथा मेरी छप्पन-वर्षीय पत्रकारिता में वही सराहना मेरा सबसे बड़ा सम्मान सिद्ध हुई।

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