मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

बुलंद मस्जिद कब्रिस्तान में सौंदर्यकरण का कार्य का शुभांरभ

-निगम पार्षद तुलसी गांधी के अथक प्रयास से शुरू हुआ कार्य
-इसमें होने वाले मुख्य कार्य कब्रिस्तान में मिट्टी का पड़ना, वजूखाना, चलने के लिए फुटपाथ, पानी की बोरिंग, कमरा आदि।

मो. रियाज़


नई दिल्ली। धर्मपुरा वार्ड 233 की निगम पार्षद तुलसी गांधी के अथक प्रयासों से वार्ड में रोजाना कुछ न कुछ कार्य हो रहे हैं। जिसमें एक नया कार्य ओर जुड़ गया जो पूरे वार्ड के लिए बहुत जरूरी था और इसके लिए निगम पार्षद काफी समय से प्रयास कर रही थीं। यह कार्य हुआ बुलंद मस्जिद कालोनी के कब्रिस्तान में। श्रीमती तुलसी गांधी ने इस कब्रिस्तान के सौंदर्यकरण के लिए काफी मेहनत की है जिससे वार्ड में हो रही परेशानी खत्म हो सके। निगम पार्षद तुलसी गांधी ने प्रयास करके पूर्वी दिल्ली नगर निगम द्धारा बुलंद मस्जिद कब्रिस्तान में दीवार को ऊंचा करने, वजू खाना बनवाने, फुटपाथ का कार्य, पानी के लिए बोरिंग करवाने, बिजली मीटर लगवाने, मिटटी डलवाना, कमरा बनवाने आदि के कार्य शुरू करवाने को मंजूरी ली और जनता को नए साल का तोहफा दिया।
कब्रिस्तान के सौंदर्यकरण के शुभारंभ के अवसर पर श्री अरविंदर सिंह लवली जी पूर्व अध्यक्ष दिल्ली प्रदेश कांग्रेस व पूर्व मंत्री (दिल्ली सरकार) ने निगम पार्षद श्रीमती तुलसी गांधी व क्षेत्र की जनता के साथ कब्रिस्तान का कार्य शुरू करवाया एवं क्षेत्र का दौरा किया। क्षेत्र का दौरा करने के बाद गरीबों को कम्बल बांटे गए। कब्रिस्तान का कार्य शुरू करने के लिए क्षेत्र की जनता ने श्री अरविंदर सिंह लवली और निगम पार्षद श्रीमती तुलसी गांधी का धन्यवाद किया। इस मौके पर समाजसेवक डी.के.गाँधी, ब्लाक अध्यक्ष अशोक शर्मा, हाजी अनीस, हारून भाई, हाजी समीर, राजेश शर्मा, जमील भाई, बाबा शेर खान, जाहिद ऑटो, नसीम अलबी, शबाब अहमद, मेहरुद्दीन भाई, निशार भाई, अली शेर, नसीम आदि लोग शामिल हुए।



 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

बिना शुल्क गेहूं आयात पर विवाद

 

अवधेश कुमार

केन्द्र सरकार पर इस बात को लेकर तीखा हमला हो रहा है कि उसने गेहूं से आयात शुल्क पूरी तरह खत्म क्यों कर दिया। वैसे इससे पहले सितंबर महीने में ही सरकार ने गेहूं के आयात पर लगने वाले शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया थां तब भी इसका विरोध हुआ था। अब 8 दिसंबर से उस 10 प्रतिशत को भी खत्म कर दिया गया है। इस समय जबकि केन्द्र सरकार पर नोट वापसी को लेकर चारों तरफ से विपक्ष हमला कर रहा है एवं उसे धनपतियों के समर्थक सरकार कह रहा है इस निर्णय को भी उससे जोड़ दिया गया है। कहा जा रहा है कि यह निर्णय किसान विरोधी है। यदि विदेश से बिना शुल्क यानी सस्ते गेहूं आएंगे हमारे देश में जो पैदावार होगी उसे कौन खरीदेगा। चूंकि उत्तर प्रदेश एवं पंजाब में आगामी कुछ महीनों मेें चुनाव होने वाले हैं, और ये दोनों प्रदेश सबसे ज्यादा गेहूं उत्पादन करने वाले राज्य है, इसलिए वहां भाजपा विरोधी पार्टियां इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहीं हैं। दोनों राज्यों में बहुमत किसानों और कृषि पर निर्भर रहने वालों का है। उत्तर प्रदेश में 76 प्रतिशत तथा पंजाब में 63 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। इसलिए भाजपा विरोधी पार्टियों को लगता है कि इसे मुद्दा बनाकर वे बहुमत जनता का समर्थन पा लंेगे। प्रश्न है कि क्या वही सही है जो विपक्ष कह रहा है या सच्चाई इसके अलावा भी है?

ऐसा नहीं है कि सरकार को यह निर्णय करते वक्त इस बात का अहसास नहीं था कि इसका विरोध होगा तथा चुनाव में उसे जनता के बीच विपक्ष के आरोपों का जवाब देना होगा। बावजूद इसके यदि उसने यह निर्णय किया है तो इसके कुछ ठोस कारण होंगे। दरअसल, यह विषय ऐसा है जिसे संतुलित होकर समझने तथा राजनीतिक पार्टियों के वक्तव्यों से अलग होकर विचार करने की आवश्यकता है। एक तर्क यह है कि जब देश में 2015-16 में 9 करोड़ 35 लाख टन के गेहूं का पैदावार हुआ तो फिर गेहूं की किल्लत का सवाल कहां से पैदा हो गया कि सरकार ने शुल्क मुक्त आयात का निर्णय लिया? ध्यान रखिए कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2014-15 में गेहूं की पैदावार 8 करोड़ 65 लाख 30 हजार टन ही हुआ था। इसके अनुसार 2015-16 में गेहू ज्यादा पैदाा हुई। तो फिर ऐसा क्यों? यही नहीं यह भी माना जा रहा है कि किसानों ने अब तक 2 करोड़ 21 लाख 63 हजार हेक्टेयर में गेहूं की बुवाई कर दिया है। यह पिछले साल के 2 करोड़ 2 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है। यानी अगर बुवाई ज्यादा है तो फिर पैदावार भी ज्यादा होगी। इसमें सरकार के सामने ऐसी क्या मजबूरी हो गई कि उसे आयात को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता महसूस हुइ? तो यह है एक पक्ष और इसके आधार पर सरकार का निर्णय अतार्किक लग सकता है। एक हद तक किसान विरोधी भी। विपक्ष इसे ही अपने तरीके से उछाल रहा है।

अब जरा दूसरे पक्ष को भी देखिए। कई विश्वसनीय हलकों से 9 करोड़ 35 लाख टन पैदावार के आंकड़े पर प्रश्न उठाए गए। इन पक्षों का कहना है कि गेहूं की पैदावार 8 करोड़ से 8.5 करोड़ टन के बीच ही हुई। खासकर गेहूं कि व्यापार से जुड़े वर्ग ने यही आंकड़ा दिया। हम इन दोनों दावों के बीच की सच्चाई का पता नहीं कर सकते। लेकिन कुछ बातें तो सच है। मसलन, भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में 9 दिसंबर के आंकड़ोें के अनुसार 1 करोड़ 65 लाख टन ही गेहूं का भंडार पड़ा है। पिछले वर्ष इस समय 2 करोड़ 68 लाख 80 हजार टन था। इस तरह जिसे अंग्रेजी में बफर स्टॉक कहते हैं उसमें 1 करोड़ टन से ज्यादा की कमी है। यह पिछले नौ साल की सबसे बड़ी कमी है। जाहिर है, यह सामान्य स्थिति नहीं है। इतना कम भंडार तो होना ही नहीं चाहिए था। वैसे सरकार को इसका जवाब तो देना चाहिए कि इतना कम भंडार क्यों है? लेकिन जो है वो हमारे सामने है और उसके आलोक में ही विचार करना होगा। तत्काल अपने देश के अंदर के गेहूं से इसकी भरपाई की कोई संभावना नहीं है। जब गेहूं पर आयात शुल्क था तब भी आयात हो रहा था। आटा मीलों ने सरकार से आयात शुल्क हटाने की मांग की थी, क्योंकि उनके यहां पर्याप्त गेहूं आ नहीं रहा था। यह सच है कि पिछले कुछ दिनों में बाजार में गेहूं एव आटा दोनों के दामों में बढ़ोत्तरी हुई है और यह जारी है। ऐसे में कोई भी सरकार करे तो क्या करे? उसके सामने आगे कुंआ एवं पीछे खाई वाली स्थिति होती है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि सरकार ने गेहूं की बाजार में पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित कर इसके मूल्य को नियंत्रित करने को प्राथमिकता दिया है। आखिर जो वर्ग खरीदकर खाता है उसका ध्यान रखना भी सरकार का दायित्व है। जब दाम बढ़ेंगे तो लोग चिल्लाएंगे कि देखो किस तरह गेहूं और आटे के दाम बढ़ गए और सरकार ने कुछ नहीं किया। दालों के दामों पर मचे हंगामे हमारे सामने है। राजधानी दिल्ली में ही 24 रुपए किलो गेहूं मिल रहे हैं। तो उन करोड़ों उपभोक्ताओं के हित को भी ध्यान मंे रखना आवश्यक था। बिना आयात संभव नहीं था। गेहूं के आयात का अर्थ है कि इसकी उपलब्धता में कमी नहीं होगी तथा सरकार इसके मूल्य को नियंत्रित रख सकती है। गेहूं के आयात का मूल्य 210 से 215 डॉलर प्रति टन है। इस तरह जब ये बाजार में आ जाएंगे तो माना जा रहा है कि सरकार ने गेहंूं का जो न्यूनतम मूल्य 1625 रुपए क्विंटन घोषित किया हुआ है उससे भी जगह-जगह 50 रुपए से 200 रुपए प्रति क्विंटल तक की कमी आ सकती है। यह बहुत बड़ी कमी होगी और उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी। दूसरे, यह शुल्क रहित व्यवस्था स्थायी रुप से नहीं है। अभी इसे 29 फरबरी 2017 तक के लिए किया गया है। मार्च तक नई फसल आ जाने का अनुमान है। करीब 35 लाख टन गेहूं के आयात का सौदा अभी तक हुआ है। इससे ज्यादा की तत्काल संभावना नहीं दिखती है, क्योंकि कालासागर से कुछ समय बाद आवागमन संभव नहीं होगा। हो सकता है इतने आयात के बाद सरकार फिर से शुल्क लगा दे। अगर हमारे यहां पैदावार बेहतर होता है और बाजार में न्यायसंगत मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में गेहूं उपलब्ध रहता है तो फिर सरकार क्यों शुल्क रहित आयात करवाएगी? उसे पागल कुत्ते ने तो काटा नहीं है कि ऐसा करके राजनीतिक जोखिम मोल ले। आखिर इसी सरकार ने पहले गेहूं पर आयात शुल्क बढ़ाया था जो कि 31 मार्च 2016 तक के लिए था, फिर इसे 30 जून तक किया गया और यह सितंबर तक जारी रहा।

 सरकार ने गेहूं का जो न्यूनतम मूल्य घोषित किया हुआ है वह तो जारी रहने ही वाला है। तो किसानों का पैदावार केन्द्र एवं राज्य सरकारें दोनों खरीदकर अपना भंडारण करेंगी। निजी व्यापारी भी इससे कम पर न खरीद पाएं इसकी व्यवस्था अवश्य राज्य सरकारों को करना चाहिए। किंतु यह माना जा रहा है कि इस बार ठंढी कम होगी एवं गरमी के कारण गेहूं जितना पैदा होना चाहिए संभवतः नहीं होगा। इस समय हम आप निश्चयात्मक तौर पर कुछ नहीं कह सकते, पर यदि ऐसी बातें विशेषज्ञों की ओर से कही जा रही है तो इसका संज्ञान लेना ही होगा। मौसम विभाग ने कम ठंढ की भविष्यवाणी तो कर दिया है। जाहिर है, सरकार का निर्णय इन सारे कारणों और तथ्यों को एक साथ मिलाकर देखने से तार्किक एवं आवश्यक लगता है। हां, सरकार का फोकस पैदावार एवं किसान हों ताकि बार-बार ऐसा करने को विवश न होना पड़े। उम्मीद है सरकार ऐसा ही करेगी।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज न घटाना अस्वाभाविक नहीं

 

अवधेश कुमार

भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से नीतिगत दरों में कोई बदलाव न करने से कई हलकों में निराशा व्यक्त की गई है। ज्यादातर अर्थवेत्ता यह अनुमान लगा रहे थे कि नोट वापसी के बाद बैंकों के पास आए भारी नकदी के बाद रिजर्व बैंक कम से कम रेपो दर में .25 प्रतिशत की कमी करेगा। यानी ब्याज दरों में कटौती का जो सिलसिला पूर्व गर्वनर के कार्यकाल में जारी हुआ और स्वयं उर्जित पटेल ने पिछली मौद्रिक समीक्षा में जारी रखा वह आगे भी कायम रहेगा। ध्यान रखिए कि पिछले अक्टूबर में रिजर्व बैंक ने रेपो दर में .25 प्रतिशत की कमी की थी। गवर्नर बनने के बाद पटेल की यह दूसरी और नोटबंदी के बाद पहली मौद्रिक नीति समीक्षा थी। प्रश्न उठता है कि इस बार ऐसा क्यों नहीं किया? यह प्रश्न इसलिए क्योंकि पिछले तीन महीने में अर्थव्यवस्था में सुधार का ठोस संकेत नहीं मिलने और साथ ही नोटवापसी से कई उद्योगों में मांग में भारी कमी की आशंका को देखते हुए सभी मानकर चल रहे थे कि रेपो रेट में कमी होगी। नोट वापसी से आर्थिक गतिविधियों में जो सुस्ती दिख रही है उसको गति देने के लिए कई कदम उठाने की जरुरत है। माना जा रहा था कि अगर केन्द्रीय बैक ब्याज दर में कटौती करता है कि उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों को कम दर में कर्ज मिलेगा और इससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। जाहिर है, रिजर्व बैंक इस तर्क से सहमत नहीं था।

स्वयं उर्जित पटेल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि महंगाई की आशंका को देखते हुए ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि अक्टूबर में ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की कटौती की गई थी। उसके बाद कटौती की जरूरत नहीं रह गई थी। ध्यान रखने की बात है कि जनवरी 2015 से रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 7 बार कटौती की है। केन्द्रीय बैक ने कई बातें को ध्यान में रखा है। इनमें सबसे पहला और महत्वपूर्ण पहलू है महंगाई। इसने जनवरी-मार्च 2017 तक 5 प्रतिशत महंगाई दर का लक्ष्य रखा है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई 0.10-.015 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। खराब होने वाले सामानों के दाम घटेंगे। ऐसा लगता है कि छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) को महंगाई थामने की ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है। महंगाई की दर फिलहाल काफी हद तक काबू में है। लेकिन रिजर्व बैंंक का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि तथा 7वें वेतन आयोग के कारण लोगों के हाथ में आए पैसे की वजह से महंगाई की दर आने वाले महीनों में बढ़ सकती है।

क्रिसिल की ओर से हाल में जारी रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल के दाम 5 से 8 प्रतिशत तक तथा डीजल के 6 से 8 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं। यह ओपेक देशों की ओर से अगले महीने से होने वाली कच्चे तेल उत्पादन में कटौती के कदम की परिणति होगी। ऐसे में आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ने की आशंका गहरी है। रेपो दर को यथास्थिति में रखने के पीछे एक बड़ा कारण यह हो सकता है।  केंद्रीय बैंक ने इस बात पर ध्यान दिया कि गेहूं, चना और चीनी जैसी खाद्य वस्तुओं के दाम तेजी से चढ़ रहे हैं। ऐसे में दर कम करने से महंगाई में और अधिक वृद्धि हो सकती थी। इससे दिसंबर से फरवरी के दौरान परिस्थितियां विपरीत हो सकती थीं कोई भी केंद्रीय बैंक ब्याज दर में कमी पर तभी विचार करता है, जब उसे ऐसा लगे कि इस फैसले से उपभोग में इजाफा होगा और लोग कर्ज लेकर खर्च करेंगे। इसके अलावा वह ऐसा तब करता है, जब उसे लगे कि इससे निवेश का माहौल तैयार होगा। अभी दोनों स्थितियां नहीं थीं। अमेरिका में अगले सप्ताह ब्याज दरों पर महत्वपूर्ण फैसला हो सकता है। राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद यह माना जा रहा है कि ज्यादातर नीतियां महंगाई को बढ़ावा देने वाली होंगी। ऐसे में ब्याज दरों के बढ़ने की उम्मीद काफी सशक्त है। अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने पर भारत जैसे देशों से पूंजी का जाना तय है। इससे रुपए में दवाब देखने को मिलेगा। डॉलर के मुकाबले रुपया बीते एक महीने में काफी कमजोर हुआ है। ब्याज दरों में कटौती रुपए की कमजोरी को बढ़ा सकती थी। इस परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि  रुपए को समर्थन देने के लिए भी रेपो दर में कटौती नहीं की गई। केंद्रीय बैंक ने कहा भी है कि कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई ने रफ्तार पकड़ी है, जबकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं में यह धीमी रही है। अमेरिका, जापान और चीन जैसे देश विकास के लिए महंगाई को बढ़ाने वाली नीतियां अपना सकते हैं। इसके चलते उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों पर दबाव होगा, जो पहले से ही ब्रेग्जिट और अन्य राजनीतिक परिस्थितियों के चलते अस्थिरता के माहौल में हैं।

यहां यह भी विचारणीय है कि रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2016-17 में विकास का अनुमान भी 7.6 प्रतिशत से घटाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। यह महत्वपूर्ण है। विकास अनुमान में कमी के लिए उसने नोटवापसी को एक महत्वपूर्ण कारण माना है। मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए कहा गया है कि नोटबंदी से कई तरह की औद्योगिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। खासतौर पर खुदरा कारोबार, होटल, रेस्तरां, पर्यटन व कई असंगठित क्षेत्र से जुड़े उद्योगों पर इसका खराब असर पड़ेगा। इन पर विपरित असर पड़ने से विकास दर की गति आगे तो नहीं ही बढ़ेगी। यानी पीछे लौटेगी। किंतु राहत की बात है कि रिजर्व बैंक ने उन अनुमानों को नकार दिया है जिसमें विकास दर के एकदम पीछे जाने की आशंका व्यक्त की जा रही थी। अगर विकास दर पीछे हट रहा है तो उसे थामने के लिए ब्याज दर में कटौती भी एक कारगर नीति मानी जाती है। साफ है कि रिजर्व बैंक ने अन्य दूसरे कारणों से जिनका जिक्र उपर किया है ऐसा नहीं किया है। यानी महंगाई और अन्य कारणों को तरजीह दी है। वैसे भी नोट वापसी के परिणामों को देखने के लिए भी कुछ वक्त चाहिए। जिन क्षेत्रों पर विपरीत असर की बात रिजर्व बैंक मान रहा है उनके बारे में भी वह आगे दूसरी बातें कहता है।  रिजर्व बैंक  अपनी समीक्षा में कहता है कि उसको भरोसा है कि आने वाले दिनों में नए करंसी नोटों का सर्कुलेशन तेज होगा और लोग गैर नकदी आधारित भुगतान की ओर बढ़ेंगे।

दूसरे लोगों के अनुमानों सेे यह कदम भले विपरीत हो, पर वित्त मंत्रालय ने ब्याज दरों के मौजूदा स्तर को बनाए रखने के फैसले को साहसिक बताया है। आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव शक्तिकांत दास ने कहा कि वैश्विक स्तर पर काफी अनिश्चितता है, महंगाई बढ़ने के आसार हैं और इस पर लगाम लगाना मुश्किल है। ऐसे में रिजर्व बैंक का कदम सही है। अगर यहां भी अनिश्चितता रहती तो विदेशी निवेशकों को यह अच्छा संकेत नहीं देता। वैसे यह सच है कि नोटवापसी के फैसले के बाद बैंकों में भारी मात्रा में नकदी जमा की गई है। यानी बैंकों के सामने नकदी का संकट नहीं होना चाहिए। बैंक अपनी जमाओं में से आसानी से कर्ज बांट सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि रेपो दर में कमी करने या न करने से नकदी की उपलब्धता पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। इसीलिए ब्याज दरों में कोई राहत नहीं दी है। जब बैंकों के पास तरलता (फंड) का कोई अभाव ही नहीं है और मांग की भी बेहद कमी है तो ऐसा करना व्यर्थ ही होता।  दूसरे, एक सच यह भी है कि रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों को घटाने के पहले जो उपाय किए हैं, उनका फायदा अभी तक बैंकों ने आम जनता को नहीं दिया है। रिजर्व बैंक अगर ब्याज दरों में कटौती करता है तो बैंकों के ऊपर कर्ज की दर घटाने का दवाब बढ़ता है। साथ ही कर्ज की दर घटने पर अपने मुनाफे को बचाने के लिए बैंक जमाओं पर दर को घटाते हैं। रिजर्व बैंक नहीं चाहता था कि जमाकर्ताओं की जमाओं पर ब्याज दर में अभी कमी आए।

वैसे रिजर्व बैंक ने रेपो दर में भले कटौती न की हो लेकिन बैंकों के लिए 100 प्रतिशत इन्क्रीमेंटल (बढ़ी हुई) सीआरआर यानी नकदी आरक्षी अनुपात की सीमा को हटा दिया है। अब बैंकों को अपने यहां होने वाले जमा के अनुपात में पूरी रकम नकद आरक्षी अनुपात के रूप में सुरक्षित नहीं रखनी पड़ेगी। रिजर्व बैंक का यह कदम बैंकों में नकदी को बढ़ाएगा। रिजर्व बैंक ने 26 नवंबर को बैंकों में बढ़ती तरलता को नियंत्रित करने के लिए 100 प्रतिशत इन्क्रीमेंटल सीआरआर की सीमा तय की थी। तो रिजर्व बैंक ने 100 प्रतिशत सीआरआर को वापस लेकर बैंकोें को बड़ी राहत दी है। गर्वनर ने कहा भी कि अब बैंक पर अब सीआरआर का कोई बोझ नहीं होगा। उम्मीद करनी चाहिए कि बैंकों पर इसके सकारात्मक प्रभाव होंगे।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

 

 

 

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख से उम्मीदें

 

अवधेश कुमार

तो सारे कयासों पर विराम लग गया। पाकिस्तान में जनरल राहील शरीफ को सेवानिवृत्ति मिल गई एवं लेफ्टिनेंट जनरल कमर जावेद बाजवा को उनकी जगह नया थल सेना प्रमुख नियुक्त कर दिया गया। अपने तीन कार्यकाल में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पांचवे थल सेना अध्यक्ष को नियुक्त किया है। निश्चय ही उनको सेना प्रमुख बनाने के पहले नवाज शरीफ ने हर पहलू पर गंभीरता से विचार विमर्श किया होगा। आखिर जनरल जहांगीर करामात की जगह जनरल परवेज मुखर्रफ को उन्होंने ही नियुक्त किया था और उसके बाद क्या हुआ यह हम सबको पता है। वहां तख्ता पलट हुआ, शरीफ को सपरिवार निर्वासित जीवन तक व्यतित करना पड़ा। वे उसे दुःस्वप्नों की तरह भूल जाना चाहेंगे। उसकी पुनरावृत्ति न हो इसके लिए वे पूरी तरह सतर्क होंगे। हालांकि जनरल महमूद हयात का नाम बाजवा से उपर चल रहा था लेकिन नवाज शरीफ ने बाजवा का चयन किया और जनरल हयात को ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी का चेयरमैन बनाया गया। तो यहां दो प्रश्न हमारे सामने उठते हैं। एक कि  जिस तरह से सेना प्रमुख के रुप में आसानी से राहिल शरीफ सेवानिवृत्त हो गए और उनकी जगह नए सेना प्रमुख आ गए उसका पाकिस्तान के लिए क्या अर्थ है। दूसरे, भारत के लिए उसके क्या मायने हैं? आखिर भारत के साथ वो किस तरह के रिश्ते चाहेंगे?

दूसरा प्रश्न हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी नियुक्ति ऐसे समय हुई जब नियंत्रण रेखा एवं सीमा पर पाकिस्तान की ओर से लगातार युद्ध विराम का उल्लंघन हो रहा है तथा दोनों ओर से गोलीबारी जारी है। पूरी स्थिति ऐसी है कि कब क्या हो जाए कोई नहीं कह सकता। पाकिस्तान ने राहिल शरीफ के नेतृत्व में इस वर्ष 270 बार से ज्यादा युद्ध विराम का उल्लंघन किया है। क्या जनरल बाजवा उस नीति को आगे बढ़ाएंगे या फिर उसमें बदलाव करेंगे? वस्तुतः पाकिस्तान में जैसा हम जानते हैं सेना एक ऐसी संस्था है जिसकी विदेश नीति में प्रभावी भूमिका होती है और खासकर भारत से संबंधित नीतियों में। भारत की तरह वहां सेना केवल राजनीतिक नेतृत्व की नीतियों का पालन नहीं करती। कई बार राजनीतिक नेतृत्व को सेना की सोच के अनुसार भी काम करना पड़ता है। तो बाजवा क्या करेंगे? कई विश्लेषक उनके एक वक्तव्य को उद्धृत करते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान के लिए आंतरिक आतंकवाद भारत से बड़ा खतरा है। वैसे भी पाकिस्तानी सेना जानती है कि भारत अपनी ओर से कभी आक्रमण नहीं करने वाला, युद्ध नहीं थोपने वाला। इसलिए उनका बयान व्यावहारिक था।

सेना प्रमुख बनने के बाद केवल व्यक्तिगत सोच का महत्व नहीं होता, सेना के मुख्यालय की सोच और नीति को आगे बढ़ाना होता है। सेना के मुख्यालय की सोच भारत विरोध की रही है। राहिल शरीफ ने अपने सेवानिवृत्त होने के पहले यह धमकी दी कि अगर पाकिस्तान ने सर्जिकल स्ट्राइक किया तो भारत की पीढ़ियां याद करेंगी और उन्हें पढ़ाया जाएगा कि सर्जिकल स्ट्राइक क्या होता है। बाजवा इस नीति से पीछे हट जाएंगे कहना कठिन है। जब नवाज शरीफ प्रधानमंत्री बने थे उनकी नीति भारत सहित पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बनाने की थी। किंतु समय बीतने के साथ उनको नीतियां बदलनी पड़ी या वे बदलने को मजबूर हो गए। जब पूर्व सेना प्रमुख जनरल अश्फाक कयानी ने दोबारा अपने सेवा विस्तार से इन्कार कर दिया तो राहिल शरीफ पहली पसंद नहीं थे लेकिन वे बने और उनके कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय वजीरीस्तान में जर्बे अज्ब ऑपरेशन चलाना था जो पाकिस्तान में हिंसा फैला रहे आतंकवादियों के खिलाफ था विशेषकर तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान और उसके सहयोगियों के खिलाफ। जून 2014 में उत्तरी वजीरिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ चलाए गए इस ऑपरेशन के बाद राहिल के उन आलोचकों का मुंह बंद हो गया जो कहते थे कि उनमंे काबिलियत नहीं है। कराची में आतंकवादियों के खिलाफ एक्शन लेने और शांति कायम करने में भी राहिल शरीफ की भूमिका अहम रही है। लेकिन जो कुछ कयास लगाए गए कि वे नवाज शरीफ पर अपनी नीतियां आरोपित करते हैं उनके पक्ष में ज्यादा प्रमाण नहीं आए। माना जाता है कि बाहर जो भी छवि बनी हो राहिल पूरे कार्यकाल में सरकार के समर्थक के रूप में बने रहे। सरकार की विदेश और सुरक्षा नीति में कभी भी राहिल शरीफ का बड़ा हस्तक्षेप नहीं रहा। ने वे उस पर कभी कुछ सार्वजनिक रुप से बोलते थे। यही कारण था कि वो सोशल मीडिया में कभी भी ज्यादा लोकप्रिय नहीं रहे।

वास्तव में जिस तरह से शांतिपूर्वक पद का स्थानांतरण हुआ उसमें राहिल शरीफ की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुछ समय के लिए यह मानना होगा कि जनरल कयानी और फिर जनरल शरीफ दोनों का जाना पाकिस्तान में लोकतंत्र के सफलता की पटरी पर चलने का संकेत है। जनरल शरीफ पिछले 20 साल में निर्धारित सेवाकाल के बाद अवकाश ग्रहण करने वाले पहले सेना प्रमुख हैं। भविष्य का कुछ नहीं कह सकते लेकिन अभी इसका यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है। अगर वाकई वहां लोकतंत्र मजबूत होता है और सेना का प्रभाव थोड़ा कम होता है तो यह पूरे क्षेत्र के हित में होगा। किंतु ज्यादा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। भारत के संदर्भ में तो कतई नहीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिसंबर 2015 में लाहौर गए जहां से वे नवाज शरीफ के घर तक गए लेकिन पठानकोट हो गया और पूरा माहौल मिनट में मटियामेट। ऐसा आगे भी हो सकता है। कमर बाजवा की नियुक्ति किन कारणों से हुई है? वह अभी ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट के इंस्पेक्टर जनरल थे। राहिल शरीफ भी आर्मी चीफ बनने से पहले इस पर पर रह चुके थे। कमर बाजवा को कश्मीर और उत्तरी इलाकों के मसलों की गहरी समझ है। कश्मीर मुद्दे को लेकर उनको खासा अनुभव है। बलोच रेजिमेंट का होेने की वजह से उत्तरी इलाके की समस्याओं के बारे मंे भी उनका व्यावहारिक अनुभव है। जाहिर है वहां के विद्रोह से निपटने में उनकी समझ का परीक्षण होगा। बाजवा ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण कॉर्प-10 का भी नेतृत्व किया है। कॉर्प 10 सेना का वो हिस्सा है जो भारत से सटे सीमा पर और नियंत्रण रेखा पर तैनात रहता है। बाजवा गिलगित और बालिस्टान में फोर्स कमांडर की पोस्ट पर भी रह चुके हैं। बलोच रेजीमेंट से पाकिस्तान को पहले भी 3 सेना प्रमुख (जन. याहया खान, जन. असलम बेग और जन. अशफाक परवेज कयानी) मिल चुके हैं। कहने का तात्पर्य यह कि अगर कश्मीर और बलूचिस्तान का अनुभव उनके सेना प्रमुख बनाए जाने का कारण है तो फिर इसका निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है। इन दोनों मामलों पर भारत की नीतियां स्पष्ट हैं।

हमारे पूर्व सेना प्रमुख जनरल विक्रम सिंह कांगों में शांति मिशन के दौरान बाजवा के साथ काम कर चुके है। उन्होंने उन्हें प्रोफेशनल सैनिक कहा है। साथ ही यह भी कहा है कि देश के अंदर आने पर प्राथमिकताएं बदल जातीं हैं। इसलिए कांगो मिशन के आधार पर हम निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। उन्होंने कहा कि हमें बाजवा और उनके दृष्टिकोण के प्रति सतर्क रहने और निगाह बनाए रखने की जरूरत है। वास्तव में बलूच और कश्मीर दोनों पर कोई सेना प्रमुख पाकिस्तान की परंपरागत नीतियों से बाहर नहीं निकल सकता। इसलिए जनरल बाजवा से भी हम तत्काल ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते। हालांकि अगर वो जेहादी ताकतों को पाकिस्तान के लिए खतरा मानते हैं तो उनकी नीतियां बदलनी चाहिए। लेकिन कश्मीर में सक्रिय जेहादी तत्वों को पाकिस्तानी मुजाहिद मानते हैं। क्या बाजवा की सोच इससे अलग होगी? क्या कश्मीर की नियंत्रण रेखा पर काम करते हुए या गिलगित बलतिस्तान में सेवाएं देते हुए उनकी सोच थोड़ी अलग थी? ऐसा था नहीं तो फिर हम तत्काल यह क्यों मान लें उनके आने से स्थितियां बदल जाएंगी? पाकस्तानी सेना भारत को दुश्मन देश मानकर काम करती है। उसका बहुत साफ लक्ष्य है भारत को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाना। जनरल बाजवा इसमें आमूल बदलाव ले आएंगे ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। एक ओर बाजवा ने पद भार ग्रहण किया और दूसरी ओर जम्मू कश्मीर में एक जगह नगरोटा में सेना पर हमले हुए जिसमें दो जवाब शहीद हुए तथा दूसरी जगह सांबा में सीमा सुरक्षा बल पर आतंकवादियों ने हमला किया। हालांकि बाजवा ने कहा कि नियंत्रण रेखा पर हालात सुधरेंगे। देखना है वे क्या करते हैं। स्वयं पाकिस्तान के हित में यही है कि युद्ध विराम का वह पालन करे तथा आतंकवादियों का निर्यात करना बंद करे। युद्ध विराम के उल्लंघन से पाकिस्तान को अब ज्यादा क्षति हो रही है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

हां, पाक अधिकृत कश्मीर हमारे बाप का है

 

अवधेश कुमार

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला के इस बयान से देश में आक्रोश फैला हुआ है कि पाक अधिकृत कश्मीर उनके बाप का है क्या? यह बयान पूरे देश को चुभ गया है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता अगर पूरे कश्मीर को आजाद या पाकिस्तान का भाग मानते हैं तो यह सहन किया जाता है। देश मान चुका है कि वे भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक हैं। लेकिन फारुख अब्दुल्ला कश्मीर की मुख्य धारा के राजनीतिज्ञ हैं। पहले उनके पिता वहां के मुख्यमंत्री थे। बाद में वे बने और फिर उनका बेटा। वे और उनके पुत्र दोनांे केन्द्र में मंत्री रह चुके हैं। ऐसे नेता के मुंह से यह बयान अचंभित करने वाला है। उनसे यह पूछा जाए कि अगर पाक के कब्जे वाला कश्मीर हमारे बाप का नहीं है तो फिर किसके बाप का है? फारुख क्यों भूल गए कि जिस संसद के वे सदस्य रहे हैं उसने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया है कि पाक के कब्जे वाले पाकिस्तान भारत का भाग है और इसमें सम्मिलित करना है। इस तरह फारुख का बयान संसद के प्रस्ताव के भी विरुद्ध है।

फारुख अब्दुल्ला कोई नौसिखिए नेता नहीं हैं कि मान लिया जाए उनके मुंह से अचानक कुछ निकल गया हो या आक्रोश में वे बोल गए हैं। वे उम्र के इस पड़ाव में हैं जहां ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती है। वैसे भी इस भाषण के बाद उन्होंने बयान पर कायम होने की बात कही है। जाहिर है, उन्होंने सोच-समझकर ऐसा बोला है। वर्तमान सरकार ने केवल इतना किया है कि जो संसद का प्रस्ताव है उसके अनुसार उसने काम करने का बयान दिया है। यह पहली बार हुआ है कि जब भारत की किसी सरकार ने पाकिस्तान से कहा है कि आपके कब्जे में हमारे कश्मीर का जो भाग है उसे आप कब खाली कर रहे हैं। अब यह भारत सरकार की नीति है कि पाक अधिकृत कश्मीर, जिसमें गिलगित बलतिस्तान भी शामिल है, के लोगों से संपर्क किया जाए, विदेशों में जो भी वहां के लोग रहते हैं उनके साथ संवाद बनाया जाए तथा उनको संगठित कर उनकी पाकिस्तान से अलग होने की लड़ाई को ताकत दिया जाए। गिलगित बलतिस्तान में पिछले वर्ष जब चुनाव कराए गए तब भी भारत ने पुरजोर विरोध दर्ज कराया। भारत का कहना था कि यह क्षेत्र पाकिस्तान का है ही नही ंतो फिर वह चुनाव क्यों करा रहा है।

यह पाकिस्तान की कश्मीर को अलग करने तथा वहां हिंसा फैलाकर भारत को परेशान करने की नीति का जवाब है। हम उनकी तरह आतंकवाद तो पैदा कर नहीं सकते, लेकिन हम केवल अपने भाग वाले कश्मीर तक उनकी दुर्नीतियों का सामाना करें, उसके परिणामों को भुगतें इससे अच्छा है कि हम उस पार के कश्मीर में भी जितना संभव है करें और उसे मुद्दा बनाएं। अगर पाकिस्तान के लिए इस पार का कश्मीर मुद्दा है तो हमारे लिए उस पार का कश्मीर। पाकिस्तान को जवाब देना का यही सर्वथा उचित तरीका है। हम केवल जवाब दें उसकी बजाय पाकिस्तान को जवाब देने के लिए विवश करें। फारुख का बयान भारत की इस नीति के विरुद्ध है। कश्मीर यदि पाकिस्तान की नजर में तथा फारुख अब्दुल्ला की नजर में विवादास्पद क्षेत्र है तो उसमेें पाक अधिकृत कश्मीर भी शामिल है। फिर यह विवादास्पद इसलिए है क्योंकि जब अक्टूबर 1947 में कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत में कश्मीर के विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिया तो पाकिस्तान ने हड़पने की कोशिश की। उस समय भी इसका फैसला हो गया होता। अगर उस समय के नेताओं ने भावुकता से काम नहीं लिया होता तो आज पाक अधिकृत कश्मीर होता ही नहीं। क्या फारुख अब्दुल्ला इस सच को नहीं जानते कि पाकिस्तान ने कबाइलियों के माध्यम से कश्मीर को कब्जाने की कोशिश की थी और उसमें उसे सफलता नहीं मिली? हम यहां उस इतिहास में नहीं जाना चाहते। यह सच सबको पता है कि आज जो पाक अधिकृत कश्मीर है वह इसलिए है, क्योंकि हमने संयुक्त राष्ट्र संघ को बीच में ला दिया।

यह भारत का दुर्भाग्य है कि यहां फारुख अब्दुल्ला जैसे नेता हैं जो ऐसे बयान देकर अपना ही पक्ष कमजोर करने की कोशिश करते हैं। उनके बयान को पाकिस्तान की मीडिया ने जितना महत्व दिया वह स्वाभाविक है। पाकिस्तान कह रहा है कि कश्मीर पर भारत की नीति पर देश में मतभेद है। इससे दुनिया में भी यह संदेश जाता है कि कश्मीर को लेकर भारत मंें ही एक राय नहीं है। उनको लगता है कि प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा हुआ कोई व्यक्ति इस तरह पाक अधिकृत कश्मीर पर भारत के दावे को नहीं मानता तो हम क्यों मानें। विश्व समुदाय के सामने यह सच तो नहीं है कि फारुख के ऐेसे वक्तव्य पर देश की आम जनता का रुख क्या है।

यह विचार करने वाली बात है कि आखिर फारुख ने इस तरह का वक्तव्य क्यों दिया? उन्हें पता था कि इसके खिलाफ देश में व्यापक प्रतिक्रिया होगी। उन्हें यह भी पता था कि कश्मीर के पाकपरस्त अलगाववादियों को छोड़कर कहीं से उनको समर्थन नहीं मिलने वाला। यह सब जानते हुए उन्होंने यदि बयान दिया है तो इसके कुछ तो कारण होंगे? तो क्या हो सकते हैं वे कारण? क्या सत्ता से बाहर होने के बाद नेशनल कॉन्फ्रंेस का आत्मविश्वास डोल गया है? उसे लगता है कि उसका जन समर्थन धीरे-धीरे छीज रहा है और उसे वापस लाने के लिए ऐसी बातें बोलना जरुरी है? यह हो सकता है। क्या उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस को सुर्खियों में लाने के लिए ऐसा बोला? क्या कश्मीर में बढ़ते इस्लामिक कट्टरता के सामने यह फारुख अब्दुल्ला जैसे नेताओं का आत्मसमर्पण हैं? ये तीनों कारण हो सकते हैं। कश्मीर के अनेक नेताओं का रवैया दोहरा रहा है। वो दिल्ली में कुछ बोलते हैं तथा घाटी में कुछ। हालांकि अब मीडिया की कृपा से उनकी कोई बात छिपी नहीं रहती। इस कारण उनके लिए जवाब देना कठिन हो जाता है। 

फारुख की बात मानी जाए तो पाक अधिकृत कश्मीर पर हमारा दावा बनता ही नहीं है। तो क्या वे बताएंगे कि पाकिस्तान का दावा कैसे बनता है? वे कहते हैं कि पाकिस्तान इसमें एक पक्ष है और आपको बात करनी होगी। देश की सरकार फारुख अब्दुल्ला के निर्देश में तो नीति निर्धारित नहीं कर सकती फिर भी मान लीजिए उनकी बात कुछ समय के लिए मान भी लिया जाए तो पाकिस्तान से क्या बातचीत होगी? कश्मीर मामले पर आज तक जो बातचीत हुई उसका नतीजा जो है सबके सामने है। फारुख अब्दुल्ला भूल गए कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के कारण उन्हें स्वयं प्रदेश छोड़ना पड़ा था। वे ंलंबे समय लंदन जाकर रहे। तो पाकिस्तान की नीति साफ है। आप बातचीत करिए या कुछ करिए उसको कश्मीर मुद्दे को सुलगाए रखना है और इसके लिए उसके पास रास्ता यह है कि आतंकवादियों को प्रशिक्षित करके सीमा पार कराते रहो ताकि हिंसा के द्वारा वे कश्मीर को अस्थिर बनाने की कोशिश करते रहे। फारुख यह भी कहते हैं कि जो लोग लंबे समय से उस भाग में रह रहे हैं वो क्यों हमारे साथ आएंगे। विचित्र तर्क है। वो हमारे साथ आएंगे नहीं आएंगे इस पर तो विचार बात में होगा। पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के खिलाफ एक बड़े वर्ग के अंदर असंतोष है। वहां लोग तमाम दबावों और भय के बावजूद सड़कों पर उतर रहे हैं यह सच है। फारुख अब्दुल्ला को यह दिखाई नहीं देता तो कुछ नहीं किया जा सकता है। हमारी नीति साफ है। हम पाक अधिकृत कश्मीर पर अपने दावे को जोरशोर से उठाएंगे, वहां के पाकिस्तान से असंतुष्ट होकर संघर्ष करने वालों को मदद करेंगे, भारत के पक्ष में आने के लिए उन्हें प्रेरित करेंगे, पाकिस्तान की पकड़ वहां कमजोर हो इसके लिए हर संभव कोशिश करेंगे ....। फारुख अब्दुल्ला जैसे लोगों को सलाह होगी कि वे इस तरह पाकिस्तान समर्थक बयान देना बंद करें।  उनका बयान अस्वीकार्य और निंदनीय है। देश के लोगों को भी ऐसे बयान के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए। इसका हर ओर से विरोध हो, निदंा के शब्द आएं ताकि दूसरे लोग उनके जैसे बयान देने का साहस तक न कर सकें।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर,पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408,09811027208

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